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सोमवार, 24 दिसंबर 2018

मीनारा मस्जिद - मुंबई का अजमेर शरीफ



हरिगोविंद विश्वकर्मा
यूं तो माहे रमज़ान हर मुसलमान के लिए खास होता है और ज़्यादातर मुलमान पूरे महीने भर रोजा रखते हैं। रोजे के इस महीने में दक्षिण मुंबई की मशहूर मस्जिद मीनारा मस्जिद में नमाज पढ़ने और सजदा करने का मौका मिल जाए तो इबादत में चांर चांद लग जाता है। इसीलिए रमजान महीने में मीनारा मस्जिद में चहल-पहल बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। सबसे बड़ी बात महीने भर यहां रोजाना ढाई हजार लोग एक साथ पांचों वक्त की नमाज अता करने हैं।
मीनारा मस्जिद मुंबई की सबसे पुरानी मस्जिदों में से एक रही है। इसका निर्माण सन् 1835-1840 के बीच हुआ। मीनारा मस्जिद के मुख्य ट्रस्टी जनाब अब्दुल वहाब बताते हैं कि मीनारा मस्जिद के निर्माण के बाद से ही यहां नमाज अता करने का सिलसिला शुरू हो गया था, लेकिन मीनारा मस्जिद की ओनर मीनारा मस्जिद ट्रस्ट का पंजीकरण बॉम्बे की ब्रिटिश हुकूमत में चैरिटी विभाग में 30-35 साल बाद 1879 में हो पाया। दो मंजिली (ग्राउंड फ्लस वन प्लस टैरेस) यह पाक मस्जिद 1850 वर्ग मीटर क्षेत्रफल में फैली है। इसके पहले मुख्य ट्रस्टी जनाब अली मोहम्मद मर्चेंट थे।
मीनारा मस्जिद का निर्माण हलाई मेमन जमात के कारोबारी परिवार ने करवाया। इस्लाम में बहुत ज्यादा आस्था रखने वाले हलाई मेमन जमात का परिवार अपनी आमदमी का एक बड़ा हिस्सा धर्म-कर्म, इबादत और दान पर खर्च कर देता था। मीनारा मस्जिद और दूसरे धर्मस्थलों का निर्माण उसके परोपकार का हिस्सा था। यह मस्जिद रंग बिरंगी सजावट के चलते रात में जगमग करती रहती है।
दरअसल, बॉम्बे के सात टापुओं में से दो बॉम्बे और मजगांव द्वापों को रिक्लेम करने के बाद बनी जगह पर मेमन समुदाय के कारोबारी आकर बसे। उस समय आसपास कोई मस्जिद नहीं थी। इससे जमात के लोगों को नमाज अता करने में असुविधा होती थी। उसी असुविधा को दूर करने के लिए मीनारा मस्जिद का निर्माण कराने का फैसला लिया। जनाब अब्दुल वहाब बताते हैं कि पूरा मोहम्मद अली रोड और आसपास के इलाके को मेमन समुदाय ने ही बसाया और गुलजार किया है। मेमन समुदाय के कारोबारियों ने ही उस दौर में मीनारा मस्जिद के अलावा जकारिया मस्जिद समेत कई मस्जिदों और गरगाहों का निर्माण करवाया।
मीनारा मस्जिद की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इस मस्जिद परिसर में एक दरगाह भी है और यहां अजमेर शरीफ की तरह कई सूफी संतों की मजारें भी है। इस कारण नमाज के लिए इसकी अहमियत बहुत बढ़ जाती है। मीनारा मस्जिद एक तरह से मोहम्मद अली रोड ही नहीं पूरी दक्षिण मुंबई की ताज की तरह है। पिछले साल इस मस्जिद में सोलर सिस्टम लगा दिया गया। यहां की बिजली की खपत का 35 हिस्सा सोलर ऊर्जा से आता है। उसके लिए टैरेस पर सोलर पैनल लगाए गए है। मीनारा मज्सिद मुंबई की पहली मस्जिद है जहां गैरपरंपरागत ऊर्जा का इस्तेमाल हो रहा है। कुल मिलाकर यह मस्जिद विश्व बंधुत्व एवं भाईचारे का संदेश देती है।

दादर कबूतरखाना - कबूतरों का आशियाना


हरिगोविंद विश्वकर्मा
सुपरस्टारद्वय रजनीकांत और अक्षय कुमार की फिल्म '2.0' ने बॉक्स ऑफिस पर धूम मचा दी है। इस फिल्म ने कमाई के मामले में पिछली कई फिल्मों को पीछे छोड़ दिया है। इस फिल्म में बताया गया है कि किस तरह पक्षियों की प्रजातियों के नष्ट होने से मानव गंभीर बीमारियों का शिकार हो रहा है। लिहाजा, फिल्म के जरिए पक्षियों की रक्षा का संदेश दिया गया है। पक्षियों की रक्षा का यह संदेश आज का नहीं, बल्कि तकरीबन नौ दशक पुराना है। पक्षियों को बचाने और उन्हें दाना-पानी देने के लिए ही मुंबई में जगह-जगह कबूतरखाना का निर्माण किया गया था। यह कार्य ब्रिटिश शासन के दौरान हुआ था। उसी क्रम में दादर रेलवे स्टेशन से वॉकिंग डिस्टेंस पर एक कबूतरखाना बनाया गया था। तब से यह कबूतरखाना पक्षियों खासकर कबूतरों का बसेरा रहा है। आज भी दादर का कबूतरखाना मुंबई के जाने पहचाने स्थलों में गिना जाता है।
एम.सी. जावले रोड के त्रिमुहानी पर स्थित कबूतरखाने की संरचना का निर्माण 1933 में किया गया था। तब यहां रोजाना करीब चार हजार कबूतर दाना चुगते थे और पानी पीते थे। यहां रोजाना करीब 15 सौ किलोग्राम चना, जवारी, बाजरा और मूंग कबूतर खाते थे और यहां रखा पानी पीते थे। कबूतरों को अन्न-जल देने का यह अभियान आज भी जारी है। शांतिनाथ जैन मंदिर, हनुमान मंदिर और एक मस्जिद से घिरा यह कबूतरखाना कभी बहुत शांतिप्रिय स्थल हुआ करता था। इसीलिए इसकी लिस्टिंग ग्रेड दो की विरासत के रूप में हुई है। इसका ग्रिल कॉस्ट आयरन का बनाया गया था। यह पुराना धान्यागार था। अब सूरत-ए-हाल एकदम बदल गया है। बड़ी संख्या में वाहनों के आवागमन और फेरीवालों के कारण यह स्थल बहुत भीड़-भाड़ वाला हो गया है। कभी यहां एक फव्वारा होता था, जो कई साल से बंद है। यह कबूतरखाना कभी शूटिंग के लिए फिल्मकारों की मनपसंद जगह होती थी। 
यह जाना पहचाना स्थान अपने जीवन के छठे-सातवें दशक में जी रहे नागरिकों के होठों पर मुस्कान लाता है। कई लोग आज भी कबूतरों को दाना देने नियमित आते हैं। पिछले सात दशक से इस विरासत का रखरखाव दादर कबूतरखाना ट्रस्ट दादर मार्केट की दुकानों से धन संग्रह करके करता है। बॉम्बे वेट्स कॉलेज और बीएसपीसीए के पशु चिकित्सक नियमित रूप से टीकाकरण के लिए इसका दौरा करते रहते हैं। कबूतरों को विटामिन की जरूरी खुराक देते हैं, जिससे आलसी कबूतर फिट और बीमारियों से दूर रहें और कबूतर खाने के आसपास के लोगों को इनके कारण कोई बीमारी न हो। इसके बावजूद कुछ समय पहले महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना की ओर से दादर कबूतरखाना बंद कराने की मांग की गई थी। मनसे नगरसेवक संदीप देशपांडे का तर्क था, "कबूतरखाने के आसपास रहने वालों का कहना है कि कबूतरखाना की वजह से तरह-तरह की बीमारियां फैल रही हैं और लोग बीमार हो रहे हैं। जनता के हित में हम लोगों ने इस कबूतरखाने को बंद करने के लिए बीएमसी कमिशनर अजय मेहता को पत्र लिखा।" हालांकि भाजपा के नगरसेवकों ने विराध किया था और कहा था कि इसका सुंदरीकरण करके इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाए। दूसरी ओर वन्यजीव प्रेमी लता अंकलेकर कहती हैं, "कबूतर कोई बीमारी नहीं फैलाते हैं। जो अपनी सेहत का ध्यान नहीं देते हैं, वे खुद बीमार पड़ते हैं और आरोप कबूतरों पर लगाते हैं। मैं 25 कबूतरखाने के पास ही 25 बिल्लियों के साथ रहती हूं। उनकी गंदगी खुद साफ करती हूं, मुझे कोई बीमारी नहीं लगती।"


माहिम चर्च - देश का सबसे पुराना चर्च



हरिगोविंद विश्वकर्मा
प्रभु ईसा मसीह का जन्मदिन और क्रिसमस-डे शहर के तमाम चर्चों (गिरिजाघरों) में बीती शाम से ही धूमधाम से मनाया जा रहा है। इस दौरान इन स्थलों को आकर्षक झांकी व पेड़ों से भी सजाया गया। क्रिसमस के मौके पर हर चर्च को दूल्हन की तरह सजाया जाता है। माहिम चर्च हर साल दिसंबर में अलग रूप में नजर आता है। इस चर्च में क्रिसमस बेहद लोकप्रिय है।
माहिम चर्च का असली नाम सेंट माइकल चर्च है। यह मुंबई ही नहीं देश के सबसे पुराने कैथोलिक चर्च में से एक है। यह पुर्तगालियों द्वारा बनाया गया पहला निर्माण है। दरअसल, 1534 में सुल्तान बहादुर शाह को हराकर पुर्तगालियों ने मुंबई पर नियंत्रण कर लिया। उन्होंने इसके बाद यहां दो चर्च बनवाए। इनके निर्माण चर्च निर्माता एंटोनियो डो पोर्टो ने किए थे। पहला चर्च सेंट मिगुल मांडव तट यानी अप माहिम में बना था, दूसरा चर्च लेडी ऑफ साल्वेशन लोअर माहिम (अब दादर) में बना और कॉन्वेंट के रूप में कार्य करता था। अपर माहिम के चर्च को 1585 में सेंट माइकल चर्च का जाने लगा। निर्माण के बाद कई चर्चों का पुनर्निर्माण भी किया गया।

18 वीं शताब्दी के आसपास बांद्रा इलाके में एक लोकप्रिय चैपल था। इसको 'ऑवर लेडी ऑफ द माउंट' के नाम से जाना जाता था। इस इमारत को पुर्तगालियों ने नष्ट कर दिया। संयोग से उस समय वर्जिन मैरी की एक नामचीन तस्वीर को बचा लिया गया था और उस उस तस्वीर को सेंट माइकल चर्च में स्थापित कर दिया गया और तब से यह तस्वीर चर्च के प्रमुख आकर्षणों में से एक है।
चैपल पर हमले के बाद लंबे समय तक एपोस्टोलिक विकर्स और पड्रोडो ऑर्डर के बीच तनाव कायम रहा और चर्च पर 60 वर्षों तक एपोस्टोलिक का कब्जा रहा। काफी संघर्ष और हमले के बाद  आखिरकार 1853 में पुर्तगाली पड्रोडो ऑर्डर ने इस चर्चर को अपने नियंत्रण में लिया। फिलहाल एकमात्र जीवित पुर्तगाली इमारतों में से एक सेंट माइकल चर्च विभिन्न औपनिवेशिक शक्तियों के प्रभाव के प्रमाण के रूप जाना जाता है।  सन 1668 में मुगलों और सिद्दियों ने मुंबई पर आक्रमण किया। लेकिन अंग्रेजों ने मुगलों के 14 जहाजों पर कब्ज़ा कर लिया और उन्हें खदेड़ दिया। मुगलों ने बदला लेने के लिए 1689 में फिर सैन्य टुकड़ी बॉम्बे भेजी। मुगलों की सेना ने मुंबई को घेर लिया और भारी तबाही की। इस हमले में सेंट माइकल चर्च भी क्षतिग्रस्त हुआ। बाद में समझौता होने पर लड़ाई खत्म हो गई।

20 वीं शताब्दी में सेंट माइकल चर्च का नवीकरण किया गया। चर्च का मौजूदा स्वरूप 1973 में बनाया गया। प्रारंभ में, ग्लास पेंटिंग, आकर्षक संरचनाएं, लकड़ी की बेंच, वर्जिन मैरी और जीसस क्राइस्ट की तस्वीरें इस सुंदर कैथोलिक चर्च को सुशोभित करती थीं। लेकिन चर्च के निरंतर और बार बार नवीकरण के कारण चर्च के पुर्तगाली वास्तुकला के सभी अवशेष अब गायब हो गए हैं। अब चर्च यहां सिर्फ एक शानदार इमारतीय संरचना है, जो शहर की सबसे पुरानी पुर्तगाली इमारतों में से एक है।
चर्च के सामने फुटपाथ पर एक छोटा सा बाजार  है, जहां आप मोमबत्तियां, हार-माला, ताजे फूल और कई और उपयोगी सामान बिकते हैं।  बुधवार को चर्च में आयोजित नोवेना मास में हिस्सा लेने और अपनी मनोकामनाएं पूर्ण करने का एक शानदार अवसर मिलता है। ऐसी मान्यता है कि जो लोग  9 बुधवार को नवीना मास में भाग लेते हैं, उनकी मनोकामना पूरी होती है। दरअसल, नोवेना परंपरा 1948 में शुरू हुई। सबसे खास बात है कि कैथोलिक चर्च में सभी धर्म के अनुयायियों को प्रवेश और इनकी सेवाओं का लाभ उठाने की अनुमति है। अधिकतर समय, चर्च को आकर्षक रूप से सजाया जाता है और अनुयायियों की आवाजाही होती रहती है।

ईसाई धर्म की अनुयायी और नियमित चर्च जाने वाली जॉयस डीसूजा कहती हैं, "ईसा मसीह ने मानवता को गुलामी से मुक्त कराने के लिए जन्म लिया था। इसीलिए उनके जन्म दिन को ईसाई समुदाय के लोग धूमधाम से मनाते हैं। उन्होंने मानवता की रक्षा के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया।"

सोमवार, 10 दिसंबर 2018

अंततः कांग्रेस में जान फूंकने में सफल रहे राहुल गांधी


हरिगोविंद विश्वकर्मा
अगर चार राज्यों में हुए विधान सभा चुनाव और उसके पहले के राजनीतिक परिवेश पर ग़ौर करें तो यही लगता है कि कांग्रेस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुक़ाबले अपने अध्यक्ष राहुल गांधी को प्रोजेक्ट करने में पूरी तरह सफल रही है। मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना विधान सभा के चुनाव नतीजे कांग्रेस की वापसी की कहानी कह रहे हैं। इसमे दो राय नहीं कि चुनावों में राहुल गांधी ने न केवल कांग्रेस पार्टी में रिवाइव किया, बल्कि वह ख़ुद को राष्ट्रीय स्तर पर मोदी के मुक़ाबले स्टेब्लिश करने में भी सफल रहे हैं। प्रधानमंत्री और उनकी सरकार पर जोरदार हमले के चलते कांग्रेस के फ़ायरब्रांड नेता के रूप में उभरे राहुल गांधी ही अब अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी को चुनौती देंगे।

यह कहने में कोई गुरेज नहीं कि कांग्रेस अब मई 2014 वाली स्थिति से उबर कर बहुत ऊपर आ गई है। उसका ग्राफ इतनी तेजी से बढ़ रहा है कि भाजपा और उसकी पितृ संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के खेमे में कांग्रेस और राहुल गांधी को ख़तरे के रूप में देखा जाने लगा है। भाजपा भली-भांति जानती है, कि राष्ट्रीय स्तर पर उसे अखिलेश-तेजस्वी, पटनायक-नायडू, ममता-मायावती या पवार-केजरीवाल से कोई ख़तरा नहीं है। भगवा पार्टी को ख़तरा केवल राहुल गांधी से है। अगर भविष्य में नरेंद्र मोदी को चुनौती मिली तो केवल राहुल से ही मिलेगी। इसीलिए मोदी समर्थकों के निशाने पर सबसे ज़्यादा राहुल गांधी ही रहते हैं। राहुल को उपहास का पात्र बनाने का कोई मौक़ा मोदी के समर्थक नहीं चूकते हैं। फेसबुक, ट्विटर और व्हाटसअप जैसे सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स पर राहुल के बारे में थोक के भाव में चुटकुले रचे जाते हैं और यह साबित करने की कोशिश की जाती है कि नरेंद्र मोदी के मुक़ाबले राहुल गांधी कहीं नहीं ठहरते, जबकि हक़ीक़त यह है कि उदार और जेंटलमैन पॉलिटिशियन की छवि वाले राहुल मुक़ाबले में हैं।

यह सच है कि राहुल को संभावित विकल्प बनता देखकर पिछले चार-पांच साल के दौरान उनके बारे में नकारात्मक बातें बहुत ज़्यादा कही और लिखी गई हैं। भाजपा से सहानुभूति रखने वाले अब भी राहुल गांधी को ऐसा अरिपक्व नेता बताते हैं, जो अब भी अपनी मां पर निर्भर है। ख़ुद नरेंद्र मोदी चुनाव प्रचार में अपने काम का ज़िक्र बिल्कुल नहीं करते हैं। वह कांग्रेस के कार्यकाल और कांग्रेस परिवार का ज़िक्र करते हैं। बहरहाल, नकारत्मक पब्लिसिटी से निकाले गए निष्कर्ष सत्य से परे हैं, क्योंकि ये निष्कर्ष केवल नकारात्मक पब्लिसिटी पर आधारित होते हैं। इसके विपरीत राहुल बार-बार राफेल विमान सौदे की बात करके भाजपा को लगातार कठघरे में खड़ा करते रहे हैं और पूछते रहे हैं कि नरेंद्र मोदी सरकार ने राफेल विमान को कितने में ख़रीदा। मजेदार बात यह है कि गोपनीयता का हवाला देते हुए सरकार और भाजपा के लोग राफेल का दाम नहीं बता रहे हैं। यहां तक कि वित्तमंत्री अरुण जेटली जैसा तथ्यों की बात करने वाले नेता राफेल के दाम में कम कीमत का परसेंट तो बता रहे हैं, लेकिन सही दाम नहीं बता रहे हैं। इससे देश के आम आदमी के मन में शंका पैदा होती है कि कहीं न कहीं गड़बड़ी जरूर है। अन्यथा अगर केंद्र सरकार ने राफेल को कांग्रेस से कम कीमत पर ख़रीदा होता तो अब तक इसका इतना प्रचार प्रसार कर दिया जाता कि राफेल का दाम हर आदमी की ज़ुबान पर होता। 

चारों विधान सभा चुनाव में राहुल गांधी बेहद सक्रिय रहे और प्रचार में उसी तरह जुटे रहे, जिस तरह नरेंद्र मोदी 2014 से कर रहे हैं। यह कांग्रेस के लिए शुभ संकेत हैं कि राहुल कांग्रेस संगठन को पर्याप्त समय दे रहे है। इसी के चलते वह कांग्रेस में जान फूंकने में सफल रहे हैं। राहुल के पक्ष में यह बात जाती है कि उनमें विपक्ष का नेता बनने के सारे नैसर्गिक गुण हैं। सत्ता पक्ष में राहुल भले सफल न हुए, लेकिन विपक्ष में वह सफल हो सकते हैं, क्योंकि उनका तेवर ही विपक्षी नेता का है यानी उनका नैसर्गिक टेस्ट सिस्टम विरोधी है। याद कीजिए, 2013 की घटना जब राहुल ने अजय माकन की प्रेस कांफ्रेंस में पहुंचकर सबके सामने अध्यादेश को फाड़ दिया था। राहुल के कृत्य को सीधे प्रधानमंत्री और यूपीए सरकार की बेइज़्ज़ती माना गया था हालांकि राहुल की इस मुद्दे पर तारीफ़ ही हुई थी।

आजकल राष्ट्रीय स्तर पर केवल दो ही नेताओं की चर्चा हो रही है। या नरेंद्र मोदी या फिर राहुल गांधी। यही तो कांग्रेस चाहती थी। कह सकते हैं कि यहां राहुल गांधी या कांग्रेस के मैनेजर्स की अपनी रणनीति पूरी तरह सफल हो दिख रहे हैं, क्योंकि विपक्ष में बाक़ी दल एक दो राज्य तक ही सीमित हैं। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का जनाधार केवल उत्तर प्रदेश में हैं, तो राष्ट्रीय जनता दल बिहार की पार्टी है। ममता की तृणमूल का पश्चिम बंगाल के बाहर कोई अस्तित्व नहीं है, तो बीजू जनता दल को भी नवीन पटनायक ने उड़ीसा से बाहर ले जाने की कोशिश ही नहीं की। यही हाल तेलुगु देशम, तेलंगाना राष्ट्र समिति, तमिल पार्टियों और वामपंथी दलों का है। भाजपा और कांग्रेस के मुक़ाबले खड़ा होने का माद्दा आम आदमी पार्टी में ज़रूर था, लेकिन अरविंद केजरीवाल की महत्वाकांक्षा ने इस पार्टी को दिल्ली की क्षेत्रीय पार्टी बना दिया। मतलब इन दलों के नेता नरेंद्र मोदी को राष्ट्रीय स्तर पर चुनौती देंगे, इसकी उम्मीद नहीं के बराबर है।
 
इस देश की जनता का टेस्ट ही ऐसा है कि यहां जुमलेबाज़ नेता के लिए हमेशा ज़बरदस्त स्कोप रहता है। उसी जुमलेबाज़ी से जनता को रिझा कर नरेंद्र मोदी सत्ता में पहुंचे हैं। अगर कहें कि राहुल गांधी अब मोदी की तरह जुमलेबाज़ी करने लगे हैं, तो अतिशयोक्ति या हैरानी नहीं होनी चाहिए। अभी हाल ही में एक चुनाव सभा में राहुल ने कहा, "भाइयो और बहनों, आपके पिताजी ने कुछ नहीं किया। आपके दादाजी ने भी कुछ नहीं किया। इतना ही नहीं आपने परदादाजी ने भी कुछ नहीं किया।" यह मोदी की ही स्टाइल में उनको दिया गया जवाब था। छत्तीसगढ़ में राहुल ने नरेंद्र मोदी का नाम लेकर कहा, "मोदीजी आप दिन गिनकर रख लें। कांग्रेस सत्ता में आई तो 10 दिनों के भीतर किसानों का कर्ज माफ हो जाएगा और यह पैसा नीरव मोदी, विजय माल्या और अनिल अंबानी के पास से आएगा।" राफेल का ज़िक्र करते हुए राहुल कहते हैं, "चौकीदार चोर है।" ऐसी ही जुमलेबाज़ी राहुल ने गुजरात विधानसभा चुनाव में की थी और जीएसटी को 'गब्बर सिंह टैक्स' का नाम दिया था। इससे पहले मोदी सरकार को 'शूट-बूट की सरकार' और उनकी योजनाओं को 'फेयर ऐंड लवली योजना' करार दे चुके हैं। यह सब जुमलेबाजी है। दरअसल, अब तक ऐसी जुमलेबाज़ी केवल नरेंद्र मोदी ही करते रहे हैं। यानी जुमलेबाज़ी के मुद्दे पर भी मोदी के सामने राहुल गंभीर चुनौती पेश करने लगे हैं।

राहुल गांधी के संसद या संसद से बाहर दिए गए भाषणों पर अगर ग़ौर करें तो पाएंगे कि वह भी लिखा हुआ भाषण नहीं पढ़ते। यानी लोगों को संबोधित करने की नैसर्गिक परिपक्वता अब उनमें आ गई है, जो किसी बड़े नेता के लिए बहुत ज़रूरी है। पब्लिक फोरा पर भी वह परिपक्व नेता की तरह बड़ी बेबाकी से हर मुद्दे पर अपनी बात रखते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि राहुल का होमवर्क ठीकठाक ही नहीं, देश के कई प्रमुख नेताओं के मुक़ाबले बहुत ही अच्छा होता है। एकाध फ्लंबिंग को छोड़ दें, तो कम से कम वह बोलते समय ब्लंडर नहीं करते और जेंटलमैन की तरह अपनी बात रखते हैं। वह जब भी बोलते हैं, अच्छा बोलते हैं। भाषण भी अच्छा और प्रभावशाली देते हैं। लोकसभा में कई बार उन्होंने यादगार भाषण दिया भी है।

राहुल गांधी के पक्ष में एक और बात जाती है कि वह गांधी वंशवाद के प्रतिनिधि हैं। 38 साल तक देश को प्रधानमंत्री देने वाले नेहरू-गांधी खानदान के वह पुरुष वारिस हैं। भारत के लोग वंशवाद पर भी फ़िदा रहते हैं। मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान, शरद पवार, बाल ठाकरे, गोपीनाथ मुंडे, सिंधिया परिवार, अब्दुल्ला और सोरेन फैमिली, पटनायक और करुणानिधि परिवार भारतीय नागरिकों की इसी गुलाम मानसिकता के कारण फलते-फूलते रहे हैं। ये नेता जनता की इसी कमज़ोरी को भुनाकर अपने परिवार के लोगों को संसद और विधान सभा में भेजते रहे हैं। दरअसल, सदियों से खानदानी हिंदू राजाओं या मुस्लिम शासकों के शासन में सांस लेने के कारण यहां की जनता ग़ुलाम मानसिकता की हो गई है। मूढ़ किस्म की इस जनता को वंशवाद शासन बहुत भाता है। लिहाज़ा, इस तरह की भावुक जनता के लिए राहुल गांधी सबसे फिट नेता हैं।