रविवार, 7 अप्रैल 2019

क्या सबसे ज़्यादा ख़तरा आडवाणी से ही है मोदी ब्रांड को?


क्या सबसे ज़्यादा ख़तरा आडवाणी से ही है मोदी ब्रांड को?

हरिगोविंद विश्वकर्मा
जीवन के आख़िरी दौर में प्रवेश कर चुके भारतीय राजनीति के पुरोधा लालकृष्ण आडवाणी क्यों रिटायर नहीं होना चाहते। वह उम्र के उस दौर में है, जब सामान्यतया इंसान की शारीरिक-मानसिक काम करने लायक नहीं रह जाता। ऐसे समय आडवाणी सक्रिय है। उनकी सक्रियता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह चुनाव के ऐन मौक़े पर ब्लॉग लिखकर सरकार और भारतीय जनता पार्टी को सलाह दे रहे हैं। ऐसी सलाह दे रहे हैं, जिसका उत्तर देने में बीजेपी के मैनेजर्स को असुविधा हो रही है।
दिसंबर के बाद से ही आडवाणी चुप थे। मगर चुनावी प्रक्रिया शुरू होते ही ब्लॉग लिख दिया। अपने ब्लॉग में आडवाणी ने लिखा, बीजेपी में राजनीतिक असहमति रखने वालों को देशद्रोही बताने की परंपरा नहीं रही है। ज़ाहिर है, आडवाणी के ब्लॉग के बाद बीजेपी बचाव की मुद्रा में आ गई। सोशल मीडिया गर्म चुनावी मौसम में और गर्मी भर दी है। बीजेपी के विरोधियों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह पर निशाना साधने का मौका दे दिया है। ऐसी बात नहीं है कि आडवाणी ने अपनी विशेष  गांधी स्टाइल में मोदी पर पहली बार हमला बोला है। वह पिछले पांच साल से इसी तरह धीरे-धीरे ब्रांड मोदी की धार कम करने की असफल कोशिश कर रहे हैं।


अभी पिछले दिसंबर में अटलबिहारी वाजपेयी की शोकसभा में की एक फोटो वायरल हो गई थी, जिसमें मोदी और आडवाणी आमने सामने थे। तस्वीर में मोदी हाथ पीछे करके खड़े थे, जबकि आडवाणी हाथ जोड़े दीन-हीन अवस्था में दिख रहे थे। यह तस्वीर इतनी ज़्यादा अपीलिंग थी कि इसे देखकर भावुक किस्म का आम आदमी निष्कर्ष निकलने लगा था कि देखिए मोदी ने कभी गुरु रहे आडवाणी को किस अवस्था में लाकर खड़ा कर दिया। एकलव्य जैसी गुरु-शिष्य की परंपरा में विश्वास करने वाले लोग अगले पर मन ही मन कहने लगे कि शिष्य का व्यवहार ठीक नहीं और अंत में सबकी सहानुभूति आडवाणी के साथ हो गई।

अगर इस प्रसंग के तह मे जाएं, तो मज़ेदार निष्कर्ष निकलता है। अमूमन होता है कि हम किसी से मिलते हैं, तो अभिवादन की भारतीय परंपरा के अनुसार हाथ जोड़ देते हैं या गर्मजोशी से हाथ मिलाते हैं या आत्मीयता थोड़ी अधिक होने पर गले लग जाते हैं। अभिवादन की यह औपचारिकता केवल चंद लमहों की ही होती हैं। लोग इसका नोटिस नहीं लेते, क्योंकि इसे भारतीय परंपरा में मानव का बहुत नैसर्गिक गेस्चर माना गया है। जो लोग हाथ जोड़कर अभिवादन करना पंसद करते हैं, वे भी कुछ पल हाथ जोड़ते हैं, फिर सामान्य अवस्था में आ जाते हैं। वीआईपी कल्चर वाले नेता पब्लिक अपीयरेंस में सबसे हाथ तो मिला नहीं पाते है, लिहाज़ा हाथ जोड़ लेते हैं।
आडवाणी के हावभाव और अभिवादन के तरीक़ा से पूरा देश वाकिफ रहा है। उनके हावभाव पर गौर करने वाले जानते है कि वह हमेशा से पब्लिक अपीयरेंस में हाथ जोड़कर आगे बढ़ते या लोगों से मिलते रहे हैं। 1990 के दशक में जब सोमनाथ से अयोध्या की रथयात्रा पर निकले थे, तब भी आमतौर पर हाथ जोड़े रहते थे। वह हाथ जोड़े रहने वाली मुद्रा में इसलिए भी रहते थे, क्योंकि लगातार सामने लोग आते रहते थे, लिहाज़ा बार-बार हाथ जोड़ना और सामान्य अवस्था में आना असुविधाजनक था। इसी तरह, आडवाणी जब केंद्र में गृहमंत्री थे तब भी पब्लिक अपीयरेंस में हाथ जोड़े रहते थे। जून 2002 के दूसरे हफ़्ते में जब टाइम मैगज़िन के दिल्ली संवाददता नागरिक अलेक्स पैरी ने वाजपेयी को 'हॉफडेड पीएम' करार देते हुए चर्चित कवर स्टोरी लिखी, जिसके चलते उन्हें देश छोड़ना पड़ा और रातोरात आडवाणी उपप्रधानमंत्री बनाए गए थे, तक भी आडवाणी हाथ जोड़ने वाली मुद्रा में ही रहते थे। नब्बे के दशक के अंतिम और पिछले दशक के आरंभ के आडवाणी के विजुअल्स देखें तो वह हाथ जोड़े ही दिखेंगे।
दरअसल, आडवाणी की हाथ जोड़ने वाली स्टाइल जस की तस है, बस आजकल उसमें नई चीज़ जुड़ गई है। वह है चेहरे पर याचक वाला इक्सप्रेशन। पिछले चार-पांच साल से लोग उनमें हर मंच पर हाथ जोड़े याचक ही देख रहे हैं। ऐसा याचक, जिसके साथ बहुत ज़्यादा नाइंसाफ़ी हुई। आडवाणी का दूसरे नेताओं से सामना होने पर नहीं नोटिस नहीं लिया जाता, लेकिन जब सामना कभी उनके शिष्य रहे मोदी से होता है, तब हर कैमरामैन फोटो क्लिक कर लेता है। वाजपेयी की शोकसभा में हाथ मोदी भी जोड़े थे, लेकिन कुछ सेंकेंड के लिए, लेकिन आडवाणी हाथ जोड़े ही रहे और एक अवस्था ऐसी आ गई है कि मोदी सीधे खड़े दिखे और आडवाणी दीन-हीन याचक। इसी कारण वह तस्वीर वाइरल हुई।
आडवाणी की याचक मुद्रा वाली तस्वीर देखकर लगता है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी अहंकारी हो गए और आडवाणी को दीन-हीन बना दिया। यह आडवाणी का अचूक हथियार है, महाबली अंग्रेज़ों के समक्ष महात्मा गांधी की अहिंसा की तरह। यह ब्रम्हास्त्र है और मोदी का पर्सनॉलिटी कल्ट डैमेज कर रहा है। इसके ज़रिए आडवाणी वह व्यक्त कर दे रहे हैं, जो वह मोदी को प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनाए जाने का विरोध कर नहीं व्यक्त कर सके थे।
हो सकता है आडवाणी यह नही चाहते हों, लेकिन उनकी दीनहीन याचक बुजुर्ग वाली मुद्रा मोदी को गाहे-बगाहे खलनायक शिष्य की इमैज दे रहा है। आडवाणी की इस मुद्रा से यही निष्कर्ष निकलता है कि जिस भाजपा को अपने ख़ून-पसीने से आडवाणी ने इस मुकाम तक पहुंचाया, उसी भाजपा में उनको राष्ट्रपति बनाना तो दूर की बात मोदी अब उनकी भी दुर्गति कर रहे हैं। आडवाणी का यह अचूक हथियार मोदी की छवि को नष्ट करने की वैसी ही ताक़त रखता है। ठीक वैसे ही जैसे अहिंसावादी ताक़त से गांधी जी ने अंग्रेज़ी साम्राज्य की नींव हिला दी थी।

शनिवार, 6 अप्रैल 2019

क्या मोदी का अंधविरोध ही मुसलमानों का एकमात्र एजेंडा है?

हरिगोविंद विश्वकर्मा
भारतीय मुसलमानों की समस्याओं को लेकर समय-समय पर कई तरह की सरकारी रिपोर्ट सामने आती रही हैं। यूपीए की तत्कालीन मनमोहन सरकार और महाराष्ट्र में पूर्व सीएम विलासराव देशमुख की ओर से भी मुसलमानों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति की पड़ताल के लिए अलग-अलग कमेटी गठित की गई, जिनमें मुसलमानों की सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, शैक्षणिक स्थिति को लेकर चौंकाने वाले तथ्य सामने आए।

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बहरहाल, अगर सोशल मीडिया या वॉट्सअप या दूसरे मेसेंजर्स पर पोस्ट हो रहे लेखोंविचारों या दूसरी सामग्रियों के कंटेंट पर गौर करेंतो एक तरफ़ से सारे मुसलमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विरोध कर रहे हैं। केवल वही मुसलमान मोदी का समर्थन कर रहे हैंजो किसी न किसी तरह भाजपा या भाजपा नेताओं से जुड़े हैं। बाक़ी सब मोदी विरोधी खेमे में खड़े नज़र आ रहे हैं। चाहे अनपढ़ मजदूर मुसलमान हों या फिर उच्च शिक्षित मुस्लिम बुद्धिजीवीचाहे राजनेता हों अथवा सामाजिक कार्यकर्ताएक तरफ़ से सब के सब मोदी विरोध का परचम लहरा रहे हैं। मोदी का अंधविरोध इतना तीव्र है कि इन्हें मोदी के अलावा हर कोई मंजूर है। चाहे वह कोई भी हो। यहां तक कि रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवादित ढांचे के विध्वंस के लिए कथित तौर पर सीधे ज़िम्मेदार लालकृष्ण आडवाणी से भी परहेज़ नहीं। बस मोदी को हटाओ। मोदी को हराओ। किसी भी क़ीमत पर हराओ। मोदी दोबारा प्रधानमंत्री न बनने पाएं।

इस अंध मोदी विरोध से आम आदमी ख़ासकर गैरमुस्लिम लोगों के मन में सवाल उठ रहा है कि क्या अंध मोदी विरोध ही मुसलमानों का एकमात्र एजेंडा हैआख़िर मुस्लिम बुद्धिजीवी दूसरे ज़रूरी मुद्दों पर इतने सक्रिय क्यों नहीं हैंक्या मुस्लिम समाज के समक्ष मोदी विरोध के अलावा और कोई समस्या नहीं हैदरअसलइस सवाल का जवाब तलाशने के लिए राजिंदर सच्चर कमेटीरंगनाथ मिश्रा आयोग और महमूदुर रहमान समिति की रिपोर्ट पर गौर करना पड़ेगा। इन रिपोर्ट्स से पता चलता है कि आज की तारीख़ में मुस्लिम समाज के सामने सबसे ज़्यादा समस्या है। कोई दूसरा समाज आज इतनी समस्याओं से दो-चार नहीं हैजितना मुस्लिम समाज। सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्र आयोग की रिपोर्ट से सभी अवगत हैं। महाराष्ट्र में मुसलमानों की समस्या के लिए आज चर्चा करते हैं महमूदुर रहमान समिति की रिपोर्ट्स की।

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दरअसल2006 में राजिंदर सच्चर कमेटी की रिपोर्ट लोकसभा में पेश होने के बाद 2008 में महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख ने राज्य में मुसलमानों की शैक्षिक-सामाजिक-आर्थिक स्थिति का अध्ययन करने के लिए रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट डॉ. महमूदुर रहमान की अगुवाई में छह सदस्यीय समिति का गठन किया। उसे महमूदुर रहमान समिति कहा गया। समिति ने रिपोर्ट अक्टूबर 2013 में कांग्रेस-एनसीपी सरकार को सौंप दीलेकिन राज्य सरकार ने उसे सार्वजनिक नहीं किया। इस बीच रिपोर्ट मीडिया में लीक ज़रूर हो गई। महमूदुर रहमान समिति की रिपोर्ट में टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसएसएनडीटी वीमेन यूनिवर्सिटी की इकोनॉमिक्स फैकेल्टी और मुंबई यूनिवर्सिटी के निर्मला निकेतन कॉलेज ऑफ़ सोशल वर्क समेतकुल सात विश्वसनीय संस्थानों के भरोसेमंद सर्वेज़ और स्टडीज़ का हवाला दिया गया है। रिपोर्ट में मुसलमानों के बारे में कई हैरान करने वाले तथ्य सामने आए। महाराष्ट्र मेंदेहात की बात छोड़ देंमुंबई जैसे शहर में रहने वाले मुसलमानों की भी हालत एकदम पिछड़ी मानी जाने वाली अनुसूचित जाति और जनजाति से भी बदतर अवस्था में है। मुसलमानों को बैंकें क़र्ज़ देने से कतराती हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक़ महाराष्ट्र में 1.20 करोड़ मुसलमान हैंजिनमें 15 साल तक की आबादी 37 फ़ीसदी हैजो ज़्यादा जन्म दर दर्शाती है। पुरुष मुखिया वाले हर मुस्लिम परिवार में औसतन 6.1 सदस्य हैं जबकि महिला मुखिया वाले परिवार में 4.9 सदस्य। रिपोर्ट में बताया गया है कि ग़रीबी और उचित मेडिकेयर का अभाव मुस्लिम 60 साल के बाद जल्दी मर जाते हैं। इसीलिए 60 साल या उससे ज़्यादा उम्र के लोगों की आबादी महज़ 6.6 फ़ीसदी है। यह भी सीरियस रिपोर्ट है। लिहाज़ा इस पर बहुत गंभीर शोध की ज़रूरत है। ताकि मुसलमानों को असामयिक मौत से बचाया जा सके। यह बहुत भयावह निष्कर्ष है।
समिति की रिपोर्ट के मुताबिक़राज्य में केवल 10 फ़ीसदी मुसलमान अपने खेत में कृषि कार्य करते हैं। 49 फ़ीसदी यानी क़रीब आधी मुस्लिम आबादी ग़रीबी रेखा के नीचे गुज़र बसर करने मजबूर है जबकि पूरे देश में 34.4 फ़ीसदी मुसलमान ग़रीब तबके के हैं। राज्य में 20 फ़ीसदी मुसलमानों के पास राशन कार्ड नहीं ही है। इसी तरह 59 फ़ीसदी मुसलमान स्लम और बहुत गंदी बस्तियों में रहते हैं। इनमें भी केवल 18 फ़ीसदी लोगों के घर पक्के हैं। राज्य में बहुत बड़ी तादाद में मुस्लिम युवक बेरोज़गार हैं। 32.4 फ़ीसदी मुसलमान छोटे-मोटे काम करते हैं। शायद यही वजह है कि 45 फ़ीसदी मुसलमानों की परकैपिटा आमदनी महज़ 500 रुपए ही है। 34 फ़ीसदी मुसलमानों (आबादी का एक तिहाई) की मासिक आमदनी 10 हज़ार रुपए से भी कम है। 24 फ़ीसदी 10 से 20 हज़ार महीने कमाते हैंजबकि 20 से 30 हज़ार कमाने वाले मुसलमानों की तादाद 3.8 फ़ीसदी है। 30 से 40 हज़ार रुपए कमाने वाले मुसलमानों की तादाद केवल 1.0 फ़ीसदी है। यह रिपोर्ट मुसलमानों की विपन्नता दिखाती है।
महमूदुर रहमान की रिपोर्ट यह भी कहती है कि मुस्लिम समाज काफ़ी संपन्न लोग भी हैं। देश के बाक़ी समुदायों की तरह मुसलमानों में भी मुट्ठी भर लोग ही बेहतर जीवन जी पाते हैं। यानी केवल 6.0 फ़ीसदी मुसलमान हर महीने 50 हज़ार या उससे ज़्यादा आमदनी करते हैं। शिक्षा के क्षेत्र में महमूदुर रहमान की रिपोर्ट तक़रीबन सच्चर कमेटी जैसी ही है। शिक्षा में मुसलमानों की दशा बहुत दयनीय है। जहां देश में साक्षरता की दर 74 फ़ीसदी हैवहीं मुसलमानों मे साक्षरता मात्र 67.6 फ़ीसदी हैं। महाराष्ट्र में यह 65.5 फ़ीसदी से भी नीचे है। हालांकि,प्राइमरी स्तर पर मुस्लिम बच्चे हिंदुओं से बेहतर स्थिति में हैं। यानी हिंदुओं के 38 फ़ीसदी बच्चे प्राइमरी तक पहुंचते हैंतो मुसलमानों के 47 फ़ीसदी बच्चे स्कूल तक पहुंच जाते हैं। आमतौर पर 14 साल की उम्र में मुस्लिम बच्चे पढ़ाई छोड़ देते हैं और बाल मज़दूर के रूप में काम करने लगते हैं। आर्थिक तंगी इसकी मुख्य वजह है। सेकेंडरी यानी 12वीं तक केवल 4.2 फ़ीसदी बच्चे पहुंच पाते हैं। उच्च शिक्षा का मुस्लिमों का आंकड़ा भयावह है। महज़ 3.1 युवक स्नातक तक पहुंचते हैं। ज़ाहिर है, इसीलिए उच्च कक्षाओं में मुसलमान दिखते ही नहीं।

रिपोर्ट के मुताबिक़राज्य में मुस्लिम लड़कियों की शिक्षा का आंकड़ा तो बेहद निराश करने वाला है। महज़ एक फ़ीसदी लडकियां कॉलेज तक पहुंचती हैं। उच्च शिक्षा हासिल न कर पाने के कारण वे नौकरी वगैरह नहीं कर पाती और मजबूरी में पुरुषों का अत्याचार सहती हैं। उनके शौहर उनके विरोध के बावजूद एक से ज़्यादा निकाह कर लेते हैं। 2006 की थर्ड नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वें के मुताबिक़2.55 फ़ीसदी मुस्लिम महिलाओं के पतियों के पास एक से अधिक बीवियां पाई गई थीं। मुसलमानों में दूसरे समुदायों की तुलना में अविवाहितोंतलाकशुदा और विधवाओं की संख्या बहुत ज़्यादा है। वैसे राष्ट्रीय स्तर पर मुस्लिमों में मैरिटल स्टैटस महज़ 29 फ़ीसदी है। रिपोर्ट के मुताबिक ग्रामीण इलाकों में 33 फ़ीसदी बच्चे उर्दू पढ़ते हैंतो शहरों में क़रीब आधे (49 फ़ीसदी) बच्चे उर्दू पढ़ते हैं। 96 फ़ीसदी स्टूडेंट्स जनरल स्टडी करते हैं। महज़ 4 फ़ीसदी ही तकनीकी संस्थानों में जाते हैं। वोकैशनल एजुकेशन का परसेंटेज 0.3 फ़ीसदी यानी नहीं के बराबर है। रिपोर्ट यह भी कहती है कि सरकारी ही नहींनिजी क्षेत्र में भी मुसलमानों को बहुत कम नौकरियां मिलती हैं।

अगर मीडिया में मुसलमानों के प्रतिनिधित्व की बात करें तो उर्दू मीडिया को छोड़ दें तो बाक़ी मीडिया जैसे बौद्धिक संस्थानों में भी इक्का-दुक्का मुस्लिम पत्रकार देखने को मिलते हैं। महमूदुर रहमान कमेटी का साफ़ निष्कर्ष है कि महाराष्ट्र में वाक़ई बहुमत में मुसलमानों की हालत बहुत दयनीय है। कमोबेश यही तर्क देते हुए सच्चर कमेटी भी मुस्लिम समाज के विकास पर ख़ास ध्यान देने की बात कही थी। संभवतः इसी तरह की रिपोर्ट के आधार पर 2007 की रंगनाथ मिश्रा कमेटी ने नौकरी में मुसलमानों को 10 फ़ीसदी आरक्षण देने की पैरवी की थी।
इन रिपोर्ट्स के आधार पर कहा जा सकता है कि मुस्लिम समाज आज ग़रीबीअशिक्षाबेरोजगारी और स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्या का सामना कर रहा है। लेकिन कोई बुद्धिजीवी इन समस्याओं पर नहीं सोचता। सब राग मोदी विरोध’ आलाप रहे हैं। गौर करने वाली बात है कि मुसलमानों का मोदी विरोध 2014 चुनाव में भी ऐसा ही था। मुसलमान मोदी का विरोध तब से कर रहे हैं जब सितंबर 2013 में उन्हें भाजपा ने प्रधानमंत्री उम्मीदवार घोषित किया था। इसके बाद अधिकांश खाते-पीते मुसलमान चुनाव में मोदी के विरोध में लंगोट बांध कर खड़े हो गए। कोई मोदी के सिर इनाम रख रहा थातो कोई गला काटने की बात कर रहा था। कांग्रेस नेता इमरान मसूद ने तो मोदी को बोटी-बोटी काट डालने की धमकी दे डाली थी। लोग ऐसी हवा बना रहे थे कि मोदी देश के प्रधानमंत्री बने तो मुसलमानों की शामत आ जाएगी। यह अंध विरोध अभियान नरेंद्र मोदी और भाजपा के लिए वरदान साबित हुआ। मुसलमानों के विरोध के बावजूद मोदी प्रधानमंत्री बनने में सफल रहे।

सबसे अहम बात यह है कि पिछले पांच साल कै दौरान मुसलमानों के अहित को लक्ष्य करके मोदी सरकार ने कोई भी फ़ैसला नहीं लिया। ट्रिपल तलाक़ विरोधी अध्यादेश को मुस्लिम विरोधी कतई नहीं कहा जा सकता। मुस्लिम महिलाओं को ट्रिपल तलाक़ की विभीषिका से मुक्त कराना हर भारतीय का फ़र्ज़ हैचाहे वह हिंदू हो या मुसलमान। ऐसे में वह अध्यादेश समय की मांग है। मुसलमानों को भी यह स्वीकार करना होगा कि उनके यहां महिलाओं की हालत ज़्यादा दयनीय है। लिहाज़ामुस्लिम समाज को समझना होगा कि सबसे पहले उन समस्याओं को हल करने के लिए आगे आना होगा। उन्हें यह स्वीकार करना पड़ेगा कि कोई न कोई वजह तो है जिसके कारण देश में हर क्षेत्र में मुसलमान दूसरे समुदाय से पिछड़ रहे हैं। यह सोचना होगा कि क्यों आतंकवाद इस्लाम के गर्भ से पैदा हो रहा हैक्यों दुनिया भर के जिहादी मुसलमान ही हैंआतंकवाद का कोई धर्म नहीं होतायह कहकर इस समस्या को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। इस बारे में ‘बीइंग द अदर: द मुस्लिम इन इंडिया’ की लेखिका सईद नकवी लिखती हैं, “इस देश का मुसलमान दरअसल विकास की कीमत पर एक खास किस्म की मजहबी और सांस्कृतिक सनक का शिकार होकर रह गया है। इसके लिए मुसलमानों को तालीम देने वाले मुल्ले ही दोषी हैं।” 

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लिहाज़ा मोदी विरोध से पहले मुल्लाओं और मुल्लापन को विरोध करना होगा। मुसलमानों को उन कारकों का विरोध करना होगा जो उनके सर्वांगीण विकास में बाधक है। मुसलमान सालों से भारतीय संस्कृति और देश का हिस्सा हैं और उन्हें अपने विकास के लिए इन जमीनी समस्याओं से अपनी आने वाली पीढ़ी को निजात दिलानी होगी। सरकारों की ओर से उनकी सामाजिक, आर्थिक स्थिति की पड़ताल समस्याओं को सुलझाने के लिए की गई है ना की राजनीतिक औजार के रूप में उनका इस्तेमाल करने के लिए। बेहतर होगा कि देश के मुसलमान अपनी समस्याओं को आगे आकर समझें और उसका समाधान निकालें।