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बुधवार, 8 जुलाई 2015

क्या मुस्लिम बच्चों के विकास में बाधा हैं मदरसे?


उत्तरप्रदेश शिया सेंट्रल बोर्ड के अध्यक्ष वसीम रिजवी  ने हाल ही में प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर मदरसों पर आतंकवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाकर उन्हें बंद करने की मांग की थी। जैसा कि अपेक्षित था, कट्टरपंथी मुसलमान उनके खिलाफ हो गए। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष सैयद गैयूरूल हसन रिज़वी ने कहा कि यह मदरसों को बदनाम करने की साजिश है। इससे पहले 2015 में महाराष्ट्र सरकार ने राज्य के सभी मदरसों के बच्चों को “आउट ऑफ स्कूल चिल्ड्रेन” घोषित करने का फैसला किया था। इससे महज़ मज़हबी तालीम यानी उर्दू और शरीयत पढ़ाने वाले 1890 मदरसों में से 1340 मदरसे स्‍कूल श्रेणी से बाहर हो गए थे। 550 मदरसों ने हर विषय पढ़ाने का सरकार का आदेश मान लिया और उनकी स्कूल की मान्यता बची रह गई।

लंबे समय से इस बात पर बहस होती रही है कि क्या यक़ीनी तौर पर मुसलमानों के बच्चों के विकास में सबसे बड़ी बाधा मदरसे ही हैं और मदरसे में तालीम हासिल करने वाले कट्टर हो जाते हैं और उन्हें आतंकवाद की ओर खींचना आसान होता है? इसी बिना पर प्रगतिशील मुसलमान मदरसा कल्चर की मुखालफत करते रहे हैं। इन लोगों का कहना है कि ग़रीब तबक़े के मुस्लिम बच्चे एजुकेशन को मेन स्ट्रीम में लाना जरूरी है। इससे अब तक उपेक्षित बच्चों के लिए भविष्य में अवसर बनेंगे और अगर मेहनत करेंगे तो अच्छा पढ़-लिखकर अफ़सर बन सकेंगे। 

प्रगतिशील मुसलमानों के तर्क को नकारा भी नहीं जा सकता। वस्तुतः मदरसे मुस्लिम बच्चों के ही नहीं, बल्कि समस्त मुस्लिम समाज के विकास में सबसे बड़ी बाधा हैं। दुनिया कहां से कहां पहुंच गई, विश्व एक गांव में तब्दील हो गया, लेकिन मदरसा चलाने वाले मुसलमान अब भी बच्चों को कई सदी पीछे रखना चाहते हैं। अब मुसलमानों को यह समझना ही होगा कि वर्तमान दौर अंग्रेज़ी शिक्षा का दौर है। इस दौर में बच्चों को भाषा के रूप में बेशक संस्कृत, उर्दू, मराठी या दूसरी क्षेत्रीय भाषाएं पढ़ाइए, लेकिन साथ में उन्हें अंग्रेज़ी, मैथ और साइंस पढ़ाना ही होगा। उन्हें इंजीनियर, डॉक्टर, आईएएस-पीसीएस और जज बनाना होगा। इसके लिए मदरसों का बंद करना समय की मांग है।

दरअसल, विद्यालय यानी स्कूल को अरबी में मदरसा कहते हैं। ऐसी मान्यता है कि पहला मदरसा हज़रत ज़ैद बिन अकरम के परिसर की पहाड़ी के पास खुला था, जिसे सफ़ा कहा गया। प्रमाण तो नहीं है, मगर माना जाता है कि सफ़ा में मोहम्मद साहब अध्यापक थे और उनके अनुयायी छात्र। 12वीं सदी के अंत तक बग़दाददमिश्कमोसल और दूसरे मुस्लिम शहरों में मदरसे फल-फूल रहे थे। भारत में मदरसे 12वीं सदी में दिल्ली सल्तनत काल में शुरू हुएलेकिन ज़्यादा शोहरत मुग़ल काल में मिली। इतिहासकारों के मुताबिक़ शाह वली अल्लाह के पिता शाह अब्दुर्रहीम ने 17वीं सदी के आख़िर में दिल्ली में पहला मदरसा मदरसा-ए रहीमिया खोला था। लखनऊ में 18वीं शताब्दी के आरंभ में मुल्ला निज़ामुद्दीन सिहलवी ने मदरसा-ए फ़िरंगी महल शुरू किया था। 1867 में देवबंद में मुहम्मद आबिद हुसैन ने मदरसा-ए दारूल उलूम की स्थापना की, जो इस्लामी अध्यात्म के सर्वश्रेष्ठ संस्थानों में से है। हालांकि, आज के दौर के मदरसों में केवल उर्दू और शरीयत सिखाए जाते हैं। यह तालीम बेशक मौलवी बनने वालों के लिए ठीक है, मगर इसमें पढ़े बच्चे बुनकर या मज़दूर ही बन सकते हैं, डॉक्टर-इंजीनियर या अफ़सर नहीं। लिहाज़ा, या तो मदरसों को आधुनिक कॉन्वेंट स्कूलों जैसा बनाया जाए, या फिर उन्हें बंद करके उनकी जगह बेहतर शिक्षा देने वाले स्कूल-कॉलेज खोले जाएं, जिन्हें शिक्षा बोर्डों या यूनिवर्सिटी से आधिकारिक मान्यता मिली हो।
मदरसों की स्कूली मान्यता ख़त्म करने के फ़ैसले का दो तरह के लोग विरोध कर रहे हैं। पहले तो मौलवी हैं, जिनकी रोज़ी-रोटी मदरसों से चलती रही है। उनका विरोध जायज़ कहा जा सकता है। दूसरे सियासतदां हैं, जिनकी पूरी राजनीति ही मुस्लिम वोटों से होती है। इनमें एमआईएम के लोकसभा सदस्य असदुद्दीन ओवैसी भी शामिल हैं। सवाल उठता है कि इनका विरोध क्या जायज़ है? क्योंकि ओवैसी साहब ख़ुद तो लंदन में पढ़े हैं, उनके बच्चे कॉन्वेंट या इंग्लिश मीडियम से पढ़ रहे हैं। ओवैसी के अलावा वे लोग ज़्यादा मुखर विरोध कर रहे हैं, जिनके भी बच्चे कॉन्वेंट या विदेशों में पढ़े हैं। ये तथाकथित हितैषी चाहते हैं कि ग़रीबों के बच्चे मदरसे के चक्कर में अंग्रेज़ी, मैथमेटिक्स और साइंस पढ़ने से वंचित रहें और अपना भविष्य चौपट कर लें, ताकि भविष्य में उनके डॉक्टर-इंजीनियर या अफ़सर की संभावना ही ख़त्म हो जाए और अच्छी सेलरी वाले जॉब के जो मौक़े आएं, उन्हें धनी मुसलमानों के अंग्रेज़ी, मैथ व साइंस पढ़ने वाले बच्चे लपक लें।
दरअसल, जस्टिस राजिंदर सच्चर कमेटी की रिपोर्ट आने के बाद तत्कालीन सीएम विलासराव देशमुख ने मई 2008 में महाराष्ट्र में मुसलमानों की शैक्षिक-सामाजिक-आर्थिक स्थिति के अध्ययन के लिए रिटायर ब्यूरोक्रेट डॉ. महमूदुर रहमान की अगुवाई में छह सदस्यों वाली महमूदुर रहमान कमेटी बनाई थी। कमेटी ने रिपोर्ट अक्टूबर 2013 में सरकार को सौंप दी थी, लेकिन अभी तक उसे सार्वजनिक नहीं किया गया है। लीक्ड रिपोर्ट में मुसलमानों के बारे कई हैरान करने वाले तथ्य सामने आए हैं। मसलन, महाराष्ट्र में, देहात की बात तो छोड़ दें, मुंबई जैसे शहर में रहने वाले मुसलमानों की भी हालत एकदम पिछड़ी मानी जाने वाली अनुसूचित जाति और जनजाति से भी बदतर है। मुसलमानों को कोई भी बैंक क़र्ज़ नहीं देती है। मुंबई से सटा मीरारोड का मुस्लिम बाहुल्य इलाक़ा नयागनर जीता जागता उदाहरण है, जहां घर लेने वालों को किसी भी बैंक से होमलोन नहीं मिलता है।
महमूदुर रहमान समिति ने रिपोर्ट में टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंस, एसएनडीटी वीमेन यूनिवर्सिटी की इकोनॉमिक्स फैकेल्टी और मुंबई यूनिवर्सिटी के निर्मला निकेतन कॉलेज ऑफ़ सोशल वर्क समेत, कुल सात संस्थानों के भरोसेमंद सर्वेज़ और स्टडीज़ का हवाला दिया है। सभी सर्वेज़ और स्टडीज़ क़मोबेश एक जैसी हैं, मगर सत्यता की कसौटी पर खरी उतरती हैं।
महमूदुर रहमान समिति की रिपोर्ट के मुताबिक़ राज्य में 1.20 करोड़ मुसलमान हैं, जिनमें 15 साल तक की जनसंख्या 37 फ़ीसदी है, जो अपेक्षाकृत ज़्यादा जन्म दर दर्शाती है। पुरुष मुखिया वाले हर मुस्लिम परिवार में औसतन 6.1 सदस्य हैं जबकि महिला मुखिया वाले परिवार में 4.9 सदस्य। रिपोर्ट में 60 साल या उससे ज़्यादा उम्र के लोगों की आबादी महज़ 6.6 फ़ीसदी बताई गई है, जिसका मतलब मुस्लिम समाज में लोग 60 साल के बाद जल्दी मर जाते हैं, इसकी वजह ग़रीबी और उचित मेडिकेयर का अभाव हो सकता है। यह अलग सीरियस शोध का विषय है। 
महमूदुर रहमान समिति की रिपोर्ट के मुताबिक़, राज्य में केवल 10 फ़ीसदी मुसलमान अपने खेत में खेती करते हैं। आधे यानी 49 फ़ीसदी मुस्लिम ग़रीबी रेखा के नीचे हैं जबकि पूरे देश में 34.4 फ़ीसदी मुसलमान ग़रीब हैं। राज्य में 20 फ़ीसदी मुसलमानों के पास राशन कार्ड नहीं है, जबकि 59 फ़ीसदी मुसलमान स्लम यानी गंदी बस्तियों में रहते हैं। इनमें केवल 18 फ़ीसदी लोगों के ही घर पक्के हैं। राज्य में बहुत बड़ी तादाद में युवक बेरोज़गार हैं। 32.4 फ़ीसदी लोग छोटे-मोटे काम करते हैं। शायद यही वजह है कि 45 फ़ीसदी मुस्लिमों की परकैपिटा आमदनी महज़ 500 रुपए ही है। 34 फ़ीसदी मुसलमानों (आबादी का एक तिहाई) की मासिक आमदनी 10 हज़ार रुपए से भी कम है। 24 फ़ीसदी 10 से 20 हज़ार महीने कमाते हैं, जबकि 20 से 30 हज़ार कमाने वाले मुसलमानों की तादाद 3.8 फ़ीसदी है। अपेक्षाकृत अच्छा यानी 30 से 40 हज़ार रुपए कमाने वालों की संख्या महज़ 1.0 फ़ीसदी है।
हालांकि ऐसा नहीं कि मुस्लिम समाज में सभी ग़रीब ही हैं। रिपोर्ट कहता है कि मुस्लिम समाज काफ़ी संपन्न है, देश का बस बाक़ी समुदायों की तरह मुसलमानों में भी मुट्ठी भर लोग बेहतर जीवन जी पाते हैं। यानी केवल 6.0 फ़ीसदी मुस्लिम हर महीने 50 हज़ार या उससे ज़्यादा आमदनी करते हैं।
शिक्षा के क्षेत्र में डॉ. महमूदुर की रिपोर्ट क़रीब-क़रीब सच्चर की रिपोर्ट जैसी ही है। मतलब, एजुकेशन में मुसलमानों की दशा बहुत दयनीय है। जहां देश में साक्षरता की दर 74 फ़ीसदी है, वहीं मुस्लिम साक्षरता केवल 67.6 फ़ीसदी हैं। महाराष्ट्र में यह 65.5 फ़ीसदी से भी नीचे है। हालांकि, प्राइमरी स्तर पर मुस्लिम बच्चे हिंदुओं से बेहतर स्थिति में हैं। यानी हिंदुओं के 38 फ़ीसदी बच्चे प्राइमरी तक पहुंचे हैं तो मुस्लिमों के 47 फ़ीसदी बच्चे। रिपोर्ट कहती है, आमतौर पर 14 साल की उम्र में मुस्लिम बच्चे पढ़ाई छोड़ देते हैं और बाल मज़दूर के रूप में काम करने लगते हैं। आर्थिक तंगी इसकी मुख्य वजह है। सेकेंडरी यानी 12वीं तक केवल 4.2 फ़ीसदी बच्चे पहुंच पाते हैं। उच्च शिक्षा का मुस्लिमों का आंकड़ा भयावह है। महज़ 3.1 युवक स्नातक तक पहुंचते हैं। 2011 के आईएएस में 203 चयनित उम्मीदवारों में महाराष्ट्र का एक ही मुस्लिम युवक था, जबकि आईपीएस में चुने गए 302 लोगों में महाराष्ट्र से बस चार मुस्लिम युवक थे। राज्य की फडनवीस सरकार इसकी वजह मदरसा कल्चर मानती है।
रिपोर्ट के मुताबिक़, राज्य में मुस्लिम लड़कियों के शिक्षा का आंकड़ा तो निराश करने वाला है। महज़ एक फ़ीसदी लडकियां कॉलेज तक पहुंचती हैं। उच्च शिक्षा हासिल न कर पाने से वे पुरुषों का अत्याचार सहती हैं। उनके शौहर विरोध के बावजूद एक से ज़्यादा निकाह कर लेते हैं। 2006 की थर्ड नैशनल फैमिली हेल्थ सर्वें के मुताबिक़, 2.55 फ़ीसदी मुस्लिम महिलाओं के पतियों के पास एक से अधिक बीवियां हैं, जबकि हिंदुओं में यह आंकड़ा 1.77 फ़ीसदी है। राज्य में मुसलमानों में दूसरे समुदायों की तुलना में अविवाहितों, तलाकशुदा और विधवाओं की संख्या बहुत ज़्यादा है। वैसे राष्ट्रीय स्तर पर मुस्लिमों में मैरिटल स्टैटस महज़ 29 फ़ीसदी है।
मुस्लिम समाज की बदहाली के लिए और ढेर सारे कारक ज़िम्मेदार हो सकते हैं, लेकिन इस पिछड़ेपन के लिए मदरसा कल्चर काफी हद तक ज़िम्मेदार ज़रूर है। रिपोर्ट के मुताबिक ग्रामीण इलाकों में 33 फ़ीसदी बच्चे उर्दू पढ़ते हैं,तो शहरों में क़रीब आधे (49 प्रतिशत) बच्चों को उर्दू की तालीम दी जाती है। मदरसे में अंग्रेज़ी पढ़ने वाले छात्रों का प्रतिशत नहीं के बराबर है। 96 फ़ीसदी स्टूडेंट्स जनरल स्टडी करते हैं। महज़ 4 प्रतिशत ही तकनीकी संस्थानों में जाते हैं। वोकैशनल एजुकेशन का परसेंटेज तो नहीं के बराबर यानी 0.3 फ़ीसदी है। इसके लिए भी मदरसों के सिलैबस को ही कसूरवार ठहराया जा सकता है। रिपोर्ट यह भी कहती है कि सरकारी ही नहीं, निजी संस्थानों में भी मुसलमानों को बहुत कम नौकरियां मिलती हैं। 
इस तरह उर्दू मीडिया को छोड़ दें तो बाक़ी मीडिया जैसे बौद्धिक संस्थानों में भी इक्का-दुक्का मुस्लिम पत्रकार मिलते हैं। महमूदुर रहमान कमेटी का निष्कर्ष है कि महाराष्ट्र में वाक़ई बहुमत में मुसलमानों की हालत बहुत दयनीय है। यही तर्क देते हुए सच्चर कमेटी भी मुस्लिम समाज के विकास पर ख़ास ध्यान देने की बात कहती है। संभवतः इसी तरह की फाइंडिंग्स के आधार पर 2007 की जस्टिस रंगनाथ मिश्रा कमेटी ने मुसलमानों को नौकरी में 10 फ़ीसदी आरक्षण देने की पैरवी की है। मज़ेदार बात यह है कि हर नेता अपने आपको मुसलमानों का हितैषी बताता ही नहीं मानता भी है, इसके बावजूद मुसलमानों के जीवनस्तर को बेहतर बनाने वाली सभी सिफ़ारिशें फ़ाइल्स के नीचे दबी धूल खा रही हैं। 
दरअसल, यह समस्या मुस्लिम समाज की है। लिहाज़ा, हल करने के लिए उसे ही आगे आना होगा। मुस्लिम समाज को यह स्वीकार करना पड़ेगा कि कोई न कोई वजह तो है जिसके कारण देश में हर क्षेत्र में मुसलमान दूसरे समुदाय से पिछड़ रहे हैं और समस्या के रूप में इसे चिन्हित किए बिना, हल नहीं निकाला जा सकता है। मुंबई के पत्रकार आबिद नक़वी भी राज्य के मदरसों के आधुनिकीकरण और उनकी शिक्षा आम स्कूलों जैसी करने की ज़ोरदार पैरवी करते हैं, हालांकि नक़वी यह भी कहते हैं कि महाराष्ट्र में मदरसों में पढ़ने वाले बच्चे दूसरे मुस्लिम देशों के मदरसों में पढ़ने वाले बच्चों जितने कट्टर नहीं होते। हालांकि, अशिक्षा, ग़रीबी और बेरोज़गारी के कारण युवक अपराध या आतंकवाद की ओर उन्मुख हो रहे हैं और इसमें मदरसों के योगदान को पूरी तरह रूल्डआउट नहीं किया जा सकता है। कम से कम इसी बिंदु पर महाराष्ट्र की बीजेपी-शिवसेना सरकार के फ़ैसले का बहुत ज़्यादा विरोध पूरी तरह सही नहीं जान पड़ता।

सोमवार, 29 जून 2015

...तो क्या खत्म हो रहा है “आप” का तिलिस्म!

हरिगोविंद विश्वकर्मा 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उनकी कैबिनेट और ख़ुद बीजेपी वह सब कर रहे हैं, जिसे तानाशाही कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगा।  जनता द्वारा निर्वाचित सरकार को संविधान या क़ानून का हवाला देकर कोई फ़ैसले न लेने देना, एक तरह से अघोषित आपातकाल है। ऐसी मिसाल केवल 1975 में मिली थी, जब कई निर्वाचित सरकारों को इंदिरा गांधी ने बर्खास्त कर दिया था। दिल्ली में अप्रत्यक्षरूप से वहीं हो रहा है, जो दिल्ली की जनता की इनसल्ट है। 
उपराज्यपाल नज़ीब जंग जो कुछ कर रहे हैं, उसे बीजेपी या उसके शासन के बेनिफिशियरीज़ लोगों के अलावा दूसरा कोई अप्रूव नहीं कर सकता। नज़ीब केंद्र के इशारे पर लोकतांत्रिक ढंग से निर्वाचित सरकार को काम नहीं करने दे रहे हैं। हर कोई समझ रहा है कि मोदी की अगुवाई में केंद्र दिल्ली सरकार और दिल्ली की जनता के साथ खुला पक्षपात और बेइमानी कर रही है। हालांकि इसे अरविंद केजरीवालदिल्ली की जनता से बदला लेना क़रार दे रहे हैं, लेकिन खुले पक्षपात और बेइमानी पर न तो दिल्ली में, न ही देश में, किसी का ख़ून खौल रहा है। लोग एकदम चुप हैं, कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं कर रहे हैं। इसका मतलब यह भी है कि लोग जान गए हैं कि आम आदमी पार्टी यानी आप और केजरीवाल भी दूध के धुले नहीं हैं।  लिहाज़ा, न तो आप को न ही केजरीवाल को जनता की सहानुभूति नहीं मिल रही है।  
दरअसल, दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले आम आदमी पार्टी को लोग ऐसी राजनीतिक पार्टी मानते थेजो दूसरी मुख्य धारा की पार्टियों से एकदम अलग थी। अलग तरह की राजनीति करने वाली पार्टी थी। लोग मानते थे, यह एकमात्र पार्टी है, जिसकी कथनी करनी में कोई अंतर नहीं है। मसलन, हर मुद्दे पर इस नवोदित राजनीतिक पार्टी का नज़रिया और नीति अलग दिखता था।  मसला अपराधियों को राजनीति से दूर रखने की बात हो, चंदे में पारदर्शिता की या पार्टी में सुप्रीमो कल्चर की, हर मुद्दे पर आप का साफ़, सर्वमान्य और लोकतांत्रिक रवैया था, जिसका इंपैक्ट सीधे आम जनता पर होता था।  जनता मानती और समझती थी कि बीजेपी या कांग्रेस जैसी दूसरी पार्टियां आप को ख़त्म करने की साज़िश में लगी हुईं हैं, ताकि पिछले 68 साल से जिस तरह की राजनीति ये पार्टियां करती आई हैं, वह बदस्तूर जारी रहे।  यही वजह है कि एसेंबली इलेक्शन में तमाम मीडिया सर्वेक्षण को दर किनार करते हुए जनता ने आप को वह अभूतपूर्व मैंडेट दिया जिसकी किसी राजनीतिक पंडित ने कल्पना भी नहीं की थी।  इसके बाद आप संयोजक केजरीवाल जनता के चीफ़ मिनिस्टर के रूप में शपथ ली।  
शपथ लेते समय अरविंद ने अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं से अपील करते हुए कहा था, कुछ भी हो किसी भी क़ीमत पर अपने ऊपर अंहकार को हावी मत होने देना, क्योंकि इसी अहंकार ने बीजेपी और कांग्रेस का बेड़ा गर्क किया है।  अरविंद की यह बात लोगों को बहुत पसंद आई। दिल्ली की जनता को धन्यवाद दिया कि उसके फ़ैसले से क़रीब सात दशक बाद ही सही, कम से कम ऐसा आदमी और ऐसी पार्टी तो सत्ता में आई, जिसे जनता का नुमाइंदा या जनता की पार्टी कहा जा सकता है।  राजनीतिक हलकों में सुगबुगाहट होने लगी कि मुमकिन है 2019 का आम चुनाव नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी न होकर नरेंद्र मोदी बनाम अरविंद केजरीवाल हो।  
बहराहल, शपथ लेते ही अरविंद ने पहले फ़ैसले में आप का संयोजक बने रहने का फ़ैसला किया।  लोग हैरान हुए, एक व्यक्ति एक पदकी बात करने वाली पार्टी में यह क्या हो रहा है।  अरविंद क्या-क्या करेंगे?दिल्ली की समस्याएं हल करेंगे या आप संगठन को राष्ट्रीय स्तर पर खड़ा करेंगे। अरविंद ने दूसरे फ़ैसले में मनीष सिसोदिया को डिप्टी सीएम बना दिया। लोग फिर असहज़ हुए, छह लोगों के छोटे से मंत्रिमंडल में डिप्टी सीएम की क्या ज़रूरतख़ैर, इसे भी नज़रअंदाज़ कर दिया गया।  अरविंद का तीसरा फ़ैसला आया, उनके कैबिनेट में किसी महिला के न होने का।  लोग तीसरी बार हैरानी हुए, छह महिलाएं विधायक चुनी गई हैं, उनमें एक भी ऐसी नहीं जो सरकार में महिलाओं को रिप्रजेंट कर सके।  
 इसी तरह अरविंद का चौथा फ़ैसला था, जीतेंद्र तोमर जैसे संदिग्ध डिग्रीहोल्डर को विरोध के बावजूद टिकट देना और फिर मंत्री बनाना।  लोग समझ नहीं पाए, किस आधार पर अरविंद संदिग्ध नेता को इतना प्रमोट कर रहे हैं।  तोमर की फ़र्ज़ी डिग्री का मामला चुनाव में ही सुर्खियों में आ गया था।  कहा तो यह भी गया कि प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव से अरविंद के मतभेद की वजह तोमर की फ़र्ज़ी डिग्री ही थी।   बहरहाल, इसके बावजूद अरविंद ने सीबीआई डायरेक्टर रंजीत सिन्हा जैसे हाईप्रोफाइल अधिकारी को बेनक़ाब करने वाले प्रशांत जैसे नेता की कीमत पर तोमर जैसे लोगो को गले लगाया।  
इसके बाद तो जो हुआ, उसकी किसी ने कल्पना तक नहीं की थी।  संजय सिंह, दिलीप पांडे, आशुतोष गुप्ता और आशीष खेतान जैसे लोग आप के तीन स्तंभों, अरविंद-योगेंद्र और प्रशांत, में से दो योगेंद्र और प्रशांत के ख़िलाफ़ बयान दिया। किसी के समझ में ही नहीं आया, यह क्या हो रहा है।  आंतरिक लोकतंत्र की बात करने वाली पार्टी में यह सब क्या है? अरविंद ने तो अहंकार को दूर रखने की बात की थी।  फिर आप की दूसरी पंक्ति के नेताओं में यह अहंकार कहां से आ गया। बयानों से साफ़ हो गया कि भारतीय राजनीति मेंआपजैसी आदर्शवादी पार्टी के लिए कोई जगह नहीं है,  इसलिए, आप भी सुप्रीमो कल्चर को वहन कर रही है। यानी केजरीवाल पार्टी में सुप्रीमो बन रहे हैं।  आप यहीं बीजेपी, कांग्रेस, एसपी, बीएसपी, शिवसेना, आरजेडी, टीएमसी और एआईडीएमके की क़तार में आ गई, जहां पहले से सुप्रीमो कल्चर है।  जैसे कोई बीजेपी में मोदी, कांग्रेस में सोनिया, एसपी में मुलायम, बीएसपी में मायावती, शिवसेना में ठाकरे, आरजेडी में लालू और टीएमसी में ममता और एआईडीएमके में जयललिता से मत-भिन्नता रख कर नहीं रह सकता, उसी तरह अब साफ़ हो गया कि केजरीवाल से मत-भिन्नता रखने वाले की आप में कोई जगह नहीं।
बहरहाल, इन विवादों के बीच अरविंद मौन रहे और इलाज के लिए बंगलुरु चले गए। तभी उनका ऐसा स्टिंग आया, जिससे उनकी पर्सनॉलिटी कल्ट ही ख़त्म हो गई।  आदर्शवाद और संस्कार की बात करने वाले अरविंद के मुंह से गाली पूरे देश ने सुनी, वह भी प्रशांत, योगेंद्र और आनंद कुमार जैसे सौम्य लोगों के लिए। किसी को यक़ीन ही नहीं हुआ, लेकिन यह सच था।
दिल्ली की सत्ता छोड़ने के लिए क़रीब हर मंच से माफ़ी मांगने वाले अरविंद ने उस धृष्टता पर एक बार भी ख़ेद व्यक्त नहीं किया।  उल्टेआप के दो स्तंभों को दूध की मक्खी तरह निकाल फैंका गया।  लोगों ने महसूस किया कि आप भी वह सब कर रही है , जो बीजेपी और कांग्रेस जैसी पार्टियां पिछले कई दशक से करती आ रही हैं।  पार्टी की साख़ पर सबसे बड़ा धब्बा क़ानून मंत्री रहे तोमर की गिरफ़्तारी ने लगाया।  जैसे, बीजेपी निहालचंद मेघवाल और स्मृति ईरानी या कांग्रेस रॉबर्ट वॉड्रा को डिफेंड करती रही है,  उसी तरह अरविंद औरआप ने तोमर का गिरफ़्तारी होने तक बचाव किया।  अब तोमर से जुड़े सवालों का अरविंद जवाब क्या देंगे।  ज़ाहिर है, तोमर के मामले में वह भी दूसरे करप्ट या संदिग्ध नेताओं का नाम लेंगे।  जैसे, उत्तर प्रदेश की क़ानून व्यवस्था का ज़िक्र होने पर एसपी नेता दिल्ली या दूसरे राज्यों के क्राइम डेटा पेश करने लगते हैं।
सबसे अंत में आया सीनियर लीडर और विधायक सोमनाथ भारती की कथित तौर पर अपनी पत्नी के साथ मारपीट. का मामला। आप जैसी पार्टी के नेता पर उसकी ही पत्नी उत्पीड़न का आरोप लगाए, यह विचलित करने वाली बात रही।  कुल मिलाकर निष्कर्ष यह निकला कि आप के नेताओं का कैरेक्टर बाक़ी दलों के नेताओं जैसा ही है।  ये लोग आदर्शवाद की ऐक्टिंग कर रहे थे जो अंततः बेनक़ाब हो गया।
अरविंद बिजली सस्ती या पानी मुफ़्त में देकर एक ख़ास तबक़े की वाहवाही भले लूट लें, लेकिन यह लंबी राजनीति के कारगर नहीं होगा।  यह हज़ार-दो हज़ार रुपए रिश्वत लेने वालों को पकड़ने और करोड़ों रुपए का ग़बन करने वालों को क्लीनचिट देने जैसा है।  दिल्ली की जनता ने उन्हें एक शानदार मौक़ा दिया था, जिसे उन्होंने अपने अहंकार और अपने चमचों की बात मानकर गंवा दिया।  इस समय पुराने अरविंद की ज़रूरत थी।  ख़ासकर ऐसे समय, जब केंद्र में सरकार की सारी ताक़त एक आदमी के हाथों में केंद्रित होती जा रही है।  विरोध के हर तरीक़े पर लगाम ही नहीं लग रहा है, बल्कि विरोध के हर स्रोत को सुनियोजित ढंग से नष्ट भी किया जा रहा है।  हर मीडिया हाउस एक ही व्यक्ति के अधिनायकवाद का गुणगान कर रहा है।  लोकपाल को कूड़ेदान में फेंक दिया गया है।  
कई संवैधानिक संस्थान मुखियाविहीन हैं।  एक रिटायर चीफ़ जस्टिस को राज्यपाल बनाकर न्यायपालिका को भ्रष्ट करने की ग़लत परंपरा शुरू कर दी गई है,  जो भी हो, मोदी ने अरविंद की अपरिपक्वता के चलते उन्हें दिल्ली में उलझा दिया है क्योंकि अरविंद ने अपने को दूसरे नेताओं की पंक्ति में ही लाकर खड़ा किया जिससे उनका ही नहीं दल का भी परसनॉलिटी कल्ट ही ख़त्म हो गया।  अरविंद की ज़िद नेआप को क्षेत्रीय पार्टी बनाकर रख दिया।

बुधवार, 17 जून 2015

सखी: स्त्री की कोमल भावनाओं का सफर

हरिगोविंद विश्वकर्मा

'सखी' : स्त्री की कोमल भावनाओं का सफर


कहा जाता है कि संगीत वह खजाना है जहां इंसान को भावनात्मक संतुष्टि मिलती है। तभी तो जब कभी कोई ख़ूबसूरत गाना हमारे कर्ण-पटल से टकराता है तो सब कुछ थम-सा जाता है और हम उस गीत में खो से जाते हैं। आंखें बंद करके उस गीत को अपने अंदर समाने देते हैं। नवोदित गायिका-गीतकार-संगीतकार रिमि बसु सिन्हा की 'सखी' एक ऐसी ही पेशकश है। एलबम में कुल नौ भावना-प्रधान गीत समाहित हैं। सभी गीतों के बोल जितने खूबसूरत हैं, गायिकाओं ने अंतरमन की छूने वाली आवाज़ से उसी तरह सराबोर किया।
सही मायने में अगर इस एलबम को उपन्यास कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। इसकी परिकल्पना, लेखन और संगीत रिमि ने ख़ुद तैयार किया है। यह अनोखा प्रयास नारीत्व को ख़ास तरीक़े से सेलिब्रेट करने की कोशिश है और नारी-रचनाधर्मिता का उत्सव भी। यह केवल स्त्रियों के जरिए ही मूर्त रूप देने का कॉन्सेप्ट है। भारतीय संगीत-जगत में इस तरह की यह पहली कोशिश है। इसमें शामिल हर गाने स्त्री की ही सोच हैं, स्त्री के ही अल्फ़ाज़ हैं और स्त्री द्वारा ही सुर में पिरोये गए हैं। चार पीढ़ी की नामचीन और समर्थ नायिकाओं ऊषा मंगेशकर, कविता कृष्णमूर्ति, केएस चित्रा, सुनिधि चौहान, रिचा शर्मा, महालक्ष्मी अय्यर, ऐश्वर्या मजुमदार और खुद रिमि बसु सिन्हा ने इन भावना-प्रधान कर्णप्रिय नग़मों को अपनी जादुई आवाज़ से सराबोर किया हैं।
मसलन, इस मनोहारी संगीत के सफ़र का आग़ाज़ ‘सुन सखी...’ गीत से होता है। इसमें स्त्री ने बताने की कोशिश की है कि वो कितना कुछ कहना चाहती है, सुनना और बांटना चाहती है। तभी तो ईश्वर ने उसे भावना-प्रधान बनाया है और ये कोमल भावनाएं सबको जोड़कर रखती हैं। चित्रा की गायिकी और भाव में सच्ची सखी दिख ही जाती है। अगला पड़ाव ‘दिम तान ना...’ गीत है जिसमें स्त्री आशा का दूत के किरदार में है। वह हर तरफ़ ख़ुशी और उल्लास फैलाना चाहती है। ताकि दुनिया के हर कोने से मोहब्बत की धुन सुनाई पड़े। सुनिधि की सम्मोहित करने वाली आवाज़ इस गीत के साथ हमें उसी दुनिया में ले जाती है।
रिमि बसु सिन्हा
रिमि बसु सिन्हा
इस सुहाने सफ़र का तीसरे ठहराव पर ‘दिल के अरमानों की बात...’ है जिसमें स्त्री के बचपन से तरुणाई तक का अंतरद्वंद्व है। दरअसल, कभी-कभी कितना वक़्त गुज़र जाता है ,स्त्री कितनी चाहत बटोर के रखती है, कितना कुछ करना  चाहती है मगर उलझनों की बेड़ियों से मुक्त नहीं हो पाती। उसके अरमान जस के तस रह जाते हैं। वक्त बहुत पीछे छूट जाता है। खुद को खोजने वाले इस गाने को बेहद ही अलग तरह से तैयार किया गया है। अलग तरीके का इस्तेमाल इसलिए किया गया है क्योंकि यह आमतौर पर बहुत कम प्रयोग किया जाने वाले नौ मात्रे के ठेके राग अहीर भैरव पर आधारित है। इस गीत को कविता कृष्णमूर्ति की खनकती आवाज़ ने यादगार बना दिया है।
सफ़र के अगर चौथे गीत ‘नैना जागे...’ की बात करें तो सूफ़ियाना अंदाज़ में पिरोए गए इस नग़मे में स्त्री के सुंदर नयन अपने प्रेरणास्वरूप इष्ट की बात करते हैं। संगीत के कद्रदान बस अपनी आंखें बंद करें और गायिका रिचा के साथ स्त्री के हसीन नयनों की महत्ता, बंद-खुले नयन के सौंदर्य का ख़ूबसूरत दीदार करें। संगीतमय सफ़र का अगला गाना ‘कुछ ना सामझ पाए...’ स्त्री के कमसिन मन की दुविधा, नासमझी, नादानी और भावनाओं के तानेबाने को उकेरता है। नए रिश्ते तलाशती स्त्री का अल्हड़पन में किसी से रिश्ता जुड़ जाना बेहद सहज है। यही थीम है इस संवेदना से छलकते गाने की जो राग खमाज पर आधारित है। महालक्ष्मी की जादुई आवाज़ ने तो इसमें चार चांद लगा दिया है।
अगले मुकाम गीत ‘बोले क्या...’ पर संगीतप्रेमी स्त्री के श्रृंगार पक्ष से रूबरू होते हैं। स्त्री और श्रृंगार एक दूसरे के पूरक हैं। मगर भावनाओं के साथ श्रृंगार का अर्थ भी बदलता रहता है। किसी अपने के लिए श्रृंगार करने में अधिक आनंद आता है। संबंधों के खोने या छूटने से मन तड़पता है, आत्मसम्मान के टूटने से डर लगता है। इसी भावना को संगीतमय बनाया है ऊषा मंगेशकर की सुरीली आवाज़ ने।
अगले गीत का शीर्षक है ‘जो ज़िंदगी की जंग हार रहा है...’ दरअसल, जीवन में गाहे-बगाहे कुछ ऐसी घटनाएं हो जाती है जो विचलित कर देती है। इस गीत में बालिका के रूप में स्त्री ख़ुद कुछ सवाल करती है अपने सपने का साकार करने की बात करती है। बालिका की भावनाओं को अभिव्यक्ति दी है बाल गायिका ऐश्वर्या ने संगीत के सफ़र का आठवें पायदान पर है ‘मेरे मन का पंछी...’ यह स्त्री की प्रेरणा को अभिव्यक्ति देता है। हिंदुस्तानी राग भीम पलासी पर आधारित यह इस गीत को ख़ुस रिमि की मीठी आवाज ने इतना ख़ूबसूरत बना दिया है कि बार बार सुनने का मन करता है। एलबम को अंजाम तक पहुंचाया है ‘नए सपने...’ ने। न जाने कितने बरस का बहुप्रतीक्षित सपना जब साकार होता है तो स्त्री कितनी आत्मविभोर हो जाती है। यह गाना सुनकर पता चलता है। यह गीत सभी गायिकाओं से सम्मिलित स्वर में तैयार किया गया है।
सांस्कृतिक नगरी इलाहाबाद के अति-प्रतिष्ठित बंगाली परिवार में जन्मी रिमि संगीत और नाटक के माहौल में ही पली-बढ़ी। आठ साल की कोमल उम्र से ही संगीत सिखना शुरू किया और जल्द ही शहर के सांस्कृतिक समारोहों का हिस्सा बन गईं। शहर ही नहीं राज्य के अनगिनत संगीत जलसों में स्कूल का प्रतिनिधित्व किया और कई पुरस्कार जीते। 15 साल की उम्र में आकाशवाणी कलाकार बन गईं। फ़िलहाल, वह आकाशवाणी और दूरदर्शन की शीर्ष कलाकारों की फ़ेहरिस्त में हैं।
हिंदुस्तानी संगीत रिमि का हमेशा से पैशन-सा रहा है। इसीलिए दसवीं में इसे एक विषय के रूप में लिया। नामचीन संगीतकार स्वर्गीय बीएन बिस्वास से संगीत की बारीकियां सीखीं। गायन-संगीत में उनकी दीवानगी देखकर उनके माता-पिता ने उन्हें स्नातक में भी संगीत लेने के लिए प्रोत्साहित किया। यही वजह रही कि रिमि ने गुरु पं. रामाश्रय झा और कमला बोस के मार्गदर्शन में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदुस्तानी संगीत में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय सांस्कृतिक प्रतियोगिता में सर्वश्रेष्ठ गायिका का पुरस्कार भी जीता। वह प्रयाग संगीत समिति इलाहाबाद से संगीत प्रभाकर और सीनियर डिप्लोमा भी हासिल करने में सफल रहीं।
1992 में दिल्ली में शिफ़्ट होने के बाद रिमि टीवी सीरियल्स और फ़िल्मी दुनिया में सक्रिय हो गईं। कई मशहूर ब्रैंड के लिए खनकती आवाज़ में अनेक भाषाओं में कई टाइटल ट्रैक्स, गाने और जिंगल्स रिकॉर्ड कराए और सीरियल्स, शॉर्ट फ़िल्म्स, डॉक्यूमेंटरी के लिए टाइटल गानों को स्वर दिया। वॉइस-ओवर शुरू से उनकी हॉबी रही और डिस्कवरी चैनल्स और कई सरकारी परियोजनाओं के नामचीन वृत्तचित्रों में अपनी आवाज़ से चार चांद लगाया। इसके अलावा वह कई मशहूर म्यूज़िकल शोज़ में हिस्सा लेने लगीं।
1999 में एचएमवी ने रिमि की आवाज़ को अपने नए भोजपुरी प्रॉजेक्ट के लिए चुना जिसे बेहद लंबे इंतज़ार के बाद लॉन्च किया गया। बहरहाल, ‘जाने हमरी बिंदिया’ टाइटल वाला सोलो-एलबम बेहद लोकप्रिय हुआ और राष्ट्रीय स्तर पर कवरेज मिली। नतीजतन एचएमवी ने अगले प्रॉजेक्ट में उन्हें साइन करने में रुचि दिखाई मगर पति की कीनिया की राजधानी नैरोबी में पोस्टिंग हो जाने से उन्हें देश से बाहर जाना पड़ा।
रिमि 2000 में नैरोबी गईं और चार साल तक वहां रहीं। कहते हैं चांद जहां भी रहेगा अपनी चांदनी तो बिखेरेगा ही। रिमि नैरोबी की संगीत दुनिया में भी सक्रिय हो गईं। वहां हिंदुस्तानी संगीत और सांस्कृतिक समारोह का बढ़ावा दिया और कई कद्रदान बनाए। जल्द ही इस अफ्रीकी शहर के संगीत फ़लक पर अपने लिए अहम मुकाम बना लिया। नैरोबी लोकल एफ़एम चैनल की बेहद जानी-पहचानी उदघोषिका बन गईं। गणतंत्र दिवस, गांधी जयंती जैसे राष्ट्रीय पर्वों पर भारतीय दूतावास की ओर से हिंदी भाषा में आयोजित स्टेज शोज़ और लाइव रेडियो प्रोग्रोम्स प्रस्तुत किए और उनका निर्देशन किया। वहां रिमी ने संगीत ही नहीं हिंदी में अपनी ज़बरदस्त रचनाशीलता का लोहा मनवाया। वसंत उत्सव और महिषासुर मर्दिनी जैसे प्रोग्राम्स की रूपरेखा बनाई, उन्हें लिखा और निर्देशन करते हुए सफलतापूर्वक पेश भी किया जिसे भारतीय दूतावास ने प्रायोजित किया। वहां रिमि ने लाइव प्रोग्राम्स पेश करने का नया ट्रेंड भी सेट किया। होली, रामनवमी, वैसाखी, महावीर जयंती, रमज़ान आदि के मौक़े पर पेश किए जाने वाले गीत के साथ ख़ूबसूरत काव्यमय स्क्रिप्ट और शेरो-शायरी जोड़कर उसमें जादू भर दिया। कुल मिलाकर उन्होंने विदेश में भारत की समृद्ध धर्मनिरपेक्ष परंपरा को आगे बढ़ाया जिसे समूचे अफ्रीका में एशियाई समुदाय के लोगों ने सराहा। रिमि ने भारतीय दूतावास की ओर से संगीत मर्मज्ञ पं. जसराज का मैराथन इंटरव्यू लिया जो नैरोबी के लोकप्रिय लोकल रेडियो पर प्रसारित भी हुआ। इसके अलावा वह कीनिया की चिन्माया मिशन सेवा ट्रस्ट से जुड़ीं और नैरोबी में अंतरराष्ट्रीय समागम पर उनका एलबम ‘भक्ति’ कंपोज़ किया जिसकी मांग जो आज भी उसी तरह है।
कीनिया में भारतीय संस्कृति और संगीत को बढ़ावा देने के अभियान में रिमि के अद्भुत योगदान को देखते हुए ही भारतीय दूतावास ने उन्हें गांधी जयंती पर संयुक्त राष्ट्रसंघ के नैरोबी स्थित अफ्रीकी मुख्यालय में संगीत उत्सव आयोजित करने की दावत दी जो बेहद सफल रहा। किसी प्रवासी का यह दुर्लभ करतब है जिसके चलते कीनिया में भारतीय दूतावास की ओर से रिमि का सम्मान किया गया। बेशक, रिमि की विविधता ही उनकी ख़ासियत है। ‘सखी’ से पहले टाइम्स म्यूज़िक ने कुमार शानू के साथ एलबम ‘मैया का दरबार’ रिलीज़ किया। फ़िलहाल रिमी मुंबई में हैं और देश की आर्थिक राजधानी में अपनी गायन और कॉम्पोज़िशन क्षमता के बल पर ख़ुद को पूर्ण संगीतकार के रूप स्थापित करने के लिए प्रयासरत हैं।
लेखक हरिगोविंद विश्वकर्मा फोकस टीवी, हमार टीवी के मुंबई ब्यूरो के चीफ हैं. 

मंगलवार, 9 जून 2015

व्यंग्य - मेरे देश के कुत्ते..... मेरे देश के कुत्ते !!!


हरिगोविंद विश्‍वकर्मा
सुबह-सबेरे घर से बाहर निकलकर मैं सड़क पर आया। स्टेशन तक पैदल जाने के मूड में था। उसी समय भौंकते कुत्तों का एक समूह मुझ पर टूट पड़ा। एक बार तो मैं तो बुरी तरह डर गया, क्योंकि इधर मुझे लगने लगे कि कुत्ते भी आदमी की तरह हो गए हैं। एकदम ख़ुदगर्ज़। सेल्फ़-ओरिएंटेड। उनमें इंसानियत, नहीं-नहीं, कुत्तियत नाम की चीज़ नहीं रह गई है। कहीं मुझे काट न लें। जिन कुत्तों में कुत्तियत नहीं उनका कोई भरोसा नहीं।

दरअसल, न्यूज़ चैनल में नौकरी के अंतिम दिनों में अल-सुबह की ड्यूटी लगा दी गई। पता नहीं, अनजाने में या अंतिम दो तीन दिन परेशान करने के लिए। जब ड्यूटी चार्ट बन गया तो दफ़्तर जाना ही था। जब सब सो रहे थे, तब उठना अच्छा बिलकुल नहीं लगा। मगर, मजबूरी थी। ना, नहीं कर सकता था। बहरहाल, इसी बहाने सुबह-सबेरे लंबे समय बाद ग्रामसिंहों से मुलाक़ात हो गई। लेकिन सारे ग्रामसिंह पाकिस्तान-मोड पर थे। यानी अपनी जगह से मुंह से ही मुझ पर गोली दाग़ रहे थे। यह अलग बात थी कि उनके भौंकने से मैं घायल नहीं हुआ।

-क्या है? मैंने ज़ोर से डांटा। कहीं सुना था, इंसान के चिल्लाने से अमूमन जानवर घबरा जाते हैं। अपनी आक्रामकता छोड़कर एकदम डिफ़ेंस पर आ जाते हैं।

मेरे डांटने का भौंक रहे एक कुत्ते पर अच्छा असर हुआ। शायद वह बहुत पहले एक बार मुझसे सुबह की ड्यूटी के दौरान मिल चुका था। मैंने तो नहीं, उसने ज़रूर मुझे पहचान लिया। वह फ़ौरन चुप हो गया। दुम हिलाता हुआ मेरी ओर लपका। मैं समझ गया, यह दुम हिला रहा है, यानी शांतिप्रिय है। शांतिप्रिय देश की तरह आक्रमण करने की इसमें हिम्मत इसमें नहीं है। लिहाज़ा, यह मुझसे फ्रेंडशिप करना चाहता है। कहने का मतलब इस कुत्ते ने मुझे ताक़तवर मान लिया।

-क्या है? दूर रहो! दूर रहो! मैं उस पर रहम दिखाने के मूड में नहीं था। लिहाज़ा, दोबारा डांट पिलाई। कुत्ते ने इसके बाद तो पूरी तरह से सरेंडर कर दिया। मेरा नेतृत्व स्वीकार कर लिया। उसकी नज़र लगातार मुझ पर थी। उसने मेरे चेहरे से ग़ायब होती आक्रामकता पढ़ ली। लिहाज़ा, लपक कर मेरे चरणों में आ गिरा। मेरे जूते चाटने लगा। मैंने सोचा, चलो यह तो मेरा चमचा बन गया। कोई बात नहीं। आम आदमी की तरह मुझे भी चमचे अच्छे लगते हैं। हां, चमचागिरी दूर से ही करें तब।

बहरहाल, उस कुत्ते की देखा-देखी बाक़ी कुत्ते भी मेरी शरण में आने लगे। किसी नेता-अफ़सर की तरह मेरे चमचों की संख्या बढ़ने लगी। कोई भी कुत्ता भौंक नहीं रहा था। यानी सबने सामूहिक रूप से मेरी प्रभुता स्वीकार कर ली थी। कुल नौ कुत्ते थे। नौ रत्न। सबने मुझे कमांडो की तरह घेर लिया। दो आगे, दो पीछे, दो दाएं और दो बाएं। नौवां कुत्ता बहुत आगे था। शायद मेरे लिए सेफ पैसेज़ बना रहा था। मैं किसी नेता की तरह कमांडोज़ के बीच निर्भय होकर पैदल रेलवे स्टेशन चला जा रहा था। अचानक सबसे आगे वाले कुत्ते का एनकाउंटर दूसरे मोहल्ले के कुत्तों से हो गया। उसने फ़ौरन यू-टर्न लिया और दुम दबाकर मेरी ओर लपका।

-क्या है? मैंने और ज़ोर से दूसरे मोहल्ले के कुत्तों को डांटा। मेरे सम्मान में सबके सब चुप हो गए। उन्होंने आपस में भी एक दूसरे पर भौंकना बंद कर दिया। मैं उस समय हैरान रह गया, जब देखा कि कुत्ते आपस में फुसफुसाकर कुछ कह रहे हैं। यानी कुत्तों ने आपस की सदियों पुरानी परंपरागत दुश्मनी छोड़ दी। कमाल है! इस बीच, मेरे मोहल्ले के कुत्तों ने मेरी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी दूसरे मोहल्ले के कुत्तों को सौंप दी और वे एक दूसरे को उचित स्थान पर सूंघकर वापस लौट गए। मैं आगे बढ़ता रहा। मेरी सुरक्षा अब दूसरे मोहल्ले के कुत्ते कर रहे थे। उसी तरह नौ रत्न। चारों ओर दो-दो कुत्ते। एक कुत्ता सबसे आगे था।

मेरे पदयात्रा की ख़बर जंगल के आग की तरह मुझसे पहले ही तीसरे मोहल्ले में पहुंच गई। वहां आदमियों में तो नहीं कुत्तों में ज़रूर हड़कंप मच गया। उनमें भौंका-भौंकी होने लगी। दो कुत्ते स्कॉटिंग कर रहे कुत्ते के पीछे दौड़े आ रहे थे। मैंने फिर बहुत ज़ोर से डांटा -क्या है? मैनर नाम की चीज़ नहीं है तुम कुत्तों में। कब तक लड़ोगे आपस में। मेरी बात मानो, मलाई खाना हो तो दुश्मनी भुला दो। एक हो जाओ। फ़ायदे में रहोगो। किसी सरकार की कृपादृष्टि मिल गई तो पीढ़ियां संवर जाएंगी।

मेरी बात का तीसरे मोहल्ले के कुत्तों पर भी ख़ासा असर हुआ। सब दुम हिलाते हुए मेरी शरण में आ गए। दोनों मोहल्ले के कुत्ते एक दूसरे को सूंघने लगे। इस कार्यक्रम के पूरा होने पर दूसरे मोहल्ले के कुत्ते भी स्वमोहल्ला वापस लौट गए। अब मैं तीसरे मोहल्ले के कुत्तों के संरक्षण में था। मोहल्ले के नौ कुत्ते मेरा बॉडीगार्ड बनने पर गौरवान्वित महसूस कर रहे थे। फूले नहीं समा रहे थे। मैं उऩकी सुरक्षा में आराम से स्टेशन की ओर चला जा रहा था।

अचानक मैंने स्टेशन के पास के मोहल्ले के कुत्तों के जागरण की आवाज़ सुनी। फिर मुझे सुखद आश्चर्य यह हुआ कि यहां भी कुत्ते एक दूसरे से लड़ नहीं रहे हैं, बल्कि प्यार का प्रदर्शन कर रहे हैं। एक दूसरे को सूंघ रहे हैं। स्टेशन के कुत्तों ने तीसरे मोहल्ले के कुत्तों को प्रेम के साथ विदा किया और मेरी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली।

अंततः इन सभी कुत्तों ने मुझे सकुशल रेलवे स्टेशन पर पहुंचा दिया। सभी कुत्ते मुझे प्लेटफ़ॉर्म तक छोड़कर वापस लौट गए। बस एक कुत्ता मेरी हिफ़ाज़त में प्लेटफ़ॉर्म पर ही खड़ा रहा। वह मेरे ट्रेन में सवार होने के बाद ही वापस लौटा।

ट्रेन में मुझे सीट मिल गई। बैठकर मैं कुत्तों के बारे में ही सोच रहा था। इतने ढेर सारे कुत्ते मेरी हिफ़ाज़त कर रहे थे। मैं कुत्तों का निर्विवाद नेता बन गया था। अचानक मेरे मन में ख़याल आया कि मुझे शांति का नोबेल पुरस्कार मिलना चाहिए। चार-चार मोहल्ले के कुत्तों के बीच शांति, प्रेम और भाई-चारा स्थापित करने के लिए। मेरे कारण कुत्तों ने अपनी परंपरागत दुश्मनी छोड़ दी। यानी मैं इंसानों में इंसानियत भले न जगा पाया होऊं परंतु कुत्तों में कुत्तियत ज़रूर जगा दिया। कुत्ते मेरे साथी बन गए। मैंने सुबह ड्यूटी लगाने के लिए सीनियर को धन्यवाद दिया। उन्होंने मुझे यह अहसास दिलाया कि मैं भी पदयात्रा करने वाला शांति की पूजारी हूं। कुत्तों का नेता हूं।

सोमवार, 8 जून 2015

मुंबई हिंदी पत्रकार संघः एक सुखद संयोग....

हरिगोविंद विश्वकर्मा
प्रस्तावित हिंदी पत्रकार संघ के गठन की प्रक्रिया चल रही है. इस संदर्भ में नब्बे के आरंभ के दशक की पत्रकारिता का ज़िक्र समीचीन होगा. तब मौजूदा प्रस्तावित हिंदी पत्रकार संघ के ज़्यादातर लोग कॉलेज में रहे होंगे. अस्सी के दशक के अंत और नब्बे के दशक के आरंभ में टेब्लायड सांध्य अखबारों का दौर शुरू हुआ. अश्विनी कुमार मिश्र का निर्भय पथिक पहला सांध्य दैनिक था. आदरणीय डॉ. राममनोहर त्रिपाठी अपने संपादन में दो बजे दोपहर अख़बार लेकर आए. जनसत्ता का संझा जनसत्ता(स्थानीय संपादक राहुल देव, प्रभारी सतीश पेंडणेकर) शुरू हुआ. निखिल वागले का आपलं महानगर और हमारा महानगर (संपादक, अनुराग चतुर्वेदी) आरंभ हुआ. शिवसेना भी पीछे नहीं रही. संजय निरुपम के संपादन में सांध्य दैनिक दोपहर का सामना शुरू हुआ. अचानक से शहर में हिंदी पत्रकारों का तादाद बहुत ज़्यादा बढ़ गई.

मैंने भी उस समय बस पत्रकारिता शुरू ही की थी. बहरहाल, नब्बे के दशक में अचानक शहर के क़रीब-क़रीब सभी हिंदी के पत्रकारों को लगा कि हर भाषा के पत्रकारों का संगठन है, लेकिन हिंदी पत्रकारों का कोई संघ नहीं है. तब मुंबई में अंग्रज़ी के लिए अंग्रेज़ी डॉमिनेटेड मुंबई प्रेस क्लब, मराठी के लिए मराठी पत्रकार संघ, गुजराती के लिए गुजराती पत्रकार संघ और उर्दू के लिए उर्दू पत्रकार संघ जैसे पत्रकारों के भाषाई फ़ोरम हैं लेकिन हिंदी पत्रकार संघ नहीं है. इसीलिए हिंदी पत्रकारों का एक संगठन खड़ा करने की मुहिम शुरू हुई.

बहरहाल, राहुल देव (जनसत्ता के स्थानीय संपादक) और विश्वनाथ सचदेव (नवभारत टाइम्स के स्थानीय संपादक) की अप्रत्यक्ष पहल पर मुंबई हिंदी पत्रकार संघ बनाने की कवायद शुरू हुई. बॉम्बे यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट (बीयूजे) में कई मीटिंग्स वगैरह हुईं. अंततः मुंबई हिंदी पत्रकार संघ अस्तित्व में आ गया. उसके लिए बीयूजे में विधिवत लोकतांत्रिक तरीक़े से चुनाव हुआ, जिसमें बतौर मतदाता मैंने भी वोट दिया. चुनाव में द्विजेंद्र तिवारी (जनसत्ता) अध्यक्ष और हरीश पाठक महासचिव (धर्मयुग, तब विश्वनाश सचदेव धर्मयुग के संपादक थे और उसे बंद करवाने तक संपादक वही रहे) निर्वाचित हुए.

उन दिनों मुलायम सिंह यादव पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे. वह मुंबई आए और उनके सम्मान में मुंबई हिंदी पत्रकार संघ ने इंडियन मर्चेंट चैंबर्स में एक कार्यक्रम किया. मुलायम सिंह ने उस कार्यक्रम में मुंबई हिंदी पत्रकार संघ को आर्थिक मदद के रूप में पांच लाख रुपए का चेक दिया. उस समय अयोध्या में कारसेवकों पर गोली चलवाने, उत्तराखंड की आंदोलनकारी महिलाओं से कथित बलात्कार और दैनिक जागरण अख़बार के ख़िलाफ़ समाजवादी पार्टी का हल्लाबोल आंदोलन के कारण मुलायम सिंह यादव की छवि इंडियन मीडिया में ठीक नहीं थी. लिहाज़ा, उनसे पैसे लेने पर मुंबई हिंदी पत्रकार संघ में गंभीर मतभेद हो गया. अंततः मुलायम सिंह यादव का पांच लाख रुपए नहीं लेने का फ़ैसला किया गया.

उसी दौरान शिवसेना का मुंबई की मीडिया से पंगा हो गया. दरअसल, आपलं महानगर (मराठी और हिंदी दोनों) ने शिवसेना के ख़िलाफ़ ख़बर छाप दी. बदले में शिवसैनिकों ने अखबार के दफ़्तर में तोड़फोड़ की और निखिल वागले पर हमला कर दिया. हमले के विरोध में शिवसेना भवन के सामने पत्रकारों ने विरोध प्रदर्शन किया. उसी समय शिवसैनिकों ने पत्रकारों पर हमला कर दिया जिसमें मणिमाला (नवभरत टाइम्स) और मिलिंद खांडेकर (दो बजे दोपहर) को गंभीर चोट लगी. इसके बाद मुंबई हिंदी पत्रकार संघ जनसत्ता और दोपहर का सामना के बीच शुरू शाब्दिक जंग में उलझ गया और धीरे-धीरे दम तोड़ दिया.

इसे संयोग ही कहेंगे कि पुराने जनरेशन के पत्रकारों और उनके संगठन ने वसूल का हवाला देते हुए मुलायम सिंह यादव से पांच लाख रुपए लेने से मना कर दिया, लेकिन नई जनरेशन के पत्रकार और उनका संगठन उनके बेटे अखिलेश यादव के मेहमान बनने वाले हैं. वैसे इस तरह के दौरे अकसर सरकारें अपने काम का एक्सपोज़र पाने के लिए कराती रहती हैं. उत्तर प्रदेश सरकार, झारखंड सरकार, केंद्र सरकार और जम्मू-कश्मीर सरकार के इस तरह के दौरे होते रहते हैं. जम्मू-कश्मीर सरकार तो पत्रकारों को वादियों की खूब सैर करवाती है. यह देशाटन तो है ही, अनुभव के लिहाज़ भी पत्रकार के लिए बेहरतरीन आयोजन होता है.

प्रस्तावित हिंदी पत्रकार संघ का कार्यक्रम जितना धांसू हुआ, उतना ही धांसू कवरेज (अख़बारी और वॉट्सअप, टीवी वाले इस तरह की ख़बर नहीं चलाते हैं) हो गई. मुंबई के सभी समाचार पत्रों के साथ लखनऊ तक के अख़बार (तरुणमित्र) में ख़बर छपी. जहां भी छपा, वॉट्सअप पर उसकी क्लिपिंग देखने को मिली. मुझे लगता है सभी साथी मुझसे सहमत होंगे.

प्रेस रिलीज़, पता नहीं किसने तैयार किया, परंतु शर्तिया किसी असाधारण प्रतिभा के धनी हिंदी पत्रकार ने ही गहन रिसर्च और मशक्कत के बाद तैयार किया होगा. ऐसा मेरा मानना है. इसीलिए उसकी लेखनी तस की तस हर अख़बार ने छाप दी, केवल हेडिंग पेज इंचार्ज ने अपने अनुसार लगाया. बस नवभारत अखबार अपवाद रहा, जिसने असाधारण प्रतिभा के धनी हिंदी पत्रकार द्वारा पत्रकार घोषित किए गए लोगों के अलावा कुछ और लोगों को पत्रकार करार देते हुए उनके नाम भी छाप दिए. वैसे, एक ही समाचार क़रीब-क़रीब सभी (नवभारत टाइम्स मैंने पढ़ा नहीं) हिंदी अख़बारों में पढ़ते-पढ़ते कई लोगों को तो यह समाचार कंठस्थ हो गया होगा. जो भविष्य मैं काम आएगा. इसके लिए शुभकामनाएं, ऐसी ही प्रेस रिलीज़ तैयार करके हिंदी पत्रकारिता का भला करते रहिए. सभी साथियों को इस शानदार आयोजन के लिए बधाई और कोटि-कोटि धन्यवाद.


मंगलवार, 19 मई 2015

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मिशन विश्वनेता

हरिगोविंद विश्वकर्मा
देश के शक्तिशाली प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी ऑफ़िस में एक साल का कार्यकाल पूरा कर रहे हैं। लिहाज़ा, उनके कार्यकाल का आंकलन होने लगा है। हालांकि, किसी नेता की सफलता या असफलता का आकलन एक साल में नहीं किया जा सकता लेकिन एक साल यह पता लगाने के लिए पर्याप्त होता है कि वह नेता किस लाइन ऑफ़ ऐक्शन की ओर जा रहा है. वैसे सत्ता की बाग़डोर संभालने के बाद से ही मोदी जिस तरह विश्व-भ्रमण कर रहे हैं, राजनीतिक हलक़ों में अटकलें लगाई जाने लगी हैं कि कहीं उनकी इच्छा विश्वनेता बनने की तो नहीं है? कई जानकार कहने लगे हैं कि मोदी की विदेश यात्राओं से तो यही लगता है कि पांच साल में वह अपने को विश्वनेता के रूप में स्थापित करना चाहते हैं, और, फिलहाल उसी मिशन पर काम कर रहे हैं।
हां, इस बात पर दो राय नहीं कि साल भर में मोदी ने विदेश यात्राओं के तमाम रिकॉर्ड तोड़ चुके हैं। वस्तुतः प्रधानमंत्री बनने के तुरंत बाद भूटान यात्रा से विदेश दौरे जो सिलसिला शुरू हुआ, वह फ़िलहाल जारी है। अब तक मोदी अमेरिका, जापान, फ्रांस, चीन, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे बड़े देशों और नेपाल, फ़िज़ी, मॉरीशस और मंगोलिया जैसे छोटे देशों की यात्रा कर चुके हैं। कह सकते हैं कि मोदी अफ्रीका को छोड़कर सभी महाद्वीपों के 18 देशों के दौरे पर जा चुके हैं। सिंगापुर तो मोदी वहां के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहे ली कुआन येव के अंतिम संस्कार में चले गए थे।
मज़ेदार बात यह है कि जैसे पिछले साल आम चुनाव के दौरान मोदी भारत के हर शहर को गुजरात से जोड़ देते थे, उसी तरह हर देश को आजकल वह भारत से जोड़ रहे हैं। नवीनतम जानकारी यह है कि मोदी ने 18 मई को मंगोलिया की संसद को संबोधित करते हुए कहा कि भारत और मंगोलिया का बहुत प्राचीन आध्यात्मिक रिश्तारहा है। कहने का मतलब, मोदी हर देश के साथ भारत का रिश्ता गढ़ ही लेते हैं। कई टीकाकार मोदी की इस ख़ासियत के क़ायल भी हैं। वैसे, मोदी अपनी हर विदेश यात्रा की जमकर मार्केटिंग भी करते हैं। विदेश यात्राओं की ऐसी रिपोर्टिंग करवाते हैं कि सूचनाओं के लिए मीडिया पर निर्भर व्यक्ति सोचने लगता है कि मोदी का क्रेज़ जिस तरह पिछले चुनाव में देश में था, अब वही क्रेज़ अब विदेशों में है। मोदी की जापान, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया यात्रा इस तरह की मार्केटिंग की मिसाल है, जैसे जापान में ढोल बजाया था वैसे ही मोदी ने मंगोलिया में वहां के वाद्य को बजाने की कोशिश की। इस स्पेशल रिपोर्ट दिखाई भी गई और लिखी भी।
पिछले साल नरेंद्र मोदी के शपथ-ग्रहण समारोह में पाकिस्तान समेत दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) के सभी सदस्य देश के राष्ट्राध्यक्ष आमंत्रित किए गए थे। मोदी की वह पहल राजनयिक स्तर पर काफी सराही गई थी। विदेशी मामलों में दख़ल रखने टीकाकारों ने कहा था, कट्टर हिंदूवादी नेता के प्रधानमंत्री बनने की घटना को ऐतिहासिक महत्व की घटना साबित करने के लिए ही शपथग्रहण में सभी को न्यौता भेजकर बुलवाया गया था, जो एक सकारात्मक शुरुआत थी। मोदी ख़ुद अमेरिका गए और अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को भी गणतंत्र दिवस के मौक़े पर भारत बुलाने में सफल रहे। उनके साथ 'मन की बात' भी प्रस्तुत की।
मोदी की इन विदेश यात्राओं का कितना फ़ायदा इस देश या देशवासियों को हुआ? इस पर अभी कुछ नहीं कहा जा सकता। इतना ज़रूर है कि ऐसा कुछ नहीं हुआ है जो विज़िबल हो। यानी विश्वमंच पर अभी तक ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, जिसे उल्लेखनीय घटना कहा जा सके। यह दावा करना कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने और धुआंधार विदेश यात्राओं से दुनिया में भारत की हैसियत बढ़ गई है, सही नहीं होगा। ऐसा कहने वाले एक झूठे आशावाद की परिकल्पना कर रहे हैं।
दरअसल, अमेरिका ही नहीं पश्चिम के क़रीब-क़रीब सभी देश चीन से आशंकित रहते हैं क्योंकि अपना राष्ट्रीय हित साधने में चीन नंबर एक है। अपने फ़ायदे के लिए बीजिंग कब क्या कर दे, कोई नहीं जानताइसीलिए किसी को चीन पर विश्वास नहीं रहता है। यहां तक कि चीन की पाकिस्तान से दोस्ती एक सोची समझी रणनीति के तहत है। चीन अपने को सिर्फ़ अपने प्रति जिम्मेदार मानता है, इसीलिए यूरोप और अमेरिका को भारत में चीन का एक विकल्प दिखता है। लिहाज़ा, विश्वमंच पर पीठ थपथपाने वाला आशावादी बयान देकर नई दिल्ली को प्रोत्साहित करते रहते हैं। हमारे प्रधानमंत्रीजी को भी विदेशों से वहीं प्रोत्‍साहन मिला है, और वे उसी से गद्गद् हैं।
अगर इतिहास पर नज़र डालें तो विश्वनेता बनने की बीमारी भारतीय नेताओं में ख़ासी पुरानी रही है। पं. जवाहरलाल नेहरू की विश्वनेता बनने की बड़ी हसरत थी। लिहाज़ा, उन्होंने गुटनिरपेक्ष आंदोलन शुरू किया। विश्वनेता बनने की चाह में नेहरू ने हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा दिया, लेकिन उनकी आंख तब खुली, जब चीन ने 1962 में भारत पर आक्रमण कर दिया और अरुणाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में बहुत बड़े भूभाग को हड़प लिया।
इंदिरा गांधी में भी यह लालसा किसी से छिपी नहीं थी, इसीलिए वह भी गुटनिरपेक्ष आंदोलन को खाद-पानी देती रहीं। हालांकि अमेरिका और सोवियत संघ के बीच शीतयुद्ध ख़त्म होते ही गुटनिरपेक्ष आंदोलन रूपी पौधा अपने आप सूख गया। इसी तरह राजीव गांधी ने भी बतौर मिस्टर क्लीनकई देशों की धुआंधार यात्रा की। कई राष्ट्राध्यक्षों ने तो प्रोटोकोल को धता-बताकर राजीव की आगवानी की। उसके बाद के नेता वस्तुतः अल्पमत सरकारों के मुखिया रहे, लिहाज़ा, वे किसी तरह सरकार चलाने और साथी दलों के नेताओ के नखरे झेलने में ही बिज़ी रहे।
कुल मिलाकर विश्वनेता बनने के आकांक्षी भारतीय नेताओं की कोशिश चाहे रंग लाई हो या नहीं, लेकिन भारत की विश्वमंच पर आज भी वही औक़ात है, उसकी जो औक़ात स्वतंत्रता मिलने के समय थी। हां, देश का प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति विदेश जिस देश की यात्रा करता है, वह देश संयुक्त राष्ट्रसंघ सुरक्षा परिषद में भारत की स्थाई सदस्यता का पब्लिकली समर्थन करता है। कई विश्वमंच पर अमेरिका भी भारत के दावे का समर्थन कर चुका है। चीन और पाकिस्तान के छोड़ दें, तो दुनिया का हर छोटा-बड़ा देश मानता है कि भारत को सुरक्षा परिषद में स्थाई सीट मिलनी चाहिए, लेकिन सच यह है कि भारत को वीटो पॉवर अभी तक नहीं मिल पाया है। देश को अभी कितना इंतज़ार करना होगा कोई नहीं जानता। कभी-कभी तो लगता है कि भारत सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य कभी नहीं बन पाएगा। मोदी भी जिस देश के दौरे पर जा रहे हैं, उस देश की लीडरशिप भारत के दावे का समर्थन का ऐलान कर देते हैं जो पिछले कई दशक से चल रहा है।
बहरहाल, राजनैतिक टीकाकार कहने लगे हैं कि मोदी जितना ध्यान विदेशी निदेश पर लगा रहे हैं उसके आधा अगर देश के अंदरूनी मामले पर लगाए होते तो नतीजा दिखने लगता, तब बलिया के बीजेपी सांसद भरत सिंह को यह न कहना पड़ता कि इस सरकार ने एक साल में भाषण पिलाने के अलावा ऐसा कुछ नहीं किया कि मतदाताओं को बताया जा सके। जहां तक निवेश की बात है तो भारत ने 1991 से अपनी अर्थव्यवस्था को वैश्विक देशों के लिए खोल रखी है, फिर भी विदेशी निवेश उतना नहीं आ रहा है, जितनी उम्मीद थी। जाहिर है, विदेशी निवेश किसी प्रधानमंत्री के कहने से नहीं बल्कि अपने सुविधा और फ़ायदे के मुताबिक आएगा।
मोदी ने पिछले साल जब सत्ता संभाली थी लोगों ने यह कयास लगाया था कि उनकी अगुवाई में देश कुछ ठोस क़दम उठाएगा। मसलन, स्विस और दूसरे विदेशी बैंकों में जमा काला धन भारत आएगा और भारत की छवि एक सशक्त देश की बनेगी, लेकिन एक साल में लफ़्फ़ाज़ी के सिवाय हुआ कुछ नहीं। काले धन पर तो बीजेपी के एक सीनियर लीडर को कहना पड़ा कि मोदी के उस बयान को सीरियस न माना जाए, यानी मोदी ने चुनाव में कैजुअली कह दिया था कि उनकी सरकार हर भारतीय के खाते में 15 लाख रुपए जमा करवाएगी। वैसे देखा जाए तो दूसरे मोर्चों पर भी मोदी के कार्यकाल कछ नहीं हुआ। कहीं-कहीं तो वह मनमोहन से भी गए गुज़रे साबित हो रहे हैं।
पाकिस्तान की ओर से सीमा पर अंधाधुंध फायरिंग चलती रहती है। मोहम्मद हाफिज़ सईद आए दिन भारत को धमकी देता रहता है। इतना ही नहीं, मुंबई आतंकी हमले के मास्टरमाइंड ज़किउर रहमान लखवी को रिहा कर दिया गया। भारत विरोध जताने के अलावा कुछ नहीं कर पाया. दाऊद इब्राहिम के बारे में भारत अब भी प्रमाण देने में व्यस्त है कि भारत में वांछित यह अपराधी पाकिस्तान में ही है। कुल मिलाकर इन तमाम मसलों पर मोदी के पीरियड में भी भारत कुछ नहीं कर पाया है सिवाय विरोध जताने के। इससे भारत की छवि दुनिया में साफ़्ट नेशनकी बन गई है। साफ़्ट नेशन की यही इमैज विश्वमंच पर भारत की भूमिका को सीमित कर देती है।

अटलबिहारी वाजपेयी ने परमाणु विस्फोट करके इस इमैज से निकलने की कोशिश की थी, लेकिन बहुमत न होने से वह बैकफुट पर आ गए थे। मोदी के साथ ऐसी कोई मज़बूरी नहीं थी। उन्हें महानायक बनने का मौक़ा मिला था, लेकिन उनके एक साल के कामकाज पर नज़र डालें तो यही लगता है, फिलहाल मोदी वह मौक़ा गंवा रहे हैं।