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मंगलवार, 8 मार्च 2016

महिलाओं की हर समस्या का एक ही हल, हर जगह उन्हें 50 फ़ीसदी प्रतिनिधित्व

हरिगोविंद विश्वकर्मा
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाकर महिलाओं को ख़ुश करने की कोशिश की जा रही है। दरअसल, जो हो रहा है, वह मुद्दे से ध्यान हटाने की कवायद है। यह वैसी ही प्रैक्टिस है जैसे, कभी राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री तो कभी लोकसभा अध्यक्ष पद पर किसी महिला को बिठाकर मान लेना कि नारी सशक्तिकरण यानी वूमैन इम्पॉवरमेंट हो गया। दरअसल, जो लोग धूमधाम से महिला दिवस मनाते हैं, उनमें ज़्यादातर लोग महिलाओं का हक़ मारते हैं। चूंकि महिलाओं का हक़ मारना यानी उनके साथ पक्षपात एक सामाजिक अपराध है, लिहाज़ा, उसी सामाजिक अपराध का प्रायश्चित करने के लिए ही पुरुष प्रधान-समाज महिला दिवस मनाता है।

सवाल उठता है कि क्या सचमुच समाज के पैरोकार महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने के पक्षधर हैं, क्या सचमुच महिलाओं का उत्थान चाहते हैं। अगर हां, तो वे सभी प्रावधान किए जाएं जो सही मायने में स्त्री को बराबरी के मुकाम तक पहुंचाते हैं। इस क्रम में सबसे ज़रूरी है कि पहले असली समस्या को जानने की कोशिश करनी चाहिए क्योंकि, किसी को पता ही नहीं कि असली समस्या क्या है। ज़ाहिर है मर्ज़ के नेचर का पता नहीं चलेगा तो दवा अंदाज़ से दी जाएगी, जिससे ठीक होने की बजाय कभी-कभार मरीज़ की मौत तक हो जाती है।

अगर नेशनल क्राइम ब्यूरो के डेटा देश में नया पर गौर करें तो नया रेप क़ानून के अस्तित्व में आने के बाद रेप की घटनाएं ज्यादा तेजी से बढ़ी हैं। सन् 2009, 2010, 2011 और 2012 में रेप के मामले क्रमशः 21,397, 22172, 24206 और 24923  तो 2013 में नया कानून बनने के बाद रेप के मामले ऊछलकर सन् 2013, 2014, 2015 और 2016 में 33707, 34098, 36,735 और 38,947 हो गया। इसका अर्थ है डर्टी सोचवाले क़ानून से नहीं डरते। क़ानून कठोरतम यानी रेपिस्ट को पब्लिकली ज़िंदा जलाने का भी बना दिया जाए। तब भी वे महिलाओं पर ज़ुल्म जारी रखेंगे। यानी रेप समेत महिलाओं पर होने वाले ज़ुल्म क़ानून कठोर करके नहीं रोके जा सकते। दरअसल, समाज ही असंतुलित और पुरुष-प्रधान यानी मेल-डॉमिनेटेड है और ऐसे समाज में रेप नहीं रोका जा सकता, क्योंकि अपनी जटिलताओं के चलते यह समाज महिलाओं को अल्पसंख्यक बनाता है।

कठोर रेप लॉ के बावजूद बढ़ती रेप की वारदातें साबित करती हैं कि क़ानून-निर्माता अब भी मूल समस्या समझ पाने में नाकाम हैं। या तो उनकी सोच वहां तक पहुंच नहीं रही है कि समस्या आइडेंटीफाई कर उसे हल करें या फिर वे इतने शातिर हैं कि समस्या हल ही नहीं करना चाहते। यह भावना मे बहकर अनाप-शनाप बयान देने का वक़्त नहीं, बल्कि पता करने का वक़्त है कि रेप जैसे क्राइम रोके कैसे जाएं। रेपिस्ट को दंड देने की बात तो बाद में आती है। अगर ऐसे प्रावधान हो जाएं कि रेप जैसे अपराध हो ही न, तो दंड पर ज़्यादा दिमाग़ खपाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। सवाल उठता है कि आख़िर रेप जैसे जघन्य अपराध हो ही क्यों रहे हैं। आख़िर क्यों औरत को अकेले या एकांत में देखकर चंद पुरुष अपना विवेक, जो सही मायने में उन्हें इंसान बनाता है, खो देते हैं और हैवान का रूप धारण कर लेते हैं? एक स्त्री जो हर किसी के लिए आदरणीय होनी चाहिए, माता-बहन के समान होनी चाहिए, आख़िर क्यों अविवेकी लोगों के लिए महज भोग की वस्तुबन जाती है?

दरअसल, महिलाओं की बहुत कम संख्या देखकर पुरुष उन्हें कमज़ोर मान लेते हैं और मनमानी करने का दुस्साहस करने लगते हैं। महिलाओं पर होने वाले हर ज़ुल्म के लिए समाज का मैल-डॉमिनेटेड ताना-बाना ही ज़िम्मेदार है। ऐसे समाज में स्त्री पुरुष की बराबरी कर ही नहीं सकती, क्योंकि यह सेटअप स्त्री को सेकेंड सेक्स का दर्जा देता है। सभ्यता के विकास के बाद जब से मौजूदा समाज प्रचलन में आया, तब से स्त्री दोयम दर्जे की ही नागरिक रही। बॉलीवुड अभिनेत्रियों या शहरों की लड़कियों को जींस-टीशर्ट या स्कर्ट में देखकर कुछ क्षण के लिए ख़ुश हुआ जा सकता है कि महिलाएं पुरुषों की बराबरी कर रही हैं लेकिन सच यह है कि स्त्री कभी पुरुष की बराबरी कर ही नहीं पाई। यह सच स्त्रियों से बेहतर कौन समझ सकता है।

दरअसल, पुरुष-प्रधान मानसिकता ही स्त्री को बराबरी का दर्जा देने भी नहीं देती। लिहाजा, ज़रूरत उन प्रावधानों पर अमल करने की है जो सही मायने में स्त्री को बराबरी के मुकाम तक लाते हैं। इसके लिए शुरुआत घर से करनी होगी। क्या लोग अपने घर में स्त्री या लड़कियों को बराबरी का दर्जा देते हैं? क्या घर में बेटे-बेटी में फ़र्क़ नहीं करते? विकसित परिवारों में स्त्री के साथ खुला पक्षपात होता है, उसे एहसास दिलाया जाता है कि दोयम दर्जे की नागरिक है। ऐसे में पिछड़े और दूर-दराज़ के समाज में स्त्री की क्या पोज़िशन होती होगी, सहज समझा जा सकता है।

पुरुष-प्रधान संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 फ़ीसदी आरक्षण मिलेगा, अब इसकी संभावना नहीं के बराबर है। महिला आरक्षण तो किसी भी सरकार के एजेंडा में ही नहीं था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अपवाद नहीं हैं। ऐसे में जो नेता रेप पर आंसू बहाते हैं, वे लोगों को बेवकूफ़ बनाते हैं। इनकी स्त्रियों को बराबरी का दर्जा देने में दिलचस्पी ही नहीं। अगर लोग सचमुच महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने के हिमायती हैं तो सबसे पहले राजनीतिक दलों के अलावा केंद्र और राज्य सरकार में 50 फ़ीसदी पद महिलाओं को दें। यानी देश की हर सरकार में महिला-मंत्रियों की तादाद पुरुष-मंत्रियों के बराबर हो। विधायिका में 33 फ़ीसदी नहीं बल्कि 50 फ़ीसदी जगह महिलाओं के लिए सुनिश्चित हो। महिलाओं की आबादी फ़िफ़्टी परसेंट है तो विधायिका में आरक्षण 33 फ़ीसदी क्यों? संसद में 790 सदस्यों (लोकसभा-545 और राज्यसभा-245) में से किसी भी सूरत में 395 सदस्य महिलाएं होनी ही चाहिए।

एक बात और, महिला आरक्षण का लाभ केवल गांधी, पवार, बादल, पटनायक, या मुलायम जैसे राजनीतिक परिवारों की महिलाएं या लड़कियां ही हाईजैक न कर लें, जैसा कि होता रहा है। पॉलिटिकल फैमिलीज़ की महिलाएं अपने पति, पिता, ससुर या बेटे की पुरुष प्रधान सोच को ही रिप्रज़ेंट करती हैं। लिहाज़ा, महिला रिज़र्वेशन का लाभ आर्थिक-सामाजिक रूप से पिछड़े यानी ग़रीबदेहाती, आदिवासीदलित, पिछड़े वर्ग और मुस्लिम जमात की महिलाओं को भी मिले, यह भी सुनिश्चित होना चाहिए। इसके अलावा मेन स्ट्रीम से ग़ायब उच्च जाति की महिलाओं को भी मौक़ा मिले। विधायिका ही नहीं, न्यायपालिका में आधे जज और आधी एडवोकेट महिलाएं होनी चाहिए। फ़िलहाल सुप्रीम कोर्ट में 25 जज हैं, उनमें केवल एक ही महिला हैं। यही वजह है कि दिल्ली गैंगरेप का मुक़दमा सुप्रीम कोर्ट में तीन साल से लंबित है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या 400 की जानी चाहिए, उनमें 200 जज महिलाएं हों। इसी तरह हाईकोर्ट और निचली अदालतों में जजों की संख्या सीधे 16 गुना बढ़ा देनी चाहिए और महिला-पुरुष जजों की संख्या बराबर होनी चाहिए।

विधायिका और न्यायपालिका के बाद नंबर आता है ब्यूरोक्रेसी का। इसमें भी हर साल छात्र-छात्राओं को चयन बराबर संख्या में होनी चाहिए। पुलिस तंत्र में महिला-पुरुष की संख्या बराबर की जानी चाहिए। कल्पना कीजिए, किसी पुलिस स्टेशन में जाते हैं और वहां जितने पुरुष हैं, उतनी ही महिलाएं भी तो आपका डर, ख़ासकर महिलाओं का डर ख़त्म हो जाएगा। इसी तरह आर्मफोर्स, बैंक, मीडिया संस्थानों और धार्मिक संस्थानों में आधी स्ट्रेंथ महिलाओं की होनी ही चाहिए। सरकारी व निजी संस्थानों, स्कूल-कॉलेज और यूनिवर्सिटीज़ में 50 प्रतिशत पोस्ट महिलाओं को दी जानी चाहिए। आख़िर महिला घर में क्यों बैठें? वे काम पर क्यों न जाएं? यदि 50 फ़ीसदी महिलाएं काम पर जाएंगी तो घर के बाहर उनकी विज़िबिलिटी पुरुषों के बराबर होगी। यानी हर जगह जितने पुरुष दिखेंगे उतनी ही महिलाएं भी। इससे महिलाओं का मोरॉल बुस्टअप करेगा।

जब गली, सड़क, बस, ट्रेन, प्लेन, दफ़्तर, थाने, कोर्ट और स्कूल-कॉलेज यानी हर जगह में महिलाओं की संख्या और मौजूदगी पुरुषों के बराबर होगी तो पुरुष की ज़ुर्रत नहीं कि महिला को बुरी नज़र से देखे। वस्तुतः महिलाओं की कम संख्या ही लंपट पुरुषों को प्रोत्साहित करती हैं। सो महिलाओं को अबला या कमज़ोर होने से बचाना है तो उन्हें इम्पॉवर करना एकमात्र विकल्प है। जिस दिन केंद्र और राज्य सरकार, लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा, न्यापालिका, कार्यपालिका और पुलिस तंत्र में पुरुष-वर्चस्व ख़त्म हो जाएगा और महिलाएं बराबर की संख्या में मौजूद रहेंगी, उस दिन हालात एकदम बदल जाएंगे।

नतीजा यह होगा कि जब लड़कियों को लड़कों की तरह सरकारी और प्राइवेट नौकरी मिलने लगेगी तो उनमें सेल्फ़-रिस्पेक्ट पैदा होगा। वे अपने को पराश्रितऔर वस्तुसमझने की मानसिकता से बाहर निकलेंगी। वे पति या पिता रूपी पुरुष पर निर्भर नहीं रहेंगी, बल्कि स्वावलंबी होंगी। तब वे माता-पिता पर बोझ नहीं होंगी। तब प्रेगनेंसी के दौरान सेक्स-डिटरमिनेशन टेस्ट की परंपरा ख़त्म हो जाएगी। घर में लड़की के जन्म पर उसी तरह ख़ुशी मनाई जाएगी जैसे पुत्र के आगमन पर। लोग केवल पुत्र की कामना नहीं करेंगे, बल्कि लड़की की भी कामना करेंगे। यक़ीन मानिए, तब 1000 लड़कों के मुक़ाबले 1000 लड़कियां पैदा होंगी। समाज संतुलित और ख़ुशहाल होगा। जहां हर काम स्त्री-पुरुष दोनों कर सकेंगे।

मगर यक्ष-प्रश्न यह है कि क्या नारी को अबला और वस्तु मानने वाला पुरुष-प्रधान समाज अपनी सत्ता महिलाओं को सौंपने के लिए तैयार होगा? इस राह में पक्षपाती परंपराएं और संस्कृति सबसे बड़ी बाधा हैं जिनमें आमूल-चूल बदलाव की जानी चाहिए। यानी ढोल, गंवार शूद्र पशु नारी, ये सब ताड़न के अधिकारीचौपाई रचने वाले तुलसीदास जैसे पुरुष मानसिकता वाले कवियों को ख़ारिज़ करना पड़ेगा। रामचरित मानसको संशोधित करना होगा, जहां पत्नी की अग्निपरीक्षा लेने और गर्भावस्था में उसे घर से निकाल देने वाले पति को मर्यादा पुरुषोत्तम राममाना गया है। महाभारतऔर व्यास की सोच भी सुधारनी होगी, जो पत्नी को दांव पर लगाने वाले जुआड़ी पति युधिष्ठिर को धर्मराजमानती है। उन सभी परंपराओं और ग्रंथो में संशोधित करना होगा, जहां पुरुष को पति-परमेश्वरऔर स्त्री को चरणों की दासीमाना गया है। इतना ही नहीं उन त्यौहारों में बदलाव करना होगा, जिसमें पुरुष की सलामती के लिए केवल स्त्री व्रत रखती है। स्त्री की सलामती के लिए पुरुष व्रत नहीं रखता। स्त्री को घूंघट या बुरक़ा पहनने को बाध्य करने वाली नारकीय परंपराओं भी छोड़ना होगा। इतना ही नहीं लड़कियों को पिता की संपत्ति में बराबर की हिस्सेदारी सुनिश्चित करनी होगी और उस पर सख़्ती से अमल करना होगा। सवाल खड़ा होता है, क्या यह पुरुष-प्रधान समाज इसके लिए तैयार होगा?

वस्तुतः समाज में महिलाओं की बहुत कम विज़िबिलिटी ही सबसे बड़ी समस्या या प्रॉब्लम है। घर के बाहर महिलाएं दिखती ही नहीं, दिखती भी हैं तो नाममात्र तादाद में। सड़कों, रेलवे स्टेशनों और दफ़्तरों में उनकी प्रज़ेंस बहुत कम होती है। मुंबई और दिल्ली जैसे डेवलप्ड सिटीज़ में भी महिलाओं की विज़िबिलिटी दस-पंद्रह फ़ीसदी से ज़्यादा नहीं है। देश के बाक़ी हिस्सों में तो हालत भयावह है। चूंकि महिलाओं की आबादी 50 फ़ीसदी है तो हर जगह उनकी मौजूदगी भी 50 फ़ीसदी होनी चाहिए। अगर विज़िबिलिटी की इस समस्या को हल कर लिया गया यानी महिलाओं की प्रज़ेंस 50 फ़ीसदी कर ली गई तो महिलाओं की ही नहीं, बल्कि मानव समाज की 99 फ़ीसदी समस्याएं ख़ुद-ब-ख़ुद हल हो जाएंगी। इसके बाद महिला दिवस मनाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। महिलाएं बिना किसी क़ानून के सही-सलामत और महफ़ूज़ रहेंगी।
(समाप्त)

सोमवार, 7 मार्च 2016

महिला आरक्षण विधेयक को भूल गए पुरुष-प्रधान समाज के नेता

हरिगोविंद विश्वकर्मा
क्या आपको याद हैकभी देश के लोग नारी सशक्तीकरण के प्रतीक महिला आरक्षण विधेयक की बात किया करते थे। उस बिल में संसद और राज्य विधान मंडलों में महिलाओं को 33 फ़ीसदी रिज़र्वेशन का प्रावधान था। अब उसकी चर्चा कोई नहीं करता। महिला आरक्षण बिल कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की विशेष पहल राज्यसभा में भारी शोर-शराबे, विरोध और निलंबन के बीच आनन-फानन नौ मार्च 2010 को पारित किया था। संसदीय इतिहास में वह दिन ऐतिहासिक दिन माना गया था। दूसरे दिन सभी अख़बारों की लीड स्टोरी वही थी। लोगों ने पहली बार सुषमा स्वराज, वृंदा करात और नज़मा हेपतुल्ला को एक मंच से लोगों का अभिवादन करते देखा था। माना गया था कि 2014 के आम चुनाव के बाद लोकसभा में एक तिहाई महिलाएं नज़र आएंगी। लेकिन ऐसा हो न सका, क्योंकि वह बिल अंततः पंद्रहवीं लोकसभा में अटक गया।

2014 की गर्मियों में उस लोकसभा का कार्यकाल ख़त्म होते ही बिल ने भी दम तोड़ दिया। संविधान के अनुच्छेद 107 (5) के तहत विचाराधीन रहने वाले बिल लोकसभा भंग होते ही ख़त्म हो जाते हैं। महिला आरक्षण विधेयक के मुखर विरोधी समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल के ज़्यादा सदस्य मौजूदा  लोकसभा में नहीं हैं। ऐसे बिल को क़ानून का रूप देने का यह सबसे अनुकूल समय था, पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को महिलाओं को संसद और विधान मडलों में प्रतिनिधित्व देने के बारे में सोचने की फ़ुर्सत ही नहीं। इसीलिए उनके 22 महीने के कार्यकाल में संसद के कई अधिवेशन हुए, लेकिन महिला रिज़र्वेशन बिल पेश करना तो दूर उसकी आहट तक नहीं है। दरअसल, यह बिल मोदी के एजेंडा में ही नहीं है।
दरअसल, पंद्रहवीं लोकसभा के पहले संयुक्त अधिवेशन मे चार जून 2009 को तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने घोषणा की थी कि सरकार महिला आरक्षण विधेयक 100 दिन के अंदर पारित करवाएगी, क्योंकि महिलाओ को कई कारण अवसरों से वंचित रहना पड़ता है। उस साल लोकल बॉडीज़ में महिला रिप्रज़ेंटेशन 50 फ़ीसदी कर दिया गया था। मुमकिन है, इस साल भी महिला दिवस मनाते हुए चंद लोग अफसोस जताएं कि आज़ादी के क़रीब दशक बाद भी महिलाओं को समुचित रिप्रजेंटेशन नहीं दिया जा सका, लेकिन पर्व के बीतते ही सब लोग फिर से भूल जाएंगे कि कभी महिलाओं को संसद और विधान सभाओं में प्रतिनिधित्व देने की बात होती थी।

यह विडंबना है कि महिला आरक्षण का ज्वलंत मुद्दा पिछले दो दशक से लंबित है। देश मे आधी आबादी पिछले दो दशक से अपना प्रतिनिधित्व बढाने की मांग कर रही हैं लेकिन पुरूष प्रधान राजनीति संसद में बिल पारित नहीं होने दे रही। हालांकि क़रीब हर राजनीतिक दल अपने मैनिफेस्टो में महिलाओं को रिज़रवेशन देने का वादा करता है। इस बार यानी 16 लोकसभा में 61 महिलाएं हैं। जबकि पिछली बार 58 महिलाएं लोकसभा में पहुंची थी। वैसे पिछली लोकसभा कई मायनों में अलग थी। पहली बार संसद में इतनी ज़्यादा महिला सांसद चुनी गईं थीं और सबसे बढ़कर भारतीय लोकतंत्र में पहली बार मीरा कुमार के रूप में महिला लोकसभा स्पीकर मिली थीं।

अगर महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने के इतिहास में जाएं तो महिलाओं के राजनीतिक सशक्तीकरण के लिए उन्हें रिज़र्वेशन देने का कॉन्सेप्ट राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में आया था। राजीव ने सत्ता का विकेंद्रीकरण करते हुए पंचायतों और लोकल बॉडीज़ को अधिकार देने और उसमें महिलाओं के लिए जगह सुरक्षित करने की बात की थी। पंचायतों और लोकल बॉडीज़ में महिलाओं को आरक्षण 73वें और 74वें संविधान संशोधन के ज़रिए 1993 में शुरू किया गया। उसी समय संसद और विधान मंडलों में महिलाओं की संख्या बढ़ाने की रूपरेखा बनी थी। हालांकि राजीव सरकार के घोटाले में फंस जाने से वह प्रयास फलीभूत नहीं हुआ।

दरअसल, महिला रिज़र्वेशन बिल का संसदीय सफर सितंबर 1996 से शुरू हुआ। जब संयुक्त मोर्चा सरकार ने बिल लोकसभा में पेश किया। उस समय भी निचले सदन में ज़बरदस्त हंगामा हुआ और मंत्री के हाथ से बिल छीन लिया गया।  जब बिल पास नहीं हुआ तो उसे संयुक्त संसदीय समिति के पास भेज दिया गया। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की नेता गीता मुखर्जी की अगुवाई वाली समिति ने नवंबर 1996 में पेश अपनी रिपोर्ट में सात संशोधन सुझाए थे। (1) रिज़र्वेशन की अवधि 15 साल, (2) ऐंग्लो-इंडियन के लिए सब-रिज़र्वेशन, (3) तीन लोकसभा सीटों से कम वाले राज्यों में भी आरक्षण, (4) दिल्ली विधान सभा में भी आरक्षण, (5) एक तिहाई से कम नहीं की जगह क़रीब एक तिहाई’ व्यवस्था (6) ओबीसी महिलाओं के लिए सब-रिज़र्वेशन और (7) राज्यसभा और राज्य विधान परिषदों में भी आरक्षण।

संशोधित महिला आरक्षण बिल 1997 फिर पेश किया गया, लेकिन तीन यादवों (मुलायम, लालू और शरद) ने उसे पास ही नहीं होने दिया। शरद यादव महिला बिल के कट्टर विरोधी निकले। वह महिलाओं को महिलाओं के प्रतिनिधि के क़ाबिल ही नहीं मानते। 1997 में एक बार उन्होंने कहा था, आपको क्या लगता है, छोटे बाल वाली महिलाएं हमारी महिलाओं के बारे में बोल पाएंगी ?” बहराल, अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने 1998 और 1999 में भी बिल पेश किया गया लेकिन विपक्ष ख़ासकर सपा और राजद के विरोध के कारण पास नहीं किया जा सका।

बहरहाल, वाम दलों और कांग्रेस के लिखित आश्वासन के बाद एनडीए सरकार ने 2002 में एक बार और 2003 में दो बार बिल पेश किया, लेकिन बहुमत होने के बावजूद बिल पास नहीं करवाया जा सका। कहते हैं अटल सरकार ने बिल पास करवाने की कोशिश ही नहीं की। इसके बाद सत्ता में आई मनमोहन सिंह सरकार ने अपने कॉमन मिनिमम प्रोग्राम में महिला आरक्षण बिल को शामिल किया, लेकिन बिल पास नहीं हो सका। आम सहमति न बन पाने को कारण बताकर महिला विधेयक को एक प्रकार से ठंडे बस्ते में डाल दिया गया और कांग्रेस ने चार साल बाद 2008 मे फिर कोशिश की। गीता मुखर्जी समिति की पहली पांच सिफारिशों को संशोधित बिल में शामिल कर लिया गया और अंतिम दो को छोड़ दिया गया।

छह मई 2008 को विधेयक पेश करते समय लोकसभा में अजीब हालात पैदा हो गए। बिल पेश कर रहे तत्कालीन मंत्री हंसराज भारद्वाज से समाजवादी पार्टी के लोग बिल छीन न लें, इसके लिए उन्हें दो कांग्रेस महिला सांसदों कुमारी शैलजा और अंबिका सोनी के बाच बैठना पड़ा। जयंती नटराजन और अलका क्षत्रिय भारद्वाज भी उनकी रक्षा कर रही थीं। इसके बावजूद भारद्वाज के बिल पेश करने की कोशिश करते समय समाजवादी पार्टी सांसद अबु आसिम आज़मी ने बिल की कॉपी छीनने की कोशिश की, तो केंद्रीय रेणुका चौधरी ने उन्हें धक्का दे दिया था।

बहरहाल, 2008 में बिल के लोकसभा में पास न होने पर इसे संसदी की स्थाई समिति के पास भेज दिया, लेकिन स्थाई समिति में बिल पर आम राय नहीं बन पाई। समाजवादी पार्टी के सदस्य वीरेंद्र भाटिया और शेलेंद्र कुमार ने कहा कि वे महिलाओं को आरक्षण देने के ख़िलाफ नहीं हैं, लेकिन विधेयक का मौजूदा स्वरूप उन्हें स्वीकार्य नहीं। उन्होंने कहा कि मौजूदा समय में महिलाओं को 20 फ़ीसदी से ज़्यादा आरक्षण नहीं दिया जाना चाहिए। इसके अलावा पिछड़े वर्ग और अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए भी कोटा होना चाहिए।

कई कार्यकर्ताओं का मानना है कि पुरुष प्रधान राजनीतिक दलसंसद और विधान सभाएं महिलाओं को आरक्षण दिए जाने के पक्ष में नहीं हैं। महिला आरक्षण बिल पर सभी राजनीतिक दलों की सोच एक जैसी ही है। दो मुख्य दलों बीजेपी और कांग्रेस हमेशा दोहरा मापदंड अपनाया। इसलिए महिलाएं समुचित प्रतिनिधित्व से वंचित हैं। महिला ऐक्टिविस्ट मधु किश्वर कहती हैं कि अगर बिना ठोस प्रवाधान के महिला आरक्षण लागू किया गया तो लाभ मौजूदा नेताओं की पत्नियों-बेटियों की बीवी-बेटी ब्रिगेड ले उडेंगी।

रविवार, 6 मार्च 2016

जेएनयू में आज़ादी-आज़ादी का उद्घोष बेहद ख़तरनाक संकेत

हरिगोविंद विश्वकर्मा
हम क्या चाहते हैं- आज़ादी! ज़ोर से बोलो- आज़ादी! इधर से बोलो- आज़ादी, उधर से बोलो- आज़ादी। फिर से बोलो- आज़ादी। हम चाहते हैं- आज़ादी! आज़ादी! आज़ादी!! आज़ादी!!! हमें आज़ादी से कम कुछ भी मंजूर नहीं, हम आज़ादी लेकर ही रहेंगे, इस आज़ादी लेने से हमें कोई ताक़त रोक नहीं सकती, हम आज़ादी चाहते हैं। अंत में छोटा-सा स्पष्टीकरण हम देश सेनहीं, बल्कि देश मेंआज़ादी चाहते हैं। यानी सांप भी मर गया और लाठी भी नहीं टूटी। इसी को कहते हैं, शब्दों की कारीगरी। मतलब अपनी बात भी कह दी और देश के टीवी देखने वाले तबके ने आज़ादी की इस परिभाषा को प्रशंसा भाव से मान भी लिया और आज़ादी पर लट्टू भी हो गया। लगे हाथ संविधान का उल्लंघन भी नहीं हुआ। निश्चित तौर पर यह जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार सिंह के लिए वैल्यू ऐडेडे मुद्दा साबित हुआ। आज़ादी का नारा देकर वह रातोरात देश का स्टार पोलिटिशियन बन गया।

आप नौ फरवरी 2016 की शाम जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय कैंपस में लगे कश्मीर की आज़ादी के नारे और तीन मार्च की रात कन्हैया कुमार सिंह की आज़ादी वाले नारे की तुलना कीजिए। बस सेकी जगह मेंने ले लिया। बाक़ी सारा मंजर, मतलब मन्तव्य और मकसद वही था। यानी इसमें शब्दों का भले हेरफेर कर दिया गया हो, लेकिन इसका संदेश वही गया, जो संदेश अलगाववादी तत्व भारतीय संसद पर हमला करवाने वाले जैश-ए-मोहम्मद के आतंकवादी मोहम्मद अफजल गुरू को फांसी पर लटकाने की तीसरी बरसी पर देना चाहते थे और जिसके लिए सारा तामझाम किया गया था। मतलब, नौ फरवरी को लगा भारत से आज़ादीका नारा 25 दिन बाद भारत में आज़ादीमें तब्दील हो गया। गहराई से मनन करने पर लगता है क़ानूनी दांव-पेंच के चलते यह किया गया, क्योंकि देशद्रोह का आरोप झेल रहे कन्हैया कुमार छह महीने की अंतरिम ज़मानत पर हैं।

बहरहाल, किसी भी देश में आज़ादी का उद्घोष और वह भी राष्ट्रीय राजधानी में, उस जगह, जहां तीन हफ़्ते पहले कश्मीर की आज़ादी और देश के टुकड़े-टुकड़े करने वाले नारे लगे हों, वहां इस तरह आज़ादी का उद्घोष किसी भी दृष्टि से शुभ संकेत नहीं है। ख़ास कर कन्हैया ने भाषण से पहले और भाषण के बाद जिस तरह आज़ादी का उद्घोष किया, वह गंभीर व चिंताजनक है। आज़ादी के उद्घोष के दूरगामी परिणामों से अनजान अरविंद केजरीवाल जैसे अपरिपक्व नेता अपने राजनीतिक लाभ के लिए इस तरह के दुस्साहस को प्रमोट करके ऐतिहासिक भूल कर रहे हैं। यह उसी तरह की भूल जैसे कभी खिलाफत आंदोलन में शामिल हो कर  महात्मा गांधी ने की थी या जवाहरलाल नेहरू ने जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देकर या फिर इस सीमावर्ती राज्य के एक तिहाई हिस्से से पाकिस्तानी क़ब्ज़ा ताक़त से ख़त्म करने की बजाय मसला संयुक्त राष्ट्र में ले जाकर की थी।

दरअसल, “आज़ादीएक उर्दू शब्द है। इसका सहज और पहला यानी प्रचलित और सबसे ज़्यादा मान्य अर्थ स्वतंत्रतायानी स्वाधीनता”, अंग्रेज़ी में फ्रीडमही होता है। यानी जब कोई आज़ादी मांगता है तो इसका मतलब वह व्यक्ति, समाज, संस्थान, सिस्टम, सरकार और देश से आज़ाद यानी स्वाधीन होना चाहता है। यानी आज़ादी की मांग केवल व्यक्ति, समाज, संस्थान, सिस्टम, सरकार और देश से ही की जा सकती है। क्योंकि व्यक्ति पर व्यक्ति, समाज, संस्थान, सिस्टम, सरकार और देश का ही नियंत्रण होता है। कन्हैया ने कहा कि हम भारत में आज़ादी चाहते हैं। फिर तपाक् से कह दिया कि देश से नहीं बल्कि ग़रीबी, जातिवाद या मनुवाद आदि से आज़ादी चाहते हैं। दरअसल, यहां आज़ादी का मतलब ही ग़लत समझा गया, क्योंकि ग़रीबी, जातिवाद या मनुवाद आदि अवस्थाएं हैं, इनसे कोई आज़ादी नहीं मांग सकता। इन अवस्थाओं में बदलाव लाया जा सकता है यानी इन्हें समूल नष्ट किया जा सकता है, इनसे आज़ाद नहीं हुआ जा सकता है।

जो शब्द देश के लिए, भले ही पहले कांग्रेस लीडरशिप और अब बीजेपी लीडरशिप के नकारपन के कारण, सिरदर्द जैसा हो गया हो और जिसका सही अर्थ देश के तमाम लोग 1990 में कश्मीर में आतंकवाद के उदय से जानते हों। आज़ादी रूपी जिस शब्द को भारत और भारतीय व्यवस्था में भरोसा न करने वाले अलगाववादी तत्व लगाते आ रहे हैं। या जिस आज़ादी शब्द से देश का मेजॉरिटी पापुलेशन चिढ़ता हो, उसी शब्द का चयन या तो मूर्खता कही जाएगी या असली मन्तव्य छुपाने के लिए लोगों की आंख में धूल झोंकने वाला क़दम कहा जाएगा। कन्हैया जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष है, इसलिए वह इस तरह की मूर्खता नहीं कर सकते। हां, वह उमर खालिद जैसे अपने दोस्तों का हिडेन एजेंडा लागू करने के लिए लोगों की आंख में धूल ज़रूर झोंक सकते हैं।

देश और देशवासियों को यह कतई नहीं भूलना चाहिए कि अफ़ज़ल गुरू ने देश के लोकतंत्र पर हमला करवाया था। उसी अफज़ल की बरसी पर कार्यक्रम में देश विरोधी और कश्मीर की आज़ादी के समर्थन में नारे लगाए गए थे। लिहाज़ा, कन्हैया का समर्थन करते समय हर सच्चे भारतीय को यह ज़रूर सोचना चाहिए, कि कन्हैया का समर्थन करके कहीं कोई ऐतिहासिक ग़लती तो नहीं कर रहे हैं, जिसके बाद पछताने के अलावा कुछ भी हाथ में नहीं आएगा।

नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने और 22 महीने उनकी सरकार की नीतियों से जिन-जिन लोगों का नुकसान हो रहा है या दिल दुख रहा है, उन सबको कन्हैया का भाषण दिल छू लेने वाला या ऐतिहासिक लगा। कुछ लोगों ने तो इतना ओजस्वी भाषण जीवन में पहली बार सुना। चाहे वह दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल हों, कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार या फिर वामपंथी दल हो, सबको कन्हैया का भाषण असाधारण लगा। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव सीताराम येचुरी ने तो घोषणा भी कर दी कि कन्हैया पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव में वामदलों का प्रचार भी करेंगे।

कन्हैया कुमार का इंटरव्यू लेने वाले पत्रकारों से उम्मीद थी कि आमने-सामने मिलने पर जेएनयू नेता से ज़रूर पूछेंगे कि क्या आप आज़ाद नहीं हैं, जो आज़ादी मांग रहे हैं। आप राजधानी में देश के प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ नारे लगा रहे हैं और आज़ादी का उद्घोष कर रहे हैं, क्या यह आज़ादी नहीं है? आप देश के सबसे बेहतरीन शिक्षण संस्थान जेएनयू में देश के ख़र्च पर में रिसर्च कर रहे हैं, क्या यह आज़ादी नहीं है? कन्हैया से यह भी पूछा जाना चाहिए था कि देश में किसने उन्हें ग़ुलाम बनाकर रखा है जो उससे आज़ादी चाहते हैं। ख़ासकर जो देश अपने आपको दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहता रहा हो, उस देश के अंदर आज़ादी की बात करना कहां तक उचित है।

लोग उम्मीद कर रहे थे कि कि कन्हैया जेएनयू जैसे संस्विथान के छात्रसंघ के अध्यक्ष हैं। लिहाज़ा, वह कुछ सीरियस और इश्यू-ओरिएंटेड बात करेंगे। मोदी की नीतियों में खामियों या ईपीएफ पर प्रस्तावित टैक्स पर बात करेंगे। वह लोकपाल की बात करेंगे, कि किस तरह मोदी ने उसे लटका रखा है। मोदी के एक रिटायर्ड चीफ़ जस्टिस को राज्यपाल बनाने कर जजों को पोस्टरिटायर प्रलोभन देकर एक बहुत ग़लत परिपाटी शुरू करने का मुद्दा उठाएंगे। मौजूदा संसद में कोई विपक्ष का नेता नहीं है, इससे कई समितियों में विपक्ष का प्रतिनिधित्व नहीं हो रहा है, लोग उम्मीद कर रहे थे कि कन्हैया यह मसला भी उठाएंगे। कन्हैया महिला आरक्षण की बात करेंगे, जिसे पिछले दो दशक से पहले कांग्रेस और अब बीजेपी ने ठंडे बस्ते में डाल रखा है। वह आरक्षण की बात करेंगे, जिसका लाभ केवल पासवान-मीरा कुमार, लालू-मुलायम जैसे लोग ही उठा रहे हैं। वह लोकतंत्र को पोलिटिकल फैमिलीज़ के क़ब्ज़े से मुक्त कराने की बात करेंगे, जिसके कारण किसानों को आत्महत्या करने के लिए मज़बूर होना पड़ रहा है और देश का लोकतंत्र मूकदर्शक बना हुआ है। लिहाज़ा, कन्हैया नकली लोकतंत्र की जगह असली लोकतंत्र लाने की बात करेंगे, लेकिन कन्हैया मोदी” “संघीऔर एबीवीपीकी टर्मिनॉलॉजी से उबर ही नहीं पाए। पूरे भाषण में वह संघी, मोदी, स्मृति, हिंदू और मनुवाद की उल्टी करते रहे। यह उलटी कई नामचीन लोगों को ऐतिहासिक लगी। कन्हैया के भाषण में आदर्शवाद हावी रहा और आदर्शवादी बातें भावुक किस्म के लोगों को बहुत अच्छी लगती हैं। लोगों ने गौर किया होगा कि कन्हैया हिदीभाषी बिहार से हैं, लेकिन ठीक से हिंदी भी नहीं बोल पा रहे थे। तो क्या जेएनयू में कमोबेश सभी छात्र ऐसे ही हैं। सभी सीरियस बात करने की बजाय क्या जुमलेबाज़ी और हुल्लड़ ही करते हैं?

कन्हैया ने यह ज़रूर कहा कि उन्हें कानून पर भरोसा है, बाबसाहेब भीमराव अंबेडकर के संविधान की एक एक धारा पर भरोसा है। उन्होंने यह भी कहा कि संविधान की प्रस्तावना में कहे गए हैं समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता, समानता के साथ खड़े हैं। लगे हाथ उन्होंने यह भी कहा कि वह उमर खालिद और दूसरे साथियों की रिहाई के लिए संघर्ष करेंगे। इसका मतलब गाहे-बगाहे या स्मार्टनेस तरीक़े से वह अपने दोस्त उमर के समर्थन में ही खड़े नज़र आए। 48 मिनट से ज़्यादा चले के भाषण में कन्हैया और उनके साथी क़रीब पहले पांच मिनट और बाद के चार मिनट किसी उन्मादी की तरह आज़ादी का उद्घोष करते रहे। इस दौरान करीब दो सौ बार आज़ादी के नारे लगे। नारे में सेकी जगह मेंका इस्तेमाल करके क़ानून और संविधान की नज़र में बच गए।

पूरा देश सोच रहा था, कि कन्हैया चश्मदीद होने के कारण देश को बताएंगे कि अफज़ल की बरसी पर आख़िर जेएनयू कैंपस में हुआ क्या था। यह तो सच है न कि वहां अफजल की बरसी मनाई गई थी और देश विरोधी और आज़ादी के समर्थन में नारे लगाए गए थे। उसमें किसकी कितनी भागीदारी है, यह देश की अदालत तय करेगी, लेकिन अपनी तरफ से कन्हैया को बताना चाहिए था कि उसमें उनका किरदार क्या था। लेकिन सबज्यूडिस के बहाने वह असली मुद्दे को टाल गए। असली मुद्दे पर बात करने की बजाय वह पूरे भाषण में मोदी, संघ, एबीवीपी और मनुवाद को कोसते रहे।

अगर इतिहास में जाएं तो पिछली सदी के आरंभ में सन् 1906 माहौल ऐसा ही था। वायसराय लॉर्ड कर्ज़न की अगुवाई में अंग्रेज़ों ने देश बंग-भंग के जरिए अलगाववाद को जो पौधा रोपा उसके उगते ही उसी माहौल में जनाब सैयद अहमद खान मुस्लिम लीग की स्थापना की। मुस्लिम लीग पाकिस्तान-पाकिस्तान कर रही थी। महज 41 साल की उम्र में उस पौधे ने देश का धर्म के आधार पर विभाजन कर दिया। तो क्या यह देश एक और विभाजन की ओर बढ़ रहा है? भले ही वह कई सदी बाद आए। लिहाज़ा, अभी से इस आज़ादी की असली मंशा पर चौकन्ना होने की ज़रूरत है, कि कही देर न हो जाए।

बुधवार, 24 फ़रवरी 2016

संसद में सेक्युलिरिज़्म पर भारी पड़ता राष्ट्रवाद

हरिगोविंद विश्वकर्मा
जिन लोगों ने उम्मीद लगा रखी थी कि देश की सबसे बड़ी जनपंचायत संसद में बजट सत्र का पहले दिन कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष बीजेपी और उसके गठबंधन दलों को बैकफुट पर ला देगी, ऐसे लोगों के लिए पहले दिन का कार्यवाही गहरी निराशा लेकर आई। पूरे दिन लोकसभा ही नहीं राज्यसभा में हमला करने की बजाय उलटे विपक्ष ही बैकफुट पर नज़र आया और बीजेपी की आक्रामकता का सामना करने में पूरी तरह असफल रहा। यह साफ़ लगा कि सही मायने में सवा सौ साल से ज़्यादा पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस में दलित और राष्ट्रवाद के मुद्दे पर अधिकार और इनपुट्स के साथ बोलने वाला नेताओं का भारी अकाल है। बाप की विरासत के बदौलत लोकसभा में पहुंचे ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसै तथाकथित यंगब्रिगेड सदन में पार्टी की संख्या भले बढ़ा दें, तर्कपूर्ण बहस करना उनके वश की बात नहीं और अगर बोलेंगे तो उससे पार्टी को नुकसान ही होगा।

ऐसे में यह कहना न तो अतिशयोक्तिपूर्ण होगा न ही अनुचित कि कांग्रेस अपने युवराज राहुल गांधी की अपरिपक्व और कन्फ़्यूज़्ड सियासत के चलते लड़ाई शुरू होने से पहले ही हार मान बैठी थी। पूरे दिन कांग्रेसी ही नहीं सेक्युलरिज़्म के बैनर तले हर नैतिक-अनैतिक काम करने वाले दल और उनके नेताओं ने भी साफ़ महसूस किया कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय कैंपस में नौ फरवरी की अप्रिय घटना के बाद छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार सिंह की कथित तौर पर देशद्रोह की आरोप में गिरफ़्तारी के समर्थन करने के लिए कांग्रेस उपाध्यक्ष का जेएनयू कैंपस जाना एक ऐतिहासिक भूल थी, जिसने उन्हें हंसी का पात्र बनाकर रख दिया है।

राहुल गांधी की इसी ऐतिहासिक भूल ने मानव संसाधन मंत्री स्मृति जुबीन ईरानी को पहले दिन चैंपियन बना दिया, जिन्होंने संसद पटल पर ज़ोरदार तरीक़े से राष्ट्रवाद की व्याख्या की। ज़बरदस्त होमवर्क करके संसद में आईं स्मृति को कांग्रेस की 2004 से 2014 के दस साल के शासन से ही नहीं, बल्कि छह दशक तक सत्ता में रहने के दौरान कांग्रेस द्वारा की गई हर ग़लती से स्मृति ईरानी और दूसरे बीजेपी नेताओं को ज़बरदस्त खाद-पानी मिलता रहा और वे लोग लच्चेदार भाषा में राष्ट्रवाद की अपने ढंग से व्याख्या तो करते ही रहे, लगे हाथ कांग्रेस की ग़लतियों को भी रेखांकित करते रहे, जिससे कांग्रेस को ही बचाव की मुद्रा में आना पड़ा।

इसकी मिसाल तब देखने को मिली जब हैदराबाद विश्वविद्यालय के दलित छात्र रोहित वेमुला की ख़ुदकुशी और जेएनयू विवाद पर स्मृति ईरानी ने दोनों सदनों में विपक्ष को करारा जवाब देते हुए कहा कि रोहित वेमुला को सस्पेंड करने का फ़ैसला जिस समिति ने किया था उसकी नियुक्ति कांग्रेस के दस साल के शासन में हुई थी। बकौल स्मृति ईरानी, “रोहित वेमुला को सस्पेंड करने का फैसला लेने वाली समिति के सदस्यों को मैंने नियुक्त नहीं किया था। हां, लेकिन केंद्र सरकार ने जब देखा कि उस समिति में कोई भी दलित प्रतिनिधि नहीं है, तो उसमें कोऑप्ट करने का फैसला ज़रूर किया गया।

विपक्ष का दरअसल, रोहित वेमुला की ख़ुदकुशी और जेएनयू विवाद को एकसाथ क्लिप करना, बीजेपी के लिए बड़े फ़ायदे कौ सौदा साबित हुआ, क्योंकि दोनों सब्जेक्ट का आपस में बस इतना संबंध था कि दोनों घटनाएं दो सेंट्रल यूनिवर्सिटीज़ में हईं। जेएनयू विवाद का दलित शोषण से कोई लेना देना नहीं था, तो रोहित वेमुला की ख़ुदकुशी का मुद्दा राष्ट्रवाद या अभिव्यक्ति की आज़ादी जैसे मुद्दों से कोसों दूर रहा। इसीलिए जहां, बीएसपी सुप्रीमो मायावती के अगुवाई में दलितों की राजनीति करने वाले रोहित वेमुला की ख़ुदकुशी मामला प्रमुखता से उठाते रहे वहीं, सेक्युलिरज़्म की रोटी पर पल रहे लोग जेएनयू विवाद में कन्हैया कुमार सिंह और खालिद उमर की गिरफ्तारी जैसे मुद्दे उठा रहे थे। दोनों मुद्दों को एकसाथ उठाए जाने से भ्रम की स्थिति बन गई।

संसद की बहस से एक बात और साफ़ हो गई कि देश के ख़िलाफ़ या देश के टुकड़े करने या फिर कश्मीर की तथाकथित आज़ादी का राग अलापने वाले लोग पूरी तरह आउटडेटेड हो चुके हैं। उनका समर्थन इक्का दुक्का लोगों के अलावा कोई नहीं देगा। इस मुल्क के लोग किसी भी कीमत पर संसद पर हमले की साज़िश रचने के लिए देश की सबसे बड़ी अदालत द्वारा दंडित किए गए जैश-ए-मोहम्मद के दुर्दांत आतंकवादी मोहम्मद अफजल गुरू की तीसरी बरसी मनाने और देश विरोधी नारे लगाने वालों का कतई समर्थन नहीं कर सकते। ऐसे तत्वों का साथ केवल टीवी स्क्रीन को काला करने वाले कन्यप़्य़ूज़्ड लोग या राग-सेक्युलिरज़्म अलापने वाले या फिर अपनी अतिवादी बौद्धिकता के कारण डायनासोर के नक्शे क़दम पर चल रहे कम्युनिस्ट ही कर सकते हैं।

ज़ाहिर-सी बात है, जेएनयू की घटना के चलते इस समय देश में अचानक यह एक तरह से 2014 की गर्मियों जैसा माहौल बन गया है, जब देश को लगा कि राग-सेक्युलिरज़्म के नाम पर कांग्रेस देश का बंटाधार कर रही है, तो मुलायम सिंह यादव गिन-गिनकर अपने बेटे-पुत्रवधू, भाइयों-भतीजों और नाती-पोतों को या तो संसद या उत्तर प्रदेश की विधान सभा में भेज रहे हैं। देश की जनता ने साफ़ देखा कि मुलायम जैसे लोग राजनीतिक लाभ के लिए कल्याण सिंह जैसे नेताओं को लगा लेते हैं तो मायावती और नीतीश कुमार जैसे लोग बीजेपी के साथ सरकार बनाने के बावजूद ख़ुद को बेशर्मी से सेक्युलिरज़्म का पैरोकार बताते हैं।

देश ने यह भी देखा कि सेक्युलिरज़्म के नाम ये तमाम दल मुसलमानों को बेवकूफ़ ही नहीं बना रहे हैं, बल्कि उनके अंदर कथित तौर पर अल्पसंख्यक और असुरक्षित होने का भाव जगा रहे हैं। अब तो ख़ुद मुस्लिम समुदायके लोग खुलेआम कहने लगे हैं कि कम्युनिस्ट, कांग्रेस और दूसरे तथाकथि धर्मनिरपेक्ष दलों के कारण ही वे हाशिये पर जा रहे हैं। यह तो सर्वविदित है कि जेएनयू में अफ़ज़ल गुरु की तीसरी बरसी में एक प्रोग्राम हुआ और उसे खालिद उमर नाम के छात्र ने ही शेखी बघारने के लिए आयोजित किया। उससे कन्हैया कुमार सिंह या खालिद उमर ने देश विरोधी नारा लगाया या नहीं यह अदालत देखेगी।

जेएनयू के इनछात्रों का व्यवहार देशद्रोह की कैटेगरी में आता हैं या नहीं, यह भी उपलब्ध फोटोग्राफ और वीडियों के रूप में उपलब्ध सबूतों और दूसरे साक्ष्यों की सत्यता की जांच करने के बाद अदालत तय करेगी। लेकिन एफआईआर दर्जकरने के बाद इनको अदालत में पेश करना तो पुलिस का काम था, लोग उसमें भी बाधा डाल रहे थे। यह बात लोगों के गले नहीं उतरी। ख़ासकर जेएनयू के वाइस चांसलर प्रो. एम जगदीश कुमार ने देशद्रोह का संगीन आरोप और लुकआउट नोटिस वाले आरोपी को गिरफ़्तार करने से दिल्ली पुलिस को रोकना भी रास नहीं आया। पिछले दो हफ़्ते से सोशल नेटवर्किंग पर लोगों के पोस्ट और रेलवे-बस में यात्रा करते लोगों की बहस से यह साफ़ हो गया था।


जो भी हो, इस बार भी साफ़ हो गया है कि संसद के बजट सत्र में बजट पेश करने के अलावा कोई रचनात्मक कार्य नहीं होने वाला। विपक्ष की अकर्मण्यता ने बीजेपी सरकार की 20 महीने के जनविरोधी और कुशासन पर ज़रूर परदा डाल दिया है। क्रूड ऑयल का भाव 25 डॉलर प्रति बैरल से भी नीचे आने से देश के आम लोगों को जो लाभ होना था उससे वंचित करने का बीजेपी और नरेंद्र मोदी का अपराध भी जेएनयू विवाद और रेहित वेमुला की आत्महत्या की मामले के नीचे दब गया।    

संजय दत्‍त की रिहाई पर उठे सवाल, बाबा पर तकदीर मेहरबान है या सिस्‍टम?

हरिगोविंद विश्‍वकर्मा
1993 के मुंबई बम धमाकों से जुड़े मामले में दोषी संजय दत्त आज जेल से रिहा हो गए। पुणे की येरवडा जेल में अधिकारियों ने औपचारिकताएं पूरी करने के बाद उन्हें रिहा कर दिया। जेल में अच्छे व्यवहार के चलते समय से पहले 114 दिन पहले उनकी रिहाई हुई है।
संजय दत्त ने येरवडा जेल में फहरा रहे तिरंगे को सैल्यूट किया, धरती को चूमा और फिर अपना बैग कंधे में डालकर जेल के बाहर आ गए। बाहर पत्नी मान्यता दत्त उनका इंतजार कर रही थीं। यहां से संजय दत्त सीधे पुणे एयरपोर्ट के लिए रवाना हो गए। संजय दत्त सबसे पहले सिद्धिविनायक मंदिर जाएंगे। इसके अलावा अपनी मां नरगिस की कब्र पर भी जाएंगे।
अगर 257 निर्दोष लोगों की जान लेने वाले 1993 के मुंबई बम धमाकों में शामिल रहे लोगों के भाग्य की बात करें तो 123 आरोपियों में अगर याकूब मेमन सबसे बदनसीब रहा तो अभिनेता और नेता पुत्र संजय दत्त सबसे ख़ुशनसीब। तभी तो दो मई 2013 से मई 2014 के बीच पैरोल और फर्लो के तहत 118 दिन जेल से बाहर रहे संजय दत्त पूरी सजा काटे बगैर ही जेल से रिहा हो गए हैं।

संजू बाबा की रिहाई की खबर से उनके पूरे परिवार के साथ साथ बॉलीवुड भी बेहद खुश है। बॉलीवुड अभिनेता मनोज बाजपेयी ने संजय की रिहाई पर खुशी जताई। मनोज ने कहा कि मैं संजू (संजय) को व्यक्तिगत रूप से जानता हूं और खुश हूं कि वह एक-दो दिन में आखिरकार अपने परिवार और दोस्तों के पास वापस आ रहे हैं। हम उस दिन का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं और हमेशा उनकी सुरक्षा के लिए प्रार्थना करते हैं।
लेकिन संजय दत्‍त की इस रिहाई पर कई तरह के सवालों का घेरा भी मंडरा रहा है। उन सवालों में सबसे महत्‍वपूर्ण सवाल खुद संजय दत्‍त की इस पूरे बम कांड में भूमिका, उसके बाद उनकी देरी से गिरफ्तारी और फिर बाद में जेल के बाद फिर जेल वह बीच-बीच में 30 दिन 60 दिन जैसे अविध में बाहर आना। जाहिर है यह सारे सवाल उनकी किस्‍मत और हमारे सिस्‍टम से आकर जुड़ते हैं ।
आइए जानने की कोशिश करते हैं कि कैस संजय दत्‍त की किस्‍मत ने इस पूरे मामले में उनका साथ दिया और कैसे सिस्‍टम उनके लिए मेहरबान बनारहा।
दरअसल, यूं तो मुंबई सीरियल बमकांड में किसी न किसी किरदार में शामिल रहे सभी आरोपी निर्दोषों की हत्या के लिए ज़िम्मेदार रहे और सभी याकूब मेमन जैसी कठोर सज़ा के हक़दार थे, लेकिन याकूब मेमन सबसे ज़्यादा बदनसीब रहा, उसके साथ तकदीर थी ही नहीं। जीने की प्रबल इच्छा रखने वाला याकूब जहां मुकद्दर के साथ के लिए तरसता रहा, वहीं शेष सभी आरोपियों को भाग्य का कुछ न कुछ साथ ज़रूर मिला।
फ़ांसी की सज़ा पाए 12 लोग अच्छी किस्मत के चलते मौत के मुंह में जाने से बच गए। हालांकि पुणे की येरवड़ा जेल से घर पहुंचे संजय दत्त सबसे ज़्यादा खुशनसीब रहे। संजय बमकांड में शामिल होने के आरोप में गिरफ़्तारी बावजूद भाग्य की बदौलत जांच ऐजेंसियों का कथित “फेवर” पाने में सफल रहे और अंततः आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप से मुक्त हो गए। इसीलिए उन्हें सबसे कम सज़ा मिली। यानी मुन्ना भाई यक़ीनन मुकद्दर का सिकंदर निकला।
संजय पर तकदीर मेहरबानी की फ़ेहरिस्त बड़ी लंबी है। उन पर पहली बार मुकद्दर तब मेहरबान हुआ जब 3 अप्रैल 1993 को पुलिस इंटरोगेशन के दौरान इब्राहिम मुस्तफ़ा चौहान उर्फ बाबा चौहान ने बताया कि इस साज़िश में एक बहुत बड़ी मछली शामिल है और उसने संजय दत्त का नाम लिया।“शांतिदूत” सुनील दत्त का बेटा साज़िश में शामिल है, यह सुनकर सबके होश उड़ गए और विशेष जांच टीम के मुखिया राकेश मारिया (फ़िलहाल मुंबई के पुलिस कमिश्नर) भी हतप्रभ रह गए।
चूंकि संजय पर मुकद्दर मेहरबान था, इसलिए, बाबा चौहान की जानकारी के बावजूद मारिया को सुनील दत्त के घर पर रेड करने की इजाज़त मुंबई पुलिस आयुक्त अमरजीत सिंह सामरा ने नहीं दी। वरना एके-56 राइफल उसी समय रिकवर हो जाती। हालांकि, खुलासा हुआ कि उसकी राजनीतिक वजह थी। राज्य में शरद पवार के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार थी और सुनील दत्त की पहुंच बहुत ऊपर तक थी।
बहरहाल, 19 अप्रैल 1993 की रात मॉरीशस से लौटते ही संजय एयरपोर्ट पर अरेस्ट हो गए। लेकिन भाग्य उनके साथ था, इसलिए पुलिस ने उनसे आरोपी नहीं, बल्कि नेता-पुत्र तरह पूछताछ की। संजय ने तत्कालीन क्राइम ब्रांच हेड महेश नारायण सिंह और राकेश मारिया के सामने कबूल कर लिया कि मास्टरमाइंड दाऊद इब्राहिम का भाई अनीस उनका दोस्त है। दोनों की अक्‍सर फोन पर बातचीत होती है। अनीस ने 16 जनवरी 1993 को 3 एके-56 राइफ़ल्स, 9 मैगज़िन्स, 450 राउंड्स और 20 हैंडग्रेनेड्स का कन्साइनमेंट अबू सालेम (जो केवल राइफल मामले के चलते बमकांड का आरोपी बनाया गया है) फ़िल्मकार समीर हिंगोरा और बाबा चौहान के साथ भेजी। तीन दिन बाद यानी 18 जनवरी की शाम सालेम हनीफ़ कड़ावाला और मंज़ूर अहमद के साथ संजय के यहां फिर आया और 2 राइफ़ल, कुछ हैंडग्रेनेड और गोलियां लेकर गया। यानी संजय ने अनीस से ग़ैरक़ानूनी तौर पर घातक राइफ़ल ली।

बमकांड में दायर आरोप पत्र के मुताबिक, दाऊद ने 300 सौ चांदी की सिल्लियां, 120 एके 56 राइफ़ल्स और कई सौ ग्रेनेड्स, मैगज़िन्स, गोलियां और कई क्विंटल विस्फोटक आरडीएक्स 9 जनवरी और 9 फ़रवरी 1993 के बीच कई खेप में रायगड़ के दिग्घी जेट्टी और शेखाड़ी के रास्ते मुंबई भेजी। यह काम इब्राहिम मुश्ताक़ मेमन उर्फ टाइगर मेमन और मोहम्मद डोसा ने किए। हथियारों और विस्फोटकों को बम बनाने के लिए मुंबई और भिवंडी भेजा गया और बाद में उसी से 12 मार्च को धमाके को अंजाम दिया गया। हथियारों और आरडीएक्स से भरा एक ट्रक रायगड़ के जंगल के रास्ते नासिक होता हुआ गुजरात के लिए भी रवाना किया गया। कस्टम टीम ने ट्रक ट्रैप किया भी, लेकिन 8 लाख रुपये रिश्वत लेकर उसे जाने की इजाज़त दे दी।
यकीनन, कस्टम टीम के सभी लोगों को टाडा के तहत सज़ा हुई। ट्रक का सामान गुजरात के अंकलेश्वर (भरुच) में बिज़नेसमैन हाज़ी रफीक़ कपाडिया के गोडाउन में छिपाया गया। यहां टीम में सालेम शामिल हुआ। हथियार तयशुदा ठिकानों और लोगों तक पहुंचाने की ज़िम्मेदारी सालेम की थी। 9 एके-56 राइफ़ल, सौ से ज़्यादा मैगज़िन और गोलियों के कई बॉक्स लेकर सालेम सड़क के रास्ते मुंबई आया। उसने अनीस के कहने पर कन्साइनमेंट में से एक राइफ़ल संजय को दी।
यानी संजय ने ब्लास्ट के बाद जिस राइफल को नष्ट करने के लिए यूसुफ़ नलवाला को मॉरीशस से फोन किया, वह राइफ़ल दिग्घी जेटी पर ही उतारी गई थी। ये बातें यहां इसलिए विस्तार से बताई गई है, ताकि साफ़ हो जाए कि संजय से ग़लती नहीं हुई, बल्कि वह बमकांड की साज़िश का हिस्सा थे। फिर भी जांच एजेंसियां उनके साथ उस तरह पेश नहीं आईं जिस तरह बाक़ी आरोपियों के साथ। यह भाग्य का ही कमाल था।
बहरहाल, एक दर्जन से ज़्यादा लोगों को फांसी की सज़ा सुनाने वाली टाडा कोर्ट ने भी संजय का क़बूलनामा स्वीकार कर लिया कि वाक़ई संजय असुरक्षित महसूस कर रहे थे, इसलिए विनाशकारी ग़ैरक़ानूनी हथियार मंगवाए। संजय के मुताबिक, मुंबई दंगों के समय उन्हें धमकियां मिल रही थी, इसलिए उन्होंने अनीस से एके-56 मांगी। संजय के क़बूलनामे को स्वीकार करना और मान लेना कि उन्हें वाक़ई जानमाल का ख़तरा था, संजय पर भाग्य की कृपा से ही हुआ। मुकद्दर की ऐसी मेहरबानी राइफल से जुड़े दूसरे आरोपियों को नहीं मिली।
दरअसल, गिरफ्तारी के बाद सुप्रीम कोर्ट तक हाथ-पैर मारने के बावजूद साल भर तक संजय को बेल नहीं मिली। उनके बढ़ते जेल प्रवास से पिता सुनील दत्त बहुत विचलित हो गए। हर नेता का चक्कर लगाते हुए वह धुर कांग्रेस विरोधी शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे की शरण में गए। मज़ेदार बात यह रही कि इस बार याकूब की फांसी का विरोध कर रहे सेक्यूलर जमात कुछ लोगों ने उसी दौरान भी मीडिया के ज़रिए शोर मचाना शुरू किया कि टाडा का दुरुपयोग हो रहा है। यह भी कहा गया है कि टाडा के चलते बड़ी तादाद में ऐसे लोग जेलों में “सड़” रहे हैं, जिनका आतंकवाद से कुछ लेना-देना नहीं है।
ऐसे लोगों के केसों पर विचार करने के लिए तत्कालीन केंद्र सरकार ने आईएएस और आईपीएस की एक क़्वासी-ज्यूडिशियल कमेटी यानी अर्ध-न्यायिक समिति का गठन किया। भाग्य ने यहां भी संजय के साथ खड़ा हो गया और क़्वासी-ज्यूडिशियल कमेटी ने भी माना कि संजय दत्त ही सबसे ज़्यादा “टाडा पीड़ित”आरोपी हैं। लिहाज़ा कमेटी ने उनके बेल की सिफ़ारिश कर दी और संजय केवल 18 महीने में ही जेल से बाहर आ गए। जबकि उसी केस में पकड़े गए बाबा, मंज़ूर, नलवाला, हिंगोरा और कड़ावाला को ज़मानत के लिए पांच साल या उससे ज़्यादा वक़्त इंतज़ार करना पड़ा।

इतना ही नहीं जिस ज़ैबुन्निसा क़ादरी (तब उसकी उम्र 64 साल थी) के घर में 2 एके-56 और हथियार 2 दिन रखे गए। उसे भी लंबे समय तक जेल में रहना पड़ा, जबकि उसके मुताबिक़,कन्साइनमेंट का बॉक्स खोलना तो दूर उसने देखा तक नहीं था। दूसरी ओर संजय ने बॉक्स को खोला ही नहीं था, बल्कि हथियार देखने के बाद अनीस को फोन करके बताया भी कि “भाई सामान मिल गया है” और नाम सामने आने पर मित्र नलवाला को फोन पर अपने बेडरूम में रखी एके-56 राइफ़ल और बाक़ी हथियार फ़ौरन नष्ट करने का निर्देश भी दिया था।
यह संजय दत्त के भाग्य का ही कमाल था कि देश की सर्वोत्तम जांच एजेंसी सीबीआई ने भी कई ऐसे फ़ैसले लिए जिसका सीधा लाभ केवल संजय को ही मिला। मसलन, संजय-अनीस बातचीत के कॉल्स डिटेल्स आरोप-पत्र से ही अलग कर दिए। जो इस्टेब्लिश्ड करता था संजय की अनीस से दंगे और बम धमाके के बीच बहुत ज़्यादा बातचीत हुई थी। इस साक्ष्य को जुटाने के लिए मुंबई पुलिस ने एड़ी-चोटी को ज़ोर लगाया था और दुबई तक गई थी, लेकिन सीबीआई ने उसे डस्टबिन में डाल दिया। यह दस्तावेज़ साबित कर रहा था कि संजय का अनीस से घनिष्ठ संबंध है और जो राइफ़ल उनको दी गई थी, वह रायगड़ समुद्र तट के रास्ते भेजे कन्साइन्मेंट के साथ लाई गई थी। यानी संजय आतंकवादी साज़िश का सीधे साझीदार थे, क्योंकि अनीस उनके “टच” में था। इससे केस बहुत स्ट्रॉंग हो रहा था। यह भाग्य का ही कमाल था कि सीबीआई फिर संजय पर मेहरबान हुई और सालेम का ट्रायल बमकांड के मुक़दमे से ही अलग कर दिया।
दरअसल, संजय और दाऊद-अनीस के बीच सालेम अहम कड़ी था, जो पुष्ट कर रहा था कि कम से कम संजय एके-56 राइफल लाने की साज़िश में सीधे तौर पर शामिल थे। यहां भाग्य का साथ होना संजय को कड़ी सज़ा से बचा लिया,क्योंकि सीबीआई अगर सख़्त होती तो संजय को कम से कम 10 साल की सज़ा मिल सकती थी। यह भाग्य का साथ ही था कि सीबीआई ने 2002 में संजय की छोटा शकील बातचीत के सार्वजनिक होने का भी संज्ञान नहीं लिया। हालांकि इसके बाद भी उसे संजय की बेल रद करने के लिए कोर्ट अप्रोच करना चाहिए था। केस के ट्रायल के दौरान भी संजय को मुकद्दर का साथ मिलता रहा। एके-56 राइफ़ल से जुड़े सभी आरोपियों को टाडा के तहत सज़ा मिली, लेकिन संजय को केवल आर्म्स ऐक्ट के तहत 6 साल की सज़ा हुई।
यह तकदीर की खेल था कि सीबीआई ने टाडा कोर्ट के फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती ही नहीं दी। किसी ने भी सीबीआई से पूछा भी नहीं कि भाई एक ही मामले में दो तरह के फ़ैसले कैसे आए गए और अगर आ गए हैं तो कम सज़ा पाने वाले आरोपी के ख़िलाफ़ जांच एजेंसी ने अपील क्यों नहीं की? उलटे सुप्रीम कोर्ट ने संजय की सज़ा एक साल और कम कर पांच साल कर दिया। निश्चित तौर पर यह भी भाग्य का ही खेल ही कहा जाएगा। जेल जाने के बाद भी संजय मुकद्दर का सिकंदर बने रहे। उनके समर्थन में जस्टिस मार्कंडेय काटजू जैसे सर्वमान्य लोग आ गए और “मानवीय” आधार पर उन्हें माफ़ीनामा देने की पैरवी करने लगे, उनकी अपील महाराष्ट्र के राज्यपाल के पास अब भी विचाराधीन है।
संजय के चाहने वालों का मानना है कि उनसे“ग़लती” हो गई। यानी संजय ने अपराध जान-बूझकर नहीं किया। अपराध उनसे अपने आप अनजाने में हो गया। मज़ेदार बात यह है कि जब संजय ने एके-56 मंगवाई थी, तब वह 33 साल के थे यानी बालिग हुए 15 साल बीत चुके थे। वह बांद्रा के जिस पॉश पाली हिल इलाक़े में रहते हैं, वहां कभी दंगा हुआ ही नहीं। दंगे पॉश इलाकों में नहीं, बल्कि झुग्गीबाहुल्य क्षेत्रों में हुए थे। लिहाज़ा, संजय का ख़तरे की दुहाई देना सरासर बेमानी थी। उस समय संजय के परिवार को कोई ख़तरा नहीं था।

दंगा, दरअसल, मुस्लिम बाहुल्य इलाक़ा से शुरू हुआ और मारकाट में सबसे जानमाल का नुक़सान भी मुसलमानों को ही उठाना पड़ा। छह दिसंबर 1992 को अयोध्या की बाबरी मस्जिद ढहाये जाने के बाद पूरे देश की तरह मुंबई में भी दंगा भड़का था। देश की आर्थिक राजधानी में 6 से 10 दिसंबर 1992 और 6 से 15 जनवरी 1993 के दौरान दो चरण में ख़ून की होली खेली गई, जिसमें, दंगों की जांच करने वाले श्रीकृष्णा आयोग के मुताबिक़, कुल 850 लोग (575 मुसलमान और 275 हिंदू) मारे गए। तात्पर्य यह है कि संजय ने किसी तरह का ख़तरा न होने के बावजूद केवल शेखी बघारने के लिए एके-56 राइफ़ल जैसा ख़तरनाक़ हथियार मंगवाए थे और तकदीर का धनी होने के नाते उन्हें केवल पांच साल की सज़ा हुई।
1993 बमकांड से पहले तक डॉन दाऊद केवल ख़तरनाक अपराधी था, सो बॉलीवुड के सितारे चाहे-अनचाहे उसके बुलाने पर अकसर दुबई पहुंच जाते थे। इसमें उन्हें अच्छा नज़राना भी मिलता था। सिल्वर स्क्रीन के लोगों के लिए दुबई तो मुंबई के बाद दूसरा ठिकाना था। 90 के दशक में दुबई महफ़ूज़ ऐशगाह था। तब कोई ऐसा अभिनेता या अभिनेत्री नहीं होगा, जिसने दाऊद के सामने ठुमके न लगाए हों। संजय भी दाऊद के ग्लैमर से नहीं बच सके।
मुंबई पुलिस के रिकॉर्ड के मुताबिक एक बार अनीस के संपर्क में आने के बाद दोनों की अच्छी ट्यूनिंग हो गई। वे अक्‍सर बात करने लगे। संजय पर्सनल इशूज़ भी शेयर करने लगे। संजय समेत बॉलीवुड के लोगों को दाऊद से रिश्ता रखने के ख़तरे का अहसास मुंबई की तबाही के बाद हुआ। अगर संजय बमकांड के बाद अनीस से संपर्क ख़त्म कर लेते तो माना जा सकता कि उनसे ग़लती हुई और भूल-सुधार करना चाहते हैं। लेकिन आरोपी होते हुए भी 2002 में संजय (तब उम्र 42 साल) ने शकील से फिर बात की और गोविंदा को सबक सिखाने का आग्रह किया। जिसे मुंबई पुलिस ने रिकॉर्ड कर लिया। यानी संजय ने अपनी पिछली ग़लतियों से कुछ भी नहीं सीखा। इसके बावजूद भाग्य ने उसका साथ दिया।
वैसे 257 हत्या के लिए सीधे तौर पर ज़िम्मेदार बम प्लांटर शोएब घंसार, असगर मुक़ादम, शाहनवाज़ कुरैशी,अब्दुल गनी तुर्क, परवेज़ शेख़, मोहम्मद इक़बाल, यूसुफ़ शेख, नसीम बरमारे, मोहम्मद फ़ारूक पावले, मुश्ताक तरानी और इम्तियाज घवाटे को भी मौत की सज़ा मिली थी, लेकिन तकदीर उनके साथ थी। कहा जा सकता है कि बमकांड में शामिल सभी अभियुक्त भाग्यशाली रहे कि उन्हें ग़ुनाह के मुक़ाबले कम सज़ा मिली।

वैसे,मुकद्दर ने संजय का साथ छोड़ा ही नहीं तभी तो संजय को जेल गए दो साल भी नहीं हुए हैं, लेकिन उस पर शुरू से फर्लो और पैरोल की बारिश हो रही है। हालांकि पूर्व आईपीएस एडवोकेट वाईपी सिंह संजय दत्त को दिए गए पैरोल को सही नहीं मानते हैं। सिंह के मुताबिक पैरोल रेयरेस्ट ऑफ़ रेयर कैटेगरी के क़ैदियों को मिलता है। हालांकि वह भी मानते हैं कि संजय दत्त वाक़ई भाग्यशाली हैं, जो उसे हर जगह फेवर मिल रहा है। वैसे अभी संजय को भाग्य की ज़रूरत है, क्योंकि उसकी क्षमादान याचिका राज्यपाल के पास विचारीधीन हैं। ऐसे में भविष्य में तकदीर उन पर दोबारा मेहरबान हो जाए और वह सज़ा ख़त्म करने से पहले छूट जाए तो हैरानी नहीं होनी चाहिए।

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2016

जेएनयू के वाइस चांसलर को जवाबदेह मानकर क्यों न उन्हें गिरफ़्तार किया जाए?

हरिगोविंद विश्वकर्मा
क्या वाक़ई जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय भारत में ही है? अगर हां, तो भारतीय क़ानून का पालन जेएनयू कैंपस में क्यों नहीं हो रहा है? आख़िर जेएनयू के वाइस चांसलर प्रो. ममिडाला जगदीश कुमार कौन होते हैं, दिल्ली पुलिस को उस शख़्स को गिरफ़्तार करने से रोकने वाले, जिस पर देशद्रोह का संगीन आरोप है और जिसके ख़िलाफ़ पुलिस ने लुकआउट नोटिस जारी कर रखा है। क्या भारत सरकार को जेएनयू कैंपस में पुलिस के प्रवेश को सुनिश्चित करने के लिए जेएनयू से प्रत्यर्पण संधि यानी एक्स्ट्रडिशन ट्रीटी साइन करनी पड़ेगी?

क्या यह किसी मज़ाक़ से कम है कि दिल्ली पुलिस की टीम दुर्दांत आतंकवादी अफ़ज़ल गुरु की बरसी मनाने वाला उमर ख़ालिद का जेएनयू के गेट पर इंतज़ार कर रही है और खालिद अपने साथियों के साथ भारतीय क़ानून पर हंस रहा है। निश्चित तौर पर इस मुद्दे पर दुनिया में भारत की खिल्ली उड़ रही है कि एक यह देश देशद्रोह के आरोपियों को राजधानी में ही नहीं पकड़ पा रही है। यह देश की इमैज के लिए बहुत ख़तरनाक है। यह बहुत ही ग़लत परंपरा की शुरुआत भी हो रही है। पुलिस की काम में बाधा डालने के लिए जेएनयू के वाइस चांसलर को फौरन बर्खास्त करके उन्हें भी गिरफ्तार किया जाना चाहिए। यही एकमात्र विकल्प है।

बताइए, अफ़ज़ल गुरु को शहीद बताने वाले और भारत मुर्दाबाद के नारे लगाने वाले प्रोग्राम का आयोजन करने वाला उमर ख़ालिद जेएनयू कैंपस में बैठा है और वाइस चांसलर पुलिस टीम को कैंपस के अंदर जाने की इजाज़त नहीं दे रहे हैं। ऐसा लग रहा है जेएनयू भारत के अंदर कोई स्वतंत्र देश हैं, जहां देशद्रोह के आरोपी को पकड़ने के लिए पुलिस को वाइस चांसलर का मुंह देखना पड़ रहा है। यह तो कायरता की पराकाष्ठा है।

यहां यह सवाल नहीं है कि कन्हैया कुमार सिंह, खालिद उमर और उनके साथी देशद्रोह के दोषी हैं या नहीं, क्योंकि उन पर देशद्रोह के आरोपों की सत्यता की जांच करना अदालत का काम है और अदालत यह काम कार्यक्रम के फोटोग्राफ और वीडियों के रूप में उपलब्ध सबूतों और दूसरे साक्ष्यों की सत्यता की जांच करने के बाद तय करेगी। यहां सवाल यह है कि कन्हैया कुमार सिंह, खालिद उमर और उनके साथियों पर देशद्रोह का मामला पहले ही दर्ज किया जा चुका है और उसके लिए इन सबको गिरफ़्तार करके उनकी कोर्ट के सामने पेश होनी चाहिए।

इस गिरफ़्तारी में अड़ंगा डालनेवाले वाइस चांसलर प्रो. एम जगदीश कुमार जेएनयू के प्रशासनिक मुखिया हैं, इसलिए कैंपस में होने वाली हर गतिविधि के लिए वह भी सीधे तौर पर ज़िम्मेदार है। अगर वह अच्छे काम के लिए ज़िम्मेदार हैं तो, देशद्रोह जैसे बुरे और राष्ट्रविरोधी काम के लिए भी वही ज़िम्मेदार हैं। अगर लोग देश के हर घटना के लिए देश के प्रधानमंत्री को जवाबदेह मानते हैं और प्रदेश की घटनाओं के लिए संबंधित मुख्यमंत्री को जवाबदेह मानते हैं तो किसी विश्वविद्यालय की हर घटना के लिए उसके वाइसचांलर को जवाबदेह मानना चाहिए। इस आधार पर जेएनयू की हर घटना के लिए वहां के वाइस चांसलर को क्यों नहीं जवाबदेह माना जाना चाहिए।

जेएनयू कैंपस के अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर अगर राष्ट्रविरोधी तत्व सिर उठा रहे हैं, तो कहीं न कहीं वाइस चांसलर ही जिम्मेदार है। लिहाज़ा, नौ फरवरी की घटना के लिए अगर कन्हैया कुमार सिंह, उमर खालिद और उनके साथी जितने ज़िम्मेदार हैं, उतने ही ज़िम्मेदार जेएनयूके वाइसचांसलर हैं। लिहाज़ा, अगर इस मसले पर अगर कन्हैया कुमार सिंह, उमर खालिद और उनके साथियोंपर मामला दर्ज किया गया है तो वाइस चांसलर के ख़िलाफ़ भी मुक़दमा दर्ज किया जाना चाहिए।

एक देश जो संयुक्त राष्ट्रसंघ की सबसे शक्तिशाली बॉडी सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता की दावेदारी पेश कर रहा है, वह अपने राजधानी में एक विश्वविद्यालय की हरकतों से नहीं निपट पा रहा है। सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता की दावेदारी का मतलब भारत दुनिया की समस्याओं को हल करने में अपना योगदान देना चाहता है। जेएनयू की घटना देश के इस दावे को निश्चित तौर पर खोखला बनाती है।

यह तो वहीं बात हुई कि जैएनयू कैंपस के अंदर शरण लिए छात्र देश के क़ानून को ठेंगा दिखाते रहे और देश वाइस चांसलर के परमिशन का इंतज़ार करता रहे। निश्चित तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके बैबिनेट के इस मामले में कठोर फैसला करना चाहिए वरना देश के लोगों में यह भावना बढ़ जाएगी कि भारत एक सॉफ़्ट नेशन हीं नहीं कमज़ोर देश भी है। अगर केंद्र सरकार मौन रहती है तो दिल्ली हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट को देश के क़ानून का पालन करवाने के लिए आगे आना चाहिए।


रविवार, 21 फ़रवरी 2016

जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार सिंह को हीरो बनाना कितना उचित?

हरिगोविंद विश्वकर्मा
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार सिंह की कथित तौर पर देशद्रोह की आरोप में गिरफ़्तारी के समर्थन और विरोध में देश भर में प्रदर्शन हो रहे हैं। यूनिवर्सिटी में पिछले 9 फरवरी को संसद पर हमले की साज़िश में फ़ांसी पर लटकाए गए जैश-ए-मोहम्मद के दुर्दांत आतंकवादी मोहम्मद अफजल गुरू की तीसरी बरसी मनाने और देश विरोधी नारे लगाने के मुद्दे पर पूरा देश दो खेमे में बंट गया है। क़रीब 50 साल पुराने जेएनयू को लेकर पूरा देश तो नहीं, बौद्धिक खेमा ज़रूर लेफ्ट-राइट कर रहा है। लेफ़्ट-विंग के समर्थक बीजेपी और संघ परिवार को फासिस्ट करार देते हुए लामबंद हो रहे हैं। उसी तरह राइट-विंग के पैरोकार कम्युनिस्ट और सेक्यूलर विचारधारा के लोगों को देशद्रोही करार देते हुए उनके ख़िलाफ़ बयानबाज़ी कर रहे हैं। लेफ़्ट-राइट के इस कांव-कांव में असली मुद्दा गौण हो गया।

कन्हैया कुमार सिंह का काम देशद्रोह की कैटेगरी में आता हैं या नहीं, यह फोटोग्राफ और वीडियों के रूप में उपलब्ध सबूतों और दूसरे साक्ष्यों की सत्यता की जांच करने के बाद अदालत तय करेगी न कि मीडिया या नुक्कड़ चर्चाओं में शामिल लोग। इसके बावजूद कुछ देर के लिए मान लिया जाए कि कन्हैया सिंह निर्दोष हैं। यह भी मान लिया जाए, जैसा कि उनके पैरोकारों का आरोप है कि दिल्ली पुलिस ने उन पर नरेंद्र मोदी सरकार के इशारे पर देशद्रोह का मामला दर्आज किया है। परंतु कन्हैया सिंह के लिए आंदोलन और धरना-प्रदर्शन कर रहे लोग यह बताएं कि उनका नेता 9 फरवरी की शाम उस कार्यक्रम में क्या कर रहा था, जो अफ़ज़ल गुरु की बरसी के दिन ही आयोजित की गई थी। कन्हैया सिंह कोई नादान या अपरिपक्व व्यक्ति नहीं, वह कॉमरेड हैं और जेएनयू से पीएचडी कर रहे हैं। उन्हें यह जानकारी थी कि उनका दोस्त और डेमोक्रेटिक स्टूडेंट यूनियन से जुड़ा उमर खालिद कई महीने से अफ़ज़ल बरसी मनाने में जुटा है। उसने 7 फरवरी को कश्मीर से 10 युवकों को दिल्ली बुलाया और सभी लोग जेएनयू कैंपस में ही ठहरे। 9 फरवरी की शाम 20-25 लोगों ने बेहद नियोजित ढंग अफ़ज़ल की बरसी मनाई। कन्हैया सिंह ने साबरमती ढाबे के पास कार्यक्रम में खालिद के साथ नारेबाजी कर रहे लोगों की अगुवाई की थी।

अफ़ज़ल को शहीद घोषित करने वाले किसी कार्यक्रम में शामिल होने से पहले हर समझदार व्यक्ति यह सोचेगा कि अफ़ज़ल को बलात् फ़ांसी पर नहीं लटका दिया गया। जांच एजेंसियों ने अफ़ज़ल के अलावा दिल्ली यूनिवर्सिटी के तत्कालीन प्रोफ़ेसर एसएआर गिलानी और दूसरे लोगों को देशद्रोह के आरोप में गिरफ़्तार किया था। अफ़ज़ल ने एक टीवी इंटरव्यू में स्वीकार किया था कि वह 2001 में संसद पर हमले का सूत्राधार था और जैश-ए-मोहम्मद के इंडिया चीफ़ गाज़ी बाबा के बराबर संपर्क में था। उसने यह भी माना था कि हमला करने वाले पांचों पाकिस्तानी आतंकियों को कश्मीर दिल्ली लेकर वही आया था। अफ़ज़ल ने अपने कार्य को जस्टीफाई करने के लिए आर्थिक तंगी का हवाला देते हुए कहा था कि पैसे के लिए वजह इस साज़िश में शामिल हुआ था।

बहरहाल, सुनवाई के बाद निचली अदालत ने अफ़ज़ल और गिलानी को फ़ांसी की सज़ा सुनाई थी। दिल्ली हाईकोर्ट ने अफ़ज़ल की सज़ा बरकरार रखी। इसके बाद भी अफ़ज़ल को बचाव के कई और अवसर दिए गए, लेकिन हर बार वह दोषी पाया गया। अंततः उसे 9 फरवरी 2013 को तिहाड़ जेल में फ़ांसी दी गई। उधर दिल्ली हाईकोर्ट ने गिलानी के ख़िलाफ़ जुटाए गए सबूत को पर्याप्त नहीं माना और उसे रिहा कर दिया। 

बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को कायम रखा और गिलानी को रिहा कर दिया, लेकिन देश की सबसे बड़ी अदालत ने संसद पर हमले में गिलानी के रोल को संदेहजनक मानते हुए कहा था कि ऐसा लगता है गिलानी संसद पर हमले का समर्थन कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि गिलानी ने अपने बचाव के लिए अपने ख़िलाफ़ लाए गए सबूतों की ग़लत व्याख्या की थी। अब गिलानी का प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया में अफ़ज़ल और मकबूल बट के लिए प्रोग्राम करना सुप्रीम कोर्ट के उस संदेह को पुख़्ता किया है।

अंग्रेज़ों द्वारा 1870 में ताजी-रात-ए-हिंद यानी इंडियन पैनल कोड में शामिल किए गए क़ानून 124ए के मुताबिक़, इस कैटेगरी के आतंकवादी की बरसी पर कार्यक्रम आयोजित करना और उसमें शिरकत करना देशद्रोह की कैटेगरी में आता है। यह नारेबाज़ी, व्यवस्था में सुधार की कैटेगरी में नहीं आता, क्योंकि नारेबाज़ी करने वाले लोग अफ़जल को शहीद बताते हुए देश के विरुद्ध नारे लगा रहे थे। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने 20 जनवरी 1962 के केदारनाथ सिंह बनाम स्टेट ऑफ बिहार मुक़दमे में साफ़ किया था कि सरकार के विरुद्ध कठोर शब्दों का प्रयोग अगर इस दृष्टि से किया गया है कि व्यवस्था या सिस्टम में सुधार हो तो वह दंडनीय अपराध नहीं होगा।

प्राइमा फेसाई साफ़ लग रहा है कि जेएनयू, जिसे सारा देश शिक्षा के विशेष मंदिर के रूप में देखता आया है, ऐसे नकारा और असामाजिक तत्वों का अड्डा बन गया है, जो देश की एकता अखंडता का भी सम्मान नहीं करते हैं। ऐसे में इस मामले में कन्हैया सिंह और खालिद उमर समेत हर दोषी के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई होनी ही चाहिए। कन्हैया सिंह ही नहीं, बल्कि खालिद की जिस-जिस ने मदद की उन सबके ख़िलाफ़ आएआईआर दर्ज किया जाना चाहिए। बेशक भारत एक डेमोक्रिटिक नेशन हैं। बेशक यह सभ्य देश अपने हर नागरिक को कुछ बुनियादी अधिकार देता है। इसका यह मतलब कतई नहीं निकाला जाना चाहिए कि लोगों को देश के विरुद्ध काम करने का लाइसेंस मिल गया है। कोई भी नागरिक अगर देश हित के ख़िलाफ़ काम करने लगे तो उससे सख़्ती से निपटना समय की मांग है।

जेएनयू में वामपंथी संगठनों की शह पर कश्मीरी छात्र, ख़ासकर अलगाववादी बेहद ऐक्टिव रहते हैं. इससे पहले भी जेएनयू में ऐसी राष्ट्रविरोधी हरकतें होती रही हैं। अफजल को फांसी देने के बाद भी यहां बवाल हुआ था। बेशक जेएनयू ने देश को बड़े-बड़े बुद्धिजीवी दिए हैं। लेकिन देश विरोधी गतिविधियां के यहां पनपने से जेएनयू की छवि ख़राब हुई है। कांग्रेस की कनफ़्यूज़िग पॉलिसी ने पहले ही कश्मीर समस्या पैदा कर दी है। अब अलगाववादी तत्वों से बहुत सख़्ती से निपटने का समय आ गया है।

रविवार, 7 फ़रवरी 2016

आउटडेटेड पुरुषवादी परंपराओं को ध्वस्त करने का वक़्त

हरिगोविंद विश्वकर्मा
इस साल गणतंत्र दिवस के दिन अहमदनगर जिले में शनि शिंगणापुर मंदिर के चबूतरे तक जाने की हिंदू महिलाओं की कोशिश और महालक्ष्मी (मुंबई) के हाजीअली दरगाह में मुस्लिम महिलाओं को प्रवेश देने की मांग, दरअसल, सदियों से चली आ रही आउटडेटेड पुरुषवादी परंपराओं को गिराने की शुरुआत भर है। लकीर के फकीर पुरुष प्रधान समाज के पैरोकार अगर होश में नहीं आए तो वह दिन दूर नहीं, जब भूमाता रण रागिनी ब्रिगेड की अध्यक्ष तृप्ति देसाई और भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की सह संस्थापक नूरजहां साफिया नियाज़ ने नेतृत्व में हर भारतीय महिला पुरुषवादी परंपरा से लड़ने के लिए तैयार हो जाएगी। लिहाज़ा, समय के साथ सोच और व्यवहार में बदलाव वक़्त का तकाजा है, जो भी ऐसा नहीं करेगा, वह निश्तिच रूप से आउटडेट घोषित कर दिया जाएगा।

साढ़े चार सौ साल से भी अधिक पुराने शनि शिंगणापुर मंदिर के चबूतरे पर महिलाओं का जाना और उनका सरसों का तेल चढ़ाना मना है। पता नहीं किसने इस बेतुकी और पक्षपातपूर्ण परंपरा का आरंभ किया है। इसी तरह छह सदी से ज़्यादा पुराने हाजीअली दरगाह में महिलाओं के प्रवेश पर मनाही है। जबकि किसी भी धार्मिक पुस्तक में कही नहीं लिखा है कि महिलाओं के साथ लैंगिक आधार पर भेदभाव किया जाए। ज़ाहिर सी बात है, इस तरह की दकियानूसी परंपराएं पुरुष-प्रधान समाज में हर जगह हैं। पहले तो महिलाओं के घर से बाहर निकलने पर ही अघोषित पाबंदी थी, लेकिन वक्त के साथ उसमें बदलाव आया और महिलाओं सीमित संख्या में ही सही हर जगह दिखती हैं।

महिलाओं के साथ लैंगिक आधार पर किसी तरह का भेदभाव करना और उन्हें किसी भी धर्मस्थल पर जाने से रोकना दरअसल सामाजिक और मानवीय दोनों तरह का अपराध है। यह भारतीय संविधान में महिलाओं को मिले अधिकार का भी गंभीर हनन है। जो लोग ऐसा कर रहे हैं। चाहे वे शनि शिंगणपुर के शनि मंदिर के पुजारी हों या सबरीमाला मंदिर के पुजारी या फिर मस्जिदों के मौलवी सबके सब मानवता के खिलाफ अपराध के दोषी हैं और इन सबके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की जानी चाहिए और पूरे देश में हर धार्मिक स्थल पर जाने की महिलाओं को आज़ादी दी जानी चाहिए। शनि शिंगणापुर के मुद्दे पर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस को फ़ैसला लेने के लिए अधिकृत किया गया है।

यहां तक कि मासिक धर्म (रजोधर्म) या पीरियड के समय भी किसी महिला को किसी धार्मिक अनुष्ठान से दूर नहीं रखना चाहिए, क्योंकि पीरियड हर महीने गर्भाशय की सफाई का एक नैसर्गिक प्रक्रिया है। उसके बाद स्त्री गर्भधारण (अगर चाहे तो) के लिए शारीरिक तौर पर तैयार होती है। इसे उसी तरह की सफाई माना जा सकता है, जिस तरह स्त्री-पुरुष दैनिक नित्यकर्म करते हैं। अगर नित्यकर्म अशुद्ध नहीं है, तो पीरियड को भी अशुद्ध नहीं माना जा सकता। अब तो मेडिकल से जुड़े लोग कहने लगे हैं कि पीरियड के समय सहवास करने में कोई हानि नहीं होती। मेडिकल साइंस के मुताबिक़, महिला का शरीर भी कमोबेश पुरुष की तरह ही है। पुरुष का शरीर स्पर्म पैदा करता है तो स्त्री के शरीर में एग्स पैदा होते हैं, जिसकी ब्रिडिंग गर्भाशय में होता है और नौ महीने बाद मानव जन्म लेता है। लिहाज़ा, स्त्री को अशुद्ध कहने का मतलब संतानोत्पत्ति को ही अशुद्ध कहना है।

राहुल सांकृत्यायन के “वोल्गा से गंगा” के मुताबिक आठ से दस हज़ार साल पहले मानव दो पैरों पर खड़ा होने के बाद निर्वस्त्र हाल में एक झुंड में जंगलों और गुफाओं में रहता था। तब मनुष्य का शरीर इतना मज़बूत होता था कि कोई बीमारी नहीं लगती थीं। आजकल जानवरों की तरह उस समय हर स्त्री-पुरुष का अनगिनत लोगों से सेक्सुअल रिलेशनशिप होता था, इसलिए किसी शिशु का पिता कौन है, यह कोई नहीं जानता था। हां, दूध पीने के कारण माता को सब लोग पहचानते थे। झुंड की सबसे ताक़तवर महिला ही झुंड की मुखिया होती थी। यह परंपरा कई हज़ार साल तक चलती रही। महिला मुखिया झुंड के हर सदस्य के साथ इंसाफ करती थी। इसलिए उस समय आपसी झगड़े या लड़ाइयां भी बहुत कम हुआ करती थीं। तब सेक्स डिटरमिनेशन टेस्ट या अबॉर्शन की प्रथा भी नहीं थी। लिहाज़ा, धरती पर स्त्री और पुरुष की तादाद लगभग बराबर होती थी। यानी जनसंख्या संतुलित थी। यह तथ्य मानव विकास पर लिखी गई किताबों में भी मिलता है। कभी-कभार जब दो झुंडों की आपस में संघर्ष होती था तब दोनों झुंड की मुखिया स्त्रियां ही आपस में मलयुद्ध करती थीं।

हुआ यूं कि एक बार एक झुंड की महिला मुखिया किसी कारण से मर गई। उसी समय उस झुंड पर दूसरे झुंड ने आक्रमण कर दिया। तब लड़ाई के लिए मर चुकी महिला मुखिया के बलिष्ठ बेटे, जो उसका प्रेमी भी था, को आगे आना पड़ा। उसका दूसरे झुंड की मादा से भयानक मलयुद्ध हुआ। पुरुष ने दूसरे झुंड की महिला को हार दिया। मानव समाज के विकास की संरचना में यह घटना अहम मोड़ थी। पुरुष ने पहली बार महसूस किया कि औसतन वह महिला से ज़्यादा ताक़तवर है। इसके बाद झुंड प्रमुख पद को सबसे ताकतवर पुरुष हथियाने लगे। यहीं से पुरुष आधिपत्य शुरू हुआ और स्त्री के साथ पक्षपात होने लगा। पुरुष उसे महज भोग की वस्तु समझने लगा और उसके मानवीय अधिकारों का भी हनन करने लगा। परिवारवाद प्रथा शुरू होने पर शुरू में एक पुरुष कई-कई पत्नियां रखता था, लेकिन स्त्री को दूसरे पुरुष की ओर देखने पर कुलटा कह दिया जाता था। जब शिक्षा की अवधारणा शुरू हुई तो पुरुष ने उस पर भी क़ब्ज़ा कर लिया। इसके बाद धर्म की स्थापना हुई। पुरुष आधिपत्य का कराण हर धर्म पुरुष प्रधान बनाए गए। जितने भी धार्मिक ग्रंथ रचे गए सबके सब पुरुषों ने रचे और सबमें पुरुष को ही महिमामंडित किया गया। जितने त्यौहार बनाए गए सब के सब पुरुष वर्चस्व के प्रतीक हैं। पत्नी पति के लिए व्रत रहती है, लेकिन कोई पति अपनी पत्नी के लिए व्रत नहीं रहता।

सारी पुरुष-प्रधान परंपराएं कमोबेश आज भी बदस्तूर जारी हैं। घर के बाहर हर जगह पुरुष ही दिखते हैं। महिलाओं की विज़िबिलिटी 10-15 फ़ीसदी से ज़्यादा नहीं है। सूचना प्रौद्योगिकी में क्रांति के दौर में भी मुंबई-दिल्ली जैसे महानगर छोड़ दिए जाएं तो महिलाओं की घर के बाहर विज़िबिलिटी पांच फ़ीसदी भी नहीं है। महिलाओं की कम विज़िबिलिटी के चलते दुस्साहसी पुरुष उनके साथ उनकी मर्जी के विरुद्ध हरकते करते हैं। उनके साथ भेदभाव करते हैं। महिलाओं के साथ होने वाले यौन अपराधों की असली वजह यही है, जिसे क़ानून को सख़्त करके नहीं रोका जा सकता। इसके लिए देश में हर जगह महिलाओं को 50 प्रतिशत जगह आरक्षित करनी पड़ेगी। हर जगह जितने पुरुष है उतनी स्त्री करनी ही पड़ेगी। शनि शिंगणापुर और हर मंदिर मस्जिद में महिलाओं का प्रवेश सुनिश्चित ही नहीं करना पड़ेगा बल्कि शनि शिंगणापुर और सबरीमाला जैसे धर्मस्थलों पर महिला पुजारी भी नियुक्त करना पड़ेगा।

कितने शर्म की बात है, कि अपने ही धर्म के स्थल पर जाने के लिए महिलाओं को आंदोलन करना पड़ रहा है और तथाकथित लोग मध्यस्थता कर रहे हैं। यहां जनता दल अध्यक्ष शरद यादव का बयान समीचीन है कि शनि मंदिर शिंगणापुर और हाजीअली दरगाह में महिलाओं का प्रवेश रोकने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करते हुए ऐसे लोगों को फौरन जेल भेजा जाना चाहिए। भारतीय संविधान जब स्त्री-पुरुष को पूजा या इबादत का समान अधिकार देता है, तब ये पुजारी या मौलवी कौन होते हैं स्त्रियों को रोकने वाले? समाज के इन तथाकथित ठेकेदारों को महिलाओं को इन धर्मस्थलों में जाने से रोकने का अधिकार किसने दे दिया?