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गुरुवार, 30 जुलाई 2015

क्या याकूब मेमन की आख़िरी इच्छा अधूरी रही?

1993 में मुंबई बम धमाकों के साजिशकर्ताओं में से एक याकूब मेमन की जीवित रहने बहुत प्रबल इच्छा थी, लेकिन आख़िरकार उसके ग़ुनाहों ने उसे जीने नहीं ही दिया और वह फांसी पर लटका दिया गया। 12 मार्च 1993 के मुंबई सीरियल ब्लास्ट के इस ग़ुनाहगार ने देश के सबसे अच्छे वकीलों की सेवाएं ली और अपने आपको फांसी के फंदे से बचाने की हर मुमकिन कोशिश की। यहां तक कि उसकी ओर से सुप्रीम कोर्ट, महाराष्ट्र के राज्यपाल और राष्ट्रपति के पास याचिका पर याचिका दायर की गई कि वह मौत की सज़ा से बच जाए, लेकिन उसकी यह इच्छा पूरी नहीं हुई और मौत ने उससे 257 हत्याओं का बदला ले लिया।
इतना ही नहीं सुप्रीम कोर्ट ने भी उसे जीवित रहने का मौक़ा देने के लिए ही रात 2.30 बजे उसके वकीलों की ओर से दायक याचिका पर सुनवाई की। याकूब के मौत के वॉरंट पर रोक लगाने के लिए उसके वकीलों की ओर से दायर याचिका खारिज़ सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को तड़के खारिज़ कर दी। तीन जजों की खंडपीठ ने कोर्ट चार में अपने आदेश में कहा कि मौत के वॉरंट पर रोक लगाना न्याय का मज़ाक़ होगा, लिहाज़ा, उसकी याचिका खारिज़ की जाती है। याचिका पर सुनवाई के लिए आधी रात में कोर्ट खोला गया। सुनवाई तड़के 3.20 बजे शुरू हुई और 90 मिनट चली। ऐसा भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में पहली बार हुआ, जब एक फांसी की सज़ा पाए क़ैदी को जीवित रहने का मौक़ा देने के लिए उसकी अपील पर देश की सबसे बड़ी अदालत ने आधी रात को सुनवाई की हो, यह इसलिए भी हुआ कि याकूब या उसके परिजन या समर्थक यह न कहें कि उसके साथ इंसाफ़ नहीं हुआ।
दरअसल, जेल सूत्रों के हवाले से बताया जा रहा है कि गुरुवार की सुबह याकूब मौत का फंदा गले में डालने से पहले अपनी 21 साल की बेटी ज़ुबेदा को देखना चाहता था, लेकिन बेटी फांसी के समय मुंबई थी, लिहाज़ा, जेल अधिकारी उसकी वह इच्छा पूरी नहीं कर सकते थे। तब याकूब से पूछा गया कि उसके बदले उसकी आख़िरी ख्‍वाहिश क्या है? तो याकूब ने कहा कि वह जुबेदा से बात करना चाहेगा। याकूब की आखिरी इच्छा का सम्मान करते हुए जेल से उसके घर फोन लगाया गया और उसने फोन पर बेटी से तीन-चार मिनट बातचीत की। फांसी की सज़ा पाए क़ैदी से उसकी आखिरी इच्छी पूछने का दस्तूर है, तो कह सकते हैं कि याकूब मेमन की आख़िरी इच्छा पूरी तरह तो नहीं बल्कि आंशिक तौर पर पूरी हो गई। वैसे याकूब का परिवार 24 जुलाई को उससे मिला था।  उसकी पत्नी रूहीन मेमन, दो बहने और बेटी ज़ुबेदा रिश्तेदार इक़बाल मेमन के साथ याकूब से नागपुर जेल में ही मिले थे। इस मुलाकात के दौरान वह फूट-फूटकर रोने लगा था।
एक अति भरोसेमंद सूत्र के मुताबिक़, याकूब मेमन ने फोन पर अपनी बेटी से कहा कि ऐसा कोई काम नहीं करना, जिससे ऐसे लाचारी भरे दिन देखने पड़े। संभवतः याकूब अपनी अप्रत्यक्ष रूप से अपनी मौजूदा लाचारी की ज़िक्र कर रहा था कि कहां वह अच्छा खाता-पिता चार्टर्ड अकाउंटेंट था, कहां भाई का साथ देकर 257 लोगों की हत्या का गुनाहग़ार बन गया और इतना लाचार हो गया कि वह जीना चाहता है, लेकिन उसका ग़ुनाह उसे जीने नहीं दे रहा है।
जेल अधिकारियों ने ऐसा महसूस किया याकूब को टाइगर मेमन का साथ देने का गहरा अफसोस है। बहरहाल, याकूब को इसके तुरंत बाद साढ़ छह बजे नागपुर सेंट्रल जेल में फांसी दे दी गई है। लोग भी मानते हैं कि मुंबई बम कांड के बाद परिवार की जलालत होते देखकर याकूब टाइगर से नाराज़ हो गया था। बुधवार की शाम वह जेल के लोगों से बराबर पूछता रहा कि सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ. संभवतः उसके मन में कहीं न कहीं उम्मीद थी कि संभव हो कोई चमत्कार हो और वह ज़िंदगी पा जाए।  लेकिन ऐसा नहीं हुआ। रात को जब उसकी आख़िरी दया याचिका राष्ट्रपति ने केंद्रीय गृहमंत्री से बातचीत के बाद ठुकराई तब उसके वकील सुप्रीम कोर्ट चले गए। यह याकूब को बताया गया था। बहरहाल, रात भर जेल अधिकारी भी सुप्रीम कोर्ट के आदेश का इंतज़ार करते रहे।
फांसी देने के समय याकूब एकदम चुप था। शायद वह अपने किए पर पछता रहा था। उसने अन्य कैदियों और जेलकर्मियों से कहा कि अगर उससे कभी कोई कोई ग़लती हो गई हो तो माफ़ कर देना। इससे पहले सुबह कुरान पढऩे के बाद याकूब का मेडिकल चेकअप किया गया। हालांकि याकूब ने यह कहते हुए कि वह एकदम फिट है, और उसने चेकअप करवाने से इनकार कर दिया। मगर जैल मैनुअल के अनुसार उसका मेडिकल किया गया और उसे फांसी देने के लिए फिट घोषित किया गया। इसके बाद तय नियमों और प्रक्रिया के तहत उसे फांसी दे दी गई।
इस मौक़े पर मुंबई धमाकों का ज़िक्र करना ग़लत नहीं होगा कि जब 12 मार्च 1993 को1.30 से 3.20 के बीच मुंबई में सिलसिलेवार 12 जगह बम धमाके हुए थे, जिसमें 257लोग मारे गए थे और  713 से ज़्यादा लोग ज़ख़्मी हुए थे। दरअसल, उस शुक्रवार को सब कुछ सामान्य ढंग से चल रहा था।  मुंबई में लोग दो चरण में हुए दंगे से उबरने लगे थे। दंगे के लिए दोषी ठहराए गए मुख्यमंत्री सुधाकरराव नाईक को कांग्रेस ने हटा दिया था और उनकी जगह रक्षामंत्री शरद पवार राज्य के मुख्यमंत्री बनकर आ चुके थे। दंगों के समय पुलिस कमिश्नर रहे श्रीकांत बापट की जगह अमरजीत सिंह सामरा आ चुके थे। मुंबई दंगों की जांच के लिए श्रीकृष्ण आयोग का गठन हो चुका था। अचानक शुक्रवार को लंच के समय दोपहर 1.30 बजे मुंबई स्टॉक एक्सचेंज में बहुत ज़ोरदार धमाका हुआ। लोग समझ ही नहीं पाए कि क्या हो गया। तब देश पर आतंकी हमले के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता था। पुलिस और फायर ब्रिगेड की टीम मौक़े पर पहुंच गई। घेरे बंदी के बाद बचाव कार्य शुरू हो गया, तभी कोई पौने घंटे बाद 2.15 बजे मस्जिद बंदर में नरसीनाथ स्ट्रीट में दूसरा धमाके की ख़बर आई। इसी बीच 15 मिनट बाद जब 2.30 बजे तीसरा शिवसेना भवन के पास के पेट्रोल पंप पर धमाका हुआ तो पहली बार मुंबई पुलिस के वायरलेस सेट पर घोषणा की गई कि यह आतंकवादी हमला है।
इसके बाद तो ऐसा लगा मुंबई ज्वालामुखी पर बैठी है और पांच-पांच दस-दस मिनट पर धमाके पर धमाके हो रहे हैं। शिवसेना भवन के धमाके के कुछ मिनट बाद 2.33 बजे नरीमन पॉइंट में एक्सप्रेस टॉवर के पास एयरइंडिया बिल्डिंग के बेसमेंट में बम फटा यह चौथा धमाका था। पांचवा धमाका 12 मिनट बाद 2.45 बजे सेंचुरी बाज़ार में हुआ जहां एक पेड़ और एक बस ही ग़ायब से हो गए। इसी समय यानी 2.45 बजे माहिम में छठा विस्फोट हुआ, यहां ग्रेनेड फेंका गया था, बाद में पता चला दाऊद के गुर्गों ने बम फेंका था। आम आदमी ही नहीं, मुंबई पुलिस और फायर ब्रिगेड के लोग भी परेशान कि कहां जाएं, किस जगह को प्राथमिकता दे।
क़रीब 3.05 बजे सातवां धमाका जवेरी बाज़ार में हुआ जबकि पांच मिनट बाद 3.10 बजे बैंडस्टैंड में सीरॉक होटल में आठवां बम फटा। शिवसेना भवन के पास 3.13 बजे प्लाजा सिनेमा में नौवां धमाका हुआ। कुछ ही पलों बाद ख़बर आई कि दसवां बम जुहू सेंटूर होटल में 3.20 बजे फटा. 3.30 बजे सहार हवाई अड्डे के पास ग्यारवां धमाका हुआ जब किसी ने ग्रेनेड फेंक और बारहवां धमाका 3.40 बजे एयरपोर्ट के पास सेंटूर होटल में हुआ। इसके बाद तो पूरा शहर ही एक अज्ञात ख़ौफ़ से घिर गया।  लोग डर रहे थे कि पता नहीं कहां-कहां बम रखा गया है? तब टीवी न्यूज़ का कल्चर नहीं था, लिहाज़ा, लोग जान ही नहीं पा रहे थे क्या हो रहा है?
बहरहाल, शाम को अमरजीस सिंह सामरा ने प्रेस कॉन्‍फ्रेंस में बताया कि यह देश की आर्थिक राजधानी मुंबई आतंकी हमला था। तीसरे दिन पता चला कि इसके पीछे मोस्ट वॉन्‍टेड क्रिमिनल दाउद इब्राहिम का हाथ है। उसके इशारे पर इन हत्याओं को इब्राहिम मुश्ताक अब्दुल रज्जाक मेमन और उसके भाइयों ने अंजाम दिया जिनमें याकूब मेमन भी था।

सोमवार, 20 जुलाई 2015

प्रतिबंध के बावजूद बेरोक-टोक चलते हैं डांस बार

हरिगोविंद विश्‍वकर्मा
पिछले साल क़ानून बना देने से महाराष्ट्र के डांस बार भले ही फ़ाइलों में भले ही बंद हो गए हों, लेकिन वास्तविकता यह थी कि बारों में डांस कभी रुका ही नहीं था। न सन् 2005 में बार डांस पर रोक प्रतिबंध लगाने से और न ही 2014 में क़ानून बना देने से। दरअसल, सरकार के आदेश या क़ानून के पालन की जवाबदेही पुलिस की है, परंतु जब पुलिस में भ्रष्ट अफ़सरों की ही चलती हो तो कैसी जवाबदेही?
कहना ग़लत नहीं होगा कि क़ानून बन जाने से बीयर-बारों में डांस तो नहीं रुका, हां, पुलिस का हफ़्ता ज़रूर बढ़ गया। मुंबई ही नहीं राज्य के बाक़ी इलाकों में बार मालिक पुलिस को हफ़्ता देकर धड़ल्ले से बार में लड़कियां नचाते हैं। पिछले गुरुवार की रेड में मीरारोड के ह्वाइट हाऊस में मिली 14 गर्ल्स इसकी गवाह हैं कि वहां उनका डांस हो रहा था। यानी क़ानून की चादर चर्र-चर्र पुलिस के लोग ही फाड़ रहे थे। कोई नहीं पूछ रहा है कि पाबंदी होने के बाद भी बार में डांस क्यों हो रहा था? अभी तक किसी पुलिस वाले के ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं हुई है। जांच चल रही है यानी लीपापोती हो रही है।
80 के दशक में बीयर बारों के डांस दरअसल “शराब के साथ शबाब भी” के फॉर्मूले के तहत शुरू हुआ था। हालांकि लड़कियों का डांस और उन पर पैसे लुटाने का नज़ारा पहले मुंबई के बारों तक सीमित था। बाद में ठाणे और नई मुंबई में भी बारों में डांस धड़ल्ले से होने लगे और पूरे राज्य में फैल गया।
डांस बार सुबह चार-पांच बजे तक चलते हैं। इससे इनका साइड इफेक्ट अपराधों में बढ़ोतरी के रूप में सामने आया। कई बीयर बार रिहायशी इलाक़ों में भी होते हैं, जिससे आम आदमी पर भी इनका असर देखा जाने लगा। महिलाओं के साथ रेप और छेड़छाड की घटनाएं बढ़ने लगी। इससे बार मालिक, बार गर्ल्स, उनके संगठन और शराबियों को छोड़कर बाक़ी लोग डांस बार का विरोध करने लगे। चूंकि महिलाओं पर अपराध में बढ़ोतरी के लिए डांस बार ज़िम्मेदार थे, इसलिए इन्हें रोकने के लिए कांग्रेस-एनसीपी सरकार पर दबाव बढ़ने लगा। अंततः सरकार झुकी और डांस बार बंद करने का फैसला किया गया।
सरकार ने बॉम्बे पुलिस एक्ट में संशोधन करके 2005 में डांस बारों पर रोक लगा दी। हालांकि थ्री स्टार और फाइव स्टार होटलों को प्रतिबंध से बाहर रखा गया। इसे आधार बनाकर डांस बार वाले बॉम्बे हाईकोर्ट गए। कोर्ट ने फ़ैसला रद्द कर दिया, जिससे सरकार को सुप्रीम कोर्ट में अपील करनी पड़ी। 16 जुलाई 2013 को सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के फ़ैसले को बरकारार रखते हुए थ्री स्टार होटलों से नीचे के डांस पर रोक हटा दी थी।
सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बावजूद सरकार डांस बार पर रोक लगाने के लिए प्रतिबद्ध थी। लिहाज़ा, डांस बार बंद कराने के लिए विधिवत क़ानून का सहारा लेना पड़ा। राज्य सरकार ने पहले जस्टिस सीएस धर्माधिकारी की अगुवाई में समिति का गठन किया था। समिति का दायरा महिलाओं पर अपराधों रोकने का उपाय सुझाना था, लेकिन डांस बार इसमें अहम मुद्दा था। इस बीच कैबिनेट की मंजूरी के बाद राज्य की एसेंबली ने 13 जून 2014 को डांस बार क़ानून पास कर दिया। उसी साल सितंबर में धर्माधिकारी समिति ने डांस बारों पर पूर्ण प्रतिबंध की सिफारिश कर दी। बस फिर क्या था, डांस बारों के लाइसेंस रद्द कर दिए गए। इस बार दायरे में थ्री स्टार और फाइव स्टार होटलों को भी लाया गया। महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम में संशोधन करके क़ानून का उल्लंघन करने वाले होटल या बार की परमिट निरस्त करने के अलावा तीन महीने से पांच साल तक की जेल और एक से पांच लाख रुपए तक ज़ुर्माने का प्रावधान किया गया।
वैसे अधिकृत तौर पर राज्य में महज़ 345 बीयर बार हैं, लेकिन बारों पर नज़र रखने वाले जानकार मानते हैं कि राज्य में दो हज़ार से ज़्यादा गैरक़ानूनी बार हैं, जो लोकल पुलिस को हफ़्ता देकर चलते हैं। बारों में डांस की इजाज़त तो नहीं है लिहाज़ा, ऑर्केस्ट्रा के नाम पर डांस होता है।  जिसमें लोकल पुलिस की मौन स्वीकृति होती है। इसके बदले बार वाले पुलिस वालों को “उचित ख़याल” रखते हैं। इसमें इनमें 65 हज़ार बार गर्ल्स समेत क़रीब सवा लाख लोगों को रोज़गार भी मिला हुआ है। मुंबई से सटे मीरा रोड उपनगर में पत्रकार बताए जा रहे राघवेंद्र दुबे नाम के युवक की हत्या की गई, उस मीरारोड-भाइंदर में 60 से ज़्यादा बीयर बार हैं, जहां धड़ल्ले से क़ानून की धज्जियां उड़ाकर रात भर डांस होता है। इसी डांस बार के चक्कर में राघवेंद्र की जान गई।
हत्या बेशक अमानवीय, दुखद और निंदनीय वारदात होती है। हत्या किसी अच्छे नागरिक की हो या फिर बुरे आदमी की, उसकी भर्त्सना होनी ही चाहिए। हत्या की वारदात में क़ुदरत द्वारा दी हुई बेशकीमती जान चली जाती है। हत्या को इंसान के जीने के अधिकार का हनन भी माना जाता है,  इसीलिए दुनिया भर का मानवाधिकार इसी फिलॉसफी के तहत हत्याओं का विरोध करता है। हत्या कमोबेश हर संवेदनशील को विचलित करती है।  कोई सभ्य आदमी हत्या के बारे में सोच कर ही दहल उठता है। यही मानसिकता मानव को हत्या की वारदात को लेकर संवेदनशील बनाती है।
हत्या को लेकर हर अच्छे नागरिक को संवेदनशील होना ही चाहिए। मीडिया को ख़ासकर कवरेज करते समय ज़्यादा संवेदनशील होना चाहिए। हत्या पर कोई तर्क-वितर्क नहीं होनी चाहि। एक स्वर से हत्या की भर्त्सना करनी चाहिए। इसी तरह में राघवेंद्र दुबे की हत्या की भी निंदा की जानी चाहिए। घटना पर विरोध दर्ज कराया जाना चाहिए। जिस हालात में हत्या हुई, उससे संदिग्ध पुलिसवालों के ख़िलाफ़ भी कार्रवाई होनी चाहिए। इतना ही नहीं इसमें जिन लोगों की संलिप्तता हो, उन पर आईपीसी के उचित सेक्शन्स के तहत मामला दर्ज करके त्वरित ऐक्शन करनी चाहिए। अपराधी चाहे जितने प्रभावशाली क्यों न हों, उन्हें बख़्शा नहीं जाना चाहिए। राघवेंद्र दुबे के परिवार को आर्थिक मदद देने की भी पहल होनी चाहिए। सुखद संकेत यह है कि ये सब बाते हो रही हैं।
सबसे अहम बात यह है कि मुंबई और ठाणे के पत्रकार, ख़ासकर हिंदी ख़बरनवीस, इस घटना को “माडिया पर हमला” कहने के मुद्दे पर दो खेमे में बंट गए हैं। एक तबक़ा कह रहा है कि हत्या का पत्रकारिता से कोई लेना-देना नहीं है। उसका तर्क है कि कथित तौर पर बीयर-बार वालों द्वारा मारे गए राघवेंद्र दुबे पत्रकार नहीं थे। दूसरी ओर दूसरा वर्ग इस तर्क से सहमत नहीं हैं। उसका अपना तर्क है जिसके मुताबिक़ राघवेंद्र 'ख़ुशबू उजाला' नाम का हिंदी साप्ताहिक अख़बार निकालते थे, इसलिए वह पत्रकार थे। इसी बिना पर यह धड़ा हत्या को “मीडिया पर हमला” करार दे रहा है।
सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि जिस साप्ताहिक अख़बार की बात हो रही है, वह मीरारोड के पेपर स्टॉल्स पर भी नहीं दिखता था। यहां तक कि शहर में अख़बार बांटने वाले भी उस अख़बार के बारे में नहीं जानते हैं। लिहाज़ा, आम आदमी का अख़ाबर से अनभिज्ञ होना सहज है। कई लोगों को राघवेंद्र दुबे की हत्या के बाद पता चला वह पत्रकार भी थे।
तो क्या यह सचमुच मीडिया पर हमला है? मीडिया पर हमला एक व्यापक टर्म है, जो लोग इसे मीडिया पर हमला कह रहे हैं, उन्हें कुछ सवालों का जवाब देना पड़ेगा। सबसे बड़ा सवाल है कि गुरुवार की रात ह्वाइट हाऊस बीयर-बार रेड के दौरान तीन ग़ुमनाम साप्ताहिक अख़बारों के तीन पत्रकार क्या करने गए थे? क्या वीकली अख़बारों में बार रेड की अपडेट कवरेज होती है? अगर नहीं तो लोकल वीकली न्यूज़पेपर्स के जर्नलिस्ट्स वहां क्यों गए? उनका क्या इंटरेस्ट था? आमतौर पर बार रेड को कवर करने के लिए बड़े-बड़े अख़बार के रिपोर्टर क्राइम भी स्पॉट पर नहीं जाते, क्योंकि पूरी दुनिया जानती है, बार-रेड भ्रष्ट पुलिस की अपनी छवि सुधारने की कवायद होती है। बारों में रेड तब पड़ती है, जब बार मालिक लोकल पुलिस को मान माफिक हफ़्ता देने से कतराने लगता है।
आमतौर पर बीयर-बारों में रेड पुलिस की सोशल सर्विस ब्रांच करती है। वह रेड से पहले टीवी वालों को ख़बर कर देती है, लेकिन ह्वाइट हाऊस में कथित रेड लोकल पुलिस के चंद अफसरान वसूली के लिए डाल रहे थे। शुरू में इसमें एसएस ब्रांच का कोई योगदान नहीं था। चर्चा में आ जाने से रेड को फ़ॉर्मल कर दिया गया और कुछ अरेस्ट और लड़कियों के रेस्क्यू का नाटक भी किया गया।
अमूमन इस तरह के अनॉफ़िशियल रेड मुंबई और ठाणे के उपनगरों में बीयर बारों में होते रहते हैं, जिन्हें वसूली रेड कहा जाता है, जो ऑन द स्पॉट भुगतान के बाद बंद हो जाते हैं। बार रेड अख़बारों की बमुश्किल सिंगल कॉलम की ख़बर होती है। ख़बरों का टोटा होने पर कभी-कभार डबल कॉलम स्थान पा जाती है। ख़बर भी फिलिंग द ब्लैंक स्टाइल की होती हैः अमुक बार में रेड पड़ी, इतनी बार-बालाएं, इतने ग्राहक और इतने कर्मचारी अरेस्ट हुए। सभी अरेस्टेड लोगों को दूसरे दिन कोर्ट से बेल मिल जाती है। बार भी दूसरे दिन से फिर से पुलिस संरक्षण में मज़े करने वाले ग्राहकों को खींचने लगता है।
इस सदी के आरंभ में टीवी मीडिया कल्चर शुरू होने पर बार रेड की ख़बर ब्रेकिंग न्यूज़ बनने लगी। टीवी पर अकसर ब्रेकिंग न्यूज़ चलती है कि अमुक बार में रेड पड़ी। मज़ेदार बात यह है कि इससे होता-जाता कुछ नहीं। चैनल पर थोड़ी देर सनसनी ज़रूर रहती है। देखा-देखी सारे टीवी न्यूज़ वाले यह ख़बर चलाते हैं। प्रतिस्पर्धा के चलते बार रेड कवर करना टीवी वालों की मजबूरी बन गई है। टीवी चैनल्स के नाइट रिपोर्टर रात ड्यूटी पर पहुंचने पर सबसे पहले सहयोगियों से पता करते हैं कि कहीं बार में रेड तो नहीं हुई। मतलब विज़ुअल और बाइट के लिए केवल इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लोग बार रेड कवर करते हैं। इससे वसंतराव ढोबले जैसे अफ़सरों का लाइमलाइट में आने का मौक़ा मिल जाता है।
चूंकि बार में रोक के बावजूद डांस हो रहा है, ऐसे में कुछ लोग साप्ताहिक अख़बार निकाल कर डांस बार की शिकायत करते हैं। यदा-कदा छपने वाले साप्ताहिक या पक्षिक या मंथली अख़बार निकाले ही इसलिए जाते हैं ताकि धन उगाही की जा सके। कहा जाता है कि शिकायत के बदले में शिकायतकर्ता को डांस बार से हर महीने नियमित राशि नज़राने के रूप में मिलती है।
मुंबई और ठाणे इस तरह के लाभार्थी पत्रकारों की फेहरिस्त बहुत लंबी है। पुलिस सूत्र बताते हैं कि राघवेंद्र दुबे खुशबू उजाला के लेटरहेड का इस्तेमाल शिकायत के लिए करते थे। हत्या में लवबर्ड बार का मालिक भी अरेस्टेड है। लवबर्ड के ख़िलाफ़ राघवेंद्र के सौ से ज़्यादा शिकायती पत्र मीरारोड पुलिस स्टेशन की फाइल में पड़े हैं। अब मुंबई के पत्रकारों को तय करना है कि राघवेंद्र दुबे को आजतक के अक्षय सिंह की कैटेगरी में खड़ा कर दिया जाए या नहीं?

सोमवार, 13 जुलाई 2015

आबादी पर अंकुश लगाने के लिए सख़्त प्रावधान की ज़रूरत

हरिगोविंद विश्वकर्मा
जनसंख्या एक ग्लोबल समस्या बन गई है। हर जगह इंसानों की भीड़ बढ़ रही है। इंसान इतने ज़्यादा पैदा हो गए हैं कि धरती छोटी पड़ने लगी है। भारत में तो जनसंख्या सभी समस्याओं की जननी बन गई है। देश की तमाम समस्याएं; मसलन- ग़रीबी, कुपोषण, पिछड़ापन, बेरोज़गारी, निरक्षरता, अपराध, नक्सलवाद, आतंकवाद, आवासहीनता, अपर्याप्त स्वास्थ सेवा, धार्मिक उन्माद, कट्टरता और स्कूल-कॉलेज में दाख़िला, सबकी सब जनसंख्या की नाभि से ही निकल रही हैं। जनसंख्या अकेले दम पर सरकार की सभी योजनाओं, नीतियों और प्रोग्राम्स की हवा निकाल रही है। कह लीजिए कि आबादी सुरसा बन गई है जो मानव कल्याण के लिए सरकार द्वारा लिए गए हर फ़ैसले को निगलती जा रही है।

आबादी में इज़ाफ़े से पर्यावरण का संतुलन भी गड़बड़ा रहा है। मनुष्यों के बढ़ने से उनके द्वारा छोड़ी गई कार्बनडाईआक्साइड भी बढ़ रही है। इसे ऑक्सीजन में बदलने वाले पेड़ कम हो रहे हैं। इससे वातावरण में कार्बनडाईआक्साइड ज़रूरत से ज़्यादा हो रही है, जिससे ग्लोबल वार्मिंग बढ़ रही है। इंसानों की आबादी बढ़ने से वन्यजीवों की संख्या पिछले 40 साल में घटकर आधी रह गई है। आबादी के कारण दुनिया में भारत का इंट्रोडक्शन एक नकारात्मक देश के रूप में होता है। जहां दुनिया के बाक़ी देशों में लोग बेहतर जीवन जी रहे हैं, वहीं भारत में लोग थोक के भाव बच्चे पैदा करके ख़ुद तो परेशान हो ही रहे हैं, दूसरों को भी परेशान कर रहे हैं। इसीलिए देश में आबादी पर सख़्ती से अंकुश लगाने का समय आ गया है।

आबादी पर हर पल नज़र रखने वाली भारत सरकार की अधिकृत बेवसाइट सेंसस इंडिया के मुताबिक़ देश में हर घंटे 3080 से ज़्यादा बच्चे पैदा हो रहे हैं, जबकि मृत्यु दर प्रति घंटे 1099 से भी कम है। यानी आबादी की भीड़ में क़रीब दो हज़ार लोग हर घंटे बढ़ रहे हैं, जो किसी बड़ी कंपनी में कर्मचारियों की संख्या के बराबर है। हर घंटे पैदा हो रहे बच्चों के लिए भविष्य में रोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्थ, शिक्षा और रोज़गार की व्यवस्था करना बहुत बड़ी गंभीर समस्या बन रही है। जनसंख्या विस्फोट को देखकर ही वर्ल्‍ड हेल्‍थ ऑर्गनाइजेशन की रिपोर्ट वर्ल्ड पॉप्युलेशन प्रोस्पेक्ट्स-दी 2012 रिवाइज्ड’ में कहा गया है कि जन्म दर इसी तरह बनी रही तो 2028 तक भारत की आबादी चीन से ज़्यादा हो जाएगी। अगर अगले कुछ दशक तक पॉप्युलेशन ऐसे ही बढ़ती रही तो लोगों को रहने के लिए जगह नहीं बचेगी। फ़िलहाल भारत के पास विश्व की समस्त भूमि का केवल 2.4 फ़ीसदी हिस्सा ही है, जबकि विश्व की जनसंख्या का 16.7 फ़ीसदी हिस्सा इस देश में रहता है। फ़िलहाल, देश की आबादी 1.296 अरब है जिसमें 66.89 करोड़ पुरुष और 62.66 करोड़ महिलाएं हैं।

2011 की जनगणना पर गौर करें तो आबादी एक दशक में 18.1 करोड़ बढ़ गई। 19वीं सदी के उत्तरार्ध में इस भूभाग (तब भारत नहीं ब्रिटिश इंडिया था) की आबादी ही क़रीब 17 करोड़ थी, लेकिन अब उससे ज़्यादा लोग दस साल में बढ़ रहे हैं। हालांकि, इस बार की जनगणना में आबादी वृद्धि दर में कमी देखी गई है, लेकिन यह बहुत मामूली है। ऊंट के मुंह में जीरा की तरह। वैसे, कन्या भ्रूण-हत्या के ख़िलाफ़ राष्ट्रव्यापी अभियान के कारण महिलाओं की जनसंख्या बढ़ रही है। देश में प्रति हज़ार पुरुषों पर 933 महिलाएं थींजो दस साल बाद 940 हो गई हैं। फ़िलहाल, आबादी में पुरुषों की संख्या 51.54 फ़ीसदी और महिलाओं की संख्या 48.46 फ़ीसदी है। 20वीं सदी के आरंभ में ब्रिटिश इंडिया की आबादी 23.84 करोड़ से दस साल में 25.21 करोड़ हो गई। मज़ेदार यह रही कि 1921 में आबादी घट कर 25.13 करोड़ हो गई। मगर अगले दो दशकों में जनसंख्या 27.89 और 31.86 करोड़ पहुंच गई। जनसंख्या वृद्धि में बूम आज़ादी के बाद आया। 1951 की जनगणना में पता चला कि भारत की आबादी 36 करोड़ को पार कर चुकी है। 1961 में और उछली और 43.9 करोड़ को टच कर गई। सत्तर के दशक में लगा कि लोगों में बच्चे पैदा करने की होड़ मची है। दस साल में 11 करोड़ लोग बढ़ गए और आबादी आधा अरब (54 करोड़) पार कर गई। इसके बाद तो मानो आबादी को पंख लग गए। 1981 में 68.3 करोड़ तो 1991 में 84.6 करोड। अगले 10 साल में क़रीब 16 करोड़ लोग बढ़ गए तो न्यू मिलेनियम में तो जन्मदर के सारे रिकॉर्ड टूट गए। एक दशक में 21 करोड़ बच्चे पैदा हुए और 2011 में आबादी 1.21 करोड़ हो गई। जनसंख्या-वृद्धि बदस्तूर जारी है।

मज़ेदार बात यह है कि आज़ादी के बाद से ही केंद्र और सभी राज्य सरकारें कोशिश कर रही हैं कि इस पर अंकुश लगाया जाए लेकिन हर कोशिश टांय-टांय फिस्स हो रही है। भारत में एक नहीं दो-दो बार जनसंख्या नीति बनाई जा चुकी है। तय हुआ कि जनसंख्या विस्फोट पर अंकुश लगाया जाएगा और छोटे परिवार प्रमोट किए जाएंगे। सन् 2000 से जनसंख्या आयोग भी अस्तित्व में आ चुका है। फिर भी यह थमने का नाम नहीं ले रही है। पचास के दशक में भारत में चीन से पहले नसबंदी शुरू की गई लेकिन 65 साल में कोई ख़ास नतीजा नहीं निकला। नसबंदी योजना कैसे काम करती है, इसकी मिसाल प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र बनारस में मिली। इसी साल 31 जनवरी को ज़िला मुख्यालय से 30 किलोमीटर दूर चिरईगांव के हेल्थसेंटर के बाहर 73 महिलाओं की ज़मीन पर लिटाकर नसबंदी की गई। चूंकि अस्पताल में बिस्तर की व्यवस्था नहीं थीलिहाज़ा, खुले आसमान के नीचे ज़मीन बेड बना दी गई। यह घटना ग्रामीण स्वास्थ केंद्रों की बदहाली की कहानी कहती है, जिस देश में 70 फ़ीसदी आबादी गांवों में रहती हो,वहां बजट का आधार ही ग्रामीण विकास होना चाहिए, लेकिन होता इसके उल्टा है। विकास का ज़्यादा शेयर शहर झटक रहे हैं, इसीलिए ग्रामीण इलाक़े में लोग दीन ही हालत में रहते हैं।

आबादी में बढ़ोतरी के लिए किसी एक समाज या धर्म को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। हिंदू हों या मुसलमान, बढ़ती आबादी के लिए दोनों ज़िम्मेदार हैं। भारतीय राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अब तक 1991-92, 1998-99 और 2005-06 में तीन सर्वे हो चुके हैं। चौथा सर्वे चल रहा है। डेटाज़ के मुताबिक़ आबादी पर अंकुश लगाने की कोई युक्ति कारगर नहीं हो रही है। 1991-92 में मुस्लिम महिलाओं की कुल प्रजनन दर यानी टोटल फर्टिलिटी रेट 4.41 थी तो हिंदू महिलाओं की 3.31 जो बहुत कम नहीं थी। 1998-99 और 2005-06 में मुस्लिमों की प्रजनन दर 3.39 और 3.4 थी तो इसी दौरान हिंदुओं की प्रजनन दर 2.78 और 2.59 दर्ज की गई। रिपोर्ट कहती है कि आबादी में बढ़ोतरी की दर का राष्ट्रीय फीगर 18 फ़ीसदी है, परंतु मुसलमानों की आबादी 24 फ़ीसदी की दर से बढ़ रही है। 1991-2001 के दौरान तो मुस्लिम आबादी 29 फ़ीसदी की दर से बढ़ रही थी, जो चिंता का विषय थी। परंतु अब इसमें गिरावट आई है, जिसमें और ध्यान देने की ज़रूरत है। आईएनएफएचएस की रिपोर्ट के मुताबिक जहां देश की हर महिलाएं औसतन 2.4 बच्चे पैदा कर रही हैं, वहीं मुस्लिम महिलाएं 3.6 बच्चे पैदा कर रही हैं। यह सही है कि मुस्लिम महिलाएं अब भी परिवार नियोजन में हिंदू महिलाओं से पीछे हैं। मगर इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता कि मुस्लिम महिलाओं में भी परिवार नियोजन अपनाने की चेतना बढ़ रही है। हिंदू महिलाओं में गर्भ निरोध के साधनों का प्रयोग 1991-92 में 37.7 फ़ीसदी से बढ़कर 1998-99 में 44.3 फ़ीसदी हो गया, जो 6.6 फ़ीसदी की बढ़ोत्तरी है। मुस्लिम महिलाओं में यह 22 फ़ीसदी से बढ़कर 30.2 फ़ीसदी हो गया। यानी जो 8.2 फ़ीसदी की वृद्धि दर्शाता है जो हिंदू महिलाओं से ज़्यादा है। इसी तरह 1998-99 से 2005-06 के बीच गर्भ निरोध के तरीक़े इस्तेमाल करनेवाली हिंदू महिलाओं की संख्या में 5.9 फ़ीसदी इज़ाफ़ा हुआ तो मुस्लिम महिलाओं के मामले में बढ़ोतरी 6.2 फ़ीसदी की रही। यानी हिंदू महिलाओं के मुकाबले 0.3 फ़ीसदी ज़्यादा। संभवतः यही बात हिंदूवादी संगठनों और नेताओं को मुस्लिमों पर हमला करने का मौक़ा देती है।

जनसंख्या वृद्धि में भारत की परंपराएं भी कम ज़िम्मेदार नहीं हैं। भारतीय समाज में संयुक्त परिवार का कॉन्सेप्ट हैं। नयी पीढ़ी पुरानी पीढ़ी की उपेक्षा नहीं करती। लोग बुढ़ापे में अपने बच्चों के साथ रहते हैं। दरअसल, यह परंपरा भी आबादी में विस्फोट की प्रमुख वजह है। देश में सोसल सिक्योरिटी नाम की चीज़ ही नहीं है. लिहाज़ा, लोग बुढ़ापे का ख़याल करके पुत्र चाहते हैं। मानते हैं कि बेटियां शादी के बाद दूसरे के घर चली जाती हैं, इसलिए बुढ़ापे में देखभाल के लिए पुत्र ज़रूरी है। पुत्र की चाहत इसी सोच का नतीजा है। हर दंपत्ति चाहता है, उसे एक बेटा ज़रूर हो। इसीलिए दो बेटियां होने पर कई लोग बेटे के लिए तीसरा बच्चा पैदा करते हैं। दो बेटे पैदा हो जाने पर बेटी के लिए कोई तीसरी संतान पैदा नहीं करता। कभी-कभी बेटे की प्रतीक्षा ख़त्म ही नहीं होती और छह-सात बेटियां पैदा हो जाती हैं। दो साल पहले पन्ना में एक हिंदू महिला ने 42 साल की उम्र में 14 वीं संतान को जन्म दिया। वैसे यह परंपरा अब टूट रही है। आजकल बच्चे बुजुर्गो को बोझ मानकर उनका तिरस्कार भी करने लगे हैं। ऐसी भी मिसाल देखने को मिलती है जब वृद्ध माता-पिता को घर से बाहर निकाल दिया जाता है। उम्र के अंतिम दौर में लोग वृद्धाश्रम में अकेले रहने को मजबूर किए जा रहे हैं। पं मदनमोहन मालवीय की 90 साल की सगी पोती विजया पारिख मिसाल हैं जो नोएडा के सेक्टर 55 के वृद्धाश्रम में पांच साल से रह रही हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भले भारत को सबसे युवा देश में कहें लेकिन 60 साल के लोगों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है। डब्ल्यूएचओ और हेल्पेज के मुताबिक, 2026 में भारत में बूढ़ों की आबादी 17.32 करोड़ होने का अनुमान है। मज़ेदार यह है कि पुरुष महिलाओं से ज़्यादा हैं लेकिन बड़ी उम्र में स्त्रियां पुरुषों से ’ज़्यादा हैं। पॉप्युलेशन को उम्र के हिसाब से नज़र रखने वाली संस्था कंट्री मीटर्स की वेबसाइट के मुताबिक भारत में 65 साल या उससे ऊपर की आबादी 5.5 फ़ीसदी यानी सात करोड़ है। अनुमानतः 50 लाख लोग ऐसे होंगे, जिनके पास बुढ़ापे में कोई सहारा नहीं होगा। ऐसे लोगों को 65 साल की उम्र होने पर सरकार की ओर से 10 हज़ार रुपए महीने वेतन देने की योजना शुरू करनी चाहिए। वैसे भी सरकार कई फ़ालतू योजनाओं में लाखों करोड़ रुपए बर्बाद कर रही है। अगर वृद्धावस्था में सामाजिक सुरक्षा की योजना शुरू की गई तो निश्तित रूप से लोगों में बेटे की चाहत कम होगी और आबादी पर अंकुश लगेगा.

सत्तर के दशक में चीन में कमोबेश ऐसे हालात थे। लिहाज़ा, बेतहाशा बढ़ रही आबादी पर लगाम लगाने के लिए चीन में 1979 में एक बच्चा नीति लागू हुई थी। एक बच्चा नीति के तहत शादी-शुदा जोड़ों को केवल एक ही बच्चा पैदा करने की इजाज़त है। दूसरा बच्चा पैदा करने पर माता-पिता के ख़िलाफ़ तो कार्रवाई होती ही है, बच्चे को 'गैरकानूनी' बच्चा कहा जाता है। उसे पहचान पत्र जारी नहीं किया जाता, जिससे बच्चा निःशुल्क शिक्षा या सेहत संबंधी सुविधाएं नहीं ले सकता। यही नहीं, बच्चा अपने ही देश में यात्रा नहीं कर सकता और किसी लाइब्रेरी का इस्तेमाल नहीं कर सकता है। एक बच्चा नीति के लागू होने से पहले चीन में लोगों के औसतन चार बच्चे हुआ करते थे। एक संतान नीति लागू होने के बाद देश की आबादी पर तो अंकुश लगा ही, वहां ज़िंदगी पूरी तरह से बदल गई। अब भारत चीन को 2028 तक ओवरटेक करने वाला है।

भारत में राजनीति के चलते चीन जैसा कठोर क़ानून बनाना शायद संभव नहीं होगा, लेकिन ऐसा कुछ क़दम उठाना ही होगा ताकि धड़ल्ले से बच्चे पैदा करने वालों के मन में ख़ौफ़ पैदा हो। जब तक भय पैदा नहीं किया जाएगा, आबादी पर अंकुश लगाना मुमकिन नहीं। इसके लिए सरकार को कुछ ऐसे कड़े क़ानून बनाने पड़ेंगे, जिन पर आसानी से अमल करके जनसंख्या पर अंकुश लगाया जा सके। जब तक दो से ज़्यादा बच्चा पैदा करने वालों को शर्मिंदा नहीं किया जाएगा, यह सिलसिला नहीं थमेगा। ऐसे लोगों को हतोत्साहित किया जाए। उन्हें एहसास कराया जाए कि दो से ज़्यादा बच्चे पैदाकर करके उन्होंने सामाजिक अपराध किया है। मसलन, दो से ज़्यादा बच्चे पैदा करने वालों को इनकम टैक्स में मिलने वाली छूट ख़त्म की जा सकती है। सरकारी योजनाओं का लाभ केवल उन्हीं को दिया जाए जिनके पास केवल एक बच्चा है। जिनके पास केवल एक बेटी है, उन्हें अनिवार्य रूप से सरकारी नौकरी देने का प्रावधान भी कारगर हो सकता है। इसके अलावा एक संतान वाले दंपति को इनकम टैक्स स्लैब में पांच लाख रुपए तक की छूट देकर ऐसा करने के लिए लोगों को प्रोत्साहित किया जा सकता है।
समाप्त

बुधवार, 8 जुलाई 2015

क्या मुस्लिम बच्चों के विकास में बाधा हैं मदरसे?


उत्तरप्रदेश शिया सेंट्रल बोर्ड के अध्यक्ष वसीम रिजवी  ने हाल ही में प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर मदरसों पर आतंकवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाकर उन्हें बंद करने की मांग की थी। जैसा कि अपेक्षित था, कट्टरपंथी मुसलमान उनके खिलाफ हो गए। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष सैयद गैयूरूल हसन रिज़वी ने कहा कि यह मदरसों को बदनाम करने की साजिश है। इससे पहले 2015 में महाराष्ट्र सरकार ने राज्य के सभी मदरसों के बच्चों को “आउट ऑफ स्कूल चिल्ड्रेन” घोषित करने का फैसला किया था। इससे महज़ मज़हबी तालीम यानी उर्दू और शरीयत पढ़ाने वाले 1890 मदरसों में से 1340 मदरसे स्‍कूल श्रेणी से बाहर हो गए थे। 550 मदरसों ने हर विषय पढ़ाने का सरकार का आदेश मान लिया और उनकी स्कूल की मान्यता बची रह गई।

लंबे समय से इस बात पर बहस होती रही है कि क्या यक़ीनी तौर पर मुसलमानों के बच्चों के विकास में सबसे बड़ी बाधा मदरसे ही हैं और मदरसे में तालीम हासिल करने वाले कट्टर हो जाते हैं और उन्हें आतंकवाद की ओर खींचना आसान होता है? इसी बिना पर प्रगतिशील मुसलमान मदरसा कल्चर की मुखालफत करते रहे हैं। इन लोगों का कहना है कि ग़रीब तबक़े के मुस्लिम बच्चे एजुकेशन को मेन स्ट्रीम में लाना जरूरी है। इससे अब तक उपेक्षित बच्चों के लिए भविष्य में अवसर बनेंगे और अगर मेहनत करेंगे तो अच्छा पढ़-लिखकर अफ़सर बन सकेंगे। 

प्रगतिशील मुसलमानों के तर्क को नकारा भी नहीं जा सकता। वस्तुतः मदरसे मुस्लिम बच्चों के ही नहीं, बल्कि समस्त मुस्लिम समाज के विकास में सबसे बड़ी बाधा हैं। दुनिया कहां से कहां पहुंच गई, विश्व एक गांव में तब्दील हो गया, लेकिन मदरसा चलाने वाले मुसलमान अब भी बच्चों को कई सदी पीछे रखना चाहते हैं। अब मुसलमानों को यह समझना ही होगा कि वर्तमान दौर अंग्रेज़ी शिक्षा का दौर है। इस दौर में बच्चों को भाषा के रूप में बेशक संस्कृत, उर्दू, मराठी या दूसरी क्षेत्रीय भाषाएं पढ़ाइए, लेकिन साथ में उन्हें अंग्रेज़ी, मैथ और साइंस पढ़ाना ही होगा। उन्हें इंजीनियर, डॉक्टर, आईएएस-पीसीएस और जज बनाना होगा। इसके लिए मदरसों का बंद करना समय की मांग है।

दरअसल, विद्यालय यानी स्कूल को अरबी में मदरसा कहते हैं। ऐसी मान्यता है कि पहला मदरसा हज़रत ज़ैद बिन अकरम के परिसर की पहाड़ी के पास खुला था, जिसे सफ़ा कहा गया। प्रमाण तो नहीं है, मगर माना जाता है कि सफ़ा में मोहम्मद साहब अध्यापक थे और उनके अनुयायी छात्र। 12वीं सदी के अंत तक बग़दाददमिश्कमोसल और दूसरे मुस्लिम शहरों में मदरसे फल-फूल रहे थे। भारत में मदरसे 12वीं सदी में दिल्ली सल्तनत काल में शुरू हुएलेकिन ज़्यादा शोहरत मुग़ल काल में मिली। इतिहासकारों के मुताबिक़ शाह वली अल्लाह के पिता शाह अब्दुर्रहीम ने 17वीं सदी के आख़िर में दिल्ली में पहला मदरसा मदरसा-ए रहीमिया खोला था। लखनऊ में 18वीं शताब्दी के आरंभ में मुल्ला निज़ामुद्दीन सिहलवी ने मदरसा-ए फ़िरंगी महल शुरू किया था। 1867 में देवबंद में मुहम्मद आबिद हुसैन ने मदरसा-ए दारूल उलूम की स्थापना की, जो इस्लामी अध्यात्म के सर्वश्रेष्ठ संस्थानों में से है। हालांकि, आज के दौर के मदरसों में केवल उर्दू और शरीयत सिखाए जाते हैं। यह तालीम बेशक मौलवी बनने वालों के लिए ठीक है, मगर इसमें पढ़े बच्चे बुनकर या मज़दूर ही बन सकते हैं, डॉक्टर-इंजीनियर या अफ़सर नहीं। लिहाज़ा, या तो मदरसों को आधुनिक कॉन्वेंट स्कूलों जैसा बनाया जाए, या फिर उन्हें बंद करके उनकी जगह बेहतर शिक्षा देने वाले स्कूल-कॉलेज खोले जाएं, जिन्हें शिक्षा बोर्डों या यूनिवर्सिटी से आधिकारिक मान्यता मिली हो।
मदरसों की स्कूली मान्यता ख़त्म करने के फ़ैसले का दो तरह के लोग विरोध कर रहे हैं। पहले तो मौलवी हैं, जिनकी रोज़ी-रोटी मदरसों से चलती रही है। उनका विरोध जायज़ कहा जा सकता है। दूसरे सियासतदां हैं, जिनकी पूरी राजनीति ही मुस्लिम वोटों से होती है। इनमें एमआईएम के लोकसभा सदस्य असदुद्दीन ओवैसी भी शामिल हैं। सवाल उठता है कि इनका विरोध क्या जायज़ है? क्योंकि ओवैसी साहब ख़ुद तो लंदन में पढ़े हैं, उनके बच्चे कॉन्वेंट या इंग्लिश मीडियम से पढ़ रहे हैं। ओवैसी के अलावा वे लोग ज़्यादा मुखर विरोध कर रहे हैं, जिनके भी बच्चे कॉन्वेंट या विदेशों में पढ़े हैं। ये तथाकथित हितैषी चाहते हैं कि ग़रीबों के बच्चे मदरसे के चक्कर में अंग्रेज़ी, मैथमेटिक्स और साइंस पढ़ने से वंचित रहें और अपना भविष्य चौपट कर लें, ताकि भविष्य में उनके डॉक्टर-इंजीनियर या अफ़सर की संभावना ही ख़त्म हो जाए और अच्छी सेलरी वाले जॉब के जो मौक़े आएं, उन्हें धनी मुसलमानों के अंग्रेज़ी, मैथ व साइंस पढ़ने वाले बच्चे लपक लें।
दरअसल, जस्टिस राजिंदर सच्चर कमेटी की रिपोर्ट आने के बाद तत्कालीन सीएम विलासराव देशमुख ने मई 2008 में महाराष्ट्र में मुसलमानों की शैक्षिक-सामाजिक-आर्थिक स्थिति के अध्ययन के लिए रिटायर ब्यूरोक्रेट डॉ. महमूदुर रहमान की अगुवाई में छह सदस्यों वाली महमूदुर रहमान कमेटी बनाई थी। कमेटी ने रिपोर्ट अक्टूबर 2013 में सरकार को सौंप दी थी, लेकिन अभी तक उसे सार्वजनिक नहीं किया गया है। लीक्ड रिपोर्ट में मुसलमानों के बारे कई हैरान करने वाले तथ्य सामने आए हैं। मसलन, महाराष्ट्र में, देहात की बात तो छोड़ दें, मुंबई जैसे शहर में रहने वाले मुसलमानों की भी हालत एकदम पिछड़ी मानी जाने वाली अनुसूचित जाति और जनजाति से भी बदतर है। मुसलमानों को कोई भी बैंक क़र्ज़ नहीं देती है। मुंबई से सटा मीरारोड का मुस्लिम बाहुल्य इलाक़ा नयागनर जीता जागता उदाहरण है, जहां घर लेने वालों को किसी भी बैंक से होमलोन नहीं मिलता है।
महमूदुर रहमान समिति ने रिपोर्ट में टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंस, एसएनडीटी वीमेन यूनिवर्सिटी की इकोनॉमिक्स फैकेल्टी और मुंबई यूनिवर्सिटी के निर्मला निकेतन कॉलेज ऑफ़ सोशल वर्क समेत, कुल सात संस्थानों के भरोसेमंद सर्वेज़ और स्टडीज़ का हवाला दिया है। सभी सर्वेज़ और स्टडीज़ क़मोबेश एक जैसी हैं, मगर सत्यता की कसौटी पर खरी उतरती हैं।
महमूदुर रहमान समिति की रिपोर्ट के मुताबिक़ राज्य में 1.20 करोड़ मुसलमान हैं, जिनमें 15 साल तक की जनसंख्या 37 फ़ीसदी है, जो अपेक्षाकृत ज़्यादा जन्म दर दर्शाती है। पुरुष मुखिया वाले हर मुस्लिम परिवार में औसतन 6.1 सदस्य हैं जबकि महिला मुखिया वाले परिवार में 4.9 सदस्य। रिपोर्ट में 60 साल या उससे ज़्यादा उम्र के लोगों की आबादी महज़ 6.6 फ़ीसदी बताई गई है, जिसका मतलब मुस्लिम समाज में लोग 60 साल के बाद जल्दी मर जाते हैं, इसकी वजह ग़रीबी और उचित मेडिकेयर का अभाव हो सकता है। यह अलग सीरियस शोध का विषय है। 
महमूदुर रहमान समिति की रिपोर्ट के मुताबिक़, राज्य में केवल 10 फ़ीसदी मुसलमान अपने खेत में खेती करते हैं। आधे यानी 49 फ़ीसदी मुस्लिम ग़रीबी रेखा के नीचे हैं जबकि पूरे देश में 34.4 फ़ीसदी मुसलमान ग़रीब हैं। राज्य में 20 फ़ीसदी मुसलमानों के पास राशन कार्ड नहीं है, जबकि 59 फ़ीसदी मुसलमान स्लम यानी गंदी बस्तियों में रहते हैं। इनमें केवल 18 फ़ीसदी लोगों के ही घर पक्के हैं। राज्य में बहुत बड़ी तादाद में युवक बेरोज़गार हैं। 32.4 फ़ीसदी लोग छोटे-मोटे काम करते हैं। शायद यही वजह है कि 45 फ़ीसदी मुस्लिमों की परकैपिटा आमदनी महज़ 500 रुपए ही है। 34 फ़ीसदी मुसलमानों (आबादी का एक तिहाई) की मासिक आमदनी 10 हज़ार रुपए से भी कम है। 24 फ़ीसदी 10 से 20 हज़ार महीने कमाते हैं, जबकि 20 से 30 हज़ार कमाने वाले मुसलमानों की तादाद 3.8 फ़ीसदी है। अपेक्षाकृत अच्छा यानी 30 से 40 हज़ार रुपए कमाने वालों की संख्या महज़ 1.0 फ़ीसदी है।
हालांकि ऐसा नहीं कि मुस्लिम समाज में सभी ग़रीब ही हैं। रिपोर्ट कहता है कि मुस्लिम समाज काफ़ी संपन्न है, देश का बस बाक़ी समुदायों की तरह मुसलमानों में भी मुट्ठी भर लोग बेहतर जीवन जी पाते हैं। यानी केवल 6.0 फ़ीसदी मुस्लिम हर महीने 50 हज़ार या उससे ज़्यादा आमदनी करते हैं।
शिक्षा के क्षेत्र में डॉ. महमूदुर की रिपोर्ट क़रीब-क़रीब सच्चर की रिपोर्ट जैसी ही है। मतलब, एजुकेशन में मुसलमानों की दशा बहुत दयनीय है। जहां देश में साक्षरता की दर 74 फ़ीसदी है, वहीं मुस्लिम साक्षरता केवल 67.6 फ़ीसदी हैं। महाराष्ट्र में यह 65.5 फ़ीसदी से भी नीचे है। हालांकि, प्राइमरी स्तर पर मुस्लिम बच्चे हिंदुओं से बेहतर स्थिति में हैं। यानी हिंदुओं के 38 फ़ीसदी बच्चे प्राइमरी तक पहुंचे हैं तो मुस्लिमों के 47 फ़ीसदी बच्चे। रिपोर्ट कहती है, आमतौर पर 14 साल की उम्र में मुस्लिम बच्चे पढ़ाई छोड़ देते हैं और बाल मज़दूर के रूप में काम करने लगते हैं। आर्थिक तंगी इसकी मुख्य वजह है। सेकेंडरी यानी 12वीं तक केवल 4.2 फ़ीसदी बच्चे पहुंच पाते हैं। उच्च शिक्षा का मुस्लिमों का आंकड़ा भयावह है। महज़ 3.1 युवक स्नातक तक पहुंचते हैं। 2011 के आईएएस में 203 चयनित उम्मीदवारों में महाराष्ट्र का एक ही मुस्लिम युवक था, जबकि आईपीएस में चुने गए 302 लोगों में महाराष्ट्र से बस चार मुस्लिम युवक थे। राज्य की फडनवीस सरकार इसकी वजह मदरसा कल्चर मानती है।
रिपोर्ट के मुताबिक़, राज्य में मुस्लिम लड़कियों के शिक्षा का आंकड़ा तो निराश करने वाला है। महज़ एक फ़ीसदी लडकियां कॉलेज तक पहुंचती हैं। उच्च शिक्षा हासिल न कर पाने से वे पुरुषों का अत्याचार सहती हैं। उनके शौहर विरोध के बावजूद एक से ज़्यादा निकाह कर लेते हैं। 2006 की थर्ड नैशनल फैमिली हेल्थ सर्वें के मुताबिक़, 2.55 फ़ीसदी मुस्लिम महिलाओं के पतियों के पास एक से अधिक बीवियां हैं, जबकि हिंदुओं में यह आंकड़ा 1.77 फ़ीसदी है। राज्य में मुसलमानों में दूसरे समुदायों की तुलना में अविवाहितों, तलाकशुदा और विधवाओं की संख्या बहुत ज़्यादा है। वैसे राष्ट्रीय स्तर पर मुस्लिमों में मैरिटल स्टैटस महज़ 29 फ़ीसदी है।
मुस्लिम समाज की बदहाली के लिए और ढेर सारे कारक ज़िम्मेदार हो सकते हैं, लेकिन इस पिछड़ेपन के लिए मदरसा कल्चर काफी हद तक ज़िम्मेदार ज़रूर है। रिपोर्ट के मुताबिक ग्रामीण इलाकों में 33 फ़ीसदी बच्चे उर्दू पढ़ते हैं,तो शहरों में क़रीब आधे (49 प्रतिशत) बच्चों को उर्दू की तालीम दी जाती है। मदरसे में अंग्रेज़ी पढ़ने वाले छात्रों का प्रतिशत नहीं के बराबर है। 96 फ़ीसदी स्टूडेंट्स जनरल स्टडी करते हैं। महज़ 4 प्रतिशत ही तकनीकी संस्थानों में जाते हैं। वोकैशनल एजुकेशन का परसेंटेज तो नहीं के बराबर यानी 0.3 फ़ीसदी है। इसके लिए भी मदरसों के सिलैबस को ही कसूरवार ठहराया जा सकता है। रिपोर्ट यह भी कहती है कि सरकारी ही नहीं, निजी संस्थानों में भी मुसलमानों को बहुत कम नौकरियां मिलती हैं। 
इस तरह उर्दू मीडिया को छोड़ दें तो बाक़ी मीडिया जैसे बौद्धिक संस्थानों में भी इक्का-दुक्का मुस्लिम पत्रकार मिलते हैं। महमूदुर रहमान कमेटी का निष्कर्ष है कि महाराष्ट्र में वाक़ई बहुमत में मुसलमानों की हालत बहुत दयनीय है। यही तर्क देते हुए सच्चर कमेटी भी मुस्लिम समाज के विकास पर ख़ास ध्यान देने की बात कहती है। संभवतः इसी तरह की फाइंडिंग्स के आधार पर 2007 की जस्टिस रंगनाथ मिश्रा कमेटी ने मुसलमानों को नौकरी में 10 फ़ीसदी आरक्षण देने की पैरवी की है। मज़ेदार बात यह है कि हर नेता अपने आपको मुसलमानों का हितैषी बताता ही नहीं मानता भी है, इसके बावजूद मुसलमानों के जीवनस्तर को बेहतर बनाने वाली सभी सिफ़ारिशें फ़ाइल्स के नीचे दबी धूल खा रही हैं। 
दरअसल, यह समस्या मुस्लिम समाज की है। लिहाज़ा, हल करने के लिए उसे ही आगे आना होगा। मुस्लिम समाज को यह स्वीकार करना पड़ेगा कि कोई न कोई वजह तो है जिसके कारण देश में हर क्षेत्र में मुसलमान दूसरे समुदाय से पिछड़ रहे हैं और समस्या के रूप में इसे चिन्हित किए बिना, हल नहीं निकाला जा सकता है। मुंबई के पत्रकार आबिद नक़वी भी राज्य के मदरसों के आधुनिकीकरण और उनकी शिक्षा आम स्कूलों जैसी करने की ज़ोरदार पैरवी करते हैं, हालांकि नक़वी यह भी कहते हैं कि महाराष्ट्र में मदरसों में पढ़ने वाले बच्चे दूसरे मुस्लिम देशों के मदरसों में पढ़ने वाले बच्चों जितने कट्टर नहीं होते। हालांकि, अशिक्षा, ग़रीबी और बेरोज़गारी के कारण युवक अपराध या आतंकवाद की ओर उन्मुख हो रहे हैं और इसमें मदरसों के योगदान को पूरी तरह रूल्डआउट नहीं किया जा सकता है। कम से कम इसी बिंदु पर महाराष्ट्र की बीजेपी-शिवसेना सरकार के फ़ैसले का बहुत ज़्यादा विरोध पूरी तरह सही नहीं जान पड़ता।

सोमवार, 29 जून 2015

...तो क्या खत्म हो रहा है “आप” का तिलिस्म!

हरिगोविंद विश्वकर्मा 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उनकी कैबिनेट और ख़ुद बीजेपी वह सब कर रहे हैं, जिसे तानाशाही कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगा।  जनता द्वारा निर्वाचित सरकार को संविधान या क़ानून का हवाला देकर कोई फ़ैसले न लेने देना, एक तरह से अघोषित आपातकाल है। ऐसी मिसाल केवल 1975 में मिली थी, जब कई निर्वाचित सरकारों को इंदिरा गांधी ने बर्खास्त कर दिया था। दिल्ली में अप्रत्यक्षरूप से वहीं हो रहा है, जो दिल्ली की जनता की इनसल्ट है। 
उपराज्यपाल नज़ीब जंग जो कुछ कर रहे हैं, उसे बीजेपी या उसके शासन के बेनिफिशियरीज़ लोगों के अलावा दूसरा कोई अप्रूव नहीं कर सकता। नज़ीब केंद्र के इशारे पर लोकतांत्रिक ढंग से निर्वाचित सरकार को काम नहीं करने दे रहे हैं। हर कोई समझ रहा है कि मोदी की अगुवाई में केंद्र दिल्ली सरकार और दिल्ली की जनता के साथ खुला पक्षपात और बेइमानी कर रही है। हालांकि इसे अरविंद केजरीवालदिल्ली की जनता से बदला लेना क़रार दे रहे हैं, लेकिन खुले पक्षपात और बेइमानी पर न तो दिल्ली में, न ही देश में, किसी का ख़ून खौल रहा है। लोग एकदम चुप हैं, कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं कर रहे हैं। इसका मतलब यह भी है कि लोग जान गए हैं कि आम आदमी पार्टी यानी आप और केजरीवाल भी दूध के धुले नहीं हैं।  लिहाज़ा, न तो आप को न ही केजरीवाल को जनता की सहानुभूति नहीं मिल रही है।  
दरअसल, दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले आम आदमी पार्टी को लोग ऐसी राजनीतिक पार्टी मानते थेजो दूसरी मुख्य धारा की पार्टियों से एकदम अलग थी। अलग तरह की राजनीति करने वाली पार्टी थी। लोग मानते थे, यह एकमात्र पार्टी है, जिसकी कथनी करनी में कोई अंतर नहीं है। मसलन, हर मुद्दे पर इस नवोदित राजनीतिक पार्टी का नज़रिया और नीति अलग दिखता था।  मसला अपराधियों को राजनीति से दूर रखने की बात हो, चंदे में पारदर्शिता की या पार्टी में सुप्रीमो कल्चर की, हर मुद्दे पर आप का साफ़, सर्वमान्य और लोकतांत्रिक रवैया था, जिसका इंपैक्ट सीधे आम जनता पर होता था।  जनता मानती और समझती थी कि बीजेपी या कांग्रेस जैसी दूसरी पार्टियां आप को ख़त्म करने की साज़िश में लगी हुईं हैं, ताकि पिछले 68 साल से जिस तरह की राजनीति ये पार्टियां करती आई हैं, वह बदस्तूर जारी रहे।  यही वजह है कि एसेंबली इलेक्शन में तमाम मीडिया सर्वेक्षण को दर किनार करते हुए जनता ने आप को वह अभूतपूर्व मैंडेट दिया जिसकी किसी राजनीतिक पंडित ने कल्पना भी नहीं की थी।  इसके बाद आप संयोजक केजरीवाल जनता के चीफ़ मिनिस्टर के रूप में शपथ ली।  
शपथ लेते समय अरविंद ने अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं से अपील करते हुए कहा था, कुछ भी हो किसी भी क़ीमत पर अपने ऊपर अंहकार को हावी मत होने देना, क्योंकि इसी अहंकार ने बीजेपी और कांग्रेस का बेड़ा गर्क किया है।  अरविंद की यह बात लोगों को बहुत पसंद आई। दिल्ली की जनता को धन्यवाद दिया कि उसके फ़ैसले से क़रीब सात दशक बाद ही सही, कम से कम ऐसा आदमी और ऐसी पार्टी तो सत्ता में आई, जिसे जनता का नुमाइंदा या जनता की पार्टी कहा जा सकता है।  राजनीतिक हलकों में सुगबुगाहट होने लगी कि मुमकिन है 2019 का आम चुनाव नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी न होकर नरेंद्र मोदी बनाम अरविंद केजरीवाल हो।  
बहराहल, शपथ लेते ही अरविंद ने पहले फ़ैसले में आप का संयोजक बने रहने का फ़ैसला किया।  लोग हैरान हुए, एक व्यक्ति एक पदकी बात करने वाली पार्टी में यह क्या हो रहा है।  अरविंद क्या-क्या करेंगे?दिल्ली की समस्याएं हल करेंगे या आप संगठन को राष्ट्रीय स्तर पर खड़ा करेंगे। अरविंद ने दूसरे फ़ैसले में मनीष सिसोदिया को डिप्टी सीएम बना दिया। लोग फिर असहज़ हुए, छह लोगों के छोटे से मंत्रिमंडल में डिप्टी सीएम की क्या ज़रूरतख़ैर, इसे भी नज़रअंदाज़ कर दिया गया।  अरविंद का तीसरा फ़ैसला आया, उनके कैबिनेट में किसी महिला के न होने का।  लोग तीसरी बार हैरानी हुए, छह महिलाएं विधायक चुनी गई हैं, उनमें एक भी ऐसी नहीं जो सरकार में महिलाओं को रिप्रजेंट कर सके।  
 इसी तरह अरविंद का चौथा फ़ैसला था, जीतेंद्र तोमर जैसे संदिग्ध डिग्रीहोल्डर को विरोध के बावजूद टिकट देना और फिर मंत्री बनाना।  लोग समझ नहीं पाए, किस आधार पर अरविंद संदिग्ध नेता को इतना प्रमोट कर रहे हैं।  तोमर की फ़र्ज़ी डिग्री का मामला चुनाव में ही सुर्खियों में आ गया था।  कहा तो यह भी गया कि प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव से अरविंद के मतभेद की वजह तोमर की फ़र्ज़ी डिग्री ही थी।   बहरहाल, इसके बावजूद अरविंद ने सीबीआई डायरेक्टर रंजीत सिन्हा जैसे हाईप्रोफाइल अधिकारी को बेनक़ाब करने वाले प्रशांत जैसे नेता की कीमत पर तोमर जैसे लोगो को गले लगाया।  
इसके बाद तो जो हुआ, उसकी किसी ने कल्पना तक नहीं की थी।  संजय सिंह, दिलीप पांडे, आशुतोष गुप्ता और आशीष खेतान जैसे लोग आप के तीन स्तंभों, अरविंद-योगेंद्र और प्रशांत, में से दो योगेंद्र और प्रशांत के ख़िलाफ़ बयान दिया। किसी के समझ में ही नहीं आया, यह क्या हो रहा है।  आंतरिक लोकतंत्र की बात करने वाली पार्टी में यह सब क्या है? अरविंद ने तो अहंकार को दूर रखने की बात की थी।  फिर आप की दूसरी पंक्ति के नेताओं में यह अहंकार कहां से आ गया। बयानों से साफ़ हो गया कि भारतीय राजनीति मेंआपजैसी आदर्शवादी पार्टी के लिए कोई जगह नहीं है,  इसलिए, आप भी सुप्रीमो कल्चर को वहन कर रही है। यानी केजरीवाल पार्टी में सुप्रीमो बन रहे हैं।  आप यहीं बीजेपी, कांग्रेस, एसपी, बीएसपी, शिवसेना, आरजेडी, टीएमसी और एआईडीएमके की क़तार में आ गई, जहां पहले से सुप्रीमो कल्चर है।  जैसे कोई बीजेपी में मोदी, कांग्रेस में सोनिया, एसपी में मुलायम, बीएसपी में मायावती, शिवसेना में ठाकरे, आरजेडी में लालू और टीएमसी में ममता और एआईडीएमके में जयललिता से मत-भिन्नता रख कर नहीं रह सकता, उसी तरह अब साफ़ हो गया कि केजरीवाल से मत-भिन्नता रखने वाले की आप में कोई जगह नहीं।
बहरहाल, इन विवादों के बीच अरविंद मौन रहे और इलाज के लिए बंगलुरु चले गए। तभी उनका ऐसा स्टिंग आया, जिससे उनकी पर्सनॉलिटी कल्ट ही ख़त्म हो गई।  आदर्शवाद और संस्कार की बात करने वाले अरविंद के मुंह से गाली पूरे देश ने सुनी, वह भी प्रशांत, योगेंद्र और आनंद कुमार जैसे सौम्य लोगों के लिए। किसी को यक़ीन ही नहीं हुआ, लेकिन यह सच था।
दिल्ली की सत्ता छोड़ने के लिए क़रीब हर मंच से माफ़ी मांगने वाले अरविंद ने उस धृष्टता पर एक बार भी ख़ेद व्यक्त नहीं किया।  उल्टेआप के दो स्तंभों को दूध की मक्खी तरह निकाल फैंका गया।  लोगों ने महसूस किया कि आप भी वह सब कर रही है , जो बीजेपी और कांग्रेस जैसी पार्टियां पिछले कई दशक से करती आ रही हैं।  पार्टी की साख़ पर सबसे बड़ा धब्बा क़ानून मंत्री रहे तोमर की गिरफ़्तारी ने लगाया।  जैसे, बीजेपी निहालचंद मेघवाल और स्मृति ईरानी या कांग्रेस रॉबर्ट वॉड्रा को डिफेंड करती रही है,  उसी तरह अरविंद औरआप ने तोमर का गिरफ़्तारी होने तक बचाव किया।  अब तोमर से जुड़े सवालों का अरविंद जवाब क्या देंगे।  ज़ाहिर है, तोमर के मामले में वह भी दूसरे करप्ट या संदिग्ध नेताओं का नाम लेंगे।  जैसे, उत्तर प्रदेश की क़ानून व्यवस्था का ज़िक्र होने पर एसपी नेता दिल्ली या दूसरे राज्यों के क्राइम डेटा पेश करने लगते हैं।
सबसे अंत में आया सीनियर लीडर और विधायक सोमनाथ भारती की कथित तौर पर अपनी पत्नी के साथ मारपीट. का मामला। आप जैसी पार्टी के नेता पर उसकी ही पत्नी उत्पीड़न का आरोप लगाए, यह विचलित करने वाली बात रही।  कुल मिलाकर निष्कर्ष यह निकला कि आप के नेताओं का कैरेक्टर बाक़ी दलों के नेताओं जैसा ही है।  ये लोग आदर्शवाद की ऐक्टिंग कर रहे थे जो अंततः बेनक़ाब हो गया।
अरविंद बिजली सस्ती या पानी मुफ़्त में देकर एक ख़ास तबक़े की वाहवाही भले लूट लें, लेकिन यह लंबी राजनीति के कारगर नहीं होगा।  यह हज़ार-दो हज़ार रुपए रिश्वत लेने वालों को पकड़ने और करोड़ों रुपए का ग़बन करने वालों को क्लीनचिट देने जैसा है।  दिल्ली की जनता ने उन्हें एक शानदार मौक़ा दिया था, जिसे उन्होंने अपने अहंकार और अपने चमचों की बात मानकर गंवा दिया।  इस समय पुराने अरविंद की ज़रूरत थी।  ख़ासकर ऐसे समय, जब केंद्र में सरकार की सारी ताक़त एक आदमी के हाथों में केंद्रित होती जा रही है।  विरोध के हर तरीक़े पर लगाम ही नहीं लग रहा है, बल्कि विरोध के हर स्रोत को सुनियोजित ढंग से नष्ट भी किया जा रहा है।  हर मीडिया हाउस एक ही व्यक्ति के अधिनायकवाद का गुणगान कर रहा है।  लोकपाल को कूड़ेदान में फेंक दिया गया है।  
कई संवैधानिक संस्थान मुखियाविहीन हैं।  एक रिटायर चीफ़ जस्टिस को राज्यपाल बनाकर न्यायपालिका को भ्रष्ट करने की ग़लत परंपरा शुरू कर दी गई है,  जो भी हो, मोदी ने अरविंद की अपरिपक्वता के चलते उन्हें दिल्ली में उलझा दिया है क्योंकि अरविंद ने अपने को दूसरे नेताओं की पंक्ति में ही लाकर खड़ा किया जिससे उनका ही नहीं दल का भी परसनॉलिटी कल्ट ही ख़त्म हो गया।  अरविंद की ज़िद नेआप को क्षेत्रीय पार्टी बनाकर रख दिया।

बुधवार, 17 जून 2015

सखी: स्त्री की कोमल भावनाओं का सफर

हरिगोविंद विश्वकर्मा

'सखी' : स्त्री की कोमल भावनाओं का सफर


कहा जाता है कि संगीत वह खजाना है जहां इंसान को भावनात्मक संतुष्टि मिलती है। तभी तो जब कभी कोई ख़ूबसूरत गाना हमारे कर्ण-पटल से टकराता है तो सब कुछ थम-सा जाता है और हम उस गीत में खो से जाते हैं। आंखें बंद करके उस गीत को अपने अंदर समाने देते हैं। नवोदित गायिका-गीतकार-संगीतकार रिमि बसु सिन्हा की 'सखी' एक ऐसी ही पेशकश है। एलबम में कुल नौ भावना-प्रधान गीत समाहित हैं। सभी गीतों के बोल जितने खूबसूरत हैं, गायिकाओं ने अंतरमन की छूने वाली आवाज़ से उसी तरह सराबोर किया।
सही मायने में अगर इस एलबम को उपन्यास कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। इसकी परिकल्पना, लेखन और संगीत रिमि ने ख़ुद तैयार किया है। यह अनोखा प्रयास नारीत्व को ख़ास तरीक़े से सेलिब्रेट करने की कोशिश है और नारी-रचनाधर्मिता का उत्सव भी। यह केवल स्त्रियों के जरिए ही मूर्त रूप देने का कॉन्सेप्ट है। भारतीय संगीत-जगत में इस तरह की यह पहली कोशिश है। इसमें शामिल हर गाने स्त्री की ही सोच हैं, स्त्री के ही अल्फ़ाज़ हैं और स्त्री द्वारा ही सुर में पिरोये गए हैं। चार पीढ़ी की नामचीन और समर्थ नायिकाओं ऊषा मंगेशकर, कविता कृष्णमूर्ति, केएस चित्रा, सुनिधि चौहान, रिचा शर्मा, महालक्ष्मी अय्यर, ऐश्वर्या मजुमदार और खुद रिमि बसु सिन्हा ने इन भावना-प्रधान कर्णप्रिय नग़मों को अपनी जादुई आवाज़ से सराबोर किया हैं।
मसलन, इस मनोहारी संगीत के सफ़र का आग़ाज़ ‘सुन सखी...’ गीत से होता है। इसमें स्त्री ने बताने की कोशिश की है कि वो कितना कुछ कहना चाहती है, सुनना और बांटना चाहती है। तभी तो ईश्वर ने उसे भावना-प्रधान बनाया है और ये कोमल भावनाएं सबको जोड़कर रखती हैं। चित्रा की गायिकी और भाव में सच्ची सखी दिख ही जाती है। अगला पड़ाव ‘दिम तान ना...’ गीत है जिसमें स्त्री आशा का दूत के किरदार में है। वह हर तरफ़ ख़ुशी और उल्लास फैलाना चाहती है। ताकि दुनिया के हर कोने से मोहब्बत की धुन सुनाई पड़े। सुनिधि की सम्मोहित करने वाली आवाज़ इस गीत के साथ हमें उसी दुनिया में ले जाती है।
रिमि बसु सिन्हा
रिमि बसु सिन्हा
इस सुहाने सफ़र का तीसरे ठहराव पर ‘दिल के अरमानों की बात...’ है जिसमें स्त्री के बचपन से तरुणाई तक का अंतरद्वंद्व है। दरअसल, कभी-कभी कितना वक़्त गुज़र जाता है ,स्त्री कितनी चाहत बटोर के रखती है, कितना कुछ करना  चाहती है मगर उलझनों की बेड़ियों से मुक्त नहीं हो पाती। उसके अरमान जस के तस रह जाते हैं। वक्त बहुत पीछे छूट जाता है। खुद को खोजने वाले इस गाने को बेहद ही अलग तरह से तैयार किया गया है। अलग तरीके का इस्तेमाल इसलिए किया गया है क्योंकि यह आमतौर पर बहुत कम प्रयोग किया जाने वाले नौ मात्रे के ठेके राग अहीर भैरव पर आधारित है। इस गीत को कविता कृष्णमूर्ति की खनकती आवाज़ ने यादगार बना दिया है।
सफ़र के अगर चौथे गीत ‘नैना जागे...’ की बात करें तो सूफ़ियाना अंदाज़ में पिरोए गए इस नग़मे में स्त्री के सुंदर नयन अपने प्रेरणास्वरूप इष्ट की बात करते हैं। संगीत के कद्रदान बस अपनी आंखें बंद करें और गायिका रिचा के साथ स्त्री के हसीन नयनों की महत्ता, बंद-खुले नयन के सौंदर्य का ख़ूबसूरत दीदार करें। संगीतमय सफ़र का अगला गाना ‘कुछ ना सामझ पाए...’ स्त्री के कमसिन मन की दुविधा, नासमझी, नादानी और भावनाओं के तानेबाने को उकेरता है। नए रिश्ते तलाशती स्त्री का अल्हड़पन में किसी से रिश्ता जुड़ जाना बेहद सहज है। यही थीम है इस संवेदना से छलकते गाने की जो राग खमाज पर आधारित है। महालक्ष्मी की जादुई आवाज़ ने तो इसमें चार चांद लगा दिया है।
अगले मुकाम गीत ‘बोले क्या...’ पर संगीतप्रेमी स्त्री के श्रृंगार पक्ष से रूबरू होते हैं। स्त्री और श्रृंगार एक दूसरे के पूरक हैं। मगर भावनाओं के साथ श्रृंगार का अर्थ भी बदलता रहता है। किसी अपने के लिए श्रृंगार करने में अधिक आनंद आता है। संबंधों के खोने या छूटने से मन तड़पता है, आत्मसम्मान के टूटने से डर लगता है। इसी भावना को संगीतमय बनाया है ऊषा मंगेशकर की सुरीली आवाज़ ने।
अगले गीत का शीर्षक है ‘जो ज़िंदगी की जंग हार रहा है...’ दरअसल, जीवन में गाहे-बगाहे कुछ ऐसी घटनाएं हो जाती है जो विचलित कर देती है। इस गीत में बालिका के रूप में स्त्री ख़ुद कुछ सवाल करती है अपने सपने का साकार करने की बात करती है। बालिका की भावनाओं को अभिव्यक्ति दी है बाल गायिका ऐश्वर्या ने संगीत के सफ़र का आठवें पायदान पर है ‘मेरे मन का पंछी...’ यह स्त्री की प्रेरणा को अभिव्यक्ति देता है। हिंदुस्तानी राग भीम पलासी पर आधारित यह इस गीत को ख़ुस रिमि की मीठी आवाज ने इतना ख़ूबसूरत बना दिया है कि बार बार सुनने का मन करता है। एलबम को अंजाम तक पहुंचाया है ‘नए सपने...’ ने। न जाने कितने बरस का बहुप्रतीक्षित सपना जब साकार होता है तो स्त्री कितनी आत्मविभोर हो जाती है। यह गाना सुनकर पता चलता है। यह गीत सभी गायिकाओं से सम्मिलित स्वर में तैयार किया गया है।
सांस्कृतिक नगरी इलाहाबाद के अति-प्रतिष्ठित बंगाली परिवार में जन्मी रिमि संगीत और नाटक के माहौल में ही पली-बढ़ी। आठ साल की कोमल उम्र से ही संगीत सिखना शुरू किया और जल्द ही शहर के सांस्कृतिक समारोहों का हिस्सा बन गईं। शहर ही नहीं राज्य के अनगिनत संगीत जलसों में स्कूल का प्रतिनिधित्व किया और कई पुरस्कार जीते। 15 साल की उम्र में आकाशवाणी कलाकार बन गईं। फ़िलहाल, वह आकाशवाणी और दूरदर्शन की शीर्ष कलाकारों की फ़ेहरिस्त में हैं।
हिंदुस्तानी संगीत रिमि का हमेशा से पैशन-सा रहा है। इसीलिए दसवीं में इसे एक विषय के रूप में लिया। नामचीन संगीतकार स्वर्गीय बीएन बिस्वास से संगीत की बारीकियां सीखीं। गायन-संगीत में उनकी दीवानगी देखकर उनके माता-पिता ने उन्हें स्नातक में भी संगीत लेने के लिए प्रोत्साहित किया। यही वजह रही कि रिमि ने गुरु पं. रामाश्रय झा और कमला बोस के मार्गदर्शन में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदुस्तानी संगीत में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय सांस्कृतिक प्रतियोगिता में सर्वश्रेष्ठ गायिका का पुरस्कार भी जीता। वह प्रयाग संगीत समिति इलाहाबाद से संगीत प्रभाकर और सीनियर डिप्लोमा भी हासिल करने में सफल रहीं।
1992 में दिल्ली में शिफ़्ट होने के बाद रिमि टीवी सीरियल्स और फ़िल्मी दुनिया में सक्रिय हो गईं। कई मशहूर ब्रैंड के लिए खनकती आवाज़ में अनेक भाषाओं में कई टाइटल ट्रैक्स, गाने और जिंगल्स रिकॉर्ड कराए और सीरियल्स, शॉर्ट फ़िल्म्स, डॉक्यूमेंटरी के लिए टाइटल गानों को स्वर दिया। वॉइस-ओवर शुरू से उनकी हॉबी रही और डिस्कवरी चैनल्स और कई सरकारी परियोजनाओं के नामचीन वृत्तचित्रों में अपनी आवाज़ से चार चांद लगाया। इसके अलावा वह कई मशहूर म्यूज़िकल शोज़ में हिस्सा लेने लगीं।
1999 में एचएमवी ने रिमि की आवाज़ को अपने नए भोजपुरी प्रॉजेक्ट के लिए चुना जिसे बेहद लंबे इंतज़ार के बाद लॉन्च किया गया। बहरहाल, ‘जाने हमरी बिंदिया’ टाइटल वाला सोलो-एलबम बेहद लोकप्रिय हुआ और राष्ट्रीय स्तर पर कवरेज मिली। नतीजतन एचएमवी ने अगले प्रॉजेक्ट में उन्हें साइन करने में रुचि दिखाई मगर पति की कीनिया की राजधानी नैरोबी में पोस्टिंग हो जाने से उन्हें देश से बाहर जाना पड़ा।
रिमि 2000 में नैरोबी गईं और चार साल तक वहां रहीं। कहते हैं चांद जहां भी रहेगा अपनी चांदनी तो बिखेरेगा ही। रिमि नैरोबी की संगीत दुनिया में भी सक्रिय हो गईं। वहां हिंदुस्तानी संगीत और सांस्कृतिक समारोह का बढ़ावा दिया और कई कद्रदान बनाए। जल्द ही इस अफ्रीकी शहर के संगीत फ़लक पर अपने लिए अहम मुकाम बना लिया। नैरोबी लोकल एफ़एम चैनल की बेहद जानी-पहचानी उदघोषिका बन गईं। गणतंत्र दिवस, गांधी जयंती जैसे राष्ट्रीय पर्वों पर भारतीय दूतावास की ओर से हिंदी भाषा में आयोजित स्टेज शोज़ और लाइव रेडियो प्रोग्रोम्स प्रस्तुत किए और उनका निर्देशन किया। वहां रिमी ने संगीत ही नहीं हिंदी में अपनी ज़बरदस्त रचनाशीलता का लोहा मनवाया। वसंत उत्सव और महिषासुर मर्दिनी जैसे प्रोग्राम्स की रूपरेखा बनाई, उन्हें लिखा और निर्देशन करते हुए सफलतापूर्वक पेश भी किया जिसे भारतीय दूतावास ने प्रायोजित किया। वहां रिमि ने लाइव प्रोग्राम्स पेश करने का नया ट्रेंड भी सेट किया। होली, रामनवमी, वैसाखी, महावीर जयंती, रमज़ान आदि के मौक़े पर पेश किए जाने वाले गीत के साथ ख़ूबसूरत काव्यमय स्क्रिप्ट और शेरो-शायरी जोड़कर उसमें जादू भर दिया। कुल मिलाकर उन्होंने विदेश में भारत की समृद्ध धर्मनिरपेक्ष परंपरा को आगे बढ़ाया जिसे समूचे अफ्रीका में एशियाई समुदाय के लोगों ने सराहा। रिमि ने भारतीय दूतावास की ओर से संगीत मर्मज्ञ पं. जसराज का मैराथन इंटरव्यू लिया जो नैरोबी के लोकप्रिय लोकल रेडियो पर प्रसारित भी हुआ। इसके अलावा वह कीनिया की चिन्माया मिशन सेवा ट्रस्ट से जुड़ीं और नैरोबी में अंतरराष्ट्रीय समागम पर उनका एलबम ‘भक्ति’ कंपोज़ किया जिसकी मांग जो आज भी उसी तरह है।
कीनिया में भारतीय संस्कृति और संगीत को बढ़ावा देने के अभियान में रिमि के अद्भुत योगदान को देखते हुए ही भारतीय दूतावास ने उन्हें गांधी जयंती पर संयुक्त राष्ट्रसंघ के नैरोबी स्थित अफ्रीकी मुख्यालय में संगीत उत्सव आयोजित करने की दावत दी जो बेहद सफल रहा। किसी प्रवासी का यह दुर्लभ करतब है जिसके चलते कीनिया में भारतीय दूतावास की ओर से रिमि का सम्मान किया गया। बेशक, रिमि की विविधता ही उनकी ख़ासियत है। ‘सखी’ से पहले टाइम्स म्यूज़िक ने कुमार शानू के साथ एलबम ‘मैया का दरबार’ रिलीज़ किया। फ़िलहाल रिमी मुंबई में हैं और देश की आर्थिक राजधानी में अपनी गायन और कॉम्पोज़िशन क्षमता के बल पर ख़ुद को पूर्ण संगीतकार के रूप स्थापित करने के लिए प्रयासरत हैं।
लेखक हरिगोविंद विश्वकर्मा फोकस टीवी, हमार टीवी के मुंबई ब्यूरो के चीफ हैं. 

मंगलवार, 9 जून 2015

व्यंग्य - मेरे देश के कुत्ते..... मेरे देश के कुत्ते !!!


हरिगोविंद विश्‍वकर्मा
सुबह-सबेरे घर से बाहर निकलकर मैं सड़क पर आया। स्टेशन तक पैदल जाने के मूड में था। उसी समय भौंकते कुत्तों का एक समूह मुझ पर टूट पड़ा। एक बार तो मैं तो बुरी तरह डर गया, क्योंकि इधर मुझे लगने लगे कि कुत्ते भी आदमी की तरह हो गए हैं। एकदम ख़ुदगर्ज़। सेल्फ़-ओरिएंटेड। उनमें इंसानियत, नहीं-नहीं, कुत्तियत नाम की चीज़ नहीं रह गई है। कहीं मुझे काट न लें। जिन कुत्तों में कुत्तियत नहीं उनका कोई भरोसा नहीं।

दरअसल, न्यूज़ चैनल में नौकरी के अंतिम दिनों में अल-सुबह की ड्यूटी लगा दी गई। पता नहीं, अनजाने में या अंतिम दो तीन दिन परेशान करने के लिए। जब ड्यूटी चार्ट बन गया तो दफ़्तर जाना ही था। जब सब सो रहे थे, तब उठना अच्छा बिलकुल नहीं लगा। मगर, मजबूरी थी। ना, नहीं कर सकता था। बहरहाल, इसी बहाने सुबह-सबेरे लंबे समय बाद ग्रामसिंहों से मुलाक़ात हो गई। लेकिन सारे ग्रामसिंह पाकिस्तान-मोड पर थे। यानी अपनी जगह से मुंह से ही मुझ पर गोली दाग़ रहे थे। यह अलग बात थी कि उनके भौंकने से मैं घायल नहीं हुआ।

-क्या है? मैंने ज़ोर से डांटा। कहीं सुना था, इंसान के चिल्लाने से अमूमन जानवर घबरा जाते हैं। अपनी आक्रामकता छोड़कर एकदम डिफ़ेंस पर आ जाते हैं।

मेरे डांटने का भौंक रहे एक कुत्ते पर अच्छा असर हुआ। शायद वह बहुत पहले एक बार मुझसे सुबह की ड्यूटी के दौरान मिल चुका था। मैंने तो नहीं, उसने ज़रूर मुझे पहचान लिया। वह फ़ौरन चुप हो गया। दुम हिलाता हुआ मेरी ओर लपका। मैं समझ गया, यह दुम हिला रहा है, यानी शांतिप्रिय है। शांतिप्रिय देश की तरह आक्रमण करने की इसमें हिम्मत इसमें नहीं है। लिहाज़ा, यह मुझसे फ्रेंडशिप करना चाहता है। कहने का मतलब इस कुत्ते ने मुझे ताक़तवर मान लिया।

-क्या है? दूर रहो! दूर रहो! मैं उस पर रहम दिखाने के मूड में नहीं था। लिहाज़ा, दोबारा डांट पिलाई। कुत्ते ने इसके बाद तो पूरी तरह से सरेंडर कर दिया। मेरा नेतृत्व स्वीकार कर लिया। उसकी नज़र लगातार मुझ पर थी। उसने मेरे चेहरे से ग़ायब होती आक्रामकता पढ़ ली। लिहाज़ा, लपक कर मेरे चरणों में आ गिरा। मेरे जूते चाटने लगा। मैंने सोचा, चलो यह तो मेरा चमचा बन गया। कोई बात नहीं। आम आदमी की तरह मुझे भी चमचे अच्छे लगते हैं। हां, चमचागिरी दूर से ही करें तब।

बहरहाल, उस कुत्ते की देखा-देखी बाक़ी कुत्ते भी मेरी शरण में आने लगे। किसी नेता-अफ़सर की तरह मेरे चमचों की संख्या बढ़ने लगी। कोई भी कुत्ता भौंक नहीं रहा था। यानी सबने सामूहिक रूप से मेरी प्रभुता स्वीकार कर ली थी। कुल नौ कुत्ते थे। नौ रत्न। सबने मुझे कमांडो की तरह घेर लिया। दो आगे, दो पीछे, दो दाएं और दो बाएं। नौवां कुत्ता बहुत आगे था। शायद मेरे लिए सेफ पैसेज़ बना रहा था। मैं किसी नेता की तरह कमांडोज़ के बीच निर्भय होकर पैदल रेलवे स्टेशन चला जा रहा था। अचानक सबसे आगे वाले कुत्ते का एनकाउंटर दूसरे मोहल्ले के कुत्तों से हो गया। उसने फ़ौरन यू-टर्न लिया और दुम दबाकर मेरी ओर लपका।

-क्या है? मैंने और ज़ोर से दूसरे मोहल्ले के कुत्तों को डांटा। मेरे सम्मान में सबके सब चुप हो गए। उन्होंने आपस में भी एक दूसरे पर भौंकना बंद कर दिया। मैं उस समय हैरान रह गया, जब देखा कि कुत्ते आपस में फुसफुसाकर कुछ कह रहे हैं। यानी कुत्तों ने आपस की सदियों पुरानी परंपरागत दुश्मनी छोड़ दी। कमाल है! इस बीच, मेरे मोहल्ले के कुत्तों ने मेरी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी दूसरे मोहल्ले के कुत्तों को सौंप दी और वे एक दूसरे को उचित स्थान पर सूंघकर वापस लौट गए। मैं आगे बढ़ता रहा। मेरी सुरक्षा अब दूसरे मोहल्ले के कुत्ते कर रहे थे। उसी तरह नौ रत्न। चारों ओर दो-दो कुत्ते। एक कुत्ता सबसे आगे था।

मेरे पदयात्रा की ख़बर जंगल के आग की तरह मुझसे पहले ही तीसरे मोहल्ले में पहुंच गई। वहां आदमियों में तो नहीं कुत्तों में ज़रूर हड़कंप मच गया। उनमें भौंका-भौंकी होने लगी। दो कुत्ते स्कॉटिंग कर रहे कुत्ते के पीछे दौड़े आ रहे थे। मैंने फिर बहुत ज़ोर से डांटा -क्या है? मैनर नाम की चीज़ नहीं है तुम कुत्तों में। कब तक लड़ोगे आपस में। मेरी बात मानो, मलाई खाना हो तो दुश्मनी भुला दो। एक हो जाओ। फ़ायदे में रहोगो। किसी सरकार की कृपादृष्टि मिल गई तो पीढ़ियां संवर जाएंगी।

मेरी बात का तीसरे मोहल्ले के कुत्तों पर भी ख़ासा असर हुआ। सब दुम हिलाते हुए मेरी शरण में आ गए। दोनों मोहल्ले के कुत्ते एक दूसरे को सूंघने लगे। इस कार्यक्रम के पूरा होने पर दूसरे मोहल्ले के कुत्ते भी स्वमोहल्ला वापस लौट गए। अब मैं तीसरे मोहल्ले के कुत्तों के संरक्षण में था। मोहल्ले के नौ कुत्ते मेरा बॉडीगार्ड बनने पर गौरवान्वित महसूस कर रहे थे। फूले नहीं समा रहे थे। मैं उऩकी सुरक्षा में आराम से स्टेशन की ओर चला जा रहा था।

अचानक मैंने स्टेशन के पास के मोहल्ले के कुत्तों के जागरण की आवाज़ सुनी। फिर मुझे सुखद आश्चर्य यह हुआ कि यहां भी कुत्ते एक दूसरे से लड़ नहीं रहे हैं, बल्कि प्यार का प्रदर्शन कर रहे हैं। एक दूसरे को सूंघ रहे हैं। स्टेशन के कुत्तों ने तीसरे मोहल्ले के कुत्तों को प्रेम के साथ विदा किया और मेरी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली।

अंततः इन सभी कुत्तों ने मुझे सकुशल रेलवे स्टेशन पर पहुंचा दिया। सभी कुत्ते मुझे प्लेटफ़ॉर्म तक छोड़कर वापस लौट गए। बस एक कुत्ता मेरी हिफ़ाज़त में प्लेटफ़ॉर्म पर ही खड़ा रहा। वह मेरे ट्रेन में सवार होने के बाद ही वापस लौटा।

ट्रेन में मुझे सीट मिल गई। बैठकर मैं कुत्तों के बारे में ही सोच रहा था। इतने ढेर सारे कुत्ते मेरी हिफ़ाज़त कर रहे थे। मैं कुत्तों का निर्विवाद नेता बन गया था। अचानक मेरे मन में ख़याल आया कि मुझे शांति का नोबेल पुरस्कार मिलना चाहिए। चार-चार मोहल्ले के कुत्तों के बीच शांति, प्रेम और भाई-चारा स्थापित करने के लिए। मेरे कारण कुत्तों ने अपनी परंपरागत दुश्मनी छोड़ दी। यानी मैं इंसानों में इंसानियत भले न जगा पाया होऊं परंतु कुत्तों में कुत्तियत ज़रूर जगा दिया। कुत्ते मेरे साथी बन गए। मैंने सुबह ड्यूटी लगाने के लिए सीनियर को धन्यवाद दिया। उन्होंने मुझे यह अहसास दिलाया कि मैं भी पदयात्रा करने वाला शांति की पूजारी हूं। कुत्तों का नेता हूं।

सोमवार, 8 जून 2015

मुंबई हिंदी पत्रकार संघः एक सुखद संयोग....

हरिगोविंद विश्वकर्मा
प्रस्तावित हिंदी पत्रकार संघ के गठन की प्रक्रिया चल रही है. इस संदर्भ में नब्बे के आरंभ के दशक की पत्रकारिता का ज़िक्र समीचीन होगा. तब मौजूदा प्रस्तावित हिंदी पत्रकार संघ के ज़्यादातर लोग कॉलेज में रहे होंगे. अस्सी के दशक के अंत और नब्बे के दशक के आरंभ में टेब्लायड सांध्य अखबारों का दौर शुरू हुआ. अश्विनी कुमार मिश्र का निर्भय पथिक पहला सांध्य दैनिक था. आदरणीय डॉ. राममनोहर त्रिपाठी अपने संपादन में दो बजे दोपहर अख़बार लेकर आए. जनसत्ता का संझा जनसत्ता(स्थानीय संपादक राहुल देव, प्रभारी सतीश पेंडणेकर) शुरू हुआ. निखिल वागले का आपलं महानगर और हमारा महानगर (संपादक, अनुराग चतुर्वेदी) आरंभ हुआ. शिवसेना भी पीछे नहीं रही. संजय निरुपम के संपादन में सांध्य दैनिक दोपहर का सामना शुरू हुआ. अचानक से शहर में हिंदी पत्रकारों का तादाद बहुत ज़्यादा बढ़ गई.

मैंने भी उस समय बस पत्रकारिता शुरू ही की थी. बहरहाल, नब्बे के दशक में अचानक शहर के क़रीब-क़रीब सभी हिंदी के पत्रकारों को लगा कि हर भाषा के पत्रकारों का संगठन है, लेकिन हिंदी पत्रकारों का कोई संघ नहीं है. तब मुंबई में अंग्रज़ी के लिए अंग्रेज़ी डॉमिनेटेड मुंबई प्रेस क्लब, मराठी के लिए मराठी पत्रकार संघ, गुजराती के लिए गुजराती पत्रकार संघ और उर्दू के लिए उर्दू पत्रकार संघ जैसे पत्रकारों के भाषाई फ़ोरम हैं लेकिन हिंदी पत्रकार संघ नहीं है. इसीलिए हिंदी पत्रकारों का एक संगठन खड़ा करने की मुहिम शुरू हुई.

बहरहाल, राहुल देव (जनसत्ता के स्थानीय संपादक) और विश्वनाथ सचदेव (नवभारत टाइम्स के स्थानीय संपादक) की अप्रत्यक्ष पहल पर मुंबई हिंदी पत्रकार संघ बनाने की कवायद शुरू हुई. बॉम्बे यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट (बीयूजे) में कई मीटिंग्स वगैरह हुईं. अंततः मुंबई हिंदी पत्रकार संघ अस्तित्व में आ गया. उसके लिए बीयूजे में विधिवत लोकतांत्रिक तरीक़े से चुनाव हुआ, जिसमें बतौर मतदाता मैंने भी वोट दिया. चुनाव में द्विजेंद्र तिवारी (जनसत्ता) अध्यक्ष और हरीश पाठक महासचिव (धर्मयुग, तब विश्वनाश सचदेव धर्मयुग के संपादक थे और उसे बंद करवाने तक संपादक वही रहे) निर्वाचित हुए.

उन दिनों मुलायम सिंह यादव पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे. वह मुंबई आए और उनके सम्मान में मुंबई हिंदी पत्रकार संघ ने इंडियन मर्चेंट चैंबर्स में एक कार्यक्रम किया. मुलायम सिंह ने उस कार्यक्रम में मुंबई हिंदी पत्रकार संघ को आर्थिक मदद के रूप में पांच लाख रुपए का चेक दिया. उस समय अयोध्या में कारसेवकों पर गोली चलवाने, उत्तराखंड की आंदोलनकारी महिलाओं से कथित बलात्कार और दैनिक जागरण अख़बार के ख़िलाफ़ समाजवादी पार्टी का हल्लाबोल आंदोलन के कारण मुलायम सिंह यादव की छवि इंडियन मीडिया में ठीक नहीं थी. लिहाज़ा, उनसे पैसे लेने पर मुंबई हिंदी पत्रकार संघ में गंभीर मतभेद हो गया. अंततः मुलायम सिंह यादव का पांच लाख रुपए नहीं लेने का फ़ैसला किया गया.

उसी दौरान शिवसेना का मुंबई की मीडिया से पंगा हो गया. दरअसल, आपलं महानगर (मराठी और हिंदी दोनों) ने शिवसेना के ख़िलाफ़ ख़बर छाप दी. बदले में शिवसैनिकों ने अखबार के दफ़्तर में तोड़फोड़ की और निखिल वागले पर हमला कर दिया. हमले के विरोध में शिवसेना भवन के सामने पत्रकारों ने विरोध प्रदर्शन किया. उसी समय शिवसैनिकों ने पत्रकारों पर हमला कर दिया जिसमें मणिमाला (नवभरत टाइम्स) और मिलिंद खांडेकर (दो बजे दोपहर) को गंभीर चोट लगी. इसके बाद मुंबई हिंदी पत्रकार संघ जनसत्ता और दोपहर का सामना के बीच शुरू शाब्दिक जंग में उलझ गया और धीरे-धीरे दम तोड़ दिया.

इसे संयोग ही कहेंगे कि पुराने जनरेशन के पत्रकारों और उनके संगठन ने वसूल का हवाला देते हुए मुलायम सिंह यादव से पांच लाख रुपए लेने से मना कर दिया, लेकिन नई जनरेशन के पत्रकार और उनका संगठन उनके बेटे अखिलेश यादव के मेहमान बनने वाले हैं. वैसे इस तरह के दौरे अकसर सरकारें अपने काम का एक्सपोज़र पाने के लिए कराती रहती हैं. उत्तर प्रदेश सरकार, झारखंड सरकार, केंद्र सरकार और जम्मू-कश्मीर सरकार के इस तरह के दौरे होते रहते हैं. जम्मू-कश्मीर सरकार तो पत्रकारों को वादियों की खूब सैर करवाती है. यह देशाटन तो है ही, अनुभव के लिहाज़ भी पत्रकार के लिए बेहरतरीन आयोजन होता है.

प्रस्तावित हिंदी पत्रकार संघ का कार्यक्रम जितना धांसू हुआ, उतना ही धांसू कवरेज (अख़बारी और वॉट्सअप, टीवी वाले इस तरह की ख़बर नहीं चलाते हैं) हो गई. मुंबई के सभी समाचार पत्रों के साथ लखनऊ तक के अख़बार (तरुणमित्र) में ख़बर छपी. जहां भी छपा, वॉट्सअप पर उसकी क्लिपिंग देखने को मिली. मुझे लगता है सभी साथी मुझसे सहमत होंगे.

प्रेस रिलीज़, पता नहीं किसने तैयार किया, परंतु शर्तिया किसी असाधारण प्रतिभा के धनी हिंदी पत्रकार ने ही गहन रिसर्च और मशक्कत के बाद तैयार किया होगा. ऐसा मेरा मानना है. इसीलिए उसकी लेखनी तस की तस हर अख़बार ने छाप दी, केवल हेडिंग पेज इंचार्ज ने अपने अनुसार लगाया. बस नवभारत अखबार अपवाद रहा, जिसने असाधारण प्रतिभा के धनी हिंदी पत्रकार द्वारा पत्रकार घोषित किए गए लोगों के अलावा कुछ और लोगों को पत्रकार करार देते हुए उनके नाम भी छाप दिए. वैसे, एक ही समाचार क़रीब-क़रीब सभी (नवभारत टाइम्स मैंने पढ़ा नहीं) हिंदी अख़बारों में पढ़ते-पढ़ते कई लोगों को तो यह समाचार कंठस्थ हो गया होगा. जो भविष्य मैं काम आएगा. इसके लिए शुभकामनाएं, ऐसी ही प्रेस रिलीज़ तैयार करके हिंदी पत्रकारिता का भला करते रहिए. सभी साथियों को इस शानदार आयोजन के लिए बधाई और कोटि-कोटि धन्यवाद.