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मंगलवार, 5 अप्रैल 2016

“भारत माता की जय” मत बोलें, पर शोर भी न करें कि “भारत माता की जय” नहीं बोलेंगे..

हरिगोविंद विश्वकर्मा
ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लमीन के प्रमुख और हैदराबाद से लोकसभा सदस्य असदुद्दीन ओवैसी ने पहले कहा, गर्दन पर छूरी रख दो तब भी भारत माता की जय नहीं बोलूंगा।अब पता नहीं उन्हें क्या हो गया है, जहां भी जाते हैं, वहां हिंदुस्तान ज़िंदाबाद या जय हिंद ज़रूर बोलते हैं, वह भी एक बार नहीं, कई-कई बार बोलते हैं। शायद अपनी ग़लती का एहसास हो गया है, इसीलिए, 29 मार्च को लखनऊ में अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने पांच बार "हिंदुस्तान ज़िंदाबाद" और पांच बार "जय हिंद" के नारे लगाए। कोई मांग नहीं रहा है फिर भी उन्होंने सफ़ाई भी दी वह देश भक्त हैं। हिंदुस्तान के शहरी हैं। अव्वल दर्जे के शहरी, लेकिन उन्हें किसी से देश भक्ति का सर्टिफिकेट नहीं चाहिए।

ओवैसी ही नहीं, देश में किसी नागरिक को किसी दूसरे नागरिक या संगठन से देशभक्ति का सर्टिफिकेट लेने की कोई ज़रूरत नहीं है। लिहाज़ा, कोई व्यक्ति या संगठन अपने को देशभक्त और दूसरे को अदेशभक्त भी नहीं कह सकता। भारतवासियों के मूल अधिकारों को महफूज़ रखने के लिए बनाए गए भारतीय संविधान में कहीं भी नहीं लिखा गया है कि सुबह उठकर सबसे पहले ज़ोर से भारत माता की जय बोलें या जो लोग भारत माता की जय बोलेंगे, केवल वही देशभक्त कहलाएंगे, बाक़ी देशभक्त नहीं कहलाएंगे। परंतु भारतीय संविधान के 395 अनुच्छेदों में कहीं भी कहीं नहीं लिखा है, कि सार्वजनिक तौर पर चिल्ला-चिल्ला कर या फतवा जारी करके कहें कि भारत माता की जय नहीं बोलेंगे।

सम्मान या भक्ति प्रदर्शित करने की चीज़ नहीं हैं, लोग स्वेच्छा से अपने माता-पिता और बड़ो के प्रति सम्मान और भक्ति प्रदर्शित करते हैं। अगर कोई बच्चा अपने माता-पिता या बड़ों का सम्मान न करें, तो वे लोग उससे यह नहीं कहेंगे कि सम्मान करो या भक्ति दिखाओ। देशभक्ति भी इसी तरह प्रदर्शित करने की चीज़ नहीं। वह सच्चे नागरिक, जिसे अंग्रेज़ी में सन ऑफ़ सॉइल कहते हैं, की पर्सनॉलिटी में इनबिल्ट होती है। इसलिए भारत माता की जय बोलिए या मत बोलिए, इस महान देश को कोई फ़र्क नहीं पड़ता। हां, गंभीर, समझदार और ज़िम्मेदार नागरिक पब्लिकली कोई ऐसी ओछी बातें नहीं करते, जिससे किसी को उसकी निष्ठा पर उंगली उठाने का मौक़ा मिले। इस मसले पर सहारनपुर के दारुल उलूम देवबंद ने फतवा जारी किया है कि मुसलमान वंदे मातरम् की तरह ही भारत माता की जय भी नहीं बोल सकते। मुफ़्तियों की खंडपीठ के मुताबिक़, इंसान को जन्म इंसान ही दे सकता है, तो धरती मां कैसे हो सकती है। मुसलमान अल्लाह के अलावा किसी की पूजा नहीं कर सकता तो भारत को देवी कैसे मानें। इसी आधार पर देवबंद ने कहा कि भारत माता की जय बोलना इस्लाम में नहीं है, लिहाज़ा मुसलमान भारत माता की जय नहीं बोलेंगे।

दरअसल, इस्माल की ग़लत व्याख्या करने वाले ये नीम हकीम मुफ़्ती हमेशा अपनी क़ौम का नुकसान करते रहे हैं। यहां इनका तर्क हैं कि लोग पृथ्वी को मां नहीं कह सकते, क्योंकि उन्हें पृथ्वी ने पैदा नहीं किया, बल्कि उन्हें उनकी मां ने पैदा किया है। यह बड़ी अजीब और हास्यास्पद हालत है। इन लोगों को कौन समझाए कि इंसान जिससे भोजन लेता है, उसी को मां कहता है। मां वस्तुतः परवरिश की सिंबल है। बच्चा पैदा होने के बाद जिस स्त्री का स्तनपान करता है, उसे मां कहता है। इसी तरह पृथ्वी यानी धरती भी मां हैं, क्योंकि ज़िंदगी भर इंसान भोजन धरती से लेता है। और धरती के हिंद महासागर क्षेत्र में कुल 3,287,263 वर्ग किलोमीटर भूभाग पर फैले हुए हिस्से को भारत, हिंदुस्तान और इंडिया कहा जाता है। चूंकि यही भूखंड यहां पैदा होने और पलने-बढ़ने वालों को भोजन देता है, इसलिए इस भूखंड को सम्मान से भारत माता कहा जाता है।

भारत माता यानी भारत एक राष्ट्र है। एक संपूर्ण स्वाधीन और लोकतांत्रिक राष्ट्र जो 29 राज्यों और सात केंद्र शासित क्षेत्रों में विभाजित है। इस भूखंड पर रहने वाला हर नागरिक केवल और केवल भारतीय यानी भारतवासी है। बिना किसी संदेह के भारतीयता इस देश में सबसे बड़ा धर्म है। कबिलाई कल्चर की तरह नहीं, बल्कि इस देश को एक सभ्य देश की तरह चलाने के लिए एक संविधान बनाया गया है, वह देश का सबसे बड़ा धर्मग्रंथ है। हिंदुत्व हो, इस्माल हो या फिर ईसाइयत या फिर दूसरा कोई धर्म, सभी धर्म भारतीयता नाम के इस धर्म के सामने बौने हैं। इसी तरह देश के धर्मग्रंथ यानी भारतीय संविधान के आगे गीता, क़ुरआन और बाइबल सबके सब दूसरी वरीयता के धर्म हैं। यही अंतिम सच है, इस पर तर्क-वितर्क की कोई गुंजाइश नहीं।

कोई नागरिक अगर हिंदू धर्म को भारतीयता से ऊपर और गीता को भारतीय संविधान से बड़ा मानता है, तो उसे ऐसी जगह या ऐसे देश में चले जाना चाहिए, जहां भारत, भारतीयता या भारतीय संविधान न हो। कोई नागरिक अगर इस्लाम को भारतीयता से ऊपर और क़ुरआन को भारतीय संविधान से बड़ा मानता है, तो उसे ऐसी जगह या ऐसे देश में चले जाना चाहिए, जहां भारत, भारतीयता या भारतीय संविधान न हो। इसी तरह अगर कोई नागरिक किसी दूसरे धर्म को भारतीयता से ऊपर और अपने धर्मग्रंथ को भारतीय संविधान से ऊपर मानता है, तो उसे भी ऐसी जगह या ऐसे देश में चले जाना चाहिए, जहां भारत, भारतीयता या भारतीय संविधान न हो। और जब तक इस भूखंड पर आप हैं, आप सबसे पहले भारतीय हैं, न कि हिंदू, मुस्लिम या ईसाई।

इस संप्रभु, सामाजिक और सेक्यूलर देश में हर नागरिक को लिखने, बोलने और धर्म मानने की पूरी आज़ादी मिली हुई है। बोलने-लिखने की आज़ादी इतनी ज़्यादा है कि लोग देश के सर्वोच्च शासक प्रधानमंत्री तक की आलोचना करते हैं। उसके फ़ैसलों से सार्वजनिक तौर पर असहमति जताते हैं। इसी आज़ादी के चलते आजकल देश का विभाजन व देश के टुकड़े करने की बात कहना, राष्ट्रगान या राष्ट्रीय गीत न गाना और भारत माता की जय न बोलने की बात करने का फैशन सा बन गया है। लिहाज़ा, असदुद्दीन ओवैसी के ख़िलाफ़ सार्वजनिक तौर पर भारत माता की जय नहीं बोलने का ऐलान करने के लिए कठोर कार्रवाई होनी चाहिए थी। ओवैसी ही नहीं, पब्लिकली ऐसे बयान देने वाले हर व्यक्ति का मताधिकार भी छीन लिया जाना चाहिए। यह पहल सुप्रीम कोर्ट को ही करनी होगी। देश से जुड़े ऐसे संवेदनशील मसले पर सुप्रीम कोर्ट को ख़ुद संज्ञान लेना चाहिए।


दरअसल, भारत माता की जय बोलने और न बोलने पर विवाद ही नहीं होना चाहिए था। आतंकवाद से मुसलमानों का पहले ही बहुत ज़्यादा नुकसान हो चुका है। लिहाज़ा, ख़ुद मुसलमानों को ही आगे आकर भारत माता की जय बोलने का विरोध कर रहे लोगों का सार्वजनिक तौर पर बहिष्कार करना चाहिए। वरना यह मसला मुसलमानों को मुख्यधारा से अलग-थलग कर सकता है। इतना ही नहीं, यदि मुसलमान चुप रहे तो यह संदेश देने की साज़िश भी की जा सकती है कि हर मुसलमन की यही भावना है, जबकि यह सच नहीं है। ओवैसी जैसे मुट्ठी भर लोगों को छोड़ दिया जाए तो देश का आम मुसलमान उसी तरह देशभक्त है, जिस तरह हिंदू। उसे किसी से देशभक्ति का प्रमाणपत्र लेने की ज़रूरत नहीं है। इस नाजुक मसले पर संवेदनशील होने की ज़रूरत है और बहके हुए लोगों से कहना चाहिए कि भारत माता की जय मत बोलें, पर शोर भी न करें कि भारत माता की जय नहीं बोलेंगे। अगर जागरुक मुसलमान फ़ौरन आगे आकर इसे नहीं संभाल तो इस संवेदनशील मसले को आरएसएस हाईजैक कर सकता है, जैसा कि लगने लगा है।

सोमवार, 4 अप्रैल 2016

महबूबा मुफ़्ती मुख्यमंत्री बनने वाली जम्मू कश्मीर की पहली और भारत की 16वीं महिला

हरिगोविंद विश्वकर्मा
मेहबूबा मुफ़्ती फ़िलहाल जम्मू-कश्मीर की पहली महिला मुख्यमंत्री बनने जा रही हैं। स्वतंत्र भारत के इतिहास में चीफ़ मिनिस्टर की कुर्सी तक पहुंचने वाली महबूबा 16वीं महिला हैं। जम्मू-कश्मीर का भरत में विलय 26 अक्टूबर 1948 में हुआ था। उसके बाद वहां 1965 तक प्रधानमंत्री हुआ करते थे। बहरहला, उसके बाद वहां सरकार के मुखिया का पद मुख्यमंत्री कर दिया गया। इस तरह राज्य में किसी महिला को सत्ता का मुखिया बनाने में 50 साल लग गए।

अगर महिला मुख्यमंत्रियों की बात करें तो स्वतंत्रता सेनानी और कांग्रेस नेता सुचेता कृपलानी (सुचेता मजूमदार) देश के किसी राज्य की मुख्यमंत्री बनने का गौरव पाने वाली पहली महिला थीं। उन्होंने 2 अक्टूबर 1963 को उत्तर प्रदेश की पहली महिला मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी। वह भारत की प्रथम महिला सीएम थीं और चार साल से ज़्यादा समय तक अपने पद पर रहीं। सुचेता के बाद उड़ीसा की नंदिनी सत्पथी दूसरी महिला मुख्यमंत्री बनीं और 14 जून 1972 को उन्हें कांग्रेस शासित उड़ीसा का सीएम बनाया गया। इसके बाद 1974 में फिर वह राज्य की मुखिया बनीं।

इसी तरह गोवा की शशिकला काकोडकर 12 अगस्त 1973 को राज्य की सीएम बनी तब तक गोवा को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं मिल सका था। महाराष्ट्रवादी गोमंतक पार्टी की नेता शशिकला 1977 में दोबारा सीएम बनीं थीं। देश की चौथी महिला सीएम बनने का गौरव मिला असम की सैयदा अनवरा तैमूर को। सईदा ने 6 दिसंबर 1980 को असम के चीफ़ मिनिस्टर की शपथ ली थी। कांग्रेस की सैयदा 30 जून 1981 तक अपने पद पर रहीं।

तमिलनाडु के एमजी रामचंद्रन के निधन के बाद 7 जनवरी 1988 को उनकी पत्नी जानकी रामचमद्रन राज्य की मुख्यमंत्री बनीं। बहरहाल, उनके कार्यकाल में ही पार्टी पर बाद अभिनेत्री जे जयलिलता का नियंत्रण हो गया और तमिलनाडु को दूसरी महिला मुख्यमंत्री जयलिलता के रूप में मिली जब 24 जून 1991 को तमिलनाडु की महिला मुख्यमंत्री बनीं। फिलहाल वह चौथी बार सीएम हैं।

दलित नेता मायावती को उत्तर प्रदेश का दूसरा मुख्यमंत्री बनने का गौरव मिला। जब मुलायम सिंह यादव की सरकार के पतन और बहुतचर्चित गेस्ट हाऊस कांड के बाद 3 जून 1995 को मायावती बीजेपी के सहयोग उत्तर प्रदेश की दूसरी महिला सीएम बनीं। गेस्ट उस कांड का असर मायावती पर इस कदर हुआ कि फिर उन्होंनें मुलायम पर भरोसा नहीं किया। हालांकि चार बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन हो चुकी हैं और अगले साल पांचवी बार राज्य की कमान अपने हाथ में लेने की कोशिश करेंगी।

पंजाब में कांग्रेस नेता राजिंदर कौर भट्टल को राज्य का पहला मुख्यमंत्री बनने का गौरव मिला, जब उन्होंने 21 जनवरी 1996 को पंजाब की सीएम की शपथ ली। भट्टल एक साल तक राज्य सरकार की मुखिया  रहीं। बिहार की राबड़ी देवी को 25 जुलाई 1997 को बिहार की पहली महिला सीएम बनने का श्रेय तब मिला, जब उनके पति लालूप्रसाद यादव को चारा घोटाले के आरोप में मुख्यमंत्री पद छोड़ा। बाद में लालू जेल गए। इस घोटाले में उन्हें सज़ा हो चुकी है और फ़िलहाल वह ज़मानत पर हैं।

इसी तरह दिल्ली की सरकार बचाने के लिए बीजेपी ने सुषमा स्वराज को दिल्ली का पहला लेडी सीएम बनने का सम्मान दिया और 12 अक्टूबर 1998 को दिल्ली की सीएम बनीं। लेकिन प्याज संकट के कारण बीजेपी उस साल विधानसभा चुनाव हार गई और कांग्रेस की शीला दीक्षित 3 दिसंबर 1998 को दिल्ली की दूसरी महिला सीएम बनी और तीन कार्यकाल तक सीएम बनी रहीं।

बीजेपी की ही वसुंधरा राजे को राजस्थान की पहली महिला मुख्यमंत्री बनने का गौरव तब मिला जब बीजेपी विधानसभा चुना में कांग्रेस को हराकर सत्ता में आई। वसुंधरा ने 8 दिसंबर 2003 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। फिलहाल, 2013 में वसुंधरा दूसरी बार सीएम बनी। इसी तरह बीजेपी की फायर ब्रांड नेता उमा भारती 8 दिसंबर 2003 को मध्यप्रदेश की पहली महिला सीएम बनने का गौरव हासिल है, लेकिन एक केस में उन्हें सीएम पद छोड़ना पड़ा।

तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बैनर्जी को कम्युनिस्टों के गढ़ पश्चिम बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री बनने का गौरव 20 मई 2011 को मिला जब वहां की जनता ने कम्युनिस्ट शासन का अंत किया और टीएमसी सत्ता सौंप दी। फिलहाल, लोकसभा चुनाव में ममता का जादू बरकरार रहा।

नरेंद्र मोदी के दिल्ली राजनीति में आने और देश का प्रधानमंत्री बनने के बाद बीजेपी शासित गुजरात में  आनंदीबेन पटेल को पहली महिला मुख्यमंत्री बनने का गौरव मिला उन्होंने 22 मई 2014 गुजरात की पहली महिला मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली।

दरअसल, आरंभ से ही अन्य क्षेत्रों की तरह भारतीय राजनीति में महिलाएं पूरी तरह उपेक्षित ही रही हैं। समय समय पर उनको सेरेमोनियल पदों पर बिठाकर ये दावे किए जाते रहे हैं कि महिलाओं की हालत देश में तेज़ी से सुधर रही है लेकिन यह दावा पूरी तरह खोखला ही रहा है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ही अभिजात्य घरों की कई महिलाएं राजनीति में आई।


बहरहाल, मेहबूबा मुफ़्ती जम्मू-कश्मीर की पहली महिला मुख्यमंत्री पद की शपथ ली है और इसके साथ ही स्वतंत्र भारत के इतिहास में मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने वाली वो 16वीं महिला बन गई हैं। सीएम की कुर्सी तक पहुंचने वाली मेहबूबा जम्मू-कश्मीर की 10 वीं राजनेता हैं। यह इस बात का संकेत है कि भारतीय राजनीति में महिलाएं अलग-थलग रही हैं।

शनिवार, 2 अप्रैल 2016

बिना वधू बने ही रुखसत हुई "बालिका वधू" प्रत्यूषा

हरिगोविंद विश्वकर्मा
दुनिया के सामने एक आदर्श बहू के रूप में आई और छोटे परदे पर अपनी सादगी और मोहक मुस्कान से करोड़ों लोगों के दिलों में जगह बनाने वाली प्रत्यूषा बैनर्जी की रियल लाइफ में भी बहू बनने की बड़ी हसरत थी, लेकिन वह हसरत हसरत ही रह गई और बिना वधू बने ही बालिका वधू दुनिया से अचानक अपने दोस्तों और प्रशंसकों को मायूस करती हुई रुख़सत हो गई।

दरअसल, बेहद भावुक किस्म की प्रत्यूषा की ज़िंदगी में 2009 बिज़नेसमैन मकरंद मल्होत्रा आया और दोनों का सीरियस अफेयर लंबे समय तक चला। प्रत्यूषा दरअसल, बहू बरकर नई जीवन की पारी शुरू करना चाहती थी। लिहाज़ा, वह चाहती थी कि दोनों शादी कर लें, जबकि मकरंद इतने जल्दी घऱ बसाने के लिए तैयार नहीं था. उसने प्रत्यूषा से शादी करने से इंकार कर दिया। इसके बाद दोनों में खटपट होने लगी और कहासुनी मारपीट तक पहुंच गई। अचानक 2013में मीडिया में दोनों के ब्रेकअप की ख़बर आई।

बहरहाल, उसके बाद प्रत्यूषा और मकरंद में खुलेआम झगड़े हुए। प्रत्यूषा ने मकरंद पर और मकरंद ने बाद अपने बचाव में प्रत्यूषा पर आरोप लगाते रहे। मामला पुलिस स्टेशन तक भी पहुंच गया। प्रत्युषा का कहना था कि मकरंद ने उन्हें जान से मारने की धमकी देता है और घर आकर डराता और मारपीट भी करता है। बहरहाल, कुछ दिनों में दोनों अपने आप शांत हो गए और अपनी-अपनी दुनिया में मस्त हो गए.

प्रत्यूषा अकेलापन फील करने लगी और उस समय उसे सहारा मिला एक प्रोडक्शन हाउस चलाने वाले
राहुलराज सिंह का। दोनों डेट करने लगे और उनका रिलेशन साथ जीने मरने की कसमे खाने तक पहुंच गया। बस क्या था प्रत्यूषा बहू बनने के सपने फिर से देखने लगी। इसी दौरान वह अपने प्रेमी के साथ एक रियलिटी शो में गई और वहां से विदा लेते समय दोनों ने जल्द ही शादी करने का वादा किया। लोगों ने सोचा ग्लैमरस दुनिया का यह कपल आदर्श मैरीड कपल बन जाएगा।

लेकिन दिन गुज़रते रहे, दोनों की शादी नहीं हुई। सार्वजनिक तौर पर विवाह करने का ऐलान करने के बाद भी उनकी शादी नहीं हुई। प्रत्यूषा और राहुल राज का रिश्ता 2015 में परवान चढ़ा था। जब राहुल शादी से आनाकानी करने लगा तो इस साल फरवरी में प्रत्युषा को संदेह होने लगा की राहुल किसी और को चाहने लगा है और शायद इस बार भी बहू बनने की उसकी हसरत पूरी नहीं हो पाएगी। इस ख़्याल के चलते वह डिप्रेशन में चली गई। प्रत्यूषा बहुत डिप्रेस थी और हाल कहे मई उसने व्हाट्सएप स्टेटस में लिखा था .."मरकर भी मुंह न तुझसे मोड़ना." यानी प्रत्यूषा किसी भी कीमत पर राहुल को नहीं छोड़ना चाहती थी। संभवतः मौत को गले लगाना उसी डिप्रेशन का नतीजा है।

प्रत्यूषा की एक खास सहेली के मुताबिक, पिछले कई हफ़्ते से वह राहुल के साथ घर न बसा पाने के कारण डिप्रेशन में थीइस बात का समर्थन प्रत्यूषा को जानने वाले कई अभिनेत्रियों ने की। प्रत्यूषा-राहुल की कॉमन फ्रेंड लीना डायस के मुताबिक, ''राहुल डिवोर्सी हैं। राहुल और उसकी दोस्त सलोनी शर्मा कथित तौर पर प्रत्यूषा को टॉर्चर करते थे। पुलिस का कहना है कि 'बालिका वधू' की 'आनंदी' को घर में फंदे से लटकते देखकर राहुल घबरा गया। बकौल राहुल, ''मैं इस हादसे से डर गया था। हालांकि मुझे लगा था वो जिंदा हैं। डर के चलते ही मैंने पुलिस को इन्फॉर्म नहीं किया।" प्रत्यूषा की मौत के बाद अस्पताल में राहुल की गैरमौजूदगी पर कई को-स्टार्स ने सवाल उठाए थे।


25 साल की जमशेदुर की इस समर्थ अभिनेत्री ने शुक्रवार की शाम कथित तौर पर रहस्यम परिस्थितियों में मौत का आलिंगन कर लिया। मुंबई पुलिस उसके प्रेमी राहुल राज सिंह के बयान के आधार पर कहग रही है कि प्रत्युषा के जीवन के अंतिम शुकवार को प्रत्यूषा ने अचानक अपना कमरा बंद किया और पंखे से फांसी लगा ली. हालाँकि अभी निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता है क्यूंकि पुलिस को अभी भी राहुल से पूछताछ करनी है जो कोकिलाबेन अस्पताल में डाक्टरों के प्रत्युषा को मृत घोषित करते ही सन्देहासपद तरीक़े से गायब हो गया था। जांच के दौरान पुलिस को प्रत्यूषा के फ्लैट से दो सेलफोन मिले। दोनों फोन की फॉरेन्सिक टेस्ट होगा। यह देखा जाएगा कि प्रत्यूषा ने आखिरी कॉल किसे किया था।

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2016

भारत सेमीफाइनल वेस्टइंडीज़ से क्यों हारा..?

हरिगोविंद विश्वकर्मा
टी-20 विश्वकप के सेमीफाइनल में मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में वेस्टइंडीज़ के हाथों भारत की पराजय से भारतीय क्रिकेटप्रेमी दुखी हो गए। कई लोगों ने माना कि गुरुवार को शाम किस्मत ने भारत का साथ नहीं दिया। कई लोगों ने कहा कि दो नोबॉल की वजह से भारत हार गया। जबकि सच यह है कि किस्मत ने वेस्टइंडीज़ से ज़्यादा भारत का साथ दिया, क्योंकि सिमंस को अगर दो नोबॉल पर जीवनदान मिला तो कोहली दो रनआउट एक बार कैच आउटहोने से बच गए थे।

भारत-वेस्टइंडीज़ के बीच सेमीफाइनल मैच का अगर निष्पक्ष विश्लेषण किया जाए तो यह कहने में गुरेज़ नहीं होना चाहिए कि भारत अपनी ग़लती और महेंद्र सिंह धोनी के चंद ग़लत फ़ैसले के कारण हार गया। हालांकि मैच के बाद कमेंटेटर से बातचीत के दौरान धोनी ने जब हार के लिए मैच के आधे घंटे पहले शुरू होने को वजह बताया तो कमेंटेटर भी हंसने लगे।

बहरहाल, यह तो मानना पड़ेगा कि विश्व चैंपियन बनने के लिए किसी टीम की अपने एक खिलाड़ी पर इतनी निर्भ्ररता ठीक नहीं। कोई भी टीम अगर किसी एक खिलाड़ी पर बुरी तरह आश्रित है तो वह कप जीतने की हक़दार नहीं हो सकती। अगर टी-20 विश्वकप की बात करें तो टीम इंडिया बुरी तरह विराट पर निर्भर है। यही वजह रही कि टीम इंडिया वानखेडे की रनों से भरी पिच पर 20 ओवर में केवल 192 रन बना सकी, जबकि धोनी को पता था कि अभी 13 दिन पहले इसी मैदान पर दक्षिण अफ्रीका की टीम 229 रन बनाने के बावजूद हार गई थी।

बांग्लादेश पर भारत की 1 रन से जीत के बाद धोनी की तारीफ़ के पुल बांध दिए गए थे। जबकि सच यह था कि उस दिन भारत ने मैच जीता नहीं था, बल्कि ख़ुद बांग्लादेश मैच हार गया था। बहरहाल, धोनी से पूछा जाना चाहिएथा कि रवींद्र जडेजा जैसे औसत दर्जे के खिलाड़ी को अंतिम एकादश में क्यों रखा जा रहा है। ख़ासकर जिस वानखेड़़े पिच पर गेंद घूम न रही हो, उस पर आर अश्विन के साथ जडेजा को क्यों टीम में रखा।

अगर रवींद्र जडेजा को ऑलराउंडर होने के कारण टीम में रखा गया। तो धोनी बताएं कि 2009 में अंतरराष्ट्रीय में पदार्पण करने वाले जडेजा बतौर ऑलराउंडर किस मैच में परफॉर्मेंस दिया है। कहने का मतलब जब जडेजा को विशुद्ध गेंदबाज़ के रूप में टीम में रखना है तो उनसे बेहतर गेंदबाज हरभजन हो सकते थे। वह अंतिम ओवरों में अच्छे शॉट्स के साथ रन भी बना लेते हैं...

वानखेड़े में जडेजा की सबसे ज़्यादा पिटाई हुई, तब भी उन्होंने अपने कोटे के पूरे 4 ओवर गेंदबाज़ी की और 48 रन दे डाले, जबकि धोनी ने अश्विन को केवल 2 ओवर दिया और अश्विन 2 ओवर में 20 रन दिए। धोनी अगर अश्विन का पूरा ओवर करवाते तो ज़्यादा से ज्यादा वह 20 रन और दे देते, लेकिन यह भी संभव था कि, वह एकाध विकेट गिरा देते तो बाज़ी पलट सकती थी।

मैच में 18 मार्च को दक्षिण अफ्रीका 229 रन की रक्षा नहीं कर पाया और इंग्लैंड से हार गया। यह बात धोनी नहीं जानते थे, तो उनकी रणनीति सही नहीं कही जा सकती थी। दरअसल, बल्लेबाज़ों के लिए स्वर्ग वानखेड़े मैदान पर भारत को कम से कम 220 रन के टारगेट के साथ उतरना चाहिए था। लेकिन भारत 200 के टारगेट के साथ उतरा। यही कारण था कि रहाणे विशुद्ध रूप से अपनी स्टाइल में बल्लेबाज़ी करते रहे और एकदिवसीय मैच के अनुसार बल्लेबाज़ी की, जबकि उनसे टी-20 जैसी बल्लेबाजी की उम्मीद थी।

15.3 ओवर में रहाणे का विकेट गिरने के बाद धोनी मैदान में उतरे। तक तक दो दो रन लेने के लिए विकेट के बीच ज़्यादा दौड़ने के कारण कोहली भी थक चुके थे। ऐसे में अंतिम चार ओवर में बल्लेबाज़ी की कमान धोनी को ख़ुद अपने हाथ में लेनी चाहिए थी। सवाल उठता है कि धोनी जब तूफानी बैटिंग नहीं कर सकते थे, तब अपने क्रम से पहले बैटिंग करने के लिए उतरे ही क्यों। जब वह मैदान पर आए तक 27 गेंदे खेली जानी थी. 27 बाल में केवल 66 बने जबकि भारत के पास 8 विकेट हाथ में थे। धोनी 8 बॉल खेले और बनाए 15 रन बनाए. जबकि यह समय चौके-छक्के मारने का समय था, सिंगल लेने का नहीं, क्योंकि यह बल्लेबाजों की पिच थी। मजेदार बात यह रही कि फ्रेश धोनी अंतिम 66 में से केवल 15 रन बनाए, जबकि थके मांदे कोहली अंतिम 17 गेंद में 51 रन बना दिए। लोग यह देखकर हैरान थे कि छोटे मैदान के कारण चौके-छक्के मारने की बजाय धोनी सिंगलव ले रहे थे। जबकि वेस्टइंडीज़ के सिंमस और रसेल चौके छक्के मार कर टीम को जिताया।


इस बार विश्वकप भारत में हो रहा था, सब कुछ भारत के अनुकूल था लेकिन धोनी के ग़लत फ़ैसले के चलते भारत अपने मैदानों पर फाइनल में नहीं पहुंच पाया। और तो और अगर किस्तम ने साथ न दिया होता तो भारत सेमीफाइनल में नहीं पहुंच पाता। अब ज़रूरत है, धोनी के विकल्प तलाशने की, ताकि भारतीय टीम एक मज़बूत टीम बनी रहे। धोनी ने बहुत खेल लिया, अब उन्हें आराम देने पर विचार किया जाना चाहिए,

बुधवार, 30 मार्च 2016

शनि शिंगणापुर विवादः औरतों को मंदिर में जाने से रोकने वाले जाएंगे जेल

हरिगोविंद विश्वकर्मा
महिलाओं के साथ खुला पक्षपात करने वाली सदियों पुरानी आउटडेटेड पंरपराओं को ध्वस्त करने की श्रीगणेश बुधवार को तक हो गया जब बॉम्बे हाईकोर्ट ने अहमदनगर के शनि शिंगणापुर मंदिर ट्रस्ट के लोगों को कड़ी फटकार लगाते हुए कि मिंदर में जहां-जहां पुरुष जाते हैं, वहां-वहां महिलाओं को जाने का अधिकार है और जो भी भविष्य में उन्हें जाने से रोकेगा उसे छह महीने के लिए जेल भेजा जाएगा। ज़ाहिर सी बात है अदालत का फ़ैसला ऐतिहासिक है और देश भर के हर मजहब के धर्मस्थलों में महिलाओं को प्रवेश को सुनिश्चित करने के लिए यह फ़ैसला एक मिसाल बनेगा।

इस तरह शनि शिंगणापुर मंदिर में जाने की हिंदू महिलाओं को मिली इजाज़त के बाद मुंबई के महालक्ष्मी के हाजीअली दरगाह में मुस्लिम महिलाओं को प्रवेश करने का रास्ता साफ़ हो गया है। यह मामला भी हाईकोर्ट के पास विचाराधीन है. महिलाओं को बराबी का दर्जा देने के पैरोकारों का मानना है कि बॉम्बें हाईकोर्ट का फ़ैसला सदियों से चली आ रही आउटडेटेड पुरुषवादी परंपराओं को गिराने की शुरुआत है।

साढ़े चार सौ साल से भी अधिक पुराने शनि शिंगणापुर मंदिर के चबूतरे तक महिलाओं के जाने और उनके सरसों का तेल चढ़ाने पर मनाही है। यह साफ़ नहीं हो पाया है कि,  किसने इस पक्षपातपूर्ण परंपरा का आरंभ किया। इसी तरह छह सदी से ज़्यादा पुराने हाजीअली दरगाह में महिलाओं के प्रवेश पर मनाही है। जबकि किसी भी धार्मिक पुस्तक में कही नहीं लिखा है कि महिलाओं के साथ लैंगिक आधार पर भेदभाव किया जाए। ज़ाहिर सी बात है, इस तरह की दकियानूसी परंपराएं पुरुष-प्रधान समाज में हर जगह हैं। पहले तो महिलाओं के घर से बाहर निकलने पर ही अघोषित पाबंदी थी, लेकिन वक्त के साथ उसमें बदलाव आया और महिलाओं सीमित संख्या में ही सही हर जगह दिखती हैं।

बहराहाल, महिलाओं के साथ लैंगिक आधार पर किसी तरह का भेदभाव करना और उन्हें किसी भी धर्मस्थल पर जाने से रोकना दरअसल सामाजिक और मानवीय दोनों तरह का अपराध है। यह भारतीय संविधान में महिलाओं को मिले अधिकार का भी गंभीर हनन है। जो लोग ऐसा कर रहे हैं। चाहे वे शनि शिंगणपुर के शनि मंदिर के पुजारी हों या सबरीमाला मंदिर के पुजारी या फिर मस्जिदों के मौलवी सबके सब मानवता के खिलाफ अपराध के दोषी हैं। बॉम्बे हाईकोर्ट के फ़ैसले के बाद ऐसे लोगों के ख़िलाफ़ आपराधिक कार्रवाई का रास्ता साफ़ हो गया है। भविष्य में देश में हर धार्मिक स्थल पर जाने की महिलाओं को आज़ादी मिलेगी।

यहां तक कि मासिक धर्म (रजोधर्म) या पीरियड के समय भी किसी महिला को किसी धार्मिक अनुष्ठान से दूर नहीं रखना चाहिए, क्योंकि पीरियड हर महीने गर्भाशय की सफ़ाई का एक नैसर्गिक प्रक्रिया है। उसके बाद स्त्री गर्भधारण (अगर चाहे तो) के लिए शारीरिक तौर पर तैयार होती है। इसे उसी तरह की सफाई माना जा सकता है, जिस तरह स्त्री-पुरुष दैनिक नित्यकर्म करते हैं। अगर नित्यकर्म अशुद्ध नहीं है, तो पीरियड को भी अशुद्ध नहीं माना जा सकता। अब तो मेडिकल क्षेत्र से जुड़े लोग भी कहने लगे हैं कि पीरियड के समय सेक्स करने में कोई हानि नहीं होती। मेडिकल साइंस के मुताबिक़, महिला का शरीर भी कमोबेश पुरुष की तरह ही है। पुरुष का शरीर स्पर्म पैदा करता है तो महिला शरीर में एग्स बनते हैं। स्पर्म और एग्स की ब्रिडिंग गर्भाशय में होता है, जो महिला के पेट में होता है। वहीं से नौ महीने बाद मानव जन्म लेता है। लिहाज़ा, स्त्री को अशुद्ध कहने का मतलब संतानोत्पत्ति को ही अशुद्ध कहना है।

राहुल सांकृत्यायन की कालजयी रचना वोल्गा से गंगाके मुताबिक आठ से दस हज़ार साल पहले मानव दो पैरों पर खड़ा होने के बाद निर्वस्त्र हाल में एक झुंड में जंगलों और गुफाओं में रहता था। तब मनुष्य का शरीर इतना मज़बूत होता था कि कोई बीमारी नहीं लगती थीं। आजकल जानवरों की तरह उस समय हर स्त्री-पुरुष का अनगिनत लोगों से सेक्सुअल रिलेशनशिप होता था, इसलिए किसी शिशु का पिता कौन है, यह कोई नहीं जानता था। हां, दूध पीने के कारण माता को सब लोग पहचानते थे। झुंड की सबसे ताक़तवर महिला ही झुंड की मुखिया होती थी। यह परंपरा कई हज़ार साल तक चलती रही। महिला मुखिया झुंड के हर सदस्य के साथ इंसाफ करती थी। इसलिए उस समय आपसी झगड़े या लड़ाइयां भी बहुत कम हुआ करती थीं। तब सेक्स डिटरमिनेशन टेस्ट या अबॉर्शन की प्रथा भी नहीं थी। लिहाज़ा, धरती पर स्त्री और पुरुष की तादाद लगभग बराबर होती थी। यानी जनसंख्या संतुलित थी। यह तथ्य मानव विकास पर लिखी गई किताबों में भी मिलता है। कभी-कभार जब दो झुंडों की आपस में संघर्ष होती था तब दोनों झुंड की मुखिया स्त्रियां ही आपस में मलयुद्ध करती थीं।

बहरहाल, शारीरिक रुप से स्त्रियों से ज़्यादा शक्तिशाली पुरुष झुंड के मुखिया बनने लगे। यहीं से पुरुष आधिपत्य शुरू हुआ और स्त्री के साथ पक्षपात होने लगा। पुरुष स्त्री को भोग की वस्तु समझने लगा और उसके मानवीय अधिकारों का हनन करने लगा। परिवारवाद प्रथा शुरू होने पर पुरुष कई-कई पत्नियां रखने लगा, लेकिन स्त्री को दूसरे पुरुष की ओर देखने पर कुलटा कह दिया जाता था। जब शिक्षा की अवधारणा शुरू हुई तो पुरुष ने उस पर भी क़ब्ज़ा कर लिया। इसके बाद धर्म की स्थापना हुई। पुरुष आधिपत्य का कारण हर धर्म पुरुष प्रधान बनाए गए। जितने भी धार्मिक ग्रंथ रचे गए सभी पुरुषों ने रचे और पुरुष को ही महिमामंडित किया। जितने त्यौहार बनाए गए, सभी सब पुरुष वर्चस्व के प्रतीक बने। स्त्री (पत्नी के रूप में) पुरुष (पति) के लिए व्रत रहती है, लेकिन कोई पुरुष किसी स्त्री के लिए व्रत नहीं रहता।

पुरुष-प्रधान परंपराएं कमोबेश बदस्तूर जारी हैं, इसीलिए घर के बाहर हर जगह पुरुष ही पुरुष दिखते हैं। महिलाओं की विज़िबिलिटी 10-15 फ़ीसदी से ज़्यादा नहीं है। सूचना प्रौद्योगिकी में क्रांति के दौर में भी मुंबई-दिल्ली जैसे महानगर छोड़ दिए जाएं तो महिलाओं की घर के बाहर विज़िबिलिटी पांच फ़ीसदी भी नहीं है। महिलाओं की कम विज़िबिलिटी के चलते दुस्साहसी पुरुष बाहर निकलने वाली एक्का-दुक्का औरतों के साथ उनकी मर्जी के विरुद्ध हरकते करते हैं। भेदभाव करते हैं। महिलाओं के साथ होने वाले यौन अपराधों की असली वजह यही है, जिसे क़ानून को सख़्त करके नहीं रोका जा सकता। इसके लिए देश में हर जगह महिलाओं को 50 फ़ीसदी जगह रिज़र्व करनी पड़ेगी। हर जगह जितने पुरुष हैं, उतनी स्त्री करनी ही पड़ेगी।


जो भी हो, इस मौक़े पर भूमाता रण रागिनी ब्रिगेड की अध्यक्ष तृप्ति देसाई और भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की सह संस्थापक नूरजहां साफिया नियाज़ जैसी बहुदुर महिलाओं को अभिनंदन किया जाना चाहिए, जो आउटडेटेड परंपराओं के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रही है. लकीर के फकीर पुरुष प्रधान समाज के पैरोकार अगर अब भी होश में नहीं आए तो वह दिन दूर नहीं, जब हर भारतीय महिला पुरुषवादी परंपरा से लड़ने के लिए तैयार हो जाएगी।
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मंगलवार, 15 मार्च 2016

शहीदों को कम, आतंकियों को ज़्यादा याद रखते हैं लोग

हरिगोविंद विश्वकर्मा
क्या आप रवींद्र म्हात्रे को जानते हैं? अगर यह सवाल आप ऐसे ही कैज़ुअली 10 भारतीयों से पूछें, तो निश्चित तौर पर बमुश्किल एक या दो लोग ही उनके बारे में बता पाएंगे। अगर यह भी बता दीजिए कि पुणे में रवींद्र म्हात्रे के नाम पर एक पुल है और विक्रोली में एक मैदान, तब भी शायद ही लोगों को याद आएगा। यहां तक कि म्हात्रे पुल से गुजरने वाले हज़ारों लोग या म्हात्रे मैदान में खेलने वाले सैकड़ों बच्चों से पूछ लें तो उनमें भी बमुश्किल इक्का-दुक्का लोग ही म्हात्रे के बारे में बता पाएंगे।

इसके विपरीत अगर लोगों से मोहम्मद अफ़ज़ल गुरु या मकबूल भट के बारे में पूछें, तो बताने वालों की संख्या एकदम उल्टी हो जाएगी। यानी एकाध लोगों को छोड़कर सभी लोग बता देंगें कि दोनों कौन थे। हाल ही में हुए जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय विवाद के केंद्र में यही दोनों थे। देश के ख़िलाफ़ साज़िश रचने वाले इन दोनों आतंकवादियों को नौ फरवरी 2016 सी शाम जेएनयू में शहीद बताया गया था। चूंकि अफ़ज़ल को लोग जानते हैं, कि 2001 में संसद पर हमले का सूत्राधार था, लेकिन मक़बूल बट के बारे में बहुत नहीं जानते कि वह कौन था और उसे फ़ांसी क्यों हुई, क्योंकि उसने अपराध पिछली सदी में किया था। इसलिए मक़बूल के अपराधों को बताना ज़रूरी है, लेकिन उससे पहले भारतीय राजनयिक रवींद म्हात्रे का ज़िक्र करना ज़्यादा मुनासिब होगा, जिनकी पढ़ाई-लिखाई मुंबई में हुई।

49 वर्षीय भारतीय राजनयिक रवींद्र म्हात्रे, दरअसल, पहली बार तीन फरवरी 1984 में चर्चा में तब आए जब ब्रिटेन में सक्रिय जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के सहयोगी संगठन जम्मू-कश्मीर लिबरेशन आर्मी के आतंकवादियों ने बर्मिंघम में उन्हें अपहृत कर लिया। दरअसल, तत्कालीन उच्चायुक्त डॉ. सईद मोहम्मद के विदाई समारोह के चलते बर्मिंघम महावाणिज्य दूतावास के प्रभारी डिप्टी कमिश्नर बलदेव कोहली लंदन में थे, क्योंकि डॉ. सईद सेवानिवृत्त हो रहे थे। उनकी मौजूदगी में सह-उच्चायुक्त म्हात्रे दफ़्तर के प्रभारी थे। वह हमेशा की तरह शाम पांच बजे ऑफ़िस से बारटले ग्रीन इलाके में स्थित अपने घर के लिए निकल पड़े, जो दो किलोमीटर दूर था। उस दिन शुक्रवार था और अगले दिन उनकी बेटी आशा का 14वां जन्मदिन, जिसकी तैयारी करनी थी। लिहाज़ा, रास्ते में केक लेते हुए जैसे ही घर के सामने बस से उतरे थे, आतंकियों ने गनपॉइंट पर उन्हें अपनी कार में बिठा लिया।

जब म्हात्रे सात बजे तक घर नहीं पहुंचे तो पत्नी डॉ. शोभा पठारे-म्हात्रे परेशान होने लगीं। उन्होंने दफ़्तर फोन लगाया, पर कोई जवाब नहीं मिला। फिर शोभा ने कोहली को फोन लगाया। वह भी हैरान हुए, क्योंकि म्हात्रे अमूमन साढ़े पांच बजे तक घर पहुंच जाते थे। जब 9 बजे तक उनका सुराग नहीं मिला तब कोहली ने बर्मिंघम पुलिस को सूचना दी। बहरहाल, शनिवार की अल-सुबह एक अज्ञात व्यक्ति ने न्यूज़ एजेंसी रॉयटर के दफ़्तर में जम्मू-कश्मीर लिबरेशन आर्मी का हाथ से टूटी-फूटी अंग्रेज़ी में लिखा एक पत्र ड्रॉप किया। जिसमें दावा किया गया था कि म्हात्रे को अगवा किया गया है। म्हात्रे को छोड़ने के बदले आतंकवादियों ने उसी दिन शाम 7 बजे तक भारत के सामने जेल में बंद मक़बूल भट को छोड़ने और दस लाख ब्रिटिश पाउंड की मांग रखी। लेटर पर कोई नाम पता या फोन नंबर नहीं था, लिहाज़ा, रॉयटर के संपादक ने ख़बर चलाने से पहले स्कॉटलैंड यार्ड को सूचना दी। जहां म्हात्रे के ग़ायब होने की शिकायत दर्ज थी।

अपहरकर्ताओं ने जेकेएलएफ से जुड़े आज़ाद कश्मीर के पैरोकार ज़ुबैर अंसारी को भी फोन किया और उनसे भारत के साथ मक़बूल की रिहाई के लिए वार्ता करने की अपील की। अंसारी ने अपहर्ताओं से समय सीमा रात 10 बजे तक बढ़ाने की अपील की, जिसे मान लिया गया। अंसारी ने स्कॉटलैंड यार्ड को सूचित कर दिया, जिससे उनका फोन सर्विलॉन्स पर रख दिया गया। भारत को भी घटना से अवगत करा दिया गया। तब विदेश मंत्रालय में वरिष्ठतम अधिकारी रोमेश भंडारी और विदेश सचिव एमके रसगोत्रा ने गुवाहाटी के दौरे पर निकल चुकीं प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से संपर्क करने की कोशिश की, परंतु विमान आसमान में था। आईबी और रॉ के प्रमुख आरएन कॉव और प्रिंसिपल सचिव पीसी अलेक्ज़ेंडर को सूचित कर दिया गया था। सवा चार बजे जैसे ही पीएम के विमान ने लैंड किया, उन्हें सूचित कर दिया गया।

ब्रिटेन से पहले बांग्लादेश और ईरान में राजनयिक रहे म्हात्रे की जीवन इंडियन एयरलाइंस के विमान सी-814 में सवार यात्रियों के जीवन से कम महत्वपूर्ण नहीं था। सन् 1999 में सी-814 में सवार यात्रियों की जान बचाने के लिए अटलबिहारी वाजपेयी सरकार में विदेश मंत्री जसवंत सिंह जैश-ए-मोहम्मद चीफ़ मौलाना मसूद अज़हर, अहमद सईद शेख और मुश्ताक़ अहमद ज़रगर जैसे ख़तरनाक आतंकवादियों को लेकर कंधार गए थे। अटल सरकार ने आतंकवाद के आगे भले घुटने टेक दिया था लेकिन आतंकवाद की शरणस्थली बने स्वर्ण मंदिर में सेना भेजने का साहस करने वाली इंदिरा ने दहशतगर्दों के आगे झुकने से साफ़ इनकार कर दिया। इंदिरा ने कहा कि न तो मक़बूल को छोड़ा जाएगा न ही भारत आतंकियों से कोई बातचीत की जाएगी। नतीजतन छह फरवरी को आतंकियों ने म्हात्रे का कत्ल करके शव बर्मिघंम शहर से 40 किलोमीटर दूर लीसेस्टरशायर के हिंकली में हाइवे के किनारे फेंक दिया। म्हात्रे के सिर में दो गोली मारी गई थी।

बहरहाल, उसी दिन इंदिरा की अध्यक्षता में केंद्रीय कैबिनेट की आपात बैठक हुई, जिसमें मौजूदा राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी (वित्त मंत्री), प्रकाशचंद्र सेठी (गृहमंत्री) आर वेंकटरमन (रक्षामंत्री) और पीवी नरसिंह राव (विदेश मंत्री) मौजूद थे। कैबिनेट ने राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह से मक़बूल की दया याचना नामंजूर करने की सिफ़ारिश की, ताकि उसे जल्दी से जल्दी फांसी पर लटकाया जा सके। राष्ट्रपति कोलकाता में थे। लिहाज़ा, एक अधिकारी कैबिनेट प्रस्ताव लेकर उनके पास गया और जैलसिंह ने फ़ौरन मर्सी पिटीशन रिजेक्ट कर दिया। गृह मंत्रालय के अफ़सर पीपी नैयर को ब्लैक वारंट लेने और मक़बूल भट की फांसी में आने वाली किसी भी संभावित बाधा को दूर करने के लिए कश्मीर भेजा गया। बहरहाल, म्हात्रे की हत्या के छह दिन बाद 11 फरवरी 1984 को मकबूल भट को तिहाड़ जेल में फ़ांसी पर लटका दिया गया और उसके शव को जेल में ही अज्ञात जगह दफ़ना दिया गया।

इंदिरा को एहसास था कि म्हात्रे की जान उनके कारण ही गई, लेकिन उन्होंने व्यापक राष्ट्रीय हित में मक़बूल को न छोड़ने का फ़ैसला किया था। घर में प्यार से दादा पुकारे जाने वाले रवींद्र के बूढ़े माता-पिता मुंबई के विक्रोली में छोटे बेटे अविनाश को साथ रहते थे। इंदिरा दूसरे दिन मुंबई गईं और एयरपोर्ट से सीधे म्हात्रे के घर गईं। प्रधानमंत्री को देख 75 वर्षीय पिता हरेश्वर म्हात्रे और 74 वर्षीय माता ताराबाई फूट-फूट कर रोने लगे। इंदिरा उनके हाथ पांच मिनट हाथ मे लेकर बैठी रहीं और सांत्वना देती। इंदिरा गांधी ने साफ़-साफ़ कहा, “मैं ख़ुद एक मां हूं, इसलिए आपका दर्द समझ सकती हूं। आपके बेटे की जान मेरे कारण ही गई, लेकिन मेरे लिए राष्ट्रहित ऊपर था, जिसके लिए रवींद्र को जान गंवानी पड़ी। इसके लिए मैं दोषी हूं और आपसे क्षमा मांगती हूं।” इंदिरा और कहीं नहीं गईं और सीधे हवाई अड्डे से दिल्ली वापस आ गईं।

दरअसल, पाकिस्तान अधिकृत कश्मूर यानी आज़ाद कश्मीर के मीरपुर शहर में रहने वाले जेकेएलएफ़ के चेयरमैन अमानुल्लाह ख़ान के सहयोगी और हॉलैंड में रहने वाले हाशिम कुरेशी की 1999 में प्रकाशित किताब “कश्मीरः द अनवेलिंग ऑफ़ ट्रूथः अ पोलिटिकल एनालिसिस ऑफ कश्मीर” में खुलासा हुआ कि म्हात्रे का अपहरण और उनकी हत्या की साजिश अमानुल्लाह ख़ान ने ही रची थी और जेकेएलएफ आतंकी मोहम्मद रियाज़, अब्दुल क़य्यूम राजा और मोहम्मद असलम मिर्ज़ा ने अंजाम तक पहुंचाया था। रियाज़ और राजा को जेल की सज़ा हुई, लेकिन मिर्ज़ा हत्या के बाद अपनी बीवी सकीना और अपने सात बच्चों को इंग्लैड में छोड़कर पाकिस्तान भागा। वह से पेनसिल्वेनिया गया और 2001 में पॉटसविले की एक महिला से निकाह कर लिया। बहरहाल, उसे अमेरिकी में पकड़ा गया।

तीन से छह फरवरी 1984 की घटना को याद करते हुए म्हात्रे की बेटी आशा म्हात्रे डिसिल्वा कहती हैं, “पापा के अपहरण की ख़बर हमारे लिए विपत्ति लेकर आई थी। अगले दिन मेरा बर्थडे था, इसलिए मै केक का इंतज़ार कर रही थी, लेकिन उस दिन पापा आए ही नहीं और फिर कभी नहीं आए। मैं और मम्मी रात भर सो नहीं पाईं। तीसरे दिन जब लाश मिली तो मां घर में ही गिर पड़ीं।” सिर से पिता का साया उठने के बाद आशा उम्र से भी ज़्यादा तेज़ी से परिपक्व हुईं। बहरहाल, रवींद्र म्हात्रे के सम्मान में पुणे में एक पुल का नाम उनके नाम पर म्हात्रे पुल रखा गया। इसके अलावा मुंबई के विक्रोली में उनके नाम से बीएमसी का एक मैदान है।

बहरहाल, रवींद्र म्हात्रे की हत्या के लिए ज़िम्मेदार जेकेएलएफ़ के संस्थापक मक़बूल भट का जन्म 18 फरवरी 1938 को हंडवारा (पूर्व कुपवाड़ा जिला) जिले के त्रेहगाम में किसान ग़ुलाम क़ादर भट के यहां हुआ। माना जाता है कि कश्मीर घाटी के पुराने हिंदू जो भट्ट थे वही धर्मपरिवर्तन के बाद भट या फिर बट हो गए थे। उसी ख़ानदान का मक़बूल भी था। 11 बरस की उम्र में मां को गंवाने वाले मक़बूल की प्राइमरी की पढ़ाई त्रेहगाम में हुई। पिता ने दूसरी शादी कर ली। मक़बूल ने कश्मीर विश्वविद्यालय से संबद्ध बारामूला के सेंट जोसेफ कॉलेज से इतिहास और राजनीति विज्ञान में बीए किया। ग्रेजुएशन करने के बाद मक़बूल कुछ साथियों के साथ पीओके चला गया, जहां उन सबको सेना ने गिरफ्तार कर लिया। बाद में मुज़फ़्फ़राबाद में बसे एक कश्मीरी की गारंटी पर रिहा किया गया।

रिहा होने के बाद मक़बूल लाहौर गया। वहां उसके मामूजान ने अपने संपर्कों से उसका दाखिला पंजाब विश्वविद्यालय में कराने की कोशिश की, लेकिन कामयाब नहीं हुए। इसके बाद मक़बूल पेशावर गया और पेशावर विश्वविद्यालय में एडमिशन मिल गया। उर्दू साहित्य से एमए करने के बाद उसने थोड़े समय शिक्षक के रूप में सेवाएं दी, बाद में लोकल अख़बार अंजाम में बतौर पत्रकार काम करने लगा। उसकी शायर अहमद फराज़ से मुलाकात हुई। बहरहाल, कुछ समय पत्रकार की नौकरी करने के बाद जब मक़बूल कई साल बाद भारत लौटा तो आज़ादी की बात करने लगा।

14 सितंबर 1966 को मकबूल अपने साथियों औरंगज़ेब और काला ख़ान के साथ मिलकर लोकल अपराध शाखा सीआईडी ​​के निरीक्षक अमरचंद के घर पर हमला कर दिया। पंजाल थाने में दर्ज एफआईआर के मुताबिक़ उसने अमरचंद को अगवा कर उनकी हत्या कर दी और कैश, गहने और दस्तावेज़ ले उड़ा। उसी दिन सुरक्षा बलों की जवाबी कार्रवाई में औरंगजेब मारा गया। मकबूल और काला गिरफ्तार कर लिए गए। मक़बूल पर पाकिस्तानी जासूस होने का आरोप लगाया गया। सुनवाई के दौरान नीलकंठ गंजू ने उसे दोषी करार दिया और मौत की सज़ा सुनाई। मक़बूल फ़ौरन बोला, “अपने ऊपर लगाए गए आरोप स्वीकार करने में मुझे कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन मैं पाकिस्तानी नहीं हूं। मैं कॉलोनियल माइंडसेट का दुश्मन हूं। मेरी तरफ ध्यान से देख लो, मैं तुम्हारा दुश्मन हूं।“

बहराहल, मक़बूल को अति सुरक्षित श्रीनगर जेल में रखा गया। लेकिन जेल में सुरंग बनाकर वह साथियों समेत भाग निकला और पाकिस्तान चला गया। वहां उसे भारत विरोधी साज़िश करने वाले और ज़्यादा मिल गए। कश्मीर की ओर दुनिया का ध्यान खींचने के लिए वह कोशिश करने लगा। तीन साल बाद वह फिर चर्चा में आया, जब जनवरी 1971 में इंडियन एयरलाइंस फोक्कर एफ-27 फ्रेंडशिप एयरक्राफ्ट ‘गंगा’ हाईजैक करके लाहौर ले जाया गया। यह काम उसके साथी हाशिम कुरेशी और अशरफ भट ने किया। जब प्लेन लैंड हुआ, तब एयरपोर्ट पर मक़बूल मौजूद था। यात्रियों को विमान से बाहर निकाल कर उसमें आग लगा दी गई। सुरक्षा एजेंसियों ने मकबूल को हाइजैक का मास्टरमाइंड बताया।

उसी साल दिसंबर में इंडिया और पाकिस्तान के बीच युद्ध हुआ। दिल्ली ने इस्लामाबाद से मकबूल को गिरफ़्तार कर उसके हवाले करने को कहा। ना-नुकुर करते हुए पाकिस्तान ने मकबूल को अरेस्ट तो किया, लेकिन भारत को सौंपने से इंकार कर दिया। पाकिस्तान की अदालत ने दो साल बाद 1974 में उसे रिहा कर दिया। रिहा होते ही मक़बूल बर्मिंघम चला गया। वहां अमानुल्लाह ख़ान के साथ मिलकर जेकेएलएफ़ से जुड़े जम्मू-कश्मीर नेशनल लिबरेशन फ्रंट ने बाद में भारतीय आर्म फोर्स से सशस्त्र संघर्ष किया, जिसमें 20 साल तक खूब खून-खराबा हुआ।

बहरहाल, जब मक़बूल अपने मिशन के साथ जब दोबारा भारत में घुसा घुसा तो इंटेलिजेंस ने उसे गिरफ्तार कर लिया। इस दौरान जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने मौत की सज़ा का बरकरार रखी। संयोग से उस समय भी हाईकोर्ट के जज जस्टिस नींलकंठ गंजू ही थे। हाईकोर्ट के फ़ैसले के बाद 23 जुलाई 1976 को मक़बूल तिहाड़ में शिफ़्ट किया गया। हाईकोर्ट की सुनाई सजा सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखी। इस बार उसको मौत की सज़ा मिलनी तय थी। वस्तुतः उसने अनफेयर ट्रायल का आरोप लगाकर राष्ट्रपति के पास दया याचिका भेजी। इस दौरान उसे तिहाड़ जेल के डेथ सेल में रखा गया। उस सेल में मक़बूल घबराता था और डेथ सेल को मेंढक का कुआं कहता था।

वैसे मक़बूल के चार भाई भी थे। हबीबुल्ला भट मकबूल से तिहाड़ में मिलने के बाद रहस्यमय तरीक़े से ग़ायब हो गया। ख़ुफिया एजेंसियों का मानना कि वह पाकिस्तान में है। दो भाई जेकेएलएफ के संयोजक गुलाम नबी भट और मंजूर अहमद भट आतंकी थे और श्रीनगर और त्रेहगाम में अलग-अलग मुठभेड़ों में मारे गए। चौथा भाई जहूर भट भी जेकेएलएफ से जुड़ा है। मकबूल की जयंती पर नियंत्रण अवैध रूप से नियंत्रण रेखा पार करने की कोशिश में नज़रबंद था। क़रीब एक वर्ष बाद पुलिस ने उसे रिहा कर दिया। मक़बूल की दो बहनें सईदा और महबूबा हैं। मक़बलू की दो बीवियां थीं। पहली बीवी राज बेगम से शौकत मक़बूल और जावेद मक़बूल और ज़कीरा से लुबना मक़बूल थीं।

बहरहाल, मकबूल को छुडवाने और ज़िंदा रखने के लिए रवींद्र महात्रे को अपहृत कर उनकी हत्या की गई, लेकिन यह पाशा उल्टा पड़ा। इंदिरा गांधी के आतंकवाद के ख़िलाफ़ कड़े और स्पष्ट रुख के चलते मक़बूल को फ़ांसी पर लटका दिया गया। इस तरह उसके साथियों ने म्हात्रे का हत्या करके मक़बूल के जीवित रहने की संभावना ही खत्म कर दी। बहरहाल, 11 फरवरी को मक़बूल के समर्थक उसकी पुण्यतिथि मनाते हैं। 1989 में उसकी पुण्य तिथि के दिन ही आंतकवाद की शुरुआत की गई थी। उसी साल 4 नवंबर को मकबूल को फांसी की सजा देने वाले जज नीलकंठ गंजू की हत्या कर दी गई थी। तब से हिंसा का जो सिलसिला शुरू हुआ वह दिल्ली की सल्तनत पर बैठने वालों की नरम नीति के कारण आज भी बदस्तूर जारी है।

गुरुवार, 10 मार्च 2016

विजय माल्या विदेश भागे, अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत

हरिगोविंद विश्वकर्मा
हिंदी में एक कहावत हैः अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत. बैंकों से क़र्ज़ लेकर ऐय्याशी करने वाले राज्यसभा सदस्य विजय माल्या के विदेश भागने के बाद नरेंद्र मादी सरकार के हाथ-पांव मारने की हरकत पर यह कहावत सटीक बैठती है। दरअसल, जब माल्या देश में थे, तब उनका पॉसपोर्ट ज़ब्त करने की बजाय उन्हें खुली आज़ादी दी गई। अब बैंकों का 9000 करोड़ रुपए डुबोकर माल्या विदेश भाग गए, तब उनका पॉसपोर्ट रद करने और देश में लाने की बात की जा रही है।

मुद्दा यह है कि विजय माल्या को पहले कांग्रेस और अब बीजेपी रिजिम में खूब छूट मिली। मसलन, वह दो साल पहले डिफॉल्टर घोषित किए जा चुके हैं. इसके बावजूद उनकी ऐय्याशी वाली लाइफस्टाइल जस की तस रही। अभी पिछले 18 दिसंबर को अपने 60वें जन्म दिन पर माल्या ने गोवा में तीन दिन तक इतनी ऐय्याशी की कि रिज़र्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन को कहना पड़ा कि किसी डिफॉल्टर व्यक्ति को जन्मदिन पर इतनी दौलत नहीं ख़र्च करनी चाहिए।

आरबीआई गवर्नर ने इशारों-इशारों में कहा था कि देश में आम आदमी को महंगा क़र्ज़ ऐसी आलीशान बर्थडे पार्टियों के चलते ही मिल रहा है। जब रिजर्व बैंक का गवर्नर ऐसा कहे कि बैंकों का उधार न लौटा पाने वाले बड़े डिफॉल्टरों को पैसे की नुमाइश कर ऐसी ऐय्याशी के साथ जन्मदिन मनाने से गलत संदेश जा रहा है तो उसी समय उस आदमी पर शिकंजा कसना ही चाहिए था।

अभी कोई दस दिन पहले डियाजियो से 515 करोड़ रुपए की डील करने और अपनी कंपनी के चेयरमैनशिप से इस्तीफा देने के बाद भी माल्या ने कहा था कि वह लंदन में बसना चाहते हैं, ताकि वह अपने बच्चों के और करीब रह सकें। तब पूरे देश को लगा कि माल्या बैंकों का पैसा डुबोकर भागेंगे, लेकिन उन्हें रोकने वाली तमाम एजेंसियां हाथ पर हाथ धरे बैठी रहीं।

बुधवार को ख़बर आई कि माल्या आख़िरकार विदेश भाग ही गए। भारत के अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि माल्या फ़िलहाल देश मे नहीं है. वह कहां है, किसी को कुछ नहीं पता। हालांकि कहा जा रहा है कि वह लंदन में है, क्योंकि वह पहले ही कह चुके हैं कि वह लंदन में शिफ़्ट होना चाहते हैं।

कई लोगों का मानना है कि केंद्र सरकार की बड़े लोगों के प्रति उदार नीति के कारण माल्या को पहले गिरफ़्तार नहीं किया गया। लोग हैरानी जता रहे हैं कि इतने बड़े डिफॉल्टर का एहतियात के तौर पर पासपोर्ट क्यों ज़ब्त नहीं किया गया। बहरहाल, किंगफिशर एयरलाइंस को क़र्ज़ देने वाली 17 बैकों की अगुवाई कर रहे भारतीय स्टेट बैंक ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा तब खटखटाया जब बहुत देर हो चुकी थी। एसबीआई ने सरकार से अपील की थी कि माल्या को गिरफ्तार किया जाए, ताकि वह बैंकों का 9000 करोड़ रुपए डुबोकर विदेश न भाग सके। लेकिन नरेंद्र मोदी की सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी रही और माल्या चुपचाप निकल लिया।

अब माल्या को क़र्ज़ देने वाली सभी 17 बैंकों से भी यह पूछा जाना चाहिए कि माल्या समेत बैड लोन वाले क़र्ज़ को देने वाले बैंक अधिकारियों के ख़िलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हुई। गौरतलब है कि उद्योंगपतियों से सांठगांठ करके शीर्ष बैंक अफसर करोड़ों रुपए के क़र्ज़ बांटते हैं और उससे मिले नज़राने से ऐश करते हैं। क़र्ज़ मंजूर करने वाले ढेर सारे बैंक अधिकारी रिटायर होने के बाद विदेश शिफ्ट हो जाते हैं और ऐश करते हैं। ऐसे अफसरों को भी जांच के दायरे में लाने की ज़रूरत है। बैड लोन बांटने वाले बैंक अफसरों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं होती, इसलिए विजय माल्या जैसे लोग बैंकों को चूना लगाते हैं।  

हम आम जीवन में देखते हैं कि कोई आदमी महज़ 5-10 हज़ार रुपए का क़र्ज़ नहीं चुका पाए तो उसे बैंकें या तो पकड़ ले जाती हैं या फिर उसके घर बॉउंसर भेज देती हैं. लेकिन माल्या जैसे धन्नासेठों के साथ रियायत करती हैं। माल्या समेत उद्योगपतियों और बिल्डरों द्वारा लिया गया क़रीब पांच लाख करोड़ रुपए का लोन लिया बैड लोन घोषित किया जा चुका है।

इससे दो जून की रोटी जुटाने के लिए एड़ी-चोटी का पसीना बहाने वाले लोगों को लगता है कि इस देश में क़ायदे का जीवन केवल विजय माल्या जैसे मुट्ठीभर लोग जीते हैं, बाक़ी तो पेट भरने के लिए भी स्ट्रगल करते हैं। देशवासियों को यह भी लग रहा है कि बीजेपी हो, कांग्रेस हो, वामदल हों, आप हो, या सपा-राजद या ममता की पार्टी हो, सभी उद्योगपतियों के हित में काम करती हैं। बहरहाल, माल्या एपिसोड के बाद उम्मीद की जानी चाहिए कि बैंकें बड़े लोगों को क़र्ज़ बांटने की अपनी नीति में बदलाव करेंगी और प्रवर्तन निदेशालय बैंक अफसरों के आय के स्रोतों और आय की मिलान करके कार्रवाई करेगा।

जैसी कि उम्मीद थी विजय माल्या के विदेश भागने का मामला बृहस्पतिवार को संसद के दोनों सदनों में ज़ोरदार तरीक़े से उठा। राज्यसभा में कांग्रेस के ग़ुलाम नबीं आज़ाद के सवाल पर वित्तमंत्री अरुण जेटली कहा कि माल्या से एक-एक पाई वसूली जाएगी। अब कितना वसूली करेंगे, यह तो वक्त ही बताएगा। यह यह बताना ज़रूरी है कि ललित मोदी को लंदन भागे कितने साल हो गए, उसे स्वदेश लाकर मुक़दमा चलाना तो दूर बीजेपी के नेता वहां जाकर उससे मिलते रहे हैं। ऐसे में विजय माल्या के ख़िलाफ़ कार्रवाई होगी इस पर भारी संदेह है।

मंगलवार, 8 मार्च 2016

महिलाओं की हर समस्या का एक ही हल, हर जगह उन्हें 50 फ़ीसदी प्रतिनिधित्व

हरिगोविंद विश्वकर्मा
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाकर महिलाओं को ख़ुश करने की कोशिश की जा रही है। दरअसल, जो हो रहा है, वह मुद्दे से ध्यान हटाने की कवायद है। यह वैसी ही प्रैक्टिस है जैसे, कभी राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री तो कभी लोकसभा अध्यक्ष पद पर किसी महिला को बिठाकर मान लेना कि नारी सशक्तिकरण यानी वूमैन इम्पॉवरमेंट हो गया। दरअसल, जो लोग धूमधाम से महिला दिवस मनाते हैं, उनमें ज़्यादातर लोग महिलाओं का हक़ मारते हैं। चूंकि महिलाओं का हक़ मारना यानी उनके साथ पक्षपात एक सामाजिक अपराध है, लिहाज़ा, उसी सामाजिक अपराध का प्रायश्चित करने के लिए ही पुरुष प्रधान-समाज महिला दिवस मनाता है।

सवाल उठता है कि क्या सचमुच समाज के पैरोकार महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने के पक्षधर हैं, क्या सचमुच महिलाओं का उत्थान चाहते हैं। अगर हां, तो वे सभी प्रावधान किए जाएं जो सही मायने में स्त्री को बराबरी के मुकाम तक पहुंचाते हैं। इस क्रम में सबसे ज़रूरी है कि पहले असली समस्या को जानने की कोशिश करनी चाहिए क्योंकि, किसी को पता ही नहीं कि असली समस्या क्या है। ज़ाहिर है मर्ज़ के नेचर का पता नहीं चलेगा तो दवा अंदाज़ से दी जाएगी, जिससे ठीक होने की बजाय कभी-कभार मरीज़ की मौत तक हो जाती है।

अगर नेशनल क्राइम ब्यूरो के डेटा देश में नया पर गौर करें तो नया रेप क़ानून के अस्तित्व में आने के बाद रेप की घटनाएं ज्यादा तेजी से बढ़ी हैं। सन् 2009, 2010, 2011 और 2012 में रेप के मामले क्रमशः 21,397, 22172, 24206 और 24923  तो 2013 में नया कानून बनने के बाद रेप के मामले ऊछलकर सन् 2013, 2014, 2015 और 2016 में 33707, 34098, 36,735 और 38,947 हो गया। इसका अर्थ है डर्टी सोचवाले क़ानून से नहीं डरते। क़ानून कठोरतम यानी रेपिस्ट को पब्लिकली ज़िंदा जलाने का भी बना दिया जाए। तब भी वे महिलाओं पर ज़ुल्म जारी रखेंगे। यानी रेप समेत महिलाओं पर होने वाले ज़ुल्म क़ानून कठोर करके नहीं रोके जा सकते। दरअसल, समाज ही असंतुलित और पुरुष-प्रधान यानी मेल-डॉमिनेटेड है और ऐसे समाज में रेप नहीं रोका जा सकता, क्योंकि अपनी जटिलताओं के चलते यह समाज महिलाओं को अल्पसंख्यक बनाता है।

कठोर रेप लॉ के बावजूद बढ़ती रेप की वारदातें साबित करती हैं कि क़ानून-निर्माता अब भी मूल समस्या समझ पाने में नाकाम हैं। या तो उनकी सोच वहां तक पहुंच नहीं रही है कि समस्या आइडेंटीफाई कर उसे हल करें या फिर वे इतने शातिर हैं कि समस्या हल ही नहीं करना चाहते। यह भावना मे बहकर अनाप-शनाप बयान देने का वक़्त नहीं, बल्कि पता करने का वक़्त है कि रेप जैसे क्राइम रोके कैसे जाएं। रेपिस्ट को दंड देने की बात तो बाद में आती है। अगर ऐसे प्रावधान हो जाएं कि रेप जैसे अपराध हो ही न, तो दंड पर ज़्यादा दिमाग़ खपाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। सवाल उठता है कि आख़िर रेप जैसे जघन्य अपराध हो ही क्यों रहे हैं। आख़िर क्यों औरत को अकेले या एकांत में देखकर चंद पुरुष अपना विवेक, जो सही मायने में उन्हें इंसान बनाता है, खो देते हैं और हैवान का रूप धारण कर लेते हैं? एक स्त्री जो हर किसी के लिए आदरणीय होनी चाहिए, माता-बहन के समान होनी चाहिए, आख़िर क्यों अविवेकी लोगों के लिए महज भोग की वस्तुबन जाती है?

दरअसल, महिलाओं की बहुत कम संख्या देखकर पुरुष उन्हें कमज़ोर मान लेते हैं और मनमानी करने का दुस्साहस करने लगते हैं। महिलाओं पर होने वाले हर ज़ुल्म के लिए समाज का मैल-डॉमिनेटेड ताना-बाना ही ज़िम्मेदार है। ऐसे समाज में स्त्री पुरुष की बराबरी कर ही नहीं सकती, क्योंकि यह सेटअप स्त्री को सेकेंड सेक्स का दर्जा देता है। सभ्यता के विकास के बाद जब से मौजूदा समाज प्रचलन में आया, तब से स्त्री दोयम दर्जे की ही नागरिक रही। बॉलीवुड अभिनेत्रियों या शहरों की लड़कियों को जींस-टीशर्ट या स्कर्ट में देखकर कुछ क्षण के लिए ख़ुश हुआ जा सकता है कि महिलाएं पुरुषों की बराबरी कर रही हैं लेकिन सच यह है कि स्त्री कभी पुरुष की बराबरी कर ही नहीं पाई। यह सच स्त्रियों से बेहतर कौन समझ सकता है।

दरअसल, पुरुष-प्रधान मानसिकता ही स्त्री को बराबरी का दर्जा देने भी नहीं देती। लिहाजा, ज़रूरत उन प्रावधानों पर अमल करने की है जो सही मायने में स्त्री को बराबरी के मुकाम तक लाते हैं। इसके लिए शुरुआत घर से करनी होगी। क्या लोग अपने घर में स्त्री या लड़कियों को बराबरी का दर्जा देते हैं? क्या घर में बेटे-बेटी में फ़र्क़ नहीं करते? विकसित परिवारों में स्त्री के साथ खुला पक्षपात होता है, उसे एहसास दिलाया जाता है कि दोयम दर्जे की नागरिक है। ऐसे में पिछड़े और दूर-दराज़ के समाज में स्त्री की क्या पोज़िशन होती होगी, सहज समझा जा सकता है।

पुरुष-प्रधान संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 फ़ीसदी आरक्षण मिलेगा, अब इसकी संभावना नहीं के बराबर है। महिला आरक्षण तो किसी भी सरकार के एजेंडा में ही नहीं था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अपवाद नहीं हैं। ऐसे में जो नेता रेप पर आंसू बहाते हैं, वे लोगों को बेवकूफ़ बनाते हैं। इनकी स्त्रियों को बराबरी का दर्जा देने में दिलचस्पी ही नहीं। अगर लोग सचमुच महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने के हिमायती हैं तो सबसे पहले राजनीतिक दलों के अलावा केंद्र और राज्य सरकार में 50 फ़ीसदी पद महिलाओं को दें। यानी देश की हर सरकार में महिला-मंत्रियों की तादाद पुरुष-मंत्रियों के बराबर हो। विधायिका में 33 फ़ीसदी नहीं बल्कि 50 फ़ीसदी जगह महिलाओं के लिए सुनिश्चित हो। महिलाओं की आबादी फ़िफ़्टी परसेंट है तो विधायिका में आरक्षण 33 फ़ीसदी क्यों? संसद में 790 सदस्यों (लोकसभा-545 और राज्यसभा-245) में से किसी भी सूरत में 395 सदस्य महिलाएं होनी ही चाहिए।

एक बात और, महिला आरक्षण का लाभ केवल गांधी, पवार, बादल, पटनायक, या मुलायम जैसे राजनीतिक परिवारों की महिलाएं या लड़कियां ही हाईजैक न कर लें, जैसा कि होता रहा है। पॉलिटिकल फैमिलीज़ की महिलाएं अपने पति, पिता, ससुर या बेटे की पुरुष प्रधान सोच को ही रिप्रज़ेंट करती हैं। लिहाज़ा, महिला रिज़र्वेशन का लाभ आर्थिक-सामाजिक रूप से पिछड़े यानी ग़रीबदेहाती, आदिवासीदलित, पिछड़े वर्ग और मुस्लिम जमात की महिलाओं को भी मिले, यह भी सुनिश्चित होना चाहिए। इसके अलावा मेन स्ट्रीम से ग़ायब उच्च जाति की महिलाओं को भी मौक़ा मिले। विधायिका ही नहीं, न्यायपालिका में आधे जज और आधी एडवोकेट महिलाएं होनी चाहिए। फ़िलहाल सुप्रीम कोर्ट में 25 जज हैं, उनमें केवल एक ही महिला हैं। यही वजह है कि दिल्ली गैंगरेप का मुक़दमा सुप्रीम कोर्ट में तीन साल से लंबित है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या 400 की जानी चाहिए, उनमें 200 जज महिलाएं हों। इसी तरह हाईकोर्ट और निचली अदालतों में जजों की संख्या सीधे 16 गुना बढ़ा देनी चाहिए और महिला-पुरुष जजों की संख्या बराबर होनी चाहिए।

विधायिका और न्यायपालिका के बाद नंबर आता है ब्यूरोक्रेसी का। इसमें भी हर साल छात्र-छात्राओं को चयन बराबर संख्या में होनी चाहिए। पुलिस तंत्र में महिला-पुरुष की संख्या बराबर की जानी चाहिए। कल्पना कीजिए, किसी पुलिस स्टेशन में जाते हैं और वहां जितने पुरुष हैं, उतनी ही महिलाएं भी तो आपका डर, ख़ासकर महिलाओं का डर ख़त्म हो जाएगा। इसी तरह आर्मफोर्स, बैंक, मीडिया संस्थानों और धार्मिक संस्थानों में आधी स्ट्रेंथ महिलाओं की होनी ही चाहिए। सरकारी व निजी संस्थानों, स्कूल-कॉलेज और यूनिवर्सिटीज़ में 50 प्रतिशत पोस्ट महिलाओं को दी जानी चाहिए। आख़िर महिला घर में क्यों बैठें? वे काम पर क्यों न जाएं? यदि 50 फ़ीसदी महिलाएं काम पर जाएंगी तो घर के बाहर उनकी विज़िबिलिटी पुरुषों के बराबर होगी। यानी हर जगह जितने पुरुष दिखेंगे उतनी ही महिलाएं भी। इससे महिलाओं का मोरॉल बुस्टअप करेगा।

जब गली, सड़क, बस, ट्रेन, प्लेन, दफ़्तर, थाने, कोर्ट और स्कूल-कॉलेज यानी हर जगह में महिलाओं की संख्या और मौजूदगी पुरुषों के बराबर होगी तो पुरुष की ज़ुर्रत नहीं कि महिला को बुरी नज़र से देखे। वस्तुतः महिलाओं की कम संख्या ही लंपट पुरुषों को प्रोत्साहित करती हैं। सो महिलाओं को अबला या कमज़ोर होने से बचाना है तो उन्हें इम्पॉवर करना एकमात्र विकल्प है। जिस दिन केंद्र और राज्य सरकार, लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा, न्यापालिका, कार्यपालिका और पुलिस तंत्र में पुरुष-वर्चस्व ख़त्म हो जाएगा और महिलाएं बराबर की संख्या में मौजूद रहेंगी, उस दिन हालात एकदम बदल जाएंगे।

नतीजा यह होगा कि जब लड़कियों को लड़कों की तरह सरकारी और प्राइवेट नौकरी मिलने लगेगी तो उनमें सेल्फ़-रिस्पेक्ट पैदा होगा। वे अपने को पराश्रितऔर वस्तुसमझने की मानसिकता से बाहर निकलेंगी। वे पति या पिता रूपी पुरुष पर निर्भर नहीं रहेंगी, बल्कि स्वावलंबी होंगी। तब वे माता-पिता पर बोझ नहीं होंगी। तब प्रेगनेंसी के दौरान सेक्स-डिटरमिनेशन टेस्ट की परंपरा ख़त्म हो जाएगी। घर में लड़की के जन्म पर उसी तरह ख़ुशी मनाई जाएगी जैसे पुत्र के आगमन पर। लोग केवल पुत्र की कामना नहीं करेंगे, बल्कि लड़की की भी कामना करेंगे। यक़ीन मानिए, तब 1000 लड़कों के मुक़ाबले 1000 लड़कियां पैदा होंगी। समाज संतुलित और ख़ुशहाल होगा। जहां हर काम स्त्री-पुरुष दोनों कर सकेंगे।

मगर यक्ष-प्रश्न यह है कि क्या नारी को अबला और वस्तु मानने वाला पुरुष-प्रधान समाज अपनी सत्ता महिलाओं को सौंपने के लिए तैयार होगा? इस राह में पक्षपाती परंपराएं और संस्कृति सबसे बड़ी बाधा हैं जिनमें आमूल-चूल बदलाव की जानी चाहिए। यानी ढोल, गंवार शूद्र पशु नारी, ये सब ताड़न के अधिकारीचौपाई रचने वाले तुलसीदास जैसे पुरुष मानसिकता वाले कवियों को ख़ारिज़ करना पड़ेगा। रामचरित मानसको संशोधित करना होगा, जहां पत्नी की अग्निपरीक्षा लेने और गर्भावस्था में उसे घर से निकाल देने वाले पति को मर्यादा पुरुषोत्तम राममाना गया है। महाभारतऔर व्यास की सोच भी सुधारनी होगी, जो पत्नी को दांव पर लगाने वाले जुआड़ी पति युधिष्ठिर को धर्मराजमानती है। उन सभी परंपराओं और ग्रंथो में संशोधित करना होगा, जहां पुरुष को पति-परमेश्वरऔर स्त्री को चरणों की दासीमाना गया है। इतना ही नहीं उन त्यौहारों में बदलाव करना होगा, जिसमें पुरुष की सलामती के लिए केवल स्त्री व्रत रखती है। स्त्री की सलामती के लिए पुरुष व्रत नहीं रखता। स्त्री को घूंघट या बुरक़ा पहनने को बाध्य करने वाली नारकीय परंपराओं भी छोड़ना होगा। इतना ही नहीं लड़कियों को पिता की संपत्ति में बराबर की हिस्सेदारी सुनिश्चित करनी होगी और उस पर सख़्ती से अमल करना होगा। सवाल खड़ा होता है, क्या यह पुरुष-प्रधान समाज इसके लिए तैयार होगा?

वस्तुतः समाज में महिलाओं की बहुत कम विज़िबिलिटी ही सबसे बड़ी समस्या या प्रॉब्लम है। घर के बाहर महिलाएं दिखती ही नहीं, दिखती भी हैं तो नाममात्र तादाद में। सड़कों, रेलवे स्टेशनों और दफ़्तरों में उनकी प्रज़ेंस बहुत कम होती है। मुंबई और दिल्ली जैसे डेवलप्ड सिटीज़ में भी महिलाओं की विज़िबिलिटी दस-पंद्रह फ़ीसदी से ज़्यादा नहीं है। देश के बाक़ी हिस्सों में तो हालत भयावह है। चूंकि महिलाओं की आबादी 50 फ़ीसदी है तो हर जगह उनकी मौजूदगी भी 50 फ़ीसदी होनी चाहिए। अगर विज़िबिलिटी की इस समस्या को हल कर लिया गया यानी महिलाओं की प्रज़ेंस 50 फ़ीसदी कर ली गई तो महिलाओं की ही नहीं, बल्कि मानव समाज की 99 फ़ीसदी समस्याएं ख़ुद-ब-ख़ुद हल हो जाएंगी। इसके बाद महिला दिवस मनाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। महिलाएं बिना किसी क़ानून के सही-सलामत और महफ़ूज़ रहेंगी।
(समाप्त)