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रविवार, 22 सितंबर 2019

चीन में उइगरों की दुर्दशा पर मुस्लिम समुदाय मौन क्यों?

हरिगोविंद विश्वकर्मा
दुनिया में किसी कोने में मुसलमानों पर ज़ुल्म होता है तो आम मुसलमान इस्लाम के भाईचारे का हवाला देते हुए पीड़ितों के समर्थन में उठ खड़ा हो जाता है। लेकिन चीन के शिंजियांग प्रांत में उइगर मुसलमानों पर हो रहे ज़ुल्म के ख़िलाफ़ कोई आवाज़ नहीं उठाता है। 2012 में जब रोहिंग्या मुसलमानों को कथित तौर पर म्यानमार से निकाला जाने लगा तो उनके समर्थन में मुंबई के आज़ाद मैदान में मुसलमानों ने भारी उपद्रव किया था। हिंसा की होली खेली और पुलिस बल पर पथराव किया गया था। बहरहाल, मुंबई पुलिस के अत्यधिक संयम के चलते उस समय भारी मारकाट होने से बच गया। इसी तरह भारत में फलिस्तीन के मुसलमानों का इतना अंध समर्थन किया जाता है कि आम मुसलमान इज़राइल को अपना दुश्मन नंबर एक मानता है। मुसलमानों की नाराज़गी के डर से ही इज़राइल जैसे विकसित और समान विचारधारा वाले देश के साथ रिश्ते को बेहतर बनाने में कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकारों ने कभी दिलचस्पी ही नहीं ली।


चीन के पश्चिमी प्रांत शिंजियांग में उइगरों पर ज़ुल्म होने की अक्सर ख़बरें आ रहती हैं। वहां मस्जिदों पर बुलडोजर चलवाया जाता है। उइगरों की धार्मिक स्वतंत्रता पर भी अंकुश लगा है। मेलबोर्न आस्ट्रेलिया के ला-त्रोबे यूनिवर्सिटी के जातीय समुदाय और नीति के विशेषज्ञ रिसर्चर जेम्स लीबोल्ड कहते हैं, “चीन की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी धर्म को ख़तरा मानती है। लंबे समय से चीन सरकार चीनी समाज को सेक्यूलर बनाना चाहती है। इसीलिए उइगरों पर अत्याचार किया जाता है।” इस साल गर्मियों में रमज़ान महीने में ही शिंजियांग के होतन शहर की सबसे प्रमुख हेयितका मस्जिद को ढहा दिया गया। इस बार जब रमज़ान में दुनिया के कोने-कोने में मुसलमान ख़ुशी से ईद मना रहे थे, तब दर्जनों मस्जिद गिराए जाने से शिंजियांग के मुस्लिम बस्तियों में सन्नाटा पसरा था, क्योंकि ऊंची गुंबददार मस्जिद की निशानी मिटने से बस्ती वीरान थी। वहां सुरक्षाकर्मियों की भारी मौजूदगी थी। 2014 में शिंजियांग सरकार ने रमज़ान में मुस्लिम कर्मचारियों के रोज़ा रखने और मुस्लिम नागरिकों के दाढ़ी बढ़ाने पर पाबंदी लगा दी थी। अंतरराष्ट्रीय मीडिया के मुताबिक 2014 में ही सख़्त आदेशों के बाद यहां की कई मस्जिदों और मदरसों के भवन ढहा दिए गए। 2017 के बाद से अकेले शिंजियांग में 36 मस्जिदें गिराई जा चुकी हैं। हालांकि शिंजियांग सरकार ने कहा कि वह धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करती है और नागरिक कानून की सीमा के दायरे में रहते हुए रमज़ान मना सकते हैं।


भारत में भी रोहिंग्या के लिए हथियार उठाने की बात करने वाले तमाम मुसलमान उइगरों के मुद्दे पर चुप हैं। किसी कोने से उइगरों पर ज़ुल्म के ख़िलाफ़ कोई आवाज़ नहीं उठा रहा है। कश्मीर मुद्दे पर दुनिया के मुसलमानों से सहयोग की अपील करने वाले इमरान ख़ान भी शिंजियांग के एक करोड़ से ज़्यादा मुसलमानों की दुर्दशा पर एकदम खामोश हैं। इमरान ने एक टीवी इंटरव्यू में कहा कि उइगरों की समस्या के बारे में उन्हें ज़्यादा जानकारी नहीं है। उइगर मुद्दे पर चीन को घेरने की जगह भारत ने इंटरपोल रेड कॉर्नर नोटिस का हवाला देकर अप्रैल 2016 में वर्ल्ड उइगर कांग्रेस की एग्ज़ीक्यूटिव कमेटी के चेयरमैन डोल्कन ईसा का ई-वीज़ा ही रद्द कर दिया था। जर्मनी निवासी ईसा धर्मशाला में तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा से मिलना चाहते थे। हैरानी वाली बात है कि उसी समय चीन जैश-ए-मोहम्मद सरगना मौलाना अज़हर मसूद को आतंकी घोषित कराने के प्रस्ताव का संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में बार-बार विरोध कर रहा था। इतना ही नहीं, हाल ही में चीन ने कश्मीर मुद्दा भी सुरक्षा परिषद में उठाया, पर प्रस्ताव गिर गया।


दरअसल, शिंजियांग के उइगर मुसलमान पिछले कई दशक से 'ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट' चला रहे हैं। वे चीन से अलग होना चाहते है। 1990 में सोवियत संघ का विघटन होने पर भी शिंजियांग की आज़ादी के लिए उइगर मुसलमानों ने संघर्ष किया था। उइगर आंदोलन को मध्य-एशिया में कई मुस्लिम देशों का समर्थन भी मिला था, लेकिन चीनी सरकार के कड़े रुख के आगे किसी की न चली और आंदोलन को सैन्य बल से दबा दिया गया। 'पूर्व तुर्किस्तान गणतंत्र' नामक राष्ट्र की पिछली सदी में दो बार स्थापना हो चुकी है। पहली बार 1933-34 में काश्गर शहर में केंद्रित था और दूसरी बार 1944-49 में सोवियत संघ की सहायता से पूर्वी तुर्किस्तान गणतंत्र बना था। 1949 से इस क्षेत्र पर चीन का नियंत्रण हैचीन 'पूर्वी तुर्किस्तान' नाम का ही विरोध करता है। वह इसे शिंजियांग प्रांत कहता है। इसकी सीमा मंगोलिया और रूस सहित आठ देशों के साथ मिलती है। इसकी अर्थव्यवस्था सदियों से खेती और व्यापार पर केंद्रित रही है। ऐतिहासिक सिल्क रूट की वजह से यहां संपन्नता और ख़ुशहाली रही है।


शिंजियांग में पहले उइगर मुसलमानों का बहुमत था। लेकिन एक रणनीति के तहत चीन ने वफ़ादार रहे बहुसंख्यक नस्लीय समूह हान समुदाय के लोगों को यहां बसाना शुरू किया। पिछले कई साल से इस क्षेत्र में हान चीनियों की संख्या में बहुत अधिक इज़ाफ़ा हुआ है। वामपंथी चीनी सरकार 'ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट' को दबाने के लिए हान चीनियों को यहां भेज रही है। उइगरों का आरोप है कि चीन सरकार भेदभावपूर्ण नीतियां अपना रही है। वहां रहने वाले हान चीनियों को मजबूत करने के लिए सरकार हर संभव मदद दे रही है। सरकारी नौकरियों में उन्हें ऊंचे पदों पर बिठाया जा रहा है। उइगुरों को दोयम दर्जे की नौकरियां दी जा रही हैं। दरअसल, सामरिक दृष्टि से शिंजियांग बेहद महत्वपूर्ण है और चीन ऐसे में ऊंचे पदों पर बाग़ी उईगरों को बिठाकर कोई जोखिम नहीं लेना चाहता। इसीलिए हान लोगों को नौकरियों में ऊंचे पदों पर बैठाया जा रहा है।


उइगर दरअसल अल्पसंख्यक तुर्क जातीय समूह हैं जो सभ्यता के विकास के बाद मध्य-पूर्व एशिया से आकर पूर्वी तुर्की में बस गया। आज भी ये लोग सांस्कृतिक रूप से मध्य-पूर्व एशिया से जुड़े हैं। इस्लाम के वहां पहुंचने पर ये लोग इस्लाम के अनुयायी बन गए। मध्य एशिया के इस ऐतिहासिक इलाक़े को कभी पूर्वी तुर्किस्तान कहा जाता था, जिसमें ऐतिहासिक तारिम द्रोणी और उइग़ुर लोगों की पारंपरिक मातृभूमि सम्मिलित हैं। इसका मध्य एशिया के उज़बेकिस्तान, किर्गिज़स्तान और काज़ाख़िस्तान जैसे तुर्क देशों से गहरा धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक संबंध रहा। उइगर आधिकारिक तौर पर मान्यता प्राप्त चीन के 55 जातीय अल्पसंख्यकों में से एक माना जाता है। पिछले साल अगस्त में संयुक्त राष्ट्र की एक कमेटी को बताया गया था कि शिंजियांग में क़रीब दस लाख मुसलमान हिरासत में रखे गए हैं। हालांकि चीन सरकार ने पहले इन ख़बरों का खंडन किया था, लेकिन इस दौरान शिंजियांग में लोगों पर निगरानी के कई सबूत सामने आए थे। तब पिछले साल चीनी प्रशासन ने माना कि तुर्कभाषी व्यावसायिक शिक्षा केंद्र चला रहे हैं, जिसका मकसद है कि लोग चीनी कानूनों से वाकिफ होकर धार्मिक चरमपंथ का रास्ता त्याग दें।


वामपंथी चीनी सरकार के पक्षपाती रुख के चलते इस क्षेत्र में हान चीनियों और उइगरों के बीच अक्सर संघर्ष की ख़बरें आती हैं। हिंसा का सिलसिला 2008 से शुरू हुआ। इसके बाद से इस प्रांत में लगातार हिंसक झड़पें होती रही हैं। 2008 में शिंजियांग की राजधानी उरुमची में हिंसा में 200 लोग मारे गए जिनमें अधिकांश हान चीनी थे। अगले साल 2009 में उरुमची में दंगे हुए जिनमें 156 उइगुर मुस्लिम मारे गए। इस दंगे की तुर्की ने कड़ी निंदा करते हुए इसे ‘बड़ा नरसंहार’ कहा था। 2012 में छह लोगों को हाटन से उरुमची जा रहे विमान को हाइजैक करने की कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हुए। चीन ने इसमें उइगर मुसलमानों का हाथ बताया था। 2013 में प्रदर्शन कर रहे उइगरों पर पुलिस ने फायरिंग कर दी, जिसमें 27 प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई थी। अधिकृत चीनी मीडिया ने तब कहा था कि प्रदर्शनकारियों के पास घातक हथियार थे जिससे पुलिस को गोलियां चलानी पड़ीं। अक्टूबर 2016 में बीजिंग में एक कार बम धमाके में पांच लोग मारे गए जिसका आरोप उइगरों पर लगा। उइगरों पर हिंसा की घटनाएं अक्सर होती हैं, लेकिन ऐसी घटनाओं को चीनी सरकार दबा देती है। यहां मीडिया पर पाबंदी होने के कारण ख़बरें नहीं आ पाती हैं।


मिस्र में दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित सुन्नी मुस्लिम शैक्षिक संस्थान अल अजहर में इस्लामिक धर्मशास्त्र का अध्ययन कर रहे उइगर छात्र अब्दुल मलिक अब्दुल अजीज ने इसी साल अगस्त में आरोप लगाया था कि एक दिन अचानक मिस्र पुलिस ने उस बिना किसी वजह के गिरफ्तार कर लिया और उसकी आंख पर पट्टी बांध दी। जब पुलिस ने उसकी आंखों से पट्टी हटाई गई तो वह यह देखकर सकते में पड़ गया कि वह एक पुलिस स्टेशन में है और चीनी अधिकारी उससे पूछताछ कर रहे हैं। उसे दिनदहाड़े उसके दोस्तों के साथ उठाया गया और काहिरा के एक पुलिस स्टेशन में ले जाया गया जहां चीनी अधिकारियों ने उससे पूछा कि वह मिस्र में क्या कर रहा है। तीनों अधिकारियों ने उससे चीनी भाषा में बात की और उसे चीनी नाम से संबोधित किया ना कि उइगर नाम से। अब्दुल ने कहा कि चीन में उइगर मुसलमानों पर अत्याचारों की बात किसी से छिपी नहीं है और अब दूसरे देशों में रह रहे उइगरों पर नकेल कसा जा रहा है। दरअसल, पाकिस्तान की तरह मिस्र में भी चीन बड़े पैमाने पर निवेश कर रहा है, इसीलिए वहां भी उइगरों पर नकेल कसी जा रही है।

चीन का कहना है कि उसे उइगर अलगाववादी इस्लामी गुटों से ख़तरा है, क्योंकि कुछ उइगर लोगों ने इस्लामिक स्टेट समूह के साथ हथियार उठा लिए हैं। चीन इसके लिए उइगर संगठन 'ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट' को दोषी मानता है। उसके अनुसार विदशों में बैठे उइगर नेता शिंजियांग में हिंसा करवाते हैं। चीन ने सीधे तौर पर हिंसा के लिए वरिष्ठ उइगर नेता इलहम टोहती और डोल्कन ईसा को जिम्मेदार ठहराया है। ईसा चीन की 'मोस्ट वांटेड' की सूची में है। इन मामलों को लेकर चीन में कई उइगर नेता जेल में हैं। उइगर समुदाय के अर्थशास्त्री इलिहम टोहती 2014 से चीन में जेल में बंद हैं। वहीं, उइगर संगठन चीन के आरोपों को गलत और मनगढ़ंत बताते हैं। उधर अमेरिका भी 'ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट' को उइगरों का अलगाववादी समूह मानता है, लेकिन वाशिंगटन का यह भी कहना है कि इस संगठन की आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देने की न तो क्षमता है और न ही हैसियत।


शनिवार, 21 सितंबर 2019

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव - भगवा गठबंधन के लिए इस बार वॉकओवर जैसी स्थिति


हरिगोविंद विश्वकर्मा
महाराष्ट्र में विधान सभा चुनाव की बहुप्रतीक्षित घोषणा निर्वाचन आयोग ने कर दी। राज्य में पहली बार चुनाव ऐसे माहौल में हो रहा है, जब विपक्ष एकदम बिखरा हुआ है। कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में हालांकि 125-125 सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला हो चुका है, लेकिन दोनों दलों के नेता इस तरह दूसरे दल में जा रहे हैं कि कांग्रेस और एनसीपी का नेतृत्व ख़ुद नहीं जानता कि कौन नेता कल पाला बदल लेगा। अब तक कांग्रेस और एनसीपी के 16 विधायक भारतीय जनता पार्टी या शिवसेना का दामन थाम चुके हैं।

विधानसभा में विपक्ष के नेता राधाकृष्ण विखे-पाटिल भाजपा में शामिल हुए। फड़णवीस ने उन्हें आवास मंत्री बना दिया। कई और बड़े नेता भाजपा में शामिल होने के लिए कतारबद्ध हैं। कतार लंबी होने के कारण इनमें से कई लोगों को शिवसेना में शामिल होने की सलाह दी जा रही है। एनसीपी मुंबई अध्यक्ष एवं पूर्व मंत्री सचिन अहिर और कांग्रेस के अब्दुल सत्तार शिवसेना का दामन थाम चुके हैं। दोनों भाजपा में शामिल होना चाहते थे। पूर्व उपमुख्यमंत्री अजित पवार के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले के बाद एफआईआर दर्ज होने से भी पार्टी बैकफुट पर है। शरद पवार ने हाल ही में पाकिस्तान की तारीफ करके एनसीपी कार्यकर्ताओं को भी असहज कर दिया है।

नरेंद्र मोदी के दौबारा प्रधानमंत्री बनने के बाद जिस तरह ट्रिपल तलाक का कानून पास किया गया और जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35 ए को हटाया गया और जम्मू-कश्मीर में कोई खून-खराबा नहीं हुआ उससे भाजपा के समर्थन में स्पष्ट जनादेश दिख रहा है। अनुच्छेद 370 ने आर्थिक मंदी, कंपनियों में छंटनी और बेरोजगारी जैसे बुनियादी मुद्दों को दबा दिया है। कांग्रेस ने अनुच्छेद 370 और 35ए को हटाए का विरोध करके अपने पांव पर कुल्हाड़ी दे मारी है। आम कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं को इस मुद्दे पर जनता का सामना करने में असुविधा हो रही है। अगर राज ठाकरे की बात करें तो इस बार विधान सभा चुनाव में उन्हें कोई भी सीरियसली नहीं ले रहा है।

भाजपा प्रचारकों को राज्य में भेजा जा रहा है ताकि अनुच्छेद 370 और 35 ए को हटाए का अधिकतम चुनावी लाभ लिया जा सके। इसी क्रम में सोमवार यानी 23 सितंबर को गोरेगांव के प्रदर्शनी मैदान पर गृहमंत्री अमित शाह की सभा हो रही है। राजनीति के जानकार साफ साफ कह रहे हैं कि इस चुनाव में सत्तारूढ़ गठबंधन को विपक्ष से इस बार वॉकओवर मिलता दिख रहा है। यह इस बिना पर कहा जा रहा है क्योंकि लोकसभा चुनाव में भाजपा शिवसेना गठबंधन को 230 विधान सभा सीटों पर बढ़त मिली थी।

हालांकि भारतीय जनता पार्टी और उसकी सहयोगी शिवसेना में सीट बंटवारे का पेंच अभी तक फंसा हुआ है। परंतु दोनों दलों का शीर्ष नेतृत्व कह रहा है कि सीट को लेकर समझौता हो जाएगा और भगवा गठबंधन के दोनों दल एक साथ चुनाव लड़ेंगे। समझा जा रहा है कि भारतीय जनता पार्टी इस बार कमांडिंग पोज़िशन में है। लिहाज़ा, शिवसेना लोकसभा चुनाव की तरह बारगेनिंग करने की स्थिति में नहीं है। रोचक बात यह है कि भाजपा के अंदर एक तबका ऐसा भी है, जो चाहता है भाजपा अकेले चुनाव लड़े, लेकिन भाजपा अकेले चुनाव नहीं लड़ेगी।

पिछली बार चुनाव में सीट बंटवारे को लेकर गंभीर मतभेद के चलते गठबंधन नहीं हो सका था और दोनों दल अकेले चुनाव मैदान में उतरे थे। भाजपा 122 सीट जीतने में कामयाब रही, जबकि शिवसेना केवल 63 सीट ही जीत सकी थी। अब तीन दूसरे दलों के विधायक शिवसेना में आ चुके हैं। इस तरह इस पार्टी के पास 66 विधायक हैं। जबकि भाजपा शिवसेना के बहुत आगे है, 13 विधायक भाजपा में आ गए हैं। मौजूदा परिस्थितियों में अगर सूत्रों की मानें तो भाजपा शिवसेना को अधिकतम 110 सीटें ही दे सकती है। हालांकि शिवसेना आधे-आधे की बात कर रही हैं, जबकि उसके नेता 115 सीट तक मान सकते हैं।

केंद्रीय नेतृत्व ने बहुत पहले देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में चुनाव लड़ने का मन बना लिया था। राज्य की छह दशक की राजनीति में पहली बार मुख्यमंत्री का चेहरा सामने रखकर चुनाव लड़ा जा रहा है। भाजपा के अंदर मुख्यमंत्री पद को लेकर कोई कन्फ्यूजन न रहे इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह पब्लिक मंच से औपचारिक घोषणा कर चुके हैं कि राज्य का चुनाव फडणवीस के नेतृत्व में लड़ा जाएगा। देवेंद्र फड़णवीस के रूप में महाराष्ट्र को 1975 के बाद अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा करने वाला पहला मुख्यमंत्री मिला। इससे पहले लोग दो या तीन साल के लिए ही मुख्यमंत्री बन पाते थे।

देवेंद्र फड़णवीस अपनी दूसरी पारी के लिए कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे हैं। तीन चरण वाली उनकी ‘महाजनादेश यात्रा’ उम्मीद से अधिक सफल रही। महाजनादेश यात्रा के दौरान हर जगह फड़णवीस को देखने सुनने बड़ी संख्या में लोग जुटे। फड़वणीस की यात्रा के समांतर युवा शिवसेना नेता आदित्य ठाकरे विजय संकल्प मेलावा पर निकले थे। वह ‘नया महाराष्ट्र’ बनाने का आह्वान कर रहे थे। यात्रा के मामले में विपक्ष भी पीछे नहीं था। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी खान देश और पश्चिम महाराष्ट्र में शिव स्वराज्य यात्रा निकाल चुकी है। कांग्रेस इस मामले में पिछड़ गई।

पहले कहा जा रहा था कि भगवा गठबंधन में मुख्यमंत्री पद को लेकर खींचतान चल रही है और शिवसेना आदित्य ठाकरे का नाम आगे कर रही है, लेकिन यह मात्र अटकल साबित हुई, शिवसेना जानती है कि भाजपा के साथ रहना उसके लिए फायदेमंद है। अगर भगवा गठबंधन सत्ता में वापस लौटता है तो आदित्य नई सरकार में उपमुख्यमंत्री बनाए जा सकते हैं। वैसे मुख्यमंत्री जनादेश यात्रा में ही कह चुके हैं कि आदित्य ठाकरे अगर चाहेंगे तो उनको उपमुख्यमंत्री पद दिया जा सकता है। फडणवीस ने यह भी कहा था कि भाजपा कार्यकर्ता चाहते हैं कि भाजपा अकेले चुनाव लड़े और पार्टी उस स्थिति में है भी, लेकिन भाजपा गठबंधन का धर्म निभाएगी और लोकसभा चुनाव से पहले हुआ गठबंधन जारी रहेगा। कुल मिलाकर राज्य में कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन इतना कमज़ोर हो चुका है कि भाजपा और शिवसेना के लोग कह रहे हैं, "अच्छे दिन आने वाले हैं।"


अब स्वामी चिन्मयानंद के आश्रमों की गहन जांच की ज़रूरत


हरिगोविंद विश्वकर्मा
मैं अपने किए पर बहुत ही शर्मिंदा हूं। मुझसे इससे आगे और कुछ मत पूछिए प्लीज़!” सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर बनाई गई एसआईटी के सामने पूछताछ के दौरान ज्ञानवान-प्रज्ञावान और वैदिक धर्म के प्रकांड पंडित भगवाधारी महापुरुष स्वामी चिन्मयानंद ने यही कहा था। स्वामी के इस भावुक स्वीकारोक्ति के बाद एसआईटी ने उनसे कुछ और पूछना उचित नहीं समझा। एसआईटी का यह क़दम समझ से परे है। वस्तुतः एसआईटी का कहना है कि इस मामले में उपलब्ध सबूत ख़ुद कहते हैं कि प्राइमा फेसाई स्वामी दोषी हैं। पीड़ित छात्रा ने जो भी आरोप लगाए हैं, वे सब सही हैं। इसके बाद तथाकथित संत चिन्मयानंद को गिरफ़्तार कर लिया गया। इस तरह आसाराम बापू और गुरमीत सिंह राम-रहीम के बाद स्वामी चिन्मयानंद तीसरे साधु हैं, जो आश्रम में रहकर अपनी ऐय्याशी कर रहे थे और धर्म के पवित्र चादर को चर्र-चर्र फाड़ रहे थे।

बहरहाल, 20 सितंबर, 2019 को चिन्मयानंद गिरफ़्तार कर लिए गए। उनके ख़िलाफ़ भारतीय दंड संहिता की धारा 376 सी, 354 डी, 342, और 506 के तहत केस दर्ज़ किया गया है। यानी जांच एजेंसी ने उन पर सीधे रेप का केस दर्ज़ नहीं किया है। कई लोग जांच एजेंसी के फ़ैसले को चिन्मयानंद को दी गई रियायत के रूप में देख रहे हैं। जो भी हो, शाहजहांपुर की स्थानीय अदालत ने स्वामी को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। वैसे स्वामी को बचाने की हर संभव कोशिश की गई। पीड़िता का धारा 164 के तहत बयान दर्ज़ होने के बाद, उसी दिन देर शाम स्वामी के बीमार होने की बात फैलाई गई। अगले दिन उन्हें बरेली मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भर्ती कराया गया। बाद में किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी लखनऊ रेफ़र कर दिया गया। लखनऊ में इलाज के दौरान पोलपट्टी खुल जाने के डर से उन्होंने वहां जाना रद कर दिया और कहा कि वह आयुर्वेदिक इलाज करवाना चाहते हैं। उन्हें मुमुक्षु आश्रम वापस ले जाया गया। वही से उनकी गिरफ्तारी हुई। इस तरह एक और साधु जेल चला गया।

चिन्मयानंद पर पहली बार बलात्कार का आरोप नही लगा है। आठ साल में यह दूसरा मौका है, जब उन पर बलात्कार का बेहद गंभीर आरोप लगा। 2001 में चिन्मयानंद जौनपुर के सांसद थे। एक दिन दक्षिणी दिल्ली की एक युवती अपने माता-पिता के साथ उनसे मिलने आई। कहते हैं, चिन्मयानंद उसी समय उस पर लट्टू हो गए और उन्होंने युवती को आधात्यामिक ज्ञान लेने की सलाह दी। उसके माता-पिता को भी बताया कि आध्यातमिक ज्ञान लेने के बाद यह लड़की दुनिया में नाम रौशन करेगी।  वह युवती स्वामी से बहुत इंप्रेस्ड हुई और दीक्षा लेना स्वीकार कर लिया। अगले साल 2002 में वह दीक्षा लेने वाली थी लेकिन मामला अटक गया। 2010 में दोबारा वह साध्वी नहीं बन सकी। बहरहाल, उसे साध्वी कहा जाने लगा। उस युवती ने नवंबर 2011 को चिन्मयानंद के ख़िलाफ़ शहर कोतवाली में बलात्कार का मामला दर्ज़ कराया।

साध्वी पीड़िता को एक विद्यालय में प्राचार्य की नौकरी मिल गई है। कुछ समय पहले उसने इंटरव्‍यू में अपनी दास्तां बताते हुए साध्वी ने कहा,मैं स्वामी चिन्मयानंद के पास संन्यास ग्रहण करने गई थी। लेकिन मुझे साध्वी नहीं बनाया। तो मैं वापस आ गई, लेकिन 2004 में स्वामी के गुंडों ने बंदूक के बल पर मुझे किडनैप कर लिया। दिल्ली से मुझे शाहजहांपुर ले जाया गया। वहां एक दिन स्वामी ने नशे में धुत होकर स्वामी के मेरे साथ रेप किया। रेप का वीडियो भी बनाया गया था। उसने ज़ुबान बंद रखने को कहा। मैं चुप हो गई और आश्रम में रहने लगी। वह सात साल तक मेरा यौन-शोषण करता रहा। इस दौरान मैं कई बार गर्भवती हुई। दो बार तो मेरा गर्भपात करवाया गया। उसके गुंडे हमेशा मेरे पीछे लगे रहते थे इस तथाकथित भगवाधारी ने मेरे साथ-साथ दर्ज़नों दूसरी लड़कियों का जीवन बर्बाद कर दिया। बूढ़ा होने के बावजूद लड़कियों के बिना यह नहीं रह सकता। बहुत बड़ा मक्कार और जालिम है।

पीड़ित साध्वी ने बताया था, 2010 में हरिद्वार आश्रम में रुद्र यज्ञ हो रहा था। स्वामी ने दिखावे के लिए स्वामी ने मुझे रुद्र यज्ञ में बैठने के लिए कहा, जबकि दूसरे आचार्य ने हमें वहां बैठने नहीं दिया। उसने कारण यह बताई कि सरस्वती परंपरा में महिलाएं संन्यास नहीं ले सकतीं। वहां मौजूद स्वामी चिन्मयानंद मंद-मंद मुस्करा रहे थे। मै समझ गई कि सारा खेल उसी का रचा हुआ है। जब मालूम हो गया कि संन्यास नहीं मिलने वाला, तो इस तरह का जीवन जीने का कौई अर्थ नहीं था। लिहाज़ा, मैंने वैदिक रीति से विवाह किया।

साध्वी ने यह भी दावा किया कि चिन्मयानंद ने तरुणाई में अपने गांव से संन्यास लेने के लिए नहीं, बल्कि गांव की ही एक लड़की से रेप करके भागा था। हैरान करने वाली बात है कि वह लड़की स्वामी की चचेरी बहन लगती थी। स्‍वामी ने आज तक किसी को साध्वी नहीं बनाया। वह केवल इस्तेमाल करता है। उसके सभी आश्रमों में ढेर सारी लड़कियां हैं। लड़कियों को गर्भवती करके उनकी शादी किसी ग़रीब ब्राह्मण या किसी नौकर से करवा देता है। स्‍वामी का आश्रम देश का पहला संस्‍थान है, जहां महिलाएं रहती हैं, लेकिन महिला वार्डेन नहीं रखी जाती। जब वह मेरे प्रमाणपत्रों को जला रहा था, तो मैंने उसके पैर पकड़े थे, लेकिन उस राक्षस ने नहीं माना और मेरे सारे प्रमाणपत्र जला दिए।

य़ह संयोग है कि चिन्मयानंद के लॉ कॉलेज की छात्रा ने आरोप लगाया है कि यह दुराचारी ढेर सारी लड़कियों की ज़िंदगी ख़राब कर चुका है। शिष्या के दुष्कर्म का आरोप लगाने के बावजूद चिन्मयानंद का बाल बांका नहीं हुआ। योगी सरकार ने मार्च 2018 में सीआरपीसी की धारा 321 के तहत शाहजहांपुर की अदालत से मुकदमा वापस लेने का फैसला किया। इसका पीड़ित साध्वी ने विरोध किया। एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में उसने कहा बेटियों के सम्मान में, भाजपा मैदान में नारा देने वाली भाजपा अब मेरा मुक़दमा ख़त्म कर रही है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है। मैं भी किसी बेटी हूं, मुझे भी इंसाफ चाहिए। केस वापस लेना लोकतंत्र की हत्या करने जैसा है। किसी अपराधी का इस हद तक पक्ष लिया जा रहा है कि सरकार उसे ट्रायल तक फेस नहीं करने देना चाहती। सरकार को न्यायालय के फ़ैसले की प्रतीक्षा करनी चाहिए थी। मैंने अदालत में इस आशय का प्रार्थनापत्र दिया है कि आरोपी के ख़िलाफ़ वारंट जारी करके उसे जल्द से जल्द जेल भेजा जाए।


चिन्मयानंद शाहजहांपुर के मूल निवासी नहीं बल्कि वह गोंडा जिले के गोगिया पचदेवरा गांव के निवासी हैं। उनके बचपन का नाम कृष्णपाल सिंह है। उनका परिवार काग्रेस विचारधारा का था। उनके चचेरे भाई उमेश्वर प्रताप सिंह कांग्रेस से विधायक भी रहे। तीन मार्च 1947 को पैदा हुए कृष्णपाल के घर का माहौल धार्मिक था। साधु-संतों का आना-जाना रहता था। लिहाज़ा, उनकी भी प्रवृत्ति धार्मिक हो गई। इंटर करने के बाद उन्होंने घर का त्याग कर दिया और पंजाब चला गया। कुछ समय तक वहां रहने के बाद बृंदावन पहुंच गए। इस दौरान उन्होंने इंस्टीट्यूट ऑफ ओरिजनल फिलास्फी से ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल कर ली। उन्होंने लखनऊ से भी पढ़ाई की। 1882 में बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से दर्शनशास्त्र में पीएचडी किया।

बृंदावन  से चिन्मयानंद 1971 में परमार्थ आश्रम ऋषिकेश पहुंचा और साधु-संतों के बीच रहने लगे। उनकी वैराग्य प्रवृत्ति को देकर उन्हें दीक्षा दी गई और उनका नाम चिन्मयानंद रखा गया। इस तरह कृष्णपाल से स्वामी चिन्मयानंद बन गए। स्वामी बनने के बाद वह परिवार की विचारधार के विपरीत जाकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ गए। हालांकि संघ के लोग चिन्मयानंद की संदिग्ध गतिविधियों से देखकर सतर्क हो गए और संघ में उसे कोई ज़िम्मेदारी नहीं दी गई। अपनी तरफ़ से चिन्मयानंद संघ की विचारधारा के समर्थक बन गए। उनहोंने संघ की एकात्मता यात्रा में भागीदारी की। वह जयप्रकाश नारायण के आदोलन से जुड़े रहे। फिर रामजन्मभूमि आदोलन से जुड़ गए। 1984 में सरयू तट पर राम जन्मभूमि का संकल्प लिया और दो साल बाद उसे रामजन्मभूमि आदोलन संघर्ष समिति का राष्ट्रीय संयोजक बना दिया गया। 1989 में स्वामी निश्चलानंद के अधिष्ठाता पद छोड़ने के बाद चिन्मयानंद अधिष्ठाता बनकर शाहजहां के मुमुक्षु आश्रम आ गया।

चिन्मयानंद इस दौरान अपना राजनीतिक क़द बढ़ाता रहा। वह तीन बार सांसद बनने में भी सफल रहा। 1991 में भाजपा के टिकट पर वह बदायूं से चुनाव मैदान में उतरा और जात गया। 1996 में शाहजहापुर भाजपा का टिकट लिया और हार गया। 1998 में मछलीशहर से जीत कर लोकसभा पहुंचा। मछलीशहर में उसने कोई काम नहीं किया, लिहाज़ा, 1999 में मछलीशहर की बजाय जौनपुर से चुनाव लड़ा और लोकसभा में पहुंचा। वर्ष 2003 में उसे अटलबिहारी वाजपेयी सरकार में गृह राज्यमंत्री बनाया गया।

स्वामी के करीबी कहते है कि संन्यासी ने उपनिषद सार, गीता बोध, भक्ति वैभव समेत करीब आठ धार्मिक किताबें लिखी हैं। स्वामी चिन्मयानंद पत्रकार भी हैं। वह दो धार्मिक पत्रिकाओं ‘धर्मार्थ' और ‘विवेक रश्मी' का संपादन करते हैं। संत के रूप में शाहजहांपुर और हरिद्वार में आश्रम भी चलाते हैं। ऋषिकेश के परमार्थ निकेतन से जुड़े हैं। वह मुमुक्षु आश्रम के अधिष्ठाता हैं और राम मंदिर आंदोलन से भी सक्रिय हैं। स्वामी चिन्मयानंद शाहजहांपुर में स्वामी शुकदेवानंद लॉ कॉलेज भी चलाते हैं। कॉलेज के लोग दबी ज़ुबान कहते हैं कि चिन्मयानंद ऐय्याशी करते हैं। यह बहुत गंभीर बात है। सरकार को चिन्मयानंद के सभी आश्रमों की गहन और बिना किसी पक्षपात के तह़क़ीक़ात करनी चाहिए और यह पता करना चाहिए कि आरोप लगाने वाली दोनों महिलाओं के आरोप में कितनी सचाई है। इंसाफ़ होना ही नहीं चाहिए, बल्कि जनता तक यह संदेश भी जाना चाहिए कि इंसाफ़ हो रहा है।


बुधवार, 18 सितंबर 2019

क्या हैं पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के हालात ?

हरिगोविंद विश्वकर्मा
भारत ने जब से जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35ए को अप्रभावी किया है, तब से पूरा पाकिस्तान हिस्टिरिया का शिकार है। सत्तापक्ष, विपक्ष, सेना, नौकरशाही, मीडिया और खिलाड़ी सभी का दिमाग़ी संतुलन बिगड़ गया है। पूरी दुनिया इस बात से हैरान हो रही है कि भारत ने अपने एक गृह राज्य के बेहतर विकास के लिए कोई क़दम उठाया है तो पीड़ा पाकिस्तानी हुक़्मरानों को क्यों हो रही है। दरअसल, सितंबर-अक्टूबर 1947 से ही पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर में बदनीयती से अनैतिक कार्य करता रहा है। दोनों अनुच्छेद उसके लिए अब तक ढाल का काम करते थे। ख़ासकर 1989 से घाटी में शुरू आतंकवाद पर अंकुश लगाने के रास्ते में ये दोनों अनुच्छेद सबसे बड़ी बाधा बन रहे हैं। चूंकि पाकिस्तान नहीं चाहता कि घाटी में शांति स्थापित हो और राज्य विकास की मुख्य धारा से जुड़े, इसलिए वह इस फ़ैसले का हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर विरोध कर रहा है। यह दीगर बात ही कि हर जगह उसकी भद्द पिट रही है।

                      Sharda Fort Azad Jammu & Kashmir Pakistan
जब प्रधानमंत्री इमरान ख़ान जम्मू-कश्मीर में मानवाधिकारों के हनन की बात कर रहे हैं। तब यह जानना ज़रूरी है कि पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर यानी पीओके और उत्तरी प्रांत गिलगित-बाल्टिस्तान यानी जीबी में मानवाधिकार कितना महफ़ूज़ है। वहां मौजूदा समय में सूरत-ए-हाल क्या है। गौर करने वाली बात यह है कि इसी महीने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त (ओएचसीएचआर) ने अपनी रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि पीओके में मानवाधिकार का उल्लंघन गंभीर है। यह वहां अधिक संरचनात्मक प्रकृति में हो रहा है।ओएचसीएचआर कार्यालय ने अपनी रिपोर्ट में पीओके और जीबी में मानवाधिकार हनन को रोकने के लिए पाकिस्तानी अधिकारियों को कई कड़े निर्देश दिए। रिपोर्ट में कहा गया है कि पीओके में बलूचिस्तान की ही तरह लोगों के ग़ायब होने की घटनाएं आम हैं। गुमशुदा के परिजन कह रहे हैं कि उनके बच्चों को पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसएई आंतकी ट्रेनिंग कैंप में ले जाकर जबरन हथियार चलाने और आतंकवाद की ट्रेनिंग दे रही है। इसी तरह जीबी में भी मानवाधिकार हनन की गंभीर घटनाएं हो रही हैं। इस प्रांत को चीन के शिंज़ियांग से जोड़ने वाले काराकोरम हाइवे और सीपेक प्रोजेक्ट का स्थानीय स्तर पर भारी विरोध हुआ था। इस उपेक्षित प्रांत के अनेक मानवाधिकार कार्यकर्ता कई साल से जेलों में पड़े सड़ रहे हैं।


गिलगिट-बालिटिस्तान के प्रमुख राजनीतिक दल यूनाइटेड कश्मीर पीपल्स नेशनल पार्टी के प्रवक्ता नासिर अज़ीज़ ख़ान कहते है, पीओके औऱ जीबी की हालत बहुत ही ख़राब है। पाकिस्तान के इशारे पर जीबी में चाइनीज़ कंपनियां सोने की खदानों सहित वहां के प्राकृतिक संसाधनों को लूट रही हैं। संसाधनों की ऐसी लूट के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वाले लोगों को आईएसआई टॉर्चर करती है। उनका अपहरण करवा लेती है। नासिर कहते हैं कि पाकिस्तानी हुक़्मरानों ने पीओके संस्थापक राष्ट्रपति सरदार इब्राहिम ख़ानजम्मू-कश्मीर मुस्लिम कॉन्फ्रेंस के प्रमुख चौधरी ग़ुलाम अब्बास और पाकिस्तान के कश्मीर मामले के मंत्री मुश्ताक गुरमानी के 'फ़र्ज़ी दस्तख़तवाले ग़ुप्त समझौते की मदद से गिलगित-बाल्टिस्तान पर बलात् क़ब्ज़ा किया था। धोखे से हमारी जमीन हड़प ली और हर क़दम पर लोगों को धोखा दिया। नासिर दावा करते हैं कि सरदार इब्राहिम ने बताया था कि उन्होंने कोई हस्ताक्षर नहीं किया। उनके हस्ताक्षर मुहम्मद दीन तासीर (पत्रकार लवलीन सिंह के ससुर) ने किए थे। लंबे समय तक इस समझौते के बारे में कोई भी नहीं जानता था। पाकिस्तान कहता है कि कराची समझौता 28 अप्रैल 1949 को हुआ था।

पीओके में मुज़फ़्फ़राबाद, नीलम वैली, मीरपुर, भीमबार, कोटली, बाग, रावलाकोट, सुधनोटी, हटियन और हवेली के रूप में दस ज़िले हैं। इनका स्वतंत्रता के बाद समुचित विकास नहीं हो पाया। लिहाज़ा, ग़रीबी दिनोंदिन बढ़ रही है। इसीलिए बेरोज़गार युवा सेना के झांसे में आकर चंद पैसे के लिए आतंकी बन जाते हैं। वैसे कुल 2.22 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले जम्मू-कश्मीर के 30 फ़ीसदी हिस्से पर पाकिस्तान और 10 फ़ीसदी हिस्से पर चीन का अवैध क़ब्जा है, जबकि भारत के पास 60 फ़ीसदी हिस्सा ही है। पीओके में रहने वाले नागिरकों का हेल्थ बजट केवल 290 करोड़ रुपए का है, जबकि भारत जम्मू-कश्मीर के लोगों के स्वास्थ पर हर साल 3037 करोड़ रुपए खर्च करता है। अभी पीओके प्रधानमंत्री राजा फारूक हैदर खान प्रधानमंत्री सहायता के लिए अमेरिका गए थे। लेकिन अमेरिकी लीडरशिप ने उन्हें घास भी नहीं डाला। हैदर ने यह बताने की कोशिश की कि पीओके में सब कुछ ठीक है, लेकिन उनका तर्क किसी अमेरिकी नेता या अधिकारी के गले नहीं उतरा। फारूक हैदर खाली हाथ ही लौट आए।


पाकिस्तानी हुक़्मरान कहते हैं कि आज़ाद कश्मीर में 1974 से संसदीय प्रणाली है और चुनाव हो रहे हैं। वहां राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री हैं। मतलब इस्लामाबाद के मुताबिक, पीओके में सब कुछ ठीक चल रहा है। दूसरी ओर मानवाधिकार कार्यकर्ता ज़ुल्फ़िकार बट कहते हैं, "आज़ाद कश्मीर बिल्कुल आज़ाद नहीं है। लोग ख़ुश नहीं हैं। वे पाकिस्तान का हिस्सा नहीं बनना चाहते। उन पर अत्याचार होता है, पर कोई सुनवाई नहीं। पीओके का सारा नियंत्रण पाकिस्तान के हाथ में है। वहां काउंसिल का चेयरमैन पाकिस्तान का प्रधानमंत्री होता है, जिसका नियंत्रण सेना करती है। लोग पाक सेना को जबरन घुस आई सेना मानते हैं। इसीलिए वहां पाकिस्तान के ख़िलाफ़ बड़ा मूवमेंट चल रहा है। इस आंदोलन में अनके नेशनलिस्ट संगठन शामिल हैंजिसमें पांच छह सक्रिय तंज़ीम हैं। ये तंज़ीम पाकिस्तान के उन दावों की हवा निकाल देते हैं जिनमें दावा किया जाता है कि उसके नियंत्रण वाला कश्मीर 'आज़ादहै। बहरहाल, अंतरराष्ट्रीय बिरादरी की ख़ामोशी इस्लामाबाद को मनमानी करने का हौसला देती है।"

मुज़फ़्फ़राबाद में रहने वाले कश्मीरी लेखक अब्दुल हकीम कश्मीरी कहते हैं, आज़ाद कश्मीर की असेंबली को मिले अधिकार बेमानी हैं। इसका कोई अंतरराष्ट्रीय स्टेटस नहीं है। इस हुकूमत को पाकिस्तान के अलावा दुनिया में कोई भी नहीं मानता। अगर सच्ची बात की जाए तो इस असेंबली की पोजीशन अंगूठा लगवाने से ज़्यादा नहीं है। 2005 के विनाशकारी भूकंप के बाद ह्यूमन राइट्स वाच ने एक रिपोर्ट तैयार की थी, जिसमें कहा गया था कि आज़ाद कश्मीर में मानवाधिकारों का उल्लंघन होता है। अभिव्यक्ति की आज़ादी पर कड़ा नियंत्रण है। जम्मू कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाने की पैरवी करने वाले चरमपंथी संगठनों को खुली छूट है। लाइन ऑफ कंट्रोल के क़रीब 1989 से असंख्य आतंकवादी कैंप चल रहे हैं। वहां अनगिनत लॉन्च पैड भी हैं। वहीं से भारत में घुसपैठ होती है।

                                                  India solders in war 1947
दरअसल, पीओके मूल जम्मू-कश्मीर का वह भाग हैजिस पर पाक ने 1947 में हमला कर क़ब्ज़ा कर लिया था। तभी से यह विवादित क्षेत्र है। संयुक्त राष्ट्र सहित अधिकांश अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं इसे पाक-अधिकृत कश्मीर कहती हैं। इसकी सीमाएं पाकिस्तानी पंजाब, उत्तर पश्चिमी सीमांत प्रांतअफ़गानिस्तानचीन और भारतीय कश्मीर से लगती हैं। इसके पूर्वी भाग ट्रांस-काराकोरम को पाकिस्तान ने चीन को दे चुका है। पाकिस्तान पूरे कश्मीर पर दावा करता है। उसके दावे का आधार पाकिस्तान घोषणपत्र है। दरअसल, मुस्लिम राष्ट्रवादी चौधरी रहमत अली ने 28 जनवरी1933 को चार पेज का बुकलेट छापा था, जिसमें "अभी या कभी नहीं : हम जीएं या हमेशा के लिए खत्म हो जाएं" नारा लिखा था। उन्होंने ब्रिटिश इंडिया के पंजाबउत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांतकश्मीरसिंध और बलूचिस्तान को मिलाकर इस्लामिक देश बनाने की पैरवी की थी। अली का तर्क था, पांचों प्रांतों की चार करोड़ आबादी में तीन करोड़ मुसलमान हैं। हमारा मजहब, तहजीबवेशभूषा, इतिहास, परंपराएंसामाजिक एवं आर्थिक व्यवहारलेन-देनउत्तराधिकार, शादी-विवाह और क़ानून यहां के मूल बाशिंदों से बिल्कुल अलग है। हमारे बीच खानपान या शादी-विवाह के संबंध नहीं है। उनके इस प्रस्ताव को 23 मार्च 1940 को मुस्लिम लीग के लाहौर घोषणा पत्र में स्वीकार किया गया था। पाकिस्तान के दावे को भारत नहीं मानता, क्योंकि अली के पाकिस्तान में पूर्वी बंगाल नहीं था, जो बाद में पाकिस्तान का हिस्सा बना।
वस्तुतः इसी दावे के आधार पर सिंतबर 1947 में पाकिस्तान ने कबायली आक्रमणकारियों की आड़ में जम्मू-कश्मीर पर हमला कर दिया और कबीले श्रीनगर के क़रीब आ गए थे। इसके बाद महाराजा हरिसिंह भागे-भागे दिल्ली गए और 26 अक्टूबर 1947 को भारत के साथ विलय प्रस्ताव पर दस्तख़त किए। इस विलय के उपरांत कश्मीर भारत का हिस्सा हो गया। भारतीय सेना ने घाटी में जब जवाबी कार्रवाई शुरू की तो पाकिस्तान सेना खुलकर लड़ने लगी। लड़ाई के बीच दोनों देशों के बीच यथास्थिति बनाए रखने का समझौता हुआ। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने युद्ध विराम की घोषणा कर दी। इससे भारतीय सेना को वर्तमान नियंत्रण रेखा के पूरब तरफ़ रुकना पड़ा और हथियाए गए हिस्से को पाकिस्तानी नियंत्रण से मुक्त नहीं कराया जा सका। लिहाज़ा, वे हिस्से पाकिस्तान के पास ही रह गए। इस क्षेत्र को पाकिस्तान आज़ाद जम्मू-कश्मीर कहता है। भारत का दावा है कि संधि के बाद पूरे कश्मीर पर उसका अधिकार बनता है। अगर अब भारत इस हिस्से को पाकिस्तान से वापस लेने के लिए कूटनीतिक प्रयास कर रहा है तो इसमें कोई बुराई नहीं है।

सोमवार, 5 अगस्त 2019

अनुच्छेद 370 : आतंकवाद ख़त्म होते ही जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य बना दिया जाएगा


हरिगोविंद विश्वकर्मा
जम्मू-कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश बनाने का प्रावधान अस्थाई है। समझा जा रहा है कि जैसे ही राज्य में आतंकवाद ख़त्म होगा, जम्मू-कश्मीर के पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल कर दिया जाएगा। दरअसल, कांग्रेस ने सात दशक के दौरान भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 रूपी गुब्बारे में इतनी अधिक हवा भरती गई, इतनी अधिक हवा भरती गई कि वह गुब्बारा अपनी पराकाष्ठा पर पहुंचकर 5 अगस्त 2019 को फट गया। अनुच्छेद 370 रूपी गुब्बार इतनी बुरी तरह फटा है कि उसका दो तिहाई हिस्सा ग़ायब हो गया। उसका एकवल एक खंड शेष रह गया। नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार ने सावन के तीसरे सोमवार जब जम्मू-कश्मीर के बारे में अपनी नीति घोषित की तो हर कोई हक्का-बक्का रह गया, क्योंकि तीन चार दिनों से चल रहा सस्पेंस अचानक ख़त्म हो गया था।

अनुच्छेद 370 को पूरी तरह ख़त्म नहीं किया गया है। उसका केवल वही खंड लागू रहेगा, जो कहता है कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। उसके बाक़ी सारे प्रावधान ख़त्म कर दिए गए, जिसके चलते राज्य को विशेष राज्य का दर्जा मिला हुआ था। अनुच्छेद 370 का ही अंग होने के कारण अनुच्छेद 35A अपने आप ख़त्म हो गया। केंद्र सरकार का सबसे अहम फ़ैसला यह रहा कि जम्मू-ख्समीर को दो केंद्र शासित प्रदेश में तब्दील कर दिया गया। अब जम्मू-कश्मीर विधानसभा के साथ केंद्र शासित प्रदेश होगा जबकि लद्दाख बिना विधान सभा के केंद्र शासित प्रदेश बन गया है। जम्मू-कश्मीर का अलग संविधान और अलग ध्वज ख़त्म कर दिया गया। इस तरह डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी का सपना साकार हो गया। कई दशक से चल रही कश्मीर समस्या का स्थाई हल ज़रूरी था। राजनैतिक हलकों में केंद्र सरकार के क़दम की सराहना की जा रही है। मौक़े की नज़ाकत को समझते हुए कई विरोधी दलों ने केंद्र सरकार के फैसले का समर्थन किया है।
दरअसल, नए जम्मू-कश्मीर के लिए जमीन तक़रीबन एक महीने से तैयार की जा रही थी। पिछले महीने खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'मन की बात' में जम्मू-कश्मीर पर काफी कुछ कहा था। पिछले चार दशक से राज्य के मुख्यमंत्री रहे फारूक अब्दुल्ला, ग़ुलाम नबी आज़ाद, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती भी कुछ दिनों से काफ़ी बेचैन दिख रहे थे। कई लोग, ख़ासकर अलगाववादी कह रहे हैं कि अगर 370 या 35 A को ख़त्म किया गया तो घाटी में विद्रोह हो जाएगा। हालांकि विद्रोह की धमकियां महज़ भ्रांति थीं, क्योंकि राज्य में जितने लोग इसके समर्थन में हैं, उससे अधिक विरोध में। इसलिए, बहुत होगा, मुट्ठी भर लोग श्रीनगर की सड़कों पर निकलेंगे। ऐसे विरोध प्रदर्शन घाटी में पिछले तीन दशक से तक़रीबन रोज़ाना ही हो रहे हैं। एक और विरोध राज्य प्रशासन झेल लेगा।

दरअसल, 8 अगस्त 1953 को कश्मीर को भारत से अलग करने की साज़िश रचने के आरोप जम्मू-ख्समीर सरकार को बर्ख़ास्त करके तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला को गिरफ़्तार करके जब जेल में डाला गया था तब भी घाटी में भारी विरोध हुआ था, लेकिन वह विरोध भी धीरे-धीरे शांत हो गया। ठीक इसी तरह इस बार कोई विरोध होगा, तो वह भी शांत हो जाएगा। दरअसल, पिछले क़रीब सात दशक से सत्तासुख भोगने वाले अब्दुल्ला-मेहबूबा जैसे लोग अनुच्छेद 35A और 370 ख़त्म करना तो दूर इन पर चर्चा से भी डर जाते थे। बहस या समीक्षा की मांग सिरे से ख़ारिज़ कर देते थे। दरअसल, 35A 370 जैसे विकास-विरोधी प्रावधान को नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीपुल डेमोक्रेटिक पार्टी जैसी पार्टियां अपने स्वार्थ के लिए बनाए रखना चाहती थीं, क्योंकि यह उनकी सियासत को बनाए रखने का कारगर टूल बन गया था।

वस्तुतः अनुच्छेद 35A के चलते राज्य में बेटियों के साथ घोर पक्षपात होता है। गैर-कश्मीरी से शादी के बाद बेटियां नागरिकता और संपत्ति का अधिकार खो देती थीं। मिसाल के तौर पर डॉ. फारुक अब्दुल्ला के बेटे उमर अब्दुल्ला और बेटी सारा अब्दुल्ला ने गैर-कश्मीर से शादी की है। उमर की नागरिकता और संपत्ति का अधिकार जस का तस है, जबकि सारा अब न तो जम्मू-कश्मीर की नागरिक नहीं हैं, न ही उनके पास संपत्ति का अधिकार है। दरअसल, अनुच्छेद 35A 370 की विसंगतियां सबसे पहले 2002 में जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट के एक फ़ैसले के बाद सामने आईं थी। हाईकोर्ट ने गैर-कश्मीरी से शादी करने वाली कुपवाड़ा की अमरजीत कौर को 24 साल बाद न्याय देते हुए उनकी नागरिकता मान्य की और उनको पैतृक संपति पर अधिकार पाने का अधिकार दिया था। हाईकोर्ट के फैसले का वहां के राजनीतिक दलों ने तीव्र विरोधा किया। दौ साल के भीतर 2004 में एसेंबली में परमानेंट रेज़िडेंट्स डिसक्वालिफ़िकेशन बिल पेश किया था। उसका मकसद हाईकोर्ट का फैसला निरस्त करना था। यह बिल क़ानून नहीं बन सका तो इसका श्रेय विधान परिषद को जाता है, जिसने इसे पास नहीं होने दिया। विभाजन के समय 20 लाख हिंदू शरणार्थी राज्य में आए थे, लेकिन अनुच्छेद 35A के चलते ही उन्हें स्टेट सब्जेक्ट नहीं माना गया। वे नागरिकता से वंचित कर दिए गए। इनमें 85 फीसदी पिछड़े और दलित समुदाय से हैं।

26 अक्टूबर 1947 को जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय के बाद शेख अब्दुल्ला प्रधानमंत्री बने थे। उन्होंने पं जवाहरलाल नेहरू से सांठगांठ कर जम्मू-ख्समीर के लिए विशेष दर्जा हासिल कर लिया। उसी के तहत संविधान में अनुच्छेद 370 शामिल किया गया। 1954 में 14 मई को राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने एक अध्यादेश जारी कर राज्य के हित में संविधान में अनुच्छेद 35A का प्रावधान किया गया। उस अध्यादेश को भारतीय संसद की मजूंरी नहीं ली गई। 35A राज्य के बाहर से आए लोगों को नागरिकता नहीं देता। उन्हें यहां ज़मीन ख़रीदने, सरकारी नौकरी करने वजीफ़ा या अन्य रियायत पाने का अधिकार भी नहीं था। यहां तक कि जम्मू-कश्मीर में भारतीय संविधान का धर्मनिरपेक्ष शब्द नहीं लागू नहीं होता था। इतना ही नहीं निरंकुश राजनीतिक वर्ग यह कहता था कि भारत की एकता अखंडता के लिए जम्मू-कश्मीर राज्य  ज़िम्मेदार नहीं होगा।


जम्मू-कश्मीर जैसे सीमावर्ती क्षेत्र की समस्या के लिए अगर पं. नेहरू को ज़िम्मेदार ठहराया जाए,  तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। नेहरू की अदूरदर्शिता नतीजा पूरा मुल्क़ भुगत रहा था। अनुच्छेद 370 का सभी ने कड़ा विरोध किया था, पर नेहरू अंत तक अड़े रहे। ‘अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता और मज़बूरी’ का हवाला देकर वह इसे लागू कराने में सफल रहे। यहां तक कि डॉ. भीमराव आंबेडकर भी कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने के पक्ष में नहीं थे। शेख़ अब्दुल्ला को लताड़ते हुए उन्होंने ने साफ़ शब्दों में कहा था, “आप चाहते हैं, भारत आपकी सीमाओं की रक्षा करे, वह आपके यहां सड़कें बनाए, आपको राशन दे और कश्मीर का वही दर्ज़ा हो जो भारत का है! लेकिन भारत के पास सीमित अधिकार हों और जनता का कश्मीर पर कोई अधिकार नहीं हो। ऐसे प्रस्ताव को मंज़ूरी देना देश के हितों से दग़ाबाज़ी करने जैसा है। मैं क़ानून मंत्री होते हुए ऐसा कभी नहीं करूंगा।” अनुच्छेद 370 का पुरज़ोर विरोध करते हुए डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1952 में पं. नेहरू से कहा, “आप जो करने जा रहे हैं, वह नासूर बन जाएगा और किसी दिन देश को विखंडित कर देगा। यह प्रावधान भारत देश नहीं, कई राष्ट्रों का समूह मानने वालों को मज़बूत करेगा। आज घाटी में जो हालात हैं, उन्हें देखकर लगता है कि मुखर्जी की आशंका ग़लत नहीं थी। 370 के कारण ही राज्य अलगाववाद की ओर मुड़ गया। देश के अंदर ही मिनी पाकिस्तान बन गया, जहां तिरंगे का अपमान होता था, देशविरोधी नारे लगाए जाते थे और भारतीयों की मौत की कामना की जाती थी।


एक सच यह भी है कि केंद्र इस राज्य को आंख मूंदकर पैसे देता रहा है, फिर भी राज्य में उद्योग–धंधा खड़ा नहीं हो सका। यहां पूंजी लगाने के लिए कोई तैयार नहीं, क्योंकि यह धारा आड़े आती हैं। उद्योग का रोज़गार से सीधा संबंध है। उद्योग नहीं होगा तो रोज़गार के अवसर नहीं होंगे। राज्य सरकार की रोज़गार देने की क्षमता कम हो रही है। क़ुदरती तौर पर इतना समृद्ध होने के बावजूद इसे शासकों ने दीन-हीन राज्य बना दिया था। यह राज्य केंद्र के दान पर बुरी तरह निर्भर था। इसकी माली हालत इतनी ख़राब रही है कि सरकारी कर्मचारियों के वेतन का 86 फ़ीसदी हिस्सा केंद्र देता है। इतना ही नहीं इस राज्य के लोग, ख़ासकर राजनीतिक क्लास के लोग पूरे देश के पैसे पर ऐश करते रहे हैं। राजनीतिक हलकों में कहा जा रहा है कि नए जम्मू-कश्मीर का भरपूर विकास होगा। बेरोज़गारी कम होगी और आतंकवाद पर लगाम लग सकेगा।

बहरहाल, जो भी हो इस फ़ैसले के बाद नरेंद्र मोदी और अमित शाह भारत के इतिहास में दर्ज हो गए हैं। कह सकते हैं कि जम्मू-कश्मीर की सर्जरी बहुत जरूरी था। अब जम्मू-कश्मीर विधानसभा का कार्यकाल छह साल से घटाकर पांच साल कर दिया गया है। सूचना पाने का अधिकार यानी आरटीआई अब जम्मू-कश्मीर में भी लागू होगा। इसे इस तरह भी कहा जा सकता है कि जम्मू-कश्मीर के नेताओं ने इतनी अति कर दी थी कि उन्हें उनकी औक़ात बनाता ज़रूरी था। अब सही मायने में देश का एक संविधान एक ध्वज हो गया है।