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गुरुवार, 25 अगस्त 2016

नवाब अकबर बुगती का आज़ाद बलूचिस्तान का सपना क्या साकार होगा ?

हरिगोविंद विश्वकर्मा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से अपने भाषण में जब से पाकिस्तान के सबसे बड़े और सबसे ग़रीब सूबा बलूचिस्तान का ज़िक्र किया है, तब से पाकिस्तान की ओर से ज़बरदस्त नाराजगी देखने को मिल रही है। बलूचिस्तान विवाद और वहां मानवाधिकार का हनन अचानक लाइम लाइट में आ गया है। इससे ज़ाहिर तौर पर पाकिस्तानी लीडरशिप का बौखलाना लाजिमी है। इस तरह कहा जा सकता है कि भारतीय प्रधानमंत्री ने वाक़ई पड़ोसी देश की दुखती रग पर हाथ रख दिया है।

इत्तिफाकन, 26 अगस्त को बलूचिस्तान के शीर्ष राष्ट्रवादी नेता नवाब मोहम्मद अकबर शाहबाज़ खान बुगती की दसवीं पुण्यतिथि है। पाकिस्तान के राष्ट्रवादी लोग नवाब बुगती को बाग़ी और ग़द्दार कहते थे। 26 अगस्त 2006 को तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ के आदेश पर पाकिस्तानी सेना ने क्वैटा से 150 किलोमीटर पूरब कोहलू जिले में नवाब बुगती के ठिकाने पर हमला कर दिया और गुफा के अंदर उनके ठिकाने को विस्फोटक से उड़ा दिया, जिसमें नवाब बुगती के अलावा उनका पोता, 37 छापामार सैनिक और 21 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए थे।

हालांकि नवाब बुगती पर सशस्त्र संघर्ष में शामिल होने और देश के ख़िलाफ़ छापामार युद्ध करने वाले गुरिल्लों की सेना तैयार करने के आरोप लगाने वाली पाकिस्तानी सेना ने उस समय दावा था कि बुगती ने गिरफ़्तारी से बचने और अदालत का सामना करने के डर से खुद को विस्फोटक से उड़ा लिया था। उनकी हत्या का पूरे बलूचिस्तान में भारी विरोध हुआ। जम्हूरी वतन पार्टी के लोग विरोध प्रदर्शन करते रहे। इससे राज्य में महीने भर आंदोलन चलता रहा। इतना ही नहीं बलोच नेशनल फ्रंट की अपील पर सूबे के अधिकांश हिस्सों में महीने भर हड़ताल रही। कोन्टा और अंदरूनी बलूचिस्तान के अनेक बड़े शहर पूर्ण बंद रहे। सरकारी दफ़्तरों में भी कर्मचारियों की संख्या न के बराबर थी। बलोच बार एसोसिएशन की अपील पर वकीलों ने भी पूरे राज्य में अदालतों का बहिष्कार किया था।

बहरहाल, 25 दिनों की जद्दोजहद के बाद एक सितंबर 2006 को बुगती को डेरा बुगती के कब्रिस्तान में उनके बेटे और भाई की कब्र के पास दफना दिया गया। उनका परिवार क़्वैटा में सार्वजनिक तौर पर सुपुर्द-ए-ख़ाक के पक्ष में था, लिहाज़ा अंतिम संस्कार समारोह में शामिल नहीं हुआ। उस समय सैन्य शासक मुशर्रफ़, पाकिस्तान सरकार और सेना को लगा था कि बुगती को मार देने से बलूच मामला शांत हो जाएगा, लेकिन हुआ इसके उलट। सन् 2007 से ही 26 अगस्त को बलूचिस्तान के लोग काला दिन के रूप में मनाने लगे। अब तो यह दिन बलोच जनता के लिए पृथक बलूचिस्तान राष्ट्र के लिए एकता दिवस बन गया है। हर साल इस दिन भारी विरोध प्रदर्शन होता है और आज़ादी की मांग की जाती है।

बहरहाल, बाद में नवाब बुगती की हत्या का आदेश देने वाले जनरल मुशर्रफ़, पूर्व प्रधानमंत्री शौकत अज़ीज़ और पूर्व गवर्नर ओवैसी अहमद गनी को 13 जून 2013 को गिरफ्तार कर लिया गया। बुगती हत्याकांड के मुक़दमा सिबी की पाकिस्तानी ऐंटी-टेररिज़्म कोर्ट ने मुशर्रफ़ और दूसरे लोगों को बरी कर दिया था, लेकिन उस फ़ैसले को चुनौती दी गई है और ऊपरी अदालत में अपील विचाराधीन है।

बलूचिस्तान के बरखान में 12 जुलाई 1927 को जन्मे अकबर बुगती की मां बलोच आदिवासी उपजाति खेतरान की थी, जबकि अब्बा जान नबाव मेहराब ख़ान बुगती आदिवासी समुदाय के मुखिया थे। बुगती के दादा सर शाहबाज़ ख़ान अंग्रेज़ी शासन में ब्रिटिश इंडियन आर्मी में बड़े ओहदे पर रहे और उन्हें सर की उपाधि मिली थी। बुगती की शिक्षा दीक्षा लाहौर के ऐचिसन कॉलेज और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में हुई। अपने पिता की मृत्यु के बाद वह अपने समुदाय के तमामदार बनाए गए थे। ब्रिटिश पत्रकार और लेखिका सिल्विया माथेसन ने नवाब बुगती का इंटरव्यू लेकर उनके जीवन पर ‘टाइगर ऑफ बलूचिस्तान’ नाम की किताब लिखी है।

नवाब बुगती बलूचिस्तान की बहुसंख्यक बलोच समुदाय के नेता थे। 1970 के दशक में वह बलूचिस्तान राज्य के मुख्यमंत्री और गवर्नर भी रहे थे। अपने देश को पाकिस्तान ने अवैध क़ब्ज़े से आज़ाद कराने के लिए उन्होंने निजी सेना बनाई थी और पाकिस्तान के साथ डेरा बुगती की पहाड़ियों से छापामार युद्ध कर रहे थे। पूर्व नेवी अफसर और बलूचिस्तान मामलों के जानकार कैप्टन आलोक बंसल की किताब ‘बलूचिस्तान इन टरमॉइल : पाकिस्तान ऐट क्रॉसरोड्स’ के मुताबिक विद्रोही सेना बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) 1970 के दशक से पाकिस्तान सेना से लड़ रही है। अब सवाल यही है कि क्या आज़ाद बलूचिस्तान का नवाब बुगती का सपना साकार होगा? पाकिस्तान बनने के बाद बलूचिस्तान के लोग आज़ादी की मांग करते हुए अनेक बार विद्रोह कर चुके हैं।

बलूचिस्तान के भूभाग पर पाकिस्तान के अलावा ईरान और अफगानिस्तान का भी क़ब्ज़ा है। सूबे की सीमाएं ईरान और अफ़गानिस्तान से लगती हैं। उत्तर-पूर्व में पाकिस्तान के क़बाइली इलाक़े और दक्षिण में अरब सागर है। दक्षिण पश्चिम में बड़ा हिस्सा सिंध और पंजाब से जुड़ा है। सिल्क रूट से कारोबारियों और यूरोप से आने वाले हमलावरों के लिए अफ़गानिस्तान तक पहुंचने का रास्ता बलूचिस्तान से होकर गुज़रता है। बलूचिस्तान का क्षेत्रफल पूरे पाकिस्तान के कुल क्षेत्रफल का 43 फ़ीसदी है, मगर आबादी पांच फ़ीसदी से भी कम है।

सूबे में बलोच के अलावा पख़्तून, सिंधी, पंजाबी, हजारा से लेकर उज्बेक़ और तुर्कमेनियाई समुदाय के लोग रहते हैं। यह राज्य प्राकृतिक संसाधन के मामले में बहुत ज़्यादा समृद्ध है। यहां ज़मीन के नीचे कोयला और खनिजों का खज़ाना भरा पड़ा है। पाकिस्तान को यहां से तेल का बड़ा हिस्सा मिलता है। इस्लामाबाद में बैठी सरकार खनिज और तेल की कमाई तो लेती है लेकिन बदले में क्षेत्र को कुछ देती नहीं। इस उपेक्षा के चलते राज्य की क़रीब सवा करोड़ जनता और पूरा सूबा बदहाली, ग़रीबी और उपेक्षा का शिकार है। इसीलिए कई दशक से स्थानीय लोग आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

दरअसल, जब भारत पाकिस्तान आज़ाद हुए तो बलूचिस्तान का स्वतंत्र अस्तित्व था। यह कलाट सूबे के रूप में सदियों से आज़ाद था। कई विद्वान मानने हैं कि बलूचिस्तान के पूर्वी किनारे पर ही सिंधु घाटी सभ्यता का उद्भव हुआ। यह भी माना जाता है कि सिंधु घाटी सभ्यता के मूल लोग बलूच ही थे। हालांकि इस कथन की पुष्टि के लिए कोई साक्ष्य मौजूद नहीं है। दरअसल, सिंधु घाटी की लिपि को अभी तक न पढ़े पाने से ही यह संशय बना हुआ है। यह भी सच है कि सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेष फ़िलहाल बलूचिस्तान में कम मिलते हैं। हालांकि लोकल बलूची जनता का मानना है कि उनके पूर्वज मूल निवास सीरिया के थे और वहीं से यहां आए थे। लिहाजा उनका मूल अफ़्रो-एशियाटिक है। हालांकि हिंद महासागर उपमहाद्वीप में बड़े शासकों का इस भूभाग पर हमेशा आधिपत्य रहा। यह मुगल साम्राज्य की स्थापना होने पर यह मुगलों के अधीन रहा और ब्रिटिश शासन में अंग्रेज़ों की अधीन। सन् 1944 में बलूचिस्तान के स्वतंत्रता का विचार अंग्रेज़ अफ़सर जनरल मनी के मन में आया था पर वह इसे अमली जामा नहीं पहना सके।

बहरहाल, 1948 में पाकिस्तान के राष्ट्रपति मोहम्मद अली जिन्ना और प्रधानमंत्री नवाबज़ादा लियाक़त अली ने जब कलाट के शासक पर पाकिस्तान में शामिल होने का दबाव बनाया तो वहां की संसद ने प्रस्ताव पारित कर पाकिस्तान में शामिल होने का आग्रह ठुकरा दिया। संसद ने साफ़-साफ़ कहा कि केवल मुस्लिम राष्ट्र होने के नाते बलूचिस्तान पाकिस्तान में शामिल नहीं हो सकता। कई लोग दावा करते हैं कि बलूचिस्तान के शासक खान ऑफ कलाट ने भारत में विलय की इच्छा जताई थी।

एक समाचार एजेंसी ने भारत के आज़ाद होने के बाद 1947 में ऑल इंडिया रेडियो पर प्रसारित वीपी मेनन का एक बयान जारी किया था, जिसमें मेनन ने कहा था, “बलूचिस्तान के शासक - किंग ऑफ कलाट मीर अहमदयार ख़ान अपने देश का भारत में विलय चाहते हैं, लेकिन भारत को इससे कुछ लेना देना नहीं है।“ बहरहाल, बाद में मेनन के बयान का गृहमंत्री सरदार बल्लभभाई पटेल और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने खंडन कर दिया। हालांकि कई इतिहासकार दावा करते हैं कि बलूचिस्तान भारत में विलय के पक्ष में था, लेकिन खान ऑफ़ कलाट के प्रस्ताव को नेहरू ने ही अस्वीकार कर दिया था।

बहरहाल, मार्च 1948 में पाकिस्तानी सेना ने बलूचिस्तान पर हमला बोल दिया और अंदर घुसकर कई ठिकानों को नियंत्रण में ले लिया। लियाक़त अली बराबर सैन्य ऑपरेशन की निगरानी करते रहे। कमाडिंग ऑफिसर मेजर जनरल मोहम्मद अकबर ख़ान और सातवीं बलूच रेजिमेंट के लेफ्टिनेंट कर्नल गुलज़ार के नेतृत्व में पाकिस्तानी सेना ने 27 मार्च 1948 को कलाट और मकरान पर क़ब्ज़ा कर लिया। अगले दिन 28 मार्च को भारी दबाव के चलते बलूच शासक खान ऑफ कलाट को अनिच्छा से अपने देश के पाकिस्तान में विलय के दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर करने पड़े। चूंकि बलोच जनता विलय के पक्ष में नहीं थी, लिहाज़ा वहां के लोग बाग़ी हो गए। सूबे में पहला सशस्त्र विद्रोह 1958 में हुआ और आज तक जारी है।

1973 में तो बलूचिस्तान की विद्राही सेना और पाकिस्तानी सेना के बीच खूनी संघर्ष हुआ। जिसमें पांच हज़ार से ज़्यादा विद्रोही मारे गए, लेकिन ईरान से सैन्य समर्थन के बावजूद पाकिस्तान को भी तीन हजार सैनिकों की मौत की हानि उठानी पड़ी थी। इसके बाद 1977 में भी विद्रोह हुआ जिसे पाकिस्तानी सेना ने दबा दिया। विद्रोही सूई हवाई अड्डे पर भी हमला कर चुके हैं और रेल पटरी, पुल, गैस पाइप लाइन और दूसरे विकास कार्यों पर हमला करते रहते हैं।

सरकार ने बलूचिस्तान समस्या को हल करने के लिए संसदीय कमेटी बनाई गई थी। कमेटी ने भी माना कि वहां जनता के साथ पाक हुक्मरानों ने इंसाफ नहीं किया। सेना या सरकारी नौकरियों में बलोच जनता का रिप्रज़ेंटेशन नहीं के बराबर है। जिस तरह चीन तिब्बत पर क़ब्ज़ा करके वहीं चीनी लोगों को बसा रहा है ताकि तिब्बती लोगों की आबादी चीनी लोगों से कम हो जाए। ठीक उसी तरह पाकिस्तान बलूचिस्तान में बाहरी लोगों को बसाकर सूबे में बलोच जनता को अल्पसंखक करने के अभियान में जुटा हुआ है।

2005 से एक बार फिर बलूचिस्तान में विद्रोह की आग धधकने लगी है। पाकिस्तान के इस अशांत सूबे में फ़िलहाल कुल तीन प्रमुख छापामार गुट संघर्ष कर रहे हैं। पहला गुट है बलूचिस्तान रिपब्लिकन आर्मी जिसके नेता ब्रम्हदाग़ ख़ान बुगती जो नवाब अकबर बुगती के पोते हैं। दूसरा गुट है मारी कबाइली का बलोचिस्तान लिबरेशन आर्मी जिसके नेता हैरबर मारी है और तीसरा गुट है डॉ. अल्ला नज़र का बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट। इन तीनों गुटों ने पाकिस्तानी सेना और जनरलों की नींद हराम करके रखी है।

फरवरी 2012 में अमेरिकी प्रतिनिधि सबा में बलूचिस्तान का मामला उठा था। अमेरिकी कांग्रेसमैन डाना रोहरबाकर ने एक प्रस्ताव पेश किया था, जिसमें कहा गया था कि राज्य में मानवाधिकारों के उल्लंघन के बारे में पाकिस्तान से सवाल जवाब किया जाना चाहिए। रोहराबाकर के प्रस्ताव का प्रतिनिधि सभा में लुई गोहमर्ट और स्टीव किंग ने समर्थन किया था। प्रस्ताव में कहा गया था कि पाकिस्तान के बनने के बाद से ही बलोच लोग मुसीबत झेल रहे हैं। लगातार विद्रोह दर्शाता है कि बलोच जनता इस्लामाबाद के शासन के विरुद्ध है, क्योंकि इस्लामाबाद ने उनके लिए कुछ नहीं किया जिससे प्राकृतिक संसाधनों के मामले में बहुत समृद्ध होने के बावजूद बलोच जनता बहुत ग़रीब है।

सूबे में सेना और विद्रोहियों के संघर्ष के चलते लाखों की तादाद में लोग लापता हैं। ग़ायब हुए लोगों के परिजन सेना पर ही अगवा करने का आरोप लगाते हैं और सड़कों पर उतर कर विरोध करते रहते हैं। बहरहाल, अब भारत अगर अंतरराष्ट्रीय मंच पर बलूचिस्तान में मानवाधिकार के उल्लंघन का मामला उठाता है तो यह देश की विदेश नीति में बड़ा बदलाव होगा। पहली बार भारत आधिकारिक तौर पर बलूचिस्तान के मामले में रुचि ले रहा है। अन्यथा 1946 से ही बलूचिस्तान पर कोई स्टैंड न लेने की कांग्रेस की नीति रही है। आज़ादी से पहले खान ऑफ कलाट ने सहायता के लिए महात्मा गांधी, नेहरू, सरदार पटेल के पास अपने दूत भेजे थे लेकिन कांग्रेस नेताओं को कोई रुचि ली थी।
हिंदुस्तान टाइम्स की मार्च 1946 की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, 1946 में खान ऑफ कलाट ने बलूचिस्तान को स्वतंत्र रखने की कोशिश की थी और कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य शमद खान को बलूचिस्तान की मदद करने के लिए नियुक्त किया था। उस समय मौलाना अबुल कलाम कांग्रेस के अध्यक्ष थे। ख़ान का समर्थन बाद में बलूचिस्तान के गवर्नर बनने वाले मीर गौस बक्श बिज़ेंजो ने भी किया था, लेकिन कांग्रेस ने इस विषय में कोई रुचि नहीं ली।

बहरहाल, बलूचिस्तान के मामले में पहली बार भारत के स्टैंड लेने ले पूरा समीकरण ही बदलता दिख रहा है। अफगानिस्तान और बांग्लादेश ने भारतीय प्रधानमंत्री के बयान का स्वागत किया है। बलूचिस्तान के लोगों ने भी नरेद्र मोदी का आभार जताया है और उम्मीद जताई है कि बलूचिस्तान में पाकिस्तान सेना के अत्याचार और मानवाधिकार के उल्लंघन के मामले को भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाएगा।

बुधवार, 24 अगस्त 2016

दही-हांडी - क्या अदालती दखल और सख़्ती से ख़त्म हो जाएगी की रोमांचकारी परंपरा ?

हरिगोविंद विश्वकर्मा
सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन धूमधाम से मटकी फोड़ने वाले दही-हांडी यानी गोविंदा त्यौहार से ठीक सप्ताह भर पहले ऐसा फ़ैसला दे दिया कि सदियों पुरानी बेहद रोमांचक और लोकप्रिय गोविंदा परंपरा का अस्तित्व ही संकट में दिखने लगा है। ज़ाहिर सी बात है, इस त्यौहार को सही मायने में मनाने वाले जेनुइन लोग निराश हैं। सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर इस बात पर बहस भी छिड़ गई है कि सुप्रीम कोर्ट की दही-हांडी पर सख़्ती कहीं भारतीय संस्कृति पर हमला तो नहीं है?

अपने फ़ैसले में देश की सबसे बड़ी अदालत नें साफ़ कर दिया कि मटकी फोड़ने के लिए बनाए जाने वाले पिरामिड में 18 साल से कम उम्र के बच्चे हिस्सा नहीं ले सकेंगे और न ही मटकी की ऊंचाई 20 फीट से ज़्यादा होगी। लब्बोलुआब देश की सबसे बड़ी अदालत ने बॉम्बे हाईकोर्ट के पिछले साल के फ़ैसले को ही बरकरार रखा है।

पिछले साल बॉम्बे हाईकोर्ट ने ऐसे इंतज़ामात करने के निर्देश दिए थे, जिन पर अमल करना मुश्किल भरा ही नहीं, क़रीब-क़रीब असंभव है। मसलन, हाईकोर्ट ने कहा था कि मटकी-स्थल के आसपास ज़मीन पर गद्दे बिछाए जाएं। चूंकि गोविंदा पर्व बारिश में पड़ता है, ऐसे में खुले आसमान के नीचे गद्दे नहीं बिछाए जा सकते। इससे गंभीर समस्या खड़ी हो सकती है। यह आयोजकों के लिए भी व्यवहारिक नहीं। हाईकोर्ट ने गोविंदाओं के लिए सुरक्षात्मक कवच और हेलमेट का इंतज़ाम करने और मटकी सड़क या रास्ते पर न टांगने की भी निर्देश दिया था। यह भी व्यवहारिक नहीं था। लिहाज़ा, इन आदेशों का पालन करना बहुत ही मुश्किल भरा होगा। अब सुप्रीम कोर्ट ने उस फ़ैसले को ओके कर दिया।

राज्य की देवेंद्र फड़नवीस सरकार के पास पुलिस को सुप्रीम कोर्ट के आदेश का सख़्ती से पालन का निर्देश देने के अलावा और कोई विकल्प भी नहीं था। इसीलिए कई लोग आशंका जताने लगे हैं कि कहीं अदालत के दख़ल और राज्य सरकार के कोर्ट का फ़ैसला लागू करवाने की मजबूरी के चलते भारतीय संस्कृति की यह रोमांचकारी परंपरा सदा के लिए ख़त्म न हो जाए। दरअसल, अदालत की ओर से दही-हांडी के जो तरीक़े बताए गए हैं, वे प्राइमा फ़ेसाई इतने अव्यवहारिक हैं कि उन पर अमल करने से बेहतर होगा, यह पर्व ही न मनाया जाए।

दही-हांडी का रोचक पर्व भारत में दशकों नहीं, कई सदियों से धूमधाम से मनाया जाता रहा है। महाराष्ट्र में यह सबसे ज़्यादा लोकप्रिय रहा है। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन होने वाले इस उत्सव में युवाओं के साथ-साथ किशोर और बच्चे भी उत्साह से शिरकत करते रहे हैं। किशोरों और बच्चों को इस पर्व में इसलिए शामिल किया जाता रहा है क्योंकि, उनका वजन कम होता है, लिहाज़ा, मटकी फोड़ते के लिए पिरामिड बनाते समय उन्हें आसानी से कंधे पर बिठाकर मटकी तक पहुंचा जा सकता है। यह काम कोई वयस्क आदमी नहीं कर सकता।

वस्तुतः दही-हांडी में मिट्टी (अब ताबां या पीतल) की मटकी में दही, मक्खन, शहद, फल और कैश धनराशि रखे जाते हैं। इस मटकी को धरती से काफी ऊपर तक टांगा जाता है। प्रायः रुपए की लड़ी रस्से से बांधी जाती है। इसी रस्से से वह बर्तन भी बांधा जाता है। बच्चे, किशोर और नवयुवक लड़के–लड़कियां पुरस्कार जीतने के लिए समारोह में हिस्सा लेते हैं और एक–दूसरे के कंधे पर चढ़कर पिरामिड बनाते हैं। जिससे सबसे ऊपर पहुंचकर आसानी से मटकी को तोड़कर उसमें रखी सामग्री को प्राप्त कर लेता है। इस धनराशि को मानव पिरामिड में भाग लेने वाले सभी सहयोगियों में बांट दिया जाता है।

यह कहना न तो ग़लत होगा और न ही अतिरंजनापूर्ण कि दही-हांडी मूलतः बच्चों, किशोरों और नवयुवकों का ही का खेल रहा है। इस रोमांचकारी भारतीय परंपरा का आरंभ भगवान कृष्ण के बाल्यकाल में गोपियों की मटकी से माखन चुराने की घटनाओं से माना जाता है। बालक कन्हैया गोपियों की मटकी फोड़कर माखन चुरा लेते थे। बड़े होने पर श्रीकृष्ण ने मटकी नहीं फोड़ी बल्कि वह कंस को मारने के लिए गोकुल को ही छोड़ दिया था। इस आधार पर कहा जा सकता है कि गोविंदा त्यौहार केवल और केवल बच्चों, किशोरों और नवयुवकों का ही है। इसमें बड़ों को शामिल नहीं होना चाहिए।

दही-हांडी की मटकी असल में सबसे ऊपर का बच्चा फोड़ता है। उसे पिरामिड में शामिल नवयुवक अपने कंधे पर बिठाकर सहारा देते हैं और मटकी तक पहुंचाते हैं। इसलिए यह कहने में कतई हर्ज़ नहीं कि इस त्यौहार का अट्रैक्शन ही बच्चे हैं। लिहाज़ा बच्चों की भागीदारी के बिना यह अधूरा सा लगेगा। इसमें केवल वयस्क युवक ही भाग लेंगे तब यह और जोख़िम भरा हो सकता है। 18 साल का होते होते औसत इंसान का वज़न 60 किलोग्राम पार कर जाता है। अगर पिरमिड में सबसे ऊपर इतने वज़नदार व्यक्ति को चढ़ाया गया तो नीचे के गोविंदाओं के दबने का ख़तरा रहेगा।

अब शिवसेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने नेतागण देश की सबसे बड़ी अदालत के फ़ैसले पर ख़ेद जता रहे हैं। राज ठाकरे ने तो तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा है, “दही हांडी उत्सव को कोर्ट ने नियमों में उलझा दिया है। तो क्या अब स्टूल पर खड़े होकर दही हांडी फोड़ी जाए?” ज़ाहिर है ऐसे कमेंट इन नेताओं की अपरिपक्वता ही दर्शाते हैं। अब खेद जताने से क्या फ़ायदा। यह तो वही बात हुई कि अब पछताए का होत जब चिड़िया चुग गई खेत।

ज़ाहिर सी बात है, अदालत का दख़ल रातोरात नहीं हुआ है। हाल के वर्षों ख़ासकर टीवी चैनलों पर लाइव टेलीकास्ट और इस त्यौहार को प्रॉडक्ट बेचने का ज़रिया बना देने से इस पर्व का बड़ा घाटा हुआ। दही-हांडी की प्राचीन परंपरा को नेताओं और बाज़ारवादियों ने अपने निजी लाभ के लिए हाईजैक कर लिया था। इसे पब्लिसिटी का माध्यम बना दिया था। इसका पूरी तरह कॉमर्शियलाइज़ेशन हो गया था। इस पर्व में करोड़ों के वारे-न्यारे होने लगे थे। गोविंदा मंडल भी पेशेवर हो गए थे, जिससे गलाकाट स्पर्धा शुरू हो गई थी। इसके चलते मटकी की ऊंचाई और इनामी राशि भयानक रूप से बढ़ने लगी थी। बाज़ारीकरण के चलते ही यह त्यौहार हंगामें वाला पर्व बन गया, इस कारण एक बड़ा तबक़ा इन आयोजनों से चिढ़ने लगा था। कहा जा सकता है कि आयोजकों और बाज़ार को संचालित करने वाली कंपनियों द्वारा इसे मुनाफ़े का जरिया बना देने से ही इस त्यौहार का बंटाधार हुआ।

गोविंदा इतना ज़्यादा स्पर्धात्मक हो गया था कि विदेशों से पेशवर गोविंद मंडल मटकी फोड़ने के लिए आने लगे थे। आज ख़ेद जताने वाले लोगों को उसी समय सक्रिय होकर गोविंदा की परंपरा को नष्ट कर रहे लोगों को रोकना चाहिए था। जब स्पर्धा बढ़ने से पिरामिड में शामिल गोविंदाओं को मटकी फोड़ने के दौरान मौत होने लगी तो मजबूरन कुछ लोगों ने महसूस किया कि इस त्योहार को विद्रुप रूप देने का विरोध होना चाहिए, उस पर अंकुश लगना चाहिए। हादसों को रोकने के लिए ही हाईकोर्ट में जनहित याचिकाएं दायर की गईं।

दरअसल, पिछले साल सबसे पहले मुंबई पुलिस के तत्कालीन प्रमुख राकेश मारिया ने बच्चों का सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए 12 साल उम्र तक के बच्चों के दही-हांडी के पिरामिड में भाग लेने पर रोक लगा दी थी। मुंबई के पुलिस प्रमुख ने यह क़दम बाल मज़दूरी उन्मूलन के क्षेत्र में काम कर रहे लोगों के दबाव में उठाया था। यहां तक तो थोड़ी खैरियत थी, लेकिन रही सही कसर अदालत के आदेश ने पूरी कर दी। ऐसे में राज्य सरकार को निर्देश दिया जाना चाहिए कि गोविंदा को कॉमर्शियलाइज़ेशन बनाने से रोका जाए, न कि इस पर अव्यवहारिक बंदिशे लगाकर।

गुरुवार, 18 अगस्त 2016

लोकसभा चुनाव 2019 नए हाईटेक मुख्यालय से लड़ेगी बीजेपी

हरिगोविंद विश्वकर्मा

ग्यारह करोड़ कार्यकर्ताओं वाली दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी भारतीय जनता पार्टी अपना मुख्यालय बदलने जा रही है। सब कुछ निर्धारित कार्यक्रम के मुताबिक़ हुआ तो पार्टी सन् 2019 का लोकसभा चुनाव अपने नए मुख्यालय से लड़ेगी। बीजेपी का नया मुख्यालय नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के पास मिंटो रोड से निकलने वाले पं. दीनदयाल मार्ग पर बनने जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रक्षाबंधन के दिन नए मुख्यालय की प्रस्तावित का आधारशिला रखी।

बीजेपी के नये कार्यालय की अत्याधुनिक तकनीक से सज्जित हाईटेक इमारत का प्लान मुंबई के मशहूर आर्किटेक्ट अरविंद नांदापुरकर, ओमकार नांदापुरकर और श्रीमती ग्रीष्मा नांदापुरकर और उनके सभी सहयोगी आर्किटेक्ट्स और इंजीनियर्स ने तैयार किया है। बीजेपी के नए मुख्यालय में देश-दुनिया के लोगों से सीधे वीडियो और ऑडियो संपर्क की आधुनिका सुविधा उपलब्ध रहेगी। सबसे बड़ी बात देश में सबसे ज़्यादा हाईटेक और आधुनिक पोलिटिकल ऑफिस होगा। यह कार्यालय दिल्ली में बीजेपी के संसद भवन के पास के अशोक रोड कार्यालय की जगह लेगा, जहां से पार्टी का कामकाज राष्ट्रीय कार्यालय पिछले पांच दशक से ज़्यादा समय से हो रहा है।

अरविंद नांदापुरकर कहते हैं, “बीजेपी शुरू से पार्टी कार्यालय को पार्टी की आत्मा मानती रही है। लिहाज़ा, ग्राम पंचायत, तहसील, जिला और राज्य के कार्यकर्ताओं से केंद्रीय कार्यालय का सीधा संपर्क ज़रूरी है, क्योंकि समर्पित कार्यकर्ता ही पार्टी की असली पूंजी हैं। इनके ज़रिए ही आम जनता बीजेपी से जुड़ती है। पार्टी और कार्यकर्ताओं के इस बंधन को और मज़बूत करने के लिए ही राष्ट्रीय अध्यक्ष माननीय अमित शाह ने केंद्रीय कार्यालय के रूप में अत्याधुनिक और ‘हाईटेक स्मार्ट ऑफिस’ की परिकल्पना की है।”

यह संयोग है कि बीजेपी को नए कार्यालय के लिए ज़मीन का आवंटन पार्टी संस्थापक पं दीनदयाल उपाध्याय मार्ग पर हुआ है। प्रस्तावित मुख्यालय सड़क के दोनों ओर दो फेज़ में बनेगा। पहले फ़ेज़ में पार्टी का प्रशासनिक एवं संगठन कार्यालय होगा, जबकि दूसरे फ़ेज़ में संगठन संकुल होगा। प्रस्तावित कार्यालय की इमारत का विशाल परिसर दो एकड़ भूखंड पर फैला होगा। यह ख़ूबसूरत जगह चारों तरफ़ से खुली है। बीजेपी कार्यालय की इमारत का निर्माण प्रधानमंत्री, बीजेपी अध्यक्ष की परिकल्पना के अनुरूप होगा।

प्रशासनिक एवं संगठन कार्यालय की इमारत के बग़ल में दो एकड़ ज़मीन पर पार्क बनाया जाएगा। पूरे परिसर को दो हिस्सों में बांटा गया है। पहला, सामने का फ्रंट ओपन स्पेस है और दूसरा अंदर का कोर्टयार्ड। सुरक्षा को ध्यान में रखकर इमारत में तीन प्रवेश द्वार बनाए जाएंगे। पहला और दूसरा प्रवेश बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं, पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं के लिए होगा, जबकि तीसरा प्रवेश द्वार मीडिया के लिए। जनता का प्रवेश फ्रंटओपन स्पेस के बाद बनी सीढ़ियों से होगा। दो बेसमेंट फ्लोर वाली प्रस्तावित छहग मंज़िली इमारत चरणबद्ध तरीक़े से बनाई जाएगी।

इमारत का खुला हुआ बाहरी हिस्सा लंबी सीढ़ियों के कारण स्टेडियम का लुक देगा, जहां दो से तीन हज़ार कार्कयर्ताओं की सभा की जा सकेगी। इमारत इस तरह डिज़ाइन की गई है कि सालभर अंदरूनी कमरों में रोशनी आती रहेगी। इससे कृत्रिम प्रकाश पर निर्भरता कम होगी। इसी तरह दिन में बीच के कोर्टयार्ड के 80 फ़ीसदी हिस्से में सूरज के प्रचंड होने पर भी शीतल छाया रहेगी। इसलिए यह हिस्सा अपेक्षाकृत दूसरे खुले हिस्से के मुक़ाबले ज़्यादा ठंडा रहेगा और यहां कभी भी सभा वगैरह की जा सकेगी। कॉरीडोर और वेटिंग एरिया को भी इस तरह डिजाइन किया गया है, जिससे हरियाली के साथ-साथ नैसर्गिक प्रकाश पहुंचता रहेगा। जिससे यहां की आबोहवा आगंतुक अच्छा लगे।

बिल्डिंग के फ्रंट व्यू पर एक बड़ी स्क्रीन लगाने का प्रस्ताव है। स्क्रीन पर बीजेपी से जुड़ी हुई गतिविधियों या कार्यक्रमों का सीधा प्रसारण यानी लाइव टेलिकास्ट चलता रहेगा। उदाहरण के तौर पर, बीजेपी की कोई सभा देश के किसी भी हिस्से में हो रही है, तो उसका लाइव फूटेज इस स्क्रीन पर दिखेगा। इमारत में इसकी क्षमता के अनुसार लोगों के मूवमेंट को आसान बनाने की पूरी कोशिश की गई है। इस बात को ध्यान में रखकर उच्च टेक्नॉलॉजी के इस्तेमाल करने का प्रस्ताव है। लोगों के एक मंज़िल से दूसरी मंजिल पर जाने या आने के लिए चार स्टेयरकेस और दो स्केलेटर होंगे। इसके अलावा सात लिफ्ट भी लगाए जाएंगे। इससे लोगों को ऊपरी मंज़िल पर आने-जाने में अनावश्यक इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा। सिक्योरिटी के नज़रिए से यह डिज़ाइन सर्वोत्तम है।

मुख्य प्रवेश पर डबल हाइटेड लॉबी डिज़ाइन की गई है। इसकी दीवार पर भारतीय संस्कृति से जुड़ी कलाकृतियां लगाई जाएंगी। इमारत की तल मंज़िल की छत को एक साइड में थोड़ा आगे बढ़ा दिया गया है। इससे पैदल आने-जाने वालों को सुरक्षित रास्ता मिलेगा और वहां से गुज़रने वाले वाहनों के कारण किसी तरह की असुविधा नहीं होगी। भारतीय संस्कृति और समृद्ध वास्तु परंपराओं को ध्यान में रखकर बनाई जाने वाली यह इमारत देश की राजधानी दिल्ली में एक धरोहर के रूप में भी अपनी जगह बनाएगी।

छठी मंज़िल राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए आरक्षित रहेगी। यहां अध्यक्ष की केबिन के साथ ऐंटीचेंबर भी होगा। यहां 25 लोगों के बैठने के लिए वेटिंग एरिया भी बनाया जाएगा। अध्यक्ष की देश, विदेश या शहर में किसी से लाइव बातचीत के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग रूम की सुविधा उपलब्ध रहेगी। अध्यक्ष के निजी सहायकों और उनके पूरे स्टॉफ के लिए कक्ष होंगे। महासचिव, उपाध्यक्ष और सचिव और दूसरे पदाधिकारियों के दफ़्तर आधुनिक बुनियादी सुविधाएं एवं एनीमिटीज़ सज्जित रहेगा। जहां उनके पीए और उनके पूरे स्टाफ बैठेंगे। इसके आलावा पार्टी के महिला, युवा, अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, किसान और ओबीसी मोर्चे, प्रकोष्ठ और दूसरे सहयोगी संगठनों के मुख्यालय यही होंगे। हर दफ्तर के पास वोटिंग एरिया और कॉन्फ्रेंस हॉल होगा।

बीजेपी के नए मुख्यालय में लोकसभा और राज्यसभा में पार्टी के नेताओं और उनके स्टाफ का भी कार्यालय और कॉन्फ्रेंस रूम बनाने का भी प्रस्ताव है। कार्यकर्ताओं और नवनिर्वाचित विधायकों या सांसदों को प्रशिक्षण वगैरह देने के लिए 50 कार्यकर्ताओं के बैठने की क्षमता वाले दो हाईटेक ट्रेनिंग हॉल, जो ज़रूरत पड़ने पर एक हाल में तब्दील किए जा सकेंगे। इमारत में ग्राउंड फ्लोर पर 400 सीटों की क्षमता वाला एक दो मंज़िला हाईटेक सभागृह बनाने का प्रस्ताव है, जिसमें हर सीट पर माइक लगी रहेगी। इसमें स्क्रीनिंग की सुविधा रहेगी। ग्राउंड फ्लोर पर ही कैंटीन भी बनाने का प्रस्ताव है। यहां कम से कम 70 लोग एक साथ बैठकर खाना खा सकेंगे या जलपान कर सकेंगे। कैंटीन में देश के हर राज्य के व्यंजन उपलब्ध रहेंगे।

भारतीय जनता पार्टी पूर्व अध्यक्ष की दो केबिन बनाई जाएगी। इसके अलावा पार्टी कोषाध्यक्ष का दफ़्तर भी इसी मंज़िल पर होगा। कोषाध्यक्ष के पीए समेत उनका पूरा स्टॉफ जिनमें तीन अकाउंट्स हेड्स होंगे, इसी मंज़िल पर बैठेंगे। यहां चेस्टरूम, स्टाफ की भी सुविधा होगी। टैरेस पर रूफटॉप म्यूज़ियम और लाइब्रेरी विकसित करने का प्रस्ताव है। जहां बीजेपी का 65 साल का गौरवशाली इतिहास समाहित रहेगा। यहां आर्काइव और देर तक बैठने की सुविधा भी उपलब्ध रहेगा। यहां लंच और डिनर के लिए टैरेस गार्डन देने का भी प्रस्ताव है।

हर राजनीतिक दल के लिए मीडिया खासा अहमियत रखता है। नए मुख्यालय में प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकारों के लिए कवरेज की हाईटेक व्यवस्था होगी। इसके लिए स्टेट-ऑफ-आर्ट मीडिया सेंटर बनाया जा रहा है, जहां प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए हाईटेक मीडिया हॉल होगा। जहां तक़रीबन हर छोटे-बड़े और देसी-विदेशी अख़बारों और टीवी न्यूज़ चैनल्स के 150 पत्रकारों के बैठने और ख़बर भेजने की सुविधा होगी। टीवी कैमरे लगाने की विशेष व्यवस्था की जाएगी ताकि किसी को समाचार संकलन में कोई असुविधा न हो। यहां 10 हाईटेक लाइव केबिन बनाए जा रहे हैं, जहां प्रवक्ताओं और दूसरे नेताओं के साथ इंटरव्यू या लाइव चैटिंग की जा सकेगी। टीवी के ओबी वैन के सिगनल्स कनेक्टिविटी की सुविधा अत्याधुनिक माध्यमों से करने का भी प्रस्ताव है। दो अत्याधुनिक सुविधांओं से युक्त स्टूडियो बनाए जाएंगे और उन दोनों के हेड की केबिन भी इसी मंज़िल पर बनाई जाएगी। यहां बीजेपी का आईटी सेक्शन भी होगा। परिसर में दो सौ कारों की पार्किंग बेसमेंट में दो मंजिले पार्किंग स्पेस में होगा। इमारत का भूमिपूजन रक्षाबंधन क दिन सुबह तमाम सीनियर बीजेपी लीडर्स की मौजूदगी में प्रधानमंत्री ने ख़ुद किया। इस मौके पर प्लान पर बनाई गई 15 मिनट की फिल्म दिखाई गई, जिसका स्क्रिप्ट इन पंक्तियों के लेखक ने तैयार किया था। यह इमारत दिसंबर 2018 तक पूरा करने की योजना है। उसके बाद अशोक रोड का मुख्यालय यहां शिफ्ट हो जाएगा।



सोमवार, 1 अगस्त 2016

राहुल गांधी को लेकर कांग्रेस आश्वस्त क्यों नहीं...?

हरिगोविंद विश्वकर्मा
अगर कहें कि कांग्रेस के लोकप्रिय नेता और उपाध्यक्ष राहुल गांधी जुमलेबाज़ी करने में माहिर हो चुके हैं, तो तनिक भी अतिशयोक्ति नहीं होगा। राहुल उसी तरह की जुमलेबाज़ी करने लगे हैं, जिस तरह की जुमलेबाज़ी से भारत की जनता मंत्रमुग्ध होती रही है। इतिहास गवाह है कि इस देश में पिछले सात दशक से केवल जुमलेबाज़ी ही हो रही है। यहां लोगों को जुमलेबाज़ी बहुत ज़्यादा पसंद है। तभी तो जुमलेबाज़ नेताओं के पीछे लोग पागल हो जाते हैं। उन्हें सिर-आंखों पर ही नहीं बिठाते हैं, बल्कि उन्हें आंख मूंदकर वोट देते हैं। कहना न होगा, इसी जुमलेबाज़ी के चलते पिछले आम चुनाव में नरेंद्र मोदी जनता के प्रिय नेता बनकर उभरे और प्रधानमंत्री भी बन गए। नरेंद्र मोदी के ‘विदेश से कालाधन लाने और हर भारतीय खाते में 15 लाख जमा कराने’ के बयान को बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने ख़ुद एक ‘चुनावी जुमलेबाज़ी’ माना।

बहरहाल, चर्चा हो रही है कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी की। अभी मॉनसून सत्र में लोकसभा में महंगाई के मुद्दे पर चर्चा के दौरान राहुल का भाषण जुमले से भरपूर रहा। उन्होंने सीज़न्ड पॉलिटिशियन्स की तरह नरेंद्र मोदी की ही स्टाइल में उनकी जमकर ख़बर ली। बीजेपी सांसदों की टोकाटोकी के बीच राहुल ने दो साल कार्यकाल में संसद में अपनी 11वीं स्पीच अपने चिरपरिचित अंदाज़ में पूरी की। उनकी जुमलेबाज़ी से बीजेपी नेता एकदम तिलमिला उठे। सरकार की तरफ़ से ख़ुद वित्तमंत्री अरुण जेटली को मोर्चा संभालना पड़ा और उन्होंने दावा किया, “पिछले कुछ महीनों में थोक महंगाई दर कम हुई है। महंगाई पर क़ाबू के लिए सरकार ने क़दम उठाए हैं।“ सोशल मीडिया पर मोदीभक्त और भी ज़्यादा तिलमिला उठे और अनाप-शनाप कमेंट करने लगे। इसका मतलब यह हुआ कि राहुल का तीर एकदम सही निशाने पर बैठा।

कांग्रेस उपाध्यक्ष ने नरेंद्र मोदी पर तंज करते हुए कहा, “मोदीजी का चुनावी नारा था, ‘हर हर मोदी, घर घर मोदी’ लेकिन आजकल हर जगह एक ही नारा चल रहा है ‘हर हर मोदी, अरहर मोदी’।“ राहुल इतने पर नहीं रुके, उन्होंने मोदी के चौकीदार वाले बयान की चुटकी लेते हुए कह दिया, “मोदीजी ख़ुद को देश का चौकीदार कहते रहे हैं, लेकिन चौकीदार की नाक के नीचे दाल चोरी हो रही है, लेकिन चौकीदार कुछ नहीं कर रहा है।” कांग्रेस के युवराज ने दो क़दम और आगे बढ़ते हुए कहा, ”सरकार ने दो साल का जश्न धूमधाम से मनाया। बहुत सारे सितारों को बुलाया, लेकिन इस पूरे फंक्शन में मोदीजी ने महंगाई पर एक भी शब्द नहीं बोला।”

इससे पहले इसी साल गर्मियों में राहुल गांधी ने 'फेयर एंड लवली' वाला बहुचर्चित जुमला देते हुए कहा था, “मौजूदा एनडीए सरकार ने काले धन को सफ़ेद बनाने के लिए एक 'फेयर एंड लवली' योजना शुरू की है।“ राहुल की जुमलेबाज़ी से उस समय भी बीजेपी के नेतागण ख़ासे बैखलाए और तब भी अरुण जेटली संकटमोटक बने और उन्हें ही आधिकारिक रूप से कहना पड़ा, “राहुल की टिप्पणी पोलिटकली इनकरेक्ट है। यह नस्ली मानसिकता दिखाता है। यह ऐसा मुहावरा है जिससे पूरी दुनिया के लोग क्रोध करते हैं लेकिन मैं इसे नज़रंदाज़ करूंगा, क्योंकि यह अज्ञानता है।"

पूरा देश जानता है और गवाह भी है कि जुमलेबाज़ी की यह स्टाइल नरेंद्र मोदी की रही है। 2014 के लोकसभा चुनाव में अपनी रैलियों में वह बार-बार वह दिल्ली में ‘मां-बेटे की सरकार’ तो उत्तर प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में ‘बाप-बेटे की सरकार’ ‘उनको साठ साल दिया मुझे साठ महीने दीजिए’और कभी ‘50 करोड़ की गर्लफ्रेंड’ जैसे जुमले पेश करके अपने नेताओं-कार्यकर्ताओं से ताली और वाहवाही लूटते थे। प्रधानमंत्री बनने के बाद भी नरेंद्र मोदी की जुमलेबाज़ी जारी रही। वह ‘मैं मैं प्रधानमंत्री नहीं प्रधानसेवक हूं’, ‘मैं तो चौकीदार हूं’, ‘मैं 65 साल का कचरा साफ़ कर रहा हूं’ और ‘न खाऊंगा न खाने दूंगा’ के जुमले से अपने भक्तों का दिल जीतते रहे हैं।

बहरहाल, अगर राहुल गांधी के संसद या संसद से बाहर दिए गए भाषणों पर गौर करें तो वह लिखा हुआ नहीं पढ़ते। नरेंद्र मोदी का तरह वह भी बिना लिखित भाषण के ही बोलते हैं। राहुल ने कुछ साल पहले कई न्यूज़ चैनलों को इंटरव्यू भी दिया था, जिसमें उन्होंने परिपक्व नेता की तरह बड़ी बेबाकी से हर मुद्दे को तरह रखा था। इसका मतलब यह कि राहुल का होमवर्क भी ठीकठाक ही नहीं, देश के कई प्रमुख नेताओं के मुक़ाबले बहुत ही अच्छा है। कम से कम वह बोलते समय ब्लंडर नहीं करते और जेंटलमैन की तरह अपनी बात रखते हैं। भले ही वह कभी-कभार ही बोलते हैं, लेकिन बोलते अच्छा हैं। अच्छा और प्रभावशाली भाषण देते हैं। लोकसभा में कई बार उन्होंने यादगार भाषण दिया भी है।

ऐसे में लोग, ख़ासकर राजनीतिक टीकाकार, अकसर हैरान होते हैं कि कांग्रेस अपने इस अतिलोकप्रिय नेता के परफॉरमेंस को लेकर आख़िर आश्वस्त क्यों नहीं है? पार्टी अपने इस फायरब्रांड नेता को लेकर शुरू से क्यों असमंजस में है और अनावश्य हिचकिचाहट दिखाती रही है, ख़ासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुक़ाबले उन्हें फ्रंट पर खड़ा करने में। वैसे 19 जून 1970 को जन्मे राहुल गांधी अब बच्चे या युवा नहीं रहे, वह 46 साल के हो गए हैं। इस उम्र में तो उनके पिता राजीव गांधी प्रधानमंत्री के रूप में अपना कार्यकाल भी पूरा कर चुके थे। बहरहाल, राहुल 2004 से अपने माता-पिता और चाचा संजय गांधी के संसदीय क्षेत्र उत्तर प्रदेश अमेठी से लगातार तीसरी बार लोकसभा के सदस्य हैं।

सबसे बड़ी बात राहुल गांधी वंशवाद के प्रतिनिधि हैं। वह 38 साल तक देश को प्रधानमंत्री देने वाले नेहरू-गांधी खानदान के पुरुष वारिस हैं। भारत के लोग जुमलेबाज़ी के अलावा वंशवाद पर भी लट्टू रहते हैं। मुलायम सिंह यादव, लालूप्रसाद यादव, रामविलास पासवान, शरद पवार, बाल ठाकरे, सिंधिया परिवार, अब्दुल्ला और सोरेन फैमिली, पटनायक और करुणानिधि परिवार जनता की इसी मानसिकता के कारण फलते फूलते रहे हैं और अपने परिवार के लोगों को संसद और विधानसभाओं में भेजते रहे हैं। दरअसल, सदियों से खानदानी हिंदू सम्राटों और मुस्लिम सुल्तानों के शासन में सांस लेने के कारण भारत की जनता ग़ुलाम मानसिकता की ओ गई है। इस मूढ़ जनता को वंशवाद शासन बहुत भाता है। लिहाज़ा, इस तरह की भावुक जनता के लिए राहुल गांधी सबसे फिट नेता हैं।

दरअसल, सोनिया गांधी और राजीव गांधी का पुत्र होने के नाते भी राहुल को फ्रंट पर ही रहना चाहिए था। लेकिन ऐसा लगता हैं, कांग्रेस में एक ऐसा खेमा है, जो नहीं चाहता कि राहुल बेबाक बोलने वाला पार्टी में फ्रंट पर आए और उन लोगों की जमी जमाई दुकानदारी ही चौपट कर दे। इसीलिए यह खेमा 10 जनपथ को सलाह देता रहता है कि राहुल गांधी अभी परिपक्व नहीं हुए हैं, लिहाज़ा अभी उन्हें बड़ी ज़िम्मदारी देने का सही और उचित नहीं आया है। इसी बिना पर राहुल को मई 2014 में 44 सांसदों के बावजूद लोकसभा में कांग्रेस का नेता नहीं बनाया। उनकी जगह कांग्रेस ने मनमोहन सिंह सरकार में रेल मंत्री रहे और क़ायदे से हिंदी न बोल पाने वाले कर्नाटक के मल्लिकार्जुन खरगे लोकसभा में नेता बना दिया। यह कांग्रेस की बड़ी भूल यानी ब्लंडर था, उसे राहुल गांधी को नेता बनाना चाहिए था, ताकि वह भविष्य में देश का नेतृत्व करने के लिए तैयार होते। लेकिन पार्टी ने वह मौक़ा गंवा दिया।

दिल्ली के सेंट कोलंबस स्कूल और दून स्कूल, हावर्ड यूनिवर्सिटी के रोलिंस कॉलेज फ्लोरिडा से स्नातक और कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के ट्रिनिटी कॉलेज से एमफिल राहुल गांधी का नैसर्गिक टेस्ट सिस्टम विरोधी है। मनमोहन की सरकार थी, तब भी वह अकसर ऐसे-ऐसे बयान दे देते थे, जिससे भ्रम होता था कि कहीं वह सरकार के विरोधी यानी विपक्ष में तो नहीं हैं। 2013 में एक बार तो राहुल ने दाग़ी नेताओं को बचाने के लिए लाए गए मनमोहन सरकार के अध्यादेश को ही फाड़ कर फेंक दिया था। इस तरह का सिस्टम-विरोधी नेता किसी भी पार्टी का एसेट होता है, लेकिन दिग्भ्रमित कांग्रेस के नेता राहुल को बोझ मानते हैं और प्रियंका को सक्रिय राजनीति में लाने के लिए फरियाद करते रहे हैं, जबकि जानते हैं, प्रियंका के राजनीति में आते ही कथिततौर पर भ्रष्टाचार करने वाले रॉबर्ट वाड्रा मुख्य केंद्र में आ जाएंगे। बहरहाल, राहुल गांधी जैसा जो नेता किसी भी विपक्षी पार्टी की पहली पसंद होता, वही नेता कांग्रेस में एकदम हाशिए पर है।


बीजेपी जानती है, कि राष्ट्रीय स्तर पर उसे मुलायम-लालू, नीतीश, पटनायक, नायडू, मायावती, ममता, जयललिता से कोई ख़तरा नहीं है। इस भगवा पार्टी को ख़तरा केवल राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल से है। अगर भविष्य में नरेंद्र मोदी को चुनौती मिली तो इन्हीं दो नेताओं से मिलेगी। इसीलिए मोदीभक्तों के निशाने पर सबसे ज़्यादा राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल ही रहते हैं। दोनों उपहास का पात्र बनाने का कोई मौक़ा भक्त नहीं चूकते। फेसबुक, ट्विटर और व्हासअप जैसे सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट पर इन दोनों नेताओं के बारे में तरह तरह के चुटकुल रचे जाते हैं और यह साबित करने की कोशिश की जाती है कि ये दोनों वाक़ई नरेंद्र मोदी के मुक़ाबले कहीं नहीं ठहरते है, जबकि हक़ीकत है कि अरविंद केजरीवाल भले सुप्रीमो कल्चर में भरोसा करते हों और आम आदमी पार्टी में अकेले नेता बने रहना चाहते हों, लेकिन राहुल गांधी बहुत उदार और जेंटलमैन नेता हैं। वह सबको लेकर चलने वाले नेता हैं। फिर भी कांग्रेस में फ्रंट पर नहीं हैं। यह कांग्रेस का दुर्भाग्य है।

शनिवार, 30 जुलाई 2016

लोकगीत कजरी - कजरी सुनकर अपने आपको जीने लगते हैं हम

हरिगोविंद विश्वकर्मा
“घिर-घिर आई बदरिया, सजन घर नाही रे रामा और धीमे धीमे बरसो से बदरिया सजन घर नही आयो रे रामा...” देखिए, पूर्वांचल उत्तर प्रदेश के इस परंपरागत लोकगीत कजरी। यह खूबसूरत कजरी, इस गीत में नायिका जिसका पति परदेश में है, कि तरह अपने प्रियतम को मिस कर रही है। मसलन बादल घिर आए हैं, और रिमझिम बारिश भी हो रही है, मगर मेरे पास प्रियतम नहीं हैं, वह मुझसे बहुत दूर हैं।

इसी तरह “हरे रामा नाचत मुरैला बाग देखन हम जाबै रे हरी!” पूर्वांचल उत्तर प्रदेश के इस परंपरागत लोकगीत कजरी को सुनकर हर कोई अपने गांव पहुंच जाता है। सावन के महीने में गांव में होने का अपना अलग मज़ा होता है। दरअसल, कजरी और सावन का चोलीदामन का संबंध है। मुंबई में पिछले 12 साल से कजरी महोत्सव हो रहा है और यह आयोजन रविवार की शाम (31 जुलाई 2014) से शुरू हो रहा है, जो 15 अगस्त तक चलेगा।

दरअसल, गगनचुंबी इमारतों वाले शहर मुंबई के बहुत व्यस्त और आपाधापी भरे जीवन में 3.13 और 5.15 की लोकल गाड़ी पकड़कर अपने घर या ऑफिस पहुंचने की मजबूरी ने मुंबई के लोगों को अपने आपसे ही दूर कर दिया है। लोग क्या थे और क्या हो गए...? ट्रैफिक से बचने के लिए कोस्टल रोड और फ्रीवे और समुद्र को चीरते सीलिंक की सुविधाओं में तलाशते मुंबई के लोग जीवन को सरल और सुविधा संपन्न बनाने के चक्कर में रात-दिन कठिनाई भरी राहम में चलने के लिए अभिशप्त होते हैं।

दरअसल, मुंबईकर, कंक्रीट के जंगल में मशीन जैसा जीवन जीने के अलावा और क्या कर रहे हैं। इस यंत्रवत और आर्टिफिशियल लाइफ में जीवन तो है नहीं। इसमें न लोग ख़ुद हैं, न ही उनकी परंपराएं। सच कहें तो इस तरह के तनाव भरे माहौल में रहते–रहते, जीते-जीते लोग जीना ही भूल गए हैं और जो जी रहे हैं, वह तो जीवन ही नहीं है। यानी लोग पैसे से हर सुख-सुविधाएं तो जुटा लेते हैं, लेकिन इस चक्कर में अपने नैसर्गिक जीवन ने दूर हो जाते हैं। जीने के यह नीरस सिलसिला जब ख़त्म होगा तो हमारे पर अपना असली जीवन जीने के लिए दिन ही नहीं होंगे।

ऐसे तनाव भरे माहौल में ख़ासकर बारिश की रिमझिम के बीच लोगों को अपने गांव की गलियों, चकरोट और कच्चे रास्तों पर ले जाती है कजरी। कजरी सुनकर अचानक याद आता है, अरे, हम कभी बचपन में गांव में होते थे, जहां सावन महीना शुरू होते ही गांवों में कजरी और झूलों की धूम मच जाती थी। कजरी सुनते-सुनते याद आता है, शाम को दोस्तों के साथ खलिहान में खेलना, धमाचौकड़ी करना। आहीपाही का खेल। चकरोच और पगडंडियों में बेतहाशा भागना। सुबह उठकर सानी-पानी करना। थन का ताजा दूध पीना। पेड़ों पर चढ़कर दातून तोड़ना। डाकिए का इंतज़ार करना, जो हमारे प्रियजनों की चिट्ठियां लाता था। इतना ही नहीं कजरी सुनते-सुनते है, एक बिछड़न सा महसूस करने लगते हैं, कि पड़ोस की भाभी कितने दर्द भरे गीत गाती हैं। कजरी में ये सारे इलिमेंट्स होते हैं। इसके अलावा कजरी में इंसानों ही नहीं मवेशियों का जिक्र, पक्षियों का कलरव, नदी-नाले और झरने का जिक्र होता है। सावन में पेड़-पौधे की हरियाली और उनकी घनी छांव कजरी में समाहित रहती है।

हालांकि बदलते परिवेश में सावन में गांवों में सुनाई देने वाले इन सदाबहार लोकगीतों के बोल धीरे धीरे गांव में ही मंद पड़ने लगे हैं। आधुनिकरण के दौर में गांवों के भी शहर में तब्दील होने की प्रक्रिया के चलते गांवों से भी यह गौरवशाली परंपरा विलुप्त सी हो रही है, लेकिन डेढ़ हज़ार किलोमीटर दूर देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में यह परंपरा अब भी जीवित है। जी हां, मुंबई में हर साल सावन में कजरी महोत्सव हमें साल भर जीने के लिए पर्याप्त ऊर्जा तो दे ही देती है।

हमारे दिल को छूने वाली कजरी यूं तो पूरे पूर्वी उत्तर प्रदेश में सबसे ज़्यादा लोकप्रिय लोकगीतों में से है, लेकिन मिर्जापुर, बनारस और जौनपुर में इसकी एक विशिष्ट शैलियां विकसित हुईं जो कहीं-कहीं गांवों में आज भी देखने को मिलती हैं। कजरी लोकगीत की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि इसमें गांव का ही चित्रण होता है। गांव से जुड़ी छोटी-छोटी बातों, परंपराओं को कजरी में बहुत मार्मिक और प्रभावशाली ढंग से पिरोया जाता है, इसीलिए जब भी हम कजरी सुनते हैं तो ख़ुद-ब-ख़ुद ख़यालों खो जाते हैं। कजरी सुनते हुए धीरे-धीरे ऐसा लगने लगता है, हम फिर से अपना अतीत जी रहे हैं। यह सुखद एहसास बस कजरी ही देती है।

आधुनिकता, मोबाइल, इंटरनेट, फेसबुक और वाट्सअप के दौर में गांव की ढेर सारी बातें हमारी सोच से विस्मृत होती जा रही हैं। ऐसे में कजरी हमने हर साल भले एक महीने के लिए अपनी दुनिया में वापस तो ले आती है। इस तरह कजरी हमारे जीवन के हर पहलू को अंदर तक छू जाती है। दिल को छूने की इस गौरवशाली परंपरा में बड़ी संख्या में महिलाए जुटती हैं। मुंबई में उत्तरप्रदेश की सांस्कृतिक विरासत के सच्चे प्रतिनिधि बन गए सामाजिक संस्था अभियान के संस्थापक और मुंबई भाजपा के महामंत्री अमरजीत मिश्र अपनी व्यक्तिगत पहल से पिछले अभियान के बैनर तले 12 साल से देश की आर्थिक राजधानी में कजरी महोत्सव का आयोजन करते आ रहे हैं।

ऐसे समय जब इंद्र देवता इस पंचवटी भूमि पर खासे मेहरबान हैं और सावनी वातावरण जैसे खुशनुमा मौसम ने सावन से पहले ही लोगों का मन मोह लिया है, निश्चित तौर पर सावन की रिमझिम फुहारों के बीच इस बार मुंबई में रहनेवाले उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों पर कजरी की मीठी रसधार बरसेगी। मिर्ज़ापुर, उत्तरप्रदेश की मशहूर कजरी गायिका और पारंपरिक कजरी विधा की शीर्ष प्रतिनिधि मधु पांडेय और मुंबई के सदाबहार लोकगायक सुरेश शुक्ला अभियान के कजरी महोत्सव में अपनी गायिकी की छंटा बिखेरेंगे।

इस साल भी कजरी महोत्सव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ’ मुहिम को समर्पित है। उत्तर भारत की स्त्रियों में कजरी गाने और खेलने की परंपरार है। विभिन्न क्षेत्रों में आयोजित होनेवाले महोत्सव के दौरान समाज में अहम् योगदान करनेवाली चुनिंदा महिलाओं को रोज़ाना "स्त्री शक्ति सम्मान" दिया जाएगा। ताकि महिलाओं और बेटियों को उनकी तरह बनने की प्रेरणा मिले। इस वर्ष सफल स्त्री के सम्मान का अनोखा तरीका होगा। सम्मानित स्त्री के हाथों उसकी मां को अभियान का ‘थैंक यू मां’ अकिंत स्मृति चिन्ह प्रदान किया जाएगा। यह सफल बेटी का मां के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का एक अनोखा तरीका होगा।

भारत की लोक संस्कृति का परंपराओं से गहरा और अटूट रिश्ता है। ऐसा ही पारंपरिक त्योहार कजरी तीज का है। भाद्रपद कृष्ण पक्ष तृतीया को संपूर्ण पूर्वी उत्तर प्रदेश में कजरी-तीज का त्योहार धूमधाम से मनाया जाता है। इस अवसर पर सुहागिनें कजरी खेलने अपने मायके जाती हैं। महिलाएं नदी-तालाब आदि से मिट्टी लाकर उसका पिंड बनाती हैं और उसमें जौ के दाने बो देती हैं। नित्य-प्रति इसमें पानी डालने से पौधे निकल आते हैं। इन पौधों को कजरी वाले दिन लड़कियां अपने भाई तथा बुजुर्गों के कान पर रखकर उनसे आशीर्वाद प्राप्त करती हैं। इस प्रक्रिया को 'जरई खोंसना' कहते हैं। इसके एक दिन पूर्व यानि भाद्रपद कृष्ण पक्ष द्वितीया को 'रतजगा' का त्योहार होता है। इस अवसर पर पूरे पूर्वी उत्तर प्रदेश में उत्सव का माहौल रहता है। तीज के दिन महिलाएं झूले डालती हैं। महिलाएं रात भर कजरी खेलती हैं। सजी धजी महिलाएं सावन का आनंद लेती दिखाई देती हैं। भारतीय परंपरा में सावन आने का मतलब है सुहागनों के सजने संवरने के दिन। हाथों में हरी चूड़ियों और मेंहदी के साथ वे सावन मनाती हैं। कजरी खेलना और कजरी गाना दोनों अलग चीजें हैं। श्रद्धा उमंग और खुमारी के संगम से शुरू होने वाले इस महीने का चरम हरियाली तीज पर पहुंचकर समाप्त होता था

कजरी का आरंभ देवी वंदना से होता है। रतजगा में गायन के साथ हास-परिहास, नकल, जोगीरा तथा प्रात: स्नान से पूर्व पतियों का नाम लेकर गाने की परंपरा है। रचना विधान की दृष्टि से कजरी का नाम 'चौलर' या चौलीर है। चौलीर में पांच फूल और चार बंदिशें होती हैं, पांचवें फूल पर कजरी समाप्त हो जाती है। यह कजरी बिना वा यंत्रों के भी गाई जा सकती है। कजरी का दूसरा भेद है शायरी। यह भेद अपेक्षाकृत नया है। इसमें बंदिशों की संख्या निश्चित नहीं होती। इसे प्राय: पुरुष गाते हैं। गायक की आवाज तेज हो और साथ में ढोल-नगाड़े की थाप हो तभी इस कजरी की रंगत जमती है।

कजली यों तो पूरे पूर्वी उत्तर प्रदेश का लोकगीत है किंतु मिर्जापुर, बनारस और जौनपुर में इसकी विशिष्ट शैलियां विकसित हुईं जो आज भी मौजूद हैं। बड़ी पुरानी लोकोक्ति है- 'लीला राम नगर कै भारी कजरी मिर्जापुर सरनाम'। इससे कजरी का मिर्जापुर से संबंध स्पष्ट होता है कि कजरी की जन्मस्थली मिर्जापुर ही है। कजरी के जन्मदाता के रूप में राजा दानो राय का नाम लिया जाता है। उन्होंने कज्जला देवी (विंध्याचल देवी) की स्तुति के रूप में कजरी का आविष्कार किया। एक अन्य मान्यता के अनुसार दानो राय की मौत के बाद महिलाओं ने अपना दु:ख व्यक्त करने के लिए नए राग में जिस गीत की रचना की वही कजरी है। कजरी का आरंभ ज्येष्ठ मास के गंगा दशहरा से होता है। तीन मास-तेरह दिन तक कजरी गाने का विधान है। गंगा दशहरा से आरंभ होनेवाली यह गायन परंपरा नागपंचमी से लेकर कजरी तीज तक अपने चरमोत्कर्ष पर रहती है।


मिर्जापुर और बनारस की कजरी में शैली का अंतर स्पष्ट प्रतीत होता है। यद्यपि कजरी की उत्पत्ति के बारे में विद्वानों में मतभेद नहीं है फिर भी इस बात पर सभी एकमत हैं कि कजरी का प्रचलन मिर्जापुर से ही बढ़ा। कजरी गायन क्षेत्र से जुड़े लोगों का मानना है कि कजरी का मायका मिर्जापुर और ससुराल बनारस में है। बनारस और मिर्जापुर में कजरी को पर्याप्त संरक्षण मिला, जिससे यह खूब विकसित हुई। बनारस के संगीतकारों ने इस क्षेत्र के प्रचलित लोकगीतों की तरह कजरी को भी शास्त्रीय सुरों में ढालकर उपशास्त्रीय गायन की एक नई विधा विकसित की जो काफी लोकप्रिय हुई। धीरे-धीरे इस लोकगीत की लोकप्रियता ग्राम्यांचलों में भी कम हो रही है। लोकसंगीत एवं लोकसंस्कृति के प्रमुख अंग के रूप में कजरी भी लुप्त होने के कगार पर है। इस लोक संस्कृति की रक्षा इससे जुड़ कर ही की जा सकती है।

गुरुवार, 28 जुलाई 2016

महात्मा गांधी की हत्या का रहस्य - आखिर क्यों मिले थे देवदास गांधी नाथूराम गोडसे से?

हरिगोविंद विश्वकर्मा
सीनियर बीजेपी लीडर और राज्यसभा सदस्य सुब्रमण्यम स्वामी ने संसद में राष्ट्रपिता मोहनदास कर्मचंद गांधी की हत्या पर चर्चा कराने की पैरवी की है। कहना न होगा कि गाहे-बगाहे स्वामी ने क़रीब सात दशक पुराने गांधी हत्याकांड के मुद्दे को फिर से चर्चा में ला दिया है। दरअसल, राष्ट्रपिता की हत्या से जुड़े कई पहलू ऐसे हैं, जिन पर कभी चर्चा तक नहीं हुई। लिहाज़ा, यह सुनहरा मौक़ा है, जब उस दुखद घटना के हर पहलू की चर्चा करके उसे सार्वजनिक किया जाए और देश के लोगों का भ्रम दूर किया जाए कि आख़िर वास्तविकता क्या है।

दरअसल, गांधी की हत्या के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 4 फरवरी 1948 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया माधव सदाशिव गोलवलकर उर्फ गुरुजी को गिरफ़्तार करवाने के बाद  आरएसएस समेत कई हिंदूवादी संगठनों पर प्रतिबंध लगा दिया था। लेकिन गांधी की हत्या में संघ की संलिप्तता का कोई प्रमाण न मिलने पर छह महीने बाद 5 अगस्त 1948 को गुरुजी रिहा कर दिए गए थे और तत्कालीन गृहमंत्री सरदार बल्लभभाई पटेल ने संघ को क्लीनचिट देते हुए 11 जुलाई 1949 को उस पर लगे प्रतिबंध को उठाने की घोषणा की थी। दरअसल, क़रीब डेढ़ साल हुई जांच पड़ताल के बाद सरदार पटेल ने भी माना था कि गांधीजी की हत्या में आरएसएस की कोई भूमिका नहीं, क्योंकि नाथूराम गोडसे ने हत्या का आरोप अकेले अपने ऊपर ले लिया था।

पिछली कांग्रेस सरकार के शासनकाल में हुए कई घोटालों को उजागर करने वाले सुब्रमण्यम स्वामी के सवाल को एकदम से ख़ारिज़ भी नहीं किया जा सकता, क्योंकि वाक़ई हत्या के बाद महात्मा गांधी की लाश का पोस्टमार्टम नहीं हुआ था, इससे आधिकारिक तौर पर पता नहीं चल सका कि आख़िर हत्यारे नाथूराम ने उन पर कितनी गोलियां चलाई थी। हालांकि गोडसे ने अपने बयान में कहा था कि वह गांधीजी पर दो ही गोली चलाना चाहता था लेकिन तीन गोली चल गई, जबकि कई लोग दावा कर रहे थे कि उसकी रिवॉल्वर से तीन नहीं कुल चार गोलियां चली थीं।

बहरहाल, सबसे बड़ी बात गोली लगने के बाद महात्मा गांधी को घायल अवस्था में किसी अस्पताल नहीं ले जाया गया, बल्कि उन्हें वहीं घटनास्थल पर ही मृत घोषित कर दिया गया और उनका शव उनके आवास बिरला हाऊस में रखा गया। जबकि क़ानूनन जब भी किसी व्यक्ति पर पर गोलीबारी होती और गोली उसे लगती है, तब सबसे पहले उसे पास के अस्पताल ले जाया जाता है। वहां मौजूद डॉक्टर ही बॉडी का परिक्षण करने के बाद उसे ‘ऑन एडमिशन’ या ‘आफ्टर एडमिशन’ मृत घोषित करते हैं।

दरअसल, गांधी की हत्या से जुड़े हर पहलू को नेहरू की अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार ने अनावश्यक रूप से रहस्यमय बना दिया। देश के लोग आज तक ढेर सारे बिंदुओं से अनजान है। गांधी की हत्या क़रीब सात दशक से पहेली बनी हुई है। यहां तक कि गांधी के जीवन के निगेटिव पहलुओं को उकेरते हुए जितनी भी किताबें छपती थीं, सब पर सरकार की ओर से प्रतिबंध लगा दिया जाता था, जिससे बाद में लेखक-प्रकाशक कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाते थे और कोर्ट के आदेश के बाद वह प्रतिबंध हटता था।

दरअसल, गांधी की हत्या करने वाले नाथूराम गोडसे के अपने इकबालिया बयान साफ़-साफ़ कहा था कि गांधी की हत्या केवल उन्होंने (गोडसे ने) ही की है। इसमें कोई न तो शामिल है और न ही कोई साज़िश रची गई। गांधी की हत्या के लिए ख़ुद गोडसे मानते थे कि उन्होंने एक इंसान की हत्या की है, इसलिए उन्हें फांसी मिलनी चाहिए। इसी आधार पर उन्होंने जज आत्माचरण के फांसी देने के फ़ैसले के ख़िलाफ अपील ही नहीं की। उन्होंने हाईकोर्ट में अपील केवल हत्या का साज़िश करार देने के पुलिस के फ़ैसले के ख़िलाफ़ की थी।

देश के विभाजन के लिए गांधी को ज़िम्मेदार मानने वाला नाथूराम चाहता था कि गांधीवाद के पैरोकार उससे गांधीवाद पर चर्चा करें, ताकि वह साबित कर सकें कि गांधीवाद से देश का कितना नुक़सान हुआ। गांधी की हत्या के बाद नाथूराम को पहले दिन तुगलक रोड पुलिस स्टेशन के हवालात में रखा गया था। उस समय गांधी के सबसे छोटे पुत्र देवदास गांधी गोडसे से मिलने गए थे। दरअसल, देवदास को लगा था कि किसी सिरफिरे, विद्रूप या असभ्य आचरण वाले व्यक्ति ने उनके पिता की हत्या की होगी, लेकिन जैसे ही वह हवालात के बाहर पहुंचे गोडसे ने ही उऩ्हें पहचान लिया।

नाथूराम ने कहा, “मैं समझता हूं आप श्रीयुत देवदास गांधी हैं।“ इस पर देवदास ख़ासे हैरान हुए, उन्होंने कहा, “आप मुझे कैसे जानते हैं।“ इस पर नाथूराम ने कहा, “हम लोग एक संपादक सम्मेलन में मिल चुके हैं। वहां आप ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ के संपादक के नाते और मैं ‘हिंदूराष्ट्र’ के संपादक के रूप में आया था।” नाथूराम ने कहा, “आज आप मेरी वजह से अपने पिताको खो चुके हैं। आप और आपके परिवार पर जो वज्रपात हुआ है, उसका मुझे ख़ेद हैं। मैंने गांधी की हत्या व्यक्तिगत नहीं, बल्कि राजनीतिक कारणों से की है। आप पुलिस से पूछिए, अगर पौने घंटे का वक़्त दें, जिससे मैं आपको बता सकूं कि मैंने गांधीजी की हत्या आख़िर क्यों की?”

हालांकि उस समय पुलिस वालों ने देवदास-गोडसे मुलाकात को तीन मिनट से ज़्यादा बढ़ाने से इनकरा कर दिया जिससे गांधी की हत्या पर गोडसे देवदास के साथ चर्चा नहीं कर सके थे। दरअसल, नाथूराम गांधी की हत्या पर गांधीवादियों से चर्च करना चाहता था। वह अपना पक्ष रखना चाहता था, इसीलिए जब गांधी के तीसरे पुत्र रामदास गांधी ने नाथूराम को फ़ासी की सज़ा सुनाए जाने के तीन महीने बाद अंबाला जेल में 17 मई 1949 को एक लंबा भावपूर्ण पत्र भेजा और नाथूराम को अहसास कराने की कोशिश कि गांधी की हत्या करके नाथूराम ने ऐसी ग़लती की जिसका एहसास उन्हें नहीं हैं, तब नाथूराम ने उनसे भी इस विषय पर चर्चा करने की अपील की थी।

रामदास ने लिखा था, “मेरे पिताजी के नाशवान देह का ही आपने अंत किया है, और कुछ नहीं। इसका ज्ञान आपको एक दिन होगा, ऐसा मेरा विश्वास है।” 3 जून 1949 को रामदास को भेजे जवाब में नाथूराम ने उनसे मिलने और गांधी की हत्या पर बातचीत करने की तीव्र इच्छा जताई। हालांकि उसके बाद रामदास और नाथूराम के बीच कई पत्रों का आदान-प्रदान हुआ। रामदास तो नाथूराम से मिलने के लिए तैयार हो गए थे, लेकिन उन्हें नेहरू ने इजाज़त नहीं दी। इस पर दो बड़े गांधीवादियों आचार्य विनोबा भावे और किशोरी लाल मश्रुवाला को नाथूराम से मिलने और उसके साथ चर्चा करके उसका पक्ष जानने की कोशिश की जानी थी, लेकिन ऊपर से उसके लिए भी इजाज़त नहीं दी गई। इस तरह गांधी की हत्या पर बहस की नाथूराम की इच्छा अधूरी रह गई।

दरअसल, नाथूराम ने इकबालिया बयान में स्वीकार किया था कि गांधी की हत्या केवल उसने ही की है। नाथूराम ने बाद में दूसरे आरोपी अपने छोटे भाई गोपाल गोडसे को बताया, “शुक्रवार शाम 4.50 बजे मैं बिड़ला भवन के द्वार पर पहुंच गया। मैं चार-पांच लोगों के झुंड के साथ रक्षक को झांसा देकर अंदर जाने में कामयाब रहा। वहां मैं भीड़ में अपने को छिपाए रहा, ताकि किसी को मुझे पर शक न हो। 5.10 बजे मैंने गांधीजी को अपने कमरे से निकलकर प्रार्थना सभा की ओर जाते हुए देखा। मैं मार्ग में सभास्थल की सीढ़ियों के पास खड़े लोगों के साथ खड़ा होकर इंतज़ार करने लगा। गांधीजी दो लड़कियों के कंधे पर हाथ रखे चले आ रहे थे। जब गांधी मेरे क़रीब पहुंचे तब मैंने जेब में हाथ डालकर सेफ्टीकैच खोल दिया। अब मुझे केवल तीन सेकेंड का समय चाहिए था। मैंने पहले गांधीजी का उनके महान् कार्यों के लिए हाथ जोड़कर प्रणाम किया और दोनों लड़कियों को उनसे अलग करके फायर कर दिया। मैं दो गोली चलाने वाला था लेकिन तीन चल गई और गांधीजी ‘आह’ कहते हुए वहीं गिर पड़े। गांधीजी ने ‘हे राम’ उच्चरण नहीं किया था।”

नाथूराम ने गोपाल को आगे बताया, “मेरे हाथ में पिस्तौल थी, उसमें अभी भी चार गोलियां थीं। मैं और गोली नहीं दागूंगा, यह भरोसा किसी को नहीं ता। इसलिए सभी लोग गांधी को छोड़कर दूर भाग गए। मैंने जब समर्पण की मुद्रा में हाथ ऊपर किए तब भी मेरे क़रीब आगे की हिम्मत किसी की नहीं पड़ रही थी। पुलिवाले की थी। मैं ख़ुद पुलिस पुलिस चिल्लाया। मैं काफी उत्तेजित महसूस कर रहा था। पांच छह मिनट बाद एक व्यक्ति को भरोसा हो गया कि मैं गोली नहीं चलाऊंगा और वह मेरे पास आया। इसके बाद सब मेरे पास पहुंचे और मुझ पर छड़ी और हाथ से प्रहार भी किए।”

जब नाथूराम को तुगलक रोड थाने ले जाया गया तो उसने फ़ौरन डॉक्टर बुलाकर अपनी जांच कराने की इच्छा जताई। डॉक्टर के आते ही उसने कहा, “डॉक्टर, मेरे शरीर का परीक्षा किजिए, मेरा हृदय, मेरी नाड़ी व्यवस्थित है या नहीं यह देखकर बताइए।” डॉक्टर ने जांच करके कहा कि वह पूरी तरह फिट हैं। तब नाथूराम ने कहा, “ऐसा मैंने इसलिए करवाया क्योंकि गांधी जी की हत्या मैंने अपने होशोंहवास में की है। सरकार मुझे विक्षिप्त घोषित न कर दे। इसलिए मैंने चाहता था, कोई डॉक्टर मुझे पूरी तरह फिट घोषित करे।”

बहरहाल, गांधी की हत्या को साज़िश साबित करके और नाथूराम गोडसे के साथ उनके मित्र और सहयोगी नारायण आप्टे उर्फ नाना को अंबाला जेल में 15 नंवबर 1949 को फांसी पर लटका दिया गया था, लेकिन गांधी की हत्या से जुड़े कई ऐसे पहलू हैं, जिन्हें लोग जानते ही नहीं। इसलिए सुब्रमण्यम स्वामी की बात मानकर महात्मा गांधी की हत्या के हर पहलू पर चर्चा बहुत ज़रूरी है, ताकि लोग जान सकें कि आख़िर क्या है, गांधी जी की हत्या का रहस्य?


रविवार, 24 जुलाई 2016

एक गोभक्त से भेंट -हरिशंकर परसाई

हरिशंकर परसाई ने यह व्यंग्य 1968 में लिखा था.. आज भी कितना प्रासंगिक है... ज़रूर पढ़े..
एक गोभक्त से भेंट
एक शाम रेलवे स्टेशन पर एक स्वामीजी के दर्शन हो गए। ऊँचे, गोरे और तगड़े साधु थे। चेहरा लाल। गेरुए रेशमी कपड़े पहने थे। साथ एक छोटे साइज़ का किशोर संन्यासी था। उसके हाथ में ट्रांजिस्टर था और वह गुरु को रफ़ी के गाने के सुनवा रहा था।
मैंने पूछा – स्वामी जी, कहाँ जाना हो रहा है?
स्वामीजी बोले – दिल्ली जा रहे हैं, बच्चा!
स्वामीजी बात से दिलचस्प लगे। मैं उनके पास बैठ गया। वे भी बेंच पर पालथी मारकर बैठ गए। सेवक को गाना बंद करने के लिए कहा।
कहने लगे – बच्चा, धर्मयुद्ध छिड़ गया। गोरक्षा-आंदोलन तीव्र हो गया है। दिल्ली में संसद के सामने सत्याग्रह करेंगे।
मैंने कहा – स्वामीजी, यह आंदोलन किस हेतु चलाया जा रहा है ?
स्वामीजी ने कहा – तुम अज्ञानी मालूम होते हो, बच्चा! अरे गौ की रक्षा करना है। गौ हमारी माता है। उसका वध हो रहा है।
मैंने पूछा – वध कौन कर रहा है?
वे बोले- विधर्मी कसाई।
मैंने कहा – उन्हें वध के लिए गौ कौन बेचते हैं? वे आपके सधर्मी गोभक्त ही हैं न?
स्वामीजी ने कहा – सो तो हैं। पर वे क्या करें? एक तो गाय व्यर्थ खाती है, दूसरे बेचने से पैसे मिल जाते हैं।
मैंने कहा – यानी पैसे के लिए माता का जो वध करा दे, वही सच्चा गो-पूजक हुआ!
स्वामीजी मेरी तरफ़ देखने लगे। बोले – तर्क तो अच्छा कर लेते हो, बच्चा! पर यह तर्क की नहीं, भावना की बात है। इस समय जो हज़ारों गोभक्त आंदोलन कर रहे हैं, उनमें शायद ही कोई गौ पालता हो। पर आंदोलन कर रहे हैं। यह भावना की बात है।
स्वामीजी से बातचीत का रास्ता खुल चुका था। उनसे जमकर बातें हुईं, जिसमें तत्व मंथन हुआ। जो तत्व प्रेमी हैं, उनके लाभार्थ वार्तालाप नीचे दे रहा हूँ।
स्वामी और बच्चा की बात-चीत —
– स्वामीजी, आप तो गाय का दूध ही पीते होंगे?
– नहीं बच्चा, हम भैंस के दूध का सेवन करते हैं। गाय कम दूध देती है और वह पतला होता है। भैंस के दूध की बढ़िया गाढ़ी मलाई और रबड़ी बनती है।
– तो क्या सभी गोभक्त भैंस का दूध पीते हैं ?
– हाँ, बच्चा, लगभग सभी।
– तब तो भैंस की रक्षा हेतु आंदोलन करना चाहिए। भैंस का दूध पीते हैं, मगर माता गौ को कहते हैं। जिसका दूध पिया जाता है, वही तो माता कहलाएगी।
– यानी भैंस को हम माता… नहीं बच्चा, तर्क ठीक है, पर भावना दूसरी है।
– स्वामीजी, हर चुनाव के पहले गोभक्ति क्यों ज़ोर पकड़ती है? इस मौसम में कोई ख़ास बात है क्या?
– बच्चा, जब चुनाव आता है, तम हमारे नेताओं को गोमाता सपने में दर्शन देती है। कहती है – बेटा चुनाव आ रहा है। अब मेरी रक्षा का आंदोलन करो। देश की जनता अभी मूर्ख है। मेरी रक्षा का आंदोलन करके वोट ले लो। बच्चा, कुछ राजनीतिक दलों को गोमाता वोट दिलाती है, जैसे एक दल को बैल वोट दिलाते हैं। तो ये नेता एकदम आंदोलन छेड़ देते हैं और हम साधुओं को उसमें शामिल कर लेते हैं। हमें भी राजनीति में मज़ा आता है। बच्चा, तुम हमसे ही पूछ रहे हो। तुम तो कुछ बताओ, तुम कहाँ जा रहे हो ?
– स्वामीजी मैं ‘मनुष्य-रक्षा आंदोलन’ में जा रहा हूँ।
– यह क्या होता है, बच्चा ?
– स्वामीजी, जैसे गाय के बारे में मैं अज्ञानी हूँ, वैसे ही मनुष्य के बारे में आप हैं।
– पर मनुष्य को कौन मार रहा है ?
– इस देश के मनुष्य को सूखा मार रहा है, अकाल मार रहा है, महँगाई मार रही है। मनुष्य को मुनाफ़ाखोर मार रहा है,काला-बाज़ारी मार रहा है। भ्रष्ट शासन-तंत्र मार रहा है। सरकार भी पुलिस की गोली से चाहे जहाँ मनुष्य को मार रही है, स्वामीजी, आप भी मनुष्य-रक्षा आंदोलन में शामिल हो जाइए न!
– नहीं बच्चा, हम धर्मात्मा आदमी हैं। हमसे यह नहीं होगा। एक तो मनुष्य हमारी दृष्टि में बहुत तुच्छ है। ये मनुष्य ही तो हैं, जो कहते हैं, मंदिरों और मठों में लगी जायदाद को सरकार जब्त करले, बच्चा तुम मनुष्य को मरने दो। गौ की रक्षा करो। कोई भी जीवधारी मनुष्य से श्रेष्ठ है। तुम देख नहीं रहे हो, गोरक्षा के जुलूस में जब झगड़ा होता है, तब मनुष्य ही मारे जाते हैं।एक बात और है, बच्चा! तुम्हारी बात से प्रतीत होता है कि मनुष्य-रक्षा के लिए मुनाफ़ाख़ोर और काला-बाज़ारी के खिलाफ़ संघर्ष लड़ना पड़ेगा। यह हमसे नहीं होगा। यही लोग तो मंदिरो, मठो व गोरक्षा-आंदोलन के लिए धन देते हैं। हम इनके खिलाफ़ कैसे लड़ सकते हैं
– ख़ैर, छोड़िए मनुष्य को। गोरक्षा के बारे में मेरी ज्ञान-वृद्धि कीजिए। एक बात बताइए, मान लीजिए आपके बरामदे में गेहूँ सूख रहे हैं। तभी एक गोमाता आकर गेहूँ खाने लगती है। आप क्या करेंगे ?
– बच्चा ? हम उसे डंडा मारकर भगा देंगे।
– पर स्वामीजी, वह गोमाता है पूज्य है। बेटे के गेहूँ खाने आई है। आप हाथ जोड़कर स्वागत क्यों नहीं करते कि आ माता, मैं कृतार्थ हो गया। सब गेहूँ खा जा।
– बच्चा, तुम हमें मूर्ख समझते हो?
– नहीं, मैं आपको गोभक्त समझता था।
– सो तो हम हैं, पर इतने मूर्ख भी नहीं हैं कि गाय को गेहूँ खा जाने दें।
– पर स्वामीजी, यह कैसी पूजा है कि गाय हड्डी का ढाँचा लिए हुए मुहल्ले में काग़ज़ और कपड़े खाती फिरती है और जगह-जगह पिटती है!
– बच्चा, यह कोई अचरज की बात नहीं है। हमारे यहाँ जिसकी पूजा की जाती है उसकी दुर्दशा कर डालते हैं। यही सच्ची पूजा है। नारी को भी हमने पूज्य माना और उसकी जैसी दुर्दशा की सो तुम जानते ही हो।
– स्वामीजी, दूसरे देशों में लोग गाय की पूजा नहीं करते, पर उसे अच्छी तरह रखते हैं और वह खूब दूध देती है।
– बच्चा, दूसरे देशों की बात छोड़ो। हम उनसे बहुत ऊँचे हैं। देवता इसीलिए सिर्फ़ हमारे यहाँ अवतार लेते हैं। दूसरे देशों में गाय दूध के उपयोग के लिए होती है, हमारे यहाँ वह दंगा करने, आंदोलन करने के लिए होती है। हमारी गाय और गायों से भिन्न है।
– स्वामीजी, और सब समस्याएँ छोड़कर आप लोग इसी एक काम में क्यों लग गए हैं ?
– इसी से सबका भला हो जाएगा, बच्चा! अगर गोरक्षा का क़ानून बन जाए, तो यह देश अपने-आप समृद्ध हो जाएगा। फिर बादल समय पर पानी बरसाएँगे, भूमि ख़ूब अन्न देगी और कारखाने बिना चले भी उत्पादन करेंगे। धर्म का प्रताप तुम नहीं जानते। अभी जो देश की दुर्दशा है, वह गौ के अनादर का परिणाम है।
– स्वामीजी, पश्चिम के देश गौ की पूजा नहीं करते, बल्कि गो-मास खाते हैं, फिर भी समृद्ध हैं?
– उनका भगवान दूसरा है बच्चा। उनका भगवान इस बात का ख़्याल नहीं करता।
– और रूस जैसे देश भी गाय को नहीं पूजते, पर समृद्ध हैं?
– उनका तो भगवान ही नहीं बच्चा। उन्हें दोष नहीं लगता।
– यानी भगवान रखना भी एक झंझट ही है। वह हर बात का दंड देने लगता है।
– तर्क ठीक है, बच्चा, पर भावना ग़लत है।
– स्वामीजी, जहाँ तक मैं जानता हूँ, जनता के मन में इस समय गोरक्षा नहीं है, महँगाई और आर्थिक शोषण है। जनता महँगाई के ख़िलाफ़ आंदोलन करती है। जनता आर्थिक न्याय के लिए लड़ रही है। और इधर आप गोरक्षा-आंदोलन लेकर बैठ गए हैं। इसमें तुक क्या है ?
– बच्चा, इसमें तुक है। तुम्हे अंदर की बात बताता हूंl देखो, जनता जब आर्थिक न्याय की माँग करती है, तब उसे किसी दूसरी चीज़ में उलझा देना चाहिए, नहीं तो वह ख़तरनाक हो जाती है। जनता कहती है – हमारी माँग है महँगाई कम हो, मुनाफ़ाख़ोरी बंद हो, वेतन बढ़े, शोषण बंद हो, तब हम उससे कहते हैं कि नहीं, तुम्हारी बुनियादी माँग गोरक्षा है, आर्थिक क्रांति की तरफ़ बढ़ती जनता को हम रास्ते में ही गाय के खूँटे से बाँध देते हैं। यह आंदोलन जनता को उलझाए रखने के लिए है।
– स्वामीजी, किसकी तरफ़ से आप जनता को इस तरह उलझाए रखते हैं?
– जनता की माँग का जिन लोगो पर असर पड़ेगा, उसकी तरफ़ से। यही धर्म है। एक उदाहरन देते हैं।
बच्चा, ये तो तुम्हे पता ही है कि लूटने वालों के ग्रुप मे सभी धर्मो के सेठ शामिल हैं और लूटे जाने वाले गरीब मज्दूरो मे भी सभी धर्मो के लोग शामिल हैं, मान लो एक दिन सभी धर्मो के हज़ारों भूखे लोग इकटठे होकर हमारे धर्म के किसी सेठ के गोदाम में भरे अन्न को लूटने के लिए निकल पड़ेl सेठ हमारे पास आया। कहने लगा- स्वामीजी, कुछ करिए। ये लोग तो मेरी सारी जमा-पूँजी लूट लेंगे। आप ही बचा सकते हैं। आप जो कहेंगे, सेवा करेंगे। बस बच्चा, हम उठे, हाथ में एक हड्डी ली और मंदिर के चबूतरे पर खड़े हो गए। जब वे हज़ारों भूखे गोदाम लूटने का नारा लगाते आये, तो मैंने उन्हें हड्डी दिखायी और ज़ोर से कहा- किसी ने भगवान के मंदिर को भ्रष्ट कर दिया। वह हड्डी किसी पापी ने मंदिर में डाल दी। विधर्मी हमारे मंदिर को अपवित्र करते हैं।, हमारे धर्म को नष्ट करते हैं। हमें शर्म आऩी चाहिए। मैं इसी क्षण से यहाँ उपवास करता हूँ। मेरा उपवास तभी टूटेगा, जब मंदिर की फिर से पुताई होगी और हवन करके उसे पुनः पवित्र किया जाएगा। बस बच्चा, वह जनता जो इकट्ठी होकर सेठ से लड़ने आ रही थी, वो धर्म के नाम पर आपस में ही लड़ने लगी। मैंने उनका नारा बदल दिया। जव वे लड़ चुके, तब मैंने कहा–धन्य है इस देश की धर्म-प्राण जनता! धन्य हैं अनाज के व्यापारी सेठ अमुकजी! उन्होंने मंदिर की शुद्धि का सारा ख़र्च देने को कहा है। बच्चा जिस सेठ का गोदाम लूटने भूखे लोग जा रहे थे, वो उसकी ही जय बोलने लगे। बच्चा, यह है धर्म का प्रताप। अगर इस जनता को गोरक्षा-आंदोलन में न लगाएँगे, यह रोजगार प्रापती के लिये आंदोलन करेगी, तनख़्वाह बढ़वाने का आंदोलन करेगी, मुनाफ़ाख़ोरी के ख़िलाफ़ आंदोलन करेगा। जनता को बीच में उलझाए रखना हमारा काम है बच्चा।
– स्वामीजी, आपने मेरी बहुत ज्ञान-वृद्धि की। एक बात और बताइए। कई राज्यों में गोरक्षा के लिए क़ानून है। बाक़ी में लागू हो जाएगा। तब यह आंदोलन भी समाप्त हो जाएगा। आगे आप किस बात पर आंदोलन करेंगे।
– अरे बच्चा, आंदोलन के लिए बहुत विषय हैं। सिंह दुर्गा का वाहन है। उसे सरकसवाले पिंजरे में बंद करके रखते हैं और उससे खेल कराते हैं। यह अधर्म है। सब सरकसवालों के ख़िलाफ़ आंदोलन करके, देश के सारे सरकस बंद करवा देंगे। फिर भगवान का एक अवतार मत्स्यावतार भी है। मछली भगवान का प्रतीक है। हम मछुओं के ख़िलाफ़ आंदोलन छेड़ देंगे। सरकार का मछली पालन विभाग बंद करवाँयेंगेे।
बच्चा, लोगो की मुसीबतें तो तब तक खतम नही होंगी, जब तक लूट खत्म नही होगी, एक मुद्दा और भी बन सकता है बच्चा, हम जनता मे ये बात फैला सकते हैं कि हमारे धर्म के लोगो की सभी मुसीबतों का कारण दूसरे धर्मो के लोग हैं, हम किसी ना किसी तरह जनता को धर्म के नाम पर उलझये रखेगे बच्चा।
इतने में गाड़ी आ गई। स्वामीजी उसमें बैठकर चले गए। बच्चा, वहीं रह गया।

शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

राजनीति बिजनेस से भी ज्यादा रिटर्न देने वाला सेक्टर

हरिगोविंद विश्वकर्मा
इस देश के सवर्णों (जनरल कैटेगरी) को लगता है कि बीजेपी और कांग्रेस जैसी पाटियां ही उनके हितों की रक्षा कर रही हैं। इसी तरह पिछड़े वर्ग (मंडलवाले) के लोगों को लगता है, महज सपा-आरजेडी और उनके जैसी दूसरी पार्टियां ही उनकी पैरोकार हैं। इसी तरह दलितों (एससी-एसटी) को लगता है कि केवल बसपा और लोजपा उनकी आवाज़ और उनके स्वाभिमान की रक्षा करती हैं। यूपी बिहार के यादवों को लगता है मुलायम-लालू उनका ही उद्धार कर रहे हैं। इसी आधार पर ये लोग अपने नेताओं के लिए किसी को भी मारने या अपमानित करने के लिए तत्पर रहते हैं। इन तमाम को नहीं पता कि ये लोग बड़ी ग़लतफ़हमी में जी रहे हैं।
दरअसल, सवर्ण हो या बैकवर्ड या फिर दलित, सभी क्राइसेस ऑफ इन्फॉरमेशन यानी अज्ञानता के शिकार हैं। एक दूसरे के ख़ून के प्यासे हो चुके इन तीनों कैटेगरीज़ के लोगों पता ही नहीं कि देश में केवल दो वर्ग है। सत्ता वर्ग और प्रजा वर्ग। सारे नेता चाहे वे जिस पार्टी के हों, सत्ता वर्ग के हैं और पार्टी लाइन से ऊपर उठकर हमेशा हर नेता दूसरे नेता को डिफेंड करता है। कोई नेता क्या है? क्या वह हमारे आपकी तरह बस और ट्रेन या रिक्शे में सफ़र करता है। नहीं, उसकी आर्थिक हैसियत पर रिसर्च करिए। तब उसका समर्थन या विरोध कीजिए।
नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं। कहते हैं, चाय बेचकर पीएम बने हैं। अपने अब तक के कार्यकाल में उन्होंने चायवालों के लिए क्या किया? प्रधानमंत्री बनते ही सबसे पहले दिल्ली कटरा (वैष्णोदेवी) के बीच श्रीशक्ति एक्सप्रेस को हरी झंडी दिखाया, जो पूरी तरह एसी ट्रेन है। आगे बुलेट ट्रेन चलाएंगे। इन सब में कितने चायवाले यात्रा करेंगे? आप सोचिए, बुलेट ट्रेन चलाने पर जितना ख़र्च आ रहा है, उससे पूरे देश के लोगों का मुफ़्त इलाज हो सकता है। उनकी जान बचाई जा सकती है, ख़ासकर उनकी जो महंगे इलाज के कारण उपचार नहीं करवा पा रहे हैं और बिना पूरा जीवन जीए मर रहे हैं। आए दिन हम सोशल नेटवर्क पर ऐसे लोगों के नाम देखते रहते हैं। खैर, मोदी ने ऐसा नहीं किया, क्योंकि वह चायवालों के नहीं सत्तावर्ग के प्रतिनिधि हैं।
दुनिया जानती है, पवार, मायावती, मुलायम-लालू, पासवान, जयललिता, करुणानिधि, ठाकरे और दूसरे ढेर सारे नेताओं ने राजनीति में आने के बाद अकूत धन बनाया। जिसका उनके ज्ञात आय के स्रोत से कोई मिलान नहीं। फिर मोदी ने किसके ख़िलाफ़ कार्रवाई की। नाम बताइए। मोदी ने तो रॉबर्ट वाड्रा तक को छोड़ दिया, जिसके ख़िलाफ़ कार्रवाई करने की बात कहकर सत्ता में आए। आप सोच रहे होंगे कि कोई कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है? तो जान लीजिए ये सभी लोग सत्तावर्ग परिवार के हैं। इन्हें पोलिटिकल फैमिली भी कह सकते हैं। एक दूसरे को बचाते हैं। इस सत्ता परिवार में तमाम मीडिया घराने के मालिक भी आते हैं, जो पत्रकारों को टूल की तरह इस्तेमाल करते हैं।
इन सत्ता-परिवार में सोनिया, मुलायम, लालू, मायावती, गडकरी, पवार, करुणानिधि, जयललिता, बादल, नीतीश, ममता, राज-उद्धव ठाकरे, सोरेन, अब्दुल्ला व मुफ्ती परिवार, गहलोत, फडनवीस, चव्हाण, पटनायक, सिंधिया, जिंदल, केजरीवाल के अलावा सभी नेता, सभी 790 सांसद, 99 फ़ीसदी विधायक हैं। हमें लगता है ये एक दूसरे के विरोधी हैं, लेकिन यक़ीन मानिए ये एक दूसरे के हितैषी हैं। इनकी मदद करते हैं सभी औद्योगिक घराने। इसके अलावा अमिताभ बच्चन, शाहरुख, सलमान, आमिर-अक्षय, तेंदुलकर, धोनी और बाक़ी खरबपति लोग भी सत्तावर्ग क्लब में शामिल हैं। इसमें दो राय नहीं कि पूरा देश महज 5 फ़ीसदी संपन्न लोगों का होकर रह गया है। वहीं लोग क़ायदे की ज़िंदगी जी रहे हैं। अंग्रेज़ों के जाने के बाद शुरुआत में जिन्हें मौक़ा मिला, उन्होंने बहुत बड़ी संपत्ति हथिया ली और वही लोग धन्नासेठ कहलाते हैं। इसी तरह जिन लोगों को नौकरियां मिलीं, उन्होंने अपने परिवार और उसके बाद क़रीबी ओर उसके बाद दूर के रिश्तेदारों को कहीं न कहीं सेट कर दिया।
ख़ूब डींग हांकी जाती है कि भारत लोकतांत्रिक देश है। यहां जनता के हित के लिए जनता के द्वारा चलाई जा रही जनता की सरकार है। अच्छा बताएं, देश और देश के लोकतंत्र में जनता की कितनी भागीदारी है? किसी को पता है, देश को कौन-कौन लोग चला रहे हैं? जो लोग देश को चला रहे हैं, वे आम आदमी के कितने हितैषी हैं? यह समझना बहुत ज़रूरी है कि इस देश में लोगों पर शासन कौन लोग कर रहे हैं? बहुत लंबे और गहन रिसर्च और अध्ययन के बाद देश में संपन्न लोगों का वर्गीकरण किया गया है।
1. बेशुमार दौलत किसके पास ?

पहली कैटेगरी
एक अरब 28 करोड़ की आबादी वाले इस देश में खरबपति (हज़ार करोड़ रुपए से ज़्यादा संपत्ति वाले) केवल 55 (पचपन) लोग हैं, जिनमें बड़े उद्योगपति, टॉप-लिस्टेड बिल्डर्स और कुछ बहुत भ्रष्ट नेता हैं। यही लोग प्रमुख राजनीतिक दलों की फंडिंग करते हैं। पूरी व्यवस्था पर एक तरह से इन्हीं का कंट्रोल है। सरकार किसी की भी रहे, इनकी कोई फाइल किसी भी मंत्रालय में नहीं रुकती। जो रोकने की कोशिश भी करता है, उसे उसके पद से हटा दिया जाता है।

दूसरी कैटेगरी
दुनिया भर में सुपररिच लोगों का हिसाब-क़िताब रखने वाली अंतरराष्ट्रीय ऐसेंजी बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप यानी बीसीजी की अभी हाल ही में आई सालाना रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में सुपररिच लोगों की संख्या तीन गुना बढ़ गई। एजेंसी ने कहा कि 100 मिलियन अमेरिकी डॉलर यानी 650+ करोड़ रुपए की संपत्ति वालों की संख्या 2013 के 284 से बढ़कर 2014 में 928 हो गई। यानी देश में मात्र 929 लोगों के पास कम से कम 650 करोड़ रुपए की संपत्ति है। इनमें इनमें उद्योगपतियों, बड़े समाचार पत्रों और चैनल्स के मालिक, बिल्डर, कारोबारी, भ्रष्ट नेता आते हैं।

तीसरी कैटेगरी
अगर व्यक्तिगत संपत्ति कम करके लगभग 200 करोड़ रुपए कर दें तो, धन्नासेठों की संख्या भी 7850 हो जाती है। इनमें उद्योगपतियों, बिल्डर, कारोबारी, भ्रष्ट नेता, अभिनेता और बड़े खिलाड़ी आते हैं। यानी इस देश में 0.0006133 फ़ीसदी लोगों के पास 200 करोड़ या उससे ज़्यादा संपत्ति है।

चौथी कैटेगरी
अगर घर की संपत्ति के अलावा बाक़ी संपत्ति को न्यूनतम 25 करोड़ रुपए कर दे, तो कोटक वेल्थ मैनेजमेंट की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक़, 2015 में भारत में सुपर रिच की संख्या 1 लाख 37 हज़ार (137100) हो गई है। यह देश की आबादी का 0.0100 फ़ीसदी है। इस वर्ग के सुपर रिच की यह संख्या 2014 में एक लाख सत्रह हज़ार थी।

पांचवी कैटेगरी
अगर घर जैसी संपत्ति को छोड़कर व्यक्तिगत संपत्ति 6 करोड़ रुपए की संपत्ति को आधार बनाएं तो बीसीजी की सालाना रिपोर्ट के अनुसार, भारत में केवल 1.75 लाख परिवारों की निजी संपत्ति क़रीब 6 करोड़ रुपये या उससे अधिक हैं। यानी इस देश में केवल 0.0150 प्रतिशत लोग ही जिन्हें सही मायने में आर्थिक रूप से सुखी और चिंतामुक्त कहा जा सकता है।

इन पांचों कैटेगरीज़ के लोग मनचाही ज़िंदगी जीते हैं। महंगाई कितनी भी बढ़ जाय इनको कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। इनके पास इतनी ज़्यादा दौलत है कि इनकी सौ पीढ़ियां भी ख़र्च नहीं कर पाएंगी। इन पर किसी संकट का असर नहीं होता। ये ठाट से 24 घंटे एसी वाली जगह रहते हैं। ये केवल प्लेन से सफ़र करते हैं। जिस संकट आप रोज़ाना दो-चार होते हैं, उससे इनका कभी सामना नहीं होता। इनके सामने रोज़ी-रोटी का संकट नहीं जो आम आदमी रोज़ाना झेलता है। ये जो दान देते हैं, या धर्म-कर्म करते हैं, वह इसलिए करते हैं ताकि इन्हें इनकम टैक्स में छूट मिले। वरना ये हमारे आपकी ओर देखना भी पसंद नहीं करते हैं।

देश की संसद पर इन्हीं का क़ब्ज़ा है। कार्यपालिका और न्यायपालिका को इन्होंने बंधक बना रखा है। इकॉनॉमी पर इनका दख़ल है। शेयर बाज़ार में यही निवेश करते हैं। मुंबई में करोड़ों रुपए के महंगे फ़्लैट ख़रीदने की हैसियत इनकी ही है। हर छोटी-बड़ी इंडस्ट्रीज़ इनके कंट्रोल में है। खेल संघों में अहम पदों पर यही हैं। छोटे-बड़े सभी संस्थानों में इनका ही वर्चस्व है। मीडिया के असली ओनर यही हैं, जहां पत्रकारों को टूल की तरह इस्तेमाल करते हैं और ज़रूरत ख़त्म होने पर दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंकते हैं। समस्याओं हल करने के लिए एसी कमरे में बैठकर यही लोग डायलॉग करते हैं।
2. बेशुमार आमदनी किसकी ?

पहली कैटेगरी
अगर सालाना कमाई को 1 करोड़ रुपए बेस मान लें तो वित्त मंत्रालय के मुताबिक, केवल 42,800 (42 हज़ार आठ सौ) लोगों की सालाना आमदनी 1 करोड़ रुपए या उससे ज़्यादा है। जो आबादी का मात्र 0.00354 फ़ीसदी है। इसमें उद्योगपति, बिल्डर, कारोबारी के साथ भ्रष्ट नौकरशाह, भ्रष्ट पुलिस अफ़सर, भ्रष्ट जज और बड़े अभिनेता और खिलाड़ी शामिल हैं। मज़ेदार बात है कि देश की कुल संपत्ति का 95 हिस्सा इन्हीं 0.00354 फ़ीसदी लोगों के पास है। यही लोकसभा, राज्यसभा और राज्य की विधानसभाओं में पहुंचने की हैसियत रखते हैं। या अपने ख़ास लोगों को फंडिंग के ज़रिए संसद-विधानसभाओं में पहुंचाते हैं, जो इनके हित के मुताबिक़ फ़ैसले लेते हैं।

दूसरी कैटेगरी
इस कैटेगरी में सत्तावर्ग के प्रति स्वामिभक्ति दिखाने वाले चमचे लोग आते हैं। इनकी सालाना कमाई 20 लाख से एक करोड़ रुपए (1.67 लाख से लेकर 8.33 लाख रुपए प्रति माह) के बीच होती है। इनकी आबादी 4.06 लाख है। ये भी आबादी का महज 0.0319 फ़ीसदी हिस्सा हैं। इस कैटेगरीज़ के लोग सत्तावर्ग के आदमी कहे जाते हैं। इनकी आबादी महज़ 0.03544 फीसदी है, जो कुल आबादी का 32वां हिस्ता नहीं बल्कि एक बत्तीसवें फ़ीसदी के आसपास है।

तीसरी कैटेगरी
इस कैटेगरी में आबादी का 0.108 फ़ीसदी हिस्सा यानी 13.78 लाख लोग आते हैं। जिनकी आमदनी 10 से 20 लाख रुपए (83 हज़ार से लेकर 1.67 लाख रुपए प्रति माह) के बीच होती है। इन पर भी महंगाई का बहुत ज़्यादा असर नहीं होता है। इस वर्ग के क़रीब 95 फ़ीसदी लोग सत्ता परिवार की ओर झुके रहते हैं। यानी उनकी दलाली या चमचागिरी करते हैं। बदले में इन्हें अच्छा जीवन जीने की गारंटी मिलती है।

चौथी कैटेगरी
इस कैटेगरी की संख्या 17.88 लाख है, जो आबादी का 0.140 फ़ीसदी है। ये हर साल 5 से 10 लाख रुपए (क़रीब 42 हज़ार से लेकर 83 हज़ार रुपए प्रति माह) की कमाई करते हैं। ये मध्यम वर्ग के आदमी कहे जाते हैं। इसमें हमारे आप के बीच के अच्छा सेलरी वाले सीनियर पत्रकार भी आते हैं। इस वर्ग के 90 फ़ीसदी से ज़्यादा लोग यथास्थितिवादी होते हैं। परिवार पालने या दूसरी मज़बूरियों के चलते ज़मीर से समझौता करके सत्ता वर्ग की हां में हां मिलाते हैं और फ़ेसबुक या दूसरी सोशल नेटवर्किंग साइट पर अपनी जमात यानी आम आदमी को ख़ूब गाली देते हैं या उसकी आलोचना करते हैं। पेट पालने की मज़बूरी में ये समाज का भला करने वालों के ख़िलाफ़ माहौल बनाते हैं।

इन चारों कैटेगरीज़ को मिला दीजिए, तो कुल 0.28344 फ़ीसदी होता है. यह आबादी का आधा फ़ीसदी भी नहीं है। यानी मुट्ठी भर लोग देश को चलाते या उनका समर्थन करते हैं। अब सोचिए, इस देश में इंसान की तरह रहने वालों की संख्या कितनी कम है।

पांचवीं कैटेगरी
सालाना कमाई को और कम करें तो कितने भयावह आंकड़े आते हैं, यह देखिए...
आमदनी की पांचवी कैटेगरी के लोगों की आमदनी 1.80 लाख से 5 लाख रुपए (15 हजार से क़रीब 42 हज़ार रुपए प्रति माह) के बीच होती हैं। टैक्स देने वालों में ये सबसे नीचे हैं। इन्हें लोअर मिडिल क्लास कहे जाते हैं जिनकी जनसंख्या 2 करोड़ 88 लाख से ज़्यादा है। यह कुल आबादी का 2.271 फ़ीसदी है।

पूरे देश में टेक्सपेयर्स की कुल संख्या 2016 के बजट के अनुसार 4 फ़ीसदी यानी 5 करोड़ 16 लाख है। यानी जितने संपन्न हैं सब इसी में हैं।रिटर्न फाइल करने वाले टैक्‍सपेयर्स में से 54 फीसदी (2.78 करोड़) के ऊपर जीरो टैक्‍स दिया। यानी ये बॉर्डर पर रह गए। यानी असली टैक्स देने वाले केवल 46 फ़ीसदी यानी 2 करोड़ 37 लाख लोग हैं। इनकी आबादी 2 फ़ीसदी भी नहीं है। बहरहाल, इन 2 फ़ीसदी लोगो पर आश्रित व्यक्तियों को भी जोड़ दिया जाए तो बमुश्किल 5 फ़ीसदी होता है। यानी महज 5 फ़ीसदी लोग इंसान की तरह रहते हैं। बाक़ी लोग जीवन के लिए संघर्ष करते हैं।
3. इनके हिस्से कुछ भी नहीं आया?
आइए उनकी बात करे जिनके हिस्से कुछ भी नहीं आया।

पहली कैटेगरी
इस कैटेगरी में देश की 27 करोड़ आबादी आती है। इन्हें रोज़ाना दो डॉलर यानी 130 से 135 रुपए मजदूरी मिलती है। ये लोअर मज़दूर वर्ग के लोग हैं इनकी सालाना आमदनी 50 हज़ार से ज़्यादा नहीं होती। इनकी तादाद 23.3 यानी क़री-क़रीब एक चौथाई आबादी अपना ख़ून पसीना बहाने का बावजूद महज 130 रुपए रोज़ पाती है।

दूसरी कैटेरगी
इस कैटेगरी में मनरेगा के तहत न्यूनतम 100 दिन काम पाने वाले लोग भी आते हैं, जिन्हें दैनिक मज़दूरी 174 रुपए मिलती है। इऩकी सालाना आमदनी 16 हज़ार से 1 लाख 80 हज़ार रुपए (क़रीब 14 सौ रुपए से लेकर 15 हज़ार रुपए प्रति माह) होती है। ये बड़ी मुश्किल से पेट पाल पाते हैं और प्रलोभन दिए जाने पर अपराध की दुनिया में उतर जाते हैं। इस कैटेगरी में 49 करोड़ 69 लाख 60 हजार लोग काम करने वाले हैं। इनकी आबादी आबादी का 38.82 फ़ीसदी है। इनमें ज़्यादातर दिहाड़ी मज़दूर हैं। अस्थाई ड्राइवर और छोटा-मोटा काम करने वाले हैं।

तीसरी कैटेगरी
इस कैटेगरी के लोग कुछ भी नहीं करते। यानी बेरोज़गार हैं। इंटनैशनल लेबर ऑर्गनाइज़ेशन की ग्लोबल इंप्लॉयमेंट ट्रेंड 2014 की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 4 करोड़ 56 लाख पंजीकृत बेरोज़गार हैं। यानी आबादी के 3.8 फ़ीसदी हिस्से के पास काम ही नहीं है। ये अपने माता-पिता या संरक्षक पर निर्भर होते हैं। इनका जीवन संकटपूर्ण होता है। बड़ी मुश्किल से पेट पाल पाते हैं और प्रलोभन दिए जाने पर अपराध की दुनिया में उतर जाते हैं। अपराध, नक्सलाइट या आतंकवाद की दुनिया में आने वाले 99 फ़ीसदी इसी कैटेगरी के होते हैं।
4. क्या है नौकरियों की हक़ीक़त ?
नौकरी में जिस आरक्षण ने देश के युवकों को अगड़े-पिछड़े या हिंदू-मुस्लिम के नाम पर आपस में लड़ा रहा है, उसकी हालत देखिए। इंडियन इकॉनमी में नौकरी की औक़ात केवल 2.3 फ़ीसदी है। यानी महज़ 2.3 फ़ीसदी के लिए युवक धर्म, जाति, क्षेत्र, भाषा और नस्ल के नाम पर बंटे हैं। इस नौकरी की संख्या महज 2.96 करोड़ है। यानी देश में कुल 2 करोड़ 96 लाख 50 हज़ार लोग ही ठीकठाक नौकरी करते हैं। यानी देश के युवकों की नज़र 97.7 फ़ीसदी हिस्से पर न होकर महज 2.3 फ़ीसदी हिस्से पर है।

बहरहाल, 2.96 करोड़ सेलरीड लोगों में 2 करोड़ लोग केंद्र सरकार, सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों की नौकरी के अलावा बैंक और दूसरे सावर्जनिक उपक्रम में काम करते हैं। केंद्र सरकार के पास 47 लाख कर्मचारी और 52 लाख पेंशन पाने वाले रिटायर्ड लोग हैं। अकेले भारतीय रेलवे में 13 लाख 34 हज़ार कर्मचारी हैं। अभी जो पे कमिशन लागू हुआ, उसका फायदा इन्हीं एक करोड़ कर्मियों को मिलेगा। ये लोग मुफ़्त की तनख्वाह लेते हैं। काम कुछ नहीं करते।

इसी तरह प्राइवेट सेक्टर में 96 लाख लोग नौकरी करते हैं। जिनमें 50 सबसे बड़ी निज़ी कंपनियों में बमुश्किल 10 लाख लोगों को नौकरी मिली हुई है। बाक़ी 86 लाख लोग छोटी-छोटी कंपनियों में काम करते हैं, जहां कंपनियां जब चाहें, उन्हें नौकरी से निकाल दें।

भारतीय बैंकों में कुल 11 लाख 51 हज़ार (पब्लिक सेक्टर बैंकों में 8 लाख 30 हजार, निजी बैंकों में 2 लाख 96 हज़ार और विदेशी बैंकों में क़रीब 25 हज़ार) कर्मचारी हैं। बैंको में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने सबसे ज़्यादा 1 लाख 98 हज़ार लोगों को नौकरी दे रखी है। इसी तरह देश की सबसे बड़ी कंपनी रिलांयस इंडस्ट्रीज़ में कुल 24,930 कर्मचारी हैं। अनिल अंबानी की रिलायंस ने अपनी बेवसाइट पर कर्मचारियों की संख्या नहीं लिखी है, परंतु माना जा रहा है कि कंपनी ने अपनी सभी कंपनियों में 20 हजार स्टॉफ रखे हैं। टाटा का कारोबार 100 से ज़्यादा देशों में हैं, इसकी बेवसाइट के मुताबिक़ समूह में 6 लाख कर्मचारी हैं। टाटा ने कितने भारतीयों को नौकरी दी है, इसकी ब्यौरा छुपा लिया है। विशेषज्ञों के मुताब़िक कंपनी ने 35 हज़ार भारतीय नागरिकों को नौकरी दी है।
देश के सबसे बड़े प्रकाशन समूह टाइम्स ऑफ इंडिया ने 11000 लोगों को नौकरी दी है। सबसे बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी माइक्रोसॉफ्ट है, जिसने पूरी दुनिया में एक लाख 18 हज़ार लोगों को नौकरी दी है। भारत में इसके पांच हज़ार से भी कम कर्मचारी हैं, जबकि भारत में सबसे ज़्यादा कमाई करती है। दूसरी सबसे बड़ी कंपनी अमेरिका की आईबीएम में 73 हज़ार कर्मचारी हैं। हिंदुस्तान यूनीलीवर के यहां 18000 लोग नौकरी करते हैं। नेस्ले कंपनी के पांचों मैगी प्लांट्स में 1500 लोग काम करते हैं और कंपनी हर साल 500 करोड़ रुपए मुनाफा कमाती है। इसी तरह सबसे बड़ी मोबाइल कंपनी वोडाफोन इंडिया के पास 11500 कर्मचारी हैं और यह कंपनी भारत से हर साल 20 हज़ार करोड़ कमाकर अपने देश भेजती है।
प्रजावर्ग की आबादी का 95 फ़ीसदी है। ये अनाज की बोरी की तरह ट्रेन में ठुंसने वाले लोग होते हैं। इनके न तो पैदा होने की नोटिस ली जाती है न ही मरने की। लोकतंत्र, लोकतंत्र के स्तंभ- कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका और मीडिया, तमाम व्यवस्थाएं- शासन-तंत्र, पुलिस, बैंक, सभी योजनाएं इनके लिए बेमानी हैं। चाहे साबित हो या न हो, पर पूरा देश जान गया है कि सत्ता के शिखर पर बैठे लोग महाभ्रष्ट हैं। ख़ुलेआम लूट रहे हैं। लूटमारी के धंधे में कोई नेता किसी से कम नहीं है। ये इतने निरंकुश हैं कि इन्हें अपने किए पर ज़रा भी पछतावा नहीं है। इनकी छांव में फल-फूल रहे, इनके चमचे, इन भ्रष्टों का बेखौफ़ होकर बचाव करते हैं। भारतीय क़ानून में बचाव-पक्ष को दिए जाने वाले मौक़े का नाजायज़ तरीक़े से दुरुपयोग कर रहे हैं।
दरअसल, क़ुदरत ने जो दिया है वह समस्त देशवासियों के लिए पर्याप्त है। लेकिन सत्ता में बैठे लालची लोगों ने आम लोगों के हिस्से के रिसोर्सेज़ पर भी क़ब्ज़ा कर लिया है। रूलिंग क्लास ने आम लोगों का हक़ मारने का सामाजिक और नैतिक अपराध किया है। लिहाज़ा इनके साथ अपराधियों की तरह सलूक किया जाना चाहिए। इनके लिए दंड निर्धारित किया जाना चाहिए।