बुधवार, 15 नवंबर 2017

क्या नाइंसाफ़ी हुई थी नाथूराम गोडसे के साथ?



हरिगोविंद विश्वकर्मा

आजकल राष्ट्रपिता मोहनदास कर्मचंद गांधी की हत्या का प्रकरण एक बार फिर से चर्चा में हैं। अभिनव भारत के एक कार्यकर्ता ने महात्मा गांधी हत्याकांड को रिओपन करने की मांग की है, हालांकि महात्मा गांधी के प्रपौत्र तुषार गांधी इसका विरोध कर रहे हैं। इस बीच एक सवाल यह भी है कि क्या बीसवीं सदी में मोहम्मद अली जिन्ना से भी बड़ा खलनायक करार दिए गए महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे और कथित तौर पर उनका साथ देने वाले उनके मित्र नारायण आपटे के साथ न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका की तरफ़ से गहरी नाइंसाफी हुई थी?

अगर नाथूराम और नारायण के साथ वाक़ई नाइंसाफी हुई तो कह सकते हैं कि आज का दिन शोक का दिन है। हरियाणा के अंबाला में आज यानी 15 नवंबर 1949 को ग़म का माहौल था। सारा शहर शोक के सागर में डूबा था। आज ही के दिन सुबह आठ बजे नाथूराम और नारायण को फ़ांसी की सज़ा दी गई थी। फ़ांसी के विरोध में पूरे शहर के दुकानदारों ने अपनी दुकानें बंद रखीं। गांधी की हत्या 30 जनवरी 1948 को शाम पांच बजकर सत्रह मिनट पर हुई थी और हत्या के 645 दिन बाद यानी एक साल 10 महीने और 15 दिन में ही दोनों आरोपियों को फ़ांसी के फंदे पर लटका दिया गया।

भारतीय न्यायालय ने गांधी हत्याकांड से जुड़े मुक़दमे में जितनी तेज़ी दिखाई, वैसी मिसाल भारतीय न्यायपालिका के पूरे इतिहास में देखने को नहीं मिलती। इस पूरे प्रकरण का जो भी निष्पक्षता से और विचारपूर्वक अध्ययन करेगा, उसे निश्चित रूप से संदेह होगा है कि संभवतः भारतीय लोकतंत्र के तीनों स्तंभों - न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका - ने 30 जनवरी 1948 को ही तय कर लिया था कि महात्मा गांधी की जान लेने वाले अपराधियों को जितने जल्दी हो सके फांसी पर लटका दिया जाना चाहिए। यानी इन तीनों स्तंभों ने उस दिन साज़िश रची थी कि हत्यारे को मृत्युदंड से कम सज़ा नहीं देनी है और जल्दी से जल्दी देनी है। वरना निचली अदालत, उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय (तब प्रिवी काउंसिल थी क्योंकि तब तक सुप्रीम कोर्ट का गठन नहीं हुआ था) ने डेढ़ साल से भी कम समय में फ़ांसी की सज़ा को अंतिम स्वीकृति दे दी।

गौरतलब है कि नाथूराम गोडसे ने पहले दिन ही कह दिया था कि उन्होंने महात्मा गांधी की हत्या की है, एक इंसान की जान ली है, इसलिए उन्हें दंडस्वरूप  फ़ांसी ही मिलनी चाहिए। इसीलिए उन्होंने अपनी सज़ा के ख़िलाफ हाई कोर्ट में अपील न करने का फ़ैसला किया था। उन्होंने यह भी कहा था कि गांधी की हत्या का काम उन्होंने अकेले किया है, इसलिए उनके अपराध का दंड उनसे जुड़े दूसरे लोगों को नहीं मिलना चाहिए। इसीलिए जब जुलाई में प्रिवी काउंसिल ने बाकी आरोपियों की अपील को अस्वीकार कर दिया तब उसके सप्ताह भर के भीतर नाथूराम और नारायण आपटे को 15 नवंबर 1949 को फ़ांसी देने की तारीख़ मुकर्रर कर दी गई। तमाम जन भावना की अनदेखी करते हुए 15 नवंबर 1949 को अंबाला कारागार में नाथूराम गोडसे और नारायण आपटे को फ़ांसी के फंदे पर लटका दिया गया।

दरअसल, गोडसे ने महात्मा गांधी की हत्या नई दिल्ली के बिड़ला हाउस परिसर में 30 जनवरी 1948 को शाम पांच बजकर सत्रह मिनट पर की थी। पेट्रोलिंग कर रहे तुगलक रोड थाने के इंस्पेक्टर दसौंधा सिंह और पार्लियामेंट थाने के डीएसपी जसवंत सिंह 5.22 बजे बिड़ला हाउस गेट पर पहुंचे। वहां अफरा-तफरी का माहौल था। गांधी के अनुयायी रो रहे थे। पुलिस वालों को पता चला किसी ने गांधीजी को गोली मार दी और ख़ुद को स्वेच्छा से जनता के हवाले कर दिया। गांधी को गोली मारने के बाद अपराधी व्दारा ख़ुद को जनता के हवाले करने की बात सुनकर पुलिस हैरान हुई। बहरहाल, तब तक गांधीजी का शव अंदर ले जाया जा चुका था। लिहाजा, दसौंधा सिंह और कुछ पुलिस वाले जसवंत सिंह के आदेश पर नाथूराम को तुगलक रोड थाने ले गए। रात को क़रीब पौने दस बजे बापू की हत्या की एफ़आईआर लिखी गई। इसे लिखा था थाने के दीवान-मुंशी दीवान डालू राम ने। उस वक्त थाने में दिल्ली के इंस्पेक्टर जनरल ऑफ पुलिस डीवी संजीवी और डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल डीडब्ल्यू मेहता भी मौजूद थे। इसके बाद नाथूराम औपचारिक रूप से अंडर अरेस्ट हो गए।

दिल्ली पुलिस की प्रताड़ना और डर के चलते दिगंबर बड़गे सरकारी गवाह बन गया। कहा जाता है कि वह बहुत कपटी स्वभाव का था भी। बहरहाल, अंततः महात्मा गांधी हत्याकांड की सुनवाई 27 मई 1949 को शुरू हुई। उसी दिन सभी 9 आरोपियों को लाल किला में बनाई गई विशेष अदालत में लाया गया और दिल्ली पुलिस ने हत्याकांड की जांच करके 8 आरोपियों के ख़िलाफ़ आरोप पत्र दाखिल किया। 21 जून को सभी पर आरोप तय कर दिए गए और अदालत की कार्यवाही शुरू हुई।

10 फरवरी 1949 को विशेष न्यायालय के न्यायाधीश आत्माचरण ने नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे उर्फ नाना को फ़ांसी की सज़ा और पांच आरोपियों विष्णु करकरे, मदनलाल पाहवा, गोपाल गोडसे, शंकर किस्तैया और डॉ. दत्तात्रय परचुरे को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई। यानी हत्या के एक साल 11 दिन बाद सज़ा हो गई। इस केस में अदालत ने विनायक दामोदर सावरकर को सबूत के अभाव में रिहा कर दिया और एक अन्य आरोपी दिगंबर बड़गे सरकारी गवाह बन गया था।

ईस्ट पंजाब हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस अमरनाथ भंडारी, जस्टिस अच्छरूराम और जस्टिस गोपालदास खोसला की पूर्ण पीठ ने 23 मई 1949 को सुनवाई शुरू की। हाईकोर्ट ने नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे की फ़ांसी की सज़ा और विष्णु करकरे, मदनलाल पाहवा, गोपाल गोडसे और शंकर किस्तैया की उम्र क़ैद  की सज़ा को बरकरार रखा और डॉ. दत्तात्रय परचुरे को रिहा कर दिया। सबसे अहम् बात हाई कोर्ट का फ़ैसला 22 जून 1949 को यानी एक महीने से एक दिन कम में ही आ गया।

दरअसल, नाथूराम और नारायण को हत्या के दो साल से भी कम समय में फ़ांसी दे दी गई। जबकि आज के दौर में हत्या की वारदात के 15-15 साल ही नहीं 20-20 साल और कहीं कहीं 25 साल तक फांसी की सज़ा पाए आरोपी को मृत्युदंड नहीं दिया जाता। अभी तीन साल पहले पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के हत्यारे बलवंत सिंह राजोआना की फांसी की सज़ा सुप्रीम कोर्ट ने इसलिए उम्रक़ैद में बदल दी क्योंकि उसकी दया याचिका पर फ़ैसला लेने में राष्ट्रपति ने कुछ ज़्यादा देरी कर दी। सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि मृत्युदंड पाए अपराधियों की दया याचिका पर अनिश्चितकाल की देरी नहीं की जा सकती और देरी किए जाने की स्थिति में उनकी सजा को कम किया जा सकता है। इसी बिना पर 2013 में देश की सबसे बड़ी अदालत ने 22 पुलिसवालों की लैंड माइन ब्लास्ट कर हत्या करने वाले  चंदन तस्कर वीरप्पन के 15 सहयोगियों की फांसी की सजा को उम्रकैद में तब्दील करने का आदेश दिया। इसी तरह 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने खालिस्तानी आतंकी देवेंद्र पाल सिंह भुल्लर की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया। सुप्रीम कोर्ट में कहा कि भुल्लर की फांसी माफी की याचिका स्वीकार की जा सकती है। दया याचिका निपटाने में देरी के आधार पर फांसी पाने वाले अपराधी को माफ़ी की मांग करने का हक देने वाले सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद इस मसले पर बहस की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती।

भारत में पिछले 70 साल के दौरान अधिकारिक सरकारी आंकड़ों के अनुसार स्वतंत्रता के बाद अब तक केवल 52 लोगों को फांसी की सजा दी गई है। हालांकि नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी दिल्ली के अनुसार भारत में 1947 से अब तक कुल 755 लोगों की मृत्युदंड की सज़ा पर अमल किया गया है। वैसे पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज अपने एक शोध में दावा करता है कि देश में फ़ांसी पर लटकाए गए लोगों की संख्या इन आंकड़ो से भी ज़्यादा है। पीयूसीएल के अनुसार केवल 1953 से 1963 के बीच यह संख्या 1422 है। बहरहाल, यह भी ग़ौरतलब है कि आज़ाद भारत में फ़ांसी पर लटकाए जाने वाले नाथूराम पहले अपराधी थे।

नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, दिल्ली के ही शोध के अनुसार भारत में सन् 2000 से अब तक निचली अदालतें कुल 1617 क़ैदियों को मौत की सज़ा सुना चुकी हैं, जिनमें से केवल 71 क़ैदियों को मृत्युदंड की पुष्टि सुप्रीम कोर्ट व्दारा की गई है। पिछले दो दशक से तो भारत में फ़ांसी की सज़ा पर एक तरह से अमल ही नहीं हो रहा है, क्योंकि ख़ुद सुप्रीम कोर्ट ने 1995 के बाद 5 अपराधियों को मौत की सज़ा दी है। इस सहस्त्राब्दि में तो केवल 4 लोगों को फांसी हुई, उनमें 3 मोहम्मद अजमक कसाब (21 नवंबर 2012, पुणे की यरवदा जेल), मोहम्मद अफ़ज़ल गुरु (9 फरवरी 2013, तिहाड़ा जेल) और याक़ूब मेमन (30 जुलाई 2015, नागपुर सेंट्रल जेल) तो आतंकवादी गतिविधियों में दोषी पाए गए थे। इससे पहले धनंजय चटर्जी को एक बच्ची से बलात्कार करके उसकी हत्या करने के अपराधी में 14 अगस्त 2004 को कोलकाता के अलीपुर जेल में फ़ांसी दे दी गई थी।

निचली अदालत ने मुकेश, पवन, विनय शर्मा और अक्षय कुमार सिंह को मौत की सज़ा सुनाई थी जिसे दिल्ली हाई कोर्ट ने बरकरार रखा था। इस साल 5 मई को सुप्रीम कोर्ट  भी उस सज़ा पर अपनी मुहर लगा चुका है। उस फ़ैसले को छह महीने से ज़्यादा बीत चुके हैं, लेकिन अभी तक अपराधी ज़िंदा हैं। 
कहने का मतलब भारतीय न्यायपालिका शुरू से लचर रही है। कोई भी केस हो, उसे टालने की परंपरा रही है। ऐसे में किसी किसी एक केस में अदालतों के साथ पूरे सिस्टम का कुछ ज़्यादा सक्रिय होकर आनन-फानन में फ़ैसला देना मन में संदेह पैदा करता है।

रविवार, 5 नवंबर 2017

दस्तावेज - मोहम्मद अली जिन्ना का तन कराची और मन मुंबई में था

हरिगोविंद विश्वकर्मा
पाकिस्तान के संस्थापक और क़ायद-ए-आज़म मोहम्मद अली जिन्ना भले ही वहां हीरो हों, लेकिन भारत में आज भी इतिहास के सबसे बड़े खलनायक माने जाते हैं। आम भारतीय उनसे बहुत ज़्यादा नफ़रत करता है और देश के विभाजन के लिए केवल और केवल उन्हीं को ज़िम्मेदार मानता है। इसीलिए जब भी कोई जिन्ना के बारे में सकारात्मक बातें करता है तो सबकी भृकुटी तन जाती है। पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने जब 2005 में जिन्ना को सेक्यूलर कह दिया तो पूरे देश में उनकी आलोचना हुई। उनको केवल अपना बयान ही वापस नहीं लेना पड़ा था, बल्कि बीजेपी अध्यक्ष का पद भी छोड़ना पड़ा था।

यह जिन्ना के प्रति लोगों के नफ़रत का ही परिणाम है कि आजकल जिन्ना के मुंबई आवास जिसे 'जिन्ना हाउस' और 'साउथ कोर्ट' कहा जाता है, को तोड़ने की बातें हो रही हैं। भारत और पाकिस्तान के बीच कड़वे रिश्तों के मौजूदा दौर में लोगों को यह जानकर हैरानी होगी कि जिन्ना मुंबई से बेइंतहां प्यार करते थे और मुंबई में ही रहना चाहते थे। पाकिस्तान के निर्माण के बाद कराची जाते समय वह सामान यहीं छोड़ गए। वह देश के बंटवारे के कुछ अरसा बाद तक यही सोच रहे थे कि दोनों देशों के बीच रिश्ते बेहतर होंगे और उनका मुंबई आना-जाना लगा रहेगा और वह अपने शानदार बंगले में आकर सुकून से रहा करेंगे। कई इतिहासकार कहते हैं कि इसीलिए वह कराची जाते समय मुंबई का अपना मकान पूरी तरह खाली करके नहीं गये थे। यह भी विडंबना ही है कि जिन्ना की एकमात्र संतान दीना ने पाकिस्तान बनने के बाद पिता के साथ पाकिस्तान जाने से इनकार कर दिया था। जिन्ना की प्रिय पत्नी रुतिन की मज़ार मुंबई में ही है। पाकिस्तान जाने से पूर्व जिन्ना ने मुंबई में उस कब्र पर अपना अंतिम गुलदस्ता रखा और हमेशा के लिए भारत छोड़कर चले गये।

प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और मोहम्मद अली जिन्ना के क़रीबी रहे पाकिस्तान में भारत के पहले हाई कमिश्नर श्री श्रीप्रकाश ने, ‘हिंदुस्तान टाइम्समें अर्ली मेमरीज़ ऑफ पाकिस्तानसे एक लेखमाला लिखी थी जिसमें गवर्नर जनरल के रूप में जिन्नालेख (23 अप्रैल 1963 अंक) में उन्होंने बंबई के जिन्ना हाउसप्रकरण का जिक्र किया था। उस प्रसंग का यहां जिक्र करना समीचीन होगा। एक बार नेहरू ने पाकिस्तान में भारतीय हाई कमिश्नर श्रीप्रकाश को फोन करके उनसे कहा कि जिन्ना हाउसभारत सरकार के लिए परेशानी का सबब बन रहा है। जिन्ना से मिलकर पूछिए कि उनकी क्या इच्छा है और वह कितना किराया चाहते हैं। नेहरू का संदेश सुनकर जिन्ना ने करीब-करीब चिरौरी करते हुए कहा – “श्रीप्रकाश, मेरा दिल न तोड़ो, जवाहरलाल को कहो मेरा दिल न तोड़ें। मैंने इस मकान को एक-एक ईंट जोड़कर बनवाया है। इसके बरामदे कितने शानदार हैं। यह एक छोटा-सा मकान है जो किसी यूरोपियन परिवार या सुरुचिसंपन्न हिंदुस्तानी प्रिंस के रहने लायक है। आप नहीं जानते मैं मुंबई को कितना चाहता हूं। मैं अभी भी वहां वापस जाने की बाट जोह रहा हूं।श्रीप्रकाश ने कहा – “सच, मिस्टर जिन्ना, आप मुंबई जाना चाहते हैं। मैं जानता हूं कि मुंबई आपकी कितनी देनदार है और आपने इस शहर की कितनी सेवा की है। क्या मैं प्रधानमंत्री को यह बताऊं कि आप वहां वापस जाना चाहते हैं।जिन्ना ने जवाब दिया – “हां आप कह सकते हैं।


अपने संदेश में श्रीप्रकाश ने जिन्ना के जवाब से नेहरू को अवगत कराया। इसके बाद केंद्र सरकार ने जिन्ना हाउसको शत्रु संपत्ति घोषित नहीं किया। कुछ माह बाद, श्रीप्रकाश को नेहरू का एक ज़रूरी टेलीफोन संदेश आया जिसमें उन्होंने कहा कि मकान को अछूता छोड़ देने पर सरकार को लोगों की तीखी आलोचना सहनी पड़ रही है। सरकार अब और अधिक समय तक इसे सह नहीं सकती। इस मकान का अधिग्रहण करना ही होगा। नेहरू चाहते थे कि जिन्ना को इसकी सूचना दे दी जाए और उनसे पूछ लिया जाये कि वह मकान का कितना किराया लेना चाहेंगे। उन दिनों जिन्ना की तबीयत ठीक नहीं थी। वह बलूचिस्तान की राजधानी क्वेटा के पास हिल स्टेशन जियारत में स्वास्थ लाभ कर रहे थे। श्रीप्रकाश ने उन्हें तत्काल चिट्ठी भेजी, जिसके जवाब में जिन्ना ने लिखा कि उन्हें 3000 रुपए मासिक किराए की पेशकश की गयी है। उन्हें उम्मीद है कि किरायेदार के रूप में उनकी भावनाओं का ख्याल रखा जाएगा। मकान ब्रिटिश डिप्टी हाई कमिश्नर को किराये पर दे दिया गया। उनका छोटा सा परिवार था। इसके साथ यह भी तय हुआ कि जब कभी जिन्ना अपने निजी उपयोग के लिए चाहेंगे किराएदार तुरंत मकान खाली कर देगा। श्रीप्रकाश के अनुसार उन्हें यह जानकर बड़ा विचित्र लगा कि जिन्ना ने अपना मकान किसी यूरोपियन या हिंदुस्तानी राजकुमार को देना पसंद किया, लेकिन मुंबई के मुसलमानों को देने का विचार भी नहीं किया। दरअसल, जिन्ना हिंदुस्तानी मुसलमानों ख़ासकर कट्सेटरपंथियों और मौलवियों से बहुत चिढ़ते थे और उन पर तनिक भी खरोसा नहीं करते थे।

98 साल की उम्र में शुक्रवार (3 नवंबर 2017) को न्यूयॉर्क में प्राण त्यागने वाली दीना वाडिया दरअसल, जिन्ना अपनी दूसरी पत्नी रुतिन की बेटी थीं। रुतिन जिन्ना की दूसरी पत्नी थीं और उनसे जिन्ना बेइंतहां मोहब्बत करते थे।  जिन्ना का अपने पारसी व्यापारी मित्र दिनशॉ पेटिट के यहां बहुत ज़्यादा आना जाना था। इसी दौरान उनकी मुलाकात और बातचीत दिनशा की 16 साल की बेहद खूबसूरत बेटी रुतिन से होती थी। नियमित मुलाकात और बातचीत के बाद रुतिन अपने पिता की उम्र के 40 वर्षीय जिन्ना की विद्वता से इस कदर प्रभावित हुई कि उन्हें दिल दे बैठी। अजीत जावेद की किताब 'सेक्यूलर ऐंड नेशनलिस्ट जिन्ना' के मुताबिक एक दिन दिनशा से जिन्ना ने पूछा, "अंतर्धार्मिक विवाह को आप कैसा मानते हैं?" तो दिनशा ने कहा कि इससे राष्ट्रीय एकता को मजबूती मिलती है। उसी समय जिन्ना ने तपाक से कहा, "मैं आपकी बेटी रुतिन से शादी करना चाहता हूं।" लेकिन दिनशा तैयार नहीं हुए। दो साल के अफेयर के बाद जिन्ना ने रुतिन के 18 साल का होते ही शादी कर ली। दिनशा ने जिन्ना पर बेटी के अपहरण का आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई, तो मुकदमे की सुनवाई के दिन रुतिन ने अदालत में जाकर कहा, "जिन्ना ने मेरा अपहरण नहीं किया बल्कि मैंने जिन्ना का अपहरण किया।" मुकदमा खारिज हो गया।

24 साल छोटी रुतिन से जिन्ना की शादी परंपरापंथी जमाने में बहुत विवादित रही। मौलवी जिन्ना की शादी को बर्दाश्त नहीं कर सके। लेकिन जिन्ना मौलवियों को भाव नहीं देते थे। रुतिन फैशनेबल लड़की थीं। उन्होंने कभी बुर्का या हिजाब जैसी मुस्लिम पोशाक नहीं पहनी, बल्कि यूरोपियन महिलाओं की तरह लो कटलिबास में रहती थीं। रुतिन से जिन्ना की इकलौती संतान दीना थी। उन्होंने भी मुसलमान से शादी न करके अपनी मां के पारसी समाज के नेविल वाडिया (वाडिया इंडस्ट्रीज़, ‘बॉम्बे डाइंगके चेयरमैन नुस्ली वाडिया के पिता) से शादी की थी। सबसे अहम् रुतिन परदे की जगह लो कटलिबास में मुस्लिम लीग की बैठकों में शिरकत करती थीं, जो कट्टर मुसलमानों को बहुत ज़्यादा नागवार गुजरता था। बहरहाल, 1929 में 29 साल की उम्र में रुतिन का निधन हो गया। जिन्ना रुतिन की जुदाई सहन नहीं कर पाए, उन्हें गहरा सदमा लगा। उस समय देश में राजनीतिक अस्थिरता थी, लिहाजा, जिन्ना 1930 में लंदन चले गए और वहां प्रीवी काउंसिल में प्रैक्टिस करने लगे।


वस्तुतः 1934 में चार साल के राजनीतिक वनवास से लौटने के बाद जिन्ना ने मुंबई के सबसे भव्य और पॉश इलाके दक्षिण मुंबई के मलाबार में समुद्र के किनारे तीन एकड़ जमीन पर अपने सपनों का घर बनाने का फैसला किया। इस भवन का डिजाइन मशहूर ब्रिटिश वास्तुकार क्लाउड बेटली ने यूरोपीय शैली में तैयार की। उनकी ही देखरेख में इसका निर्माण शुरू हुआ। निर्माण के समय खुद जिन्ना नियमित यहां आते थे और पूरे निर्माण कार्य की व्यक्तिगत निगरानी करते थे। सन् 1936 में जिन्ना हाउस बनकर तैयार हो गया। दो मंजिले (ग्राउंड प्लस फर्स्ट फ्लोर) इमारत में तीन कांफ्रेंस हॉल और 14 कमरे हैं। इसके निर्माण पर तब दो लाख रुपए का खर्च आया था। इसमें अखरोट की महंगी लकड़ियों की पैनलिंग की गई है और इटैलियन संगमरमर के इस्तेमाल से शानदार बुर्ज व खूबसूरत खंभे हैं। कभी बेहद खूबसूरत रहे इस बंगले की खिड़कियों से समुद्र का नज़ारा साफ दिखाई देता है। माउंट प्लेज़ेंट रोड(अब भाउसाहब हीरे मार्ग) पर यूरोपियन स्टाइल में बना जिन्ना हाउस अब खंडहर हो चुका है मगर जब ये  बना था तब पहली नजर में ही देखने वालों को मोहित कर लेता था।

एसके धांकी की पुस्तक 'लाला लाजपत राय एंड इंडियन नेशनलिज्म' के मुताबिक, सरोजनी नायडू गांधी के बाद जिन्ना की बहुत इज्जत करती थीं और उन्हें महान धर्मनिरपेक्ष नेता और हिंदू मुस्लिम एकता का राजदूत कहती थी। जिन्ना से मिलने के लिए जिन्ना हाउस में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचंद्र बोस जैसे बड़े नेता आते थे। पूर्व वित्तमंत्री जसवंत सिंह की चर्चित किताब "जिन्नाः इंडिया-पार्टिशन इनडेपेंडेंस" के मुताबिक जिन्ना पाकिस्तान जाकर कभी सुकून से नहीं रहे। उनसे जो ब्लंडर हुआ था, उसको लेकर पछताते थे। जिन्ना मुंबई आकर रुतिन की मजार पर जाना चाहते थे। एमएच सईद की किताब 'द साउंड एंड फ्यूरी - ए पोलिटिकल स्टडी ऑफ मोहम्मद अली जिन्ना' के मुताबिक कट्टर मुसलमान रुतिन से शादी करने के लिए जिन्ना को जीवन भर माफ नहीं कर पाए और उन्हें काफिर कहने लगे थे। जिन्ना के कायदे आजम बनने के बाद पाकिस्तान में यह शेर बड़ा प्रचलित हुआ-
इक काफिरा के वास्ते इस्लाम को छोड़ा,
यह कायदे आजम है या काफिरे आजम।

अपने देहांत से कुछ पूर्व मृत्यु शय्या पर पड़े जिन्ना का पाकिस्तान निर्माण के प्रति पूरी तरह मोह भंग हो गया था। उन्हें देश के बंटवारे की महागलतीका एहसास हो चुका था, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी और जिन्ना भारतीय इतिहास के सबसे बड़े खलनायक बन चुके थे।


बुधवार, 1 नवंबर 2017

सरदार पटेल को क्या गृहमंत्री पद से हटाना चाहते थे महात्मा गांधी?

हरिगोविंद विश्वकर्मा


क्या आपको पता है, कि मरणोपरांत राष्ट्रपिता का दर्जा पाने वाले मोहनदास कर्मचंद गांधी यानी महात्मा गांधी देश के पहले उपप्रधानमंत्री लौह पुरुष सरदार बल्लभभाई पटेल की नीतियों से बिल्कुल इत्तिफ़ाक नहीं रखते थे। इसीलिए उन्होंने सरदार पटेल को देश का प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया। इसके बाद कश्मीर पर हमले करने वाले पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए के भुगतान जब पटेल ने को रोक दिया तब गांधी ने आमरण अनशन की धमकी दे डाली। गांधी के आगे झुकती हुई भारत सरकार ने इसके बाद पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए का भुगतान कर दिया। दरअसल, उस समय एक बार तो नौबत यहां तक आ गई कि अगर गांधी की हत्या न हुई होती तो एक दो दिन में सरदार पटेल के इस्तीफे की ख़बर आ जाती।

नवजीवन प्रकाशन मंदिर की ओर से प्रकाशित गांधी की दिल्ली डायरी में लिखित बयान के अनुसार गांधीजी जनवरी के पहले हफ़्ते में लिखा, "कोई बड़ा फ़ैसला लेने से पहले पटेल अब मुझसे कुछ नहीं पूछते, अब वह मेरी उपेक्षा करते हैं।" जब पटेल ने घोषणा कर दी कि जब तक पाकिस्तान अपनी सेना कश्मीर से वापस नहीं बुला लेता तो हम 55 करोड़ रुपए का भुगतान नहीं करेंगे। बकौल सरदार पटेल "कश्मीर पर निर्णय हुए बिना हम कोई रुपया पाकिस्तान को देना स्वीकार नहीं करेंगे।" गांधी की दिल्ली डायरी के अनुसार, गांधी ने 12 जनवरी 1948 की शाम अपने अनुयायियों को संबोधित करते हुए कहा, "ऐसा भी मौक़ा आता है जब अहिंसा का पुजारी किसी अन्याय के सामने विरोध प्रकट करने के लिए उपवास करने पर मजबूर हो जाता है। ऐसा मौक़ा मेरे लिए आ गया है।"

गांधी की दैनिक डायरी पढ़ें तो पता चलता है कि अगर गांधीजी की हत्या न हुई होती तो निश्चित रूप से सरदार पटेल को जवाहरलाल नेहरू मंत्रिमंडल से अलग होना पड़ सकता था। दरअसल, गांधी के ब्रम्हचर्य का प्रयोग जैसे प्रपंच से पटेल ख़ासे नाराज़ थे। पटेल को ब्रम्हचर्य के प्रयोग के दौरान गांधी का मनु, आभा, सुशीला और आश्रम की दूसरी महिलाओं के साथ नग्न सोना बहुत नागवर लगता था। इससे पटेल उनसे और चिढ़ने लगे थे। इसलिए कोई भी बड़ा फ़ैसला लेने से पहले उन्होंने गांधी की सलाह लेना कम कर दिए थे। हालांकि जब गांधी दिल्ली में होते थे तब पटेल उनसे शुभेच्छा भेंट करने ज़रूर आते थे। 30 जनवरी की शाम गांधी की हत्या से कुछ मिनट पहले पटेल उनसे मिलने आए थे। मुलाकात के कारण ही गांधी को प्रर्थनास्थल पर पहुंचने में विलंब हो गया था।

जिस तरह गांधी का संविधान निर्माता डॉ. बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर से मतभेद थे, उसी तरह उनका पटेल से सांप्रदायिक मसले पर गंभीर मतभेद था। ख़ासकर जब पाकिस्तान की ओर से कश्मीर पर हमला किया गया तो पटेल ने बयान जारी करके पाकिस्तान को दिए जाने वाले 75 करोड़ रुपए में से 55 करोड़ रुपए (20 करोड़ रुपए का भुगतान पहले ही किया जा चुका था) की अंतिम किश्त रोकने की घोषाणा कर दी। मगर गांधी को पटेल का फ़ैसला बिल्कुल रास नहीं आया। बताया जाता है कि इसके बाद गांधी पटेल के और विरोधी हो गए। गांधी के साथ पटेल के गंभीर मतभेद के चलते ही गांधी की हत्या होने के बाद यह भी सवाल उठने लगे कि कहीं गांधी की हत्या के पीछे पटेल का तो हाथ नहीं।

दरअसल, गांधी के पटेल से मतभेद की वजह मोहम्मद अली जिन्ना के निर्देश पर डायरेक्ट ऐक्शन में नोआखली में हिंदुओं के सामूहिक नरसंहार करवाने वाले बंगाल के शासक हुसैन शहीद सुहरावर्दी थे। पटेल उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं करते थे, लेकिन गांधी पटेल के विरोध को उचित नहीं मानते थे। वस्तुतः गांधी नेहरू के मुकाबले पटेल को कट्टरपंथी मानते थे। उनको लगता था आगे चल कर पटेल के कट्टरपंथी दृष्टिकोण के मुकाबले नेहरू की नरम और लचीली नीति देश के लिए ज़्यादा सफल होगी। पर छुपा हुआ सत्य यह भी था कि गांधी की मर्जी के ख़िलाफ़ एक बार सुभाषचंद्र बोस के कांग्रेस अध्यक्ष चुने जाने के बाद से गांधी कांग्रेस पर अपनी पकड़ को लेकर आश्वस्त नहीं थे। उन्हें लगता था कि अगर पटेल ने अपना नाम वापस नहीं लिया तो नेहरू हार जाएंगे जिसे उनकी हार मानी जाएगी। साथ ही उन्हें यह भी पता था कि पटेल उनके कहने पर अपना नाम वापस ले लेंगे लेकिन नेहरू ऐसा नहीं करेंगे।

मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने अपनी जीवनी 'इंडिया विन्स फ्रीडम' में लिखा था, "सरदार पटेल के नाम का समर्थन ना करना मेरी बहुत बड़ी भूल थी। हमारे बीच बहुत सारे मतभेद थे लेकिन मेरा यक़ीन है कि मेरे बाद अगर 1946 में पटेल कांग्रेस अध्यक्ष बनाए गए होते तो आज़ादी के समय कैबिनेट मिशन प्लानको वह नेहरू से बेहतर ढंग से लागू करते। नेहरू की तरह वह जिन्ना को प्लान को फेल करने का अवसर न देते। मैं ख़ुद को कभी इस बात के लिए माफ़ नहीं कर पाऊंगा कि मैंने यह ग़लती न कर पटेल का साथ दिया होता भारत के पिछले दस सालों का इतिहास कुछ और ही होता।"

31 अक्टूबर 1875 को जन्मे पटेल ने सी राजगोपालाचारी को भारत का पहला राष्ट्रपति बनने से रोक दिया था इसके बावजूद राजगोपालाचारी ने लिखा, “इस में कोई संदेह नहीं कि बेहतर होता अगर पटेल प्रधानमंत्री और नेहरू विदेशमंत्री बनाए गए होते। मैं स्वीकार करता हूं कि मैं भी ग़लत सोचता था कि इन दोनों में नेहरू ज़्यादा प्रगतिशील और बुद्धिमान हैं। पटेल के प्रति यह झूठा प्रचार किया गया था कि वह मुस्लिमों के प्रति कठोर थे। अफ़सोस कि यह ग़लत तथ्य होने के बावजूद इसका प्रचार किया जा रहा था।"

दरअसल, सन् 1946 के चुनाव में भारी समर्थन मिलने के बावजूद गांधी ने पटेल को कांग्रेस अध्यक्ष नहीं बनने दिया। कांग्रेस अध्यक्ष ही आज़ादी मिलने पर देश का प्रधानमंत्री बनता और गांधी की पहली पसंद जवाहरलाल नेहरू थे। इसलिए उन्होंने पटेल से चुनाव मैदान से हटने का आग्रह किया जिसे उन्होंने मान लिया। सन् 1946 में सभी को विश्वास था कि आजादी मिलने वाली है। दूसरा वर्ल्ड वॉर खत्म हो चुका था और अंग्रेज भारतीयों को सत्ता हस्तांतरण के बारे में विचार-विमर्श करने लगे थे। कांग्रेस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार के गठन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी। उस साल चुनावों में कांग्रेस को सबसे अधिक सीटें मिली थीं। अचानक कांग्रेस अध्यक्ष पद की ओर सभी की निगाह चली गई थी। पटेल की कर्मठ जीवन शैली, कामयाब प्रशासक और दृढ़प्रतिज्ञ राजनेता की छवि के कारण कांग्रेस में आम कार्यकर्त्ता ही नहीं वरिष्ठ नेता भी उनको प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे।

भारत छोडो आंदोलन के कारण कांग्रेस के अधिकांश बड़े नेता जेल में थे। इस कारण 6 साल से चुनाव नहीं हो सका था। लिहाज़ा, 6 साल से मौलाना अबुल कलाम आज़ाद कांग्रेस अध्यक्ष थे। वह भी अध्यक्ष पद के चुनावों में भाग लेने के इच्छुक थे क्योंकि उनकी भी प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा थी। किंतु गांधी ने उन्हें बता दिया कि अध्यक्ष पद का फिर से उम्मीदवार नहीं बनाया जाएगा। आज़ाद ने अध्यक्ष बनने का इरादा त्याग दिया। यही नहीं, गांधी ने साफ तौर अपना समर्थन नेहरू को दिया था। उनकी नज़र में उस समय कांग्रेस की बागडोर संभालने के लिए नेहरू से बढ़कर कोई उम्मीदवार नहीं था।

अध्यक्ष पद के लिए नामांकन भरने की अंतिम तिथि 29 अप्रैल 1946 थी। नामांकन 15 राज्यों की कांग्रेस की क्षेत्रीय कमेटियों द्वारा किया जाना था। हैरत की बात कि गांधी के खुले समर्थन के बावजूद नेहरू को एक भी राज्य की कांग्रेस कमेटी का समर्थन नहीं मिला, जबकि 15 में से 12 राज्यों से सरदार पटेल का नाम कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए प्रस्तावित किया गया। बाकी 3 राज्यों ने किसी का भी नाम आगे नहीं आया। स्पष्ट है कि पटेल के पास निर्विवाद समर्थन हासिल था जो उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष बनाने के लिए पर्याप्त था। इसे गांधी ने चुनौती के रूप में लिया। उन्होंने जेबी कृपलानी पर दबाव डाला कि वह कांग्रेस कार्य समिति के सदस्यों को नेहरू के नाम का प्रस्ताव करने के लिए राजी करें। आश्चर्य की बात कि गांधी को अच्छी तरह से मालूम था कि कांग्रेस कार्य समिति के सदस्यों के पास यह अधिकार था ही नहीं कि वह नेहरू के नाम का प्रस्ताव रखते क्योकि यह अधिकार कांग्रेस के संविधान के अनुसार केवल राज्यों की इकाइयों के पास ही था।

बहरहाल, सच तो यह है कि सरदार पटेल ने ही भारत को विभाजित करने के मंसूबों पर पानी फेरा था। आज जो विकासशील भारत हैं, वद 70 साल पहले भारत-श्रेष्ठ भारत के मिशन की कमान संभालने वाले सरदार पटेल की ही देन है। वस्तुतः स्वतंत्रता मिलने से पहले भारत में दो तरह के शासक थे। भारत का एक हिस्सा वह था जिस पर अंग्रेजों का सीधा शासन था, दूसरा हिस्सा वह था जिस पर 562 से ज्यादा रियासते और रजवाड़े थे। रियासतदार और रजवाड़े अंग्रेजों के अधीन शासन कर रहे थे।

विभाजित के समय अंग्रेजों ने चालाकी से रजवाड़ों के सामने दो विकल्प रखा। पहला विकल्प भारत या पाकिस्तान में से किसी एक के साथ विलय था और दूसरा विकल्प आजाद देश के रूप में वजूद कायम रखना। यह पटेल का कमाल था कि उन्होंने सूझबूझ और कूटनीति से बिना किसी खूनखराबे के भारत को एक किया। 6 मई 1947 को सरदार पटेल ने रियासतों और रजवाड़ों का भारत में विलय का मुश्किल मिशन शुरू किया। विलय के बदले रियासतों के वशंजों को प्रिवी पर्सेज के जरिए नियमित आर्थिक मदद का प्रस्ताव रखा। साथ ही रियासतों से उन्होंने देशभक्ति की भावना से फैसला लेने को कहा। 15 अगस्त 1947 तक भारत में शामिल होने की समय सीमा भी तय कर दी। साम-दाम-दंड-भेद की पटेल की इस कूटनीति ने जल्दी ही रंग दिखाना शुरू कर दिया।

आखिरकार 15 अगस्त 1947 को जब लाल किले में तिरंगा फहराया गया तब-तब भारत एक मुल्क के रूप में दुनिया के नक्शे पर वजूद में आया लेकिन जूनागढ़ के नवाब ने पाकिस्तान में शामिल होने का फैसला किया। जम्मू-कश्मीर के राजा हिंदू थे लेकिन बहुसंख्यक आबादी मुस्लिम थी, जबकि जूनागढ़ और हैदराबाद के शासक मुस्लिम थे, लेकिन उनकी बहुसंख्यक आबादी हिंदू थी। सांप्रदायिक हिंसा के माहौल में इन्हें लेकर कोई भी गलत फैसला बड़ी आफ़त बन सकता था।

87 फीसदी हिंदू आबादी वाले हैदराबाद का नवाब उस्मान अली खान विलय के पक्ष नहीं था, उसके इशारे पर वहां की सेना हैदराबाद की जनता पर अत्याचार कर रही थी। 13 सितंबर 1948 को पटेल ने भारतीय फौज को हैदराबाद पर चढ़ाई करने का आदेश दे दिया। ऑपरेशन पोलो के तहत सेना ने दो ही दिन में हैदराबाद पर क़ब्ज़ा कर लिया।


नोट - व्यस्ता के कारण इसे कल यानी 31 अक्टूबर 2017 को पूरा नहीं कर पाया था, आज पूरा हुआ और पोस्ट कर रहा हूं।