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गुरुवार, 9 अप्रैल 2020

चीन के वुहान से लॉकडाउन हटते ही हज़ारों लोगों का पलायन

हरिगोविंद विश्वकर्मा
दुनिया को वैश्विक महामारी सीसीपी वारयस (चीनी कम्युनिस्ट पार्टी वायरस) को नज़राना देने वाले और इस मौत के सौदागर का एपीसेंटर रहे चीन के हुबेई प्रांत के वुहान में सरकार ने जैसे ही 76 दिवसीय लॉकडाउन को उठाने की घोषणा की वैसे ही वुहान से पलायन करने वालों का तांता लग गया है। पहले दिन यानी 8 अप्रैल 2020 को ही 20 हज़ारों लोग शहर से पलायन कर गए।

अमेरिका के न्यूयॉर्क टाइम्स और वॉशिंगटन पोस्ट के बाद सबसे प्रतिष्ठित समाचार पत्र समूह The Epoch Times ने अपने प्रिंट एवं डिजिटल एडिशन में इस बारे में विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की है। रिपोर्ट में बताया गया है कि पिछले तीन महीने के दौरान बहुत बड़ी तादाद में लोगों की लाशें देखकर ये लोग विचलित हो गए हैं और अपने भविष्य को लेकर बहुत चिंतित हैं, इसलिए लोग किसी तरह ऐसी जगह जाना के लिए तत्पर थे जहां, उनकी जान बच सके। इसीलिए मौक़ा मिलते ही लोग परिवार समेत वुहान से पलायन कर रहे हैं। 

रिपोर्ट के मुताबिक 23 जनवरी, जब सरकार ने शहर के 1 करोड़ 10 लाख लोगों को उनके घरों में क़ैद करने की घोषणा की थी, के बाद से कोरोना का मार झेल चुके इस शहर ने इतनी अभूतपूर्व भीड़ कभी नहीं देखी थी। आलम यह था कि सरकार द्वारा लॉकडाउन ख़त्म करे के निर्धारित समय आधी रात होने से पहले ही एक्सप्रेसवे पर बहुत बड़ी तादाद में लोग हो गए थे। लोगों ने ट्रेन और विमान पकड़ने के लिए रेलवे स्टेशन और हवाई अड्डों पर जाने के लिए पहले से ही अपने शरीर को सुरक्षात्मक लिहाफ लपेटकर शहर से बाहर निकलने के लिए अपनी बारी का इतज़ार करते देखे गए थे।


सीमावर्ती क्षेत्र से लिए गए विडियों के फुटेज यह कहानी ख़ुद बयां कर रहा है। स्थानीय लोगों को अपनी कार का हार्न बजाकर ढाई महीने बाद मिली आज़ादी का स्वागत किया। 8 अप्रैल, 2020 की अलसुबह ली गई हवाई तस्वीर वुहान में एक राजमार्ग के टोल प्लाज़ा पर कतार में खड़ी कारों को दर्शाती है। वुहान के 75 हाइवे टोल में से एक पर निकलने की प्रतीक्षा कर रहे चेन ने बताया, हम फिर मौत के मुहाने पर ढकेल दिए जाएं, इससे पहले यहां से निकल जाना चाहते हैं, क्योंकि कोई नहीं जानता कि कब चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार अपनी पॉलिसी बदलने की घोषणा कर दे। मुझे इस बात का दुख है कि मैंने अपने बॉस का आग्रह ठुकरा दिया जिसने उससे रुकने का आग्रह किया था।


हाइवे पर अपनी बारी का इतंज़ार कर रहे हेनयांग जिले के लीयू, जिनमें माता-पिता हेनयांग में ही रहते हैं, भी इसी तरह की चिंता जताते हैं। उन्होंने कहा, यहां किसी को कुछ नहीं पता कि कल क्या होने वाला है। इसलिए लोग अपनी और अपने परिजनों की जान बचाने के लिए सब कुछ वुहान में छोड़कर पलायन कर रहे हैं। लीयू ने कहा, "आप कभी नहीं जान सकते कि इस देश की नीतियां किस दिशा में जा रही हैं," लीयू हेनान प्रांत के ज़िनयांग शहर में पहुंच कर अपनी कार मंगोलिया की मोड़ते हुए बताया, “जितना जल्दी संभव हो पा रहा है, हम वुहान छोड़ रहे हैं। यहां हर दिन किसी न किसी परिवर्तन की घोषणा की जाती है।”


आवागमन पर लगे प्रतिबंध के हटने से एक घंटे पहले हज़ारों की संख्यां में कारें हाइवे के प्रवेश द्वार पर क़तारबद्ध हो गई थी। वुहान से बुधवार को लगभग 55,000 लोगों के रेलयात्रा का टिकट बुक करवाया था। अगले दिन यह संख्या दोगुनी हो गई। हवाई अड्डे के एक अधिकारी ने बताया कि शाम तक वुहान से 10,000 यात्री बाहर निकल गए।

मंगलवार, 7 अप्रैल 2020

कोरोना को रोकने के लिए लॉकडाउन बढ़ाना ही एकमात्र विकल्प


हरिगोविंद विश्वकर्मा
हालांकि देश में सीसीपी वारयस (चीनी कम्युनिस्ट पार्टी वायरस) से संक्रमित लोगों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है, इसके बावजूद अगर अमेरिका, इटली और स्पेन जैसे बेहतरीन हेल्थकेयर वाले विकसित देशों की तुलना करें तो यही लगता है कि भारत कोरोना वायरस को विस्फोटक रूप से बढ़ने से रोकने में अभी तक तो सफल रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह रही कि देश और देशवासियों ने मिलकर कोरोना वारयस को तीसरे चरण में जाने से रोक दिया है। इसका सारा श्रेय देशव्यापी लॉकडाउन को जाता है। इसलिए चीनी कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा फैलाई गई कोरोना नाम की इस वैश्विक महामारी को रोकने के लिए लॉकडाउन की अवधि 30 अप्रैल तक बढ़ाने की घोषणा तत्काल होनी चाहिए।

लॉकडाउन इसलिए भी ज़रूरी है, क्योंकि देश में कोरोना संक्रमण और इस वायरस से होने वाली मौतों का ग्राफ बढ़ ही रहा है। थोड़ी ढिलाई से जिस तरह लोग सब्ज़ी और अन्य खाद्य सामग्री खरीदने के लिए टूट पड़ते हैं, उस पर अंकुश लगाने के लिए लॉकडाउन एकमात्र विकल्प है। अन्यथा भारत भी अमेरिका, इटली, स्पेन, फ्रांस, ईरान और ब्रिटेन की तरह कम्युनिटी ट्रांसफर का शिकार हो सकता है।

वजह चाहे जो हो, लेकिन इतना तो सच है कि जाहिल तबलीग़ी जमात मरकज़ के सदर मौलाना मोहम्मद साद कांधलवी के पागलपन के बावजूद भारत ने कोरोना वायरस के विस्फोटक संक्रमण को रोकने में अब तक तो कामयाब ही रहा है। अगर पूरा देश इसी तरह भविष्य में भी एकजुट रहा और लोग अपने-अपने घरों में इसी तरह बंद रहे तो, भारत निश्चित रूप से सीसीपी वारयस को इसी महीने हराने में सफल हो जाएगा।

भारत में कोरोना वायरस का आगाज़ यूरोप के दो सबसे समृद्ध देशों इटली और स्पेन से एक दिन पहले हुआ था। लेकिन इन दोनों देशों में कोरोना संक्रमण जिस गति से बढ़ा उसकी तुलना में लॉकडाउन की घोषणा करने से देर हो गई। इसका नतीजा यह हुआ कि कोरोना वायरस कुछ दिन के अंदर पहले चरण से दूसरे और दूसरे चरण से तीसरे चरण में चला गया और अंततः कम्युनिटी स्प्रेड हो गया। आज इटली और स्पेन में लाशों का अंबार लगा है। लेकिन भारत ने सोशल डिस्टेंसिंग और लॉकडाउन की घोषणा इन दोनों देशों के बाद की, इसके बावजूद यूरोप अमेरिका की तुलना में यहां संक्रमण नियंत्रण में है।

दरअसल, चीन के बाद कोरोना वायरस का प्रकोप पूरी दुनिया में लगभग एक ही साथ यानी 19 जनवरी 2020 से 31 जनवरी 2020 के बीच शुरू हुआ। अमेरिका और यूरोप में यह भयानक रूप से बढ़ा और आज विकसित देशों में बड़ी संख्या में नागरिकों की जान ले रहा है। लेकिन भारत में कोरोना संक्रमण उस विस्फोटक गति को प्राप्त करने में सफल नहीं हो सका। भारत फिलहाल प्रभावित दोशों में 30 वें नंबर पर है।

चीन के बाहर सबसे पहले संक्रमण अमेरिका में फैला। दुनिया के सबसे तातकवर देश में कोरोना का पहला मरीज 19 जनवरी 2020 को पाया गया। जहां न्यूयॉर्क में एक चीनी नागरिक कोरोना पॉजिटिव घोषित किया गया। अमेरिका में कोरोना संक्रमण बहुत तेज़ी से पहले चरण से दूसरे चरण में पहुंचा और दूसरे चरण से बड़ी तेज़ी से तीसरे चरण यानी कम्युनिटी ट्रांसफर फेज में पहुंच गया। आज अमेरिका में कोरोना से मौतें 12 हज़ार से अधिक और कोरोना संक्रमित लोगों की संख्या 4 लाख से ऊपर है।

इटली में कोरोना वायरस कोरोना के ओरिजिन पॉइंट वुहान से उसके कोरोबारी रिश्ते के चलते 31 जनवरी 2020 को पहुंचा। दरअसल, जब इटली में सरकार ने चीन से आने वालों पर रोक लगाने का सिलसिला शुरू किया तो वहां के वामपंथी नेताओं ने इसका विरोध किया। इसके बाद इटली में "चीनी भाइयों को गले लगाओ" अभियान शुरू किया। सभी उम्र के सामान्य स्वस्थ इटालियंस ने यादृच्छिक चीनी लोगों को गले लगाया और फिर स्थानीय समुदाय के भीतर इस बीमारी को ले जाने और फैलाने लगे। लिहाज़ा, इटली ने बिजली की गति से पहले चरण से दूसरे चरण और दूसरे चरण से तीसरे चरण में पहुंच गया। अब तक इटली में 17,127 मौतें हो चुकी है और 1,35,586 लोग संक्रमित हैं।

विकसित देशों की बात करें तो अमेरिका के बाद फ्रांस दूसरा देश है, जहां चीनी वायरस सबसे पहले पहुंचा। फ्रांस में कोरोना वायरस की दस्तक 24 जनवरी 2020 को हुई। फ्रांस में कोरोना वायरस का संक्रमण बहुत तेज़ी से पहले चरण से दूसरे चरण में पहुंचा और दूसरे चरण से उससे भी तेज़ी से तीसरे चरण में गया और देश कोरोना के कम्युनिटी ट्रांसफर का शिकार हो गया। आज फ्रांस में चीनी वायरस से 10,328 मौतें  हो चुकी हैं, जबकि देश में कोराना पॉज़िटिव के 78,167 केस हैं।

यूरोप के सबसे धनी देशों में से एक स्पेन का दरवाज़ा चीनी वायरस ने 31 जनवरी 2020 को ही खटखटा दिया था। इस देश में भी कोरोना वायरस का संक्रमण बहुत तेज़ी से फैला और पहले चरण से दूसरे चरण में पहुंच गया। कुछ दिनों के भीतर यह वायरस दूसरे चरण से बड़ी तेज़ी से तीसरे चरण यानी कम्युनिटी ट्रांसफर फेज में पहुंच गया। इसके चलते पूरा इटली शहर लॉकडाउन है। इस ख़ूबसूरत देश में लाशों का अंबार लगता जा रहा है। अगर स्पेन में लोगों के मरने का सिलसिला इसी तरह बदस्तूर जारी रहा तो जल्द ही दुनिया में कोरोना वायरस से मरने वाले सबसे ज़्यादा लोग स्पेन में ही होंगे। अभी तक वहां 14,045 मौत हो चुकी है और संक्रमित लोगों की संख्या 1,41,942 तक पहुंच गई है।

इसी तरह ईरान में कोरोना वायरस की दस्ताक 19 फरवरी 2020 को हुई, लेकिन कुछ कट्टरपंथियों की लापरवाही के चलते यहां कोरोना जल्दी ही कोहराम मचाने लगा। ईरान अमेरिका यूरोप की तरह विकसित मेडिकल सुविधा वाला देश नहीं है। इसका नतीजा यह हुआ कि वहां गली-गली में लोगों की मौत होने लगी। फिलहास ईरान में अबतक 3,872 लोगों की जान जा चुकी है, जबकि 62,589 कोरोना पॉजिटिव के संक्रमण के शिकार है।

इन देशों की तुलना में भारत कोरोना वायरस के प्रसार की रफ़्तार में ब्रेक लगाने में बहुत हद तक सफल रहा है। भारत में कोरोना का संक्रमण दुबई के रास्ते 30 जनवरी 2020 को आया जब केरल में एक आदमी कोरोना संक्रमित पाया गया। इतना ही नहीं भारत में कोरोना से पहली मौत 12 मार्च को हुई। सबसे बड़ी बात भारत में अभी तक कोरोना दूसरे चरण में रोक दिया गया है। फ़िलहाल देश में डेढ़ सौ मौतें हुई हैं और पांच हजार से अधिक संक्रमित हैं। इन संख्याओं के साथ केवल लगाया जा सकता है, क्योंकि भारत ने अपनी सूझबूझ से इन्हें बढ़ने की गुंजाइश नहीं दी।

शनिवार, 4 अप्रैल 2020

कट्टरपंथियों को डील करने में भाजपा कांग्रेस से भी अधिक फिसड्डी

हरिगोविंद विश्वकर्मा
देश में पिछले छह साल से सत्तारूढ़ राजनीतिक दल भारतीय जनता पार्टी अक्सर कांग्रेस पर मुसलमानों के कथित तुष्टीकरण का आरोप लगाती रही है। कांग्रेस की नीतियों को भाजपा के नेता इम्पीज़मेंट पॉलिटिक्स की संज्ञा देते रहे हैं। लेकिन दिल्ली के निज़ामुद्दीन के तबलीग़-ए-जमात आलमी मरकज़ में देश-विदेश से आए जमातियों को वहां से निकलने के बारे जो भी खुलासे हो रहे हैं, उस पर ग़ौर करें, तो यही लगता है कि कट्टरपंथी मुसलमानों को डील करने में राष्ट्रवाद की पैरोकार भाजपा मुसलमानों के लिए सॉफ्ट कॉर्नर रखने वाली कांग्रेस से भी ज़्यादा फिसड्डी साबित हुई है।

निज़ामुद्दीन में छह मंज़िली इमारत में मौजूद हज़ारों की तादाद में जमातियों को निकालने के लिए तबलीग़ी मरकज़ के सदर मौलाना मोहम्मद साद को मनाने और राजी करने हेतु राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल का रात दो बजे मरकज़ में जाना, यही दर्शाता है कि कट्टरपंथी मुसलमानों को डील करते समय भाजपा भी कांग्रेस की तरह बहुत सॉफ़्ट अप्रोच अख़्तियार करती है और कट्टरपंथियों को नाराज़ नहीं करना चाहती है। अन्यथा 22 मार्च को जनता कर्फ़्यू से पहले ही कोरोना वायरस फैलाने वाले इन जमातियों को डंडे मार कर हकालकर क़्वारंटीन सेंटर में दिया जाता।

देश भर में कोरोना मरीज़ों की संख्या में सात सौ कोरोना पॉज़िटिव मरीज़ो का योगदान देने वाला तबलीग़ी आलमी मरकज़ तो चीनी वायरस फैलने के लिए तो सबसे अधिक ज़िम्मेदार है ही, लोकल पुलिस और स्थानीय नागरिक प्रशासन से लेकर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और दिल्ली सूबे के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तक भी उतने ही ज़िम्मेदार हैं, क्योंकि ये लोग 19, 20 और 21 मार्च की अवधि के दौरान कोई सख़्त कार्रवाई करने की बजाय बस हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे। अगर देश-विदेश से आए जमातियों के जमावड़े की बात इन तक पहुंचाई ही नहीं गई तो यह तो और भी गंभीर मसला है।

तबलीग़ी आलमी मरकज़ की बंगलेवाली मस्जिद की इमारत में मौजूद 2346 लोगों को बेशक निकाल लिया गया है, लेकिन यह सवाल अभी तक अनुत्तरित है कि इतनी बड़ी तादाद में लोगों को वहां रुकने और चीनी वायरस फैलाने की इजाज़त किन परिस्थियों में दी गई। जमातियों की जांच करके पहले ही सभी को क़्वारंटीन सेंटर में क्यों नहीं भेजा गया। केंद्रीय गृहमंत्री के आदेश पर काम करने वाली दिल्ली पुलिस ने 22 मार्च से पहले सख़्त क़दम क्यों नहीं उठाया। इसका जवाब मांगा जाना ही चाहिए।

ऐसे समय, जब देश के सभी धार्मिक और शिक्षण संस्थान 18 मार्च को ही बंद कर दिए गए। 18 मार्च को ही देश में सबसे अधिक भीड़ खींचने वाले तिरुपति बालाजी मंदिर और जम्मू-कश्मीर के वैष्णोदेवी मंदिर को बंद कर दिया गया। 20 मार्च को दुनिया में सबसे अधिक भीड़ खींचने वाली मक्का मस्जिद और मदीना मस्जिद भी बंद कर दी गई। तब तबलीग़ी आलमी मरकज़ की बंगलेवाली मस्जिद की इमारत में चार हज़ार तमातियों को निकालने के लिए स्थानीय पुलिस सक्रिय क्यों नहीं हुई?

दरअसल, चीनी वाइरस का ख़तरा देश में 30 जनवरी को पहला कोरोना पॉज़िटिव केस मिलने के बाद ही महसूस किया जाने लगा था। कई कंपनियां अपने कर्मचारियों को घर से काम करने की सलाह देने लगी थी। इस दौरान कभी केरल से तो कभी महाराष्ट्र से कोरोना पॉज़िटिव की इक्का-दुक्का ख़बरें आ रही थीं। 12 मार्च को कर्नाटक के कुलबर्गी में सऊदी अरब से हज़ करके लौटे 76 वर्षीय बुज़ुर्ग की कोरोना से मौत की ख़बर आते ही देश में हलचल मचने लगी। अगले दिन एक और कोरोना डेथ के बाद संस्थानों को बंद करने का सिलसिला शुरू हो गया, क्योंकि तब तक देश में कोरोना पॉज़िटिव के 80 से ज़्यादा मरीज़ों की पुष्टि हो चुकी थी।

दिल्ली सरकार ने 13 मार्च को डॉ. राममनोहर लोहिया अस्पताल में एक महिला की कोरोना से मौत के बाद इस चीनी वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए 200 से अधिक लोगों के एक जगह एकत्रित होने पर रोक लगा दी। 17 मार्च को 50 लोगों के एक जगह जमा होने प्रतिबंध लगा दिया गया। 19 मार्च को खतरा बढ़ता देख यह संख्या 20 कर दी गई। 20 मार्च को एक जगह पांच लोगों के इकट्ठा होने पर रोक लगा दी गई। ऐसे क्रिटिकल समय में निज़ामुद्दीन में तबलीग़ी आलमी मरकज़ की इमारत में क़रीब चार हज़ार लोगों को क्यों जमा होने दिया गया? इसका जवाब लोकल पुलिस के साथ साथ लोकल प्रशासनिक अधिकारियों से भी पूछा जाना चाहिए।

वस्तुतः तबलीग़ी आलमी मरकज़ इमारत की दीवार निज़ामुद्दी पुलिस स्टेशन की दीवार से एकदम सटी हुई है। सड़क से जाने पर मरकज़ से पुलिस स्टेशन की दूरी 40 मीटर से ज़्यादा नहीं होगी। ऐसे में हज़रत निज़ामुद्दीन पुलिस या स्थानीय ख़ुफ़िया इकाई (लोकल इंटेलिजेंस यूनिट) को इतनी बड़ी तादाद में लोगों को जुटने की पक्की ख़बर रही ही होगी और ज़ाहिर है इस सूचना को निश्चित रूप से थानाध्यक्ष और एलआईयू ने अपने आला अधिकारियों के साथ ज़रूर शेयर किया होगा।

ऐसे में लग यही रहा है, केंद्रीय गृहमंत्री और मुख्यमंत्री समेत आला अफ़सरों से कोई स्पष्ट निर्देश न मिलने की अवस्था में स्थानीय पुलिस स्टेशन के प्रभारी मुकेश वालिया नीरो की तरह बंसी बजाते रहे। 23 मार्च को जब कोरोना मरीज़ों की संख्य़ा 400 पार कर गई और चीनी वायरस से मरने वालों की संख्य 4 से अचानक 7 पहुंच गई, तब थाना प्रभारी को लगा कि मामला सीरियस होता जा रहा है। लिहाज़ा, तबलीग़ी आलमी मरकज़ छह सात लोगों बुलाकर उन्होंने कैमरे के सामने मरकज़ को खाली करने का निर्देश दिया। यह कार्य थानाध्यक्ष ने चार दिन पहले क्यों नहीं किया?

दरअसल, 28 मार्च को अंडमान-निकोबार से रिपोर्ट आई कि संक्रमित 10 से से 9 लोग तबलीग़ी आलमी मरकज़ के प्रोग्राम में शामिल हुए थे। चौथी संक्रमित मरीज़ मरकज़ में शामिल एक मौलाना की बीवी थी। इस रिपोर्ट से सभी के कान खड़े हो गए और लोकल पुलिसकर्मी और एसडीएम के साथ इमारत में गए और मौलाना साद से इमारत खाली करवाने और खांस रहे लोगों को अस्पताल और बाक़ी जमातियों को क्वारंटीन सेंटर भेजने का आग्रह किया, लेकिन कोरोना वायरस को ही इस्लाम के ख़िलाफ़ साज़िश मानने वाला मौलाना साद अड़ गया और कहा कि उसके लोग मस्जिद में मर जाएंगे, लेकिन अस्पताल या क्वारंटीन सेंटर में बिल्कुल नहीं जाएंगे।

यहीं झाम फंस गया। लात और डंडे खाने के पात्र मौलना साद को पुलिस वाले मनाने मे जुटे रहे। मान जाइए। खांस-छींक रहे लोगों को अस्पताल और बाक़ी लोगों को क्वारंटीन सेंटर भेजने दीजिए कहते हुए मनुहार करते रहे।
पूरे देश में प्रवासी मजदूरों को पुलिस डंडे मारती रही और मुर्गा बनने के लिए मजबूर करती रही, लेकिन मरकज़ में मिशन मान-मनौव्वल चलता रहा। जब रात 12 बजे मिशन मान-मनौव्वल फेल हो गया तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सूचित किया गया। तब प्रधानमंत्री ने भी मौलाना और गंदी मानसिकता वाले जमातियों डंडे मारने का आदेश देने की जगह मौलाना को मनाने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को भेजा।

अजित डोभाल के मनाने के बाद मौलाना साद तैयार हो गया और रात में ही खांस-छींक रहे जमातियों को बाहर निकलने का सिलसिला शुरू हुआ। वहां इतने अधिक जमाती थे कि इमारत को खाली कराने में तीन दिन लग गए। सबको निकलने के बाद बताया गया कि 2346 लोग थे। यह कहना ग़लत नहीं होगा भारत धरती का इकलौता ऐसा मुल्क है, जहां बुद्धिजीवी मुसलमान तो डर महसूस करते हैं, लेकिन पर्यटन वीज़ा लेकर विदेश इस्लाम का प्रचार करने यानी धर्म परिवर्तन को बढ़ावा देने के लिए इस भयस्थल के दौरे पर आते हैं और अपना काम ख़त्म करके चले भी जाते हैं। अब भारत सरकार होश में आई है और लगभग एक हज़ार विदेशी जमातियों को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया है।

अब यह भी पता चल रहा है कि तबलीग़ी मरकज़ में बड़ा कुर्ता छोटा पायजामा पहनने और दाढ़ी रखने वाले इन जमातियों को क्या प्रशिक्षण दिया जाता है। ज़ाहिर है, इन लोगों को महिलाओं को भोग की वस्तु मानने की तालीम दी जाती है। तभी तो ये लोग जहां हैं, वहीं उपद्रव कर रहे हैं। अस्पताल में महिला नर्सों के सामने नंगे होकर अंडरवियर पहन रहे हैं, अश्लील वीडियों देख रहे हैं, अश्लील इशारे कर रहे हैं और कुछ ऐसे भी काम कर रहे हैं जिसे लिखा भी नहीं जा सकता। सबसे दुखद बात यह कि मोदी-विरोध में अंधे कई तथाकथित बुद्धिजीवी दूसरी मिसालें देकर इन जाहिलों और जानवरों की पैरवी कर रहे हैं।

स्कॉटलैंड यार्ड की तरह सक्षम और तेज़-तर्रार मानी जाने वाली दिल्ली पुलिस एक हफ़्ता गुज़र जाने के बावजूद मौलाना साद को नहीं खोज पाई है। ऐसी पुलिस से किसी आतंकवादी को खोज लेने की कैसे उम्मीद की जा सकती है। ज़ाहिर है, पुलिस जानती है कि मौलाना साद कहां छिपा हुआ है, लेकिन उसे तलाशने का बहाना कर रही है। यह कांग्रेस शासन में होता तो गले उतर जाता लेकिन भाजपा शासन में यह बात बिल्कुल हज़म नहीं हो रही है।