Powered By Blogger

बुधवार, 20 मई 2020

कोरोना संक्रमणकाल में सूना है राज्य का सबसे शक्तिशाली ‘वर्षा’ बंगला

हरिगोविंद विश्वकर्मा

क्या अमेरिकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप ह्वाइट हाउस में रहने की बजाय अपने निजी बंगले से अमेरिकी प्रशासन चला सकते हैंक्या भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 7 रेसकोर्स रोड के प्रधानमंत्री आवास की बजाय अहमदाबाद में अपने निजी घर से प्रधानमंत्री के दायित्व का निर्वहन कर सकते हैं? क्या देश के किसी राज्य का मुख्यमंत्री अपने सरकारी सीएम आवास की बजाय अपने निजी आवास से राज्य की बाग़डोर संभाल सकता है? तीनों सवालों का एकलौता जवाब है नहीं। लेकिन महाराष्ट्र भारत का संभवतः इकलौता राज्य है, जहां यह सवाल आजकल हां में तब्दील हो गया है।

 

इसे भी पढ़ें - व्यंग्य - 'वो' वाली दुकान


जी हां, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री का तकरीबन छह दशक (57 साल) से आधिकारिक आवास रहा वर्षा बंगला मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के नाम बेशक आवंटित है, लेकिन वह उस बंगले में नहीं, बल्कि अपने निजी आवास मातोश्री में ही रहते हैं और महाराष्ट्र पर टूटे 60 साल से सबसे भीषणतम कहर कोरोना वाइरस संक्रमण के दौरान भी वह वर्षा से नहीं, बल्कि मातोश्री से हालात की निगरानी कर रहे हैं और नई वैश्विक महामारी को संभालने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन कोरोना है कि उनसे संभलने का नाम ही नहीं ले रहा है।


इसे भी पढ़ें - मी नाथूराम गोडसे बोलतोय ! 


इसका परिणाम यह हुआ है कि महाराष्ट्र कोरोना संक्रमित लोगों की संख्या और कोरोना मौत के मामले में पूरे देश में शीर्ष पर ही नहीं है, बल्कि पांच मई 2020 तक देश में 1,07,000 (1.7 लाख) कोरोना संक्रमित मरीज़ थे। इसमें महाराष्ट्र का योगदान 37136 (37 हजार से अधिक) था, जो कि 35 फीसदी है। इसी तरह देश में अब तक कोरोना से 3303 मौतें हुई हैं, जबकि महाराष्ट्र में 1249 लोगों की कोरोना से जान जा चुकी है। यह क़रीब 37 फ़ीसदी होता है। कहने का मतलब महाराष्ट्र में कोरोना संक्रमण बेक़ाबू हो चुका है। राज्य कोरोना को संभालने के लिए कारगर नेतृत्व का अभाव साफ दिख रहा है।

 

इसे भी पढ़े - क्या हैं पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के हालात ?


राज्य में अब तक 1328 से अधिक पुलिस वाले भी कोरोना की चपेट में आए हैं। इनमें से 52 पुलिसकर्मियों की कोरोना संक्रमण के चलते अकाल मौत हो चुकी है। मुंबई तो लगता है हालात धीरे-धीरे अमेरिका के न्यूयार्क जैसे होते जा रहे हैं। यहां 22563 लोग कोरोना से संक्रमित हैं, जिनमें 813 लोगों की मौत हो चुकी है। कहने का मतलब देश की आर्थिक राजधानी में कोरोना का नंगा नाच हो रहा है। लॉकडाउन का पालन करने के लिए राज्य में बुलाई गई सीआरपीएफ की 10 कंपनियों में से पांच को मुंबई में ही तैनात किया गया है।

 

इसे भी पढ़े - चीन में उइगरों की दुर्दशा पर मुस्लिम समुदाय मौन क्यों?


मुंबई में संक्रमित मरीज़ों के संपर्क में आए लोगों की तादाद इतनी अधिक है कि सबको अलगअलग क्वारंटीन सेंटर में रखना संभव नहीं है। इसीलिए बीएमसी ने 19 मई को दिशा निर्देश जारी किया कि जिम इमारत में कोरोना पॉज़िटव मरीज़ मिलेगा, वहां अब पूरी बिल्डिंग को नहीं बल्कि उस मंज़िल विशेष को ही सील किया जाएगा। मुंबई में संक्रमित मरीज़ों की बढ़ती संख्या से अस्पतालों में बेड कम पड़ रहे हैं। ऐसे में बीएमसी ने मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम को टेकओवर करने के लिए मुंबई क्रिकेट असोसिएशन को पत्र लिखा है।

 

इसे भी पढ़े - क्या मोदी का अंधविरोध ही मुसलमानों का एकमात्र एजेंडा है?


जहां कोरोना वाइरस से संक्रमण के समय संपूर्ण राज्य का कोरोना नियंत्रण कक्ष मुख्यमंत्री की देखरेख में उनके आधिकारिक आवास वर्षा बंगले में होना चाहिए था, वहीं राज्य का सबसे शक्तिशाली बंगला वर्षा इन दिनों खाली और सूनसान पड़ा है। यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा कि कभी राज्य का सबसे शक्तिशाली और महत्वपूर्ण आवास रहा वर्षा उद्धव बाल ठाकरे के मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही पूरी तरह अप्रासंगिक हो गया है और इन दिनों तो एकदम से मपरघट की तरह गहरे सन्नाटे में पड़ा हुआ है। और राज्य में कोरोना का संक्रमण का विस्तार रोके नहीं रुक रहा है।


इसे भी पढ़े - जस्टिस दीपक मिश्रा से भी ज़्यादा संदिग्ध आचरण वाले न्यायाधीश

 

सत्ता परिवर्तन के बाद जब राज्य में शिवसेनाराष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और राष्ट्रीय कांग्रेस के महाविकास अघाड़ी की सरकार बनी तो लगभग 60 साल के उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और वर्षा बंगला दो दिसंबर 2019 को उनके नाम आवंटित भी हो गयालेकिन उद्धव ठाकरे अपने मंत्री बेटे आदित्य ठाकरेपत्नी रश्मि ठाकरे और दूसरे बेटे तेजस ठाकरे के साथ बांद्रा पूर्व उपनगर के स्थित अपने पिता के निजी आवास मातोश्री में ही रहते हैं। कोरोना संक्रमण से पहले उद्धव ठाकरे महीने में एकाध बार किसी बैठक में भाग लेने के लिए वर्षा चले जाते थेलेकिन कोरोना के चलते जब से लॉकडाउन की घोषणा की गई हैतब से वह अपने निजी बंगले मातोश्री से ही कम निकलते हैंलिहाज़ावर्षा में उनका आना-जाना क़रीब-क़रीब बंद सा ही हो गया है।

 

इसे भी पढ़े - क्या कांग्रेसी ही चाहते थे,कोई गांधीजी को मार दे?


दरअसल, 1960 में राज्य के गठन के बाद सबसे शक्तिशाली और महत्वपूर्ण सरकारी आवास सह्याद्रि हुआ करता थालेकिन पांच दिसंबर 1963 को जब तत्कालीन मारोतराव कन्नमवार के आकस्मिक निधन के बाद वसंतराव नाइक ने राज्य के सत्ता की बाग़डोर संभाली तब से 12000 वर्गफीट में फैला वर्षा राज्य का सबसे शक्तिशाली और महत्वपूर्ण आवास का दर्जा पा गया। तब से देवेंद्र फड़णवीस के कार्यकाल तक वर्षा राज्य में सत्ता का केंद्र हुआ करता थालेकिन फड़णवीस की विदाई के साथ वर्षा बंगले की शान और शक्ति की भी विदाई हो गई। यह बंगला अचानक से अप्रासंगिक हो गया।

 

इसे भी पढ़े - इजराइल से क्यों नफ़रत करते हैं मुस्लिम ?


वस्तुतः इस बंगले को बॉम्बे प्रेसिडेंसी बनने के साथ अंग्रेज़ों ने बनवाया था। तब इसका नाम डग बीगन बंगला हुआ करता था। 1936 तक यह बंगला ब्रिटिश इंडिया के अग्रेज़ अफसरों का सरकारी आवास हुआ करता था। स्वतंत्रता मिलने के बाद यह द्विभाषी बॉम्बे के अधीन आ गया। 1956 में यह बंगला द्वभाषी राज्य के राजस्व और सहकारिता मंत्री वसंतराव नाइक को आवंटित किया गया। नाइक अपने बेटे अविनाश के जन्मदिन पर 7 नवंबर, 1956 को रहने के लिए डग बीगन बंगले में आ गए।


इसे भी पढ़े - 'वंदे मातरम्' मत बोलें, पर शोर भी न मचाएं कि 'वंदे मातरम' नहीं बोलेंगे..

 

राज्यों के पुनर्गठन के बाद जब महाराष्ट्र राज्य अस्तित्व में आया तो वसंतराव नाइक राज्य के पहले कृषि मंत्री बनाए गए। बहरहालउनकी पत्नी वत्सलाबाई नाइक जब अपने बंगले की तुलना सह्याद्रि बंगले से करती तो उन्हें उका बंगला बहुत मामूली लगता था। वह पति से शिकायत करती थी कि कैसा साधारण सा रौनक विहीन बंगला उन्हें आवंटित किया गया है। इसके बाद वसंतराव नाइक ने न्यूनतम खर्च में बंगले का पूरी तरह से जीर्णोद्धार करवा दिया और इसमें आमनींबूसुपारी वगैरह के अनेक पेड़ लगवा दिए। वह बंगले का नामकरण करना चाहते थे और अपने आवास का नाम ‘वी’ से रखना चाहते थे। वसंतराव का बारिश बहुत ही अंतरंग विषय था। कवि पांडुरंग श्रवण गोरेका पसंदीदा गीत ‘शेतकार्यंचे गने’ उन्हें बेहद पसंद था। उन्होंने वसंत-वत्सला-वर्षा को मिलाते हुए 1962 में डग बीगन बंगले का नाम वर्षा रख दिया।

 

इसे भी पढ़े - क्या है मुलायम सिंह यादव की प्रेम-कहानी?


1963 में जब वह राज्य के मुख्यमंत्री बने तो मंत्रिमंडल की पहली बैठक खत्म करने के बाद वर्षा पहुंचे और वर्षा में अपना आवासीय दफ्तर बनवाया। इस तरह 1963 से वर्षा बंगले को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री का आधिकारिक आवास का दर्जा मिल गया। अगले साल यानी 1964 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू महाराष्ट्र के दौरे पर आए थे. वह राजभवन में ही ठहरेलेकिन नाइक के आमंत्रण पर रात का भोजन करने के लिए तत्कालीन राज्यपाल और अपनी बहन विजयलक्ष्मी पंडित के साथ वर्षा के लॉन में आए और यही भोजन किया।


इसे भी पढ़े - धर्म,मजहब या रिलिजन अफीम का नशा है और हर अनुयायी अफीमची

 

वसंतराव नाइक ने 20 फरवरी1975 को बंगला खाली कर दिया। इसके बाद जो भी राज्य का मुख्यमंत्री बना उसका सरकारी आवास वर्षा बंगला ही रहा। शंकरराव चव्हाण, शरद पवार, अब्दुल रहमान अंतुले, बाबासाहेब भोसले, वसंतदादा पाटिल, शिवाजीराव पाचिल निलंगेकर, सुधाकरराव नाईक, मनोहर जोशी, नारायण राणे, विलासराव देशमुख, सुशील कुमार शिंदे, अशोक चव्हाण, पथ्वीराज चव्हाण और देवेंद्र फडणवीस ने मुख्यमंत्री का कामकाज इसी बंगले में रहकर किया। लेकिन उद्धव ठाकरे के शासनकाल में यह ऐतिहासिक बंगला सूना पड़ा है।

 

इसे भी पढ़े - अगर भारत हिम्मत दिखाकर केवल सिंधु जल संधि को रद कर दे तो घुटने टेक देगा पाकिस्तान


लोगों का कहना है कि ऐसे समय जब राज्य अपने साठ साल के इतिहास में सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है। कोरोना संक्रमण महाराष्ट्र में तेज़ी से हैतब मुख्यमंत्री आवास होने के नाते वर्षा के रूप में राज्य के पास एक औपचारिक नियंत्रण केंद्र होना चाहिए था। जहां से राज्य के सभी 36 ज़िलों, 27 महानगर पालिकाओं, 3 महानगर परिषदों और 34 जिला परिषदों के साथ साथ पूरे राज्य के प्रशासन का संचालन और निगरानी होनी चाहिए थीलेकिन राजनीतिक अदूरदर्शिता और अपरिपक्वता के कारण वर्षा बंगला भूतखाना बना हुआ है और कोरोना राज्य में शिव तांडव कर रहा है।

 

इसे भी पढ़े - नवाब अकबर बुगती का आज़ाद बलूचिस्तान का सपना क्या साकार होगा ?


राजनीतिक टीकाकारों का मानना है कि कोरोना संक्रमण को रोकने के लिए वर्षा को हर प्रशासनिक गतिविधि का केंद्र होना चाहिए था। दक्षिण मुंबई में राजभवन ही नहीं राज्य का मंत्रालय भवन और बीएमसी मुख्यालयमुंबई पुलिस मुख्यालयमहाराष्ट्र पुलिस मुख्यालय और भारतीय नौसेना मुख्यालय और दूसरे अन्य प्रमुख संस्थान वर्षा के आसपास चार से पांच किलोमीटर के ही दायरे में हैं। वहां से प्रशासनिक संचालन और दिशा-निर्देश जारी करने में आसानी होती लेकिन प्रशासनिक कार्य के लिए अनुभवहीन उद्धव ठाकरे यही ग़लती कर बैठे।

 

इसे भी पढ़े - आबादी 136 करोड़ के पार गई - भारत को “हम दो हमारा कोई नहीं” स्कीम की जरूरत


जब से उद्धव ठाकरे के बंगले में पहले चायवाला कोरोना संक्रमित पाया गया और उसके बाद मुख्यमंत्री की सुरक्षा में तैनात कई पुलिस वाले कोरोना से संक्रमित हुए तब से उद्धव बहुत मुश्किल से अपने घर से बाहर निकलते हैं। वह कोरोना संक्रमण से इतने आशंकित है कि अपनी को कार सरकारी ड्राइवर से ड्राइव करवाने की बजाय ख़ुद ही ड्राइव करते हैं। कहने का मतलब राज्य में जिस तरह की अफरा-तफरी का माहौल है, उसमें कोरोना जासी महामारी से निपटने राज्य को भारी मुश्किलात का सामना करना पड़ रहा है।

शुक्रवार, 1 मई 2020

व्यंग्य - 'वो' वाली दुकान


हरिगोविंद विश्वकर्मा
वह मुस्करा रहा था। मुस्करा ही नहीं रहा था, बल्कि हंस भी रहा था। बहुत ख़ुश लग रहा था। ऐसा लग रहा था, जैसे उसके मन में लड्डू फूट रहे हैं। वह अपनी ख़ुशी संभाल नहीं पा रहा था। फिर अचानक ठठा कर हंसने लगा। 
अचानक सबकी नज़र उसकी ओर गई। मैं उसे देखने से ख़ुद को नहीं रोक पाया। लिहाज़ा, उस पर मेरी नज़र चली गई। मैं उसकी ओर लपक लिया। पहुंचते ही जानने का प्रयास किया। उसकी ख़ुशी का कारण।
-अरे भाई आपकी इस ख़ुशी का राज़? मैंने कलाई हिलाकर इशारे से पूछा।
-मुझे वॉट्सअप पर मैसेज आया है।
-क्या मैसेज आया है। मुझे भी तो बताओ। ऐसा कौन सा मैसेज आ गया जो तुम ठठाकर हंस रहे हो?
-साहब, इस मैसेज का मैं लॉकडाउन शुरू होने से ही इंतज़ार कर रहा था। बड़ी बेसब्री से इस संदेश की राह देख रहा था।
-क्या मैसेज है, बताओगे या ऐसे ही पहेलियां बुझाते रहोगे।
-'वो' वाली दुकान भी खुल रही है साहब।
-कौन 'वो' वाली दुकान?
-सोमरस वाली दुकान! 
-दारू की दुकान? मैं उसकी ओर देखकर ज़ोर से बोला।
-दारू की दुकान कहकर उसका अपमान न करें! चाहे तो आप मदिरा की दुकान कह सकते हैं। आप मधु की दुकान कह सकते हैं। या फिर आप वाइन शॉप कह सकते हैं। वाइन शॉप खुल रही है। उसने बड़े आहिस्ता से जवाब दिया।
मैं उसकी ओर देखता रह गया। यह सोचने लगा कि शराब के कितने पर्यायवाची जानता है यह व्यक्ति।
-एक बात कहूं साहब? वह फिर धीरे से कहा।
-हां-हां, बोलो-बोलो। मैं पुलिसवाला नहीं हूं, इसलिए बिंदास बोलो। एक प्रशंसापात्र मैंने भी उसकी ओर बढ़ा दिया।
-पहली बार देश ही नहीं, देश की जनता ने महसूस किया है। उसने लंबी सांस छोड़ी।
-क्या महसूस किया है भाई, देश और देश की जनता ने? मैंने उत्सुकतावश पूछा। 
-हमारी कम्युनिटी की अहमियत को। उसे चेहरे पर रहस्यमयी मुस्कान तैर गई।
-हमारी कम्युनिटी की अहमियत का मतलब
-हां, हम सोमरस पान करने वालों की कम्युनिटी साहब। अचानक वह भावुक हो गया। आगे बोला -पूरी दुनिया में हमारी एक ही कम्युनिटी है। हमारे साथ न तो किसी देश का नाम जुड़ता है। न किसी धर्म का। हमें जाति के बंधन में नहीं बाधा जा सका। हम नस्लभेद से भी परे हैं। ऐसी है हमारी कम्युनिटी साहब। हम न तो देश के नाम पर लड़ते हैं, न धर्म के नाम पर। न तो जाति के नाम पर लड़ते हैं, न ही नस्ल के नाम पर। हमें अपनी कम्युनिटी पर गर्व है। आई एम प्रउड ऑफ माई कम्युनिटी।
-मतलब तुम शराबी हो? मैंने सीधा सवाल कर दिया। संगीत की भाषा में मेरा स्वर आरोहक्रम में था।
-शराबी मत कहो साहब। मदिराप्रेमी कहो। सोमरस पान करने वाला कहो। मैं सोमरस पान करने वालों की बात कर रहा हूं। सरकार को अब समझ में आई मदिराप्रेमियों की अहमियत साहब। उसने अवरोह क्रम में जवाब दिया। 
-इसमें अहमियत जैसी क्या बात है?
-अहमियत है साहब। देखो न, एक महीने से अधिक समय से देश में वाइन शॉप बंद हैं। इससे सरकार को हज़ारों करोड़ के राजस्व का नुकसान हुआ गया। देश की अर्थ-व्यवस्था पर भारी चपत लगी है। यह हमारे न पीने से हुआ है। अगर आगे भी हमें पीने से रोका गया तो यह घाटा लाखों में पहुंच सकता है। उसने किसी अध्यापक की तरह मुझे अर्थशास्त्र का गणित समझाया।
-बात तो सही कह रहे हो यार। सरकार को शराब से हर महीने हज़ारों करोड़ राजस्व मिलता है। यह बात तो सही है। मैंने उसकी बात से सहमति जताई।
-इस तरह हर साल लाखों करोड़ रुपए का राजस्व हुआ न।
-सही कहा आपने। चलो, अब तो शराब की दुकानें खुलनेवाली हैं। 
-वाइन शॉप कहिए न साहब। इसमें स्टेटस सिंबल भी है। हमारा मान भी बढ़ता है। हमारे कंधों पर देश की अर्थ व्यवस्था टिकी है।
-सही कहा आपने। आप लोगों की वजह से अर्थ व्यवस्था गुलज़ार रहती है। लाखों लोगों के घर में चूल्हा जलता है।
-लेकिन साहब मैंने भी एक संकल्प लिया है।
-कौन सा संकल्प?
-यही कि देश की अर्थ व्यवस्था में मंदी लाने का आरोप हमारी कम्युनिटी पर न पड़े।
-मैं समझा नहीं। 
-यही कि हम थोड़ा अधिक पीएंगे, ताकि कमबख़्त कोरोना के कारण 40 दिन में राजस्व का जो घाटा हुआ है, उसकी भरपाई कर दें। आख़िर हमारी भी तो कोई जिम्मेदारी है, उस देश के प्रति जिस देश के हम वासी हैं। मैं अपनी कम्युनिटी के लोगों से अपील करता हूं, उनके थोड़े प्रयास से देश की अर्थ व्यवस्था संभल जाएगी। लोगों की रोज़ी-रोटी छिनने से बच जाएगी। इसलिए देश के लिए पीएं। कोराना को हराने के लिए पीएं।
आप सच्चे देशभक्त हैं। आप महान हैं। यहां सड़क पर क्या कर रहे हैं? आपकी ज़रूरत तो वित्तमंत्रालय में है। कोरोना से लड़ाई जीतने के लिए देश को आपकी कम्युनिटी की ही ज़रूरत है।