रविवार, 18 फ़रवरी 2018

राष्ट्र को समर्पित टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज



हरिगोविंद विश्वकर्मा
क्या आप यक़ीन करेंगे, कि इस देश में श्रम समेत कई बिषयों के क़ानून के आधार ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले रिसर्चर्स की रिपोर्ट के आदार पर ड्राफ्ट की गई है। इस तरह की रचनात्मक काम देश में केवल एक ही संस्थान कर रहा है और वह है टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज।

भारत की सामाजिक दशा कई सदियों ही नहीं हज़ारों साल से बड़ी दयनीय रही है। मगर दुनिया इससे बेख़बर रही। देश की सामाजिक स्थिति पर किसी का ध्यान इसलिए नहीं गया, क्योंकि इस सब्जेक्ट पर काम करने वाला कोई नहीं था। संयोग से पिछली सदी के 1920-30 के दशक में इस तरह के संस्थान की ज़रूरत महसूस की गई और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के रूप में एक संस्थान सामने आया।

राष्ट्रीय मूल्‍यांकन और प्रत्यायन परिषद की ओर से 5-स्टार सम्मान और 'ए' ग्रेड पा चुका टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज यानी टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान (टिस्स) सोशल साइंस की स्टडी के लिए भारत ही नहीं दुनिया का अग्रणी संस्थान रहा है। इसकी महत्ता इसी बात से जानी जा सकती है कि इसकी कई रिपोर्ट्स पर कानून भी बनाए जा चुके हैं। भारत का जो श्रम कानून है, वह टिस्स की देन है।

सृजित संपत्ति के उचित आवंटन के जरिए नए समाज का निर्माण उद्योग का असली मकसद है। यह विजन टाटा समूह के संस्थापक जमशेदजी टाटा और उनके बेटे सर दोराबजी टाटा का है। इसी विजन के तहत टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज का जन्म हुआ। 1920 के दशक में मुंबई के नागपाडा की चालों में अमेरिकी मिशनरी क्लिफोर्ड मैंशर्ट ने जमशेदजी के सहयोग से शहरी सामुदायिक प्रोग्राम शुरू किया।

इनमें दोराबजी भी सहयोग करते थे। इसी दौरान एक संस्थान की जरूरत हुई और 1936 में नागपाडा नेबरहुड हाउस में दोराबजी टाटा ग्रेजुएट स्कूल ऑफ सोशल वर्क शुरू हुआ। डॉ मैंशर्ट निदेशक बने। पहले साल ही डिप्लोमा कोर्स होने के बावजूद 20 सीटों के लिए 400 आवेदन आए। इसका नाम बदलकर 1944 में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज कर दिया गया। टिस्स एशिया पैसिफ़िक क्षेत्र में सामाजिक कार्य शिक्षा में अग्रणी संस्था है। इसने सामाजिक नीति, नियोजन, हस्तक्षेप रणनीतियों और मानव संसाधन विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया है।

1936 और 1948 के दौरान संस्थान ने ऐसी रिपोर्ट्स तैयार कीं, जिनका असर राष्ट्रीय कानूनों व नीतियों पर पड़ा। पूर्व निदेशक एस परशुरामन टिस्स के इतिहास में बारे में बताते हैं, “टिस्स की रिपोर्ट्स पर कानून बने। हमने श्रम कल्याण एवं औद्योगिक प्रबंधन कोर्स चलाए। उसी पर 1948 में श्रम कानू बना। देश की श्रम कल्याण की नीति सीधे-सीधे सर दोरबाजी टाटा ग्रेजुएट स्कूल के कार्य से विकसित हुई।”

देवनार कैंपस का शुभारंभ 6 अक्टूबर 1954 को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने किया। 1964 में इसे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से डीम्ड यूनिवर्सिटी की मान्यता मिली। तब से टिस्स ने शिक्षा कार्यक्रमों का लगातार विस्तार किया। संस्थान सामाजिक व शैक्षणिक की बदलती जरूरतों के अनुसार सामाजिक कार्य के क्षेत्रमें व्यापक स्तर पर काम कर रहा है। टिस्स मानव संसाधनों और समाज कार्य में पेशेवर प्रशिक्षण देता है। यहां संगठित और सुव्यवस्थित फील्ड प्रोजेक्ट्स होते हैं, जहां विभिन्न समस्याओं पर रिसर्च होता है। संस्थान ने 500 से अधिक शोध रिपोर्ट प्रकाशित की हैं। 32 फील्ड एक्शन प्रोजेक्ट आरंभ किए हैं।

हालांकि टिस्स डीम्ड यूनिवर्सिटी है, फिर भी संचालन बोर्ड का अध्यक्ष ट्रस्ट प्रतिनिधि ही होता है। जेआरडी टाटा ने कई साल बोर्ड की अध्यक्षता की। उनका मानना था कि संपत्ति वापस समाज के विकास में लगाई जानी चाहिए। सोलापुर में सूखाग्रस्त इलाके में ग्रामीण कैंपस है। वहां पूरी तरह से सूखी पहाड़ियों को सफलतापूर्वक हर-भरा बनाया जा चुका है। कई अन्य परियोजनाएं आकार ले रही हैं। संस्थान की आगामी योजनाओं में विकासपरक अध्ययन, आपदा प्रबंधन, घरेलू हिंसा और मानवाधिकार से संबंधित अन्य केंद्रों की शुरुआत शामिल है। टिस्स शिक्षा, ट्रेनिंग और रिसर्च में योगदान दे रहा है। एनजीओज को तकनीकी मदद देता टाटा समूह ने ऐसे संस्थान का निर्माण किया है जिसने देश को संवारा, आगे बढ़ने में मदद की और अब सशक्त बना रहा है।

टिस्स सामाजिक विज्ञान, कार्मिक प्रबंधन, औद्योगिक संबंध एवं स्वास्थ्य, अस्पताल प्रबंधन और सामाजिक कार्य में स्नातकोत्तर और डॉक्टरेट की डिग्रियां देता है। टिस्स में नौ शिक्षण विभाग, आठ अनुसंधान इकाइयां, दो संसाधन इकाइयां और संसाधन सेल हैं।

'टिस्सा' की वेबसाइट
छात्रों और रिसर्चर्स का 'अल्मा मैटर', टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान के बारे में यह लैटिन मुहावरा एकदम सही है, क्योंकि टिस्स अपने छात्रों के लिए के लिए मातृ संस्थान ही नहीं, मां की तरह भी है, जो अपने हर छात्र का भरण-पोषण बौद्धिक ख़ुराक देकर करता रहा है। इसीलिए आपका अल्मा मैटर टिस्स, आप सबकी महान उपलब्धियों की दास्तान जानना और तमाम दूसरे टिस्सियन्स के साथ ख़ुशी के साथ शेयर करना चाहता है। यह अपने तमाम टिस्सियन्स की कीर्ति, सफलता, उपलब्धि, विशेषज्ञता, जीवन-अनुभव, सम्मान, अपेक्षा, प्रतिबद्धता, दोस्ती और अपने स्वयं के संस्थान टिस्स, जिसे ख़ुद मिल चुका है, का आभार व्यक्त करने वाली भावनाओं का लिए स्वागत करता हैं।

टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेस अलामस एसोसिएशन यानी टिस्सा का मुख्य उद्देश्य छात्रों और पूर्व छात्रों को सलाह, अनुसंधान और परियोजनाओं, मार्गदर्शन, इंटर्नशिप, फील्डवर्क अवसर, नौकरी पोस्टिंग, संदर्भ, छात्रवृत्ति और पुरस्कार के जरिए संबंधित क्षेत्रों में आपसी विकास के लिए एकजुट करना है। टिस्स और टिस्सियन्स को आपस में जोड़ने, उनसे संवाद करने और अल्ट्रास्पेशल बॉन्डिंग फिर से जीवंत करने का सबसे आसान, सबसे तेज़ और सबसे सुरक्षित माध्यम वेबसाइट है। टिस्सा की वेबसाइट 3 फरवरी, 2018 को शुरू हो गई। यह सुपर स्पेशल वेबसाइट दुनिया भर में फैले टिस्स के छात्रों को समर्पित है और चार दशकों के बाद पुराने और नए बैच को साथ लाएगा। इसीलिए टिस्सा वेबसाइट हमेशा ट्रेंडी और अपटूडेट रहती है।

टिस्स की स्नातक और कोंकण बाज़ार की ओनर नयन खड़पकर कहते हैं, "सच पूछो तो टाटा इंस्टीयूट ऑफ़ सोशल साइंस की कीर्ति और महिमा को दुनिया के कोने कोने में ले जाने के लिए सबसे परफेक्ट ब्रांड अंबेसेडर टिस्सियन्स ही हैं। टिस्स ने हम सबके जीवन को प्रकाशमान किया है, समग्र शिक्षा उपलब्ध कराकर हमारे भविष्य को उज्जवल बनाया है। इसीलिए टिस्स की फिर से कल्पना करके अपने प्यार, सम्मान और कृतज्ञता दिखाने की हम सबकी बारी है।"

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सोमवार, 5 फ़रवरी 2018

ट्रिपल तलाक़ - राजीव गांधी की ग़लती को सुधारने का समय

हरिगोविंद विश्वकर्मा

कांग्रेस की मौलवियों और कट्टरपंथियों के सामने हथियार डालने की परंपरागत नीति, जिसके कारण आज यह पार्टी अस्तित्व के संकट से  गुज़र रही है, के चलते ट्रिपल तलाक़ यानी तीन तलाक़ की अमानवीय परंपरा को गैरज़मानती अपराध की कैटेगरी में रखने वाला विधेयक लोकसभा में पारित होने के बाद राज्यसभा में लटक गया, क्योंकि संसद के ऊपरी सदन में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का बहुमत नहीं था। अब उम्मीद की जा रही है कि मुस्लिम पुरुषों की अनैतिक और अमानवीय मनमानी के चलते मुस्लिम महिलाओं की ज़िंदगी को नारकीय बनाने वाली इस प्रथा को बंद करने के लिए मौजूदा बजट सत्र में उसे क़ानूनी जामा पहना दिया जाएगा।
उधर ट्रिपल तलाक़ पर क़ानूनी पाबंदी लगाने का पुरज़ोर विरोध कर रहा ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड अब भी ट्रिपल तलाक़ को गैरज़मानती अपराध की श्रेणी में रखने के पक्ष में नहीं दिख रहा है। हालांकि इस परंपरा का पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी तो नहीं, उनकी पत्नी सलमा अंसारी ने ज़रूर खुलकर विरोध किया। तीन तलाक़ की प्रथा को अमानवीय और बकवास क़रार देते हुए सलमा अंसारी कट्टरपंथी पुरुषों को क़ुरआन पढ़ने की सलाह दे चुकी हैं, लेकिन मौलवी और कट्टरपंथी अब भी झुकने को तैयार नहीं दिख रहे हैं। इसीलिए ट्रिपल तलाक़ का मुद्दा एक राष्ट्रीय मसाइल बन गया है। हैरत की बात है कि मीडिया, सोशल मीडिया और जनचर्चा में बुद्धिजीवी मुसलमान अब भी नरेंद्र मोदी सरकार के ट्रिपल तलाक़ को गैरज़मानती अपराध बनाने की कोशिश का विरोध कर रहे हैं। विरोधियों में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड सबसे आगे है।
सलमा अंसारी के विपरीत ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड कहता आया है कि तीन तलाक़ का मुद्दा भी पवित्र क़ुरआन और हदीस की बुनियाद पर है। इसमें किसी भी तरह का बदलाव मुमकिन नहीं और मुसलमान किसी भी बदलाव को क़बूल नहीं कर सकता। मज़ेदार बात है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड एक साथ तीन तलाक़ को सामाजिक बुराई तो मानता है, परंतु वह इस प्राचीन परंपरा पर सामाजिक स्तर पर ही पाबंदी लगाने के पक्ष में है। बोर्ड पहले ही तलाक़ के मामले में कोड ऑफ़ कंडक्ट जारी करके एक साथ तीन तलाक़ देने वाले का सामाजिक बहिष्कार करने का ऐलान कर चुका है। बोर्ड ने कहा है कि अब निकाह के क़ुबूलनामे के वक़्त ही शौहर को यह भी क़ुबूल करना होगा कि वह एक साथ तीन तलाक़ नहीं बोलेगा। एक साथ तीन तलाक के बेज़ा इस्तेमाल को रोकने के लिए मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड मॉडल निकाहनामा में यह प्रावधान कर रहा है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड हैदराबाद में 9 फरवरी को होने वाली तीन दिवसीय बैठक में इस मसाइल पर चर्चा करेगा।
गौरतलब है कि अगस्त में सुप्रीम कोर्ट की पांच विद्वान न्यायाधीशों, जिसमें हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई समुदाय के जज थे, की संवैधानिक पीठ ने मुस्लिम महिलाओं को तलाक़-तलाक़-तलाक़ की सदियों पुरानी अमानवीय और बर्बर परंपरा से निजात दिला दी थी। सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का सबसे ज़्यादा स्वागत ज़ाहिर तौर पर ट्रिपल तलाक़ और हलाला की विभीषिका से दो चार होने वाली देश की मुस्लिम महिलाओं ने किया था। इन महिलाओं ने खुले दिल से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ़ करते हुए उनका शुक्रिया अदा किया था। कहा तो यह भी गया कि तीन तलाक़ के मुद्दे के चलते ही पिछले उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव में मुस्लिम महिलाओं ने अपने शौहरों के निर्देश को अंगूठा दिखाया और उनकी मर्जी के विरुद्ध भारतीय जनता पार्टी को वोट दिया था और भाजपा सवा तीन सौ सीट जीतने में कामयाब रही थी।
तीन तलाक़ के मुद्दे पर केंद्र सरकार को धन्यवाद देने वाली महिलाओं में अभिनेत्री सलमा आगा भी शामिल रहीं, जिन्होंने ट्रिपल तलाक़ के अमानवीय पहलू को समाज के सामने लाने वाली पहली फिल्म 'निकाह' में यादगार अभिनय किया था। उस फिल्म के प्रदर्शन के बाद भारतीय समाज ने शिद्दत से महसूस किया कि वाक़ई मुस्लिम महिलाओं के लिए ट्रिपल तलाक़ किसी भयावह सपने से कम नहीं है। चूंकि देश में आज़ादी के बाद कांग्रेस की सरकार रही और वह सरकार ट्रिपल तलाक़ की पैरवी करने वाले मुल्लों के निर्देश पर काम करती थी, इसलिए इन कुप्रथाओं को दूर नहीं किया जा सका।
ट्रिपल तलाक़ को असंवैधानिक क़रार देने के सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद केंद्र सरकार सक्रिय हो गई और तीन तलाक़ को गैरज़मानती अपराध की कैटेगरी में रखने वाले विधेयक की ड्राफ्टिंग की गई और उसे लोकसभा, जहां एनडीए के पास बहुमत है, में पारित करवा लिया गया, लेकिन राज्यसभा में यह चर्चित विधेयक लटक गया। हालांकि कट्टरपंथियों की तर्ज पर कांग्रेस भी तीन तलाक़ की परंपरा का विरोध करने का दावा कर रही है और इसी बिना पर देश की इस सबसे पुरानी पार्टी ने लोकसभा में विधेयक का विरोध नहीं किया।
बहरहाल, ट्रिपल तलाक़ का मुद्दा पिछले एक साल से चर्चा में है। इस मसले ने सन् 1980 के दशक में देश विदेश में चर्चा का विषय बनने वाले बहुचर्चित शाहबानो प्रकरण की याद ताज़ा कर दी है। उस समय भी देश की सबसे बड़ी अदालत ने तलाक़शुदा शाहबानो के पक्ष में फ़ैसला दिया था। लेकिन कांग्रेस की तुष्टीकरण की नीति ने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को बुरी तरह डरा दिया और सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को इस्लाम में दख़ल मानकर केंद्र सरकार ने नया क़ानून बनाया और सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को लागू होने से ही रोक दिया था। इस तरह कांग्रेस के इस बेहद अमानवीय क़दम से ट्रिपल तलाक़ की गंभीर शिकार शाहबानो इंसाफ़ पाने से वंचित रह गई।
यह कहने में गुरेज़ नहीं कि सन् 1986 में शाहबानो के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के दिए गए फ़ैसले को बदलने के लिए क़ानून बनाकर राजीव गांधी की सरकार ने जो ब्लंडर किया था उसे इस बार राष्ट्रीय जनतांत्रिक सरकार संशोधित करने की कोशिश कर रही है। यानी जब सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से इस बारे में राय मांगी तो केंद्र ने साफ़ कहा कि ट्रिपल तलाक़ का धर्म से कोई संबंध नहीं, लिहाज़ा सरकार इसे ख़त्म करने के पक्ष में है। अपनी उसी लाइन ऑफ़ ऐक्शन के तहत केंद्र सरकार ने इस बिल को लोकसभा में पारित करवाया। केंद्र सरकार के फ़ैसले का नतीजा देश की मुस्लिम महिलाओं को ट्रिपल तलाक़ से मुक्ति के रूप में सामने आया है। कहना न होगा कि यह काम कोई दूरदर्शी सरकार ही कर सकती थी।
दरअसल, 62 वर्षीय मुस्लिम महिला शाहबानो पांच-पांच बच्चों की मां थीं। उनके शौहर ने सन् 1978 में ही तलाक़ तलाक़ तलाक़ कहते हुए उनसे पत्नी का दर्जा छीन लिया था। मुस्लिम पारिवारिक क़ानून के अनुसार शौहर बीवी की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ ऐसा कर सकता है। अपनी और बच्चों की जीविका का कोई साधन न होने के कारण शाहबानो पति से गुज़ारा लेने के लिए अदालत पहुंचीं। उस लाचार महिला को सुप्रीम कोर्ट पहुंचने में ही सात साल गुज़र गए। सुप्रीम कोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 125 के तहत फ़ैसला दिया जो हर किसी पर लागू होता है, चाहे वह व्यक्ति किसी भी धर्म, जाति या संप्रदाय का हो। सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि शाहबानो को निर्वाह-व्यय के समान जीविका दी जाए। तब भी रूढ़िवादी मुसलमानों को कोर्ट का फ़ैसला मजहब में हस्तक्षेप लगा। असुरक्षा की भावना के चलते उन्होंने इसका विरोध किया। लिहाज़ा, तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने उनकी मांगें मान लीं और इसे धर्म-निरपेक्षता की मिसाल के रूप में पेश किया। तब सरकार के पास 415 लोकसभा सांसदों का बंपर बहुमत था, लिहाज़ा, मुस्लिम महिला (तलाक़ अधिकार सरंक्षण) क़ानून 1986 में आसानी से पास हो गया।
मुस्लिम महिला (तलाक़ अधिकार सरंक्षण) क़ानून के अनुसार जब मुसलमान त़लाकशुदा महिला इद्दत के समय के बाद अपना गुज़ारा नहीं कर सके तो कोर्ट उन संबंधियों को उसे गुज़ारा देने का आदेश दे सकता है जो मुस्लिम क़ानून के अनुसार उसकी संपत्ति के उत्तराधिकारी हैं। परंतु, ऐसे रिश्तेदार अगर नहीं हैं अथवा गुज़ारा देने की स्थिति में नहीं हैं, तो कोर्ट प्रदेश वक्फ़ बोर्ड को गुज़ारा देने का आदेश देगा। इस प्रकार से मुस्लिम महिला के शौहर के गुज़ारा देने का उत्तरदायित्व और जवाबदेही सीमित कर दी गई।
मुस्लिम महिला (तलाक़ अधिकार सरंक्षण) क़ानून राजीव गांधी के कार्यकाल में एक बदनुमा दाग़ की तरह माना जाता है, क्योंकि कांग्रेस के उस फ़ैसले ने एक मज़लूम मुस्लिम महिला को गुज़ारा भत्ता पाने से वंचित कर दिया और भविष्य में तलाक़ की विभीषिका झेलने वाली हर मुस्लिम महिला को और ज़्यादा लाचार कर दिया। उस समय कट्टरपंथी मुसलमानों को छोड़कर हर किसी ने राजीव गांधी की तुष्टिकरण वाली नीति की आलोचना की थी। वह क़ानून आज भी काग्रेस के उस असली चरित्र को सामने लाता है, जिसके कारण सवा सौ साल से ज़्यादा पुरानी यह पार्टी विलेन बन गई और आज अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष कर रही है। उस फ़ैसले को कांग्रेस का राजनैतिक लाभ के लिए अल्पसंख्यक वोट बैंक के तुष्टीकरण का सटीक उदाहरण माना जाता है।
बहरहाल, इस बार केंद्र में भाजपा की अगुवाई वाली सरकार सही मायने में मुस्लिम महिलाओं को इंसाफ़ दिलाने की ओर अग्रसर है। इसीलिए पिछले दस साल से शौहर के अमानवीय फ़ैसले की शिकार हुई सायराबानो के पक्ष में केंद्र एक दीवार की तरह खड़ा हो गया है। ट्रिपल तलाक़ की गैरइस्लामिक परंपरा ने मुस्लिम पुरुषों को निरंकुश और बेलगाम बना दिया था। यहां तक, 'ट्रैजिडी क्वीन' मीना कुमारी (महज़बीन बानो) के साथ इस्लामिक रीति रिवाज़ से निकाह करने वाले फिल्मकार कमाल अमरोही ने मतभेद होने पर ग़ुस्से में तीन बार तलाक़ कहकर शादी तोड़ दी थी। मीना कुमारी इससे सीरियस डिप्रेशन में चली गईं, जो अंततः उनकी मौत की वजह बनी। ऐसी ही मज़लूम सायरा बानो को केद्र सरकार का सहारा मिला। केंद्र सरकार के विधि मंत्रालय ने इस मुद्दे को गंभीरता से लिया और अंततः मुस्लिम महिलाओं को इस परंपरा से मुक्ति दिलाने की पहल की। 
वैसे भी हर धर्म की भी अपनी एक सीमा होनी ही चाहिए। इंसानियत से बड़ा कोई धर्म, मजहब या रिलिजन नहीं हो सकता। तीन तलाक़ निश्चित रूप से इंसानियत के दायरे से बहुत ज़्यादा दूर था। पहले सुप्रीम कोर्ट और अब केंद्र सरकार ज़्यादा कुछ नहीं कर रही है, बस उसे बेहतर करने की कोशिश कर रही है। दुनिया का कोई भी धर्म नागरिकों के मनुष्य अधिकारों से बड़ा नहीं हो सकता है। इसीलिए मोदी सरकार ने इस परंपरा को हमेशा के लिए ख़त्म करने की पहल की है। इसलिए मानवीय आधार पर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और कांग्रेस समेत तमाम सेक्यूलर पार्टियों को इसका समर्थन करना चाहिए ताकि ट्रिपल तलाक़ को गैरज़मानती अपराध बनाया जा सके। यक़ीन मानिए, अगर कांग्रेस ने इस बार भूल सुधार नहीं किया तो 2019 के आम चुनाव में यह सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनेगा और नरेंद्र मोदी सरकार की हर नाकामी को ढंकते हुए भाजपा को 2014 के चुनाव से भी बड़ी जीत दिलाएगा, क्योंकि इस निरक्षर बाहुल्य देश में विकास या भ्रष्टाचार नहीं बल्कि धर्म सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा होता है।
दरअसल, कांग्रेस की नीतियों के चलते सदियों से उदार रहा हिंदू समाज यह महसूस करने लगा है कि  वन नेशन वन लॉ की थ्यौरी पर चलना चाहिए और देश में हर नागरिक के लिए एक ही क़ानून होना चाहिए, इसी मन:स्थिति के चलते देश का बहुसंख्यक समाज सांप्रदायिक कही जाने वाली पार्टियों को आंख मूंदकर वोट दे रहा है, क्योंकि वह मानने लगा है कि एनडीए अगर बुरा भी करेगा तो भी वह कट्टरपंथियों, जिन्हें सेक्यूलर कहने का फ़ैशन है, से बेहतर ही होगा। केंद्र सरकार ने अध्यादेश जारी करके अंततः इस सामाजिक बुराई को खत्म करने का कारगर कदम उठा लिया है। 19 सितंबर 2018 को जारी किया गया।