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मंगलवार, 1 अगस्त 2017

'वंदे मातरम्' मत बोलें, पर शोर भी न मचाएं कि 'वंदे मातरम' नहीं बोलेंगे..

हरिगोविंद विश्वकर्मा
भारतीय संविधान में देश के राष्ट्रगीत का दर्जा पाने वाला गीत 'वंदे मातरम्' एक बार फिर चर्चा में है। कई मुस्लिम नेता, ख़ासकर जिनकी इमेज कट्टरपंथी नेता की है, वो इसे न गाने के लिए अड़ गए हैं। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लमीन के विधायक वारिस पठान ने तो महाराष्ट्र विधान सभा में यहां तक कह दिया कि उन्हें मार भी डाला जाए तब भी वह 'वंदे मातरम्' नहीं बोलेंगे। इसी तरह कभी सांसद असदुद्दीन ओवैसी या अबु आसिम आज़मी तो कभी आज़म ख़ान जैसे अपरिपक्व नेता चिल्ला-चिल्ला कर कहते हैं कि वे 'वंदे मातरम्' नहीं गाएंगे या 'भारत माता की जय' नहीं बोलेंगे।

भारतवासियों के मूल अधिकारों को महफूज़ रखने के लिए बनाए गए संविधान में तकनीकी तौर पर कहीं भी नहीं लिखा गया है कि सुबह उठकर सबसे पहले 'वंदे मातरम्'का सरगम छेड़ें या ज़ोर से 'भारत माता की जय' बोलें। संविधान में यह भी नहीं लिखा है कि जो लोग 'वंदे मातरम्'गाएंगे या 'भारत माता की जय' बोलेंगे, केवल वही लोग देशभक्त कहलाएंगे, बाक़ी देशभक्त नहीं कहलाएंगे। परंतु पूरे भारतीय संविधान के किसी भी अनुच्छेद में कहीं भी ये नहीं लिखा है, कि सार्वजनिक तौर पर चिल्ला-चिल्ला कर या फतवा जारी करके कहें कि 'वंदे मातरम्' नहीं गाएंगे या 'भारत माता की जय' नहीं बोलेंगे।

यह देश इतना उदार है कि किसी को किसी से किसी बात के लिए सर्टिफिकेट या इजाज़त लेने की कोई ज़रूरत नहीं है। ओवैसी, आज़मी या पठान जैसे नेताओं को न तो किसी दूसरे नेता से देशभक्ति लेने का सर्टिफिकेट लेने की ज़रूरत है न देने की। लिहाज़ा, कोई व्यक्ति या संगठन अपने को “देशभक्त” और दूसरे को “अदेशभक्त” भी नहीं कह सकता। देशभक्ति ऐसी चीज़ है जिसे कम से कम साबित करने की कोई ज़रूरत नहीं। किसी को यह साबित नहीं करना है कि वह वह देशभक्त हैं या नहीं। देशभक्ति नागरिक के बात-व्यवहार से ही झलकती है।

जहां तक वंदे मातरम् की बात है तो स्वतंत्रता संग्राम में इस गाने की ज़बरदस्त धूम थी। इसके बावजूद जब राष्ट्रगान के चयन की बात आई तो वंदे मातरम् के स्थान पर रवींद्रनाथ ठाकुर के 'जन गण मन' को वरीयता दी गई। दरअसल, कई कट्टरपंथी मुसलमानों को तब भी 'वंदे मातरम्' गाने पर आपत्ति थी, क्योंकि इस गीत में देवी दुर्गा को राष्ट्र के रूप में देखा गया है। उनका यह भी मानना था कि यह गीत जिस उपन्यास 'आनंद मठ' से लिया गया है, वह मुसलमानों के ख़िलाफ़ लिखा गया है। इन आपत्तियों पर सन् 1937 में कांग्रेस ने गहरा चिंतन किया। जवाहरलाल नेहरू की अगुआई में समिति का गठन किया गया, जिसमें मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, सुभाषचंद्र बोस और आचार्य नरेंद्र देव भी शामल थे। समिति ने 28 अक्टूबर 1937 को कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में अपनी रिपोर्ट पेश की। जिसमें 'जन गण मन' को राष्ट्रगान और वंदे मातरम् एवं मोहम्मद इकबाल के कौमी तराने 'सारे जहां से अच्छा' को राष्ट्रगीत बनाने की सिफ़ारिश की गई।

बहरहाल, 14 अगस्त 1947 की रात्रि में संविधान सभा की पहली बैठक का आरंभ ‘वंदे मातरम्’ के साथ और समापन‘जन गण मन..’ के साथ हुआ। आज़ादी के बाद डॉ राजेंद्र प्रसाद ने संविधान सभा में 24 जनवरी 1950 को 'वंदे मातरम्'  को राष्ट्रगीत के रूप में वाला बयान पढ़ा जिसे हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई और पारसी सभी धर्मों के प्रतिनिधियों ने आम राय से स्वीकार किया। राजेंद्र प्रसाद ने कहा, "शब्दों की वह संगीतमय रचना जिसे जन गण मन से संबोधित किया जाता है, भारत का राष्ट्रगान है; बदलाव के ऐसे विषय, अवसर आने पर सरकार अधिकृत करे और वंदे मातरम् गान, जिसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है; को जन गण मन के समकक्ष सम्मान व पद मिले। मैं आशा करता हूँ कि यह सदस्यों को संतुष्ट करेगा।" इलके बाद 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के बाद ‘वंदे मातरम’ को औपचारिक रूप से राष्ट्रगीत और ‘जन गण मन’ राष्ट्रगान बना दिया गया।

वंदे मातरम् भारत में बेहद लोकप्रिय रहा है। कट्टरपंथी मुसलमान इसका जितना विरोध कर रहे हैं, यह गीत उतना ही फैल रहा है। अभी सन् 2002 में ब्रिटिश ब्रॉड कॉरपोरेशन बीबीसी ने सर्वेक्षण किया था, जिसके मुताबिक ‘वंदे मातरम्’ विश्व का दूसरा सर्वाधिक लोकप्रिय गीत है। इसे हर धर्म के लोग गाते हैं, केवल चंद कट्टरपंथी मुसलमानों को ही इस गीत पर संदेह रहता है। गीत की रचना से ही हिंदू इसे गर्व से गाते रहे हैं, जबकि बहुमत में मुसलमान ख़ासकर कट्टर मुसलमाल इसे शायद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का गीत समझ कर इससे परहेज करते हैं। पिछले साल ओवेसी ने तो यहां तक कह दिया था, “गर्दन पर छूरी रख दो तब भी ‘वंदे मातरम्’ या 'भारत माता की जय' नहीं बोलूंगा।"

दरअसल, सम्मान या भक्ति या देशभक्ति प्रदर्शित करने की चीज़ नहीं। लोग स्वेच्छा से माता-पिता, बड़ों और देश के प्रति सम्मान और भक्ति प्रदर्शित करते हैं। अगर कोई व्यक्ति अपने माता-पिता, बड़ों-बुजुर्गों या देश का सम्मान न करे, तो लोग उससे यह नहीं कहेंगे कि तुम सम्मान करो या भक्ति दिखाओ। सच पूछो तो सम्मान, भक्ति या देशभक्ति इंसान के अंदर ख़ुद पैदा होती है। इस तरह भी कह सकते हैं कि सम्मान या भक्ति या देशभक्ति सच्चे नागरिक यानी सन ऑफ़ सॉइल की पर्सनॉलिटी में इनबिल्ट होती है। इसलिए ‘वंदे मातरम्’ गाएं या न गाएं, इस महान देश को कोई फ़र्क नहीं पड़ता। हां, ज़िम्मेदार, गंभीर और समझदार नागरिक पब्लिकली कोई ऐसी ओछी बातें नहीं करते, जिससे किसी को उसकी निष्ठा पर उंगली उठाने का मौक़ा मिले।

वंदे मातरम् या भारत माता की जय जैसे मुद्दे केवल मुस्लिम नेता ही नहीं उठाते हैं। कई इस्लामिक तंजीमें भी इस तरह की आग में तेल डालती रहती हैं। उत्तर प्रदेश सहारनपुर के दारुल उलूम देवबंद का फतवा भी है कि मुसलमान न तो वंदे मातरम् गाएंगे न ही भारत माता की जय बोलेंगे। मुफ़्तियों की खंडपीठ मानती है, इंसान को जन्म इंसान ही दे सकता है, तो धरती मां कैसे हो सकती है। मुसलमान अल्लाह के अलावा किसी की इबादत नहीं कर सकता तो भारत को देवी कैसे मानें। इसी आधार पर देवबंद ने कहा कि भारत माता की जय बोलना इस्लाम में नहीं है। लिहाज़ा मुसलमान भारत माता की जय नहीं बोलेंगे।

दरअसल, इस्माल की ग़लत व्याख्या करने वाले नीम हकीम मुफ़्ती हमेशा अपनी क़ौम का नुकसान करते आए हैं। यहां इनका तर्क है कि लोग पृथ्वी को मां नहीं कह सकते, क्योंकि उन्हें पृथ्वी ने पैदा नहीं किया, बल्कि उन्हें उनकी मां ने पैदा किया है। यह बड़ी अजीब और हास्यास्पद हालत है। इन जाहिलों को कौन समझाए कि इंसान जिससे भोजन लेता है, उसी के लिए उसकी ज़ुबान से मां शब्द निकलता है। वस्तुतः मां परवरिश की सिंबल है। बच्चा पैदा होने के बाद जिस स्त्री का स्तनपान करता है,उसे मां कहता है। इसी तरह पृथ्वी यानी धरती भी मां हैं,क्योंकि ज़िंदगी भर इंसान भोजन धरती से ही लेता है और धरती के हिंद महासागर क्षेत्र में कुल 3,287,263 वर्ग किलोमीटर भूभाग पर फैले हुए हिस्से को भारत, हिंदुस्तान और इंडिया कहा जाता है। चूंकि यही भूखंड यहां पैदा होने और पलने-बढ़ने वालों को भोजन देता है, इसलिए इस भूखंड को सम्मान से भारत माता कहा जाता है।

कहने का मतलब भारत माता ही भारत यानी भारतवर्ष है। जिसका अस्तित्व दुनिया में एक राष्ट्र के रूप में है। एक संपूर्ण स्वाधीन और लोकतांत्रिक राष्ट्र, जो 29 राज्यों और सात केंद्र शासित क्षेत्रों में विभाजित है। इस भूखंड पर रहने वाला हर नागरिक केवल और केवल भारतीय यानी भारतवासी है। बिना किसी संदेह के भारतीयता इस देश का सबसे बड़ा धर्म है। किसी कबिलाई कल्चर की तरह नहीं, बल्कि इस देश को एक सभ्य देश की तरह चलाने के लिए एक वृहद संविधान बनाया गया है, वह देश का सबसे बड़ा धर्मग्रंथ है। हिंदुत्व हो, इस्लाम हो या फिर ईसाइयत या फिर दूसरा कोई धर्म, सभी धर्म भारतीयता नाम के इस धर्म के सामने बौने हैं। इसी तरह देश के धर्मग्रंथ यानी “भारतीय संविधान” के आगे गीता, क़ुरआन और बाइबल सबके सब दूसरी वरीयता के धर्म हैं। यही अंतिम सच है, इस पर तर्क-वितर्क की कोई गुंजाइश नहीं।

कोई नागरिक अगर हिंदू धर्म को भारतीयता से ऊपर और गीता को भारतीय संविधान से बड़ा मानता है, तो उसे धरती पर ऐसी जगह खोजनी चाहिए, जहां भारत, भारतीयता या भारतीय संविधान न हो। कोई नागरिक अगर इस्लाम को भारतीयता से ऊपर और क़ुरआन को भारतीय संविधान से बड़ा मानता है, तो उसे भी धरती पर ऐसी जगह चले जाना चाहिए, जहां भारत, भारतीयता या भारतीय संविधान न हो। इसी तरह अगर कोई भी नागरिक अपने धर्म को भारतीयता से ऊपर और अपने धर्मग्रंथ को भारतीय संविधान से ऊपर मानता है, तो उसे भी धरती पर ऐसी जगह खोजनी चाहिए, जहां भारत, भारतीयता या भारतीय संविधान न हो। और जब तक इस भारतीय भूखंड पर आप हैं, आप सबसे पहले आप भारतीय हैं, न कि हिंदू, मुस्लिम या ईसाई। इस संप्रभु, सामाजिक और सेक्यूलर देश में हर नागरिक को लिखने, बोलने और धर्म अपनाने की पूरी आज़ादी मिली है। बोलने-लिखने की आज़ादी इतनी ज़्यादा है कि लोग देश के सर्वोच्च शासक प्रधानमंत्री तक की आलोचना करते हैं। उसके फ़ैसलों से सार्वजनिक तौर पर असहमति जताते हैं। इसी आज़ादी के चलते आजकल देश का विभाजन व देश के टुकड़े करने की बात कहना, राष्ट्रगान या राष्ट्रगीत के बारे में अप्रिय बात करना या भारत माता की जय न बोलने की बात करना फैशन सा बन गया है।


दरअसल, वंदे मातरम् बोलने या न बोलने पर विवाद ही नहीं होना चाहिए था। आतंकवाद और ट्रिपल तलाक़ के मुद्दे से मुसलमानों का पहले ही बहुत ज़्यादा नुकसान हो चुका है। लिहाज़ा, ख़ुद मुसलमानों को ही आगे आकर वंदे मातरम् के बारे में अनाप-शनाप बोलने वालों का विरोध करना चाहिए। वंदे मातरम् या भारत माता की जय को विवाद का विषय बनाने वालों का बहिष्कार करना चाहिए। वरना यह मसला मुसलमानों को मुख्यधारा से अलग-थलग कर सकता है। इतना ही नहीं, यदि मुसलमान चुप रहे तो यह संदेश देने की साज़िश भी की जा सकती है कि हर मुसलमान की यही भावना है, जबकि यह सच नहीं है। ओवैसी जैसे मुट्ठी भर लोगों को छोड़ दिया जाए तो देश का आम मुसलमान उसी तरह देशभक्त है, जिस तरह हिंदू। उसे किसी से देशभक्ति का प्रमाणपत्र लेने की ज़रूरत नहीं है। बस इस मसले पर संवेदनशील होने की ज़रूरत है और बहके हुए लोगों से कहना चाहिए कि 'वंदे मातरम्' या'भारत माता की जय' मत बोलें, पर शोर भी न करें कि 'वंदे मातरम्' या 'भारत माता की जय' नहीं बोलेंगे।

रविवार, 25 जून 2017

ईमानदार जज जेल में, भ्रष्टाचारी बाहर !

हरिगोविंद विश्वकर्मा
सुप्रीम कोर्ट देश की सबसे बड़ी अदालत है, इसलिए उसका फ़ैसला सर्वोच्च और सर्वमान्य है। चूंकि भारत में अदालतों को अदालत की अवमानना यानी कॉन्टेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट की नोटिस जारी करने का विशेष अधिकार यानी प्रीवीलेज हासिल है, इसलिए कोई आदमी या अधिकारी तो दूर न्यायिक संस्था से परोक्ष या अपरोक्ष रूप से जुड़ा व्यक्ति भी अदालत के फैसले पर टीका-टिप्पणी नहीं कर सकता। इसके बावजूद निचली अदालत से लेकर देश की सबसे बड़ी न्याय पंचायत तक, कई फ़ैसले ऐसे आ जाते हैं, जो आम आदमी को हज़म नहीं होते। वे फ़ैसले आम आदमी को बेचैन करते हैं। मसलन, किसी भ्रष्टाचारी का जोड़-तोड़ करके निर्दोष रिहा हो जाना या किसी ईमानदार का जेल चले जाना या कोई ऐसा फैसला जो अपेक्षित न हो।


चूंकि जज भी इंसान हैं और इंसान काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार जैसे पांच विकारों या अवगुणों के चलते कभी-कभार रास्ते से भटक सकता है। ऐसे में इंसान होने के नाते जजों से कभी-कभार गलती होना स्वाभाविक प्रक्रिया है। इस दलील पर एकाध स्वाभाविक गलतियां स्वीकार्य हैं, हालांकि उन गलतियों का दुरुस्तीकरण भी होना चाहिए, लेकिन कई फैसले ऐसे होते हैं, जिनमें प्रभाव, पक्षपात या भ्रष्टाचार की बहुत तेज़ गंध आती है। कोई बोले भले न, पर उसकी नज़र में फ़ैसला देने वाले जज का आचरण संदिग्ध ज़रूर हो जाता है। किसी न्यायाधीश का आचरण जनता की नज़र में संदिग्ध हो जाना, भारतीय न्याय-व्यवस्था की घनघोर असफलता है।

न्यायपालिका को अपने गिरेबान में झांक कर इस कमी को पूरा करना होगा, वरना धीरे-धीरे उसकी साख़ ही ख़त्म हो जाएगी, जैसे बलात्कार के आरोपी अखिलेश सरकार में मंत्री रहे गायत्री प्रजापति की ज़मानत मंजूर करके जिला एवं सत्र न्यायधीश जस्टिस ओपी मिश्रा ने न्यायपालिका की साख़ घटाई। दो साल पहले बॉम्बे हाई कोर्ट के जस्टिस अभय थिप्से ने अभिनेता सलमान ख़ान को हिट रन केस में कुछ घंटे के भीतर आनन-फानन में सुनवाई करके ज़मानत दे दिया और जेल जाने से बचा लिया था। इसी तरह कर्नाटक हाईकोर्ट के जस्टिस सीआर कुमारस्वामी ने महाभ्रष्टाचारी जे जयललिता को निर्दोष करार देकर फिर उसे मुख्यमंत्री बना दिया था। ऐसे फ़ैसले न्यायपालिका को ही कठघरे में खड़ा करते हैं।


हाल ही में दो बेहद चर्चित जज न्यायिक सेवा से रिटायर हुए। मई में गायत्री को बेल देने वाले जज ओपी मिश्रा ने अवकाश ग्रहण किया, जून में कलकत्ता हाईकोर्ट के जज जस्टिस सीएस कर्णन। कर्णन की चर्चा बाद में पहले जज ओपी मिश्रा का ज़िक्र। गायत्री पर एक महिला और उसकी नाबालिग बेटी से बलात्कार करने का आरोप था, इसके बावजूद जज मिश्रा ने ज़मानत दी। इलाहाबाद हाईकोर्ट की रिपोर्ट में पता चला है कि जज मिश्रा ने गायत्री से 10 करोड़ रुपए लेकर ज़मानत पर रिहा कर दिया था। करोड़ों रुपए डकारने के बावजूद जज मिश्रा और दूसरे रिटायर्ड जज आराम से सेवानिवृत्त जीवन जी रहे हैं।


दूसरी ओर जस्टिस कर्णन पर कभी भी भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगा, फिर भी वह जेल की हवा खा रहे हैं। यह भी गौर करने वाली बात है कि जस्टिस कर्णन दलित समुदाय के हैं और दुर्भाग्य से भारतीय न्यायपालिका में दलित और महिला समाज का रिप्रजेंटेशन नहीं के बराबर है। दलित या महिला समुदाय के किसी जज को हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट को जज बनाया गया यह विरला ही सुनने को मिलता है। फिर जस्टिस कर्णन ऐसे समय बिना गुनाह (इसे आगे बताया गया है) के जेल की हवा खा रहे हैं, जब किसी दलित व्यक्ति को देश का प्रथम नागरिक बनाकर सर्वोच्च सम्मान देने की होड़ मची है और दलित समाज के दो शीर्ष नेता रामनाथ कोविंद और मीरा कुमार राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ रहे हैं।

जस्टिस कर्णन को सजा देने का फैसला भी किसी एक जज ने नहीं किया, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के सात सीनियर मोस्ट जजों की संविधान पीठ ने किया है। संविधान पीठ ने जस्टिस कर्णन को सर्वोच्च न्यायिक संस्था की अवमानना का दोषी पाया और एकमत से सज़ा सुनाई। सुप्रीम कोर्ट के सात विद्वान जजों की पीठ के दिए इस फैसले की न तो आलोचना की जा सकती है और न ही उसे किसी दूसरे फोरम में चुनौती दी जा सकती है। इतना अवश्य कहा जा सकता है कि जस्टिस कर्णन प्रकरण बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। भारतीय न्याय-व्यवस्था में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ जब किसी सेवारत जज को जेल की सजा हुई हो।

जबसे जस्टिस कर्णन गिरफ़्तार करके जेल भेजे गए हैं। आम आदमी के मन में यह सवाल बुरी तरह गूंज रहा है कि आख़िर कर्णन का अपराध क्या है? क्या उन्होंने कोई संगीन अपराध किया? उत्तर - नहीं। क्या उन्होंने कोई ग़लत फ़ैसला दिया? उत्तर - नहीं। क्या उन्होंने किसी से पैसे लिए या कोई भ्रष्टाचार किया? उत्तर - नहीं। क्या उन्होंने कोई ऐसा आचरण किया जो किसी तरह के अपरोक्ष भ्रष्टाचार की ही श्रेणी में आता है? उत्तर - नहीं। मतलब न कोई अपराध किया, न ग़लत फ़ैसला दिया और न ही कोई भ्रष्टाचार किया, फिर भी हाईकोर्ट का जज जेल में है। लिहाजा, आम आदमी के मन में सवाल उठ रहा है कि फिर जस्टिस कर्णन जेल में क्यों हैं? उत्तर - उन्होंने कथित तौर पर कई भ्रष्ट जजों के नाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दे दिए थे।

दरअसल, जस्टिस कर्णन ने 23 जनवरी 2017 को पीएम मोदी को लिखे खत में सुप्रीम कोर्ट और मद्रास हाई कोर्ट के दर्जनों जजों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे। कर्णन ने अपनी चिट्ठी में 20 जजों के नाम लिखते हुए उनके खिलाफ जांच की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस कर्णन के इस आचरण को कोर्ट की अवमानना क़रार दिया और उन्हें अवमानना नोटिस जारी कर सात जजों की बेंच के सामने पेश होने का आदेश दिया। इसके बाद जस्टिस कर्णन और सुप्रीम कोर्ट के बीच जो कुछ हुआ या हो रहा है, उसका गवाह पूरा देश है। भारतीय न्याय-व्यवस्था में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ जब किसी कार्यरत जस्टिस को जेल की सज़ा हुई हो।

यह मामला सिर्फ़ एक व्यक्ति बनाम न्यायपालिका तक सीमित नहीं रहा। इस प्रकरण का विस्तार हो गया है और यह देश के लोकतंत्र के 80 करोड़ से ज़्यादा स्टैकहोल्डर्स यानी मतदाओं तक पहुंच गया है। देश का मतदाता मोटा-मोटी यही बात समझता है कि जेल में उसे होना चाहिए जिसने अपराध किया हो। जिसने कोई अपराध नहीं किया है, उसे जेल कोई भी नहीं भेज सकता। सुप्रीम कोर्ट भी नहीं। इस देश के लोग भ्रष्टाचार को लेकर बहुत संजीदा हैं, क्योंकि भ्रष्टाचार की बीमारी से हर आदमी परेशान है। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर देश के लोगों ने भ्रष्टाचार से लड़ने का दावा करने वाली एक नई नवेली पार्टी को सिर-आंखों पर बिठा लिया था।

बहरहाल, भारत का संविधान हर व्यक्ति को अपने ख़िलाफ़ हो रहे अन्याय, पक्षपात या अपने मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के खिलाफ़ बोलने की आज़ादी देता है। अगर कर्णन को लगा कि उनके साथ अन्याय और पक्षपात हो रहा है, तो उसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना उनका मौलिक अधिकार था। इतना ही नहीं, उन्होंने जजों के ख़िलाफ़ आरोप प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में लगाए थे। उस प्रधानमंत्री को जिसे देश के सवा सौ करोड़ जनता का प्रतिनिधि माना जाता है। लिहाज़ा, अवमानना नोटिस जारी करने से पहले जस्टिस कर्णन के आरोपों को सीरियली लिया जाना चाहिए था, उसमें दी गई जानकारी की निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए थी। उसके बाद अगर जस्टिस कर्णन गलत पाए जाते तो उनके ख़िलाफ़ ऐक्शन होना चाहिए था। दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ।

सुप्रीम कोर्ट देश की सबसे बड़ी अदालत है। लिहाज़ा, उसका ध्यान उन मुद्दों पर सबसे पहले होना चाहिए, जिसका असर समाज या देश पर सबसे ज़्यादा होता है। मसलन, देश की विभिन्न अदालतों में दशकों से करोड़ों की संख्या में विचाराधीन केसों का निपटान कैसे किया जाए, लेकिन ऐसा नहीं हैं। देश की सबसे बड़ी अदालत सबसे ज़्यादा शिथिल है। इसकी एक नहीं कई कई मिसालें हैं, जिनसे साबित किया जा सकता है कि सुप्रीम कोर्ट संवेदनशील केसेज़ को लेकर भी उतनी संवेदनशील नहीं है, जितना उसे होना चाहिए।


उदाहरण के रूप में दिसंबर 2012 के दिल्ली गैंगरेप केस को ले सकते हैं। जिस गैंगरेप से पूरा देश हिल गया था। सरकार ने जस्टिस जगदीश शरण वर्मा की अध्यक्षता में आयोग गठित किया। उन्होंने दिन रात एक करके रिपोर्ट पेश की। आनन-फानन में संसद का विशेष अधिवेशन बुलाया गया और अपराधिक क़ानून में बदलाव किए गए। उस केस की सुनवाई के लिए फॉस्टट्रैक कोर्ट गठित की गई जिसने महज 173 दिन यानी छह महीने से भी कम समय में सज़ा सुना दी थी और दिल्ली हाईकोर्ट ने भी केवल 180 दिन यानी छह महीने के अंदर फांसी की सज़ा पर मुहर लगा दी थी, लेकिन उसे सुप्रीम कोर्ट ने लटका दिया और उसे फैसला सुनाने में तीन साल (1145 दिन) से ज़्यादा का समय लग गया।

देश का आम आदमी हैरान होता है कि करोड़ों की संपत्ति बनाने वाली जयललिता को निचली अदालत के जज माइकल चून्हा ने 27 सितंबर 2014 को चार साल की सज़ा सुनाई, जिससे उन्हें सीएम की कुर्सी  छोड़नी पड़ी और जेल जाना पड़ा। उनका राजनीतिक जीवन ही ख़त्म हो गया। लेकिन आठ महीने बाद 11 मई 2015 को कर्नाटक हाईकोर्ट के कुमारस्वामी ने जया को निर्दोष करार दे दिया। वह फिर मुख्यमंत्री बन गई और जब मरी तो अंतिम संस्कार राजा की तरह हुआ। जबकि क़रीब दो साल बाद सुप्रीम कोर्ट को ही कुमारस्वामी का फ़ैसला रद्द करना पड़ा और जयललिता की सहयोगी शशिकला को जेल भेजना पड़ा। देश की सबसे बड़ी अदालत के न्यायाधीशों की नज़र में कुमारस्वामी का आचरण क्यों नहीं आया। अगर उन्होंने ग़लत फ़ैसला न सुनाया होता तो एक भ्रष्टाचारी महिला दोबारा सीएम न बन पाती और उसकी समाधि के लिए सरकारी ज़मीन न देनी पड़ती। इससे पता चलता है कि कुमारस्वामी ने कितना बड़ा अपराध किया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनको कोई नोटिस जारी नहीं किया। सबसे अहम कि कुमारस्वामी पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं।


इसी तरह हिट ऐंड रन केस में अभिनेता सलमान ख़ान को 7 मई 2015 को निचली अदालत ने सज़ा सुनाई। आम आदमी को ज़मानत लेने में महीनों और साल का समय लग जाता है, लेकिन बॉम्बे हाई कोर्ट के जस्टिस अभय थिप्से ने सलमान ख़ान को कुछ घंटों के भीतर बेल दे दी। इतना ही नहीं जब पूरा देश उम्मीद कर रहा था कि सलमान को शर्तिया सज़ा होगी, तब बॉम्बे हाईकोर्ट के जज जस्टिस एआर जोशी ने 10 दिसंबर 2015 को रिटायर होने से कुछ पहले दिए गए अपने फ़ैसले में सलमान को बरी कर दिया। इस फ़ैसले से सरकार ही नहीं देश का आम आदमी भी हैरान हुआ। साफ़ लगा कि अभिनेता ने न्यायपालिका को मैनेज कर लिया। जब जज ओपी मिश्रा रिश्वत ले सकते हैं तो हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट का जज भी रिश्वत ले सकता है, इस संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता। बहरहाल, सलमान को रिहा करने की राज्य सरकार की अपील अब दो साल से सुप्रीम कोर्ट के पास है। अगर सुप्रीम कोर्ट ने सलमान को सज़ा दे दी तो क्या जस्टिस एआर जोशी के ख़िलाफ कार्रवाई होगी, ज़ाहिर है नहीं, क्योंकि इस तरह की कोई व्यवस्था संविधान में नहीं हैं।

द टाइम्स ऑफ़ इंडिया के मुताबिक, 17 सितंबर 2010 को पूर्व क़ानून मंत्री और क़ानूनविद शाति भूषण ने सुप्रीम कोर्ट में एक अप्लीकेशन देकर कहा था, “एकाध नहीं, आठ-आठ मुख्य ऩ्यायाधीश भ्रष्टाचार में लिप्त पाए जा चुके हैं। अगर देश की सबसे बड़ी अदालत के पास हिम्मत है तो उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करें।” इतना ही नहीं मुख्य ऩ्यायधीश रहे जस्टिस जगदीश शरण वर्मा और जस्टिस आदर्श सेन आनंद पर तो भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे थे। देश के चर्चित खोजी पत्रकार विनीत नारायण ने अपनी वीडियो मैगज़ीन ‘कालचक्र’ ने जस्टिस आदर्श सेन आनंद पर ज़मीन घोटाले के आरोप लगाए थे। बदले में उन्हें बहुत ज़्यादा प्रताड़ित किया गया था। अपने ही लॉ-इंटर्न के यौन उत्पीड़न के आरोपों से घिरे सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस ए के गांगुली के ख़िलाफ़ क्या कार्रवाई हुई? सन् 2013 में कई महीने तक यह मामला सुर्खियों में रहा, लेकिन कुछ नहीं। गांगुली से केवल पश्चिम बंगाल मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष पद से इस्तीफा मांगा गया था।

बहरहाल, अगर भ्रष्टाचार से जुड़े मामले पर जस्टिस कर्णन ने पीएम को पत्र लिखा तो अवमानना नोटिस देने से पहले कर्णन के आरोपों की गंभीरता और तथ्यपरकता की जांच होनी चाहिए थी। जिन पर कर्णन ने आरोप लगाया, उनका बाल भी बांका नहीं हुआ और आरोप लगाने वाले कर्णन को उनके आरोप ग़लत साबित होने से पहले ही जेल भेज दिया गया। न्यायपालिका के भीतर रहते हुए कोई उसकी व्यवस्था पर प्रश्न नहीं उठा सकता और उसके बाहर होने पर भी आलोचना नहीं कर सकता। वह अवमानना का विषय बन जाएगा। यह तो निरंकुशता हुई, जिसका समाधान जल्द से जल्द खोजा जाना चाहिए। इतना ही नहीं न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार पर बहस करने का वक़्त आ गया है, ताकि इसमें लोगों की आस्था बनी रहे।


समाप्त

शनिवार, 29 अप्रैल 2017

कुलभूषण जाधव को क्या पहले ही फांसी पर लटका चुका है पाकिस्तान?

हरिगोविंद विश्वकर्मा
क्या भारतीय नौसेना के पूर्व अधिकारी कुलभूषण सुधीर जाधव का हश्र पाकिस्तान भारतीय नागरिक सरबजीत सिंह जैसा कर चुका है? यानी दुश्मन ने भारत के इस सपूत की अमानवीय और अलोकतांत्रिक ढंग से हत्या कर दी है। दरअसल, इस आशंका को इसलिए भी बढ़ावा मिल रहा है, क्योंकि कुलभूषण के बारे में भारत की ओर से अब तक 16 बार राजनयिक के ज़रिए जानकारी मांगी गई है, लेकिन पाकिस्तान लगातार इनकार कर रहा है और अब तक उनके बारे में कोई जानकारी नहीं दी है।

हाल ही में पाकिस्तान के अशांत सिंध प्रांत में कथित तौर पर भारतीय ख़ुफिया एजेंसी रॉ (रिसर्च ऐंड एनालिसिस) के लिए जासूसी के जुर्म में कुलभूषण को पाकिस्तान की सैन्य अदालत ने मौत की सजा सुनाई है। पाक सैन्य अदालत के फ़ैसले के बाद से दोनों देशों के रिश्तों में खटास सी आ गई है। भारत कुलभूषण के ख़िलाफ़ दायर किए गए आरोपपत्र की कॉपी मांग रहा है, लेकिन पाकिस्तान कोई भी जानकारी देने से साफ़ इनकार कर रहा है।


बहरहाल, अगर कुलभूषण की हत्या की आशंका सच है तो यह भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए अंतरराष्ट्रीय मंच पर बहुत बड़ी कूटनीतिक पराजय की तरह होगी। इसलिए प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री को कुलभूषण की सलामती के बारे में कठोर रुख अपनाकर फ़ौरन सही जानकारी देने की इस्लामाबाद सरकार से मांग करनी चाहिए। यह मानने में हर्ज नहीं कि कुलभूषण का मामला अब राजनयिक स्तर से बहुत ऊपर उठ चुका है।

भारतीय जनता पार्टी बिहार के आरा से लोकसभा सदस्य और मनमोहन सिंह के कार्यकाल में केंद्रीय गृह सचिव रहे राजकुमार सिंह (आरके सिंह) का भी मानना है कि संभवतः पाकिस्तानी सेना पहले ही कुलभूषण जाधव की हत्या कर चुकी है। इसीलिए अब इस्लामाबाद कथित तौर पर देश की राष्ट्रीय सुरक्षा और गोपनीयता का हवाला देकर पूर्व नेवी ऑफिसर के बारे में कोई भी जानकारी देने से इनकार कर रहा है।

सन् 2011 से 2013 के दौरान केंद्र में गृह सचिव रहे आरके सिंह का कहना है कि विदेशी नागरिकों को लेकर पाकिस्तान का ट्रैक रिकॉर्ड बहुत अमानवीय और भयानक रहा है। इसलिए भारत सरकार को इस मुद्दे को बहुत गंभीरता से लेनी चाहिए। पूर्व नौकरशाह ने कहा कि ऐसा लगता है कि गिरफ्तारी के बाद पाकिस्तानी सेना द्वारा कुलभूषण जाधव को बहुत ज़्यादा टॉर्चर किया गया, जिससे संभवतः उनकी मौत हो गई। कुलभूषण की मौत के बाद पाकिस्तानी सेना की अदालत ने उन्हें फांसी देने की सज़ा सुना दी, ताकि मामले की लीपापोती की जा सके।

बहरहाल, अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार क़ानून के जानकारों का भी मानना है कि पाकिस्तान जिस तरह से कुलभूषण जाधव के बारे में तथ्य छुपा रहा है और कोई भी सूचना देने से आनाकानी कर रहा है, वह गंभीर संदेह पैदा कर रहा है कि कहीं कुलभूषण के साथ अनहोनी हो तो नहीं चुकी है। कम से कम कोई देश किसी भी विदेशी जासूस के साथ ऐसा सलूक नहीं करता कि संबंधित देश को उसके बारे में कोई जानकारी ही न दी जाए।

भारत में लोग कुलभूषण की पाकिस्तान में पकड़े जाने की ख़बर आने के बाद से ही बहुत परेशान हैं। वॉट्सअप, फेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल नेटवर्किंग पर कुलभूषण को बचाने के लिए साल भर से मुहिम चल रही है और उन्हें किसी भी क़ीमत पर सकुशल देश में लाने की अपील प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से की जा रही है। दरअसल, लोग सरबजीत सिंह के बहाने देख चुके हैं कि जासूसी के आरोप में पड़ोसी दुश्मन देश में पकड़े जाने का क्या हश्र होता है।

दुनिया देख चुकी है कि पाकिस्तान के लाहौर की सेंट्रल जेल में सरबजीत को पीट पीटकर मार डाला गया था। सरबजीत के बारे में पाकिस्तान की बताई कहानी के अनुसार, 26 अप्रैल 2013 को तक़रीबन दोपहर के 4.30 बजे सेंट्रल जेल, लाहौर में कुछ कैदियों ने ईंट, लोहे की सलाखों और रॉड से सरबजीत पर हमला कर दिया था। नाजुक हालत में सरबजीत को लाहौर के जिन्ना अस्पताल में भर्ती करवाया गया। इलाज के दौरान वह कोमा में चले गए और 1 मई 2013 को जिन्ना हॉस्पिटल के डॉक्टरों  ने सरबजीत को ब्रेनडेड घोषित कर दिया।

केंद्रीय गृह राज्यमंत्री हंसराज अहीर ने कहा कि भारत सरकार को अपने किसी नागरिक के स्वास्थ्य के बारे में जानने का पूरा अधिकार है। अहीर के मुताबिक़, इस्लामाबाद आज भले ही कुलभूषण जाधव के बारे में कोई जानकारी नहीं दे रहा है, लेकिन एक न एक दिन उसे उनकी सलामती के बारे में भारत को बतानी ही पड़ेगी। भारत में लोगों का मानना है कि सरकार को अपनी पूरी ताकत झोंक देनी चाहिए ताकि कुलभूषण को सही सलामत वापस स्वदेश वापस लाया जा सके।

अमेरिका में रह रहे भारतीय-अमेरिकी समुदाय ने कुलभूषण जाधव को मौत की सजा से बचाने के लिए व्हाइट हाउस पिटीशन लॉन्च किया है। भारतीय-अमेरिकियों ने कुलभूषण की जान बचाने के लिए ट्रंप प्रशासन से दख़ल देने की मांग की है। व्हाइट हाउस की वेबसाइट पर ‘वी द पीपुल पिटीशन’ में कहा गया है कि जाधव के ख़िलाफ़ लगाए गए आरोप कि वह भारत के लिए जासूसी कर रहा था पूरी तरह से ग़लत और मनगढ़ंत हैं। ट्रंप प्रशासन इस पर कोई प्रतिक्रिया दे इसके लिए 14 मई तक इस पर एक लाख लोगों के हस्ताक्षर होने ज़रूरी हैं।

पाकिस्तान ने आरोप लगाया था कि कुलभूषण जाधव ईरान से इलियास हुसैन मुबारक़ पटेल के नक़ली नाम पर पाकिस्तान आया जाया करते थे। पाकिस्तान का कहना है कि 29 मार्च 2016 को उन्हें बलूचिस्तान से गिरफ़्तार किया गया। भारत सरकार का दावा है कि कुलभूषण का ईरान से अपहरण हुआ है। पाकिस्तान का दावा है कि कुलभूषण भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ के लिए काम करते हैं और बलूचिस्तान में विध्वंसक गतिविधियों में शामिल हैं। इसी आरोप के लिए 11 अप्रैल 2017 को पाकिस्तान के मिलिट्री कोर्ट ने कुलभूषण को मौत की सजा सुनाई, जिसका भारत सरकार व भारतीय जनता ने भारी विरोध किया।


सन् 1970 में महाराष्ट्र के सांगली में जन्मे कुलभूषण के पिता सुधीर जाधव मुंबई पुलिस में वरिष्ठ अधिकारी रहे हैं। कुलभूषण जाधव का बचपन दक्षिण मुंबई में गुजरा था। कुलभूषण को दोस्त भूषण कहकर बुलाते थे, जबकि उनसे छोटे उन्हें “भूषण दादा” कहते थे। फुटबॉल का शौकीन कुलभूषण ने 1987 में नेशनल डिफेन्स अकादमी में प्रवेश लिया तथा 1991 में भारतीय नौसेना में शामिल हुए। उसके बाद सेवा-निवृति के बाद ईरान में अपना व्यापार शुरू किया था। उसी सिलसिले में वह ईरान में थे, जहां से अपहृत करके उन्हें पाकिस्तान ले जाया गया था।

गुरुवार, 27 अप्रैल 2017

शहीद की बेटी

(कारगिल वॉर के समय लिखी मेरी कविता)

कब आओगे पापा?

पापा कब तुम आओगे
तुम्हारी बहुत याद आती है मुझे
अच्छा बाबा खिलौने मत लाना
मैं जिद नहीं करूंगी
नहीं तंग करूंगी तुम्हें
बस तुम आ जाओ
मम्मी हरदम रोती हैं
मांग में सिंदूर भी नहीं भरतीं
मंगल सूत्र निकाल दिया है उन्होंने
चूड़ियां भी तोड़ डाली हैं
सफेद साड़ी में लिपटी
बेडरूम में पड़ी
सिसकती रहती हैं
वह मुझसे बात भी नहीं करतीं
वह किसी से नहीं बोलतीं
घर पर रोज नए नए लोग आते हैं
बॉडी गार्ड वाले लोग आते हैं
चुप रहते हैं फिर चले जाते हैं
मम्मी उनसे भी बात नहीं करतीं
बस रोती रहती हैं
बिलखती रहती हैं
रात को नींद खुलने पर
उन्हें रोते ही देखती हूं
मम्मी के आंसू देखकर
मैं भी रोती हूं पापा
मुझे तुम बहुत याद आते हो
प्लीज पापा आ जाओ
मेरे लिए नहीं तो मम्मी के लिए ही
लेकिन तुम चले आओ
देखो तुम नहीं आओगे तो
मैं रूठ जाऊंगी
तुमसे बात नहीं करूंगी
कट्टी ले लूंगी
तुम कैसे हो गए हो पापा
क्या तुम्हें मेरी और मम्मी की सचमुच याद नहीं आती
तुम तो ऐसे कभी नहीं थे
अचानक तुम्हें क्या हो गया
तुम इतने बदल कैसे गए पापा
आज अखबारों में
तुम्हारी फोटो छपी है
लिखा है
तुम शहीद हो गए
देश के लिए
अपनी आहुति दे दी
यह शहीद और आहुति क्या है पापा
ड्राइंग रूम में
तुम्हारी वर्दी वाली जो फोटो टंगी है
उस पर फूलों की माला चढ़ा दी गई है
अगरबत्ती सुलगा दी गई है
मेरी तो कुछ समझ में ही नहीं आता
आज स्कूल की टीचर भी आईं थी
मेरे सिर पर हाथ फेर रही थीं
स्कूल में उन्होंने कभी इतना प्यार नहीं दिखाया
मम्मी भी फफक फफक कर रो रही थीं
मुझे भी रोना आ रहा था
सब लोग रो रहे थे
पापा तुम आ जाओ प्लीज
मुझे डर लगता है बहुत डर लगता है
मैं छुपना चाहती हूं पापा
बस तुम्हारे सीने में तुम्हारी गोदी में
ये देखो पापा
मेरे आंसू फिर गिरने लगे हैं
मैं रो रही हूं
सच्ची ये अपने आप गिर रहे हैं
मुझे तुम्हारी याद आने लगी है
बस तुम आ जाओ
आ जाओ न!
(इस कविता का पाठ मैंने 1999 में मोदी कला भारती सम्मान मिलने पर इंडियन मर्चेंट मैंबर के सभागृह में किया था, सबकी आंखें भर आईं थींं)

मंगलवार, 7 मार्च 2017

नारी

नारीक्या सचमुच चाहता है समाज
स्त्री-पुरुष को देखना समान
तो इसके लिए
कुछ नहीं करना
बस बेटी को बना होगा
उत्तराधिकारी परिवार का
सामाजिक रूप से ही नहीं
क़ानूनी तौर पर भी
चली आ रही है परंपरा
पता नहीं कितनी सदियों से
पुत्र को बनाने की उत्तराधिकारी
भेट चढ़ गई है स्त्री
उस पुरुष-प्रधान परंपरा की
बन गई है नागरिक
दोयम दर्जे की
अबला, पराया धन, बोझ
और पता नहीं क्या-क्या
कहा जाने लगा है स्त्री को
अगर करना है मुक्त
ग़ुलामी के एहसास से उसे
तो देना होगा उसे अधिकार
पिता की संपत्ति पाने का
बहुत ज़्यादा नहीं
केवल दस साल के लिए
हां, इन दस सालों
बेटा नहीं, केवल बेटी ही होगी
वारिस माता-पिता की
तब होगा नारी का
सही मायने में सशक्तिकरण
और वह पहुंच जाएगी
पुरुष के बराबर
बिना किसी आरक्षण के
मानिए यकीन
तब हो जाएंगी हल
अपने आप समाज की
सारी समस्याएं
क्योंकि अपने स्वभाव के चलते
नारी नहीं करेगी
पुरुष के साथ भेदभाव
जैसा कि पुरुष अब तक
करता रहा है नारी के साथ
हरिगोविंद विश्वकर्मा