सोमवार, 2 अप्रैल 2018

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मुंबई का गौरव - राजाबाई क्लॉक टॉवर

पहले समय देखने की घड़ी उतनी प्रचलन में नहीं थी। घड़ी वही लोग पहन पाते थे, जिनके पास उसे खरीदने की हैसियत होती थी। इसीलिए अंग्रेजों के शासनकाल में हर शहर में कम से कम एक क्लॉक टावर या घड़ी टॉवर या फिर घंटा घर बनाने की शानदार परंपरा शुरू हुई। व्रिटिश काल में ही सन् 1860 से 1890 के बीच कमोबेश हर शहर में क्लॉक टॉवर या घंटाघर बनाया गया। उस समय घड़ी टॉवर या घंटाघर शहर और कस्बे में समय को बताने में अभिन्न भूमिका निभाते थे। सबसे अहम आज पुराने घड़ी टॉवर शहर के प्रमुख लैंडमार्क में तब्दील हो गए हैं।

करीब दो सदी पहले मुंबई में भी लोगों को सही समय क्या है, इसे जानने में बहुत असुविधा होती थी। इसीलिए मुंबई में घंटाघर यानी क्लॉक टॉवर बनाने के कवायद 18 वीं सदी के साठ के दशक में शुरू हुई। सबसे पहले सोचा जाने लगा कि इसे बनाया कहां जाए। चूंकि अध्ययन के दृष्टि से मुंबई विश्वविद्यालय का पोर्ट कैंपस (तब कालीना कैंपस नहीं था) अहम केंद्र था, लिहाज़ा, विश्वविद्यालय परिसर में काउंसिल क्षेत्र में ही क्लॉक टॉवर बनाने की फैसला किया गया।

अपने अंदर एक लंबा इतिहास समेटे राजाबाई क्लॉक टॉवर आज भी मुंबई विश्वविद्यालय परिसर में शान से खड़ा है। ब्रिटिश वास्तुकार सर गिलबर्ट स्कॉट ने इसकी डिजाइनिंग की। राजाबाई क्लॉक टावर लंदन के बिग बेन की प्रतिकृति है। इसके निर्माण की पहली ईंट 1 मार्च 1869 में रखी गई और नवंबर 1878 में यह पूरा हो गया। इसका ग्राउंड फ्लोर पर 17 मीटर बाई 8.5 मीटर के दो साइड रूम हैं। इसकी ऊचाई को चार चरण विभाजित किया गया है। इसकी ऊंचाई लगभग 29 मंजिली इमारत के बराबर है। बहुमंजिली इमारतों के दौर में यह ऊचाई भले कम लगे, लेकिन कभी इतना ऊंचा निर्माण असंभ कार्य माना जाता था।

टॉवर की वास्तुकला विनीशियन और गॉथिक शैलियों का संगम है। यह स्थानीय स्तर पर उपलब्ध बफर रंगीन कुर्ला पत्थर से बनाया गया है। उस समय इसके निर्माण पर पांच लाख 50 हजार रुपए खर्च हुए थे। उस समय यह बहुत बड़ी राशि थी। दरअसल, बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज के संस्थापक प्रेमचंद रायचंद ने राजाबाई क्लॉक टावर बनाने के लिए एक मोटी धनराशि आर्थिक सहायता के रूप में दी थी। इसीलिए क्लॉक टॉवर का नाम रॉयचंद की मां राजाबाई के नाम पर राजाबाई कलॉक टॉवर रखा गया।

दरअसल, प्रेमचंद रॉयचंद की मां राजाबाई नेत्रहीन थीं। वह जैन धर्म की कट्टर अनुयायी थीं और अपना रात का खाना सूर्यास्त से पहले खा लेती थीं। इस टॉवर के बन जाने के बाद उसमें लगी घड़ी की शाम की घंटी राजाबाई की समय जानने में बड़ी मदद करने लगी। बीच में दर्दीले फिल्मी गीतों की परंपरा शुरू होने पर असफल प्रेमी टॉवर की इस्तेमाल खुदकुशी करने के लिए करने लगे। इसलिए इसे जनता के लिए बंद कर दिया गया।  

जनवरी 2012 में इस ऐतिहासिक की इमारत को संरक्षित करने के लिए टाटा कंसल्टिंग सर्विस ने राजाबाई क्लॉक टॉवर और विश्वविद्यालय लाइब्रेरी की इमारत की मरम्मत इंडियन हेरिटेज सोसाइटी के साथ मिलकर की। बड़ी चुनौतियों में से एक यह थी कि उस घड़ी टावर के संवेदनशील पुनःनिर्माण कार्य तथा मरम्मत कार्य को अंजाम देना जो कि 87 मीटर की ऊंचाई पर चल रही है। बहरहाल मरम्मत कार्य पर कुल 4 करोड़ 20 लाख रुपये का खर्च आया। मुंबई यूनिवर्सिटी को यह धनराशि टीसीएस ने आर्थिक सहायता के रूप में दी। मरम्मत का काम विशेषज्ञ श्रमिकों एवं विशेषज्ञों द्वारा किया गया। जो परिणाम आखिरकार मिला वो एक भव्य भवन का हैजिसकी भव्यता फिर से लौटा दी गई है। ऐसे समय जब मुंबई शहर में अनेक धरोहरें देखभाल के अभाव में खंडहर में तब्दील होते जा रहे हैं। तब राजाबाई टॉवर का उसी शान-शौकत से खड़े रहकर मुंबई का गौरव बढ़ाना महत्वपूर्ण है। वैसे तो मुंबई विश्वविद्यालय भवन को भी गिलबर्ट स्कॉट ने इसका डिजाइन तैयार किया है और यह 15वीं शताब्दी का इटेलियन भवन जैसा दिखता है। लेकिन राजाबाई टॉवर ने उसकी सुंदरता में चार चांद लगा दिया है।
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