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बुधवार, 17 जून 2015

सखी: स्त्री की कोमल भावनाओं का सफर

हरिगोविंद विश्वकर्मा

'सखी' : स्त्री की कोमल भावनाओं का सफर


कहा जाता है कि संगीत वह खजाना है जहां इंसान को भावनात्मक संतुष्टि मिलती है। तभी तो जब कभी कोई ख़ूबसूरत गाना हमारे कर्ण-पटल से टकराता है तो सब कुछ थम-सा जाता है और हम उस गीत में खो से जाते हैं। आंखें बंद करके उस गीत को अपने अंदर समाने देते हैं। नवोदित गायिका-गीतकार-संगीतकार रिमि बसु सिन्हा की 'सखी' एक ऐसी ही पेशकश है। एलबम में कुल नौ भावना-प्रधान गीत समाहित हैं। सभी गीतों के बोल जितने खूबसूरत हैं, गायिकाओं ने अंतरमन की छूने वाली आवाज़ से उसी तरह सराबोर किया।
सही मायने में अगर इस एलबम को उपन्यास कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। इसकी परिकल्पना, लेखन और संगीत रिमि ने ख़ुद तैयार किया है। यह अनोखा प्रयास नारीत्व को ख़ास तरीक़े से सेलिब्रेट करने की कोशिश है और नारी-रचनाधर्मिता का उत्सव भी। यह केवल स्त्रियों के जरिए ही मूर्त रूप देने का कॉन्सेप्ट है। भारतीय संगीत-जगत में इस तरह की यह पहली कोशिश है। इसमें शामिल हर गाने स्त्री की ही सोच हैं, स्त्री के ही अल्फ़ाज़ हैं और स्त्री द्वारा ही सुर में पिरोये गए हैं। चार पीढ़ी की नामचीन और समर्थ नायिकाओं ऊषा मंगेशकर, कविता कृष्णमूर्ति, केएस चित्रा, सुनिधि चौहान, रिचा शर्मा, महालक्ष्मी अय्यर, ऐश्वर्या मजुमदार और खुद रिमि बसु सिन्हा ने इन भावना-प्रधान कर्णप्रिय नग़मों को अपनी जादुई आवाज़ से सराबोर किया हैं।
मसलन, इस मनोहारी संगीत के सफ़र का आग़ाज़ ‘सुन सखी...’ गीत से होता है। इसमें स्त्री ने बताने की कोशिश की है कि वो कितना कुछ कहना चाहती है, सुनना और बांटना चाहती है। तभी तो ईश्वर ने उसे भावना-प्रधान बनाया है और ये कोमल भावनाएं सबको जोड़कर रखती हैं। चित्रा की गायिकी और भाव में सच्ची सखी दिख ही जाती है। अगला पड़ाव ‘दिम तान ना...’ गीत है जिसमें स्त्री आशा का दूत के किरदार में है। वह हर तरफ़ ख़ुशी और उल्लास फैलाना चाहती है। ताकि दुनिया के हर कोने से मोहब्बत की धुन सुनाई पड़े। सुनिधि की सम्मोहित करने वाली आवाज़ इस गीत के साथ हमें उसी दुनिया में ले जाती है।
रिमि बसु सिन्हा
रिमि बसु सिन्हा
इस सुहाने सफ़र का तीसरे ठहराव पर ‘दिल के अरमानों की बात...’ है जिसमें स्त्री के बचपन से तरुणाई तक का अंतरद्वंद्व है। दरअसल, कभी-कभी कितना वक़्त गुज़र जाता है ,स्त्री कितनी चाहत बटोर के रखती है, कितना कुछ करना  चाहती है मगर उलझनों की बेड़ियों से मुक्त नहीं हो पाती। उसके अरमान जस के तस रह जाते हैं। वक्त बहुत पीछे छूट जाता है। खुद को खोजने वाले इस गाने को बेहद ही अलग तरह से तैयार किया गया है। अलग तरीके का इस्तेमाल इसलिए किया गया है क्योंकि यह आमतौर पर बहुत कम प्रयोग किया जाने वाले नौ मात्रे के ठेके राग अहीर भैरव पर आधारित है। इस गीत को कविता कृष्णमूर्ति की खनकती आवाज़ ने यादगार बना दिया है।
सफ़र के अगर चौथे गीत ‘नैना जागे...’ की बात करें तो सूफ़ियाना अंदाज़ में पिरोए गए इस नग़मे में स्त्री के सुंदर नयन अपने प्रेरणास्वरूप इष्ट की बात करते हैं। संगीत के कद्रदान बस अपनी आंखें बंद करें और गायिका रिचा के साथ स्त्री के हसीन नयनों की महत्ता, बंद-खुले नयन के सौंदर्य का ख़ूबसूरत दीदार करें। संगीतमय सफ़र का अगला गाना ‘कुछ ना सामझ पाए...’ स्त्री के कमसिन मन की दुविधा, नासमझी, नादानी और भावनाओं के तानेबाने को उकेरता है। नए रिश्ते तलाशती स्त्री का अल्हड़पन में किसी से रिश्ता जुड़ जाना बेहद सहज है। यही थीम है इस संवेदना से छलकते गाने की जो राग खमाज पर आधारित है। महालक्ष्मी की जादुई आवाज़ ने तो इसमें चार चांद लगा दिया है।
अगले मुकाम गीत ‘बोले क्या...’ पर संगीतप्रेमी स्त्री के श्रृंगार पक्ष से रूबरू होते हैं। स्त्री और श्रृंगार एक दूसरे के पूरक हैं। मगर भावनाओं के साथ श्रृंगार का अर्थ भी बदलता रहता है। किसी अपने के लिए श्रृंगार करने में अधिक आनंद आता है। संबंधों के खोने या छूटने से मन तड़पता है, आत्मसम्मान के टूटने से डर लगता है। इसी भावना को संगीतमय बनाया है ऊषा मंगेशकर की सुरीली आवाज़ ने।
अगले गीत का शीर्षक है ‘जो ज़िंदगी की जंग हार रहा है...’ दरअसल, जीवन में गाहे-बगाहे कुछ ऐसी घटनाएं हो जाती है जो विचलित कर देती है। इस गीत में बालिका के रूप में स्त्री ख़ुद कुछ सवाल करती है अपने सपने का साकार करने की बात करती है। बालिका की भावनाओं को अभिव्यक्ति दी है बाल गायिका ऐश्वर्या ने संगीत के सफ़र का आठवें पायदान पर है ‘मेरे मन का पंछी...’ यह स्त्री की प्रेरणा को अभिव्यक्ति देता है। हिंदुस्तानी राग भीम पलासी पर आधारित यह इस गीत को ख़ुस रिमि की मीठी आवाज ने इतना ख़ूबसूरत बना दिया है कि बार बार सुनने का मन करता है। एलबम को अंजाम तक पहुंचाया है ‘नए सपने...’ ने। न जाने कितने बरस का बहुप्रतीक्षित सपना जब साकार होता है तो स्त्री कितनी आत्मविभोर हो जाती है। यह गाना सुनकर पता चलता है। यह गीत सभी गायिकाओं से सम्मिलित स्वर में तैयार किया गया है।
सांस्कृतिक नगरी इलाहाबाद के अति-प्रतिष्ठित बंगाली परिवार में जन्मी रिमि संगीत और नाटक के माहौल में ही पली-बढ़ी। आठ साल की कोमल उम्र से ही संगीत सिखना शुरू किया और जल्द ही शहर के सांस्कृतिक समारोहों का हिस्सा बन गईं। शहर ही नहीं राज्य के अनगिनत संगीत जलसों में स्कूल का प्रतिनिधित्व किया और कई पुरस्कार जीते। 15 साल की उम्र में आकाशवाणी कलाकार बन गईं। फ़िलहाल, वह आकाशवाणी और दूरदर्शन की शीर्ष कलाकारों की फ़ेहरिस्त में हैं।
हिंदुस्तानी संगीत रिमि का हमेशा से पैशन-सा रहा है। इसीलिए दसवीं में इसे एक विषय के रूप में लिया। नामचीन संगीतकार स्वर्गीय बीएन बिस्वास से संगीत की बारीकियां सीखीं। गायन-संगीत में उनकी दीवानगी देखकर उनके माता-पिता ने उन्हें स्नातक में भी संगीत लेने के लिए प्रोत्साहित किया। यही वजह रही कि रिमि ने गुरु पं. रामाश्रय झा और कमला बोस के मार्गदर्शन में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदुस्तानी संगीत में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय सांस्कृतिक प्रतियोगिता में सर्वश्रेष्ठ गायिका का पुरस्कार भी जीता। वह प्रयाग संगीत समिति इलाहाबाद से संगीत प्रभाकर और सीनियर डिप्लोमा भी हासिल करने में सफल रहीं।
1992 में दिल्ली में शिफ़्ट होने के बाद रिमि टीवी सीरियल्स और फ़िल्मी दुनिया में सक्रिय हो गईं। कई मशहूर ब्रैंड के लिए खनकती आवाज़ में अनेक भाषाओं में कई टाइटल ट्रैक्स, गाने और जिंगल्स रिकॉर्ड कराए और सीरियल्स, शॉर्ट फ़िल्म्स, डॉक्यूमेंटरी के लिए टाइटल गानों को स्वर दिया। वॉइस-ओवर शुरू से उनकी हॉबी रही और डिस्कवरी चैनल्स और कई सरकारी परियोजनाओं के नामचीन वृत्तचित्रों में अपनी आवाज़ से चार चांद लगाया। इसके अलावा वह कई मशहूर म्यूज़िकल शोज़ में हिस्सा लेने लगीं।
1999 में एचएमवी ने रिमि की आवाज़ को अपने नए भोजपुरी प्रॉजेक्ट के लिए चुना जिसे बेहद लंबे इंतज़ार के बाद लॉन्च किया गया। बहरहाल, ‘जाने हमरी बिंदिया’ टाइटल वाला सोलो-एलबम बेहद लोकप्रिय हुआ और राष्ट्रीय स्तर पर कवरेज मिली। नतीजतन एचएमवी ने अगले प्रॉजेक्ट में उन्हें साइन करने में रुचि दिखाई मगर पति की कीनिया की राजधानी नैरोबी में पोस्टिंग हो जाने से उन्हें देश से बाहर जाना पड़ा।
रिमि 2000 में नैरोबी गईं और चार साल तक वहां रहीं। कहते हैं चांद जहां भी रहेगा अपनी चांदनी तो बिखेरेगा ही। रिमि नैरोबी की संगीत दुनिया में भी सक्रिय हो गईं। वहां हिंदुस्तानी संगीत और सांस्कृतिक समारोह का बढ़ावा दिया और कई कद्रदान बनाए। जल्द ही इस अफ्रीकी शहर के संगीत फ़लक पर अपने लिए अहम मुकाम बना लिया। नैरोबी लोकल एफ़एम चैनल की बेहद जानी-पहचानी उदघोषिका बन गईं। गणतंत्र दिवस, गांधी जयंती जैसे राष्ट्रीय पर्वों पर भारतीय दूतावास की ओर से हिंदी भाषा में आयोजित स्टेज शोज़ और लाइव रेडियो प्रोग्रोम्स प्रस्तुत किए और उनका निर्देशन किया। वहां रिमी ने संगीत ही नहीं हिंदी में अपनी ज़बरदस्त रचनाशीलता का लोहा मनवाया। वसंत उत्सव और महिषासुर मर्दिनी जैसे प्रोग्राम्स की रूपरेखा बनाई, उन्हें लिखा और निर्देशन करते हुए सफलतापूर्वक पेश भी किया जिसे भारतीय दूतावास ने प्रायोजित किया। वहां रिमि ने लाइव प्रोग्राम्स पेश करने का नया ट्रेंड भी सेट किया। होली, रामनवमी, वैसाखी, महावीर जयंती, रमज़ान आदि के मौक़े पर पेश किए जाने वाले गीत के साथ ख़ूबसूरत काव्यमय स्क्रिप्ट और शेरो-शायरी जोड़कर उसमें जादू भर दिया। कुल मिलाकर उन्होंने विदेश में भारत की समृद्ध धर्मनिरपेक्ष परंपरा को आगे बढ़ाया जिसे समूचे अफ्रीका में एशियाई समुदाय के लोगों ने सराहा। रिमि ने भारतीय दूतावास की ओर से संगीत मर्मज्ञ पं. जसराज का मैराथन इंटरव्यू लिया जो नैरोबी के लोकप्रिय लोकल रेडियो पर प्रसारित भी हुआ। इसके अलावा वह कीनिया की चिन्माया मिशन सेवा ट्रस्ट से जुड़ीं और नैरोबी में अंतरराष्ट्रीय समागम पर उनका एलबम ‘भक्ति’ कंपोज़ किया जिसकी मांग जो आज भी उसी तरह है।
कीनिया में भारतीय संस्कृति और संगीत को बढ़ावा देने के अभियान में रिमि के अद्भुत योगदान को देखते हुए ही भारतीय दूतावास ने उन्हें गांधी जयंती पर संयुक्त राष्ट्रसंघ के नैरोबी स्थित अफ्रीकी मुख्यालय में संगीत उत्सव आयोजित करने की दावत दी जो बेहद सफल रहा। किसी प्रवासी का यह दुर्लभ करतब है जिसके चलते कीनिया में भारतीय दूतावास की ओर से रिमि का सम्मान किया गया। बेशक, रिमि की विविधता ही उनकी ख़ासियत है। ‘सखी’ से पहले टाइम्स म्यूज़िक ने कुमार शानू के साथ एलबम ‘मैया का दरबार’ रिलीज़ किया। फ़िलहाल रिमी मुंबई में हैं और देश की आर्थिक राजधानी में अपनी गायन और कॉम्पोज़िशन क्षमता के बल पर ख़ुद को पूर्ण संगीतकार के रूप स्थापित करने के लिए प्रयासरत हैं।
लेखक हरिगोविंद विश्वकर्मा फोकस टीवी, हमार टीवी के मुंबई ब्यूरो के चीफ हैं. 

मंगलवार, 9 जून 2015

व्यंग्य - मेरे देश के कुत्ते..... मेरे देश के कुत्ते !!!


हरिगोविंद विश्‍वकर्मा
सुबह-सबेरे घर से बाहर निकलकर मैं सड़क पर आया। स्टेशन तक पैदल जाने के मूड में था। उसी समय भौंकते कुत्तों का एक समूह मुझ पर टूट पड़ा। एक बार तो मैं तो बुरी तरह डर गया, क्योंकि इधर मुझे लगने लगे कि कुत्ते भी आदमी की तरह हो गए हैं। एकदम ख़ुदगर्ज़। सेल्फ़-ओरिएंटेड। उनमें इंसानियत, नहीं-नहीं, कुत्तियत नाम की चीज़ नहीं रह गई है। कहीं मुझे काट न लें। जिन कुत्तों में कुत्तियत नहीं उनका कोई भरोसा नहीं।

दरअसल, न्यूज़ चैनल में नौकरी के अंतिम दिनों में अल-सुबह की ड्यूटी लगा दी गई। पता नहीं, अनजाने में या अंतिम दो तीन दिन परेशान करने के लिए। जब ड्यूटी चार्ट बन गया तो दफ़्तर जाना ही था। जब सब सो रहे थे, तब उठना अच्छा बिलकुल नहीं लगा। मगर, मजबूरी थी। ना, नहीं कर सकता था। बहरहाल, इसी बहाने सुबह-सबेरे लंबे समय बाद ग्रामसिंहों से मुलाक़ात हो गई। लेकिन सारे ग्रामसिंह पाकिस्तान-मोड पर थे। यानी अपनी जगह से मुंह से ही मुझ पर गोली दाग़ रहे थे। यह अलग बात थी कि उनके भौंकने से मैं घायल नहीं हुआ।

-क्या है? मैंने ज़ोर से डांटा। कहीं सुना था, इंसान के चिल्लाने से अमूमन जानवर घबरा जाते हैं। अपनी आक्रामकता छोड़कर एकदम डिफ़ेंस पर आ जाते हैं।

मेरे डांटने का भौंक रहे एक कुत्ते पर अच्छा असर हुआ। शायद वह बहुत पहले एक बार मुझसे सुबह की ड्यूटी के दौरान मिल चुका था। मैंने तो नहीं, उसने ज़रूर मुझे पहचान लिया। वह फ़ौरन चुप हो गया। दुम हिलाता हुआ मेरी ओर लपका। मैं समझ गया, यह दुम हिला रहा है, यानी शांतिप्रिय है। शांतिप्रिय देश की तरह आक्रमण करने की इसमें हिम्मत इसमें नहीं है। लिहाज़ा, यह मुझसे फ्रेंडशिप करना चाहता है। कहने का मतलब इस कुत्ते ने मुझे ताक़तवर मान लिया।

-क्या है? दूर रहो! दूर रहो! मैं उस पर रहम दिखाने के मूड में नहीं था। लिहाज़ा, दोबारा डांट पिलाई। कुत्ते ने इसके बाद तो पूरी तरह से सरेंडर कर दिया। मेरा नेतृत्व स्वीकार कर लिया। उसकी नज़र लगातार मुझ पर थी। उसने मेरे चेहरे से ग़ायब होती आक्रामकता पढ़ ली। लिहाज़ा, लपक कर मेरे चरणों में आ गिरा। मेरे जूते चाटने लगा। मैंने सोचा, चलो यह तो मेरा चमचा बन गया। कोई बात नहीं। आम आदमी की तरह मुझे भी चमचे अच्छे लगते हैं। हां, चमचागिरी दूर से ही करें तब।

बहरहाल, उस कुत्ते की देखा-देखी बाक़ी कुत्ते भी मेरी शरण में आने लगे। किसी नेता-अफ़सर की तरह मेरे चमचों की संख्या बढ़ने लगी। कोई भी कुत्ता भौंक नहीं रहा था। यानी सबने सामूहिक रूप से मेरी प्रभुता स्वीकार कर ली थी। कुल नौ कुत्ते थे। नौ रत्न। सबने मुझे कमांडो की तरह घेर लिया। दो आगे, दो पीछे, दो दाएं और दो बाएं। नौवां कुत्ता बहुत आगे था। शायद मेरे लिए सेफ पैसेज़ बना रहा था। मैं किसी नेता की तरह कमांडोज़ के बीच निर्भय होकर पैदल रेलवे स्टेशन चला जा रहा था। अचानक सबसे आगे वाले कुत्ते का एनकाउंटर दूसरे मोहल्ले के कुत्तों से हो गया। उसने फ़ौरन यू-टर्न लिया और दुम दबाकर मेरी ओर लपका।

-क्या है? मैंने और ज़ोर से दूसरे मोहल्ले के कुत्तों को डांटा। मेरे सम्मान में सबके सब चुप हो गए। उन्होंने आपस में भी एक दूसरे पर भौंकना बंद कर दिया। मैं उस समय हैरान रह गया, जब देखा कि कुत्ते आपस में फुसफुसाकर कुछ कह रहे हैं। यानी कुत्तों ने आपस की सदियों पुरानी परंपरागत दुश्मनी छोड़ दी। कमाल है! इस बीच, मेरे मोहल्ले के कुत्तों ने मेरी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी दूसरे मोहल्ले के कुत्तों को सौंप दी और वे एक दूसरे को उचित स्थान पर सूंघकर वापस लौट गए। मैं आगे बढ़ता रहा। मेरी सुरक्षा अब दूसरे मोहल्ले के कुत्ते कर रहे थे। उसी तरह नौ रत्न। चारों ओर दो-दो कुत्ते। एक कुत्ता सबसे आगे था।

मेरे पदयात्रा की ख़बर जंगल के आग की तरह मुझसे पहले ही तीसरे मोहल्ले में पहुंच गई। वहां आदमियों में तो नहीं कुत्तों में ज़रूर हड़कंप मच गया। उनमें भौंका-भौंकी होने लगी। दो कुत्ते स्कॉटिंग कर रहे कुत्ते के पीछे दौड़े आ रहे थे। मैंने फिर बहुत ज़ोर से डांटा -क्या है? मैनर नाम की चीज़ नहीं है तुम कुत्तों में। कब तक लड़ोगे आपस में। मेरी बात मानो, मलाई खाना हो तो दुश्मनी भुला दो। एक हो जाओ। फ़ायदे में रहोगो। किसी सरकार की कृपादृष्टि मिल गई तो पीढ़ियां संवर जाएंगी।

मेरी बात का तीसरे मोहल्ले के कुत्तों पर भी ख़ासा असर हुआ। सब दुम हिलाते हुए मेरी शरण में आ गए। दोनों मोहल्ले के कुत्ते एक दूसरे को सूंघने लगे। इस कार्यक्रम के पूरा होने पर दूसरे मोहल्ले के कुत्ते भी स्वमोहल्ला वापस लौट गए। अब मैं तीसरे मोहल्ले के कुत्तों के संरक्षण में था। मोहल्ले के नौ कुत्ते मेरा बॉडीगार्ड बनने पर गौरवान्वित महसूस कर रहे थे। फूले नहीं समा रहे थे। मैं उऩकी सुरक्षा में आराम से स्टेशन की ओर चला जा रहा था।

अचानक मैंने स्टेशन के पास के मोहल्ले के कुत्तों के जागरण की आवाज़ सुनी। फिर मुझे सुखद आश्चर्य यह हुआ कि यहां भी कुत्ते एक दूसरे से लड़ नहीं रहे हैं, बल्कि प्यार का प्रदर्शन कर रहे हैं। एक दूसरे को सूंघ रहे हैं। स्टेशन के कुत्तों ने तीसरे मोहल्ले के कुत्तों को प्रेम के साथ विदा किया और मेरी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली।

अंततः इन सभी कुत्तों ने मुझे सकुशल रेलवे स्टेशन पर पहुंचा दिया। सभी कुत्ते मुझे प्लेटफ़ॉर्म तक छोड़कर वापस लौट गए। बस एक कुत्ता मेरी हिफ़ाज़त में प्लेटफ़ॉर्म पर ही खड़ा रहा। वह मेरे ट्रेन में सवार होने के बाद ही वापस लौटा।

ट्रेन में मुझे सीट मिल गई। बैठकर मैं कुत्तों के बारे में ही सोच रहा था। इतने ढेर सारे कुत्ते मेरी हिफ़ाज़त कर रहे थे। मैं कुत्तों का निर्विवाद नेता बन गया था। अचानक मेरे मन में ख़याल आया कि मुझे शांति का नोबेल पुरस्कार मिलना चाहिए। चार-चार मोहल्ले के कुत्तों के बीच शांति, प्रेम और भाई-चारा स्थापित करने के लिए। मेरे कारण कुत्तों ने अपनी परंपरागत दुश्मनी छोड़ दी। यानी मैं इंसानों में इंसानियत भले न जगा पाया होऊं परंतु कुत्तों में कुत्तियत ज़रूर जगा दिया। कुत्ते मेरे साथी बन गए। मैंने सुबह ड्यूटी लगाने के लिए सीनियर को धन्यवाद दिया। उन्होंने मुझे यह अहसास दिलाया कि मैं भी पदयात्रा करने वाला शांति की पूजारी हूं। कुत्तों का नेता हूं।

सोमवार, 8 जून 2015

मुंबई हिंदी पत्रकार संघः एक सुखद संयोग....

हरिगोविंद विश्वकर्मा
प्रस्तावित हिंदी पत्रकार संघ के गठन की प्रक्रिया चल रही है. इस संदर्भ में नब्बे के आरंभ के दशक की पत्रकारिता का ज़िक्र समीचीन होगा. तब मौजूदा प्रस्तावित हिंदी पत्रकार संघ के ज़्यादातर लोग कॉलेज में रहे होंगे. अस्सी के दशक के अंत और नब्बे के दशक के आरंभ में टेब्लायड सांध्य अखबारों का दौर शुरू हुआ. अश्विनी कुमार मिश्र का “निर्भय पथिक” पहला सांध्य दैनिक था. आदरणीय डॉ. राममनोहर त्रिपाठी अपने संपादन में “दो बजे दोपहर” अख़बार लेकर आए. “जनसत्ता” का “संझा जनसत्ता” (स्थानीय संपादक राहुल देव, प्रभारी सतीश पेंडणेकर) शुरू हुआ. निखिल वागले का “आपलं महानगर” और “हमारा महानगर” (संपादक, अनुराग चतुर्वेदी) आरंभ हुआ. शिवसेना भी पीछे नहीं रही. संजय निरुपम के संपादन में सांध्य दैनिक “दोपहर का सामना” शुरू हुआ. अचानक से शहर में हिंदी पत्रकारों का तादाद बहुत ज़्यादा बढ़ गई.

मैंने भी उस समय बस पत्रकारिता शुरू ही की थी. बहरहाल, नब्बे के दशक में अचानक शहर के क़रीब-क़रीब सभी हिंदी के पत्रकारों को लगा कि हर भाषा के पत्रकारों का संगठन है, लेकिन हिंदी पत्रकारों का कोई संघ नहीं है. तब मुंबई में अंग्रज़ी के लिए अंग्रेज़ी डॉमिनेटेड मुंबई प्रेस क्लब, मराठी के लिए मराठी पत्रकार संघ, गुजराती के लिए गुजराती पत्रकार संघ और उर्दू के लिए उर्दू पत्रकार संघ जैसे पत्रकारों के भाषाई फ़ोरम हैं लेकिन हिंदी पत्रकार संघ नहीं है. इसीलिए हिंदी पत्रकारों का एक संगठन खड़ा करने की मुहिम शुरू हुई.

बहरहाल, राहुल देव (जनसत्ता के स्थानीय संपादक) और विश्वनाथ सचदेव (नवभारत टाइम्स के स्थानीय संपादक) की अप्रत्यक्ष पहल पर मुंबई हिंदी पत्रकार संघ बनाने की कवायद शुरू हुई. बॉम्बे यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट (बीयूजे) में कई मीटिंग्स वगैरह हुईं. अंततः मुंबई हिंदी पत्रकार संघ अस्तित्व में आ गया. उसके लिए बीयूजे में विधिवत लोकतांत्रिक तरीक़े से चुनाव हुआ, जिसमें बतौर मतदाता मैंने भी वोट दिया. चुनाव में द्विजेंद्र तिवारी (जनसत्ता) अध्यक्ष और हरीश पाठक महासचिव (धर्मयुग, तब विश्वनाश सचदेव धर्मयुग के संपादक थे और उसे बंद करवाने तक संपादक वही रहे) निर्वाचित हुए.

उन दिनों मुलायम सिंह यादव पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे. वह मुंबई आए और उनके सम्मान में मुंबई हिंदी पत्रकार संघ ने इंडियन मर्चेंट चैंबर्स में एक कार्यक्रम किया. मुलायम सिंह ने उस कार्यक्रम में मुंबई हिंदी पत्रकार संघ को आर्थिक मदद के रूप में पांच लाख रुपए का चेक दिया. उस समय अयोध्या में कारसेवकों पर गोली चलवाने, उत्तराखंड की आंदोलनकारी महिलाओं से कथित बलात्कार और दैनिक जागरण अख़बार के ख़िलाफ़ समाजवादी पार्टी का हल्लाबोल आंदोलन के कारण मुलायम सिंह यादव की छवि इंडियन मीडिया में ठीक नहीं थी. लिहाज़ा, उनसे पैसे लेने पर मुंबई हिंदी पत्रकार संघ में गंभीर मतभेद हो गया. अंततः मुलायम सिंह यादव का पांच लाख रुपए नहीं लेने का फ़ैसला किया गया.

उसी दौरान शिवसेना का मुंबई की मीडिया से पंगा हो गया. दरअसल, आपलं महानगर (मराठी और हिंदी दोनों) ने शिवसेना के ख़िलाफ़ ख़बर छाप दी. बदले में शिवसैनिकों ने अखबार के दफ़्तर में तोड़फोड़ की और निखिल वागले पर हमला कर दिया. हमले के विरोध में शिवसेना भवन के सामने पत्रकारों ने विरोध प्रदर्शन किया. उसी समय शिवसैनिकों ने पत्रकारों पर हमला कर दिया जिसमें मणिमाला (नवभरत टाइम्स) और मिलिंद खांडेकर (दो बजे दोपहर) को गंभीर चोट लगी. इसके बाद मुंबई हिंदी पत्रकार संघ जनसत्ता और दोपहर का सामना के बीच शुरू शाब्दिक जंग में उलझ गया और धीरे-धीरे दम तोड़ दिया.

इसे संयोग ही कहेंगे कि पुराने जनरेशन के पत्रकारों और उनके संगठन ने वसूल का हवाला देते हुए मुलायम सिंह यादव से पांच लाख रुपए लेने से मना कर दिया, लेकिन नई जनरेशन के पत्रकार और उनका संगठन उनके बेटे अखिलेश यादव के मेहमान बनने वाले हैं. वैसे इस तरह के दौरे अकसर सरकारें अपने काम का एक्सपोज़र पाने के लिए कराती रहती हैं. उत्तर प्रदेश सरकार, झारखंड सरकार, केंद्र सरकार और जम्मू-कश्मीर सरकार के इस तरह के दौरे होते रहते हैं. जम्मू-कश्मीर सरकार तो पत्रकारों को वादियों की खूब सैर करवाती है. यह देशाटन तो है ही, अनुभव के लिहाज़ भी पत्रकार के लिए बेहरतरीन आयोजन होता है.

प्रस्तावित हिंदी पत्रकार संघ का कार्यक्रम जितना धांसू हुआ, उतना ही धांसू कवरेज (अख़बारी और वॉट्सअप, टीवी वाले इस तरह की ख़बर नहीं चलाते हैं) हो गई. मुंबई के सभी समाचार पत्रों के साथ लखनऊ तक के अख़बार (तरुणमित्र) में ख़बर छपी. जहां भी छपा, वॉट्सअप पर उसकी क्लिपिंग देखने को मिली. मुझे लगता है सभी साथी मुझसे सहमत होंगे.

प्रेस रिलीज़, पता नहीं किसने तैयार किया, परंतु शर्तिया किसी असाधारण प्रतिभा के धनी हिंदी पत्रकार ने ही गहन रिसर्च और मशक्कत के बाद तैयार किया होगा. ऐसा मेरा मानना है. इसीलिए उसकी लेखनी तस की तस हर अख़बार ने छाप दी, केवल हेडिंग पेज इंचार्ज ने अपने अनुसार लगाया. बस नवभारत अखबार अपवाद रहा, जिसने असाधारण प्रतिभा के धनी हिंदी पत्रकार द्वारा पत्रकार घोषित किए गए लोगों के अलावा कुछ और लोगों को पत्रकार करार देते हुए उनके नाम भी छाप दिए. वैसे, एक ही समाचार क़रीब-क़रीब सभी (नवभारत टाइम्स मैंने पढ़ा नहीं) हिंदी अख़बारों में पढ़ते-पढ़ते कई लोगों को तो यह समाचार कंठस्थ हो गया होगा. जो भविष्य मैं काम आएगा. इसके लिए शुभकामनाएं, ऐसी ही प्रेस रिलीज़ तैयार करके हिंदी पत्रकारिता का भला करते रहिए. सभी साथियों को इस शानदार आयोजन के लिए बधाई और कोटि-कोटि धन्यवाद.


मंगलवार, 19 मई 2015

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मिशन विश्वनेता

हरिगोविंद विश्वकर्मा
देश के शक्तिशाली प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी ऑफ़िस में एक साल का कार्यकाल पूरा कर रहे हैं। लिहाज़ा, उनके कार्यकाल का आंकलन होने लगा है। हालांकि, किसी नेता की सफलता या असफलता का आकलन एक साल में नहीं किया जा सकता लेकिन एक साल यह पता लगाने के लिए पर्याप्त होता है कि वह नेता किस “लाइन ऑफ़ ऐक्शन” की ओर जा रहा है. वैसे सत्ता की बाग़डोर संभालने के बाद से ही मोदी जिस तरह विश्व-भ्रमण कर रहे हैं, राजनीतिक हलक़ों में अटकलें लगाई जाने लगी हैं कि कहीं उनकी इच्छा विश्वनेता बनने की तो नहीं है? कई जानकार कहने लगे हैं कि मोदी की विदेश यात्राओं से तो यही लगता है कि पांच साल में वह अपने को विश्वनेता के रूप में स्थापित करना चाहते हैं, और, फिलहाल उसी मिशन पर काम कर रहे हैं।
हां, इस बात पर दो राय नहीं कि साल भर में मोदी ने विदेश यात्राओं के तमाम रिकॉर्ड तोड़ चुके हैं। वस्तुतः प्रधानमंत्री बनने के तुरंत बाद भूटान यात्रा से विदेश दौरे जो सिलसिला शुरू हुआ, वह फ़िलहाल जारी है। अब तक मोदी अमेरिका, जापान, फ्रांस, चीन, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे बड़े देशों और नेपाल, फ़िज़ी, मॉरीशस और मंगोलिया जैसे छोटे देशों की यात्रा कर चुके हैं। कह सकते हैं कि मोदी अफ्रीका को छोड़कर सभी महाद्वीपों के 18 देशों के दौरे पर जा चुके हैं। सिंगापुर तो मोदी वहां के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहे ली कुआन येव के अंतिम संस्कार में चले गए थे।
मज़ेदार बात यह है कि जैसे पिछले साल आम चुनाव के दौरान मोदी भारत के हर शहर को गुजरात से जोड़ देते थे, उसी तरह हर देश को आजकल वह भारत से जोड़ रहे हैं। नवीनतम जानकारी यह है कि मोदी ने 18 मई को मंगोलिया की संसद को संबोधित करते हुए कहा कि भारत और मंगोलिया का बहुत प्राचीन “आध्यात्मिक रिश्ता“ रहा है। कहने का मतलब, मोदी हर देश के साथ भारत का रिश्ता गढ़ ही लेते हैं। कई टीकाकार मोदी की इस ख़ासियत के क़ायल भी हैं। वैसे, मोदी अपनी हर विदेश यात्रा की जमकर मार्केटिंग भी करते हैं। विदेश यात्राओं की ऐसी रिपोर्टिंग करवाते हैं कि सूचनाओं के लिए मीडिया पर निर्भर व्यक्ति सोचने लगता है कि मोदी का क्रेज़ जिस तरह पिछले चुनाव में देश में था, अब वही क्रेज़ अब विदेशों में है। मोदी की जापान, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया यात्रा इस तरह की मार्केटिंग की मिसाल है, जैसे जापान में ढोल बजाया था वैसे ही मोदी ने मंगोलिया में वहां के वाद्य को बजाने की कोशिश की। इस स्पेशल रिपोर्ट दिखाई भी गई और लिखी भी।
पिछले साल नरेंद्र मोदी के शपथ-ग्रहण समारोह में पाकिस्तान समेत दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) के सभी सदस्य देश के राष्ट्राध्यक्ष आमंत्रित किए गए थे। मोदी की वह पहल राजनयिक स्तर पर काफी सराही गई थी। विदेशी मामलों में दख़ल रखने टीकाकारों ने कहा था, कट्टर हिंदूवादी नेता के प्रधानमंत्री बनने की घटना को ऐतिहासिक महत्व की घटना साबित करने के लिए ही शपथग्रहण में सभी को न्यौता भेजकर बुलवाया गया था, जो एक सकारात्मक शुरुआत थी। मोदी ख़ुद अमेरिका गए और अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को भी गणतंत्र दिवस के मौक़े पर भारत बुलाने में सफल रहे। उनके साथ 'मन की बात' भी प्रस्तुत की।
मोदी की इन विदेश यात्राओं का कितना फ़ायदा इस देश या देशवासियों को हुआ? इस पर अभी कुछ नहीं कहा जा सकता। इतना ज़रूर है कि ऐसा कुछ नहीं हुआ है जो विज़िबल हो। यानी विश्वमंच पर अभी तक ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, जिसे उल्लेखनीय घटना कहा जा सके। यह दावा करना कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने और धुआंधार विदेश यात्राओं से दुनिया में भारत की हैसियत बढ़ गई है, सही नहीं होगा। ऐसा कहने वाले एक झूठे आशावाद की परिकल्पना कर रहे हैं।
दरअसल, अमेरिका ही नहीं पश्चिम के क़रीब-क़रीब सभी देश चीन से आशंकित रहते हैं क्योंकि अपना राष्ट्रीय हित साधने में चीन नंबर एक है। अपने फ़ायदे के लिए बीजिंग कब क्या कर दे, कोई नहीं जानता?  इसीलिए किसी को चीन पर विश्वास नहीं रहता है। यहां तक कि चीन की पाकिस्तान से दोस्ती एक सोची समझी रणनीति के तहत है। चीन अपने को सिर्फ़ अपने प्रति जिम्मेदार मानता है, इसीलिए यूरोप और अमेरिका को भारत में चीन का एक विकल्प दिखता है। लिहाज़ा, विश्वमंच पर पीठ थपथपाने वाला आशावादी बयान देकर नई दिल्ली को प्रोत्साहित करते रहते हैं। हमारे प्रधानमंत्रीजी को भी विदेशों से वहीं प्रोत्‍साहन मिला है, और वे उसी से गद्गद् हैं।
अगर इतिहास पर नज़र डालें तो विश्वनेता बनने की बीमारी भारतीय नेताओं में ख़ासी पुरानी रही है। पं. जवाहरलाल नेहरू की विश्वनेता बनने की बड़ी हसरत थी। लिहाज़ा, उन्होंने गुटनिरपेक्ष आंदोलन शुरू किया। विश्वनेता बनने की चाह में नेहरू ने हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा दिया, लेकिन उनकी आंख तब खुली, जब चीन ने 1962 में भारत पर आक्रमण कर दिया और अरुणाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में बहुत बड़े भूभाग को हड़प लिया।
इंदिरा गांधी में भी यह लालसा किसी से छिपी नहीं थी, इसीलिए वह भी गुटनिरपेक्ष आंदोलन को खाद-पानी देती रहीं। हालांकि अमेरिका और सोवियत संघ के बीच शीतयुद्ध ख़त्म होते ही गुटनिरपेक्ष आंदोलन रूपी पौधा अपने आप सूख गया। इसी तरह राजीव गांधी ने भी बतौर “मिस्टर क्लीन”कई देशों की धुआंधार यात्रा की। कई राष्ट्राध्यक्षों ने तो प्रोटोकोल को धता-बताकर राजीव की आगवानी की। उसके बाद के नेता वस्तुतः अल्पमत सरकारों के मुखिया रहे, लिहाज़ा, वे किसी तरह सरकार चलाने और साथी दलों के नेताओ के नखरे झेलने में ही बिज़ी रहे।
कुल मिलाकर विश्वनेता बनने के आकांक्षी भारतीय नेताओं की कोशिश चाहे रंग लाई हो या नहीं, लेकिन भारत की विश्वमंच पर आज भी वही औक़ात है, उसकी जो औक़ात स्वतंत्रता मिलने के समय थी। हां, देश का प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति विदेश जिस देश की यात्रा करता है, वह देश संयुक्त राष्ट्रसंघ सुरक्षा परिषद में भारत की स्थाई सदस्यता का पब्लिकली समर्थन करता है। कई विश्वमंच पर अमेरिका भी भारत के दावे का समर्थन कर चुका है। चीन और पाकिस्तान के छोड़ दें, तो दुनिया का हर छोटा-बड़ा देश मानता है कि भारत को सुरक्षा परिषद में स्थाई सीट मिलनी चाहिए, लेकिन सच यह है कि भारत को वीटो पॉवर अभी तक नहीं मिल पाया है। देश को अभी कितना इंतज़ार करना होगा कोई नहीं जानता। कभी-कभी तो लगता है कि भारत सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य कभी नहीं बन पाएगा। मोदी भी जिस देश के दौरे पर जा रहे हैं, उस देश की लीडरशिप भारत के दावे का समर्थन का ऐलान कर देते हैं जो पिछले कई दशक से चल रहा है।
बहरहाल, राजनैतिक टीकाकार कहने लगे हैं कि मोदी जितना ध्यान विदेशी निदेश पर लगा रहे हैं उसके आधा अगर देश के अंदरूनी मामले पर लगाए होते तो नतीजा दिखने लगता, तब बलिया के बीजेपी सांसद भरत सिंह को यह न कहना पड़ता कि इस सरकार ने एक साल में भाषण पिलाने के अलावा ऐसा कुछ नहीं किया कि मतदाताओं को बताया जा सके। जहां तक निवेश की बात है तो भारत ने 1991 से अपनी अर्थव्यवस्था को वैश्विक देशों के लिए खोल रखी है, फिर भी विदेशी निवेश उतना नहीं आ रहा है, जितनी उम्मीद थी। जाहिर है, विदेशी निवेश किसी प्रधानमंत्री के कहने से नहीं बल्कि अपने सुविधा और फ़ायदे के मुताबिक आएगा।
मोदी ने पिछले साल जब सत्ता संभाली थी लोगों ने यह कयास लगाया था कि उनकी अगुवाई में देश कुछ ठोस क़दम उठाएगा। मसलन, स्विस और दूसरे विदेशी बैंकों में जमा काला धन भारत आएगा और भारत की छवि एक सशक्त देश की बनेगी, लेकिन एक साल में लफ़्फ़ाज़ी के सिवाय हुआ कुछ नहीं। काले धन पर तो बीजेपी के एक सीनियर लीडर को कहना पड़ा कि मोदी के उस बयान को सीरियस न माना जाए, यानी मोदी ने चुनाव में कैजुअली कह दिया था कि उनकी सरकार हर भारतीय के खाते में 15 लाख रुपए जमा करवाएगी। वैसे देखा जाए तो दूसरे मोर्चों पर भी मोदी के कार्यकाल कछ नहीं हुआ। कहीं-कहीं तो वह मनमोहन से भी गए गुज़रे साबित हो रहे हैं।
पाकिस्तान की ओर से सीमा पर अंधाधुंध फायरिंग चलती रहती है। मोहम्मद हाफिज़ सईद आए दिन भारत को धमकी देता रहता है। इतना ही नहीं, मुंबई आतंकी हमले के मास्टरमाइंड ज़किउर रहमान लखवी को रिहा कर दिया गया। भारत विरोध जताने के अलावा कुछ नहीं कर पाया. दाऊद इब्राहिम के बारे में भारत अब भी प्रमाण देने में व्यस्त है कि भारत में वांछित यह अपराधी पाकिस्तान में ही है। कुल मिलाकर इन तमाम मसलों पर मोदी के पीरियड में भी भारत कुछ नहीं कर पाया है सिवाय विरोध जताने के। इससे भारत की छवि दुनिया में “साफ़्ट नेशन”की बन गई है। साफ़्ट नेशन की यही इमैज विश्वमंच पर भारत की भूमिका को सीमित कर देती है।

अटलबिहारी वाजपेयी ने परमाणु विस्फोट करके इस इमैज से निकलने की कोशिश की थी, लेकिन बहुमत न होने से वह बैकफुट पर आ गए थे। मोदी के साथ ऐसी कोई मज़बूरी नहीं थी। उन्हें महानायक बनने का मौक़ा मिला था, लेकिन उनके एक साल के कामकाज पर नज़र डालें तो यही लगता है, फिलहाल मोदी वह मौक़ा गंवा रहे हैं।

रविवार, 25 जनवरी 2015

भारत केवल टैक्स देने वालों का देश, हर सुविधा और योजना केवल टैक्स देने वालों के लिए...

हरिगोविंद विश्वकर्मा
आपको बुरा लग सकता है, लेकिन सच यही है कि यह पूरा देश महज 10 फ़ीसदी लोगों का होकर रह गया है। वहीं दस प्रतिशत लोग गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस समेत तमाम सरकारी त्यौहार मनाते हैं। फिलहाल देश की कुल आबादी 1.25 अरब है। वित्त मंत्रालय के मुताबिक 2012-13 में केवल 42,800 लोगों की सालाना आमदनी एक करोड़ रुपए या उससे ज़्यादा थी। यानी फ़र्स्ट कैटेगरी में आबादी का मात्र 0.00354 फ़ीसदी ऐसा है, जो हर साल एक करोड़ या उससे ज़्यादा कमा रहा है। 

इस फेहरिस्मेंत उद्योगपति, बिल्डर, कारोबारी, राजनेता, अभिनेता, बड़े खिलाड़ी और भ्रष्ट नौकरशाह, भ्रष्ट पुलिस अफ़सर और भ्रष्ट जज शामिल हैं। इस कैटेगरी में सत्तावर्ग के प्रति स्वामिभक्ति दिखाने वाले सेकेंड कैटेगरी वे लोग भी शामिल किए जा सकते हैं जिनकी जनसंख्या 4.06 लाख है। ये भी देश की आबादी का महज 0.0319 फ़ीसदी हिस्सा है। इनकी सालाना कमाई 20 लाख से 1 करोड़ के बीच होती है। इन दोनों कैटेगरी (फ़र्स्ट और सेकेंड कैटेगरी) के लोगों को सत्तावर्ग का आदमी यानी रूलिंग फ़ैमिली कहा जाता है। अगर इन दोनों वर्ग को मिला दीजिए तो होता हैः 0.00354 + 0.03190 = 0.03544 फीसदी। यह देश की कुल आबादी का एक (1.0) फ़ीसदी भी नहीं है। आधी (0.5) फ़ीसदी या एक चौथाई (0.25) फ़ीसदी भी नहीं है। बल्कि एक आठवां (0.125) फ़ीसदी भी नहीं है और एक सोलहवां (0.0625) फ़ीसदी भी नहीं है। यह आबादी देश की कुल आबादी की एक बत्तीसवां फ़ीसदी के आसपास है।

कहने का मतलब हमारी आबादी का एक बहुत कम हिस्सा ख़ुशहाल है। मनचाही ज़िंदगी जीता है। इनके सामने जीवित रहने या रोज़ी-रोटी का संकट नहीं जो आम आदमी रोज़ाना झेलता है। महंगाई कितनी भी बढ़ जाय सत्तावर्ग को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। इनके पास इतनी दौलत है कि आने वाली कई पीढ़ियां ख़र्च नहीं कर पाएंगी। इस वर्ग पर किसी तरह के संकट का असर नहीं होता है। यह वर्ग ठाट से वातानुकूलित घरों में सोता है। जहां भी रहता है, वहां उसे एसी कमरे में रखा जाता है। यह वर्ग केवल प्लेन से सफ़र करता है और समस्याओं के हल करने के लिए वातानुकूलित कमरे में बातचीत करता है। इसी 0.03544 फ़ीसदी हिस्से के लोग लोकसभा और राज्यसभा में पहुंचने की हैसियत रखते हैं। चुनाव के बाद सरकार बनाते हैं। अब सोचिए, आप पर शासन कौन लोग करते हैं और आपके मुक़ाबले उनकी हैसियत क्या है? ये लोग जो भी दान देते हैं, या धर्म-कर्म करते हैं, वह इसलिए करते हैं ताकि इन्हें इनकम टैक्स में छूट मिले। वरना ये हमारे आपकी ओर देखना भी पसंद नहीं करते हैं।

देश की संसद पर इन लोगों का क़ब्ज़ा है। ब्यूरोक्रेसी यानी कार्यपालिका को इन लोगों ने ही बंधक बना रखा है। तमाम इकॉनॉमी में इन्हीं का दख़ल है। शेयर बाज़ार में यही लोग निवेश करते हैं। मुंबई जैसे महानगरों में करोड़ों रुपए के महंगे फ़्लैट ख़रीदने की हैसियत इन्ही लोगों की है। हर छोटी-बड़ी इंडस्ट्रीज़ इनके ही कंट्रोल में है। सभी खेल संघों में अहम पदों पर यही लोग हैं। छोटे-बड़े सभी संस्थानों में इनका ही वर्चस्व है। मीडिया के असली ओनर यही लोग हैं, जहां पत्रकारों को ये लोग टूल की तरह इस्तेमाल करते हैं और ज़रूरत ख़त्म होने पर दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंकते हैं। सीमा पर सैनिक और आतंकवादी एक दूसरे का ख़ून बहाते हैं लेकिन हर डायलॉग यही लोग करते हैं। देश की 95 फ़ीसदी संपत्ति, संसाधन और धन इन्हीं के क़ब्ज़े में है।

अभी रिज़व बैंक ऑफ़ इंडिया में आरटीआई के ज़रिए एक विस्फोटक सूचना निकाली गई। देश की बड़ी बैंकों ने 5 लाख करोड़ रुपए रिपीट 5 लाख करोड़ रुपए औद्योगिक घरानों को और 3.75 लाख करोड़ रुपए रिपीट 3.75 करोड़ रुपए बिल्डरों यानी रियल इस्टेट की कंपनियों को लोन के रूप में दिया था। अब पौने नौ लाख करोड़ रुपए की यह धनराशि बैड लोन कैटेगरी में रख दी गई है। बैड लोन का मतलब इसकी रिकवरी नहीं हो सकती। इसमें किंगफ़ीशर के कर्मचारियों को वेतन न दे पाने लेकिन पिछले साल 14 करोड़ में आईपीएल टीम के लिए युवराज को ख़रीदने वाले उद्योगपति विजय माल्या शामिल हैं जिनका उधार लिया गया क़रीब 3000 करोड़ रुपए का क़र्ज़ बैड लोन की कैटेगरी में चला गया है। यानी उसे वापस करने की बाध्यता माल्या पर नहीं क्योंकि वह कंपनी ही सिक कंपनी की कैटेगरी में आ गई है तो वे क्या करें। मज़ेदार बात यह है कि इस मामले में अभी तक केवल एक बैंक के बड़े अफ़सर के ख़िलाफ़ कार्रवाई की गई है। बैड लोन को मंज़ूर करने वाले बाक़ी बैंक अफ़सर रिश्वत की रकम से ऐश कर रहे हैं। तो ये हैं रूलिंग क्लास यानी रूलिंग फ़ैमिली।

इस रूलिंग फ़ैमिली का साथ हमारे-आपके बीच के दो कैटेगरी के लोग देते हैं। जिन्हें हम थर्ड कैटेगरी और फोर्थ कैटेगरी कह सकते हैं। आइए इसे भी आंकड़ों के ज़रिए समझते हैं। थर्ड कैटेगरी में देश की आबादी का 0.108 फ़ीसदी हिस्सा यानी 13.78 लाख लोग आते हैं। जिनकी आमदनी 10 से 20 लाख रुपए के बीच होती है। इन पर भी महंगाई वगैरह का बहुत ज़्यादा असर नहीं होता है। इस वर्ग के क़रीब 90 फ़ीसदी लोग सत्ता परिवार की ओर झुके रहते हैं। यानी दलाली या चमचागिरी करते हैं। इसमें फोर्थ कैटेगरी के लोगों को भी शामिल कर लीजिए। फोर्थ कैटेगरी की संख्या 17.88 लाख है और यह आबादी का 0.140 फ़ीसदी है। ये लोग हर साल 5 से 10 लाख रुपए की कमाई कर लेते हैं। इसमें हमारे आप के बीच के मोटी सेलरी वाले चंद सीनियर पत्रकार भी हैं। इस फ़ोर्थ कैटगरी के 80 फ़ीसदी से ज़्यादा लोग यथास्थितिवादी होते हैं। यानी परिवार पालने या दूसरी मज़बूरियों के चलते अपने ज़मीर से समझौता करके सत्ता वर्ग की हां में हां मिलाते हैं और फ़ेसबुक या दूसरी सोशल नेटवर्किंग साइट पर अपनी जमात यानी आम आदमी को ख़ूब गाली देते हैं या उसकी आलोचना करते हैं।

अब इन चारों वर्ग को मिला दीजिए तो होता हैः 0.00354 + 0.0319 + 0.108 + 0.140 = 0.28344... यह देश की आबादी का आधा प्रतिशत भी नहीं है। यानी कह सकते हैं कि मुट्ठी भर लोग देश को चला रहे हैं या उनका समर्थन कर रहे हैं।

आमदनी की फ़िफ़्थ कैटेगरी में आमदनी न्यूनतम टेक्स सीमा 1 लाख अस्सी हज़ार रुपए से 5 लाख के बीच के लोग आते हैं। टैक्स देने वालों में ये सबसे नीचे हैं। इसे लोअर मिडिल क्लास कहा जाता है जिसकी जनसंख्या 288.44 लाख है। यह देश की कुल आबादी का 2.271 फ़ीसदी है।

पूरे देश में टेक्सपेयर्स की कुल संख्या  3.25 फ़ीसदी है। यानी जितने संपन्न हैं सब इसी में हैं। इसमें 3.25 फ़ीसदी पर आश्रित लोगों को जोड़ दिया जाए तो यह क़रीब 10 फ़ीसदी होता है। यानी इस देश में महज दस फ़ीसदी लोग ही इंसान की तरह रहते हैं। बाक़ी लोग जीवन के लिए संघर्ष करते हैं।

जिस नौकरी में आरक्षण होता है और वह आरक्षण हमें अगड़े-पिछड़े या हंदू-मुस्लिम रूप में आपस में लड़ाता है उसका परसेंटेज बहुत कम है। महज़ 3 फ़ीसदी के क़रीब है। इस तीन फ़ीसदी के लिए हम कहीं धर्म, कहीं जाति, कहीं क्षेत्र, कही भाषा तो कहीं नस्ल के नाम पर आपस में बंटे हैं।

दूसरी ओर प्रजा परिवार यानी पूरे देश की जनता है, जो देश की आबादी का 96 फ़ीसदी है। प्रजावर्ग परिवार के लोग अनाज की बोरी की तरह ट्रेन में ठुंसने वाले लोग होते हैं। ये वे लोग हैं, जिनके न तो पैदा होने की नोटिस ली जाती है न ही मरने की।  बड़े ज़ोर-शोर से मनरेगा रोज़गार योजना का जिक्र की जाती है। मनरेगा में साल भर में युवा बेरोज़गार को 100 दिन के रोज़गार की गारंटी मिली है। इसमें सौ रुपए दैनिक मज़दूरी मिलती है। कोई सहज कल्पना कर सकता है कि साल भर में किसी को 100 दिन काम यानी 10 हज़ार रुपए मिल जाए तो क्या वह साल भर इतनी धनराशि से सरवाइव कर सकता है?

चाहे साबित हो या न हो, पर पूरा देश जान गया है कि सत्ता के शिखर पर बैठे सभी लोग महाभ्रष्ट हैं। और इस ग़रीब देश को और आम जनता को बिना किसी अपराधबोध के ख़ुलेआम लूट रहे हैं। लूटमारी के धंधे में कोई नेता किसी से कम नहीं है। ये इतने निरंकुश हैं कि इन्हें अपने किए पर ज़रा भी पछतावा नहीं है। इनकी छांव में फल-फूल रहे, इनके चमचे, इन भ्रष्टों का बेखौफ़ होकर बचाव करतो हैं। भारतीय क़ानून में बचाव-पक्ष को दिए जाने वाले मौक़े का नाजायज़ तरीक़े से दुरुपयोग कर रहे हैं।

नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री है। सब डींग हांकते हैं कि वह चाय बेचकर प्रधानमंत्री बने हैं। अपने अब तक के कार्यकाल में उन्होंने अपनी जमात चायवालों के लिए क्या किया? ज़ाहिर है कुछ नहीं। प्रधानमंत्री बनते ही सबसे पहले दिल्ली कटरा (वैष्णोदेवी) के बीच श्रीशक्ति एक्सप्रेस चलाई जो पूरी तरह एसी ट्रेन है। इसमें कितने चायवाले यात्रा करेंगे, कोई सहज सोच सकता है। मोदी की दूसरी बहु-प्रचारित जन-धन योजना है। जिसमें लोगों का खाता खुल रहा है और परिवार के मुखिया को एक लाख रुपए का मुफ़्त दुर्घटना बीमा मिल रहा है। इसका लाभ हादसे में मरने के बाद ही मिल सकता है। बेहतर होता, मोदी लाख की जगह 50 हज़ार का ही बीमा देते और वह भी हेल्थ बीमा ताकि लोग जीते जी उसका लाभ लेते और बीमार होने पर अपना इलाज करवाते। खैर ऐसा नहीं हुआ क्योंकि मोदी अब चायवालों के नहीं सत्तावर्ग के प्रतिनिधि हैं।

इसी तरह सत्ता-परिवार में सोनिया गांधी, नितिन गडकरी, शरद पवार, मुलायम यादव, मायावती, लालू प्रसाद यादव, करुणानिधि, जयललिता, प्रकाश बादल, नीतीश कुमार, ममता बैनर्जी, राज ठाकरे, उद्धव ठाकरे, शीबू सोरेन, अशोक गहलोत, देवेंद्र फडनवीस, पृथ्वीराज चव्हाण, अशोक चव्हाण के अलावा सभी राजनेता, सभी सांसद, 99 फ़ीसदी विधायक है। हमें लगता है ये एक दूसरे के विरोधी हैं, लेकिन यक़ीन मानिये ये एक दूसरे के हितैषी हैं। इनकी मदद करते हैं अंबानी-बंधु, टाटा-बिरला, महिंद्रा, एन श्रीनिवासन और सभी औद्योगिक घराने। इसके अलावा अमिताभ बच्चन, शाहरुख ख़ान, सलमान खान, अक्षयकुमार, सचिन तेंदुलकर, महेंद्रसिंह धोनी और बाक़ी खरबपति लोग भी सत्तावर्ग क्लब में शामिल हैं।

मुलायम से पूछना चाहिए, पिछले 45 साल के दौरान आपने ऐसा क्या किया कि इतने दौलतमंद हो गए? आपके परिवार का हर सदस्य संसद या विधनसभा में क्यों है? क्या देश में दूसरे लोग नहीं हैं? बादल से पूछना चाहिए, ख़ुद मुख्यमंत्री बन गए, चलो ठीक है, बेटे को डिप्टी सीएम बनाते वक़्त आपको जरा भी शर्म नहीं आई? चुनाव में जीत मिली इसका मतलब आपका परिवार ही सरकार चलाएगा।  

नवीन पटनायक और अखिलेश यादव (कुछ समय पहले उमर अब्दुल्ला और हेमंत सोरेन) इसलिए सीएम हैं क्योंकि पॉलिटिशियन्स के बेटे हैं। उमर के पिता फ़ारुक अब्दुल्ला भी शेख अब्दुल्ला का बेटा होने के कारण सीएम थे। सोनिया गांधी इसलिए देश की सबसे ताक़तवर महिला हैं क्योंकि राजीव गांधी की पत्नी हैं। राहुल इसलिए कांग्रेस उपाध्यक्ष हैं क्योंकि वे सोनिया-राजीव के बेटे हैं। उनकी युवा टीम में माधवराव सिंधिया के बेटे ज्योतिर्दित्य, राजेश पायलट के बेटे सचिन, मुरली देवड़ा के बेटे मिलिंद, जीतेंद्र प्रसाद के बेटे जतिन जैसे लोग हैं जो बाप की बोई गई फसल काट रहे हैं। उत्तरप्रदेश में मुलायम, रामगोपाल, धर्मेंद्र, ट्विंकल, तेज प्रताप सभी सांसद, अखिलेश और शिवपाल विधायक एक ही परिवार के हैं।

देश का लोकतंत्र, लोकतंत्र के स्तंभ- कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका और मीडिया, तमाम व्यवस्थाएं- शासन-तंत्र, पुलिस, बैंक, सभी योजनाएं सब की सब फ़र्ज़ी हैं। देश में 1.25 अरब लोग रहते हैं। पिछली सदी या उससे पहले और अंग्रेज़ों के जाने के बाद शुरुआत में जिन्हें मौक़ा मिला उन्होंने ही संपत्ति का बहुत बड़ा हिस्सा, क़रीब नब्बे फ़ीसदी, हथिया लिया और आज वही धन्नासेठ कहलाते हैं।

इस बात की ख़ूब डींग हांकी जाती है कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है। यहां जनता के हित के लिए जनता के द्वारा चलाई जा रही जनता की सरकार है। क्या यह सही है? बिल्कुल नहीं। इस देश में और इस देश के लोकतंत्र में आम जनता की कितनी भागीदारी शून्य है?

दरअसल, हमारी क़ुदरत ने जो दिया है वह समस्त देशवासियों के लिए है। लेकिन सत्ता-परिवार के लोगों ने दूसरों के हिस्से के रिसोर्सेज़ पर भी क़ब्ज़ा कर लिया है। रूलिंग क्लास ने निर्धन लोगों का हक़ मारने का सामाजिक और नैतिक अपराध किया है। लिहाज़ा इनके साथ अपराधियों की तरह सलूक किया जाना चाहिए। इनके लिए दंड निर्धारित किया जाना चाहिए।


इन चंद लोगों के पास लाखों-हज़ारों करोड़ रुपए की संपत्ति है जबकि बाक़ी पूरा देश कंगाल है और केवल हवा खा रहा है। इसलिए हे देशवासियों जागो! इन बेइमानों को पहचानो! ये तुम्हारे दुश्मन हैं! इन्हें इनकी असली जगह आप ही ला सकते हैं। इसके लिए होना होगा आप सबको एकजुट! अंधेरनगरी को ख़त्म करने के लिए जनता को ही आगे आना होगा।