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मंगलवार, 25 फ़रवरी 2020

व्यंग्य : राष्ट्रदादी-राष्ट्रनानी आंदोलन

हरिगोविंद विश्वकर्मा
वहां ढेर सारी महिलाएं बैठी थीं। सब अलग-अलग गुट में। एक जगह दो महिलाएं थीं। दोनों मुस्करा रही थीं। मुस्करा नहीं, बल्कि हंस रही थीं। बहुत ख़ुश लग रही थीं।
-आप दोनों की इस ख़ुशी का राज़? मैंने कलाई हिलाकर इशारे से ही पूछ लिया।
-हम केवल दो नहीं, हज़ारों हैं। हम बहुत ख़ुश हैं। नागरिकता संशोधन क़ानून का अंतरराष्ट्रीयकरण हो गया, दोनों बोलीं।
-वह कैसे?
-ट्रंप की मौजूदगी में दिल्ली में ख़ूब हिंसा हुई। मज़ा आ गया। अब ट्रंप ज़रूर मोदी की ख़बर लेगा। मोदी का काला क़ानून वापस लेना पड़ेगा।
-बात में तो दम है। वाक़ई! बाई द वे आप लोगों का परिचय?
-हम दोनों दादी हैं। दादी!
-दादी?
-हां बेटा, दादी!
-किसकी दादी है आप दोनों?
-पूरे देश की दादी।
-मतलब राष्ट्रदादी!
-हां बेटा। हम राष्ट्रदादी हैं!
-बधाई हो राष्ट्रदादी। दरअसल, मैं शाहीनबाग़ की दादियों और नानियों से ही मिलने आया था।
-बोलो बेटा, हम दोनों राष्ट्रदादी हैं और राष्ट्रनानी भी!
-मतलब टू-इन-वन?
-हां बेटा।
-क्या बात है, राष्ट्रपिता, राष्ट्रपुत्र, राष्ट्रमाता के बाद देश को राष्ट्रदादी और राष्ट्रनानी भी मिल गईं।
-बिल्कुल, बेटा।
-राष्ट्रदादी, आप यहां शाहीनबाग़ में क्या कर रही हैं।
-आंदोलन बेटा। यहां की सभी दादियां-नानियां आंदोलन कर रही हैं।
-आपके आंदोलन में कौन-कौन है?
-केवल हम दादियां और नानियां हैं बेटा। इस आंदोलन में हर धर्म और समुदाय की दादियां और नानियां हैं। सेक्यूलर दादियां और सेक्यूलर नानियां। यह राष्ट्रदादी-राष्ट्रनानी आंदोलन है बेटा। समूचे मानव इतिहास का पहला राष्ट्रदादी-राष्ट्रनानी आंदोलन बेटा।
-यह आंदोलन किसलिए हो रहा है।
-भारतीय संविधान को बचाने के लिए यह आंदोलन हो रहा है। अंबेडकर के संविधान की रक्षा के लिए हम राष्ट्रदादियां-राष्ट्रनानियां घर से बाहर निकली हैं।
-बहुत बढ़िया राष्ट्रदादी!
-यह आंदोलन किसके ख़िलाफ़ हो रहा है।
-संघी सरकार के ख़िलाफ़!
-संघी सरकार के ख़िलाफ़ या नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़? मैंने पूछा।
-दोनों के ख़िलाफ़ बेटा। संघी सरकार ने ही तो बनाया है सीएए।
-आप लोग नागरिकता संशोधन क़ानून का विरोध क्यों कर रही हैं?
-यह पक्षपाती क़ानून है बेटा।
-पक्षपाती कैसे हुआ? ज़रा ख़ुलासा करिए राष्ट्रदादी।
-दोनों राष्ट्रदादियां सकपका गईं।
-हम दोनों को ज़्यादा नहीं पता बेटा। केवल इतना ही पता है, यह काला क़ानून है। यह मुसलमानों के ख़िलाफ़ है।
-किन मुसलमानों के ख़िलाफ़?
-सभी मुसलमानों के ख़िलाफ़?
-मुसलमानों के ख़िलाफ़ कैसे है?
-ऐसे ही, यह मुसलमानों के ख़िलाफ़ है।
-कारण बताइए। यह मुसलमानों के ख़िलाफ़ कैसे है? किस राष्ट्रदादी या राष्ट्रनानी को इस काले क़ानून की जानकारी है?
-एक बुद्दिजीवी राष्ट्रदादी उर्फ राष्ट्रनानी वहां आ गई।
-क्या पूछ रहे हो बेटा? उसने मुझसे सवाल किया।
-मैं यह पूछ रहा हूं राष्ट्रदादी कि आप लोग आंदोलन क्यों कर रही हैं?
-हम लोग काले क़ानून के ख़िलाफ़ आंदोलन कर रहे हैं बेटा।
-किस काले क़ानून के ख़िलाफ़। यह क़ानून काला कैसे है? यही तो पूछ रहा हूं।
-मेरी आवाज़ सुनकर वहां और राष्ट्रदादियां-राष्ट्रनानियां आ गईं।
-किसी को भी नहीं पता था, कि काला क़ानून कैसे मुसलमानों के ख़िलाफ़ है।
-मतलब आप लोगों में किसी को पता नहीं कि काला क़ानून क्या है।
-नहीं-नहीं, हमें पता है। हम दादियां और नानियां उम्रदराज़ हो गई हैं न। इसलिए भूल जाती है, इस काले क़ानून की बारीक़ियां।
-मैं तो आप लोगों का समर्थन करने आया था। सोचा, चलूं राष्ट्रदादियों-राष्ट्रनानियों के समर्थन में मैं भी बैठ जाऊं शाहीनबाग़ में। हाइवे पर सोने का मज़ा लूं।
कुछ देर वहां शांति रही।
-अरे, वो महक। इधर आ।
महक राष्ट्रदादियों-राष्ट्रनानियों से थोड़ी कम उम्र की महिला थी। जींस-टीशर्ट में। वह आ गई।
-इनको काले क़ानून के बारे में बता दो। एक दादी बोली।
-क्या जानना चाहते हैं आप??? उस महिला ने पूछा।
-आपकी तारीफ़? आप भी राष्ट्रदादी हैं? मैंने भी सवाल दाग़ दिया।
-नहीं, मैं राष्ट्रदादी या राष्ट्रनानी नहीं हूं। मैं राष्ट्रपुत्री हूं। भारत की बेटी!
-आप क्या करती हैं? मेरा मतलब, आंदोलन के अलावा और क्या करती हैं।
-रिसर्च। जेएनयू में रिसर्चर हूं।
-किस सब्जेक्ट पर रिसर्च कर रही है?
-रिलिजियस पर्सिक्यूशन यानी धार्मिक उत्पीड़न विषय पर?
-बहुत बढिया। आपके साथ बातचीत में मज़ा आएगा। तो आप भी आंदोलन में शामिल हैं?
-हां, हम सभी सीएए, एनआरसी और एनपीआर के विरोध में आंदोलन कर रहे हैं। अंबेडकर के संविधान को बचाना चाहते हैं, जिन्हें हाफपैंटी नष्ट करने पर तुले हुए हैं।
-एक-एक करके बताइए। पहले सीएए यानी नागरिकता संशोधन क़ानून।
-यह हमारे संविधान के ख़िलाफ़ है। मुसलमानों के ख़िलाफ़ है।
-संविधान के ख़िलाफ़ या मुसलमानों के ख़िलाफ़?
-दोनों के ख़िलाफ़!
-ज़्यादा किसके ख़िलाफ़?
-मुसलमानों के।
-वह कैसे?
-यह काला क़ानून हमारी नागरिकता छीन लेगा। हमें डिटेंशन कैंप में डाल देगा।
-लेकिन यह क़ानून नागरिकता छीनने के लिए नहीं, बल्कि नागरिकता देने के लिए है। जी हां, सीएए पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान में धार्मिक उत्पीड़न के शिकार अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिकता देने के लिए है।
-ग़लत। आप सही नहीं बोल रहे हैं।
-ग़लत नहीं, सौ फ़ीसदी सही बोल रहा हूं। यह क़ानून धार्मिक उत्पीड़न के शिकार अल्पसंख्यकों के लिए है।
-नहीं, आप ग़लतबयानी कर रहे हैं। इस क़ानून में हिंदुओं, सिखों, बौद्धों और ईसाइयों का ज़िक्र है। लेकिन मुसलमान इस क़ानून से ग़ायब कर दिए गए।
-मतलब, आप क्या कहना चाहती हैं, विस्तार से समझाइए।
-मतलब यह कि सीएए के लाभार्थी केवल हिंदू, सिख, बौद्ध और ईसाई हैं। पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान के मुसलमान नहीं। इसी बात का विरोध कर रहे हैं हम लोग।
-और बारीक़ी से समझाइए। आपने कहा कि सीएए के लाभार्थी केवल हिंदू, सिख, बौद्ध और ईसाई हैं। पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान के मुसलमान इस क़ानून के लाभार्थी नहीं हैं।
-हां, अब आप सही पकड़े हैं। सभी एक स्वर में बोल पड़ी।
-मतलब इस क़ानून के लाभार्थी पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान के मुसलमान भी बनाए जाने चाहिए। ठीक है न?
-हां, अब आप एकदम सही पकड़े हैं।
-मतलब आप लोग पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान के मुसलमानों को इस क़ानून का लाभार्थी बनाने के लिए आंदोलन कर रही हैं। ठीक है न?
-हां, अब आप पूरी तरह सही पकड़े हैं।
-इसका मतलब यह भी कि आप लोग पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान के मुसलमानों के हितों की रक्षा करने के लिए आंदोलन कर रही हैं। ठीक है न?
-वही तो, आख़िरकार आप समझ गए। सही पकड़ लिया।
-मतलब यह आंदोलन पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान के मुसलमानों के लिए हो रहा है। ठीक है न?
-नहीं-नहीं, यह आंदोलन बाबासाहेब के संविधान को बचाने के लिए है। आप कन्फ़्यूज़ कर रहे हैं।
-इसमें क्या कन्फ़्यूज़न है?
-बतौर जेएनयू की रिलिजियस पर्सिक्यूशन रिसर्चर आप यह कहना चाहती हैं कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान में मुसलमानों पर भी धार्मिक अत्याचार हो रहा है? मतलब इन तीनों इस्लामी मुल्कों में मुसलमान भी धर्म-परिवर्तन के शिकार हो रहे हैं। उनका भी मजहब बदलवाया जा रहा है।
-नहीं-नहीं। आप हमें कन्फ़्यूज़ नहीं कर सकते। हम लोग अंबेडकर के संविधान को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।  
-मैं आप लोगों को क्या कन्फ़्यूज़ करूंगा। आप लोग तो पहले से ही कन्फ़्यूज़्ड हैं।

-आप लोग मुसलमानों को शिक्षित करने पर आंदोलन नहीं करेंगी। उनकी ग़रीबी हटाने के लिए आंदोलन नहीं करेंगी। आप लोग आंदोलन सीएए में पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान के मुसलमानों को लाभार्थी बनाने के लिए करेंगी। आप लोग महान हैं। बहरहाल, इजाज़त दीजिए। नमस्कार। आप लोग पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान के मुसलमानों के लिए लड़ते रहिए। शुभकामनाएं।

शनिवार, 7 दिसंबर 2019

रेप की बढ़ती वारदातों के लिए क्या सामाजिक तानाबाना ज़िम्मेदार है?


हरिगोविंद विश्वकर्मा
देश में दिनोंदिन गैंगरेप की बढ़ती वारदातों से हर शरीफ आदमी चिंतित है। वह समझ नहीं पा रहा है कि आधी आबादी पर हो रहा यह जुल्म आख़िर रुक क्यों नहीं रहा है। सख़्त क़ानून का डर बलात्कारी महसूस नहीं क्यों रहे हैं। आख़िर महिलाओं को हवस की निगाह से देखने के इस तरह के माइंडसेट की मूल वजह क्या है? सबसे दुर्भाग्य की बात यह है कि इस मुद्दे पर तो बहस ही नहीं चल रही है। आंदोलन, धरना-प्रदर्शन में असली मुद्दा गौण हो गया है।  

जगह-जगह जो बहस चल रही है। वह मुद्दे से भटकाने वाली ही है। गली-मोहल्ला हो, सड़क हो, बस-ट्रेन हो या फिर देश की सबसे बड़ी पंचायत संसद, हर जगह यही भटकाने वाला मुद्दा छाया हुआ है। कहीं तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में वेटेनरी डॉक्टर से गैंगरेप करने वाले चारों आरोपियों के इनकाउंटर को सही बताया जा रहा है तो कहीं ग़लत। मतलब सज़ा देने के अमानवीय, अलोकतांत्रिक और तालिबानी तरीक़े ज़्यादातर लोग समर्थन कर रहे हैं। जबकि कुछ लोग इस तरह की कार्रवाई का विरोध कर रहे हैं। इस विरोध और समर्थन में मूल मुद्दा ग़ायब है।  

हैदराबाद रोप में ‘न्याय होने’ के बाद लोग उसी तरह की सज़ा की मांग उन्नाव गैंगरेप के आरोपियों के लिए कर रहे हैं। आक्रोशित लोग धरना-प्रदर्शन के ज़रिए रेपिस्ट को जल्द से जल्द सज़ा-ए-मौत देने की पुरज़ोर पैरवी कर रहे हैं। कहीं-कहीं रिएक्शन और आक्रोश एकदम एक्स्ट्रीम पर है, लोग इस तरह रिएक्ट कर रहे हैं कि अगर उनका बस चले तो रेपिस्ट्स को फ़ौरन फ़ांसी के फ़ंदे से लटका दें। समाजवादी पार्टी की सांसद जया बच्चन ने तो राज्यसभा में यहां तक कह दिया कि बलात्कारियों की मॉब लिंचिंग कर दी जाए। यानी उनको भीड़ के हवाले कर दिया जाए और भीड़ उन्हें पीट-पीट कर मार डाले।

यह भी संभव है कि देश में अचानक बन रहे माहौल के दबाव में केंद्र सरकार बलात्कारियों को जल्दी से सज़ा देने वाला कोई बिल संसद में पेश कर दे और वह क़ानून भी बन जाए। अगर बलात्कारियों का जल्दी फ़ांसी सुनिश्चित करने वाला क़ानून बना तो निश्चित रूप से यह ऐतिहासिक होगा। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या संभावित सख़्त क़ानून से रेप जैसे वीभत्स और हैवानियत भरे अपराध पर पूरी तरह अंकुश लग पाएगा? यह दावे के साथ नहीं कहा जा सकता, क्योंकि 2013 में नया रेप क़ानून बनने के बाद रेप की वारदातें रुकने की बजाय और बढ़ गईं हैं।

बलात्कारियों को सज़ा-ए-मौत देने से रेप की वारदात पर विराम लगने की गारंटी आख़िर कौन देगा? क्या हत्या के लिए मौत की सज़ा के प्रावधान से हत्या रुक गई? इसके लिए फ़ांसी की सज़ा होने के बाद भी हत्याएं क्यों हो रही हैं? इसका मतलब यह है कि जैसे फ़ांसी की सज़ा हत्याएं रोकने में नाकाम रही, वैसे ही कैपिटल पनीश्मेंट रेप को रोकने में कामयाब होगा, इस पर पूर्ण भरोसा नहीं किया जा सकता। क्योंकि जब पुरुष पर वहशीपन या हैवानियत सवार होता है तो वह क्वांटम ऑफ़ पनीश्मेंट के बारे में सोचता ही नहीं, अगर सोचता तो अपराध ही न करता। लिहाज़ा, ऐसे क़ानून के अस्तित्व में आने के बाद भी रेप का सिलसिला जारी रह सकता है।

दरअसल, हिंदुस्तानी बहुत भावुक किस्म के होते हैं। भावुकता में इंसान का विवेक और उसकी तर्क-क्षमता कुंद हो जाती है। वह संतुलित एवं संयमित ढंग से सोच ही नहीं पाता। कोरी भावुकता इंसान को समस्या की जड़ तक पहुंचने ही नहीं देती। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि भावुकता सही मायने में समस्या को आइडेंटीफ़ाई करने में सबसे बड़ी बाधा है। जब तक इंसान भावुक होकर सोचेगा, किसी समस्या का सही हल नहीं कर सकेगा। इसलिए यह वक़्त भावुक होने की नहीं, बल्कि इस बात पर विचार करने का है कि रेप जैसे अपराध को रोका कैसे जाए। रेपिस्ट को दंड देने की बात तो बाद में आती है। अगर कुछ ऐसा प्रावधान हो जाएं कि रेप जैसा अपराध ही नियंत्रित हो जाए तो दंड पर ज़्यादा दिमाग़ खपाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।

अगर इस बिंदु पर ग़ौर करेंगे तो सवाल उठेगा कि आख़िर बलात्कार जैसा जघन्य अपराध होता ही क्यों हैं। क्यों पुरुष औरत को एकांत में देखकर अपना विवेक, जो उसे इंसान बनाता है, भूल जाता है और वहशी और हैवान बन जाता है? क्यों वह यौन-भुखमरी (सेक्स स्टारवेशन) का शिकार हो जाता है? एक स्त्री जो हर इंसान के लिए आदणीय होनी चाहिए, माता-बहन के समान होनी चाहिए, क्यों वहशी पुरुष के लिए भोग की वस्तु बन जाती है? यानी क्यों किसी जगह स्त्री की कम संख्या से पुरुष उसे कमज़ोर मान लेते हैं और उसके साथ मनमानी करने लगते हैं। इस विषय पर गंभीरता और संयम से विचार करने के बाद लगता है कि रेप ही नहीं, महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले छोटे-बड़े हर ज़ुल्म के लिए हमारे समाज का ताना-बाना ही मुख्य तौर पर ज़िम्मेदार है।

हमारे समाज का तानाबाना बुरी तरह मेल-डॉमिनेटेड है। ऐसे समाज में स्त्री चाहकर भी पुरुष की बराबरी कर ही नहीं सकती, क्योंकि यह ढांचा स्त्री को दोयम दर्जे की नागरिक यानी सेकेंड सेक्स का दर्जा देता है। सभ्यता के विकास के बाद जब से मौजूदा समाज प्रचलन में आया है, तब से स्त्री दोयम दर्जे की ही नागिरक रही है। शहरों में लड़कियों को जींस-टीशर्ट में देखकर हम कुछ समय के लिए भले ख़ुश हो लें कि समाज में महिलाएं पुरुषों की बराबरी कर रही हैं, लेकिन सच तो यह है कि स्त्री कभी पुरुष की बराबरी कर ही नहीं पाई। यह एक स्त्री से बेहतर और कोई नहीं जान सकता। पुरुष-प्रधान समाज की मानसिकता ही स्त्री को बराबरी का दर्जा देने भी नहीं देती।

आज ज़रूरत इस बात की है कि समाज में वे तमाम प्रावधान किए जाएं जो सही मायने में स्त्री को बराबरी के मुकाम तक पहुंचाते हैं। इसके लिए शुरुआत घर से करनी होगी। जो लोग गैंगरेप की मुख़ालफ़त कर रहे हैं, क्या वे अपने घर में स्त्री को बराबरी का दर्जा देते हैं। क्या वे घर में बेटे-बेटी में फ़र्क़ नहीं करते? संसद में भावुक होने वाले नेता क्या स्त्री के प्रति बायस्ड नहीं हैं? राजनीति में एकाध अपवाद को छोड़ दें, तो हर जगह पिता की विरासत केवल बेटा ही क्यों संभालता है? पुत्रों का पिता की विरासत संभालना, यही दर्शाता है कि बड़े राजनीतिक घराने में ही बेटियों के साथ पक्षपात होता है।

जवाहरलाल नेहरू की उत्तराधिकारी इंदिरा गांधी इसलिए बन सकीं, क्योंकि नेहरू को पुत्र नहीं था। आज भी उन्हीं एडवांस फ़ैमिलीज़ में बेटियां उत्तराधिकारी बनती हैं, जहां पुत्र नहीं होते। जब विकसित परिवारों में स्त्री के साथ खुला पक्षपात और दोयम दर्जे का बर्ताव हो, तो दूर-दराज़ और पिछड़े इलाक़ों में स्त्री की क्या हैसियत होती होगी, सहज कल्पना की जा सकती है। संसद ने महिलाओं को आरक्षण देने वाला बिल पास ही नहीं किया। यह मुद्दा मौजूदा सरकार के दूसरे कार्यकाल में भी एजेंडे में नहीं है। फिर ये लोग गैंगरेप पर क्यों चिंता जता रहे हैं? ज़ाहिर है, इनका स्त्रीप्रेम छद्म है, हक़ीक़त से परे है। महिला आरक्षण पर इनका मौन इन्हें पुरुष-प्रधान समाज का पैरोकार ही नहीं बनाता, बल्कि यह भी दर्शाता है कि इनका महिलाओं को पुरुषों के बराबर का दर्जा देने में कोई दिलचस्पी नहीं। सब अपनी-अपनी रोटी सेंक रहे हैं।

अगर सचमुच ये लोग महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने के हिमायती हैं तो संसद और विधान सभाओं समेत हर जनपंचायत में 33 फ़ीसदी नहीं, बल्कि 50 फ़ीसदी जगह महिलाओं के लिए सुनिश्चित करने की पहल करें। देश में महिलाओं की आबादी क़रीब-क़रीब फ़िफ़्टी परसेंट है तो आरक्षण 33 फ़ीसदी क्यों? एक बात और, महिला आरक्षण का लाभ केवल एडवांस्ड परिवारों की लड़कियां या महिलाएं ही हाईजैक न कर लें, बल्कि इसका लाभ सामाजिक रूप से पिछड़े समाज यानी ग़रीब, आदिवासी, दलित, पिछड़े और मुस्लिम परिवार की महिलाओं को मिले, यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

चूंकि देश में आधी जनसंख्या महिलाओं की है, लिहाज़ा उनके लिए हर जगह 50 फ़ीसदी जगह आरक्षित की जाना चाहिए। विधायिका ही नहीं, कार्यपालिका यानी ब्यूरोक्रेसी, पुलिस, आर्मफोर्स, न्यायपालिका, मीडिया हाउसेज़ और धार्मिक संस्थानों, मसलन पुजारियों की संख्या में भी महिलाओं की संख्या पुरुषों के बराबर होनी चाहिए। सरकारी और निजी संस्थान की नौकरियों में आधी जगह महिलाओं को दी जानी चाहिए। बैंक हो, यूनिवर्सिटी हो या अन्य संस्थान हर जगह आधी जगह महिलाएं हों। महिलाएं घर में क्यों बैठें? वे काम पर क्यों न जाएं?

अगर 50 फ़ीसदी महिलाएं काम पर जाएंगी तो बाहर उनकी विज़िबिलिटी पुरुषों के बराबर होगी। यानी हर सावर्जनिक जगह पर इक्का-दुक्का महिला की बजाय बड़ी संख्या में महिलाएं दिखेंगी। इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ेगा। सड़क, बस, ट्रेन और दफ़्तरों में महिलाओं की बराबर मौजूदगी से किसी पुरुष की ज़ुर्रत नहीं कि उसकी ओर बुरी निग़ाह डाले। महिलाओं की कम संख्या लंपट पुरुषों का हौसला बढ़ाती है। इस मुद्दे पर ईमानदारी से सोचने वाला व्यक्ति इसका समर्थन करेगा। महिलाओं को अबला या कमज़ोर होने से बचाने के लिए उनका इम्पॉवरमेंट ही एकमात्र विकल्प है। यही हर समस्या का स्थाई हल भी है। जब संसद में 770 सदस्यों में से 385 महिलाएं होंगी, केंद्र और राज्य-मंत्रिमंडल में महिला-पुरुष बराबर होंगे, ब्यूरोक्रेसी में आधी संख्या में स्त्री होगी, अदालतों में 50 फ़ीसदी जज महिलाएं होंगी, पुलिस थानों में पुलिस वर्दी में आधी लड़कियां होंगी तो अपने आप महिला पुरुष की बराबरी कर लेगी। वह क़ानून की बैसाखी के बिना भी सही-सलामत और महफ़ूज़ रहेगी।

लेकिन क्या ऐसा होगा? क्या नारी को अबला और वस्तु मानने वाला पुरुष-प्रधान समाज सत्ता महिलाओं को सौंपने के लिए तैयार होगा? सबसे बड़ा सवाल यही है। इसमें परंपराएं और संस्कृति सबसे बड़ी बाधा हैं जिनमें आमूल-चूल बदलाव की ज़रूरत है। अगर हम सही मायने में महिलाओं को पुरुष के बराबर खड़ा करना है तो उन सभी ग्रंथों-किताबों को पुनर्परिभाषित करना होगा जो पति को ‘परमेश्वर’ और पत्नी को ‘चरणों की दासी’ मानते हैं। हमें उन त्यौहारों को प्रमोट करने से बचना होगा, जिसमें पति की सलामती के लिए पत्नी व्रत रखती है। स्त्री को घूंघट या बुरके की नारकीय परिपाटी से मुक्ति दिलानी होगी। लेकिन सवाल यह है कि क्या समाज इसके लिए तैयार होगा? अगर हां तो बदलाव की शुरुआत तुरंत करनी चाहिए, अगर नहीं तो महिलाओं से रेप पर घड़ियाली आंसू बहाने का क्या औचित्य, क्योंकि वस्तुतः यह समाज पुरुष-प्रधान यानी मेल-डॉमिनेटेड है और ऐसे समाज में रेप नहीं रोका जा सकता। चाहे रेपिस्ट को पब्लिकली ज़िंदा जलाने का क़ानून बना दिया जाए। यानी पुरुष प्रधान समाज है, रेप होगा ही क्योंकि अपनी जटिलताओं के चलते यह समाज महिलाओं को अल्पसंख्यक बना देता है।
(समाप्त)

शनिवार, 30 नवंबर 2019

आखिर शरद पवार ने क्यों दिया शिवसेना को ही समर्थन?


आखिर शरद पवार ने क्यों दिया शिवसेना को ही समर्थन?

हरिगोविंद विश्वकर्मा
अब जबकि महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना-राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी-कांग्रेस की महा विकास अघाड़ी सरकार ने राज्य विधान सभा में बहुमत हासिल कर लिया है। इस बात पर चर्चा करना समीचीन होगा कि महाराष्ट्र की राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार ने अपने दो धुर विरोधी दलों भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना में से शिवसेना को ही समर्थन देने और तीन दलों की महा विकास अघाड़ी बनाकर राज्य सरकार में शामिल होने का फ़ैसला क्यों किया?

जब से शरद पवार ने यह निर्णय लिया है, तब से राजनीतिक टीकाकार इस बात पर माथापच्ची कर रहे हैं कि आख़िर मराठा क्षत्रप ने शिवसेना को ही समर्थन क्यों दिया? जब किसी दक्षिणपंथी दल के साथ जाना ही था तो पवार भाजपा के साथ क्यों नहीं गए, जबकि 2014 के विधान सबा चुनाव में किसी दल को बहुमत न मिलने पर उन्होंने भाजपा को समर्थन देने के साफ संकेत दे दिए थे। तो इस बार पवार ने भाजपा की बजाय शिवसेना को क्यों चुना? इस मुद्दे पर राजनीतिक टीकाकार आगे भी लंबे समय तक सिर खपाते रहेंगे।

दरअसल, महाराष्ट्र की सत्ता के कारीडोर से परिचित लोग मानते हैं कि भाजपा के साथ जाने पर पवार को फ़ायदा ही फ़ायदा था। भाजपा के साथ गठबंधन बनाने पर मुमकिन था कि कांग्रेस पवार का साथ न देती लेकिन इसके बावजूद पवार साहब के दोनों हाथ में लड्डू होते। मसलन, पहला लाभ यह होता कि एनसीपी को केंद्र सरकार में एक या वह चाहती तो दो मंत्री पद मिल सकते थे। मतलब ख़ुद पवार और उनकी लोकसभा सदस्य बेटी सुप्रिया सुले या सीनियर एनसीपी लीडर प्रफुल्ल पटेल केंद्र में कैबिनेट मंत्री बन सकते थे।

दूसरा एनसीपी के जिन नेताओं के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के मामले चल रहे हैं, उन्हें ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता। ज़ाहिर है इससे क़रीब 25 हज़ार करोड़ रुपए के महाराष्ट्र सहकारी बैंक घोटाले में मनी लॉन्डरिंग मामले में प्रवर्तन निदेशालय के राडार में आए ख़ुद शरद पवार और सिंचाई विभाग में कई हज़ार करोड़ के घोटाले में कथित तौर पर शामिल उनके भतीजे अजित पवार को राहत मिल सकती थी। इक़बाल मिर्ची के साथ कारोबारी रिश्ते के गंभीर आरोप का सामना कर रहे सीनियर एनसीपी लीडर प्रफुल्ल पटेल प्रवर्तन निदेशालय के शिकंजे से बच सकते थे। इसके अलावा दिल्ली के महाराष्ट्र सदन समेत कई घोटाले में कथित तौर पर शामिल होने के कारण लंबे समय तक जेल में बंद रहे छगन भुजबल और जयंत पाटिल को भी फ़ौरी तौर पर राहत मिल सकती थी।

ऊपर से भाजपा के साथ महाराष्ट्र में सरकार बनाने से शरद पवार जितना चाहते, उन्हें मंत्री पद मिल जाते। जबकि शिवसेना के साथ जाने से उनको 12 से अधिक मंत्री पद नहीं मिलने वाला। इसके बावजूद शरद पवार ने शिवसेना का साथ दिया। कहा जाता है कि अजित पवार को एनसीपी संसदीय दल का नेता चुने जाने के लिए हुई निर्वाचित विधायकों की बैठक में ख़ुद अजित पवार और धनंजय मुंडे भाजपा के साथ सरकार बनाने की पैरवी कर रहे थे, जबकि नवाब मलिक और दूसरे नेता भाजपा की बजाय शिवसेना को समर्थन देने की बात कर रहे थे।

सबकी राय सुनने के बाद शरद पवार ने अपना फ़रमान सुनाया। वह फ़रमान था कि एनसीपी भाजपा के साथ नहीं, बल्कि शिवसेना के साथ मिलकर सरकार बनाएगी। दरअसल, एनसीपी में शरद पवार का क़द इतना ज़्यादा विशाल है कि बाक़ी सभी नेता उनके सामने बौने नज़र आते हैं। किसी में उनकी बात काटने की न कूवत है न हिम्मत। लिहाज़ा, सबके सब ने चुपचाप साहेब का आदेश सिरोधार्य कर लिया और यह निश्चित हो गया कि अगली सरकार में एनसीपी और कांग्रेस शामिल होंगे, क्योंकि कांग्रेस में भी पवार के फ़ैसले को काटने की किसी में हिम्मत नहीं है। इसके बाद आगे की रणनीति पर काम होने लगा।

जब मीडिया में ख़बर आई कि एनसीपी शिवसेना के साथ सरकार बनाएगी तो लोग भी हैरान हुए कि एनसीपी शिवसेना के साथ सरकार कैसे बनाएगी और उसमें कांग्रेस किस भूमिका में शामिल होगी? दरअसल, इसका जवाब खोजने के लिए शरद पवार के राजनीतिक जीवन पर नज़र डालनी पड़ेगी।

पवार पहली बार 18 जुलाई 1978 को मुख्यमंत्री बने थे। इसके लिए उनको अपने गुरु वसंतदादा पाटिल की सरकार गिरानी पड़ी थी। वह 20 महीने मुख्यमंत्री रहे। दूसरी बार वह 26 जून 1988 को मुख्यमंत्री बने जब राजीव गांधी ने उन्हें कांग्रेस में वापस लिया। इस बार वह लगभग तीन साल मुख्यमंत्री रहे। तीसरी और अंतिम बार शरद पवार 6 मार्च 1993 को मुख्यमंत्री बने और दो साल तक शासन किया।

1995 के विधानसभा चुनाव कांग्रेस हार गई और पहली बार राज्य में शिवसेना-भाजपा भगवा गठबंधन सरकार बनी। 1999 में शरद पवार ने कांग्रेस से अलग होकर एनसीपी बना ली और अपने बूते पर चुनाव में उतरे थे। 1999 के चुनाव में शिवसेना (69) और भाजपा (56) का गठबंधन केवल 125 सीट जीत सका। सरकार बनाने के लिए ज़रूरी 20 विधायक का समर्थन भगवा गठबंधन को नहीं मिल सका। इसके बाद सरकार बनाने के लिए 75 सीट जीतने वाली कांग्रेस और 58 सीट जीतने वाली एनसीपी के बीच पोस्टपोल गठबंधन हुआ। 15 निर्दलीय विधायकों के समर्थन से विलासराव देशमुख पहली बार राज्य के मुख्यमंत्री बने।

एनसीपी सरकार में अहम पार्टनर थी और सरकार उस पर निर्भर थी। लिहाज़ा, रोज़ाना सुबह-सुबह शरद पवार का फोन मुख्यमंत्री के सरकारी आवास वर्षा में आने लगा। पवार साहब देशमुख को ज़रूरी दिशा-निर्देश देते थे। चूंकि सरकार पवार के समर्थन के बिना चल नहीं सकती थी, इसलिए रोज सुबह पवार साहब का कॉल अटेंड करना देशमुख की मजबूरी थी। चुनाव से कुछ महीने पहले देशमुख की जगह सुशील कुमार शिंदे मुख्यमंत्री बने। उनको भी रोज़ाना पवार साहब का फोन अटेंड करना पड़ता था।

इसी तरह 2004 के चुनाव में भी शिवसेना (62)-भाजपा (54) गठबंधन को 116 सीट मिली। इस बार कांग्रेस की सीट 75 से घटकर 69 हो गई, जबकि एनसीपी 58 से 71 पर पहुंच गई। लेकिन पवार साहब ने मुख्यमंत्री पद पर दावा नहीं किया। वह उपमुख्यमंत्री पद से संतुष्ट हो गए। विलासराव देशमुख दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। इस बार भी रोज़ सुबह उनको पवार का कॉल अटेंड करना पड़ता था। 2008 में मुंबई पर आतंकी हमले के बाद क्षतिग्रस्त होटल ताज में बेटे रितेश देशमुख और फिल्मकार रामगोपाल वर्मा को ले जाने की गलती पर देशमुख को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा और अशोक चव्हाण नए मुख्यमंत्री बने। उनको भी रोज़ सुबह पवार साहब का फोन कॉल लेना पड़ता था।

2009 के चुनाव में कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन को जबरदस्त सफलता मिली और 144 सीट जीतकर यह गठबंधन बहुमत (145) के मुहाने पर पहुंच गया। हालांकि एनसीपी 71 से 62 सीट पर आ गई, लेकिन कांग्रेस 69 से 82 पर पहुंच गई। राज्य में फिर कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन की सरकार बनी। अशोक चव्हाण पहली बार से अधिक शक्तिशाली मुख्यमंत्री के रूप में सत्तानशीं हुए। लेकिन पवार साहब का कॉल उनको लेना ही पड़ता था। महीने भर में ही आदर्श घोटाले के कारण चव्हाण की कुर्सी चली गई। 11 नवंबर 2010 को दिल्ली से पृथ्वीराज चव्हाण मुख्यमंत्री बनाकर भेजे गए। अब वर्षा में आने वाले पवार साहब के कॉल वही अटेंड करते थे। यह सिलसिला 2014 तक चला।

2014 में नरेंद्र मोदी लहर में पूरे देश की तरह यहां भी कांग्रेस-एनसीपी को पराजय का मुंह देखना पड़ा। भाजपा और शिवसेना ने अलग-अलग चुनाव लड़ा। इस चुनाव में भाजपा को शानदार सफलता मिली परंतु 122 सीट जीतने के बावजूद भाजपा सत्ता से 23 सीट पीछे थी। लिहाज़ा, पवार ने भाजपा को समर्थन देने का साफ़ संकेत दे दिया। इससे शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे पर नवनिर्वाचित विधायकों का सरकार में शामिल होने के लिए ज़बरदस्त दबाव पड़ा और नौबत शिवसेना में विभाजन की भी आ गई। मजबूरी में उद्धव छोटे भाई के रूप में भाजपा-शिवसेना गठबंधन सरकार में शामिल होने के लिए तैयार हुए और देवेंद्र फड़णवीस राज्य के मुख्यमंत्री हुए।

शपथ लेने के बाद फडणवीस जैसे ही वर्षा में शिफ़्ट हुए, उन्हें रोज़ सुबह पवार साहब के कॉल आने लगे। फडणवीस नए-नए चीफ़मिनिस्टर बने थे, सो अनिच्छा के बावजूद वह पवार के कॉल अटेंड कर लेते थे। कुछ समय बाद उनको लगा कि वर्षा में कॉल करना और मुख्यमंत्री को ज्ञान देना पवार का शगल बन गया है। लिहाज़ा, उन्होंने पवार साहब का कॉल नज़रअंदाज़ करना शुरू कर दिया। उनके नज़रअंदाज़ करने के बावजूद कुछ दिन तक पवार साहब के कॉल आते रहे लेकिन धीरे-धीरे कॉल आने बंद हो गए।

2019 के चुनाव में भाजपा को अपने बल पर बहुमत न मिलने से सत्ता की चाबी एक बार फिर पवार के हाथ में आती दिखी। अंतिम नतीजे आने से पहले ही उन्होंने अपने क़रीबी शिवसेना प्रवक्ता संजय राऊत की ओर चारा फेंक भी दिया। पवार जानते थे कि फडणवीस सीएम बनेंगे तो उनका कॉल अटेंड नहीं करेंगे, लेकिन शिवसेना का सीएम ऐसी हिमाक़त नहीं कर सकता। शिवसेना मुख्यमंत्री पद की लालच में पवार साहब के जाल में उलझ गई। चुनाव में सत्ता के लिए 50-50 प्रतिशत की भागीदारी की बात करने वाली जो शिवसेना 124 सीट मिलने और चुनाव प्रचार में देवेंद्र फडणवीस का बार बार नाम उछाले जाने पर चुप रही उसी पार्टी ने भाजपा को बहुमत से 40 सीट दूर देखकर उसके सामने ढाई साल का मुख्यमंत्री पद देने का प्रस्ताव रख दिया।

इसे भाजपा स्वीकार नहीं कर सकती थी। लिहाज़ा, पार्टी ने विपक्ष में बैठने का फैसला किया। यही तो शरद पवार साहब चाहते थे। लिहाज़ा, उनकी पसंद के उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बन गए हैं। क़रीब पांच साल बाद अब फिर पवार साहब का कॉल मुख्यमंत्री सीधे अटेंड करेगा। यही तो पवार साहब चाहते थे, इसीलिए उन्होंने मज़बूत भाजपा (105 सीट) की जगह कमज़ोर शिवसेना (56 सीट) को समर्थन देने का फैसला किया और सरकार बनवाकर अमित शाह से बड़े चाणक्य का तग़मा हासिल कर लिया।