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सोमवार, 30 मार्च 2020

क्या है तबलीग़ी आलमी मरकज़?

यह जानने के लिए ज़रूर पढ़े... 

हरिगोविंद विश्वकर्मा
अपना दिल थाम लीजिए, क्योंकि भारत में चीनी कोरोना वायरस (चीनी कम्युनिस्ट पार्टी वाइरस यानी सीसीपी वायरस यानी कोविड-19) से संक्रमित कोरोना पॉजिटिव मरीज़ों की संख्या में विस्फोट होने वाला है। यह संख्या किसी भी समय बहुत ज़्यादा बढ़ सकती है। यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा कि राजधानी दिल्ली ही नहीं, बल्कि पूरे देश में सीसीपी वायरस का एपीसेंटर दिल्ली के निजामुद्दीन पश्चिम में स्थित तबलीग़ी जमात का आलमी मरकज़ यानी ग्लोबल सेंटर ही होगा।

ऐसे समय में जब विश्स स्वास्थ्य संगठन और अन्य विशेषज्ञ घातक कोरोनावायरस के प्रसार पर अंकुश लगाने के लिए 'सामाजिक दूरी' रखने की अपील कर रहे हैं और चीनी वायरस को और फैलने से रोकने के लिए पूरे देश में लॉकडाउन घोषित किया गया है। 17 से 19 मार्च 2020 के दौरान 300 से ज़्यादा विदेशियों समेत तक़रीबन 3500 तबलीग़ जमात के लोग इस मकरज़ की बंगलेवाली मस्जिद में एकत्रित हुए थे।

तबलीग़ी आलमी मरकज़ में हुए तीन दिवसीय सम्मेलन के बाद तक़रीबन हज़ार देसी-विदेशी इस्लामी प्रचारक 10 या 12 के समूह में देश के अलग-अलग हिस्सों में चले गए। यह कहना ग़लत नहीं होगा कि तबलीग़ी जमात के लोगों ने कोरोना वायरस को देश के हर इलाक़े में मुसलमानों में फैला दिया है। ऐसा ही एक समूह तेलंगाना की मस्जिद में बैठक में भाग लिया, जिनमें से सोमवार को पांच लोगों को कोविड-19 से मौत हो गई है। इसके अलावा प्रोग्राम में शिरकत करने वाले तमिलनाडु के व्यक्ति की मौत हो गई। अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में सभी 10 कोरोना पॉजिटिव यहीं से गए थे। कश्मीर में जिस व्यक्ति की जान गई है, वह भी यहां से इस्लाम के प्रचार-प्रसार का हुनर सीख कर गया था।

जब पूरा देश अपने घरों में क़ैद है, तब लीग़ी मरकज़म 1500 लोग सोशल डिस्टेंसिंग की अपील को धता-बता कर एक साथ रह रहे थे। इन लोगों ने एक साथ जुमे की नमाज़ भी पढ़ी। यहां आए लोगों को मौलानाओं ने आश्वस्त करते हुए कहा था, “डरो मत अल्लाह-ताला हमें कोरोना वाइरस से दूर रखेगा।” अब बड़ी संख्या में इस कार्यक्रम मं शामिल हुए लोग कोरोना पॉजिटिव निकल रहे हैं। यह देखकर सरकार के हाथ-पांव फूल गए हैं।

दरअसल, सोमवार को तेलंगाना में छह लोगों की कोरोना वायरस से मौत की खबर आई तो पूरे देश में हड़कंप मच गया। ये सभी लोग तबलीग़ी आलमी मरकज़ में इस्लाम के प्रचार-प्रसार के लिए आयोजित मजहबी प्रोग्राम में हिस्सा लेकर अपने घरों को लौटे थे। कार्यक्रम में शामिल क़रीब नौ सौ लोगों में कोरोना के संक्रमण की आशंका बताई जा है। पूरे देश में लॉकडाउन के बावजूद इतनी बड़ी संख्या में राजधानी में हुए इस धार्मिक आयोजन ने सुरक्षा-व्यवस्था की पोल खोल दी है।

अब केंद्र और राज्य सरकारें तबलीग़ी आलमी मरकज़ में हुए तीन दिवसीय सम्मेलन में शामिल सभी लोगों को ढूंढकर उनकी जांच करने में जुटी हैं। ऐसे में, ज़ाहिर है, आपकी जिज्ञासा तबलीगी जमात के बारे में जानने की हो रही होगी, कि आखिर क्या है यह जमात और दिल्ली में इतनी बड़ी संख्या में क्यों हो रहा था इसका आयोजन? दरअसल, तबलीगी जमात मरकज का हिंदी में अर्थ होता है, अल्लाह की कही बातों का प्रचार करने वाले तालिबों के समूह का केंद्र। तबलीगी जमात से जुड़े लोग पारंपरिक इस्लाम को मानते हैं और इसी का प्रचार-प्रसार करते हैं। एक दावे के मुताबिक इस जमात के दुनिया भर में 15 करोड़ सदस्य हैं। बताया जाता है कि तबलीगी जमात आंदोलन को 1927 में मुहम्मद इलियास अल-कांधलवी ने हरियाणा के नूंह जिले के गांव से शुरू किया था।

तबलीगी जमात के मुख्य उद्देश्य "छह उसूल" (कलिमा, सलात, इल्म, इक्राम-ए-मुस्लिम, इख़्लास-ए-निय्यत, दावत-ओ-तबलीग़) हैं। एशिया में इनकी अच्छी खासी आबादी है। राजधानी दिल्ली का निजामुद्दीन में इस जमात का मुख्यालय है। इस जमात को अपनी पहली बड़ी मीटिंग करने में करीब 14 साल का समय लगा। अविभाजित भारत में ही इस जमात ने अपना आधार मज़बूत कर चुका था। 1941 में 25,000 तबलीग़ियों की पहली मीटिंग आयोजित हुई।

बहुमंजिला बंगलेवाली मस्जिद भीड़ वाली सड़क पर स्थित है। सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया का मकबरे इससे सटा हुआ है। इस्लाम मजहब के प्रचार प्रसार के लिए यहां हर साल तबलीग़ ढोल और नगाड़े की थापों के बीच सूफी की मजार पर चादर चढ़ते हैं। लंबी दाढ़ी रखने और लंबा कुरता और छोटा पैजामा पहनने वाले मौलवी इस्लाम का प्रचार-प्रचार करते हैं। तब्लीगी जमात के मरकज़ और निज़ामुद्दीन औलिया की मजार के बीच, कालजयी शायर मिर्ज़ा ग़ालिब की मजार है। समुदाय के कई लोग कहते हैं कि तबलीग़ी जमात के लोग धर्म प्रचारकों को पलायनवादी और दुनिया से कटे हुए होते हैं, क्योंकि ये लोग ज़मीन के नीचे और आकाश के ऊपर की बातों का ज़िक्र करते हैं।

तबलीग़ी का दावा है कि किसी के पास इस मरकज़ में आने वाले सदस्यों की सूची या रजिस्टर नहीं है, लेकिन इसके सदस्य दुनिया भर में फैले हुए हैं। धीरे-धीरे यह आंदोलन पूरी दुनिया में फैल गया और दुनिया के अलग-अलग देशों में हर साल इसका सालाना कार्यक्रम होता है। तबलीग़ी इस जमात का सबसे बड़ा जलसा हर साल बांग्लादेश में आयोजित होता है। भारत और पाकिस्तान में भी इस जमात का सालाना जलसा होता है। इन जलसों में दुनिया के क़रीब 200 देशों से बड़ी संख्या में मुसलमान शिरकत करते हैं। इस तरह तबलीगी आलमी मरकज़ के कारण भारत में आंशिक सामुदायिक विस्तार शुरू हो गया है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने यह बात स्वीकार किया है कि स्थिति ख़तरनाक है।

रविवार, 29 मार्च 2020

Corona Virus - चीन के लिए दुनिया भर में बढ़ रही है नफ़रत


हरिगोविंद विश्वकर्मा
ऐसे समय जब चीन की लापरवाही से चीन के वुहान से निकलकर दुनिया भर में फैल चुके कोरोना वायरस से बहुत बड़ी तादाद में मौत और संक्रमण की ख़बरें मिल रही है। तब चीन और चीन के लोगों के ख़िलाफ़ दुनिया भर में नफ़रत बहुत तेज़ी से बढ़ रही है। वॉट्सअप, फ़ेसबुक, ट्विटर और दूसरी सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर लोग इन मौतों के लिए चीन को ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं और चीन पर  जमकर गुस्‍सा निकाल रहे रहे हैं। बड़ी संख्या में लोग चीन में निर्मित सामानों के बहिष्कार की अपील कर रहे हैं तो बहुत बड़ी तादाद में लोग चीन के ख़िलाफ़ अंतरराष्ट्रीय अदालत में मुक़दमा दर्ज करने की पैरवी कर रहे हैं।

अमेरिका, यूरोप ही नहीं एशिया और चीन के पड़ोसी देशों से लोगों में चीन के प्रति ग़ुस्सा और नफ़रत देखी जा रही है। सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर बहुत सारे लोग कोरोना संबंधी ट्वीट करने के लिए कुंगफू, चाइना वायरस और कम्युनिस्ट वायरस जैसे हैशटैग का इस्तेमाल कर रहे हैं। ऐसी साइटों पर डाटा टै्रफिक 1000 फीसदी तक बढ़ गया है। कुछ मीडिया आउटलेट्स भी एशियाई लोगों के खिलाफ भड़काने का काम कर रहे हैं।

भारत में 21 दिन के लॉकडाउन के कारण बहुत से लोगों का समय सोशल मीडिया, कम्युनिकेशन एप्स, चैट रूम और गेमिंग में बीत रहा है। इस दौरान बहुत बड़ी संख्या में लोग चीन और चीन लोगों के ख़िलाफ़ संदेश भेजकर कोरोना फैलाने में उनका हाथ बता रहे हैं। देश में कोरोना का क़हर बहुत तेज़ी से फैल रहा है।

इज़रायल स्थित टेक स्टार्टअप लाइट की रिपोर्ट कहती है कि कोरोना वायरस को लेकर भारी तादाद में लोग चीन को ज़िम्मेदार मान रहे हैं। इसलिए वे चीन के लोगों के लिए नफ़रत भरे संदेश भेजकर बीज़िंग के खिलाफ भड़ास निकाल रहे हैं। लोगों के संदेशों में गाली गलौज़, विषवमन, आक्रोश और ग़स्सा दिख रहा है। यह स्टार्टअप सोशल मीडिया पर समाज विरोधी कंटेंट की आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से निगरानी करता है।

टेक स्टार्टअप लाइट कंपनी के अनुसार चीन से शुरू होने वाली इस महामारी के बाद कुछ दिनों तक तो प्रेरक कंटेंट देखने को मिला लेकिन अब सिर्फ ग़ुस्‍से भरे संदेश ही देखने को मिल रहे हैं। इन संदेशों में दुनिया भर में कोरोना का प्रकोप फैलने के पीछे चीनी कम्युनिस्ट पार्टी को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। इसीलिए बड़ी संख्या में लोग कोरोना वायरस को चीनी वायरस या सीसीपी वायरस कहा जा रहा है।

पश्चिम ही नहीं, पूरी दुनिया मानती है कि कोरोना वायरस चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के कुप्रबंधन ने चलते चीने के बाहर चला गया और आजकल वैश्विक महामारी बन चुका है। अमेरिकी अख़बार ‘दी अपोच टाइम्स’ तो अपनी हर स्टोरी में कोरोना वायरस को सीसीपी वायरस यानी कम्युनिस्ट पार्टी वायरस के रूप में लिख रहा जा रहा है। अख़बार के मुताबिक, लोग मानते हैं कि कोराना चीन की जनता की लापरवाही से नहीं, बल्कि चीन में सत्तारूढ़ चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की लीपापोती का नतीजा है। इसीलिए इसे सीसीपी वायरस कहा जा रहा है। आस्ट्रेलिया में स्काई न्यूज ने एक वीडियो जिसमें कहा गया है कि चीन ने जान बूझकर दुनिया में कोरोना फैलाया। इस वीडियो पर पांच हजार से अधिक लोगों ने कमेंट किया है।

अमेरिका के कई राजनेता और दक्षिणपंथी समूहों के कार्यकर्ता चेतावनी दे चुके हैं। इसीलिए कोरोना को लेकर चीनी समुदाय के ख़िलाफ़ नस्लभेदी  नफ़रत बढ़ रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा कोविड-19 वायरस को बार-बार चाइनीज वायरस कहने से भी लोगों के मन में चीन के प्रति दुर्भावना बढ़ रही है।

सोमवार, 23 मार्च 2020

Corona Virus - दो महीने से ग़ायब हैं चीन के 2 करोड़ मोबाइल फोनधारक

हरिगोविंद विश्वकर्मा
चीन में कोरोना वायरस के क़हर के बाद 2 करोड़ 10 लाख 3 हजार मोबाइल और 8.40 लाख लैंडलाइन्स फोनों का न तो कॉल के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है और न ही उनके बिल भरे जा रहे हैं। इसलिए मजबूर होकर चीन की सर्विस प्रोवाइडर कंपनियों ने इन फोनों को बंद कर दिया है। इससे दुनिया भर में आशंका यह जताई जा रही है कि चीन में कोविड-19 से बहुत बड़ी संख्या में नागरिकों की मौत हुई, लेकिन वहां की कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार ने मृतक के आंकड़ों पर लीपापोती कर रही है।

अमेरिका के न्यूयॉर्क टाइम्स और वॉशिंगटन पोस्ट के बाद सबसे प्रतिष्ठित अख़बार समूह The Epoch Times ने अपने प्रिंट एवं डिजिटल एडिशन में इस बारे में विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की है। रिपोर्ट के मुताबिक, चीन में 21 मिलियन यानी दो करोड़ दस हजार मोबाइल फोन अकाउंट्स पिछले दो महीने के दौरान डिएक्टिवेट हो गए हैं। आशंका यह जताई जा रही है कि कोरोना वाइरस से जो लोग अपना जान गंवा बैठे, उनका फोन बंद हो गया है। हालांकि चीन कह रहा है कि कोरोना के चलते परेशान होकर लोग मोबाइल फोन अकाउंट बंद कर रहे हैं। आज के दौर में किसी का अपना फोन कोरोना के कारण बंद करने की बात हज़म नहीं हो रही है। इसलिए लग रहा है कि चीन शर्तिया कोरोना मृतकों की संख्या अब भी छुपा रहा है।

चीनी मामलों के टिप्पणीकार तांग जिंगुआन ने 21 मार्च बातचीत कै दौरान कहा, “सेल फोन चीन में लोगों के जीवन का एक बहुत ही अनिवार्य हिस्सा हैं। वहां दुनिया के दूसरे देशों के मुक़ाबले अदिक लोग मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हैं। चीन में डिजिटलीकरण का स्तर दुनिया के किसी भी देश के मुक़ाबले बहुत अधिक ऊंचा है। वहां लोग सेल फोन के बिना जीवित नहीं रह सकते हैं। पेंशन और सामाजिक सुरक्षा के लिए सरकार से व्यवहार करने, ट्रेन टिकट खरीदने, खरीदारी करने के लिए लोग सेल फोन का उपयोग करते हैं।”

तांग जिंगुआन कहते हैं “कम्युनिस्ट शासन में हर चीनी को हेल्थ कोड जनरेट करना पड़ता है, उसके लिए हर नागरिक अपने सेल फोन का उपयोग करता है। फिलहाल, केवल ग्रीन हेल्थ कोड धारक को चीन में कहीं आने-जाने की अनुमति है। ऐसे परिवेश में किसी नागरिक के लिए अपना सेल फोन खाता बंद या रद्द करना असंभव सा है। चीन ने फोन को पंजीकृत करने वाले हर व्यक्ति की पहचान की पुष्टि के लिए 1 दिसंबर, 2019 को अनिवार्य रूप से फेस स्कैनिंग की शुरू की।

तांग जिंगुआन कहते हैं “इससे पहले, 1 सितंबर, 2010 तक चीन को सभी सेल फोन उपयोगकर्ताओं को अपनी वास्तविक पहचान (आईडी) के साथ फोन को पंजीकृत करने की आवश्यकता होती थी, जिसके द्वारा सरकार अपने व्यापक निगरानी प्रणाली के माध्यम से लोगों के भाषणों की मॉनिटरिंग कर सकती थी। इसके अलावा, चीनी लोगों को अपने सेल फोन के साथ अपने बैंक खाते और सामाजिक सुरक्षा खाते को जोड़ना पड़ता है, क्योंकि इन सभी सेवा के ऐप ही फोन के सिम कार्ड का पता लगा सकते हैं और फिर सरकार के डेटाबेस के जरिए यह सुनिश्चित करने के लिए जांच सकते हैं कि अमुक नंबर उसी व्यक्ति का है या नहीं है।"

बीजिंग ने 10 मार्च, 2020 को सेल फोन आधारित हेल्थ कोड को शुरू किया। इसके लिए चीन में हर नागरिक को सेल फोन ऐप इंस्टॉल करना और उसमें अपनी व्यक्तिगत हेल्थ इनफॉर्मेंशन दर्ज जरूरी हो गया। उसके बाद ऐप लोगों के हेल्थ स्टैटस को वर्गीकृत करने के लिए, तीन रंगों में क्यूआर कोड जनरेट करता है। रेड का अर्थ है, व्यक्ति को कोई संक्रामक बीमारी, येलो का अर्थ, व्यक्ति को कोई संक्रामक बीमारी हो सकती है और ग्रीन का अर्थ है कि व्यक्ति को कोई संक्रामक बीमारी नहीं है।

चीनी उद्योग और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने पिछले 19 मार्च 2020 को फरवरी में हर राज्य में फोनधारकों की संख्या बताई। पिछली घोषणा की तुलना में, जिसे नवंबर 2019 तक के डेटा के लिए 18 दिसंबर, 2019 को जारी किया गया था, दोनों सेल फोन धारकों और लैंडलाइन उपयोगकर्ताओं की संख्या में नाटकीय रूप से भारी गिरावट दर्ज की गई है। एक साल पहले इसी अवधि में सेल फोन धारकों खातों की संख्या में वृद्धि हुई थी।

सेल फोन उपयोगकर्ताओं की संख्या 1.600957 बिलियन यानी 160.0957 करोड़ से घटकर 1.579927 बिलियन यानी 157.9927 करोड़ हो गई, जो कि 21.03 मिलियन यानी 2 करोड़ 10 लाख 3 हजार कम है। लैंडलाइन उपयोगकर्ता 190.83 मिलियन यानी 19.083 करोड़ से घटकर 189.99 मिलियन यानी 18.999 करोड़ तक गिर गए, जो कि 0.84 मिलियन यानी 8 लाख 40 हज़ार कम है।

फरवरी 2019 में, संख्या बढ़ गई थी। 26 मार्च, 2019 और 20 दिसंबर, 2018 को मंत्रालय की घोषणाओं के अनुसार, फरवरी 2019 में सेल फोन उपयोगकर्ताओं की संख्या 1.5591 बिलियन यानी 155.91 करेड़ से बढ़कर 1.5835 बिलियन यानी 158.35 करोड़ हो गई, जो कि 24.37 मिलियन यानी 2 करोड़ 43 लाख और सात हजार अधिक है। लैंडलाइन उपयोगकर्ता 183.477 मिलियन यानी 18.3477 करोड़ से बढ़कर 190.118 मिलियन यानी 19.0118 करोड़ हो गए थे, जो 6.641 मिलियन यानी 66 लाख 41 हजार अधिक था।

चीनी राष्ट्रीय सांख्यिकी ब्यूरो के अनुसार, 2019 के अंत में देश की जनसंख्या 2018 की तुलना में 4.67 मिलियन यानी 46 लाख 70 हज़ार अधिक थी, और 1.40005 बिलियन यानी एक अरब 40 करोड़ 50 हज़ार तक पहुंच गई थी। लैंडलाइन उपयोगकर्ताओं में 2020 की कमी फरवरी में राष्ट्रव्यापी क्वारंटीन के कारण हो सकती है, जिसके दौरान कई छोटे व्यवसायों को बंद कर दिया गया था। लेकिन सेल फोन उपयोगकर्ताओं की कमी को इस तरह से नहीं समझाया जा सकता है। सभी तीन चीनी सेल फोन वाहक के ऑपरेशन डेटा के अनुसार, दिसंबर 2019 तक सेल फोन खातों में वृद्धि होती रही, लेकिन 2020 में अचानक तेज़ी से गिरावट हुई।

चीन को सेल फोन मार्केट में लगभग 60 प्रतिशत हिस्सेदार चाइना मोबाइल चीन में मोबाइल सर्विस देने वाली सबसे बड़ी कंपनी है। कंपनी ने बताया कि उसने फरवरी 2020 में 7.254 मिलियन यानी 72 लाख 54 हज़ार सेल फोन धारक खो दिए। इसी तरह जनवरी 2020 में 0.862 मिलियन यानी 86 हजार 2 सौ फोन काते बंद हो गए थे। जबकि कंपनी के मोबाइल खाता धारकों में दिसंबर 2019 में 3.732 मिलियन यानी 37 लाख 32 हज़ार मोबाइल फोन धारकों की बढ़ेतरी हुई थी। 2019 की शुरुआत में चाइना मोबाइल का कारोबर लाभोन्मुख था। जनवरी 2019 में कंपनी के ग्राहकों की संख्या में 2.411 मिलियन यानी 24 लाख 11 हज़ार की बढ़ोतरी हुई थी। इसी तरह फरवरी 2019 में कंपनी के 1.091 मिलियन यानी 10 लाख 91 हज़ार उपयोगकर्ता बढ़े थे।

चीन को सेल फोन मार्केट में लगभग 21 प्रतिशत हिस्सेदार चाइना टेलीकॉम चीन की दूसरी सबसे बड़ी सर्विस प्रोवाइडर कंपनी है। इस कंपनी ने फरवरी 2020 में 5.6 मिलियन यानी 56 लाख उपयोगकर्ता खो दिए। इसी तरह जनवरी 2020 में 0.43 मिलियन यानी 43 लाख उपयोगकर्ता खो दिए। गौरतलब है कि चाइना टेलीकॉम ने 2019 के दिसंबर में 1.18 मिलियन यानी 11 लाख 80 हज़ार उपयोगकर्ता, फरवरी में 2.96 मिलियन यानी 29 लाख 60 हज़ार और जनवरी में 4.26 मिलियन यानी 42 लाख 60 हज़ार उपयोकर्ता हासिल कि किए।

चीन की तीसरी मोबाइल कंपनी चाइना यूनिकॉम ने अभी तक फरवरी का डेटा सार्वजनिक नहीं किया है। इस कंपनी ने जनवरी 2020 में और 2019 की शुरुआत में अपने यूजर्स की संख्या को सर्वजनिक किया है। कंपनी ने जनवरी 2020 में 1.186 मिलियन यानी 11 लाख 86 हज़ार उपयोगकर्ता खो दिए, जबकि पिछले साल फरवरी यानी फरवरी 2019 में कंपनी को 1.962 मिलियन यानी 19 लाख 62 हज़ार उपयोगकर्ता प्राप्त हुए। इसी तरह जनवरी 2019 में कंपनी को 2.763 मिलियन यानी 27 लाख 63 हज़ार उपयोगकर्ता मिले थे।

चीनी सरकार हर वयस्क चीनी नागरिक को अधिकतम पांच सेल फोन नंबर्स के लिए आवेदन करने की अनुमति देता है। 10 फरवरी के बाद से अधिकांश चीनी छात्रों ने स्कूल/कॉलेज बंद होने के चलते सेल फोन नंबर के साथ ऑनलाइन कक्षाएं अटेंड की। इन छात्रों के खाते उनके माता-पिता के नाम से हैं, जिसका अर्थ है कि कुछ माता-पिता को फरवरी में अपने बच्चों के लिए एक नया सेल फोन अकाउंट खोलने की आवश्यकता थी। इसका मतलब फरवरी में मोबाइल यूजर्स की संख्या बढ़नी अपेक्षित थी। अब सवाल यह उठता है कि क्या सेल फोन खातों में नाटकीय गिरावट कोरोना वायरस के कारण मरने वालों के खाता बंदी को दर्शाता है?

तांग जिंगुआन कहते हैं "यह भी संभव है कि कुछ प्रवासी श्रमिकों के पहले दो सेल फोन नंबर थे। एक उनके गृहनगर से है, और दूसरा वे जिस शहर में काम करते हैं। इस हिसाब से फरवरी से वे अपने कार्यस्थल वाले फोन नंबर को बंद कर सकते हैं, क्योंकि वे वहां नहीं जा सकते। आमतौर पर, प्रवासी श्रमिक जनवरी में चीनी नववर्ष के लिए अपने गृह शहर चले जाते थे, और फिर यात्रा प्रतिबंधों ने उस शहर में लौटने से रोक दिया होता जहां वे नौकरी करते थे। चीन में सेल फोन के लिए कुछ मूल मासिक शुल्क के चलते अधिकांश प्रवासी श्रमिक केवल एक सेल फोन रखते हैं। चीनी राष्ट्रीय सांख्यिकी ब्यूरो ने 29 अप्रैल, 2019 को घोषणा की थी कि चीन में 288.36 मिलियन यानी 28 करोड़ 83 लाख 60 हजार प्रवासी श्रमिक थे। पिछले 17 मार्च को चीन सरकार ने कहा कि हुबेई प्रांत को छोड़कर चीन के सभी प्रांतों में 90 प्रतिशत से अधिक व्यवसाय का संचालन शुरू हो गया है। झेजियांग, शंघाई, जिआंगसु, शानडांग, गुआंग्शी और चोंगकिंग में लगभग सभी व्यवसायों ने उत्पादन फिर से शुरू कर दिया है। इस तरह यदि प्रवासी श्रमिकों की संख्या और रोज़गार का स्तर दोनों सही हैं, तो 90 फ़ीसदी से अधिक प्रवासी श्रमिक काम पर वापस आ गए हैं।

तांग जिंगुआन कहते हैं "ऐसा संभव है कि चीन में शटडाउन के कारण हुए आर्थिक उथल-पुथल के चलते कुछ दो फोन रखने वाले लोग अपना दूसरा अतिरिक्त फोन सरेंडर कर सकते हैं, क्योंकि व्यापार बंद होने के कारण, वे अतिरिक्त बिल का खर्च वहन नहीं करना चाहते हैं। बहरहाल, वर्तमान समय में डेटा का विवरण कोई नहीं जानता है। अगर केवल 10 प्रतिशत सेल फोन यूजर्स की करोना से मौत हो जाने से बंद होते तो भी चीन में कोरोना से मरने वालों की संख्या दो मिलियन यानी 20 लाख तक हो जाएगी।” चीन की ओर से जारी मौत की जानकारी दूसरे स्रोतों से मिली सूचना से मेल नहीं खाती है, अन्यथा वहां की स्थिति के बारे में जाना जा सकता है।

चीन की इटली के साथ तुलना करने से पता चलता है कि चीन में मरने वालों की संख्या बहुत कम है। इटली ने भी सी तरह के साधनों को अपनाया जो चीनी शासन ने चीन में इस्तेमाल किया था। इसके बावजूद कोरोना वायरस से इटली में 4,825 मौंते हुई यानी वहां 9 प्रतिशत की मृत्यु दर है। जबकि चीन में वायरस से अधिक बड़ी आबादी के साथ था फिर भी वहां इटली में रिपोर्ट की गई आधी से भी कम 4 प्रतिशत की मृत्यु दर 3,265 लोगों की मौत बताई जा रही है।

हुबेई प्रांत के कोरोना वायरस के एपिसेंटर में गतिविधियां चीन में होने वाली मौतों के आंकड़ों के भी एकदम विपरीत हैं। चीन के वुहान में सात अंतिम संस्कार घरों में जनवरी के अंत में 24 दिन, 24 घंटों के शव जलते रहने की सूचना थी। चीन 16 फरवरी से लगातार हुबेई प्रांत में एक दिन में 5 टन मेडिकल कचरा निकल रहा है और चीन शव जलाने में सक्षम 40 मोबाइल क्रिमेटर्स का उपयोग कर रहा है।

जो भी हो डेटा में कमी के चलते चीन में कोरोना वायरस की मौत एक रहस्य बन गया है। दो करोड़ से ज़्यादा मोबाइल फोन का अचानक बंद होना यही संकेत करता है कि चीन में कोराना वायरस से मरने वालों की वास्तविक संख्या आधिकारिक संख्या से बहुत अधिक भी हो सकती है। गौरतलब है कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के कवरअप और कुप्रबंधन ने कोरोना वायरस को पूरे चीन में फैलने और एक वैश्विक महामारी बनाने की अनुमति दी।


सारी सूचनाएं अमेरिकी अख़बार The Epoch Times से साभार 

शनिवार, 21 मार्च 2020

Corona Virus : बहुत बड़ी विपदा की दस्तक – कोरोना से नहीं, भूख से मरने का ख़तरा अधिक!

हरिगोविंद विश्वकर्मा

फ़ेसबुक या दूसरी सोशल नेटवर्किंग साइट पर ज़्यादातर नौकरीशुदा लोग सक्रिय हैं। जिन्हें नियमित रूप से हर महीने वेतन मिलता है। ज़िंदगी एक सही ढर्रे पर होती है। ज़ाहिर है, उनके सामने कम से कम भोजन का संकट यानी क्वैश्चन ऑफ एग्ज़िस्टेंस नहीं है। उन्हें केवल और बेहतर जीवन की उम्मीद रहती है। उनकी यही एकमात्र समस्या होती है, जिसे जेनुइन समस्या की कैटेगरी में नहीं रखा जा सकता है। कह सकते हैं कि इसलिए अमूमन ऐसे लोग बिंदास रहते हैं। किसी घटना को लेकर बहुत चिंतित नहीं होते, क्योंकि उनके सामने रोटी की संकट नहीं होता है। लॉक्ड डाउन की अवस्था में उनके सामने ‘वर्क फ्रॉम होम’ का विकल्प है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी निजी कंपनियों से अपील भी कर चुके हैं कि संकट की कर्मचारियों का वेतन न काटा जाए। ज़ाहिर है कोई भी कंपनी अपने कर्मचारियों का वेतन नहीं काटने वाली है। इसीलिए नौकरीशुदा लोग बहुत ज़्यादा चिंतित नहीं हैं। कई लोगों के फेसबुक पोस्ट से तो यही लगता है कि कोरोना संक्रमण उनके एक एडवेंचर की तरह हैं, इसीलिए ऐसे लोग इस महामारी के हमले के बाद के घटनाक्रम को उत्सव की तरह ले रहे हैं।

जिनके पास नौकरी नहीं है, या जो दैनिक आधार पर श्रम करने वाले लोग हैं, वे सोशल नेटवर्किंग साइट पर बहुत कम सक्रिय रहते हैं। ऐसे लोगों का ज़्यादातर समय दो जून की रोटी जुटाने में ही चला जाता है। उनके सोशल प्लेटफ़ॉर्म पर बहुत सक्रिय न होने से आम सोशली या नौकरीशुदा व्यक्ति को उनकी सोच, उनकी पीड़ा, उनके दुख-दर्द का एहसास नहीं हो पाता। यह महसूस करना हो तो बाहर जाने वाली ट्रेनों के प्रस्थान स्थल यानी कुर्ला टर्मिनस यानी एलटीटी चले जाइए। सब भाग रहे हैं। सब कुछ छोड़कर भाग रहे हैं। केवल बीवी बच्चों के साथ। ये लोग कोरोना के डर से नहीं भाग रहे हैं, बल्कि ये लोग कोरोना के चंगुल में फंसे देश में होने वाली रोटी के संकट से घबराकर भाग रहे हैं। उन्हें पता है कि कोरोना से लॉक्ड डॉउन का दौर लंबा खिंचा तो वे कोरोना से नहीं तो भुखमरी से अवश्य मर जाएंगे। इसलिए अपने वतन जाना चाहते हैं, गांव में कम से कम दो जून की नहीं तो, एक जून रोटी तो मिल जाएगी।

जिनके पास किसी तरह नौकरी नहीं है। यानी जो लोग जिस दिन काम करते हैं, उन्हें उसी दिन का मेहनताना मिलता है, ज़ाहिर है, उनका सब कुछ, ज़्यादातर का जीवन ही, ख़त्म होने के कग़ार पर है। वे लोग ‘काम नहीं तो दाम नहीं’ जैसे माहौल में ज़िंदा रह पाएंगे, इसे लेकर आश्वस्त नहीं हैं। इन असंगठित क्षेत्र के बदनसीब लोगों के पास ‘वर्क फ्रॉम होम’ का विकल्प ही नहीं है। ज़ाहिर है, इनमें से ज़्यादातर कोरोना संक्रमण से बच जाएंगे, लेकिन कारोबार चौपट होने से उपजे हालात में भोजन का संकट उनकी जान ले लेगा।

दैनिक आधार पर काम करने वाले जानते हैं कि इटली, स्पेन और ब्रिटेन जैसे देश, जहां बेरोज़गारों को इतनी भत्ता मिलता है कि वे साल में एक बार विदेश यात्रा करते हैं, में लोग कोरोना को नियंत्रित नहीं कर पा रहे हैं तो भारत जैसा देश, जहां स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह राम भरोसे हैं, जहां हैं, वहां मुनाफ़ाखोर हेल्थ इश्योरेंस कंपनियों के क़ब्ज़े में हैं, ऐसे हालात में यह देश कोरोना जैसी महामारी से कैसे निपटेगा, यह सब लोग बख़ूबी जानते हैं। कोई भी सरकार भाषण का ज्ञान देने के अलावा कुछ नहीं कर पाती, मौजूदा सरकार भी वही कर रही है। हमारी सरकार कोरोना को चीन की बीमारी समझती रही। कह लें हाथ पे हाथ धरे बैठी रही। जनवरी से ही विदेश से आने वाले हर शख्स पर नज़र नहीं रखा जा सका। यही वजह यह हुई कि कनिका कपूर जैसे लोग कोरोना वायरस लेकर आते रहे और इसे परमाणु संलयन (चेन रिएक्शन) की तरह फैलाते रहे। हर दिन दूसरे दिन से ज़्यादा लोग कोरोना की चपेट में आ रहे हैं। इसलिए फिर कह रहा हूं, इस कोरोना वायरस को फैलने से रोका जाए और इस देश को तुरंत लॉक्ड डॉउन कर दिया जाए।

फ़िलहाल, काम के अभाव में लोग घरों में क़ैद हो रहे हैं। दिन भर से घर में बैठे हैं। चुपचाप। ख़ाली बैठा, मैं कभी फेसबुक पर चला जाता हूं, कभी टीवी चालू कर देता हूं। अभी मैंने जी सिनेमा चैनल पर ‘उजड़ा चमन’ फिल्म देखी। अच्छी फिल्म लगी। फिल्म ख़त्म होने के बाद फिर सोचने लगा। बहुत विचलित हो रहा हूं। समझ में नहीं आ रहा है, क्या किया जाए? आगे क्या होगा? इसकी भी बहुत अधिक चिंता है। दुबई से जबलपुर का चार लोगों का एक परिवार कोरोना पॉजिटिव पाया गया है। इन लोगों ने मुंबई से जबलपुर तक की यात्रा ट्रेन से की। अभी-अभी ख़बर आई है कि विदेश संपर्क के बाद ट्रेन में बिना विदेश संपर्क के आठ कोरोना केस पाए गए हैं। ये लोग दिल्ली से रामगुंडम की यात्रा कर रहे थे। यानी कम्युनिटी स्प्रेड का ख़तरा एकदम हमारी चौखट तक आ गया है।

मंगलवार, 25 फ़रवरी 2020

व्यंग्य : राष्ट्रदादी-राष्ट्रनानी आंदोलन

हरिगोविंद विश्वकर्मा
वहां ढेर सारी महिलाएं बैठी थीं। सब अलग-अलग गुट में। एक जगह दो महिलाएं थीं। दोनों मुस्करा रही थीं। मुस्करा नहीं, बल्कि हंस रही थीं। बहुत ख़ुश लग रही थीं।
-आप दोनों की इस ख़ुशी का राज़? मैंने कलाई हिलाकर इशारे से ही पूछ लिया।
-हम केवल दो नहीं, हज़ारों हैं। हम बहुत ख़ुश हैं। नागरिकता संशोधन क़ानून का अंतरराष्ट्रीयकरण हो गया, दोनों बोलीं।
-वह कैसे?
-ट्रंप की मौजूदगी में दिल्ली में ख़ूब हिंसा हुई। मज़ा आ गया। अब ट्रंप ज़रूर मोदी की ख़बर लेगा। मोदी का काला क़ानून वापस लेना पड़ेगा।
-बात में तो दम है। वाक़ई! बाई द वे आप लोगों का परिचय?
-हम दोनों दादी हैं। दादी!
-दादी?
-हां बेटा, दादी!
-किसकी दादी है आप दोनों?
-पूरे देश की दादी।
-मतलब राष्ट्रदादी!
-हां बेटा। हम राष्ट्रदादी हैं!
-बधाई हो राष्ट्रदादी। दरअसल, मैं शाहीनबाग़ की दादियों और नानियों से ही मिलने आया था।
-बोलो बेटा, हम दोनों राष्ट्रदादी हैं और राष्ट्रनानी भी!
-मतलब टू-इन-वन?
-हां बेटा।
-क्या बात है, राष्ट्रपिता, राष्ट्रपुत्र, राष्ट्रमाता के बाद देश को राष्ट्रदादी और राष्ट्रनानी भी मिल गईं।
-बिल्कुल, बेटा।
-राष्ट्रदादी, आप यहां शाहीनबाग़ में क्या कर रही हैं।
-आंदोलन बेटा। यहां की सभी दादियां-नानियां आंदोलन कर रही हैं।
-आपके आंदोलन में कौन-कौन है?
-केवल हम दादियां और नानियां हैं बेटा। इस आंदोलन में हर धर्म और समुदाय की दादियां और नानियां हैं। सेक्यूलर दादियां और सेक्यूलर नानियां। यह राष्ट्रदादी-राष्ट्रनानी आंदोलन है बेटा। समूचे मानव इतिहास का पहला राष्ट्रदादी-राष्ट्रनानी आंदोलन बेटा।
-यह आंदोलन किसलिए हो रहा है।
-भारतीय संविधान को बचाने के लिए यह आंदोलन हो रहा है। अंबेडकर के संविधान की रक्षा के लिए हम राष्ट्रदादियां-राष्ट्रनानियां घर से बाहर निकली हैं।
-बहुत बढ़िया राष्ट्रदादी!
-यह आंदोलन किसके ख़िलाफ़ हो रहा है।
-संघी सरकार के ख़िलाफ़!
-संघी सरकार के ख़िलाफ़ या नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़? मैंने पूछा।
-दोनों के ख़िलाफ़ बेटा। संघी सरकार ने ही तो बनाया है सीएए।
-आप लोग नागरिकता संशोधन क़ानून का विरोध क्यों कर रही हैं?
-यह पक्षपाती क़ानून है बेटा।
-पक्षपाती कैसे हुआ? ज़रा ख़ुलासा करिए राष्ट्रदादी।
-दोनों राष्ट्रदादियां सकपका गईं।
-हम दोनों को ज़्यादा नहीं पता बेटा। केवल इतना ही पता है, यह काला क़ानून है। यह मुसलमानों के ख़िलाफ़ है।
-किन मुसलमानों के ख़िलाफ़?
-सभी मुसलमानों के ख़िलाफ़?
-मुसलमानों के ख़िलाफ़ कैसे है?
-ऐसे ही, यह मुसलमानों के ख़िलाफ़ है।
-कारण बताइए। यह मुसलमानों के ख़िलाफ़ कैसे है? किस राष्ट्रदादी या राष्ट्रनानी को इस काले क़ानून की जानकारी है?
-एक बुद्दिजीवी राष्ट्रदादी उर्फ राष्ट्रनानी वहां आ गई।
-क्या पूछ रहे हो बेटा? उसने मुझसे सवाल किया।
-मैं यह पूछ रहा हूं राष्ट्रदादी कि आप लोग आंदोलन क्यों कर रही हैं?
-हम लोग काले क़ानून के ख़िलाफ़ आंदोलन कर रहे हैं बेटा।
-किस काले क़ानून के ख़िलाफ़। यह क़ानून काला कैसे है? यही तो पूछ रहा हूं।
-मेरी आवाज़ सुनकर वहां और राष्ट्रदादियां-राष्ट्रनानियां आ गईं।
-किसी को भी नहीं पता था, कि काला क़ानून कैसे मुसलमानों के ख़िलाफ़ है।
-मतलब आप लोगों में किसी को पता नहीं कि काला क़ानून क्या है।
-नहीं-नहीं, हमें पता है। हम दादियां और नानियां उम्रदराज़ हो गई हैं न। इसलिए भूल जाती है, इस काले क़ानून की बारीक़ियां।
-मैं तो आप लोगों का समर्थन करने आया था। सोचा, चलूं राष्ट्रदादियों-राष्ट्रनानियों के समर्थन में मैं भी बैठ जाऊं शाहीनबाग़ में। हाइवे पर सोने का मज़ा लूं।
कुछ देर वहां शांति रही।
-अरे, वो महक। इधर आ।
महक राष्ट्रदादियों-राष्ट्रनानियों से थोड़ी कम उम्र की महिला थी। जींस-टीशर्ट में। वह आ गई।
-इनको काले क़ानून के बारे में बता दो। एक दादी बोली।
-क्या जानना चाहते हैं आप??? उस महिला ने पूछा।
-आपकी तारीफ़? आप भी राष्ट्रदादी हैं? मैंने भी सवाल दाग़ दिया।
-नहीं, मैं राष्ट्रदादी या राष्ट्रनानी नहीं हूं। मैं राष्ट्रपुत्री हूं। भारत की बेटी!
-आप क्या करती हैं? मेरा मतलब, आंदोलन के अलावा और क्या करती हैं।
-रिसर्च। जेएनयू में रिसर्चर हूं।
-किस सब्जेक्ट पर रिसर्च कर रही है?
-रिलिजियस पर्सिक्यूशन यानी धार्मिक उत्पीड़न विषय पर?
-बहुत बढिया। आपके साथ बातचीत में मज़ा आएगा। तो आप भी आंदोलन में शामिल हैं?
-हां, हम सभी सीएए, एनआरसी और एनपीआर के विरोध में आंदोलन कर रहे हैं। अंबेडकर के संविधान को बचाना चाहते हैं, जिन्हें हाफपैंटी नष्ट करने पर तुले हुए हैं।
-एक-एक करके बताइए। पहले सीएए यानी नागरिकता संशोधन क़ानून।
-यह हमारे संविधान के ख़िलाफ़ है। मुसलमानों के ख़िलाफ़ है।
-संविधान के ख़िलाफ़ या मुसलमानों के ख़िलाफ़?
-दोनों के ख़िलाफ़!
-ज़्यादा किसके ख़िलाफ़?
-मुसलमानों के।
-वह कैसे?
-यह काला क़ानून हमारी नागरिकता छीन लेगा। हमें डिटेंशन कैंप में डाल देगा।
-लेकिन यह क़ानून नागरिकता छीनने के लिए नहीं, बल्कि नागरिकता देने के लिए है। जी हां, सीएए पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान में धार्मिक उत्पीड़न के शिकार अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिकता देने के लिए है।
-ग़लत। आप सही नहीं बोल रहे हैं।
-ग़लत नहीं, सौ फ़ीसदी सही बोल रहा हूं। यह क़ानून धार्मिक उत्पीड़न के शिकार अल्पसंख्यकों के लिए है।
-नहीं, आप ग़लतबयानी कर रहे हैं। इस क़ानून में हिंदुओं, सिखों, बौद्धों और ईसाइयों का ज़िक्र है। लेकिन मुसलमान इस क़ानून से ग़ायब कर दिए गए।
-मतलब, आप क्या कहना चाहती हैं, विस्तार से समझाइए।
-मतलब यह कि सीएए के लाभार्थी केवल हिंदू, सिख, बौद्ध और ईसाई हैं। पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान के मुसलमान नहीं। इसी बात का विरोध कर रहे हैं हम लोग।
-और बारीक़ी से समझाइए। आपने कहा कि सीएए के लाभार्थी केवल हिंदू, सिख, बौद्ध और ईसाई हैं। पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान के मुसलमान इस क़ानून के लाभार्थी नहीं हैं।
-हां, अब आप सही पकड़े हैं। सभी एक स्वर में बोल पड़ी।
-मतलब इस क़ानून के लाभार्थी पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान के मुसलमान भी बनाए जाने चाहिए। ठीक है न?
-हां, अब आप एकदम सही पकड़े हैं।
-मतलब आप लोग पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान के मुसलमानों को इस क़ानून का लाभार्थी बनाने के लिए आंदोलन कर रही हैं। ठीक है न?
-हां, अब आप पूरी तरह सही पकड़े हैं।
-इसका मतलब यह भी कि आप लोग पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान के मुसलमानों के हितों की रक्षा करने के लिए आंदोलन कर रही हैं। ठीक है न?
-वही तो, आख़िरकार आप समझ गए। सही पकड़ लिया।
-मतलब यह आंदोलन पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान के मुसलमानों के लिए हो रहा है। ठीक है न?
-नहीं-नहीं, यह आंदोलन बाबासाहेब के संविधान को बचाने के लिए है। आप कन्फ़्यूज़ कर रहे हैं।
-इसमें क्या कन्फ़्यूज़न है?
-बतौर जेएनयू की रिलिजियस पर्सिक्यूशन रिसर्चर आप यह कहना चाहती हैं कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान में मुसलमानों पर भी धार्मिक अत्याचार हो रहा है? मतलब इन तीनों इस्लामी मुल्कों में मुसलमान भी धर्म-परिवर्तन के शिकार हो रहे हैं। उनका भी मजहब बदलवाया जा रहा है।
-नहीं-नहीं। आप हमें कन्फ़्यूज़ नहीं कर सकते। हम लोग अंबेडकर के संविधान को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।  
-मैं आप लोगों को क्या कन्फ़्यूज़ करूंगा। आप लोग तो पहले से ही कन्फ़्यूज़्ड हैं।

-आप लोग मुसलमानों को शिक्षित करने पर आंदोलन नहीं करेंगी। उनकी ग़रीबी हटाने के लिए आंदोलन नहीं करेंगी। आप लोग आंदोलन सीएए में पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान के मुसलमानों को लाभार्थी बनाने के लिए करेंगी। आप लोग महान हैं। बहरहाल, इजाज़त दीजिए। नमस्कार। आप लोग पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान के मुसलमानों के लिए लड़ते रहिए। शुभकामनाएं।

शनिवार, 7 दिसंबर 2019

रेप की बढ़ती वारदातों के लिए क्या सामाजिक तानाबाना ज़िम्मेदार है?


हरिगोविंद विश्वकर्मा
देश में दिनोंदिन गैंगरेप की बढ़ती वारदातों से हर शरीफ आदमी चिंतित है। वह समझ नहीं पा रहा है कि आधी आबादी पर हो रहा यह जुल्म आख़िर रुक क्यों नहीं रहा है। सख़्त क़ानून का डर बलात्कारी महसूस नहीं क्यों रहे हैं। आख़िर महिलाओं को हवस की निगाह से देखने के इस तरह के माइंडसेट की मूल वजह क्या है? सबसे दुर्भाग्य की बात यह है कि इस मुद्दे पर तो बहस ही नहीं चल रही है। आंदोलन, धरना-प्रदर्शन में असली मुद्दा गौण हो गया है।  

जगह-जगह जो बहस चल रही है। वह मुद्दे से भटकाने वाली ही है। गली-मोहल्ला हो, सड़क हो, बस-ट्रेन हो या फिर देश की सबसे बड़ी पंचायत संसद, हर जगह यही भटकाने वाला मुद्दा छाया हुआ है। कहीं तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में वेटेनरी डॉक्टर से गैंगरेप करने वाले चारों आरोपियों के इनकाउंटर को सही बताया जा रहा है तो कहीं ग़लत। मतलब सज़ा देने के अमानवीय, अलोकतांत्रिक और तालिबानी तरीक़े ज़्यादातर लोग समर्थन कर रहे हैं। जबकि कुछ लोग इस तरह की कार्रवाई का विरोध कर रहे हैं। इस विरोध और समर्थन में मूल मुद्दा ग़ायब है।  

हैदराबाद रोप में ‘न्याय होने’ के बाद लोग उसी तरह की सज़ा की मांग उन्नाव गैंगरेप के आरोपियों के लिए कर रहे हैं। आक्रोशित लोग धरना-प्रदर्शन के ज़रिए रेपिस्ट को जल्द से जल्द सज़ा-ए-मौत देने की पुरज़ोर पैरवी कर रहे हैं। कहीं-कहीं रिएक्शन और आक्रोश एकदम एक्स्ट्रीम पर है, लोग इस तरह रिएक्ट कर रहे हैं कि अगर उनका बस चले तो रेपिस्ट्स को फ़ौरन फ़ांसी के फ़ंदे से लटका दें। समाजवादी पार्टी की सांसद जया बच्चन ने तो राज्यसभा में यहां तक कह दिया कि बलात्कारियों की मॉब लिंचिंग कर दी जाए। यानी उनको भीड़ के हवाले कर दिया जाए और भीड़ उन्हें पीट-पीट कर मार डाले।

यह भी संभव है कि देश में अचानक बन रहे माहौल के दबाव में केंद्र सरकार बलात्कारियों को जल्दी से सज़ा देने वाला कोई बिल संसद में पेश कर दे और वह क़ानून भी बन जाए। अगर बलात्कारियों का जल्दी फ़ांसी सुनिश्चित करने वाला क़ानून बना तो निश्चित रूप से यह ऐतिहासिक होगा। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या संभावित सख़्त क़ानून से रेप जैसे वीभत्स और हैवानियत भरे अपराध पर पूरी तरह अंकुश लग पाएगा? यह दावे के साथ नहीं कहा जा सकता, क्योंकि 2013 में नया रेप क़ानून बनने के बाद रेप की वारदातें रुकने की बजाय और बढ़ गईं हैं।

बलात्कारियों को सज़ा-ए-मौत देने से रेप की वारदात पर विराम लगने की गारंटी आख़िर कौन देगा? क्या हत्या के लिए मौत की सज़ा के प्रावधान से हत्या रुक गई? इसके लिए फ़ांसी की सज़ा होने के बाद भी हत्याएं क्यों हो रही हैं? इसका मतलब यह है कि जैसे फ़ांसी की सज़ा हत्याएं रोकने में नाकाम रही, वैसे ही कैपिटल पनीश्मेंट रेप को रोकने में कामयाब होगा, इस पर पूर्ण भरोसा नहीं किया जा सकता। क्योंकि जब पुरुष पर वहशीपन या हैवानियत सवार होता है तो वह क्वांटम ऑफ़ पनीश्मेंट के बारे में सोचता ही नहीं, अगर सोचता तो अपराध ही न करता। लिहाज़ा, ऐसे क़ानून के अस्तित्व में आने के बाद भी रेप का सिलसिला जारी रह सकता है।

दरअसल, हिंदुस्तानी बहुत भावुक किस्म के होते हैं। भावुकता में इंसान का विवेक और उसकी तर्क-क्षमता कुंद हो जाती है। वह संतुलित एवं संयमित ढंग से सोच ही नहीं पाता। कोरी भावुकता इंसान को समस्या की जड़ तक पहुंचने ही नहीं देती। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि भावुकता सही मायने में समस्या को आइडेंटीफ़ाई करने में सबसे बड़ी बाधा है। जब तक इंसान भावुक होकर सोचेगा, किसी समस्या का सही हल नहीं कर सकेगा। इसलिए यह वक़्त भावुक होने की नहीं, बल्कि इस बात पर विचार करने का है कि रेप जैसे अपराध को रोका कैसे जाए। रेपिस्ट को दंड देने की बात तो बाद में आती है। अगर कुछ ऐसा प्रावधान हो जाएं कि रेप जैसा अपराध ही नियंत्रित हो जाए तो दंड पर ज़्यादा दिमाग़ खपाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।

अगर इस बिंदु पर ग़ौर करेंगे तो सवाल उठेगा कि आख़िर बलात्कार जैसा जघन्य अपराध होता ही क्यों हैं। क्यों पुरुष औरत को एकांत में देखकर अपना विवेक, जो उसे इंसान बनाता है, भूल जाता है और वहशी और हैवान बन जाता है? क्यों वह यौन-भुखमरी (सेक्स स्टारवेशन) का शिकार हो जाता है? एक स्त्री जो हर इंसान के लिए आदणीय होनी चाहिए, माता-बहन के समान होनी चाहिए, क्यों वहशी पुरुष के लिए भोग की वस्तु बन जाती है? यानी क्यों किसी जगह स्त्री की कम संख्या से पुरुष उसे कमज़ोर मान लेते हैं और उसके साथ मनमानी करने लगते हैं। इस विषय पर गंभीरता और संयम से विचार करने के बाद लगता है कि रेप ही नहीं, महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले छोटे-बड़े हर ज़ुल्म के लिए हमारे समाज का ताना-बाना ही मुख्य तौर पर ज़िम्मेदार है।

हमारे समाज का तानाबाना बुरी तरह मेल-डॉमिनेटेड है। ऐसे समाज में स्त्री चाहकर भी पुरुष की बराबरी कर ही नहीं सकती, क्योंकि यह ढांचा स्त्री को दोयम दर्जे की नागरिक यानी सेकेंड सेक्स का दर्जा देता है। सभ्यता के विकास के बाद जब से मौजूदा समाज प्रचलन में आया है, तब से स्त्री दोयम दर्जे की ही नागिरक रही है। शहरों में लड़कियों को जींस-टीशर्ट में देखकर हम कुछ समय के लिए भले ख़ुश हो लें कि समाज में महिलाएं पुरुषों की बराबरी कर रही हैं, लेकिन सच तो यह है कि स्त्री कभी पुरुष की बराबरी कर ही नहीं पाई। यह एक स्त्री से बेहतर और कोई नहीं जान सकता। पुरुष-प्रधान समाज की मानसिकता ही स्त्री को बराबरी का दर्जा देने भी नहीं देती।

आज ज़रूरत इस बात की है कि समाज में वे तमाम प्रावधान किए जाएं जो सही मायने में स्त्री को बराबरी के मुकाम तक पहुंचाते हैं। इसके लिए शुरुआत घर से करनी होगी। जो लोग गैंगरेप की मुख़ालफ़त कर रहे हैं, क्या वे अपने घर में स्त्री को बराबरी का दर्जा देते हैं। क्या वे घर में बेटे-बेटी में फ़र्क़ नहीं करते? संसद में भावुक होने वाले नेता क्या स्त्री के प्रति बायस्ड नहीं हैं? राजनीति में एकाध अपवाद को छोड़ दें, तो हर जगह पिता की विरासत केवल बेटा ही क्यों संभालता है? पुत्रों का पिता की विरासत संभालना, यही दर्शाता है कि बड़े राजनीतिक घराने में ही बेटियों के साथ पक्षपात होता है।

जवाहरलाल नेहरू की उत्तराधिकारी इंदिरा गांधी इसलिए बन सकीं, क्योंकि नेहरू को पुत्र नहीं था। आज भी उन्हीं एडवांस फ़ैमिलीज़ में बेटियां उत्तराधिकारी बनती हैं, जहां पुत्र नहीं होते। जब विकसित परिवारों में स्त्री के साथ खुला पक्षपात और दोयम दर्जे का बर्ताव हो, तो दूर-दराज़ और पिछड़े इलाक़ों में स्त्री की क्या हैसियत होती होगी, सहज कल्पना की जा सकती है। संसद ने महिलाओं को आरक्षण देने वाला बिल पास ही नहीं किया। यह मुद्दा मौजूदा सरकार के दूसरे कार्यकाल में भी एजेंडे में नहीं है। फिर ये लोग गैंगरेप पर क्यों चिंता जता रहे हैं? ज़ाहिर है, इनका स्त्रीप्रेम छद्म है, हक़ीक़त से परे है। महिला आरक्षण पर इनका मौन इन्हें पुरुष-प्रधान समाज का पैरोकार ही नहीं बनाता, बल्कि यह भी दर्शाता है कि इनका महिलाओं को पुरुषों के बराबर का दर्जा देने में कोई दिलचस्पी नहीं। सब अपनी-अपनी रोटी सेंक रहे हैं।

अगर सचमुच ये लोग महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने के हिमायती हैं तो संसद और विधान सभाओं समेत हर जनपंचायत में 33 फ़ीसदी नहीं, बल्कि 50 फ़ीसदी जगह महिलाओं के लिए सुनिश्चित करने की पहल करें। देश में महिलाओं की आबादी क़रीब-क़रीब फ़िफ़्टी परसेंट है तो आरक्षण 33 फ़ीसदी क्यों? एक बात और, महिला आरक्षण का लाभ केवल एडवांस्ड परिवारों की लड़कियां या महिलाएं ही हाईजैक न कर लें, बल्कि इसका लाभ सामाजिक रूप से पिछड़े समाज यानी ग़रीब, आदिवासी, दलित, पिछड़े और मुस्लिम परिवार की महिलाओं को मिले, यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

चूंकि देश में आधी जनसंख्या महिलाओं की है, लिहाज़ा उनके लिए हर जगह 50 फ़ीसदी जगह आरक्षित की जाना चाहिए। विधायिका ही नहीं, कार्यपालिका यानी ब्यूरोक्रेसी, पुलिस, आर्मफोर्स, न्यायपालिका, मीडिया हाउसेज़ और धार्मिक संस्थानों, मसलन पुजारियों की संख्या में भी महिलाओं की संख्या पुरुषों के बराबर होनी चाहिए। सरकारी और निजी संस्थान की नौकरियों में आधी जगह महिलाओं को दी जानी चाहिए। बैंक हो, यूनिवर्सिटी हो या अन्य संस्थान हर जगह आधी जगह महिलाएं हों। महिलाएं घर में क्यों बैठें? वे काम पर क्यों न जाएं?

अगर 50 फ़ीसदी महिलाएं काम पर जाएंगी तो बाहर उनकी विज़िबिलिटी पुरुषों के बराबर होगी। यानी हर सावर्जनिक जगह पर इक्का-दुक्का महिला की बजाय बड़ी संख्या में महिलाएं दिखेंगी। इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ेगा। सड़क, बस, ट्रेन और दफ़्तरों में महिलाओं की बराबर मौजूदगी से किसी पुरुष की ज़ुर्रत नहीं कि उसकी ओर बुरी निग़ाह डाले। महिलाओं की कम संख्या लंपट पुरुषों का हौसला बढ़ाती है। इस मुद्दे पर ईमानदारी से सोचने वाला व्यक्ति इसका समर्थन करेगा। महिलाओं को अबला या कमज़ोर होने से बचाने के लिए उनका इम्पॉवरमेंट ही एकमात्र विकल्प है। यही हर समस्या का स्थाई हल भी है। जब संसद में 770 सदस्यों में से 385 महिलाएं होंगी, केंद्र और राज्य-मंत्रिमंडल में महिला-पुरुष बराबर होंगे, ब्यूरोक्रेसी में आधी संख्या में स्त्री होगी, अदालतों में 50 फ़ीसदी जज महिलाएं होंगी, पुलिस थानों में पुलिस वर्दी में आधी लड़कियां होंगी तो अपने आप महिला पुरुष की बराबरी कर लेगी। वह क़ानून की बैसाखी के बिना भी सही-सलामत और महफ़ूज़ रहेगी।

लेकिन क्या ऐसा होगा? क्या नारी को अबला और वस्तु मानने वाला पुरुष-प्रधान समाज सत्ता महिलाओं को सौंपने के लिए तैयार होगा? सबसे बड़ा सवाल यही है। इसमें परंपराएं और संस्कृति सबसे बड़ी बाधा हैं जिनमें आमूल-चूल बदलाव की ज़रूरत है। अगर हम सही मायने में महिलाओं को पुरुष के बराबर खड़ा करना है तो उन सभी ग्रंथों-किताबों को पुनर्परिभाषित करना होगा जो पति को ‘परमेश्वर’ और पत्नी को ‘चरणों की दासी’ मानते हैं। हमें उन त्यौहारों को प्रमोट करने से बचना होगा, जिसमें पति की सलामती के लिए पत्नी व्रत रखती है। स्त्री को घूंघट या बुरके की नारकीय परिपाटी से मुक्ति दिलानी होगी। लेकिन सवाल यह है कि क्या समाज इसके लिए तैयार होगा? अगर हां तो बदलाव की शुरुआत तुरंत करनी चाहिए, अगर नहीं तो महिलाओं से रेप पर घड़ियाली आंसू बहाने का क्या औचित्य, क्योंकि वस्तुतः यह समाज पुरुष-प्रधान यानी मेल-डॉमिनेटेड है और ऐसे समाज में रेप नहीं रोका जा सकता। चाहे रेपिस्ट को पब्लिकली ज़िंदा जलाने का क़ानून बना दिया जाए। यानी पुरुष प्रधान समाज है, रेप होगा ही क्योंकि अपनी जटिलताओं के चलते यह समाज महिलाओं को अल्पसंख्यक बना देता है।
(समाप्त)