गुरुवार, 26 नवंबर 2015

26/11 की सातवीं वर्षगांठ परः आतंकवाद से लोहा लेने के लिए तैयार है मुंबई?


हरिगोविंद विश्वकर्मा
बृहस्पतिवार को मुंबई पर आतंकी हमले 26/11 को सात साल पूरे हो गए। इस दौरान मुंबई पुलिस और राज्य पुलिस में बदलाव की ख़ूब बातें हुईं, लेकिन क्या उन पर वाकई अमल किया गया, इस पर आम आदमी को भारी संदेह है। मुंबई पुलिस ने हथियार वगैरह तो जुटा लिए लेकिन देश में पुलिस की मानसिकता पहले जैसी “खैनी खाने वाले” जैसी है, जिसे देखकर संदेह होता है कि ये लोग आतंकी हमले का मुकाबला कर पाएंगे। कम से कम लोग राह चलते हुए लोग पुलिस को यही रवैया देखते हैं। रेलवे स्टेशनों या दूसरे संवेदनशील जगह पर तैनात पुलिस वालों का रवैया देखकर इस आशंका की पुष्टि होती है,कि पुलिस बल में वाकई कोई सुधार हुआ है। इससे लगता यही है कि मुंबई आतंकवाद से निपटने के लिए आधी-अधूरी ही तैयार है।
मुख्यमंत्री देवेद्र फडनवीस, महाराष्ट्र पुलिस महानिदेश प्रवीण दीक्षित और मुंबई पुलिस कमिश्नर अहमद जावेद समय समय पर बयान देते रहते हैं कि मुंबई ही नहीं पूरे राज्य में किसी भी हिमाकत से निपटने की सुरक्षा तैयारियां मुकम्मल हैं और जवान हर दुस्साहस का जवाब देने के लिए सक्षम और चौकस हैं। लेकिन अगर ज़मीनी हकीकत का अवलोकन करें तो ये दावे उसी तरह लगते हैं, जैसे दावे सन् 1993 सीरियल बम ब्लास्ट के बाद से सत्ता संभालने वाले तमाम चीफ मिनिस्टर या शीर्ष पुलिस अफसरान करते आ रहे हैं और इन दावों के विपरीत आतंकी हमले समय-समय पर होते रहे हैं।
दरअसल, आईएसआईएस के उदय के बाद दहशतगर्दी का ज़्यादा ख़तरनाक रूप में सामने आया है। अब तक एजेंसियां सिमी, इंडियन मुजाहिदीन, लश्करे तैयबा, हिजबुल मुजाहिद्दीन, जैशे मोहम्मद, अल बदर, अलकायदा और तालिबान से निपटने में परेशान हो रही थी। आईएसआईएस की बर्बरता देखकर हर आदमी का दिल दहल जाता है। इस बेरहम संगठन का काम करने का तरीक़ा अलग हैं। कैमरे के सामने दुश्मनों का सिर कलम करने के लिए कुख्यात इस संगठन के फिदाइनों से निपटने के लिए पुख्ता तैयारी करनी पड़ेगी। यह अपना काम इंटरनेट के जरिए करता है। दुनिया भर के युवकों को बरगलाकर लगातार अपनी ताक़त बढ़ाने वाले इस संगठन में भारत से भी युवक भर्ती हो रहे हैं। इन विपरीत परिस्थितियों में देश की मुंबई पुलिस, महाराष्ट्र एटीएस, एनआईए एवं दूसरी सुरक्षा एजेंसियां और खुफिया तंत्र के लोगों को पूरी तरह चौकस रहना होगा। अपनी तैयारियों में आमूलचूल परिवर्तन करना पड़ेगा।
पूर्व आईपीएस वाईपी सिंह इंटेलिजेंस को मज़बूत करने पर ज़ोर देते हैं। उन्हें नहीं लगता कि बिना मज़बूत खुफिया तैयारियों के मुंबई पुलिस आईएसआईएस जैसी हिमाकत से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है। उनको लगता है कि हमले का जवाब हमले से देने रणनीति से अधिक कारगर खुफिया तंत्र को मज़बूत करना है। इंटेलिजेंस को मज़बूत करके आतंकवाद का मुकाबला बेहतर तरीक़े से किया जा सकता है। बाईपी सिंह कहते हैं कि भारत में राज्य और केंद्र की खुफिया एजेंसियों के बीच तालमेत का अभाव देखा जाता है, जिसकी मुख्य वजह अधिकारियों का व्यक्तिगत इगो होता है। जबकि ऐसे नाजुक समय पर सभी संबंधित एजेंसियों को तालमेल के साथ काम करना चाहिए।
हालांकि एक सीनियर पुलिस अफसर कहते हैं, कि अगर मुंबई में फिर आतंकी हमला हुआ तो सात साल पहले जितना नुक़सान नहीं होगा। पुलिस बहुत मजबूत पोज़िशन में है। आतंकवादियों को मुंहतोड़ जवाब देने में पूरी तरह सक्षम है। जबकि कमिश्नर रहे एक दूसरे अधिकारी कहते हैं 26/11 जैसे हमले के लिए तो पुलिस पूरी तरह तैयार है, लेकिन बदलते समय के साथ अब आतंकियों की रणनीति भी बदल गई है। अत्याधुनिक हथियार और टेक्नॉल़ॉजी हासिल करने के बाद आतंकी और ख़तरनाक हो गए हैं। लिहाज़ा, 21वीं सदी के आतंकवाद का सामना करने के लिए पुलिस को और आधुनिक बनाना होगा और जवानों को अंतरराष्ट्रीय स्तर की ट्रेनिंग देनी होगी और सुरक्षा तैयारियों को फिर से परखना होगा।
दरअसल, राज्य ने हमले के दौरान पुलिस की नाकामियों का पता लगाने के लिए नौकरशाह राम प्रधान और इंटेलिजेंस विशेषज्ञ वपल्ला बालचंद्रन की दो सदस्यों वाली हाई लेवल कमेटी बनाई थी। कमेटी ने फोर्स का सही नेतृत्व न कर पाने के लिए तत्कालीन पुलिस कमिश्नर हसन गफूर को कठघरे में खड़ा करते हुए अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी, जिसमें देश की आर्थिक राजधानी की सुरक्षा चाक-चौबंद करने के लिए कई सिफारिशों की गई थीं। प्रधान कमेटी ने राज्य की समुद्री सीमा पर चौकस निगरानी करने, केंद्र-राज्य खुफिया एजेंसियों के बीच सही तालमेल बाने,  पुलिस को घातक हथियारों और वेहिकल्स से लैस करने, संवेदनशील स्थानों पर वॉच टॉवर बनाने और शहर में हर प्रमुख जगह सीसीटीवी कैमरे लगाने की ज़ोरदार सिफारिश की थी. लेकिन सात साल बाद भी सभी सिफारिशों लागू नहीं की जा सकी, ख़ासकर शहर में पांच हज़ार सीसीटीवी कैमरे लगाने का सुझाव अभी तक फाइलों की धूल खा रही है।
वैसे कमेटी के सुझावों के अनुसार आतंकवाद से निपटने के लिए एनएसजी की तर्ज पर राज्य में फोर्स वन बनाई गई है। आईपीएस संजय सक्सेना की अगुवाई में प्रशिक्षित जवान किसी भी तरह की चुनौती से निपटने के लिए चौकस हैं। फोर्स वन हर महीने तीन मॉक ड्रिल करती है, जिसमें तैयारियों का जायजा लिया जाता है। आतंकवाद से लड़ने के लिए क्विक रिस्पॉन्स टीम (क्यूआरटी) भी बनी है और हर दो थाने के बीच एक वेहिकल्स दिया गया है। जिसका संचालन संबंधित थाना इंचार्ज की सलाह पर किया जाता है। इसकी मदद के लिए मुंबई की पांचों रिजन में चार रिजर्व पलाटून मौजूद रहती हैं। केंद्र ने भी एनएसजी का हब मुंबई में भी बनाया है। आतंकियों से निपटने के लिए बुलेटप्रूफ मार्क्समैन जीप भी पुलिस के पास है और विस्फोटक का पता लगाने के लिए स्कैनर वैन, स्नाइपर गन और दूसरे अत्याधुनिक हथियार भी पुलिस को दिए गए हैं।
प्रधान कमेटी ने भी समुद्री सुरक्षा को मजबूत करने के क्रम में जगह जगह कोस्टल पोस्ट बनाने का सुझाव दिया था। लिहाज़ा, समुद्री सीमा को सुरक्षित करने के लिए स्पीड बोट्स और एमफिबियस मरीन क्राफ्ट्स तैनात की गईं। मगर समुचित रखरखाव और मुस्तैद जवानों के अभाव में ज्यादातर स्पीड बोट और एमफिबियस मरीन क्राफ्ट्स समुद्र में खड़ी रहती हैं। सबसे बड़ी बात यह कि पिछले दिनों मीडिया में यह भी ख़बर आई थी कि कोस्टल पुलिस में तैनात कई लोग तैरना भी नहीं जानते। वे मुंबई की समुद्री सीमा की रक्षा कैसे करेंगे। यह कोई भी सहज समझ सकता है। सात साल बाद हालात बदल चुके हैं और फोर्स वन और क्यूआरटी को छोड़ दें तो बाकी तैयारी उस स्तर की नहीं हैं जैसी होनी चाहिए। प्रधान कमेटी की सिफारिश पर अमल करते हुए मुंबई में हुतात्मा चौक पर पहला वॉच चॉवर बनाया गया। इसके बाद सीएसटी, डीजी ऑफिस, मेट्रो सिनेमा और बधवार पार्क में भी वॉचटॉवर बनाए गए हैं।
प्रधान कमेटी की सिफारिशों के तहत पांच हज़ार से ज्यादा सीसीटीवी कैमरे लगाने थे। लेकिन अभी तक अलम नहीं किया जा सका है। पहले कांग्रेस-एनसीपी और अब बीजेपी-शिवसेना घोषणाए करती रही है कि इतने सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएंगे, पर अभी तक अमल नहीं किया गया, जो बहुंत बड़ी लापरवाही कही जा सकती है। इस साल मई में सरकार ने शहर में छह हज़ार (6020) सीसीटीवी कैमरे लगाने का निर्णय किया था, पर अमल अभई तक नहीं हुआ है। इसी तरह 26/11 के दौरान अत्याधुनिक हथियारों के अलावा जवानों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर के बुलेटप्रूफ जैकेट की कमी महसूस की गई थी। मगर सरकार ने बूलेटप्रूफ वाहन तो खरीद लिए लेकिन अभी तक बुलेटप्रूफ जैकेट मुंबई पुलिस के पास नहीं हैं।
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