बुधवार, 3 मई 2017
शनिवार, 29 अप्रैल 2017
कुलभूषण जाधव को क्या पहले ही फांसी पर लटका चुका है पाकिस्तान?
हरिगोविंद विश्वकर्मा
क्या भारतीय नौसेना के पूर्व अधिकारी कुलभूषण सुधीर जाधव का हश्र पाकिस्तान
भारतीय नागरिक सरबजीत सिंह जैसा कर चुका है? यानी दुश्मन ने भारत के इस सपूत की अमानवीय और
अलोकतांत्रिक ढंग से हत्या कर दी है। दरअसल, इस आशंका को इसलिए भी बढ़ावा मिल रहा है, क्योंकि कुलभूषण के बारे में
भारत की ओर से अब तक 16 बार राजनयिक के ज़रिए जानकारी मांगी गई है, लेकिन पाकिस्तान लगातार
इनकार कर रहा है और अब तक उनके बारे में कोई जानकारी नहीं दी है।
हाल ही में पाकिस्तान के अशांत सिंध प्रांत में कथित तौर पर भारतीय ख़ुफिया
एजेंसी रॉ (रिसर्च ऐंड एनालिसिस) के लिए जासूसी के जुर्म में कुलभूषण को पाकिस्तान
की सैन्य अदालत ने मौत की सजा सुनाई है। पाक सैन्य अदालत के फ़ैसले के बाद से
दोनों देशों के रिश्तों में खटास सी आ गई है। भारत कुलभूषण के ख़िलाफ़ दायर किए गए
आरोपपत्र की कॉपी मांग रहा है, लेकिन पाकिस्तान कोई भी जानकारी देने से साफ़ इनकार कर रहा है।
बहरहाल, अगर कुलभूषण की हत्या की आशंका सच है तो यह भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
के लिए अंतरराष्ट्रीय मंच पर बहुत बड़ी कूटनीतिक पराजय की तरह होगी। इसलिए
प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री को कुलभूषण की सलामती के बारे में कठोर रुख अपनाकर
फ़ौरन सही जानकारी देने की इस्लामाबाद सरकार से मांग करनी चाहिए। यह मानने में
हर्ज नहीं कि कुलभूषण का मामला अब राजनयिक स्तर से बहुत ऊपर उठ चुका है।
भारतीय जनता पार्टी बिहार के आरा से लोकसभा सदस्य और मनमोहन सिंह के कार्यकाल
में केंद्रीय गृह सचिव रहे राजकुमार सिंह (आरके सिंह) का भी मानना है कि संभवतः
पाकिस्तानी सेना पहले ही कुलभूषण जाधव की हत्या कर चुकी है। इसीलिए अब इस्लामाबाद
कथित तौर पर देश की राष्ट्रीय सुरक्षा और गोपनीयता का हवाला देकर पूर्व नेवी ऑफिसर
के बारे में कोई भी जानकारी देने से इनकार कर रहा है।
सन् 2011 से 2013 के दौरान केंद्र में गृह सचिव रहे आरके सिंह का कहना है कि
विदेशी नागरिकों को लेकर पाकिस्तान का ट्रैक रिकॉर्ड बहुत अमानवीय और भयानक रहा
है। इसलिए भारत सरकार को इस मुद्दे को बहुत गंभीरता से लेनी चाहिए। पूर्व नौकरशाह
ने कहा कि ऐसा लगता है कि गिरफ्तारी के बाद पाकिस्तानी सेना द्वारा कुलभूषण जाधव
को बहुत ज़्यादा टॉर्चर किया गया, जिससे संभवतः उनकी मौत हो गई। कुलभूषण की मौत के बाद पाकिस्तानी सेना की अदालत
ने उन्हें फांसी देने की सज़ा सुना दी, ताकि मामले की लीपापोती की जा सके।
बहरहाल, अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार क़ानून के जानकारों का भी मानना है कि पाकिस्तान जिस
तरह से कुलभूषण जाधव के बारे में तथ्य छुपा रहा है और कोई भी सूचना देने से
आनाकानी कर रहा है, वह गंभीर संदेह पैदा कर रहा है कि कहीं कुलभूषण के साथ अनहोनी हो तो नहीं चुकी
है। कम से कम कोई देश किसी भी विदेशी जासूस के साथ ऐसा सलूक नहीं करता कि संबंधित
देश को उसके बारे में कोई जानकारी ही न दी जाए।
भारत में लोग कुलभूषण की पाकिस्तान में पकड़े जाने की ख़बर आने के बाद से ही
बहुत परेशान हैं। वॉट्सअप, फेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल नेटवर्किंग पर कुलभूषण को बचाने के लिए साल भर से
मुहिम चल रही है और उन्हें किसी भी क़ीमत पर सकुशल देश में लाने की अपील
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से की जा रही है। दरअसल, लोग सरबजीत सिंह के बहाने देख चुके हैं कि जासूसी
के आरोप में पड़ोसी दुश्मन देश में पकड़े जाने का क्या हश्र होता है।
दुनिया देख चुकी है कि पाकिस्तान के लाहौर की सेंट्रल जेल में सरबजीत को पीट
पीटकर मार डाला गया था। सरबजीत के बारे में पाकिस्तान की बताई कहानी के अनुसार,
26 अप्रैल 2013 को तक़रीबन
दोपहर के 4.30 बजे सेंट्रल जेल, लाहौर में कुछ कैदियों ने ईंट, लोहे की सलाखों और रॉड से सरबजीत पर हमला कर दिया था। नाजुक हालत में सरबजीत
को लाहौर के जिन्ना अस्पताल में भर्ती करवाया गया। इलाज के दौरान वह कोमा में चले
गए और 1 मई 2013 को जिन्ना हॉस्पिटल के डॉक्टरों
ने सरबजीत को ब्रेनडेड घोषित कर दिया।
केंद्रीय गृह राज्यमंत्री हंसराज अहीर ने कहा कि भारत सरकार को अपने किसी
नागरिक के स्वास्थ्य के बारे में जानने का पूरा अधिकार है। अहीर के मुताबिक़,
इस्लामाबाद आज भले ही
कुलभूषण जाधव के बारे में कोई जानकारी नहीं दे रहा है, लेकिन एक न एक दिन उसे उनकी सलामती के बारे में
भारत को बतानी ही पड़ेगी। भारत में लोगों का मानना है कि सरकार को अपनी पूरी ताकत
झोंक देनी चाहिए ताकि कुलभूषण को सही सलामत वापस स्वदेश वापस लाया जा सके।
अमेरिका में रह रहे भारतीय-अमेरिकी समुदाय ने कुलभूषण जाधव को मौत की सजा से
बचाने के लिए व्हाइट हाउस पिटीशन लॉन्च किया है। भारतीय-अमेरिकियों ने कुलभूषण की
जान बचाने के लिए ट्रंप प्रशासन से दख़ल देने की मांग की है। व्हाइट हाउस की
वेबसाइट पर ‘वी द पीपुल पिटीशन’ में कहा गया है कि जाधव के ख़िलाफ़ लगाए गए आरोप
कि वह भारत के लिए जासूसी कर रहा था पूरी तरह से ग़लत और मनगढ़ंत हैं। ट्रंप प्रशासन
इस पर कोई प्रतिक्रिया दे इसके लिए 14 मई तक इस पर एक लाख लोगों के हस्ताक्षर होने
ज़रूरी हैं।
पाकिस्तान ने आरोप लगाया था कि कुलभूषण जाधव ईरान से इलियास हुसैन मुबारक़
पटेल के नक़ली नाम पर पाकिस्तान आया जाया करते थे। पाकिस्तान का कहना है कि 29
मार्च 2016 को उन्हें बलूचिस्तान से गिरफ़्तार किया गया। भारत सरकार का दावा है कि
कुलभूषण का ईरान से अपहरण हुआ है। पाकिस्तान का दावा है कि कुलभूषण भारतीय
ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ के लिए काम करते हैं और बलूचिस्तान में विध्वंसक गतिविधियों
में शामिल हैं। इसी आरोप के लिए 11 अप्रैल 2017 को पाकिस्तान के मिलिट्री कोर्ट ने
कुलभूषण को मौत की सजा सुनाई, जिसका भारत सरकार व भारतीय जनता ने भारी विरोध किया।
सन् 1970 में महाराष्ट्र के सांगली में जन्मे कुलभूषण के पिता सुधीर जाधव
मुंबई पुलिस में वरिष्ठ अधिकारी रहे हैं। कुलभूषण जाधव का बचपन दक्षिण मुंबई में
गुजरा था। कुलभूषण को दोस्त भूषण कहकर बुलाते थे, जबकि उनसे छोटे उन्हें “भूषण दादा” कहते थे। फुटबॉल
का शौकीन कुलभूषण ने 1987 में नेशनल डिफेन्स अकादमी में प्रवेश लिया तथा 1991 में
भारतीय नौसेना में शामिल हुए। उसके बाद सेवा-निवृति के बाद ईरान में अपना व्यापार
शुरू किया था। उसी सिलसिले में वह ईरान
में थे, जहां से अपहृत करके उन्हें पाकिस्तान ले जाया गया था।
गुरुवार, 27 अप्रैल 2017
शहीद की बेटी
(कारगिल वॉर के समय लिखी मेरी कविता)
कब आओगे पापा?
पापा कब तुम आओगे
तुम्हारी बहुत याद आती है मुझे
अच्छा बाबा खिलौने मत लाना
मैं जिद नहीं करूंगी
नहीं तंग करूंगी तुम्हें
बस तुम आ जाओ
मम्मी हरदम रोती हैं
मांग में सिंदूर भी नहीं भरतीं
मंगल सूत्र निकाल दिया है उन्होंने
चूड़ियां भी तोड़ डाली हैं
सफेद साड़ी में लिपटी
बेडरूम में पड़ी
सिसकती रहती हैं
वह मुझसे बात भी नहीं करतीं
वह किसी से नहीं बोलतीं
घर पर रोज नए नए लोग आते हैं
बॉडी गार्ड वाले लोग आते हैं
चुप रहते हैं फिर चले जाते हैं
मम्मी उनसे भी बात नहीं करतीं
बस रोती रहती हैं
बिलखती रहती हैं
रात को नींद खुलने पर
उन्हें रोते ही देखती हूं
मम्मी के आंसू देखकर
मैं भी रोती हूं पापा
मुझे तुम बहुत याद आते हो
प्लीज पापा आ जाओ
मेरे लिए नहीं तो मम्मी के लिए ही
लेकिन तुम चले आओ
देखो तुम नहीं आओगे तो
मैं रूठ जाऊंगी
तुमसे बात नहीं करूंगी
कट्टी ले लूंगी
तुम कैसे हो गए हो पापा
क्या तुम्हें मेरी और मम्मी की सचमुच याद नहीं आती
तुम तो ऐसे कभी नहीं थे
अचानक तुम्हें क्या हो गया
तुम इतने बदल कैसे गए पापा
आज अखबारों में
तुम्हारी फोटो छपी है
लिखा है
तुम शहीद हो गए
देश के लिए
अपनी आहुति दे दी
यह शहीद और आहुति क्या है पापा
ड्राइंग रूम में
तुम्हारी वर्दी वाली जो फोटो टंगी है
उस पर फूलों की माला चढ़ा दी गई है
अगरबत्ती सुलगा दी गई है
मेरी तो कुछ समझ में ही नहीं आता
आज स्कूल की टीचर भी आईं थी
मेरे सिर पर हाथ फेर रही थीं
स्कूल में उन्होंने कभी इतना प्यार नहीं दिखाया
मम्मी भी फफक फफक कर रो रही थीं
मुझे भी रोना आ रहा था
सब लोग रो रहे थे
पापा तुम आ जाओ प्लीज
मुझे डर लगता है बहुत डर लगता है
मैं छुपना चाहती हूं पापा
बस तुम्हारे सीने में तुम्हारी गोदी में
ये देखो पापा
मेरे आंसू फिर गिरने लगे हैं
मैं रो रही हूं
सच्ची ये अपने आप गिर रहे हैं
मुझे तुम्हारी याद आने लगी है
बस तुम आ जाओ
आ जाओ न!
(इस कविता का पाठ मैंने 1999 में मोदी कला भारती सम्मान मिलने पर इंडियन मर्चेंट मैंबर के सभागृह में किया था, सबकी आंखें भर आईं थींं)
कब आओगे पापा?
पापा कब तुम आओगे
तुम्हारी बहुत याद आती है मुझे
अच्छा बाबा खिलौने मत लाना
मैं जिद नहीं करूंगी
नहीं तंग करूंगी तुम्हें
बस तुम आ जाओ
मम्मी हरदम रोती हैं
मांग में सिंदूर भी नहीं भरतीं
मंगल सूत्र निकाल दिया है उन्होंने
चूड़ियां भी तोड़ डाली हैं
सफेद साड़ी में लिपटी
बेडरूम में पड़ी
सिसकती रहती हैं
वह मुझसे बात भी नहीं करतीं
वह किसी से नहीं बोलतीं
घर पर रोज नए नए लोग आते हैं
बॉडी गार्ड वाले लोग आते हैं
चुप रहते हैं फिर चले जाते हैं
मम्मी उनसे भी बात नहीं करतीं
बस रोती रहती हैं
बिलखती रहती हैं
रात को नींद खुलने पर
उन्हें रोते ही देखती हूं
मम्मी के आंसू देखकर
मैं भी रोती हूं पापा
मुझे तुम बहुत याद आते हो
प्लीज पापा आ जाओ
मेरे लिए नहीं तो मम्मी के लिए ही
लेकिन तुम चले आओ
देखो तुम नहीं आओगे तो
मैं रूठ जाऊंगी
तुमसे बात नहीं करूंगी
कट्टी ले लूंगी
तुम कैसे हो गए हो पापा
क्या तुम्हें मेरी और मम्मी की सचमुच याद नहीं आती
तुम तो ऐसे कभी नहीं थे
अचानक तुम्हें क्या हो गया
तुम इतने बदल कैसे गए पापा
आज अखबारों में
तुम्हारी फोटो छपी है
लिखा है
तुम शहीद हो गए
देश के लिए
अपनी आहुति दे दी
यह शहीद और आहुति क्या है पापा
ड्राइंग रूम में
तुम्हारी वर्दी वाली जो फोटो टंगी है
उस पर फूलों की माला चढ़ा दी गई है
अगरबत्ती सुलगा दी गई है
मेरी तो कुछ समझ में ही नहीं आता
आज स्कूल की टीचर भी आईं थी
मेरे सिर पर हाथ फेर रही थीं
स्कूल में उन्होंने कभी इतना प्यार नहीं दिखाया
मम्मी भी फफक फफक कर रो रही थीं
मुझे भी रोना आ रहा था
सब लोग रो रहे थे
पापा तुम आ जाओ प्लीज
मुझे डर लगता है बहुत डर लगता है
मैं छुपना चाहती हूं पापा
बस तुम्हारे सीने में तुम्हारी गोदी में
ये देखो पापा
मेरे आंसू फिर गिरने लगे हैं
मैं रो रही हूं
सच्ची ये अपने आप गिर रहे हैं
मुझे तुम्हारी याद आने लगी है
बस तुम आ जाओ
आ जाओ न!
(इस कविता का पाठ मैंने 1999 में मोदी कला भारती सम्मान मिलने पर इंडियन मर्चेंट मैंबर के सभागृह में किया था, सबकी आंखें भर आईं थींं)
मंगलवार, 7 मार्च 2017
नारी
नारीक्या सचमुच चाहता है समाज
स्त्री-पुरुष को देखना समान
तो इसके लिए
कुछ नहीं करना
बस बेटी को बना होगा
उत्तराधिकारी परिवार का
सामाजिक रूप से ही नहीं
क़ानूनी तौर पर भी
चली आ रही है परंपरा
पता नहीं कितनी सदियों से
पुत्र को बनाने की उत्तराधिकारी
भेट चढ़ गई है स्त्री
उस पुरुष-प्रधान परंपरा की
बन गई है नागरिक
दोयम दर्जे की
अबला, पराया धन, बोझ
और पता नहीं क्या-क्या
कहा जाने लगा है स्त्री को
अगर करना है मुक्त
ग़ुलामी के एहसास से उसे
तो देना होगा उसे अधिकार
पिता की संपत्ति पाने का
बहुत ज़्यादा नहीं
केवल दस साल के लिए
हां, इन दस सालों
बेटा नहीं, केवल बेटी ही होगी
वारिस माता-पिता की
तब होगा नारी का
सही मायने में सशक्तिकरण
और वह पहुंच जाएगी
पुरुष के बराबर
बिना किसी आरक्षण के
मानिए यकीन
तब हो जाएंगी हल
अपने आप समाज की
सारी समस्याएं
क्योंकि अपने स्वभाव के चलते
नारी नहीं करेगी
पुरुष के साथ भेदभाव
जैसा कि पुरुष अब तक
करता रहा है नारी के साथ
हरिगोविंद विश्वकर्मास्त्री-पुरुष को देखना समान
तो इसके लिए
कुछ नहीं करना
बस बेटी को बना होगा
उत्तराधिकारी परिवार का
सामाजिक रूप से ही नहीं
क़ानूनी तौर पर भी
चली आ रही है परंपरा
पता नहीं कितनी सदियों से
पुत्र को बनाने की उत्तराधिकारी
भेट चढ़ गई है स्त्री
उस पुरुष-प्रधान परंपरा की
बन गई है नागरिक
दोयम दर्जे की
अबला, पराया धन, बोझ
और पता नहीं क्या-क्या
कहा जाने लगा है स्त्री को
अगर करना है मुक्त
ग़ुलामी के एहसास से उसे
तो देना होगा उसे अधिकार
पिता की संपत्ति पाने का
बहुत ज़्यादा नहीं
केवल दस साल के लिए
हां, इन दस सालों
बेटा नहीं, केवल बेटी ही होगी
वारिस माता-पिता की
तब होगा नारी का
सही मायने में सशक्तिकरण
और वह पहुंच जाएगी
पुरुष के बराबर
बिना किसी आरक्षण के
मानिए यकीन
तब हो जाएंगी हल
अपने आप समाज की
सारी समस्याएं
क्योंकि अपने स्वभाव के चलते
नारी नहीं करेगी
पुरुष के साथ भेदभाव
जैसा कि पुरुष अब तक
करता रहा है नारी के साथ
बुधवार, 8 फ़रवरी 2017
ग़ज़ल - हैरतअंगेज अल्फ़ाज़ पुस्तक में लिखा था
ग़ज़ल
हैरतअंगेज अल्फ़ाज़ पुस्तक में लिखा था
कनक कहीं धतूरा कहीं सोना लिखा था
चर्चा कहीं थी लाखों-करोड़ों के बजट की
कनक कहीं धतूरा कहीं सोना लिखा था
चर्चा कहीं थी लाखों-करोड़ों के बजट की
कहीं बच्चों को भूख से मरना लिखा था
जिक्र था बुद्ध, सुकरात महान आदमी थे
कहीं आदमी को केवल खिलौना लिखा था
कहीं आदमी को केवल खिलौना लिखा था
स्वास्थ के लिए हंसना है बहुत ही ज़रूरी
किसी को ज़िंदगी भर बस रोना लिखा था
किसी को ज़िंदगी भर बस रोना लिखा था
द्रौपदी को दुशासन ने बेहया करना चाहा
कहीं लाज को औरत का गहना लिखा था
हरिगोविंद विश्वकर्मा
मंगलवार, 10 जनवरी 2017
ग़ज़ल - कैसी ज़िंदगी
कैसी ज़िंदगी
कतरा-कतरा जीवन टुकड़ों में ज़िंदगी
देखना अभी कितनी बंटती है ज़िदगी.
लाख कोशिश से भी समेट नहीं पाया
हर क़दम पर देखो बिखरी है ज़िंदगी.
सोचा था मेहनत से गुज़र जाएगा जीवन
यहां तो उस तरह की है ही नहीं ज़िंदगी.
शर्तिया होगी मौत ऐसे जीवन से बेहतर
उसे भी आने नहीं देती कमबख़्त ज़िंदगी.
हे मां क्यों पढ़ा गई ईमानदारी का पाठ
देख तो हो गई है कैसी बदतर ज़िंदगी.
कतरा-कतरा जीवन टुकड़ों में ज़िंदगी
देखना अभी कितनी बंटती है ज़िदगी.
लाख कोशिश से भी समेट नहीं पाया
हर क़दम पर देखो बिखरी है ज़िंदगी.
सोचा था मेहनत से गुज़र जाएगा जीवन
यहां तो उस तरह की है ही नहीं ज़िंदगी.
शर्तिया होगी मौत ऐसे जीवन से बेहतर
उसे भी आने नहीं देती कमबख़्त ज़िंदगी.
हे मां क्यों पढ़ा गई ईमानदारी का पाठ
देख तो हो गई है कैसी बदतर ज़िंदगी.
शनिवार, 31 दिसंबर 2016
नोटबंदी - लोगों की असुविधा के लिए बैंकवालों को माफ़ नहीं किया जाना चाहिए
हरिगोविंद विश्वकर्मा
2016 आख़िरकार बीत गया। साल के अंतिम 53 दिन बेहद संकट भरे रहे। संकट इतना
गहरा रहा कि पैसे होने के बावजूद मध्यम वर्ग पाई-पाई का मोहताज़ रहा। डिमोनिटाइज़ेशन
की घोषणा करके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने समर्थकों (जिन्हें मोदी विरोधी भक्त
कहते हैं) के हीरो बन गए, लेकिन अपने विरोधियों, ख़ासकर गैरदक्षिणपंथी विचारधारा
के लोगों के लिए मोदी विलेन बन गए। नोटबंदी की घोषणा के बाद मोदी समर्थकों के साथ
आम जनता को भी लगा कि कालधन रखने वालों के बुरे दिन आ गए, लेकिन जब धन्नासेठों के
पास नए नोटों की गड्डियां मिलने लगी तो लोगों का मोदी से मोहभंग होने लगा और लोग
मानने लगे कि आम आदमी को बेवकूफ बनाने के लिए यह योजना शुरू की गई।
कई लोगों ने और बहुसंख्यक जनता ने भी माना कि मोदी की नोटबंदी की योजना ठीक
थी, लेकिन बैंकवालों ने एक साज़िश के तहत इसे फेल कर दिया। इसीलिए देश में आजकल
बैंक और बैंक अधिकारी विलेन बने हुए हैं। ट्रेन हो, बस हो या फिर चाय की दुकान,
लोग बैंकवालों को ही कोस रहे हैं। हालांकि नरेंद्र मोदी, बीजेपी और आरएसएस के
टिपिकल विरोधी इसे प्रधानमंत्री की नई चाल मान रहे हैं। उनके अनुसार नोटबंदी फेल
होने पर लोग मोदी को नहीं, बल्कि बैकों को गाली दे रहे हैं यानी मोदी के किए की
सज़ा भुगत रहे हैं बैंकवाले। दरअसल, बैंकों को लोग इसलिए भी कोस रहे हैं, क्योंकि
नोटबंदी के बाद जो भी रुपए वितरित हुए, उसे केवल बैंकों ने ही वितरित किया।
लिहाज़ा, लोगों को जो भी असुविधा हुई या हो रही है, उसके लिए सरकार से ज़्यादा
बैंकें ज़िम्मेदार हैं।
दरअसल, अतीत पर नज़र डाले तो भारत में बैंकों का कामकाज कभी भी चर्चा का विषय
नहीं रहा है। एकाध मामले को छोड़ दें, तो बैंकवाले आमतौर पर ऊपर से देखने में बहुत
ईमानदार माने जाते रहे हैं, जबकि यह सच नहीं है। सच तो यह है कि तमाम बैंक अफ़सरान
आम जनता के लिए बहुत सख़्त मालूम पड़ते हैं, लेकिन धन-कुबेरपतियों के सामने नरम हो
जाते हैं और बिना बारीक़ी से जांच पड़ताल किए करोड़ों रुपए का क़र्ज़ मंजूर करके ख़ूब
दरियादिली दिखाते हैं। इसके बावजूद इक्का-दुक्का केसेज़ को छोड़ दें तो बैंकवालों पर
सरकार या दूसरी एजेंसियों की नज़र नहीं के बराबर रहती है।
यही वजह है कि बेइमान धन्नासेठों से सांठगांठ करके बैंकवाले करोड़ों रुपए का
क़र्ज़ बांटते रहे हैं, जो दो चार साल बाद बैड लोन में तब्दील हो जाता है, लेकिन
इसके लिए किसी क़र्ज़दाता बैंक ने कभी क़र्ज़ मंजूर करने वाली शाखा के तत्कालीन
मैंनेजर को दोषी नहीं ठहराया। यहां तक कि ऐयाशी के लिए मशहूर विजय माल्या की
किंगफिशर एयरलाइंस के क़रीब 1201 करोड़ रुपए समेत 63 लोन डिफॉल्टर्स के 7000 (सात
हज़ार) करोड़ रुपए को बट्टे खाते (क़रीब-क़रीब माफ़ कर देना) में डालने के स्टेट
बैंक ऑफ इंडिया के फ़ैसले पर किसी ने सवाल नहीं उठाया। इतनी बड़ी रकम बट्टे खाते
में डालने पर एसबीआई के एक भी अधिकारी की नौकरी नहीं गई। यहां तक कि इन 63 लोगों
को लोन मंज़ूर करने वाले एसबीआई अफ़सरों से भी जवाब-तलब नहीं किया गया।
लब्बोलुआब यह कि परदे के पीछे काम करने के कारण बैंकवालों को पूरा भरोसा था कि
नोटबंदी के बाद भी वे जो कुछ करेंगे उस पर किसी एजेंसी की नज़र नहीं पड़ेगी।
लिहाज़ा, मौक़ा मिला है तो हाथ साफ़ कर लेने में कोई बुराई नहीं। लगता है, बैंकवालों
का यही अति आत्मविश्वास अब भारी पड़ रहा है। दरअसल, 8 नवंबर 2016 की शाम जब प्रधानमंत्री
ने 500/1000 की नोट बंद करने की घोषणा की तो जनता को लगा
बहुत अच्छा फ़ैसला है, लेकिन बैंकवाले उसी समय भांप गए कि बिना तैयारी के शुरू की
गई यह योजना देर-सबेर टांय-टांय फिस्स होने वाली ही है। सरकार ने इस योजना में
इतनी ज़्यादा बार संशोधन किया कि वाक़ई लगने लगा कि उसने इसे बिना तैयारी के शुरू
कर दिया था।
जो भी हो बैंकवालों ने नोटबंदी योजना के तमाम लूप होल्स को फ़ौरन पढ़ लिए। लिहाज़ा,
उन्होंने सोचा कि क्यों न इन लूप होल्स का फ़ायदा उठाकर अपने ख़ास लोगों का कल्याण
करते हुए उनके पुराने नोट (कालेधन) नई करेंसी में बदल दिए जाएं। जोड़-घटाने और
आंकड़बाजी में बेहद उस्ताद बैंकवालों ने कैलकुलेट कर लिया था कि अगर बांटने के लिए
रिज़र्व बैंक से मिली धनराशि जनता से पैनकार्ड लेकर अपने ख़ास लोगों को दे दी जाए
तो सरकार बिल्कुल भांप ही नहीं पाएंगी। न ही पकड़ पाएगी। इससे उनकी सेहत पर कोई
ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ेगा, क्योंकि इतने माइक्रो लेवल पर जांच पड़ताल करेगा कौन?
इसके बाद बैंक वालों ने वह खेल खेलना शुरू किया जो अब तक अरबपतियों के क़र्ज़
को बैडलोन में तब्दील होने को जस्टीफाई करने के लिए खेलते आ रहे हैं। इस बार खेल
था 500/1000 की पुरानी करेंसी को 2000 की नई करेंसी में
बदलने का। पूरे देश सोचता रहा कि बेचारे बैंकवाले बिना छुट्टी के दिन-रात काम कर
रहे हैं, जबकि बैंकवाले कैश बांटने की बजाय रसूखदार लोगों को नई करेंसी की गड्डी
की गड्डी पहुंचाने में लगे थे। पहले दो हफ़्ते नोटबंदी की आड़ में ब्लैक मनी हो
ह्वाइट करने का खेल बदस्तूर जारी रहा। इसका नतीजा यह हुआ कि एक सीरीज़ के ढेर सारे
नोट कुछ चंद लोगों तक पहुंच गए।
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई), इनकम टैक्स (आईटी)
और लोकल पुलिस द्वारा
देशव्यापी छापे मारकर जिस तरह से रसूखदार लोगों के पास से रोज़ाना करोड़ों
रुपए पकड़े जा रहे हैं। यानी जिस तरह दो हज़ार की नई करेंसी की गड्डियां और सोने
के भंडार ज़ब्त किए जाने की ख़बरें आ रही हैं। उससे ऐसा लगता है जैसे बैंकवालों ने
2000 रुपए की नई करेंसी का ज़्यादातर हिस्सा रातोंरात रसूखदार लोगों को दे डाला और
बेचारा आम आदमी लाइन में खड़ा अपनी बारी का इंतज़ार करता रह गया। नंबर आने पर उसे
कैश ख़त्म होने का बोर्ड देखने को मिला।
सरकार के निर्देश पर रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया ने कहा कि एक आदमी एक दिन में
केवल दो हज़ार रुपए एटीएम से निकाल पाएगा। यानी एक एटीएम कार्ड होल्डर एक दिन में
केवल 2000 रुपए (500 की नई नोट जारी होने के बाद 2500) की एक नोट पा सकता है। यानी
अगर एटीएम 24 घंटे चलता (जो हुआ नहीं) तब एक आदमी के पैसे निकालने में 2 मिनट जोड़
लें तो दिन भी में अधिकत 720 लोग 14 लाख 40 हज़ार रुपए निकाल सकते थे। इसी तरह चेक
के ज़रिए शेविंग अकाउंट से 10 हज़ार रुपए यानी 2000 की पांच नोट और करेंट अकाउंट
से 24 हज़ार रुपए यानी 2000 की 12 नोट ले सकते हैं, लेकिन यहां तो रसूखदार लोगों
के पास से एक-एक, दो-दो, तीन-तीन, चार-चार करोड़ नहीं बल्कि दस-दस और बीस-बीस
करोड़ रुपए मिल रहे हैं। एक सज्जन के पास तो 250 करोड़ रुपए की 2000 की गड्डियां
मिलीं, वह भी एक सीरियल की नोट यानी ये नोट एक ही बैंक से आए होंगे। इसका यह भी
मतलब है कि बैंकें आम आदमी को “पैसे नहीं हैं” कहकर बेरंग लौटा रही थीं और पैसे रसूखदार लोगों तक पहुंचा रही थीं।
सवाल यह है कि 2000 की एक नोट (एटीएम) या पांच नोट (शेविंग खाता) की बजाय
लोगों के पास गड्डी की गड्डी कैसे पहुंच गई। इसका क्या जवाब है, जो लोग बैंकवालों
को ईमानदार बता रहे हैं। जिस तरह से काला धन रोज़ाना पकड़ा जा रहा है, उसे
बैंकवाले कैंस करेंगे जस्टीफाई। ज़ाहिर है, भारतीय बैंकों ने देशवासियों ही नहीं
पूरे देश को धोखा दिया। चंद ईमानदार बैंक अफ़सरों व कर्मचारियों को स्वाभाविक तौर
पर बुरा लग सकता है, लेकिन इस कटु सच से इनकार नहीं किया जा सकता कि नोटबंदी की
घोषणा और 2000 की नोट जारी किए जाने के बाद भारतीय बैंकों ने देश के साथ गद्दारी
की।
8 नवंबर के बाद बैंकों ने जो कुछ किया, उसकी गहन जांच-पड़ताल के लिए एक आयोग
यानी कमीशन बिठाने की ज़रूरत है और ज़ब्त की जा रही 2000 रुपए की गड्डियां जिस
बैंक से दी गई हों, उस बैंक के पूरे ब्रांच के सभी अधिकारियों-कर्मचारियों के
ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार ही नहीं, बल्कि देशद्रोह का भी मामला दर्ज करके उन पर मुक़दमा
चलाया जाना चाहिए और उन्हें कड़ी से कड़ी सज़ा दी जानी चाहिए, क्योंकि बैंक अफसरों
ने कैश धनराशि अगर रसूखदार लोगों को न देकर आम जनता में बांटा होता तो लोगों को
इतनी ज़्यादा असुविधा नहीं होती, जितनी हुई या अभी तक हो रही है। बैंकवालों को माफ़ नहीं किया जाना चाहिए।
गुरुवार, 15 दिसंबर 2016
2012 दिल्ली गैंगरेप - इंसाफ़ के लिए कब तक करना होगा इंतज़ार?
हरिगोविंद विश्वकर्मा
16 दिसंबर का दिन संभवतः हर किसी को याद होगा। चार साल पहले इसी दिन राजधानी दिल्ली
में एक चलती हुई बस में एक बर्बरतापूर्ण गैंगरेप हुआ था। उसकी चौथी बरसी पर एक बार
फिर लोग गाहे-बगाहे सवाल उठा रहे हैं कि आख़िर ग़ुनाहगारों को अब तक सज़ा क्यों
नहीं दी गई? सरकार की ओर से कहा जा रहा हा कि उसने तो अपनी तरफ़ से दोषियों को सज़ा देने
की प्रक्रिया में पूरी कर दी। मतलब, दिल्ली पुलिस ने रिकॉर्ड समय में मामले की
जांच करके आरोप पत्र दाखिल कर दिया। इसके बावजूद अपराधी अभी तक ज़िंदा है।
दरअसल, चार साल पहले दिल्ली गैंगरेप के आरोपियों को जल्दी सज़ा देने के लिए फास्टट्रैक
कोर्ट का गठन किया गया था। रोहिणी की फास्टट्रैक कोर्ट ने 173 दिन यानी छह महीने से भी कम
समय में सज़ा सुना दी थी। बाद में दिल्ली हाईकोर्ट ने भी 180 दिन यानी छह महीने के
अंदर फांसी की सज़ा पर मुहर लगा दी थी। उस समय लोकतंत्र के तीनों स्तंभों
कार्यपालिका (पुलिस+सरकार), विधायिका (संसद) और
न्यायपालिका (निचली अदालत+दिल्ली हाईकोर्ट) की
सक्रियता देखकर एक बार पूरे देश को लगा और भरोसा भी हुआ कि पूरी व्यवस्था बदल
जाएगी। ऐसे प्रावधान हो गए हैं कि कोई बलात्कार की हिमाकत नहीं करेगा। महिलाओं पर
यौन हमला करने वाला हर अपराधी जेल में होगा।
लेकिन ऐसा नहीं हुआ। तमाम कवायदें टांय-टांय फिस्स हो गईं, क्योंकि देश का
सबसे महत्वपूर्ण मुक़दमा 14 मार्च 2014 से यानी क़रीब-क़रीब तीन साल (2 साल 10
महीने) से सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। अगर कहें कि इस देरी से देश में कम से
कम बलत्कृत महिला को जल्दी न्याय दिलाने की सरकार की कोशिश की हवा देश की सबसे
बड़ी अदालत में निकल गई, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। मतलब, आप सरकार में हैं तो चाहे
जितना उछल कूद लें, कमेटी बिठा लें, जांच करवा लें और फॉस्टट्रैक कोर्ट बना लें,
लेकिन फ़ैसला अदालत मुक़दमे की प्रक्रिया पूरी होने पर ही देगी। अब व्यवस्था ही
ऐसी है तो सुप्रीम कोर्ट क्या करे।
बहरहाल, 16-17 दिसंबर 2012 की रात आठ से नौ के बीच पैरामेडिकल छात्रा के साथ
छह दरिंदों ने इतना अमानवीय व्यवहार किया था कि लड़की का शरीर ही नष्ट हो गया।
भारत में डॉक्टरों ने उसकी जान बचाने की हर संभव कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हुए। भारतीय डॉक्टरों के नाकाम होने
पर उसे सिंगापुर के विश्वविख्यात माउंट एलिजाबेथ अस्पताल ले जाया गया, फिर भी उसकी जान नहीं बचाई
जा सकी। कहने का मतलब दो हफ़्ते मौत से जूझने के बाद 29 दिसंबर को वह यमराज से उसी तरह हार गई, जैसे दो हफ़्ते पहले बलात्कारियों
से लड़ने के बाद हार गई थी।
गैंगरेप की दुनियाभर में निंदा हुई थी। देश में कहीं शांतिपूर्ण तो कहीं उग्र प्रदर्शन
भी हुए थे। दिल्ली में प्रदर्शन के उग्र होने पर मेट्रो सेवा बंद करनी पड़ी थी।
रायसीना हिल्सरोड पर तो दिल्ली पुलिस ने आंदोलनकारियों पर लाठीचार्ज कर दिया था। घटना
के दो दिन बाद संसद के दोनों सदनों में जोरदार हंगामा हुआ था। आक्रोशित संसद
सदस्यों ने रेपिस्ट्स के लिए फ़ांसी की सज़ा तय करने मांग की थी। इसके बाद तत्कालीन
गृहमंत्री सुशीलकुमार शिंदे ने संसद को आश्वासन दिया कि आरोपियों को जल्द से जल्द
सज़ा दिलवाने की सरकार की ओर से हर संभव कोशिश की जा रही है और राजधानी दिल्ली में
महिलाओं की सुरक्षा के लिए हर संभव क़दम उठाए जा रहे हैं।
वह घटना कितनी महत्वपूर्ण थी इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि केंद्र
ने महिलाओं के ख़िलाफ़ बढ़ते य़ौन अपराध को रोकने के लिए कठोर क़ानून बनाने की
घोषणा की। लिहाजा, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे जस्टिस जेएस वर्मा की
अध्यक्षता में कमेटी का गठन किया गया। कमेटी ने दिन रात काम किया। उसे ऑक्सफोर्ड
यूनिवर्सिटी समेत देश-विदेश से क़रीब 80 हजार सुझाव मिले। कमेटी ने रिकॉर्ड 29 दिन में 630 पेज की रिपोर्ट 23 जनवरी 2013 को सरकार को सौंप दी।
कमेटी को महिलाओं पर यौन अत्याचार करने वालों को कठोरतम दंड देने की सिफारिश
करनी थी। लोगों को उम्मीद भी थी कि बलात्कारियों को फ़ांसी की सज़ा देने का
प्रावधान किया जाएगा। मगर कमेटी की रिपोर्ट बेहद निराशाजनक रही। रिपोर्ट में कमेटी
ने रेप को रेयर ऑफ़ रेयरेस्ट केस माना ही नहीं, जबकि देश का पूरा नेतृत्व हर बलात्कारी को फ़ांसी
की सज़ा देने के पक्ष में था। इसीलिए, वर्मा कमेटी की रिपोर्ट पढ़कर कई महिला
संगठनों ने आरोप लगाए थे कि पुरुष प्रधान समाज में पले-बढ़े और न्याय-व्यवस्था का
संचालन करने वाले जस्टिस वर्मा संभवतः बलत्कृत स्त्री की पीड़ा महसूस करने में असफल
रहे, अन्यथा हर बलात्कारी
के लिए फ़ांसी की सज़ा की सिफ़ारिश ज़रूर करते।
वस्तुतः कमेटी ने रेप के बाद लड़की की हत्या या मौत को रेयरेस्ट ऑफ़ रेयर ज़रूर माना और
हत्यारे रेपिस्ट के लिए मौत की सज़ा का प्रावधान किया। इसके अलावा जस्टिस वर्मा ने
यौन अपराध करने वालों को कड़ी सज़ा का प्रावधान किया जिसके चलते तरुण तेजपाल जैसे
तथाकथित बुद्धिजीवी पुलिस की गिरफ़्त में आए। बहरहाल, 21 मार्च 2013 को लोकसभा ने बलात्कार विरोधी बिल पास कर दिया और इस
क़ानून को क्रिमिनल लॉ संशोधन अधिनियम 2013 कहा गया।
दिल्ली गैंगरेप पर बीबीसी के लिए फिल्मकार लेस्ली एडविन ने 'इंडियाज डॉटर्स' शीर्षक से डॉक्यूमेंट्री
बनाई थी, जिसमें उन्होंने देश
में महिलाओं या लड़कियों के प्रति पुरुष की मानसिकता को बताने की हर संभव कोशिश की
थी। इसके लिए उन्होंने तिहाड़ जेल में एक आरोपी का इंटरव्यू भी लिया था। उस
इंटरव्यू के कारण यह वृत्तचित्र विवाद में आ गया। उस पर प्रसारण से पहले ही बैन लग
गया। भारत सरकार के सख़्त होने पर वृत्तचित्र के कंटेंट को यू-ट्यूब से भी हटाना
पड़ा।
इस बीच दिल्ली गैंगरेप के मुख्य आरोपी ड्राइवर रामसिंह ने न्यायपालिका से पहले
ख़ुद को सज़ा दे दी और 11 मार्च 2013 की सुबह तिहाड़ जेल में ख़ुकुशी कर ली। पिछले साल बरसी के दो दिन बाद यानी 16 दिसंबर की रात पीड़ित लड़की
पर सबसे ज़्यादा हैवानियत करने वाला आरोपी मुहम्मद अफरोज भारतीय न्याय-व्यवस्था पर
हंसता हुआ जेल (सुधार घर) से बाहर आया, क्योंकि रेप करते समय उसकी उम्र 18 साल से
कुछ दिन कम थी यानी वह नाबालिग था।
दिल्ली गैंगरेप के बाक़ी चार आरोपियों मुकेश सिंह, अक्षय ठाकुर, विनय शर्मा और पवन गुप्ता को विशेष त्वरित अदालत ने
दोषी क़रार देते हुए फ़ांसी की सज़ा सुनाई जा चुकी है। बेशक न्यायपालिका के पास
वर्कलोड ज़्यादा है. जैसा कि सुप्रीम कोर्ट के एक जज दो साल पहले हैदराबाद में एक
सेमिनार में कह चुके हैं कि देश में 65 हज़ार (64,919) आपराधिक मुक़दमे लंबित हैं। वैसे पूरे देश में तीन करोड़
मुकदमे अंडरट्रायल हैं। इसके बावजूद दिल्ली गैंगरेप की सुनवाई हो जानी चाहिए थी।
जो भी हो, नया अपराध क़ानून के बने क़रीब तीन साल होने वाले हैं, लेकिन इसके तहत अभी तक किसी
को सज़ा नहीं हुई है। एक लड़की के साथ बलात्कार के बाद उसकी हत्या करने वाले
कोलकाला के गार्ड धनंजय चटर्जी को 14 अगस्त 2004 को फांसी दी गई थी। मौत की सज़ा
पाने वाला धनंजय अब तक एकमात्र रेपिस्ट है। नए क़ानून के बाद दिल्ली के अलावा
मुंबई शक्तिमिल कंपाउंड गैंगरेप समेत कई बलात्कार के आरोपियों को निचली अदालतों की
ओर से फांसी की सज़ा सुनाई जा चुकी है, लेकिन सभी मुक़दमे ऊपरी अदालतों में लटके
पड़े हैं।
संभवतः यही वजह है कि तमाम कोशिश के बावजूद रेप की वारदातें रोके नहीं रुक रही
हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक़, पिछले साल बलात्कार के 3,27,394 मुक़दमे दर्ज हुए। इसी तरह 2014 में 36735 महिलाएं बलात्कार की शिकार
हुईं। 2013 में रेप के 33707 और 2012 में 24923 मामले केस हुए थे। 2014 में
रोज़ाना 101 रेप की वारदात दर्ज
हुई। यानी 14 मिनट में एक महिला अपनी इज्ज़त गंवा बैठती है। सन् 2012 के बाद रेप की घटनाओं में सात फ़ीसदी से ज़्यादा
बढ़ोतरी हुई है। दिल्ली और मुंबई महिलाओं के लिए सेफ मानी जाती है, लेकिन यहां बलात्कार की
घटनाएं सबसे ज़्यादा होती है। अकेले दिल्ली में रोज़ाना चार महिलाएं रेप की शिकार
होती हैं।
उर्दू के मशहूर शायर ख़्वाज़ा हैदर अली 'आतिश' का शेर बहुत शोर सुनते थे “पहलू में दिल का, जब चीरा तो क़तरा-ए-खूं न निकला।“ इस देश की व्यवस्था की करनी-कथनी में अंतर बयां
करता है। मतलब, कभी लोग क्रांति करने के लिए उतावले हो जाते हैं और कभी घटना ही विस्मृत कर
देते हैं। सरकार भी पीछे नहीं रहती और घोषणा पर घोषणा करने लगती है, यह सोचे बिना ही कि घोषणा पर
अमल संभव है या नहीं। इतनी सक्रियता देखकर लगता है कि अब ऐसी वारदातें भविष्य में
नहीं होंगी, लेकिन जल्द ही लोग घटना ही भूल जाते हैं और पुलिस कांख में डंडा दबाए फिर से
वही ”खैनी खाने” वाली मुद्रा में आ जाती है। उसका
यह अप्रोच हर घटना को लेकर रहता है। चाहे वह आतंकी हमला हो या फिर महिलाओं पर यौन
हमला यानी गैंगरेप।
समाप्त
बुधवार, 14 दिसंबर 2016
बैंकिंग सिस्टम की साख पर लगा बट्टा
हरिगोविंद विश्वकर्मा
एक तरफ़ रोज़ाना प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) और इनकम
टैक्स (आईटी) के छापे में चंद लोगों के पास से कई-कई करोड़ रुपए ज़ब्त किए जा रहे
हैं और निजी बैंक और नैशनलाइज़्ड बैंक ही नहीं बल्कि रिज़र्व बैंक के अधिकारी
पकड़े जा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर लोग खाते में पैसे होने के बावजूद पैसे-पैसे के
लिए मोहताज़ हैं और बैंकों का चक्कर काट रहे हैं।
डिमॉनिटाइज़ेशन यानी नोटबंदी की घोषणा को एक महीने से कुछ ज़्यादा हो गए हैं,
लेकिन तमाम बैंकों और एटीएम सेंटर्स के सामने लगने वाली लाइन कम होने का नाम ही नहीं
ले रही है। मुंबई में हालात अपेक्षाकृत थोड़े सुधरे हुए ज़रूर लग रहे हैं, लेकिन देश
के बाक़ी हिस्से में लंबी लाइनों का सिलसिला बरक़रार है। यह सच है कि नवंबर महीने में
जितनी भीड़ थी, अब उतनी तो नहीं है, लेकिन अब भी लोग अपने ख़ून-पसीने की कमाई बैंक
से निकालने के लिए कई-कई घंटे संघर्ष कर रहे हैं।
परेशान लोगों के जले पर नमक छिड़कते हुए केंद्र सरकार और रिज़र्व बैंक ऑफ
इंडिया की ओर से दावा किया जा रहा है कि 90 फ़ीसदी एटीएम अपडेट कर दिए गए हैं और
वे काम करने लगे हैं, लेकिन सच यह है कि किसी भी ओर निकल जाइए, आपको हर जगह 90
फ़ीसदी एटीएएम केंद्रों पर शटर गिरा हुआ ही दिखेगा। अभी एक न्यूज़ चैनल ने मुंबई
में कोलाबा से बोरिवली, मुलुंड और मानखुर्द तक सभी निजी और राष्ट्रीयकृत बैंकों के
एटीएम चेक करवाया तो पता चला 90 फ़ीसदी से ज़्यादा एटीएम पर अब भी ताला लगा हुआ
है।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या बैंकवाले केंद्र सरकार को ग़लत रिपोर्ट दे रहे
हैं? अगर हां, तो सवाल है कि बैंकवाले ऐसा क्यों कर रहे
हैं? आख़िर वे कौन लोग हैं जो सरकार को गुमराह करते हुए
बता रहे हैं कि 90 फ़ीसदी एटीएम काम करने लगे हैं। जिस तरह से देश में रोज़ाना अलग-अलग
हिस्से में करोड़ों रुपए में नई करंसी के पकड़े जाने की ख़बरें आ रही हैं। उससे
लोग हतप्रभ हैं कि वे तो महज़ दो हज़ार रुपए की एक नोट पाने के लिए कई-कई घंटे
एटीएम की क़तार में खड़े हो रहे हैं, फिर इतनी बड़ी मात्रा में नई करेंसी चंद लोगों
के पास कैसे पहुंच रही है?
दरअसल, प्रवर्तन निदेशालय, सीबीआई और इनकम टैक्स अधिकारियों की जांच में जो
तथ्य सामने आ रहे हैं, उन पर एक बार किसी को यक़ीन नहीं होगा। पिछले 30-33 दिनों
में बैंकवालों ने जो कुछ किया, उससे देश का पूरा बैंकिंग सिस्टम सवालों के घेरे
में आ गया है। दरअसल, निजी बैंकों में जो घपले हुए सो हुए, कई नैशनलाइज़्ड बैंकों के
असरों ने जमकर काल धन सफेद किया। यहां तक कि रिज़र्व बैंक का अधिकारी भी कालाधन
सफ़ेद करने के अभियान में लग गया।
बेंगलुरु से 93 लाख रुपए के नए नोट बरामद होने की घटना सामने आने के बाद अब
पुलिस ने रिजर्व बैंक अधिकारी के माइकल को गिरफ्तार कर लिया। माइकल पर 1.51 करोड़
के पुराने नोटों को नई करेंसी से बदलने का
आरोप है। माइकल कमीशन के लिए पुराने नोटों को नए नोटों से बदल रहा था। इसके पास से
17 लाख रुपए नकद बरामद हुआ है। इस अधिकारी पर दलालों के साथ मिलकर कालेधन को सफेद
करने का आरोप है।
बहरहाल, बैंकवालों ने जो कुछ किया, वे तमाम बुरे कारनामे अगर सार्वजनिक कर दिए
गए तो लोग बैंकों पर दोबारा कभी भरोसा नहीं करेंगे। लोग बैंकों पर आंख मूंदकर
भरोसा करते रहे हैं और स्वेच्छा से अपने व्यक्तिगत दस्तावेज़ उनके हवाले कर देते हैं।
भविष्य में जब उन्हें पता चलेगा कि उनके व्यक्तिगत दस्तावेज़ों को ग़लत इस्तेमाल किया
गया तब खाताधारक को क्या सदमा नहीं लगेगा। इस बार बैंकवालों ने यही सब किया है।
सीबीआई ने बेंगलुरु के इंदिरानगर शाखा के कर्नाटक बैंक के चीफ़ मैनेजर
सूर्यनारायण बेरी को फर्जीवाड़े में पकड़ा है। दरअसल, नोटबंदी की घोषणा के बाद सूर्यनारायण
ने पूरी शाखा के साथ मिलकर अपने खाताधारकों के पैन कार्ड का गलत इस्तेमाल करके अवैध
लेनदेन किया। बैंक ने ग्राहकों को एक बार पैसे देकर उनके पैन कार्ड का विवरण ले
लिए, जब कस्टमर्स दोबारा
ब्रांच में गए तो उन्हें नए नोट नहीं होने का हवाला देकर लौटा दिया गया। बैंकरों
ने इन कस्टमर्स को पैसे देने के बजाय नए नोटों का अवैध लेनदेन किया।
सीबीआई जांच में पाया गया कि धनलक्ष्मी बैंक के 31 एटीएमों में डाले जाने के लिए 1.30 करोड़ रुपये के नए नोट जारी
किए गए थे, लेकिन पैसे कर्नाटक
सरकार के शीर्ष अधिकारी एससी जयचंद्र और चंद्रकांत रामलिंगम समेत अनेक
सहयोगियों के पास पहुंच गए। हालांकि बाद में इन सबको सस्पेंड कर दिया गया। दरअसल,
नोटबंदी के बाद दो दिन एटीएम बंद रहे। इस दौरान कछेक एटीएमों को अपडेट कर दिया
गया। इसके बावजूद एटीएम चालू नहीं किए गए। कई यूं ही डेड पड़े रहे। अब जांच में पता
चला है कि एटीएमों के लिए दिए गए नए नोटों से काला धन सफेद किया गया और नए नोट काले
धनवालों के पास पहुंचा दिया गया।
ये तो दो उदाहरण है। बैंक अधिकारियों द्वारा 8 नवंबर के बाद जमकर घोटाला किया
गया। लोगों की यह भी धारणा बन गई है कि जनता को जो भी कठिनाई हो रही है उसके लिए केवल
बैंकवाले ही ज़िम्मेदार है। दरअसल, अकूत काला धन रखने वाले बैंक अधिकारी नहीं
चाहते है कि प्रधानमंत्री की नोटबंदी के ज़रिए काला धन नष्ट करने की योजना फलीभूत
हो। इसीलिए वर्कलोड का रोना रोते हुए इस योजना की हवा निकाल रहे हैं। बैंक अफसर नोटबंदी
के लूपहोल्स का फ़ायदा उठाकर कालाधन जमकर सफ़ेद कर रहे हैं।
आजकल ट्रेन या बस में नोटबंदी और बैंकर्स के कथित भ्रष्टाचार की ही चर्चा है। लोग
खुलेआम कह रहे हैं कि बैंकवालों ने पूरे जीवन की कमाई एक महीने में ही कर ली। जिस
तरह से रोज़ाना नई करेंसी देश के हर कोने से ज़ब्त हो रही है, उससे तो लोगों की
आशंका सच लग रही है। ओवरटाइम कार्य का हवाला देकर बैंकवाले केवल कालेधन को सफ़ेद
करने में जुटे हैं। दादर पूर्व में एक बैंक के गेट के सामने सैंडविच बेचने वाला एक
दिन उसी बैंक से सौ-सौ रुपए के कई बंडल लेकर निकला। पूछने पर पहले तो उसने आनाकानी
की, फिर बताया कि बैंक में उसकी सेटिंग है, इसलिए, उसने ख़ूब पैसे एक्सचेंज किए।
रिज़र्व बैंक के डिप्टी गवर्नर आर गांधी ने 13 नंवबर को अधिकृत बयान जारी किया
कि नोटबंदी के बाद 10 दिसंबर तक बैंकों ने 35 दिन में 4.61 लाख करोड़ रुपये नए नोट
वितरित कर दिए गए हैं। मात्रा के हिसाब से कुल 21.8 अरब नोट जारी हैं. इनमें से
20.1 अरब नोट 10, 20, 50 और 100 रुपये के
हैं. वही 500 और 2,000 के कुल 1.7 अरब नए नोट जारी किए गए हैं। वहीं दूसरी ओर बैंकों
में 12.44 लाख करोड़ रुपये के पुराने 1000 और 500 के नोट जमा हुए हैं. रिजर्व बैंक
और करेंसी चेस्ट को लौटाए गए पुराने नोट 12.44 लाख करोड़ रुपये के हैं। वहीं दूसरी
ओर बैंकों में अब तक 12.44 लाख करोड़ रुपये के पुराने 1000 और 500 के नोट जमा हुए
हैं। अभी इससे कुछ ही ज़्यादा करेंसी कालाधन के रूप में लोगों के पास है, जिसके 30
दिसंबर तक बैंक में जमा होने की उम्मीद है।
नोटबंदी पर बैंकवालों की भूमिका की जांच करने के लिए ईडी, सीबीआई और इनकमटैक्स
डिपार्टमेंट का एक टॉस्क फोर्स या आयोग का गठन किया जाना चाहिए। इतना ही नहीं
बैंकों में काम करने वालों की निजी संपत्तियों की जांच की जानी चाहिए और उनकी
संपत्ति की उनके आय के स्रोतों से मिलान की जानी चाहिए। इसके अलावा नोटबंदी के बाद
जिन लोगों को पुराने नोट स्वीकार करने अनुमति दी गई थी। उनके लेनदेन की बारीक़ी से
जांच होनी चाहिए कि 8 नंवबर के बाद उनका लेनदेन अचानक बढ़ क्यों गया, जबकि नोटबंदी
के बाद पूरा देश मंदी के दौर में है।
सोमवार, 5 दिसंबर 2016
कौन होगा जयललिता का उत्तराधिकारी ? नेतृत्व संकट से जूझ सकती है एआईडीएमके
नेतृत्व संकट से जूझ सकती है एआईडीएमके
हरिगोविंद विश्वकर्मा
मायावाती और ममता बैनर्जी की तरह जयराम जयललिता ने भी अपनी पार्टी के भीतर
सेकेंड इन कमान यानी दूसरे नंबर की लीडरशिप को पनपने ही नहीं दिया। इसके चलते भविष्य
में ऑल इंडिया द्रविड़ मुनेत्र कज़गम (एआईडीएमके) को नेतृत्व संकट से गुज़रना पड़
सकता है। फ़िलहाल, जयलिलता की गैरमौजूदगी में दो बार राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके
ओ पनीरसेल्वम को राजभवन में राज्यपाल विद्यासागर राव ने राज्य के अगले मुख्यमंत्री
के रूप में शपथ तो दिला दी, लेकिन वह पार्टी को एकजुट रख पाएंगे और उसे जीत दिला
पाएंगे यह भरोसा राजनीति के जानकार नहीं कर पा रहे हैं।
पनीरसेल्वम के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि उनकी पार्टी संगठन पर उतनी मजबूत
पकड़ नही है जितनी जयललिता की थी। इतना ही नहीं जयललिता की छत्रछाया में वह अपनी खुद
की कोई खास छवि या प्रभाव नहीं बना पाए। भविष्य में अगर किसी दूसरे नेता ने उन्हें
रिप्लेस किया तो उनकी यही कमज़ोरी ज़िम्मेदार होगी। तमिलनाडु की दो बड़ी पार्टियों
में डीएमके के एम करुणानिधि तो अपने बेटे और बेटियों को राजनीति में लाकर अपने
उत्तराधिकारी के विकल्प दे दिए, लेकिन जयललिता ऐसा नहीं कर पाईं। यही वजह है कि
उनकी पार्टी को भविष्य में नेतृत्व संकट का सामना करना पड़ सकता है।
इसमें दो राय नहीं कि तमिलनाडु ही नहीं देश की राजनीति में जयललिता ने अपना
क़द इतना विराट कर लिया था कि उनके दल में कोई भी नेता क़द में उनकी बराबरी तो दूर
उनके आसपास भी नहीं पहुंच सकता। यह वजह है कि एआईडीएमके भविष्य में उसी तरह
नेतृत्व संकट से गुज़र सकती है, जैसे एमजी रामचंद्रन के निधन के बाद हुई थी। उस
समय रामचंद्र की पत्नी जानकी रामचंद्रन और जयललिता के बीच उत्तराधिकारी बनने के
लिए भयानक संघर्ष और विधान सभा में मारपीट तक हो गई थी। बहरहाल चुनाव में जानकी की
पराजय के बाद जयललिता निर्विवाद रूप से पार्टी की नंबर एक नेता बन गईं।
दरअसल, जैसे उत्तर प्रदेश और बिहार की जनता परिवारवाद की आदी तमाम नाकामी के
बावजूद वह मुलायम सिंह यादव, मायावती और लालू प्रसाद यादव में ही भरोसा जताती है। वैसे
ही दक्षिण भारत की प्रजा अभिनेताओं को भगवान की तरह पूजने वाले स्वभाव की होती है।
ये नेता चाहे जितना भ्रष्टाचार करें, जनता उन्हें ही चुनेगी। यही वजह है कि
तमिलनाडु में पिछले 60 साल से बारी बारी से डीएमके या एआईडीएमके सत्ता में आती रही
है।
वस्तुतः जनता की इसी मानसिकता के कारण दक्षिण के राज्यों में एमजी रामचंद्रन,
जयललिता और एनटी रामाराव की बोलबाला रहा। यहां तक कि द्रविड़ मुनेत्र कज़गम के
नेता और पांच बार मुख्यमंत्री रह चुके एम करुणानिधि भी तमिल फिल्म और तमिल साहित्य
के नामचीन नाम रहे हैं। तमिलनाडु में रजनीकांत की लोकप्रियता का आलम यह है कि उनकी
फिल्म फ्लॉप फिल्म भी इतना ज़्यादा बिज़नेस कर लेती है कि हिंदी की हिट फिल्म भी
उतने पैसे नहीं कमा पाती है।
अब सवाल उठ रहा है कि करिश्माई नेता के नेतृत्व की आदी तमिल जनता 65 साल के पनीरसेल्वम को अपने
नेता के रूप में स्वीकार कर पाएंगी, इस पर बहुत भारी संदेह है, क्योंकि जयललिता का
अंधभक्त होने के नाते उन्हें भले सरकार का मुखिया बना दिया गया हो, लेकिन वह पूरी
पार्टी को संभालकर एकजुट रख पाएंगे और करुणानिधि को चुनैती दे पाएंगे इस पर भी
दुविधा है। फिर पार्टी में जयललिता का कद इतना बड़ा था कि उनकी पार्टी में सब उनके
आगे बौने लगते हैं।
दरअसल, पनीरसेल्वम की इमैज जयललिता के कट्टर भक्त की रही है। यहां तक कि 2014
में भ्रष्टाचार के आरोप में जयललिता के जेल भेजे जाने के बाद वह सार्वजनिक मंच पर फूट-फूट
कर रोए थे। इतना ही नहीं मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते समय भी पूरे देश ने उन्हें
मंच पर ही अपने आंसू बहाते देखा था। बहरहाल, इस साल सितंबर में जयललिता के बीमार
होने पर पनीरसेल्वम ही जयललिता के नाम पर तमिलनाडु का राजकाज संभाल रहे थे। जयललिता
के आठ विभागों का प्रभार उन्हें ही दिया गया था।
राजनीतिक हलकों में कहा जा रहा है कि जयललिता के उत्तराधिकारी और तमिलनाडु के
अगले मुख्यमंत्री के रूप में 45 साल के दक्षिण भारतीय सुपरस्टार थला अजित कुमार पनीरसेल्वम
से बेहतर विकल्प हो सकते थे। वह युवा हैं और सबसे बड़ी बात उस परंपरा के प्रतिनिधि
है। जिससे एमजी रामचंद्रन और जे जयलिलता इस मुकाम तक पहुंची हैं यानी वह ग्लैमरस
दुनिया के आदमी है, तमिल जनता जिनकी दीवानी रही है।
जयललिता की हालत बहुत ज़्यादा बिगड़ने के बाद सोमवार को कहा जा रहा था कि
जयललिता ने अपनी वसीयत में लिखा हुआ है कि अजित कुमार ही उनके उत्तराधिकारी होंगे।
इस वसीयत से जयललिता के तमाम बेहद भरोसमंद सहयोगी अच्छी तरह अवगत थे लेकिन,
कहा जा रहा है कि सियासत का
कोई अनुभव नहीं होने के कारण अंतिम समय में पनीरसेल्वम को ही जयललिता का
उत्तराधिकारी और मुख्यमंत्री बनाने का फ़ैसला किया गया।
तमिलनाडु की जनता भावुक स्वभाव की होती है। अभिनेताओं के रूपहले परदे की छवि
को ही असली मानती आई है। यही वजह है कि इस दक्षिणी राज्य में अभिनेताओं की
लोकप्रियता सिर चढ़कर बोलती है। एमजी रामचंद्रन और जयललिता अपने रूपहले परदे की
इमैज के चलते लोकप्रियता के शिखर तक पहंचने में कामयाब रहे। इसी परिपाटी के चलते
जयललिता के उत्तराधिकारी के रूम में अजीत कुमार का नाम आगे किया जा रहा था।
मुख्यमंत्री की कुर्सी पर शशिकला नटराजन की भी नज़र थी। शशिकला जयललिता की
सबसे करीबी मानी जाती रही हैं। एक जमाने में कहा जाता था कि जयललिता के हर फैसले
के पीछे शशिकला का हाथ होता है लेकिन बाद में दोनों के रिश्तों में खटास आ गई थी। शशिकला
भी पनीरसेल्वम की तरह थेवर समुदाय से हैं। उनका प्रभाव जयललिता के करीबी लोगों में
तो है पर वह परदे के पीछे ही काम करती रही हैं इसलिए कहा जाता है कि उनके पास
जनाधार नहीं है। फिर शशिकला पर भी जयललिता के साथ इन पर भ्रष्टाचार के मामले चले
हैं। उनके भतीजे सुधाकरन को जयललिता ने दत्तक पुत्र माना था और 1995 में उसकी भव्य शादी के
चर्चे आज भी होते हैं। शादी में खर्चे के कारण जयललिता की आलोचना भी हुई थी और बाद
में उन पर जो आरोप लगे उसकी पृष्ठिभूमि शाही शादी ही थी।
वैसे तो एआईडीएमके में 78 साल के पानरुति रामचंद्रन, लोकसभा के उप सभापति एम. थंबीदुरई, मंत्री इडापड्डी
पलानीस्वामी, अन्नाद्रमुक के उभरते सितारे 57 साल के एम फोई पांडियाराजन और शीला बालाकृष्णन भी
संभावित उत्तराधिकारियों की फेहरिस्त में हैं। पनीसेल्वम करुणानिधि और उनके बेटे
को चुनौती देते हुए पार्टी का सफल नेतृत्व कर पाएंगे, इस पर इस समय दावा करना
आत्मघाती हो सकता है। फ़िलहाल तो राज्य में सात दिन का राजनीतिक शोक है। कोई
गतिविधि उसलके बाद होगी।
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