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शनिवार, 9 अगस्त 2014

सचिन तेंदुलकर : विज्ञापन के लिए वक़्त है, संसद के लिए नहीं!

हरिगोविंद विश्वकर्मा
सचिन तेंदुलकर, लता मंगेशकर और अमिताभ बच्चन हर काम केवल और केवल अपने या अपने परिवार या अपनी कंपनी के फ़ायदे के लिए करते हैं. ये महान व्यक्तित्व इतनी ऊंचाई तक पहुंचने के बावजूद कभी निहित स्वार्थ से ऊपर नहीं ऊठ पाए. जिसके चलते आदत इनके महान क़द को छोटा कर देता है.

शुक्रवार को सचिन ने दिल्ली में एक प्रोग्राम में ग़लत बयानी कर दी. उन्होंने कहा कि वह अपने बड़े भाई अजीत तेंदुलकर की बीमारी (बाईपास सर्जरी) के चलते संसद में नियमित नहीं जा सके. यह एकदम सफ़ेद झूठ है. अजीत के बाइपास सर्जरी पिछले हफ़्ते मुंबई के जसलोक अस्पताल में डॉ. सुधांशु भट्टाचार्य ने की अगवाई में डॉक्टर्स की एक टीम ने की जबकि सचिन संसद मनोनीत किए जाने के बाद से ही राज्य सभा से ग़ायब हैं.

कांग्रेस द्वारा राज्यसभा सदस्य बनाने जाने के बाद भी वह लगातार विज्ञापन की शूटिंग के लिए ख़ूब समय निकालते रहे हैं, क्योंकि उससे उनको मोटी रकम मिलती है. इसीलिए, क्रिकेट को अलविदा कहने के बावजूद महेंद्र सिंह धोनी और विराट कोहली के साल भर बाद भी बाद सचिन विज्ञापन से सबसे ज़्यादा कमाई करने वाले खिलाड़ी हैं. सचिन आज भी बहुराष्ट्रीय कंपनी अविवा, कोकाकोला, अदिदास, तोशीबा, फ़्यूचर ग्रुप, एसएआर ग्रुप, स्विस घड़ी कंपनी ऑडिमार्स से जुड़े हुए हैं. कई छोटी-मोटी कंपनियों के प्रॉडक्ट भी बेचते रहते हैं. तभी तो 2013 में फ़ोर्ब्स ने उनकी कमाई 22 मिलियन डॉलर बताई थी. दरअसल, राज्यसभा में सचिन जाएं या न जाएं, उनको उतना ही पैसा (वेतन-भत्ता) मिलेगा. लिहाज़ा संसद में बैठकर वक़्त जाया करने की बजाय वह अपना कीमती वक़्त कॉमर्शियल शूटिंग्स को देते हैं.

एक क्रिकेटर के रूप में सचिन तेंदुलकर ने कभी कोई ऐसी पारी नहीं खेली जिसे भारत को जीत मिली हो. इसीलिए, “विज़डन की 100 बेस्ट इनिंग्स” में सचिन की कोई पारी नहीं है. जबकि सुनील गावस्कर, वीवीएस लक्ष्मण, राहुल द्रविड़, सौरव गांगुली, गुलडप्पा विश्वनाथ, कपिलदेव और वीरेंद्र सेहवाग जैसे अनेक भारतीय बल्लेबाज़ रहे हैं जिनकी कोई न कोई पारी विज़डन का 100 बेस्ट पारियों में रही है.

सचिन की टेस्ट मैच, एक दिवसीय मैच और टी-20 मैचों में बल्लेबाज़ी का बारीक़ी से अध्ययन करें तो जब भी भारत संकट में रहा, वह सस्ते में पैवेलियन लौट गए. टेस्ट मैच में एक बार पाकिस्तान के ख़िलाफ़ भारत मैच जीतने की पोज़िशन में था लेकिन शतक बनाने के थोड़ी देर बाद ही सचिन आउट हो गए और भारत मैच हार गया. सचिन ने 200 टेस्ट की 329 पारियों में 53 के औसत से 15921 रन बनाए लेकिन उनके ज़्यादातर शतक ड्रा हुए मैचेज़ में रहे. वह गेंदबाज़ों की तूफानी या शॉर्टपिच गेंद कभी विश्वास से नहीं खेल पाए इसीलिए डेल स्टेन, डोनाल्ड, मैकग्रा, लिली, वकार, विशप मलिंगा या ली की गेंदों के सामने उनके खाते में बहुत ज़्यादा रन नहीं हैं. उनका खेल बांग्लादेश या जिंब्ब्वे की फिसड्डी टीमों के ख़िलाफ़ सबसे उम्दा रहा है. उनका करीयर बेस्ट अविजित 248 भी बांग्लादेश के ख़िलाफ़ ही है. दरअसल, यूएनआई में नौकरी के दौरान इन पंक्तियों के लेखक ने काफ़ी रिसर्च के बाद सचिन पर इसी तरह की एक बढ़िया रिपोर्ट फ़ाइल की थी लेकिन उसे सचिन विरोधी क़रार देते हुए एजेंसी ने रिलीज़ नहीं की क्योंकि उस समय सचिन के बारे में निगेटिव लिखना तो दूर कोई सोचता भी नहीं था.

सचिन ने राज्यसभा की मर्यादा को ही नहीं घटाया बल्कि, भारतरत्न पुरस्कार की प्रतिष्ठा में भी बट्टा लगा दिया है.  भारत रत्न पुरस्कार पा चुका खिलाड़ी टीवी पर लोगों से एक ख़ास किस्म के प्रोडक्ट ख़रीदने की अपील करता है. जबकि दुनिया जानती है सारे किरदार टीवी विज्ञापन में झूठ बोलते हैं. सचिन एक आम अभिनेता या खिलाड़ी के रूप में यह झूठ बोलते तो कोई हर्ज़ नहीं था, लेकिन यह झूठ सचिन भारत रत्न के रूप में बोलते हैं. इसका निश्चित तौर पर ग़लत संदेश जाता है.


एक बात और, अगर पर्याप्त अटेंडेंस न होने पर किसी छात्र को परीक्षा में बैठने से रोका जा सकता है तो संसद की कार्यवाही से बिना कारण ग़ायब रहने वाले हर सदस्य की सदस्यता रद की जानी चाहिए ताकि ऐसे लोगों को मौक़ा मिले जिनके पास संसद (लोकसभा-राज्यसभा) विधानसभा या अन्य जनपंचायत के लिए पर्याप्त समय हो.

सोमवार, 30 जून 2014

ग़ज़ल - कैसी है ज़िंदगी...?

कैसी है ज़िंदगी...?

बेतरतीब सा सफ़र है टुकड़ों में ज़िंदगी
देखना अभी कितनी बंटती है ज़िदगी.

लाख कोशिश की पर समेट नहीं पाया
हर क़दम पर देखो बिखरी है ज़िंदगी.

सोचा था मेहनत से गुज़र जाएगा जीवन
यहां तो उस तरह की है ही नहीं ज़िंदगी.

शर्तिया होगी मौत ऐसे जीवन से बेहतर
उसे भी आने नहीं देती कमबख़्त ज़िंदगी.

हे मां क्यों पढ़ा गई सतयुग का पाठ
देख तो हो गई है कैसी बदतर ज़िंदगी.

-हरिगोविंद विश्वकर्मा

सोमवार, 12 मई 2014

व्यंग्य : हे मतदाताओं! तुम भाड़ में जाओ!!

हे मतदाताओं! तुम भाड़ में जाओ!!
हरिगोविंद विश्वकर्मा
हे मतदाताओं! तुम भाड़ में जाओ! मैं तुम्हारे आगे हाथ नहीं जोड़ने वाला। मैं तुम्हें इस क़ाबिल ही नहीं मानता, कि तुम्हारे आगे हाथ जोड़ूं। मैं तुमसे वोट भी नहीं मांगूंगा। मुझे पता है, तुम इस बार मुझे वोट नहीं दोगो, क्योंकि तुम मुझसे नाराज़ हो। ठीक उसी तरह जैसे, पांच साल पहले तुम मेरे विरोधी से नाराज़ थे। मैं जानता हूं, पिछले पांच साल के दौरान मैंने कुछ भी नहीं किया, इसलिए तुम नाराज़ होगे ही। तुम नाराज़ रहो मेरे ठेंगे से। पांच साल पहले, करोड़ों रुपए फूंककर मैं चुनाव लड़ा था। तुम्हारे भाइयों का शराब पिलाई थी। ढेर सारे लोगों को कैश भी बांटे थे। चुनाव में इतनी दौलत ख़र्च की थी, तो उसकी भरपाई क्यों न करता। मैं समाजसेवा के लिए पॉलिटिक्स में नहीं आया हूं। मैं इतना बड़ा बेवकूफ भी नहीं हूं, कि समाजसेवा के लिए इस गंदे क्षेत्र में आऊं। तुम लोग भले बेवकूफ़ी करो, मैं बेवकूफ़ी नहीं कर सकता। इसीलिए अपने कार्यकाल में पांच साल मैंने जमकर पैसे बनाए। कह सकते हो, मैंने हर काम पैसे लेकर किया। मैंने सरकारी पैसे हज़म किए। इन सबका तुम्हें बुरा नहीं लगना चाहिए था, परंतु बुरा लगा। तो बुरा लगता रहे। मुझे रत्ती भर फ़र्क़ नहीं पड़ता। तुम मुझे वोट दो या न दो। इससे भी मेरी सेहत पर कोई असर नहीं पड़ता। बहुत होगा, मैं चुनाव हार जाऊंगा। वह तो इस क्षेत्र में हर पांच साल बाद होता है। इस बार भी हारने पर पांच साल घर बैठूंगा। इतने पैसे बनाया हूं, उसे ख़र्च करूंगा। परिवार के साथ देश-विदेश घूमूंगा। मुझे पता है इस बार तुम मेरे उसी विरोधी को वोट दोगे, जिसने मुझसे पहले तुम्हारी वाट लगाई थी। इस बार तुम उसे जीताओगे, तो वह पांच साल तक फिर तुम्हारी वाट लगाएगा। इतनी वाट लगाएगा, इतनी वाट लगाएगा कि अगली बार तुम मजबूरन फिर मुझे वोट दोगे। तुम्हारे पास और कोई विकल्प ही नहीं है। देश में लोकतंत्र के आगमन से यही होता आ रहा है। आगे भी होता रहेगा। बेटा, यह तुम्हारी नियति है। तुम्हारे पास नागनाथ या सांपनाथ हैं। तुम उन्हीं में किसी को चुनने के आदी हो चुके हो।

दरअसल, सबसे पहले तुम पर हिंदू राजाओं ने शासन किया। तुम्हारे लिए कुछ भी नहीं किया। तुम्हें हर चीज़ से तुम्हे वंचित रखा। बाद में मुस्लिम सुल्तानों ने तुम्हारा ख़ून चूसा। उसके बाद आए अंग्रेज़। उन्होंने भी तुम्हारा जमकर दोहन किया। सबसे अंत में बारी आई मेरे जैसे देशभक्तों की। मैंने देखा कि शोषण का तुम विरोध तो दूर उफ् तक नहीं करते। ऐसे में मैं क्यों पीछे रहता। मैं जुट गया अपना और अपने परिवार की तरक़्क़ी करने में। आज मैं पोलिटिकल फ़ैमिली बनाकर ऐश कर रहा हूं। तुम्हें ख़ूब लूट रहा हूं। आगे भी ऐसे ही लूटता रहूंगा। मैं तुम्हें इसी तरह ग़ुलाम बनाए रखूंगा। सदियों से ग़ुलाम रहने के कारण ग़ुलामी तुम्हारे जीन्स यानी डीएनए में घुस गई है। मैंने तुम्हें ऐसा ट्रीटमेंट दिया है कि अब तुम मन से हमेशा ग़ुलाम ही रहोगे। मेरे चमचे बने रहोगे। मेहनत तुम करोगे और मौज़ मैं करूंगा।

हां, तुम्हारे पास कोई ईमानदार आएगा। तुम्हारा अपना कोई हितैषी बनेगा और तुम्हारे हित की बात करेगा। तुम्हें हम नेताओं की असलियत बताएगा और तुमसे वोट मांगेगा। ताकि तुम्हारा भला करे। मैं जानता हूं, तुम उसे वोट नहीं दोगे, बल्कि तुम उसकी टांग खींचोगे। उसे गाली दोगे। उसे फटकारोगे। ज़लील करोगे। उसके बारे में तरह-तरह की बातें फैलाओगे। कई ग़लत खुलासे करोगे। वह ईमानदार भी रहेगा तो भी तुम उस पर भरोसा नहीं करोगे, क्योंकि अपने समाज के लोगों को गरियाने का हुर तुम्हारे अंदर इस तरह फिट कर दिया गया है, कि वह कभी ख़त्म ही नहीं होगा। तुम अपने हर हितैषी को दुश्मन ही समझोगे। यह तुम्हें कलियुग का शाप है।

देखो न, तुम अपनी औक़ात नहीं देखते और बातें करते हो प्रधानमंत्री की। तुम चर्चा करते हो कि इसे पीएम बनाना है, उसे पीएम बनाना है। इसे सीएम बनाना है, उसे सीएम बनाना है। यहां तक कि जो नेता तुम्हें जानता तक नहीं तुम उसे भी पीएम बनाने की बात करते हो। तुम रेलवे टिकट लेने के लिए कई-कई दिन लाइन में खड़े रहते हो। लोकल ट्रेन में गेहूं की बोरी की तरह ठुंस जाते हो। रसोई गैस पाने के लिए धक्के खाते हो। पुलिस और सरकारी कर्मचारियों की गाली सुनते हो। तुम्हारी फरियाद कोई नहीं सुनता। तुम दर-दर भटकते हो। नौकरी पाने के लिए रिरियाते हो। नौकरी लग गई तो उसे बचाए रखने के लिए चाटुकारिता करते हो। तुम दीन-हीन रहोगे तब भी बात करोगे पीएम की। दिल्ली सल्तनत की। आजकल तो तुममें से कुछ लोग फ़ेसबुक पर आ गए हैं। एक स्मार्ट फोन लेकर हरदम अपने लोगों के ख़िलाफ़ कुछ न कुछ पोस्ट करते रहते हैं। कमेंट दो-चार लोग लाइक क्या करने लगे, बन गए बुद्धिजीवी। बुद्धिजीवी का स्वभाव होता है, वह उसी की वाट लगाता है जो उसकी मदद करना चाहता है। तुम भी वही करते हो। एक राज़ की बात बताऊं, तुम जैसे हो वैसे ही रहो। तुम बदलोगे तो मेरे और मेरे लोगों का अस्तित्व ख़तरे में पड़ जाएगा। इसलिए तुम जैसे हो वैसे ही रहो हमेशा। शोषित, दमित और उत्पीड़ित।

व्यंग्य : एक इंटरव्यू दे दीजिए प्लीज़....

हरिगोविंद विश्वकर्मा
हे नेताजी आप महान हैं. आप देशवासियों के भाग्यविधाता हैं. भारत के इतिहास में आप जैसा करिश्माई नेता न तो कभी हुआ था, न तो अब है और न ही कभी भविष्य में होगा. आप श्रेष्ठों में श्रेष्ठ हैं. बस आप हमें अपना एक इंटरव्यू दे दीजिए, प्लीज़! चाहे जैसे भी हो, एक बार मेरे साथ बैठ जाइए. मुझसे बातचीत कर लीजिए, आप जो कहेंगे, मैं वहीं पूछूंगा. या अगर मैं ग़लती से कोई अप्रिय सवाल पूछ बैठूं तो आप मुझे बिना संकोच के डांट दीजिएगा, इससे मेरा कतई अपमान नहीं होगा. मुझे सुविधानुसार ही इंटरव्यू दीजिएगा. मुझे कोई परेशानी नहीं होगी. मुझे तो बस आपके एक अदद इंटरव्यू से मतलब. मुझे सवाल से नहीं, इंटरव्यू से मतलब है सरकारजी. इस समय आपका एक इंटरव्यू लेना ही मेरी जीवन का मकसद है. इसलिए एक इंटरव्यू दे दीजिए प्लीज़.

हे नेताजी, आपने ऐरे, गैरे, नत्थू खैरे को इंटरव्यू दे दिया. आपके दर से कोई खाली नहीं गया. जो भी आपके यहां आया, उससे आपने बातचीत कर ली. केवल मैं ही अभागा वंचित रह गया, आपका इंटरव्यू लेने से. अब मेरी प्रतिष्ठा दांव पर है. लोग ताने पर ताने दे रहे हैं. कहते हैं, “आप नेताजी का इंटरव्यू नहीं कर सके. आपकी पत्रकारिता में अब वह धार नहीं रही. इसीलिए नेताजी ने आपको इंटरव्यू नहीं दिया. आपका असर होता तो आपको भी इंटरव्यू ज़रूर मिलता. ” बतौर पत्रकार, अब, मेरी क्रेडिबिलिटी, मेरी साख, आपके एक इंटरव्यू की मोहताज़ हो गई है. इसलिए कह रहा हूं, अब मेरी इज़्ज़त आपके हाथ में है. इसे तो बचा लीजिए. बस एक इंटरव्यू दे दीजिए, प्लीज़.

आप जैसा कहेंगे, वैसा ही इंटरव्यू लूंगा. आपका इंटरव्यू लेने के अपना फ़ॉर्मेट को ही बदल दूंगा. आपके साथ अच्छे कपड़े पहनकर बैठूंगा. नहीं-नहीं, आपकी पंसद के कपड़े पहन लूंगा. हां, आप जो भी कहेंगे, वहीं कपड़े पहनूंगा. आप कहेंगे तो कपड़े उतारकर केवल चड्ढी-बनियान में इंटरव्यू लूंगा. आप इससे भी खुश नहीं होंगे तो दंडवत करते हुए आपसे सवाल पूछूंगा. इससे भी संतुष्ट न हुए तो एक पांव पर खड़े होकर इंटरव्यू लूंगा. या फिर आप चाहेंगे तो नाक रगड़कर सवाल पूछूंगा. आप आराम से कुर्सी पर या सोफे पर बिराजना, मैं नीचे फ़र्श या ज़मीन पर बैठूंगा. इससे मेरी अवमानना नहीं होगी क्योंकि आपके इंटरव्यू के लिए मैंने अपना सेल्फ़-रिस्पेक्ट ताक पर रख दिया है. मैंने अपने को इतना बदला, सो कृपा करिए. बस एक इंटरव्यू दे दीजिए, प्लीज़.
                                                   

इंटरव्यू में मुझे आपकी तारीफ़ करने का मौक़ा मिलेगा. जो मैं अब तक नहीं कर सका. मैं नादान आपका आलोचक जो था. केवल और केवल आपकी आलोचना करता रहा. जो मन में आया वहीं आपको कहता रहा. सरकारजी, सच पूछो तो मैंने घनघोर पाप किया है. अब मैं अपने पाप का प्रायश्चित करना चाहता हूं. आपका एक इंटरव्यू लेना चाहता हूं. ताकि मैं बता सकूं पूरी दुनिया को, कि मैं ग़लत था. आप सही थे. आपकी खासियत के बारे में, आपके जादू के बारे में बताऊंगा, सारी दुनिया को. जिसके चलते आजकल हर कोई आपका लट्टू है. आप पर फ़िदा है. आपकी जय-जयकार कर रहा है. हमें भी जय-जयकार करने का मौक़ा दीजिए. एक इंटरव्यू दे दीजिए, प्लीज़.

बुधवार, 30 अप्रैल 2014

घर हुआ सपना कांग्रेस-शासन में! (हरिगोविंद विश्वकर्मा)

घर हुआ सपना कांग्रेस-शासन में!
 हरिगोविंद विश्वकर्मा
मुंबई को सपनों का शहर कहा जाता है। माना जाता है कि यहां सपने पूरे होते हैं। इसीलिए देश के कोने-कोने से लोग अपने सपने संजोए यहां भागे चले आते हैं। लेकिन सपने साकार करने वाली नगरी क्या अब भी मुंबई सपने साकार करती है? बिना किसी भेदभाव के अब तक लोगों को रोटी कपड़ा और मकान देती आई मुंबई अब बदलने लगी है। इस हक़ीक़त से कोई भी असहमत नहीं होगा कि मुंबई ने अब “अपना घर” बनाने के सपने को साकार करना बंद कर दिया है। यानी मायानगरी में आशियाने का ख़याल ही सपना हो गया है। दरअसल, यह सब हुआ है कांग्रेस के 10 साल के शासन में। मुंबई ही नहीं देश के हर छोटे-बड़े शहर में रियल इस्टेस के भाव में दस गुना तक की बढ़ोतरी हुई है जिससे अब औसत आदमी के लिए घर बनाना किसी सपने जैसा हो गया है।

सन् 2004 तक मुंबई शहर तो नहीं, उपनगरों में ज़रूर घर ख़रीदना मुमकिन था। लोग-बाग बैंक से क़र्ज़ लेकर या मित्रों-रिश्तेदारों से मदद मांगकर किसी तरह सिर पर छांव बना लेते थे। क़रीब 225 वर्गफ़ीट क्षेत्रफल का घर तब चार-पांच लाख रुपए तक मिल जाता था। वन बेडरूम-हॉल-किचन (बीएचके) का सेट आठ से दस लाख में उपलब्ध था। लेकिन कांग्रेस की सरकार क्या बनी, रातोंरात सब कुछ बदल गया। घर के दाम में मानो पंख लग गए। चार-पांच लाख के फ़्लैटों की कीमत 10 साल में 35 से 40 लाख पहुंच गई। आठ से दस लाख के घर 75 से 90 लाख के हो गए। चूंकि लोगों की आमदनी में उस हिसाब से इज़ाफ़ा नहीं हुआ, लिहाज़ा महंगाई की मार झेल रहा आम आदमी घर खरीद ही नहीं सकता। कांग्रेस-रिजिम में बिल्डर और रियल इस्टेट कारोबारी जमकर फल-फूल रहे हैं। अब तो हालत यह हो गई है कि अगर आप किसी तरह कमा-धमाकर अपना और परिवार का पेट पाल रहे हैं तो मुंबई में रहने की तो कल्पना ही मत कीजिए। इतना ही नहीं आसपास के नगरों में रहने का भी ख़्वाब मत देखिए क्योंकि अब विरार-बोइसर या कल्याण-उल्हासनगर-टिटवाला में भी घर ख़रीदना आपकी हैसियत से परे हो गया है।

अभी कुछ महीने पहले बंगलुरु की फ़र्म “नाइट फ़्रैंक इंडिया” ने देश में फ़्लैट की कीमतों पर सर्वे किया था। सर्वे के मुताबिक मुंबई में 30 फ़ीसदी अंडर-कंस्ट्रक्शन फ़्लैट्स की कीमत करोड़ रुपए से अधिक है जबकि 52 फ़ीसदी घरों के दाम 60-70 लाख से ऊपर। जो सस्ते घर उपलब्ध हैं उनमें ज़्यादातर स्लम रिडेवलपमेंट अथॉरिटी के 225 से 270 वर्गफ़ीट के रेंज के कम क्षेत्रफल के छोटे घर हैं, जिनकी कीमत 35-45 लाख के बीच है। अगर रिडेवलपमेंट योजना की बिल्डिंगों को छोड़ दें तो मुंबई में औसत इमारतों, यानी पांच, सात या नौ मंज़िल की बिल्डिंग, का निर्माण ही बंद हो गया है। अब हर जगह केवल और केवल गगनचुंबी टॉवर्स बनाए जा रहे हैं जो औसतन 25 से 40 और कोई-कोई 50 मंज़िल के हैं। देश की सबसे ऊंची इमारत भी मुंबई में ही बनाई जा रही है। इन बहुमंज़िली इमारतों में वन बीएचके सेट का कॉन्सेप्ट ही नहीं हैं। यानी जो फ़्लैट बन रहे हैं, उनमें सबसे छोटा घर दो बीएचके है, जिसकी न्यूनतम जगह 900 वर्गफ़ीट है।

दो साल पहले जनता को बेवकूफ़ बनाने के लिए महाराष्ट्र की कांग्रेस-एनसीपी सरकार ने सर्कुलर जारी किया कि बिल्डरों को सुपरबिल्टअप एरिया के मुताबिक नहीं, बल्कि कारपेट एरिया के हिसाब से फ़्लैट बेचने पड़ेगे। सरकार के फ़रमान से लोग ख़ुश हुए कि घर के दाम गिरेंगे। वे भी घर ख़रीद सकेंगे लेकिन हुआ उलटा। घर के दाम बढ़ते ही गए। मज़ेदार बता यह है कि नए सरकारी नॉर्म के मुताबिक आज की तारीख़ में सुपरबिल्टअप एरिया के हिसाब से घर बेचा नहीं जा सकता लेकिन यह फ़ाइलों की बात है। क़ानून बना दिया गया, पर ध्यान नहीं दिया गया कि उस पर अमल हो रहा है या नहीं। सरकार और नेताओं के आशीर्वाद से दिन दूना रात चौगुना तरक़्क़ी कर रहे बिल्डर कारपेट-एरिया की बजाय ग्राहकों से सुपरबिल्टअप का चार्ज ले रहे हैं। ग़ौर करने वाली बात है कि रजिस्ट्री कारपेट-एरिया पर ही हो रही है यानी बाक़ी टैक्सेज़ वगैरह कारपेट-एरिया पर ही लग रहे हैं।

मिसाल के तौर पर मुंबई के पश्चिमी उपनगर गोरेगांव में फ़िलहाल फ़्लैट के भाव 12 से 16 हज़ार रुपए प्रति वर्गफ़ीट के बीच है। यहां सबसे छोटे घर 900 वर्गफ़ीट कारपेट एरिया के हैं जिनका सुपरबिल्टअप क्षेत्रफल 1420 से 1450 वर्गफ़ीट के बीच है। ये फ़्लैट कारपेट भाव पर नहीं धड़ल्ले से सुपरबिल्टअप रेट पर बेचे जा रहे हैं। कारपेट-एरिया के अनुसार मौज़ूदा भाव से फ़्लैट की कीमत एक करोड़ से थोड़ा ज़्यादा (1 करोड़ 8 लाख) है। पर सुपरबिल्टअप दाम 1 करोड़ 74 लाख रुपए कर देता है। इस पर 9 लाख रुपए वेहिकल पार्किंग चार्ज लिया जाता है जो कि क़ानूनन मुफ़्त है। इसके अलावा दो साल की अवधि के लिए सोसाइटी चार्ज के रूप में 4 लाख रुपए (यानी लगभग 18 हज़ार रुपए प्रति माह) वसूला जाता है। इसमें आजकल 100 रुपए प्रति वर्गफ़ुट फ़्लोरराइज़ चार्ज भी लगने लगा है। यानी अगर 31वीं मंज़िल पर घर है तो 3100 रुपए प्रति वर्गफ़ुट के हिसाब से 38 लाख 75 हज़ार रुपए फ़्लोरराइज़ चार्ज लगेगा। मतलब ले देकर फ़्लैट की कीमत सवा दो करोड़ रुपए (2.225 करोड़) की सीमा को पार कर जाती है।

मज़ेदार बात यह है कि काग़ज़ पर फ़्लैट की कीमत कारपेट-एरिया के अनुसार ही होती है। बल्कि रेट को और भी कम कर दिया जाता है। मतलब घर की रजिस्ट्री बहुत कम दर पर होती है। कारपेट एरिया के अलावा बाक़ी क्षेत्रफल की जो भी धनराशि होती है उसका भुगतान कैश में होता है। दो करोड़ के फ़्लैट का औसतन व्हाइट-ट्रांज़ैक्शन केवल 80 से 85 लाख रुपए या उससे भी कम में होता है। यानी 60 फ़ीसदी से ज़्यादा धनराशि ब्लैकमनी होती है। रेवेन्यू और आयकर विभाग के लोग बिल्डरों के साथ मिलकर अपने ही विभाग को चूना लगाते हैं। कहा जा सकता है कि अंधेरगर्दी और लूट-खसोट के खेल में बिल्डरों के अलावा नेता, नौकरशाह, राजस्व अफ़सर, ब्यूरोक्रेट्स, सरकारी कर्मचारी, पुलिस, आयकर विभाग और बाक़ी एजेंसियों के लोग शामिल रहते हैं। यह तो मुंबई का उदाहरण है। पूरे देश में रियाल इस्टेट का मुंबई  फ़ॉर्मूला ही लागू है। कोई औसत आमदनी वाला आदमी घर खरीद कर दिखाए। पूरा जीवन बैंक का इंटरेस्ट भरते भरते गुज़ार जाएगा।

कांग्रेसी ज़ोर-शोर से कह रहे हैं कि देश तरक़्की कर रहा है। इनसे कौन पूछे कि तरक़्की का मतलब क्या नागरिकों को शहर से बाहर खदेड़ देना है। फिलहाल, काग्रेस यही कर रही हैं। आख़िर उस विकास का क्या मतलब जब आदमी घर ही न खरीद पाए। इतनी महंगाई में औसत आमदनी वाली आदमी कैसे रहेगा मुंबई जैसे शहर में? यानी देश की आर्थिक राजधानी में 10-20 हज़ार रुपए महीने कमाने वालों के लिए कोई ग़ुंज़ाइश ही नहीं रह गई है। वह घर के सपने तो देख सकता है लेकिन अपने देश और अपने शहर में ही घर नहीं खरीद सकता। ऐसे में अगर कहें कि इस विकसित भारत से बेहतर तो अपना पिछड़ा भारत ही था, जहां कम से कम आदमी थोड़ी कोशिश करके रोटी, कपड़ा और मकान तो जुटा लेता था। जिस देश में एक बड़ा तबक़ा दिन भर पसीना बहाने के बाद भी सौ रुपए न कमा पाता हो, वहां करोड़ों रुपए के घर की बात बड़ी अटपटी लगती है। लेकिन सच तो यही है।

समाप्त

मंगलवार, 4 मार्च 2014

राज ठाकरे से नितिन गडकरी की मुलाक़ात का मतलब?

राज ठाकरे से नितिन गडकरी की मुलाक़ात का मतलब?
मासूम उत्तर भारतीय बच्चों को मारने वालों को माफ़ी नहीं!

हरिगोविंद विश्वकर्मा
मुंबई, ठाणे और महाराष्ट्र के बाक़ी इलाक़ों में रहने वाले उत्तर भारतीयों सावधान हो जाओ। नौकरी के लिए परीक्षा देने आए तुम्हारे बच्चों को मुबई के रेलवे स्टेशनों, सड़कों और परीक्षा केंद्रों पर दौड़ा-दौड़ा कर पिटवाने वाले राज ठाकरे को भूलना नहीं। पिछले एक हफ़्ते में पूर्व बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी राज ठाकरे से दो बार मिले हैं। ये दोनों नेता बहुत अच्छे दोस्त हैं। यानी बीजेपी के रिजिम में भी राज ठाकरे प्रोटेक्टेड रहेंगे। उत्तर भारतीय लोगों के ख़िलाफ़ अपमानजनक कमेंट करते रहेंगे, ज़हर उगलते रहेंगे क्योंकि बीजेपी के मैनेजर गडकरी उनके दोस्त हैं।

हे उत्तरभारतीयों! अब तुम्हें तय करना है कि तुम्हारे अपने मासूम बच्चों की पिटने वालों, पिटवाने वालों और हमलावरों से दोस्ती रखने वालों को इस लोकसभा चुनाव में वोट देना है या नहीं? यक़ीन मानो जो लोग नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी या सेक्युलरिज़्म का हवाला देकर इन हमलावरों से दोस्ती गांठ रहे हैं। या इन हमलावरों से किसी भी तरह से जुड़े हैं। उनकी बातों में आना है या नहीं, यह तुम्हें ही तय करना है। निश्चित तौर पर अगर तुम्हारे अंदर का स्वाभिमान मरा नहीं है, उन बच्चों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटने का दृश्य नहीं भूले होगे तो तुम लोग इनको कतई वोट नहीं दोगो।

तुम्हारे बीच के वे नेता जो इन हमलावरों से जुड़े हैं, उनके दोस्त हैं, या उनके ख़ेमे में हैं, उनके अपने स्वार्थ हैं। उनके अपने स्वार्थ के आगे तुम्हारा हित कहीं ठहरता ही नहीं। इस बात को ज़ेहन में रखना। इसलिए इस तरह के अवसरवादी नेताओं से भी सावधान रहना क्योंकि ये अवसरवादी अपना हित साधने के लिए यानी विधायक, सांसद या मंत्री बनने के लिए तुम्हारा इस्तेमाल कर रहे हैं। यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं सत्ता के लालची ये स्वार्थी नेता उत्तर भारतीय समाज के लिए हमलावरों से भी ज़्यादा ख़तरनाक हैं। ये विभीषण की कैटेगरी में आते हैं।

उत्तर भारतीय छात्रों की पिटाई करवाने वाले महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के अध्यक्ष राज ठाकरे को कांग्रेस और बीजेपी दोनों प्रमोट कर रही हैं। कांग्रेस ने कभी राज ठाकरे के ख़िलाफ़ उचित कार्रवाई नहीं की तो अब बीजेपी चुनाव में उनका साथ और समर्थन चाह रही है। यानी ये दोनों राष्ट्रीय पार्टियां उत्तर भारतीय छात्रों पर हुए हमले की सीधी दोषी हैं। कांग्रेस शासन में संरक्षण इंन्जॉय करने वाले राज ठाकरे आज भी मराठी धरती पुत्रों का हवाला देकर उत्तर भारत के लोगों का हड़काते रहते हैं, अपमानजनक भाषा का प्रयोग करते हैं और कांग्रेस और बीजेपी दोनों पार्टियां मौन धारण किए रहती हैं।

बीजेपी ने तो अपनी मुंबई इकाई में उत्तर भारतीयों का पत्ता ही साफ़ कर दिया है। कोई है बीजेपी नेता जिसे आज की तारीख़ में उत्तर भारतीयों का हितैषी या प्रतिनिधि कहा जा सके। मुंबई बीजेपी ने उत्तर भारतीय नेताओं को चुन-चुनकर हाशिए पर डाल दिया। ऐसे में उत्तर भारतीय वोटों की उम्मीद यह पार्टी क्या राजनाथ सिंह के नाम किस आधार पर कर रही है। ज़ाहिर हैं कांग्रेस और बीजेपी में यहां भी कोई ख़ास अंतर नहीं है जैसे देश के बाक़ी हिस्सों में। दोनों पार्टियां एक ही सिक्के की दो पहलू हैं।

हमारा देश 26 जनवरी 1950 को लागू किए गए 397 अनुच्छेदों वाले संविधान से चल रहा है। इसमें अब तक सौ से ज़्यादा संशोधन किए गए हैं। देश का वहीं संविधान देश के हर नागिरक को रोज़ी-रोटी के लिए देश के किसी भी कोने में जाने, रहने और काम करने का अधिकार देता है। इसीलिए देश के हर कोने के लोग दूसरी जगह बसे हैं। इसी को हम विविध संस्कृति के नाम से जानते हैं। जिसे हम गंगा-जमुनी संस्कृति भी कहते हैं। लेकिन राज ठाकरे जैसे सत्ता के लालची अरबपति नेता मराठीभाषियों की भावनाओं को अपने स्वार्थ के लिए भड़काते हैं। तो ऐसे लोगों के ख़िलाफ़ फ़ॉस्टट्रैक कोर्ट में मामला चलवाकर इन्हें यथाशीघ्र सज़ा दी जानी चाहिए थी। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। इस राजनीति को बेनक़ाब करने का वक़्त आ गया है।

अगर उत्तर प्रदेश, बिहार और बाक़ी प्रदेशों के लोग रोज़ी-रोटी के लिए मुंबई की रुख करते हैं तो इसके लिए 67 साल तक शासन करने वाली कांग्रेस, बीजेपी, जनता पार्टी, जनता दल और इन दलों के नेता जवाहरलाल नेहरू, लालबहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, पीवी नरसिंह राव, मनमोहन सिंह के अलावा मोराजी देसाई, चौधरी चरण सिंह, विश्वनाथप्रताप सिंह, चंद्रशेखर सिंह, एचडी देवेगौड़ा, इंद्रकुमार गुजराल और अटलबिहारी वाजपेयी को ज़िम्मेदार ठहराया जाएगा। क्योंकि इन नेताओं ने देश का संतुलित विकास नहीं किया। मुंबई को अगर विरार तक मान लें, तो यह शहर देश की 60-65 किलोमीटर में समुद्री सीमा में सिमटा है और देश के पास 7000 हज़ार किलोमीटर से ज़्यादा की समुद्री सीमा है। इस लिहाज़ से देश में 100 से ज़्यादा मुंबई विकसित की जा सकती थी। लेकिन नहीं की गई। कल्पना कीजिए, इस देश के पास 100 से ज़्यादा मुंबई जैसे शहर होते तो क्या मुंबई में इतनी भयानक भीड़ होती? कौन चाहेगा अपनी मिट्टी से दूर ऐसी जगह रहे जहां उसे बाहरी कहा जाता है और तमाम तरह के अपमान झेलने पड़ते हैं। अपने गांव तक आने-जाने के लिए स्ट्रगल करना पड़ता है।

अगर मुंबई के ओरिजिन की बात करें तो कभी यह सात टापुओं पर बसा वीरान इलाक़ा था। यहां हर कोई बाहर से ही आया है। हां, कोई बहुत पहले आ गया था, कोई बाद में आया, कोई अब आ रहा है और कोई भविष्य में आएगा। यहां अगर ठाकरे परिवार की बात करें तो आधुनिक डीएनए विश्लेषण से यह साबित हो गया है कि ठाकरे के पूर्वज चंद्रसेनिया कायस्थ समुदाय से आते हैं जिनका मूल चिनाब नदी यानी कश्मीर है। यानी वे कश्मीर से ही निकलकर पूरे देश में फैले और बिहार, मध्य प्रदेश होते हुए महाराष्ट्र (तब महाराष्ट्र था ही नहीं) में पहुंचे। यानी जब हर कोई मुंबई में बाहर से आया है तो कोई किसी को बाहरी कैसे कह सकता है। इसलिए सबको “भारतीय” कहना ज़्यादा प्रासंगिक होगा।

बहुत से लोगों को पता नहीं है कि वाराणसी में बहुत बड़ी तादाद में मराठी और बंगाली रहते हैं। मराठियों और बंगालियों ने बनारस में काशी की संस्कृति को आत्मसात कर लिया है। इसलिए वे वहां अपने को बाहरी नहीं समझते। फिर उत्तर प्रदेश बिहार जैसे राज्यों में इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया जाता कि कौन कहां से आया है। लिहाज़ा किसी के साथ भाषा के आधार पर भेद किया ही नहीं जाता। ऐसे में यह सवाल जायज है कि फिर मुंबई में उत्तर प्रदेश के लोगों को किस बिना पर “परप्रांतीय” या “बाहरी” कैसे कहा जा सकता है? ख़ासकर जब महाराष्ट्र राज्य ही 1960 में बना हो तो कैसे कोई यही का आदमी अपने आपको धरती पुत्र और बाक़ी लोगों को बाहरी कह सकता है। इस तरह की नफ़रत फैलाने वालों के ख़िलाफ़ जब यह सिलसिला शुरू हुआ तभी ऐक्शन लिया जाना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं किया गया। कांग्रेस ऐसे तत्वों को बढ़ावा देती रही। ऐसी कांग्रेस को कभी माफ़ नहीं किया जाना चाहिए जिसने कुछ चुनिंदा राज्यों के अलावा कहीं भी विकास नहीं किया लिहाज़ा हर जगह से लोग रोज़ी रोटी की तलाश में अपना घर बार छोड़कर चले जाते हैं और वहां राज ठाकरे जैसे लोगों की राजनीति के शिकार होते हैं।

आज़ादी के बाद कांग्रेस पूरे समय केवल और केवल वोट बैंक की राजनीति करती रही है। एक साज़िश के तहत मुसलमानों को शिक्षा से वंचित रखा। नतीजा सामने हैं, आज सरकारी नौकरियों में मुसलमान अपनी आबादी के अनुपात में कहीं है भी नहीं। इतनी बड़ी आबादी और सरकारी नौकरी में इतना कम प्रतिनिधित्व हैरान करता है। इसलिए यह क़ौम आज भी सुरक्षा के नाम पर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी जैसे अवसरवादी राजनीतिक दलों को वोट देने के लिए मज़बूर है। और ये पार्टियां और उनके मुस्लिम नेता इस क़ौम को बेवकूफ़ बनाते हैं।

उत्तर भारतीयों की तरह मुसलमानों का मुद्दा कम अहम नहीं है। छह दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद मुंबई में दिसंबर और जनवरी में दो चरण में दंगे (हुए तो कतई नहीं) करवाए गए। जिसमें हज़ार से ज़्यादा निर्दोष लोग मारे गए। उसकी जांच के लिए श्रीकृष्णा आयोग का गठन हुआ। आयोग ने अपनी रिपोर्ट भी दी लेकिन आज कहां है वह रिपोर्ट। 1999 में कांग्रेस ने उसी रिपोर्ट को लागू करने का वादा करके मुसलमानों का वोट हासिल किया था। आज मुंबई दंगे को लोग पूरी तरह भूल गए हैं जबकि उस मारकाट के दोषी शायद ही किसी को सज़ा मिली होगी।

ज़ाहिर सी बात है कि अगर कांग्रेस-एनसीपी सीरियस होती तो श्रीकृष्ण आयोग में दोषी ठहराए गए लोगों के ख़िलाफ़ फ़ॉस्टट्रैक कोर्ट में मुक़दमा चलता और उन्हें उनके ग़ुनाह के लिए जेल भेजा जाता लेकिन कांग्रेस ने ऐसा नहीं किया। मुसलमानों का हितैषी होने का दंभ करने वाले भी विधायक और मंत्री का पद पाते ही अपनी क़ौम को भूल गए। लिहाज़ा आज ये सभी कैरेक्टर जब आप के पास वोट के लिए आएं तो क्या आपको उन्हें वोट देना चाहिए? नहीं बिलकुल नहीं। हां, आपके पास इन नेताओं के अलावा और कोई ऑप्शन न हो तो राइट टू रिजेक्ट का इस्तेमाल कीजिए लेकिन सत्तावर्ग के इन कथित दलालों को वोट कभी मत देना।

कुल मिलाकर ख़ुशहाल और शांतिपूर्ण जीवन हर आदमी का सपना होता है। समाज और शहर ऐसा हो जो अपने परिवार जैसा लगे। ऐसे में नफ़रत फैलाने का क्या तुक? जो लिहाज़ा लोग नफ़रत की आग पर अपनी रोटी सेंकते हैं उन्हें आइडेटिफ़ाई करके बाहर का रास्ता क्यों न दिखा दिया जाए और इसके लिए चुनाव जैसा लोकतंत्र का महापर्व सबसे शुभ और पाक घड़ी है।

समाप्त

सोमवार, 18 नवंबर 2013

पलायनवादी अण्णा हज़ारे की कुंठा

हरिगोविंद विश्वकर्मा
देश के सबसे प्रतिष्ठित समाजसेवी का ख़िताब गले में लटकाए घूम रहे अण्णा हज़ारे आख़िर चाहते क्या हैं? क्या वह सठिया गए हैं? या कांग्रेस ने उन्हें मैनेज कर लिया है? पूरे देश को पहले लगा कि अण्णा कोई फकीर टाइट आदमी हैं, मंदिर में रहते हैं, भ्रष्टाचार को यक़ीनन समूल नष्ट करना चाहते हैं। मगर उनकी पैंतरेबाज़ी से पूरा मुल्क हैरान है, कि आख़िर अण्णा को हो क्या गया है? वह चाहते क्या हैं? भष्टाचार को संरक्षित करना चाहते हैं या उसका ख़ात्मा करना चाहते हैं?  वह भ्रष्टाचारियों के ख़िलाफ़ लड़ने वालों के साथ हैं या ख़ुद भ्रष्टाचारियों के साथ? ऐसे समय जब दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी और उसके नेता अरविंद केजरीवाल को जनता का भरपूर समर्थन मिल रहा है। पहली बार चुनाव लड़ रही आप ने कांग्रेस ही नहीं बीजेपी के भी दांत खट्टे कर दिए हैं। आप के चलते ही चुनावी मुक़ाबला कम से कम दिल्ली में त्रिकोणीय हो गया है। यानी भारतीय राजनीति में मतदाताओं के सामने पहली बार ईमानदारी भी एक विकल्प के रूप में है। ऐसे समय भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ने वाले साफ़-सुथरे लोगों का हौसला आफ़ज़ाई करने की बजाय अण्णा उन्हें हतोत्साहित कर रहे हैं। अण्णा उन्हीं लोगों को क्रेडिबिलिटी पर गंभीर सवाल खड़ा कर रहे हैं जो उनका सबसे ज़्यादा रिस्पेक्ट करते हैं।

अण्णा ने केजरीवाल को जो चिट्ठी लिख मारी है उसे पढ़कर तो कम से कम यही लगता है उन्होंने फिलहाल अपना पाला बदल लिया है। वह “राग कांग्रेस” आलापने लगे हैं। देश का भट्ठा बैठाने वाली कांग्रेस का खुला समर्थन कर रहे हैं। इसीलिए, चुनाव के अति नाज़ुक मौक़े पर, जब महज दो हफ़्ते पहले जब मतदान केवल दो सप्ताह दूर है, उन्होंने अरविंद के चेहरे पर ग़ैरज़रूरी चिट्ठी दे मारी है। इससे भ्रष्ट कांग्रेस के नेताओं को आप के लोगों पर कीचड़ उछालने का और मौक़ा मिल गया है। आप के उम्मीदवार हतोत्साहित हों, और कांग्रेस ज़ोर-शोर से दोहराती रहे कि केजरीवाल ने अण्णा को धोखा दिया। इन पंक्तियों के लिखने तक कांग्रेस के लोग यही करने भी लगे हैं। कांग्रेसी आप के महज पांच करोड़ विदेशी चंदे की जांच करवा रही है। जबकि पार्टी के पास दो हज़ार करोड़ रुपए के चंदे के सोर्स का कोई अता पता नहीं है।

खैर, चिट्ठी में सभी ग़ैरज़रूरी तथ्य उठाए गए हैं। मसलन, अण्णा ने कहा है कि चुनाव में उनके नाम का दुरुपयोग हो रहा है। जबकि सच ये है कि आप का कोई उम्मीदवार अण्णा का नाम तक नहीं ले रहा है। किसी पोस्टर पर उनकी फोटो नहीं है। किसी नारे में उनका नाम नहीं है। फिर कैसे हुआ उनके नाम का दुरुपयोग?  हां, जनलोकपाल की चर्चा होने पर अरविंद या बाक़ी टॉप लीडरान यह ज़रूर कहते हैं कि यदि दिल्ली में आप की सरकार बनी तो विधानसभा की अधिवेशन दिसंबर में ही रामलीला मैदान में होगा जिसमें सबसे पहले अण्णा वाला जनलोकपाल का बिल पारित किया जाएगा। इसे अगर अण्णा अपने नाम का इस्तेमाल मानते हैं, तो उनकी बलिहारी! इसके अलावा उन्होंने आरोप लगाया है कि अण्णा आंदोलन का पैसा चुनाव में खर्च हो रहा है। जबकि अण्णा के आंदोलन का पैसा आंदोलन के दौरान ही खर्च हो गया था। उस समय अतिरिक्त राशि की ज़रूरत पड़ी थी। उसकी पाई-पाई का ब्यौरा ऑडिट हो चुका है जिसे अण्णा अगस्त २०१२ में ही मान चुके थे। तीसरा पॉइंट है, अण्णा को लगता है कि जनलोकपाल क़ानून बनाने के नाम पर आप के नेता झूठ बोल रहे हैं। यहीं बात कांग्रेस चुनाव में कह रही है। बेशक देश के लिए क़ानून संसद में बनेगा लेकिन दिल्ली के लोगों के लिए क़ानून तो दिल्ली एसेंबली में ही बनेगा। यह अण्णा अगर नहीं समझ पा रहे हैं, तो भगवान ही मालिक।

अण्णा से कोई पूछे कि जनलोकपाल कैसे बनेगा? क्या जनलोकपाल आसमान से टपकेगा? या भगवान की तरह अचानक प्रकट होकर व्यवस्था से भ्रष्टाचार को समूल नाश कर देगा? अण्णा से यह भी पूछा जाना चाहिए कि जनलोकपाल बनेगा कैसे? क्या इस जनलोकपाल को सोनिया गांधी, मनमोहन, सुरेश कलमाड़ी, पवार, गडकरी, ए राजा, मुलायम, लालू यादव, धनंजय, रसीद मसूद, रघुराज सिंह, करुणानिधि, जयललिता, जगनमोहन जैसे भ्रष्ट लोग बनाएंगे? नहीं इन लोगों को बनाना होता तो अब तक क़ानून बन गया होता या कह सकते हैं कि आम आदमी पार्टी के गठन की नौबत ही नहीं आती।

अण्णा की फितरत देखिए, पहले तो भ्रष्टाचार उन्मूलन का खूब शोर मचाया। आनन-फानन में आमरण अनशन पर बैठ गए। मासूम देशवासियों को लगा कि नासूर बन चुके भ्रष्टाचार को ख़त्म करने वाला मसीहा आख़िरकार आ ही गया। इसका नतीजा यह हुआ कि उस आंदोलन के साथ पूरे देश में आंदोलन शुरू हो गया। जो जहां था वहीं अनशन-धरने पर बैठ गया। जनता का अपार समर्थन पाकर अण्णा हृदय परिवर्तन जैसी बहकी बहकी बाते करने लगे। ऐसा लगा कि अण्णा आदर्श समाज का सपना देख रहे हैं जो कि मौजूदा दौर में मुमकिन नहीं है। उनकी बात सुनकर हर किसी को यही लगने लगता है इस आदमी को कोई सीरियस साइकिक प्रॉब्लम है।

अण्णा जैसे हिडेन एजेंडा रखने वाले लोग भारतीय लोकतंत्र के लिए सबसे घातक हैं। ये राजनीति को गंदी कहकर अपराधियों और बेईमानों को संसद में घुसने का वॉकओवर दे देते हैं। इनके फैलाए भ्रम के कारण साफ़-सुथरी इमैज वाले लोग राजनीति में उतरते नहीं और उसका नतीजा यह होता है कि शहाबुद्दीन, धनंजय, राजा भैया जैसे अपराधी सांसद-मंत्री बन जाते हैं। सीधी-सी बात है, अगर आप जनलोकपाल क़ानून को लेकर सचमुच सीरियस हैं तो आपको संसद और विधानसभाओं में ऐसे लोग चाहिए ही जो जनलोकपाल बिल के पक्ष में सदन में मतदान करें। कम से कम मौजूदा दौर में संसद और विधान सभाओं पर अपराधियों या जरूरत से कई गुना पैसा और संपत्ति जमा करने वाले सामाजिक अपराधियों का क़ब्ज़ा है। ये अपराधी किसी भी कीमत जनलोकपाल बनने नहीं देंगे। इसी मुद्दे पर अण्णा ने शुरुआत में राजनीतिक पार्टी बनाने की पहल का समर्थन किया था।

अगर समय पर ग़ौर करें तो अण्णा के अप्रत्याशित क़दम से साफ़ हैं कि आप को मिल रहे जनसमर्थन से उन्हें जलन हो रही है। इसी कारण वह भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों के ख़िलाफ़ चल रहे मूवमेंट कमज़ोर करने की कोशिश कर रहे हैं। जिससे दिल्ली विधानसभा में आप को सेटबैक मिले। यही तो कांग्रेस का असली ऐजेंडा है जिसे अमली जामा अब अण्णा पहना रहे हैं। उनको कौन समझाए कि अगर जनलोकपाल अस्तित्व में आया तो उसे ईमानदार लोग ही बनाएंगे। अनैतिक तरीके और भ्रष्टाचार से अरबों-खरबों की दौलत जमा कर चुके भ्रष्ट और अपराधी सांसद हमेशा लोकपाल बिल के ख़िलाफ़ ही वोट करेंगे। क्योंकि जनलोकपाल एक ऐसी व्यवस्था बनाएगा जहां गांधी-नेहरू के वंशवाद, शरद पवार संपत्ति बनाने की लालच, मुलायम, पटनायक, ठाकरे, बादल, अब्दुल्ला, करुणानिधि, जगनमोहन के परिवारवाद, लालू और रॉब्रट वाड्रा की लूट-खसोट और राजाभैया के दहशतवाद के लिए कोई जगह नहीं होगी। यानी इन सबका अस्तित्त ही ख़त्म हो जाएगा। कल्पना कीजिए, ऐसी भारतीय राजनीति का जहां ये सारे विदूषक जेल की हवा खा रहे हों। और उनकी संपत्ति जब्त कर ली गई हो। तो इस देश में कोई बेरोज़गार या भूखा नहीं रहेगा।

अब अण्णा चाहते हैं कि वह राजनीति को गंदा कहकर उसमें ना उतरे ताकि उनके कपड़े गंदे न हो सके। ज़ाहिर सी बात है, अगर आपको इस देश और देश के लोगों की ज़रा भी फिक्र हैं तो आप पैसा जमा नहीं कर सकते क्योंकि तक़रीबन देश की ८० फीसदी आबादी की दैनिक आमदनी १०० रुपए से भी कम है। यानी महुमत में यह देश ग़रीबों का देश हैं। और यह ग़रीबी भ्रष्टाचार के कारण है। जब तक भ्रष्टाचारी जेल नहीं भेजे जाते और उनकी भ्रष्टाचार की कमाई जब्त नहीं की जाती, यह मनमानी ऐसे ही चलती रहेगी। इसीलिए तो बेईमानी का निवाला खानो वालों की नींद हराम हो गई है। आप के उम्मीदवार ईमानदार है, तभी तो अरविंद ने कह दिया कि अण्णा संतोष हेगड़े से जांच करवा लें। अगर अरविंद दोषी पाए गए तो दिल्ली ऐसेंबली का चुनाव नहीं लड़ेंगे। किसी दूसरी पार्टी के नेता में इतनी हिम्मत है। ज़ाहिर सी बात है कि अगर आपका अपने ऊपर अंकुश हैं तो कोई व्यवस्था आपको भ्रष्ट नहीं कर सकती। चाहे वह राजनीति ही क्यों न हो। दिल्ली में आप के लोगों को जो समर्थन मिल रहा है, उससे साफ़ हैं कि लोग बेईमानी का पैसा खा-खाकर तुंद फैलाने वाले इन भ्रष्ट नेताओं से जनता छुटकारा पाना चाहती है और विकल्प तलाश रही है। ऐसे में साफ़-सुथरे लोगों को राजनीति में उतरना ही होगा। और उसके लिए आप सर्वोत्तम मंच है।

जो लोग इस देश की खुशहाली के अभिलाषी हैं। उन्हें किसी बहकावे में नहीं आना चाहिए। बहकाने की वह कोशिश चाहे अण्णा हजारे जैसे पलायनवादी कर रहे हों या विदूषक बन चुकी भारतीय मीडिया के लोग। पहली बार ईमानदारी का विकल्प वोटरों के सामने है। अगर आप अपना और अपनी आने वाली पीढ़ी का भला चाहते हैं। यानी आप एक ऐसा सिस्टम चाहते हैं जहां लोगों के सामने अस्त्तित्व संकट ना हो तो इस बार किसी बहकावे में मत आइए। यह तटस्थ रहने का समय नहीं है। या तो बेईमानों का साथ दीजिए या ऊमानदारों का।

समाप्त

मंगलवार, 14 मई 2013

संजय दत्त ने अपराध जान-बूझ किया था या अनजाने में!

हरिगोविंद विश्वकर्मा
चंद रोज़ बाद अभिनेता संजय दत्त सलाखों के पीछे चले जाएंगे। कुल 42 महीने के लिए। यह ख़बर फिर सुर्खियां बटोरेगी। इस बात पर चर्चा होगी कि क्या संजय ने अपराध जान-बूझ किया या उनसे अनजाने में हो गया। जब संजय ने मुंबई बमकांड के मास्टर माइंड और मुख्य आरोपी दाऊद इब्राहिम कासकर के भाई अनीस से अपनी और अपने परिवार की रक्षा करने के लिए एके-56 मंगवाई थी, तब उनकी उम्र 33 साल थी यानी उन्हें बालिग हुए 15 साल बीत चुका था। मज़ेदार पहलू यह है कि संजय बांद्रा के जिस पॉश पाली हिल इलाक़े में रहते हैं, वहां तो दंगा हुआ ही नहीं। मुंबई के दंगे (इन पंक्तियों के लेखक ने तब ‘जनसत्ता’ के लिए दंगों की रिपोर्टिंग की थी) पॉश इलाकों में नहीं, बल्कि झुग्गीबाहुल्य क्षेत्रों में हुए थे। सो संजय का अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा की दुहाई देना सरासर बेमानी है। यानी उस समय कम से कम संजय या उनके परिवार के लिए किसी तरह के ख़तरे का सवाल ही नहीं पैदा होता था। दंगा, दरअसल, मुस्लिम इलाकों से ही शुरू हुआ और उस मारकाट में सबसे जानमाल का नुकसान अल्पसंख्यक समुदाय को ही उठाना पड़ा। दरअसल, 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद ढहाये जाने के बाद पूरे देश की तरह मुंबई में भी दंगो भड़क उठा था। देश की आर्थिक राजधानी में 6 से 10 दिसंबर 1992 और 6 से 15 जनवरी 1993 के दौरान दो चरण में ख़ून की होली खेली गई जिसमें 257 लोग मारे गए और घायल हुए। हालांकि दंगों की जांच करने वाले श्रीकृष्णा आयोग के मुताबिक दंगों में कुल 850 लोग (575 मुसलमान और 275 हिंदू) दंगे की मारे गए। कहने का तात्पर्य संजय ने किसी तरह का ख़तरा न होने के बावजूद केवल शेखी बघारने के लिए एके-56 राइफ़ल जैसा ख़तरनाक़ हथियार मंगवाया था।

सच पूछो तो, 1993 में मुंबई बम विस्फोट से पहले तक माफिया डॉन दाऊद केवल वांछित ख़तरनाक अपराधी था, इसलिए बॉलीवुड के सितारे चाहे-अनचाहे उनके बुलाने पर अकसर दुबई पहुंच जाते थे। इसके लिए उन्हें अच्छा नज़राना मिल जाता था। सिल्वर स्क्रीन के लोगों के लिए दुबई तो मुंबई के बाद दूसरा ठिकाना था। नब्बे के दशक में कोई ऐसा अभिनेता या अभिनेत्री नहीं होगा, जिसने दाऊद के दरबार में ठुमके न लगाया हो। तब दुबई एक महफ़ूज़ ऐशगाह था। लिहाज़ा, संजय दत्त भी दाऊद ऐंड कंपनी के ग्लैमर से ख़ुद को नहीं बचा पाए। मुंबई पुलिस के रिकॉर्ड के मुताबिक एक बार वे अनीस के संपर्क में आए तो दोनों की अच्छी ट्यूनिंग हो गई। उनमें अकसर बातचीत होने लगी। संजय अनीस से पर्सनल इशूज़ भी शेयर करने लगा। संजय समेत बॉलीवुड के लोगों को दाऊद या उससे जुड़े अपराधियों से ताल्लुक़ात रखने के ख़तरे का अहसास 12 मार्च 1993 को मुंबई में तबाही के बाद हुआ। अगर संजय दत्त मुंबई धमाकों के बाद अनीस से जान-पहचान ख़त्म कर लेते तो इस बात में थोड़ा दम रहता कि उनसे अनजाने में ग़लती हुई है और वे भूल-सुधार करना चाहते हैं। लेकिन बमकांड का आरोपी होते हुए भी 2002 में संजय (तब उनकी उम्र 42 साल थी) ने छोटा शकील से फिर बातचीत की और उससे अभिनेता गोविंदा को सबक सीखाने का आग्रह किया। जिसे मुंबई पुलिस ने रिकॉर्ड कर लिया। यानी संजय दत्त ने अपनी गलतियों से कुछ भी नहीं सीखा। इसलिए उन्हें अपने किए की सज़ा भुगतनी ही चाहिए। उच्च पदों पर बैठे लोग माफी या सज़ा कम करने की अपील पर विचार करते समय इस तथ्य को ज़ेहन ज़रूर रखना चाहिए।

चूंकि सुप्रीम कोर्ट ने अभिनेता संजय दत्त को मोहलत देने से इनकार करते हुए उन्हें सरेंडर की सलाह दी है। हालांकि इस सच को नहीं भूलना चाहिए कि संजू बाबा पर शुरू से हर कोई मेहरबान रहा है। अब चूंकि उनका सज़ा की अवधि शुरू हो रही है सो आगे इस बात की पड़ताल की जा रही है कि संजय को “रूलिंग क्लास का आदमी” होने का कहां-कहां फ़ायदा मिला और किस-किस ने उन पर मेहरबानी की बरसात की। 12 मार्च 1993 से 15 मई 2013 के दौरान संजय दत्त से जुड़े इस मामले पर ग़ौर करने के बाद ये साफ़ हो जाता है कि अभिनेता पर मेहरबानियों की बरसात शुरू से हो रही है। यह सिलसिला तब शुरू हुआ जब पहली बार उनका नाम बमकांड में सामने आया और यह अभी पिछले महीने तक जारी रहा जब देश की सबसे बड़ी अदालत ने उन्हें चार हफ़्ते की मोहलत दे दी थी।

पहली मेहरबानी मुंबई पुलिस की ओर से तब हुई जब बमकांड में सज़ायाफ़्ता इब्राहिम मुस्तफ़ा चौहान उर्फ बाबा ने 3 अप्रैल 1993 को संजय का नाम लिया। बाबा ने ख़ुलासा किया कि इस साज़िश में एक बहुत बड़ी मछली शामिल है जिसका नाम सुनकर लोगों के होश उड़ जाएंगे। जब बाबा ने हैवीवेट कांग्रेस सांसद सुनील दत्त के बेटे संजय दत्त का नाम लिया तो विशेष जांच टीम के मुखिया राकेश मारिया भी हतप्रद रह गए। किसी ने सोचा भी न था कि पदयात्रा करने वाले “शांति के पुजारी” का बेटा बम धमाके की साज़िश का हिस्सेदार हो सकता है। बहरहाल, मुन्नाभाई पर मेहरबानी हुई और तत्कालीन पुलिस आयुक्त अमरजीत सिंह सामरा ने मारिया को संजय का घर रेड करने की इजाज़त नहीं दी। हालांकि बाद में खुलासा हुआ कि इसके पीछे राजनीतिक वजह थी क्योंकि संजय के पिता कांग्रेस के लॉमेकर थे। सूबे में शरद पवार के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार थी। और काग्रेस के लोकप्रिय सांसद सुनील दत्त की पार्टी के आला नेताओं से अच्छी ट्यूनिंग थी।

बहरहाल, 19 अप्रैल 1993 की रात मॉरीशस से लौटते ही संजय गिरफ़्तार कर लिए गए। लेकिन गिरफ़्तारी के बाद उनसे पुलिस बेहद शराफ़त से पेश आई। यह भी पुलिस की ओर से की गई मेहरबानी थी क्योंकि रात में संजय को अफ़सर के केबिन में रखे सोफ़े पर सोने की इजाज़त दी गई। उनको आरोपी की तरह नहीं, राजनेता के बेटे की तरह पूछताछ की यानी उनसे थर्ड डिग्री इंटरोगेशन नहीं हुआ। हालांकि संजय ने “ईमानदारी” से एमएन सिंह (तत्कालीन क्राइम ब्रांच प्रमुख) और मारिया को बता दिया कि दाऊद का भाई अनीस उनका दोस्त है और दोनों की अकसर बातचीत होती रहती है। अनीस ने तीन एके-56 राइफ़ल्स, 9 मैगज़िन्स, 450 राउंड्स (गोली) और 20 हैंडग्रेनेड्स (हथगोले) का कन्साइनमेंट उनके पास भेजी। संजय के मुताबिक प्रतिबंधित हथियारों की ख़ेप अनीस का आदमी अबू सालेम 16 जनवरी 1993 की सुबह उनके घर लेकर आया। सालेम के साथ समीर हिंगोरा और बाबा चौहान भी थे। बहरहाल, तीन दिन बाद यानी 18 जनवरी की शाम सालेम हनीफ़ कड़ावाला और मंज़ूर अहमद के साथ फिर संजय के घर आया और 2 एके-56 राइफ़ल, कुछ हैंडग्रेनेड और गोलियां सालेम को वापस लेकर गया। यानी संजय ने उसी आदमी (अनीस) से ग़ैरक़ानूनी तौर पर एके-56 राइफ़ल मंगवाई जो बमकांड का मुख्य आरोपी था। दरअसल, दाऊद, आरोप पत्र के मुताबिक. ने 300 सौ चांदी की सिल्लियां, 120 एके 56 राइफ़ल्स और संकड़ों की संख्या में ग्रेनेड, मैगज़िन, गोलियां और कई क्विंटल विस्फोटक पावडर आरडीएक्स 9 जनवरी और 9 फ़रवरी 1993 के बीच कई खेप में रायगड़ के दिघी जेट्टी और शेखाड़ी के रास्ते मुंबई में भेजी। ये काम एक अन्य मास्टर मांइंड टाइगर मेमन और मोहम्मद डोसा लेकर आए। हथियारों और आरडीएक्स से भरा ट्रक रायगड़ के जंगल के रास्ते नासिक होता हुआ गुजरात रवाना हुआ। कस्टम की टीम ने ट्रक को ट्रैप किया भी लेकिन आठ लाख रुपए रिश्वत मिलने पर उसे जाने की इजाज़त दे दी। इस टीम के लोगों को टाडा के तहत सज़ा सुनाई गई है। बहरहाल, ट्रक का सामान गुजरात के भरुच ज़िले में बिज़नेसमैन हाज़ी रफीक़ कपाडिया के गोडाउन में छिपाया गया। यहां अंकलेश्वर में इस टीम में अबू सालेम शामिल हो गया। हथियारों को पूर्व निर्धारित ठिकानों और लोगों तक पहुचाने की ज़िम्मेदारी सालेम को दी गई। 9 एके-56 राइफ़ल, सौ से ज़्यादा मैगज़िन और गोलियों के कई बॉक्स लेकर सड़क के रास्ते मुंबई आया। सालेम ने अनीस के कहने पर उसी कन्साइनमेंट में से एक राइफ़ल संजय को दी। यानी संजय ने 12 मार्च के धमाके के बाद जिस राइफल को नष्ट करने के लिए यूसुफ़ नलवाला को मॉरीशस से फोन किया वह राइफ़ल दिग्घी जेटी पर ही उतारी गई थी।

इसके बावजूद, आतंकवाद एवं विध्वंस निरोधक क़ानून (टाडा) जज ने संजय दत्त का वह क़बूलनामा स्वीकार कर लिया जिसमें मुन्नाभाई ने कहा था कि वह असुरक्षित महसूस कर रहा था इसलिए उसने ये घातक और ग़ैरक़ानूनी हथियार लिए। संजय दत्त और उनसे सहानुभूति रखने वाले शुरू से यह तर्क दे रहे हैं कि मुंबई दंगों के समय उनको धमकियां मिल रही थी इसलिए संजय ने अनीस से एके-56 मांगी। मतलब साफ़ है, जो लोग इन मुद्दे पर बेलौस टिप्पणी कर रहे हैं, उन्हें ज़मीनी हक़ीक़त की जानकारी ही नहीं। मतलब संजय के क़बूलनामे को स्वीकार करना और मान लेना कि उनके परिवार को जानमाल का ख़तरा था, अभिनेता के लिए टाडा जज की ओर से की गई अहम मेहरबानी थी।

दरअसल, गिरफ़्तार होने के बाद संजय दत्त को सुप्रीम कोर्ट तक जाने के बावजूद साल भर तक बेल नहीं मिली। ज़मानत रद होने के बाद बेटे का जेल प्रवास साल भर से ज़्यादा खिंचने से सुनील दत्त विचलित हो गए। वह हर पार्टी के नेता का चक्कर लगाने लगे। वह इसी दौरान धुर कांग्रेस विरोधी शिवसेना नेता बाल ठाकरे के बंगले पर भी गए। उसी दौरान सेक्यूलर जमात लोगों की ओर से यह शोर मचाया जाने लगा कि टाडा क़ानून का दुरुपयोग हो रहा है। यह भी कहा गया है कि टाडा क़ानून के चलते बड़ी तादाद में ऐसे लोग जेलों में सड़ रहे हैं जिनका आतंकवाद से कुछ लेना-देना भी नहीं। ऐसे लोगों के मामलों पर विचार करने के लिए केंद्र सरकार ने नौकरशाहों और पुलिस अफ़सरों की एक क़्वासी-ज्यूडिशियल (अर्धन्यायिक) कमेटी का गठन किया गया। यहां संजय दत्त पर एक और बहुत बड़ी मेहरबानी हुई। क़्वासी-ज्यूडिशियल कमेटी ने सबसे पहले संजय को ही सबसे ज़्यादा “टाडा पीड़ित” माना और उनके ज़मानत की सिफ़ारिश कर दी। लिहाज़ा संजय 18 महीने में ही जेल से बाहर आ गए। जबकि इसी मामले में बाबा चौहान, मंज़ूर अहमद, यूसुफ़ नलवाला, समीर हिंगोरा और हनीफ़ कड़ावाला जैसे लोगों को ज़मानत के लिए 5 साल या उससे अधिक इंतज़ार करना पड़ा। इतना ही नहीं जिस 64 वर्षीय ज़ैबुन्निसा क़ादरी के घर में 2 एके-56 और हथियार 2 दिन रखे गए। उसे भी लंबे समय तक जेल में रहना पड़ा और अदालत ने उसे पांच साल की सज़ा सुनाई है। हालांकि कन्साइनमेंट का बॉक्स खोलना तो दूर ज़ैबुन्निसा ने तो उसे देखा तक नहीं जबकि संजय ने बॉक्स को खोला था और हथियार देखने के बाद अनीस को फोन पर बताया भी कि “सामान” मिल गया। हैरानी वाली बात यह है कि 12 मार्च 1993 को सीरियल ब्लास्ट की ख़बर सुनकर मॉरीसश में शूटिंग कर रहे संजय डर गए और अपने मित्र नलवाला को फोन करके कहा कि उनके घर (बेडरूम) में रखी एक 56 राइफ़ल और बाक़ी हथियार फ़ौरन नष्ट कर दे।

बहरहाल, सीरियल ब्लास्ट की जांच का ज़िम्मा संभालने के बाद सीबीआई ने जाने या अनजाने कई ऐसे फ़ैसले लिए जिसका सीधा लाभ केवल और केवल संजय दत्त को मिला। मसलन संजय की अनीस से बातचीत के कॉल्स डिटेल्स को आरोप पत्र से ही अलग कर दिया। मुंबई पुलिस ने इस जुटाने में कड़ी मेहनत की थी लेकिन सीबीआई ने उसे डस्टबिन में डाल दिया। इस दस्तावेज़ से आसानी से सिद्ध हो रहा था कि संजय का अनीस से बहुत घनिष्ठ संबंध है और जो राइफ़ल संजय को दी गई वह दाऊद द्वारा रायगड़ समुद्र तट के रास्ते भेजे गए कन्साइन्मेंट के साथ देश में लाई गई थी। यानी संजय उस आतंकवादी साज़िश का सीधे सीधे साझीदार हो जाते क्योंकि दाऊद का भाई संजय के “टच” में थे। सीबीआई ने दूसरी और सबसे बड़ी मेहरबानी संजय पर सालेम के ट्रायल को बमकांड के मुक़दमे से अलग करके की। जी हां, सालेम को भारत लाए जाने के बाद उसके केस को बमकांड से अलग कर दिया गया। सीबीआई की ओर से तर्क दिया गया कि इससे मुक़दमे की सुनवाई में अनावश्यक देरी से बचने के लिए किया गया। दरअसल, संजय और दाऊद-अनीस के बीच सालेम अहम कड़ी था जो पुष्ट कर देता कि कम से कम संजय एके-56 लाने की साज़िश में शामिल था। यह सीबीआई या कहे कांग्रेस (सीबीआई की असली बॉस) की ओर से संजय पर बड़ी मेहरबानी थी जिसने उन्हें कम से कम 10 साल की सज़ा से बाल-बाल बचा लिया। देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी ने 2002 में संजय की छोटा शकील बातचीत का संज्ञान नहीं लिया। हालांकि इसके बाद भी उसे अभिनेता की बेल रद करने के लिए कोर्ट को अप्रोच करना चाहिए था। इसे सीबीआई की संजय के लिए एक और एक और मेहरबानी कहा जा सकता है।

केस के ट्रायल के दौरान भी संजय को मेहरबानी का प्रतिसाद मिलता रहा और सालेम द्वारा लाई गई एके-56 राइफ़ल से जुड़े सभी आरोपियों को टाडा के तहत लंबी सज़ा मिली लेकिन संजय केवल आर्म्स ऐक्ट के तहत दोषी माने गए और 6 साल की सज़ा सुनाई गई। सीबीआई इसके बाद भी संजय पर मेहरबानी की बारिश करती रही और टाडा कोर्ट के फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती ही नहीं दी गई। इतना ही नहीं सुप्रीम कोर्ट में भी किसी माननीय जस्टिस ने सीबीआई से पूछा भी नहीं कि एक ही मामले में दो तरह के फ़ैसले कैसे आए और अगर आ गए हैं तो कम सज़ा पाने वाले के ख़िलाफ़ अपील क्यों नहीं की गई। उलटे देश की सबसे बड़ी अदालत ने संजय दत्त की सज़ा एक साल और कम कर दी। अगर सुपुरीम कोर्ट ने संजय के वकीलों के लिए जवाब देना आसान नहीं होता।

जस्टिस मार्कंडेय काटजू की अगुवाई में लोग संजय दत्त को “मानवीय” आधार पर माफ़ कर देने की पैरवी कर रहे हैं, उनकी अपील महाराष्ट्र के राज्यपाल के पास विचाराधीन है। यानी बॉलीवुड स्टार पर जेल की सलाखों के पीछे मेहरबानी की बरसात अभी होती रहेगी और इन्हीं मेहरबानियों के चलते संजय दत्त सज़ा पूरी होने से पहले ही अगर जेल से बाहर आ जाए तो हैरानी नहीं होनी चाहिए। संजय दत्त पारिवारिक और सामाजिक नागरिक बन चुके हैं। बड़ी बेटी रिचा के अलावा मान्यता से दो छोटे बच्चों के पिता हैं लेकिन जो ग़ुनाह उनसे हुआ है उसकी कीमत तो उन्हें चुकानी ही पडेगी।
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