बुधवार, 18 मई 2016

कानून को ठेंगा : कितनी शादियां करेगा वह

हरिगोविंद विश्वकर्मा
क़रीब छह साल पहले उसने दूसरी शादी की थी। वह भी बिना तलाक़ लिए। इसके बावजूद तब किसी को कोई आपत्ति न हुई थी। अब वह तीसरी शादी करने जा रहा है। और मज़ेदार बात यह है कि इस बार भी किसी को कोई आपत्ति नहीं है। ज़ाहिर है आने वाले दिनों में वह चौथी, पांचवी या उससे अधिक शादियां कर सकता है क्योंकि किसी को कोई आपत्ति ही नहीं। यानी अगर कोई आपत्ति न करे तो करते रहो शादी पर शादी... है न विचित्र वाकया।

यह घटना है मुंबई से सटे डोंबिवली का। जहां इन दिनों सुनील सालन नाम का शख़्स तीसरी शादी की तैयारी कर रहा है। मज़ेदार बात ये हैं कि लोकल पुलिस भी ख़ामोश हैं क्योंकि इस शादी से किसी को कोई ऐतराज़ नहीं है। मानपाड़ा थाने के इंचार्ज ने कहा कि सालन की दोनों बीवियों, बच्चों, दोनों सास-ससुर और सालों और बाक़ी रिश्तेदारों को कोई आपत्ति नहीं। फिर पुलिस क्या करे। हां, दूसरी पत्नी के एक रिश्तेदार को आपत्ति है लेकिन उनकी आपत्ति मायने नहीं रखती क्योंकि वह बहुत दूर के रिश्तेदार हैं।

दरअसल, तीसरी बार फेरे लेने के लिए क़रीब-क़रीब तैयार सालन की दो बीवियों से कुल पांच संतानें हैं। फिलहाल तो उसे अपनी नई-नवेली दुल्हन का इंतज़ार है तो दोनों बीवियों को छोटी बहन के रूप में आने वाली नई-नवेली सौतन का। जबकि पांचों बच्चे नई-नवेली मम्मी को देखने के लिए लालायित हैं। ज़ाहिर है ऊपर से घर में हर्ष-उल्लास है। लेकिन अंदर ही अंदर हर कोई मज़बूर है। विरोध करना मुसीबत को न्यौता देने के समान है।

अगर, पूरे मामले पर ग़ौर करे तो सुनील मानपाड़ा पुलिस स्टेशन की हद में रहता पड़ता है। उत्तराधिकार में बहुत बड़ी संपत्ति पिता से मिली है। यानी अच्छा खाता कमाता है। उम्र चालीस के ऊपर है। उसने 18-19 साल पहले प्रेम-विवाह किया था। जब ख़ूबसूरत प्रेमिका बीवी बनी तो लगा कि घर-परिवार में ख़ुशहाली का बसेरा हो गया। फिर बच्चे भी हुए। एक-एक करके तीन। घर में किलकारियां गूंजने लगीं। औसत सोच-समझ वाली एक भारतीय महिला को और क्या चाहिए। लिहाज़ा सालन की बीवी को लगा वह धरती की सबसे ख़ुशनसीब औरत है।
शायद उसकी ख़ुशी को किसी की नज़र लग गई। जी हां. तीसरे बच्चे के जन्म के बाद सालन की प्रेमिका से पत्नी बनी महिला में दिलचस्पी कम होने लगी। जिस स्त्री के साथ वह कभी जीने मरने की कसमें खाता था, जो स्त्री कभी उसे चांद की टुकड़ा नजर आती थी, वही उसे अचानक कुरूप लगने लगी। सालन का मन बीवी की ओर से पूरी तरह विरक्त हो गया। इसी दौरान उसकी मुलाकात दूसरी युवती से हुई जो अविवाहित थी। जान-पहचान दोस्ती में बदल गई। चंद दिन बाद ही सालन ने महसूस किया कि उसका दिल युवती पर आ गया है। यानी दोस्ती प्यार में बदल गई।

सालन ने प्रपोज़ किया और प्रेमिका ने हां कर दी। सालन के मन में लड्डू फूटने लगे। बस क्या था, सालन दूसरी शादी की योजना बनाने लगा। इसकी भनक पत्नी को लग गई। उसने विरोध किया और रोना-धोना शुरू किया। पर सालन ने उससे साफ़-साफ़ कह दिया कि विरोध करेगी तो बच्चों समेत उसे घर से निकाल देगा। पत्नी को अपनी असली हैसियत का पता चला कि वह पति की रहमोकरम पर है। यानी अगर स्त्री कमा नहीं रही है और विशुद्ध हाऊसवाइफ़ है तो 21वीं सदी में वह अबला ही है।

उसे अपना ही नहीं बच्चों का भी भविष्य अंधकारमय दिखा। लिहाज़ा उसने हालात से समझौता करना ही मुनासिब समझा। अपना विरोध वापस ले लिया। बस क्या था, सालन ने दूसरी शादी कर ली। यानी एक स्त्री ने ही उससे उसका पति छीन लिया। बहरहाल, पहली पत्नी और तीनों बच्चों ने घर के छठे सदस्य का स्वागत किया। दूसरी पत्नी से भी दो बच्चे हुए। यानी कुल दो बीवियां और पांच बच्चे। आठ सदस्यों का परिवार। दूसरी बीवी का दूसरा बच्चा तो अभी दो साल का ही है। पिछले एक साल से सालन का मन फिर भटकने लगा। चंद महीने पहले उसकी जान-पहचान तीसरी युवती से हुई। कुछ दिन में रिश्ता इतना गहराया शारीरिक संबंध बन गया। वे एक दूसरे के बिना जीने की कल्पना तक से कतराने लगे। सालन ने घर में जब ये फ़ैसला सुनाया तो सब सन्न। किसी को कुछ सूझा नहीं।

दरअसल, सालन घर का कमाने वाला इकलौता सदस्य है। उसे रोका गया तो भी वह नहीं रुकेगा। हां, जीवन-यापन के लिए जो पैसे वह दोनों पत्नियों और पांचों बच्चों को दे रहा है, उसे भी बंद कर देगा। इसीलिए घर के लोगों ने उसके फ़ैसले को स्वीकार करना ही श्रेयस्कर समझा क्योंकि किसी के पास और कोई चारा नहीं।

सुनील सालन तो एक मिसाल भर है। पुरुष-प्रधान भारतीय समाज में बड़ी संख्या में पुरुषों के पास दो या दो से ज़्यादा पत्नियां हैं। सालन जैसे ग़ुमनाम पुरुष ही नहीं कई नामचीन नेता, पत्रकार, साहित्यकार और बुद्धिजीवियों की दो-दो पत्नियां है, इनमें कुछ लोगों के पास तीन-तीन बीवियां हैं। इन महिलाओं को पत्नी या बीवी नहीं कहा जा सकता। क्योंकि पत्नी तो केवल पहली ही होती है। बाक़ी स्त्रियों को तो पत्नी का दर्जा ही नहीं मिलता। इस्लाम को छोड़ दें तो हर मज़हब में पति या पत्नी से वैधानिक रूप से बिना तलाक़ लिए किसी भी पुरुष या स्त्री की शादी संभव नहीं।

कई पुरुष मिलेंगे जिन्होंने पत्नी से बिना वैधानिक तलाक़ के दूसरी शादी कर ली है। उत्तर प्रदेश बिहार में तो इसकी बहुतायत है। शादी के बाद कई बार पुरुषों का कंवारी लड़की से शारीरिक संबंध हो जाता है, और वे शादी कर लेते हैं। लेकिन बिना वैधानिक तलाक़ के हुई शादी ग़ैरक़ानूनी मानी जाती है। देश की कोई अदालत ऐसी महिलाओं को पत्नी का दर्जा नहीं देती। दूसरी शादी के लिए बीवी से कंसेंट के नाम पर स्टैंप पेपर पर दस्तख़त करवा लेते हैं। इस तरीक़े को फ़िल्मी तलाक़ कह सकते हैं। जी हां, फ़िल्मों में तलाक़ के काग़ज़ात ख़ुद या किसी के हाथ या पोस्ट से भेज दिए जाते हैं और साइन कर देने से तलाक़ मान लिया जाता है।

दुनिया की कोई भी अदालत इस तलाकनामे को मंज़ूर नहीं करती और रद्दी की टोकरी में फेंक देती है। दरअसल, हर अदालत पति-पत्नी के वैधानिक अलगाव को ही तलाक़ को मानती। ये तलाक़नामा फ़ैमिली कोर्ट की ओर से जारी होता है। पति और पत्नी, विधिवत अलग होने के लिए फ़ैमिली कोर्ट में याचिका दाख़िल करते हैं। दोनों को नोटिस जारी होता है और अदालत में बयान दर्ज होता हैं। एक दूसरे से अलग होने की ठोस वजह बताई जाती। इसके बाद भी फ़ैमिली कोर्ट रिश्ता तोड़ने से पूर्व सुलह का एक और मौक़ा देती है। हां, दंपति के बीच सुलह की हर संभावना ख़त्म होने पर ही तलाक़ की इजाज़त दी जाती है। तलाक़ के बाक़ी सभी तरीक़े फ़र्ज़ी तलाक़ माने जाते हैं।

वैसे कई मुस्लिम देशों में भी एक से ज़्यादा निकाह की रवायत ख़त्म कर दी गई है। अपने देश में भी एक से अधिक निकाह यानी पहली बीवी के होते दूसरी शादी की वैधता पर बहस चल ही रही है। ये बहस तब शुरू हुई जब राजस्थान पुलिस ने लियाक़त अली को पहली पत्नी के रहते निकाह करने पर नौकरी से निकाल दिया जिसे राजस्थान हाईकोर्ट ने भी सही ठहराया। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी उस पर मुहर लगा दी। देश की सबसे बड़ी अदालत ने कहा कि कोई कर्मचारी पत्नी के होते दूसरी शादी करेगे तो नौकरी से हाथ धो बैठेगा। 1986 के बहुचर्चित केस का फ़ैसला 25 जनवरी, 2010 को आया। यानी अब धर्म का बहाना लेकर भी कोई दूसरी शादी करेगा तो मामला अदालत तय करेगी चाहे वो मुस्लिम ही क्यों न हो। टर्की और ट्यूनीशिया में पत्नी के होते निकाह ग़ैरक़ानूनी है। मिश्र, सीरिया, जॉर्डन, इराक, यमन, मोरक्को और यहां तक कि पड़ोसी पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी इस पर अदालतें फैसला सुनाती हैं। लेकिन भारत में तमाम अदालतों की आलोचना के बाद ये आज भी जारी है।

इस्लाम के इसी प्रावधान का फायदा उठाकर कई स्त्रियां दूसरी स्त्रियों के पति छीन चुकी हैं। हेमा मालिनी और अनुराधा बाली इसकी मिसाल हैं। प्रकाश कौर से धर्मेंद्र को छीनने के लिए हेमा मालिनी ख़ुद आयशा बी बन गईं जबकि धर्मेंद्र को दिलावर खान बना दिया। इसी तरह अनुराधा ने चंदर मोहन को सीमा विश्नोई से छीनने के लिए ख़ुद फ़िज़ा बन गई जबकि चंदर को चांद मोहम्मद बना दिया। यानी बिगमी क़ानून के शिकंजे से बचने के लिए इन लोगों ने मज़हब का सहारा लिया।

आज पुरुष-महिला के बीच समानता की बढ़-चढ़कर हो रही है। मगर सालन जैसे लोगों का ऐयाशी के लिए बार-बार शादी करके इस दावे को झुठलाते हैं। ये समय की मांग है कि स्त्री को महज मनोरंजन समझने वालों पर अंकुश लगाने के लिए कठोर क़ानून बनाने की ज़रूरत है। इतना ही नहीं उत्तराधिकार क़ानून पर सख़्ती से अमल किया जाना चाहिए। इसमें बेटी को पिता की संपत्ति में हिस्सेदार तो बना दिया गया है लेकिन इस क़ानून पर अमल परंपरा के ख़िलाफ़ माना जाता हैं। और परंपरा यह है कि बेटी पराया धन होती है, उसका पिता की संपत्ति में कोई हिस्सा नहीं। तभी तो आज भी लड़कियां शादी के बाद मायके चली जाती हैं और पिता की संपत्ति पर उनका दावा ख़त्म हो जाता है जबकि बेटा या बेटे पिता की दौलत पर ऐश करते हैं।

दरअसल, सुनील सालन की दोनों बीवियां उसकी तीसरी शादी का विरोध इसलिए भी नहीं कर पा रही हैं क्योंकि वे जीवन-यापन के लिए पति पर बुरी तरह निर्भर हैं। दोनों महिलाओं के पास किसी तरह की सामाजिक सुरक्षा नहीं है। इसीलिए न चाहते हुए भी पति की तीसरी शादी को क़बूल कर रही हैं। अन्यथा जैसे कोई पुरुष अपनी बीवी के जीवन में किसी दूसरे पुरुष की कल्पना तक नहीं कर पाता। उसी तरह महिला भी अपने पति के जीवन में दूसरी स्त्री सहन नहीं कर सकती। लेकिन सामाजिक असुरक्षा के चलते वे भारी मन से पति की इच्छा को स्वीकार करती हैं।

अगर बिगमी क़ानून के ट्रायल पर गौर करें तो उसकी रफ़्तार बहुत धीमी होती है। मुकदमे के निपटारे में सालों-साल लग जाते हैं। दिल्ली के 41 वर्षीय जगदीश प्रसाद ने पहली पत्नी से तलाक विए बिना 1970 में दूसरी शादी कर ली। पत्नी ने अदालत का दरवाज़ा खटखटाया। तीस हज़ारी कोर्ट में मुक़दमे के निपटारे में 37 साल ख़र्च हो गए। अगस्त 2008 में फ़ैसला आने के समय जगदीश 78 साल का हो चुका था। हालांकि अदालत ने उसे बिगमी को दोषी क़रार दिया गया और सज़ा और ज़ुर्माना हुआ लेकिन इतनी लंबी अदालती लड़ाई तोड़कर रख देती है। इसीलिए स्त्री क़ानून के झमेले में न पड़ कर पति की इच्छा को स्वीकार कर लेती हैं।

समाप्त


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