सोमवार, 20 जुलाई 2015

प्रतिबंध के बावजूद बेरोक-टोक चलते हैं डांस बार

हरिगोविंद विश्‍वकर्मा
पिछले साल क़ानून बना देने से महाराष्ट्र के डांस बार भले ही फ़ाइलों में भले ही बंद हो गए हों, लेकिन वास्तविकता यह थी कि बारों में डांस कभी रुका ही नहीं था। न सन् 2005 में बार डांस पर रोक प्रतिबंध लगाने से और न ही 2014 में क़ानून बना देने से। दरअसल, सरकार के आदेश या क़ानून के पालन की जवाबदेही पुलिस की है, परंतु जब पुलिस में भ्रष्ट अफ़सरों की ही चलती हो तो कैसी जवाबदेही?
कहना ग़लत नहीं होगा कि क़ानून बन जाने से बीयर-बारों में डांस तो नहीं रुका, हां, पुलिस का हफ़्ता ज़रूर बढ़ गया। मुंबई ही नहीं राज्य के बाक़ी इलाकों में बार मालिक पुलिस को हफ़्ता देकर धड़ल्ले से बार में लड़कियां नचाते हैं। पिछले गुरुवार की रेड में मीरारोड के ह्वाइट हाऊस में मिली 14 गर्ल्स इसकी गवाह हैं कि वहां उनका डांस हो रहा था। यानी क़ानून की चादर चर्र-चर्र पुलिस के लोग ही फाड़ रहे थे। कोई नहीं पूछ रहा है कि पाबंदी होने के बाद भी बार में डांस क्यों हो रहा था? अभी तक किसी पुलिस वाले के ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं हुई है। जांच चल रही है यानी लीपापोती हो रही है।
80 के दशक में बीयर बारों के डांस दरअसल “शराब के साथ शबाब भी” के फॉर्मूले के तहत शुरू हुआ था। हालांकि लड़कियों का डांस और उन पर पैसे लुटाने का नज़ारा पहले मुंबई के बारों तक सीमित था। बाद में ठाणे और नई मुंबई में भी बारों में डांस धड़ल्ले से होने लगे और पूरे राज्य में फैल गया।
डांस बार सुबह चार-पांच बजे तक चलते हैं। इससे इनका साइड इफेक्ट अपराधों में बढ़ोतरी के रूप में सामने आया। कई बीयर बार रिहायशी इलाक़ों में भी होते हैं, जिससे आम आदमी पर भी इनका असर देखा जाने लगा। महिलाओं के साथ रेप और छेड़छाड की घटनाएं बढ़ने लगी। इससे बार मालिक, बार गर्ल्स, उनके संगठन और शराबियों को छोड़कर बाक़ी लोग डांस बार का विरोध करने लगे। चूंकि महिलाओं पर अपराध में बढ़ोतरी के लिए डांस बार ज़िम्मेदार थे, इसलिए इन्हें रोकने के लिए कांग्रेस-एनसीपी सरकार पर दबाव बढ़ने लगा। अंततः सरकार झुकी और डांस बार बंद करने का फैसला किया गया।
सरकार ने बॉम्बे पुलिस एक्ट में संशोधन करके 2005 में डांस बारों पर रोक लगा दी। हालांकि थ्री स्टार और फाइव स्टार होटलों को प्रतिबंध से बाहर रखा गया। इसे आधार बनाकर डांस बार वाले बॉम्बे हाईकोर्ट गए। कोर्ट ने फ़ैसला रद्द कर दिया, जिससे सरकार को सुप्रीम कोर्ट में अपील करनी पड़ी। 16 जुलाई 2013 को सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के फ़ैसले को बरकारार रखते हुए थ्री स्टार होटलों से नीचे के डांस पर रोक हटा दी थी।
सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बावजूद सरकार डांस बार पर रोक लगाने के लिए प्रतिबद्ध थी। लिहाज़ा, डांस बार बंद कराने के लिए विधिवत क़ानून का सहारा लेना पड़ा। राज्य सरकार ने पहले जस्टिस सीएस धर्माधिकारी की अगुवाई में समिति का गठन किया था। समिति का दायरा महिलाओं पर अपराधों रोकने का उपाय सुझाना था, लेकिन डांस बार इसमें अहम मुद्दा था। इस बीच कैबिनेट की मंजूरी के बाद राज्य की एसेंबली ने 13 जून 2014 को डांस बार क़ानून पास कर दिया। उसी साल सितंबर में धर्माधिकारी समिति ने डांस बारों पर पूर्ण प्रतिबंध की सिफारिश कर दी। बस फिर क्या था, डांस बारों के लाइसेंस रद्द कर दिए गए। इस बार दायरे में थ्री स्टार और फाइव स्टार होटलों को भी लाया गया। महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम में संशोधन करके क़ानून का उल्लंघन करने वाले होटल या बार की परमिट निरस्त करने के अलावा तीन महीने से पांच साल तक की जेल और एक से पांच लाख रुपए तक ज़ुर्माने का प्रावधान किया गया।
वैसे अधिकृत तौर पर राज्य में महज़ 345 बीयर बार हैं, लेकिन बारों पर नज़र रखने वाले जानकार मानते हैं कि राज्य में दो हज़ार से ज़्यादा गैरक़ानूनी बार हैं, जो लोकल पुलिस को हफ़्ता देकर चलते हैं। बारों में डांस की इजाज़त तो नहीं है लिहाज़ा, ऑर्केस्ट्रा के नाम पर डांस होता है।  जिसमें लोकल पुलिस की मौन स्वीकृति होती है। इसके बदले बार वाले पुलिस वालों को “उचित ख़याल” रखते हैं। इसमें इनमें 65 हज़ार बार गर्ल्स समेत क़रीब सवा लाख लोगों को रोज़गार भी मिला हुआ है। मुंबई से सटे मीरा रोड उपनगर में पत्रकार बताए जा रहे राघवेंद्र दुबे नाम के युवक की हत्या की गई, उस मीरारोड-भाइंदर में 60 से ज़्यादा बीयर बार हैं, जहां धड़ल्ले से क़ानून की धज्जियां उड़ाकर रात भर डांस होता है। इसी डांस बार के चक्कर में राघवेंद्र की जान गई।
हत्या बेशक अमानवीय, दुखद और निंदनीय वारदात होती है। हत्या किसी अच्छे नागरिक की हो या फिर बुरे आदमी की, उसकी भर्त्सना होनी ही चाहिए। हत्या की वारदात में क़ुदरत द्वारा दी हुई बेशकीमती जान चली जाती है। हत्या को इंसान के जीने के अधिकार का हनन भी माना जाता है,  इसीलिए दुनिया भर का मानवाधिकार इसी फिलॉसफी के तहत हत्याओं का विरोध करता है। हत्या कमोबेश हर संवेदनशील को विचलित करती है।  कोई सभ्य आदमी हत्या के बारे में सोच कर ही दहल उठता है। यही मानसिकता मानव को हत्या की वारदात को लेकर संवेदनशील बनाती है।
हत्या को लेकर हर अच्छे नागरिक को संवेदनशील होना ही चाहिए। मीडिया को ख़ासकर कवरेज करते समय ज़्यादा संवेदनशील होना चाहिए। हत्या पर कोई तर्क-वितर्क नहीं होनी चाहि। एक स्वर से हत्या की भर्त्सना करनी चाहिए। इसी तरह में राघवेंद्र दुबे की हत्या की भी निंदा की जानी चाहिए। घटना पर विरोध दर्ज कराया जाना चाहिए। जिस हालात में हत्या हुई, उससे संदिग्ध पुलिसवालों के ख़िलाफ़ भी कार्रवाई होनी चाहिए। इतना ही नहीं इसमें जिन लोगों की संलिप्तता हो, उन पर आईपीसी के उचित सेक्शन्स के तहत मामला दर्ज करके त्वरित ऐक्शन करनी चाहिए। अपराधी चाहे जितने प्रभावशाली क्यों न हों, उन्हें बख़्शा नहीं जाना चाहिए। राघवेंद्र दुबे के परिवार को आर्थिक मदद देने की भी पहल होनी चाहिए। सुखद संकेत यह है कि ये सब बाते हो रही हैं।
सबसे अहम बात यह है कि मुंबई और ठाणे के पत्रकार, ख़ासकर हिंदी ख़बरनवीस, इस घटना को “माडिया पर हमला” कहने के मुद्दे पर दो खेमे में बंट गए हैं। एक तबक़ा कह रहा है कि हत्या का पत्रकारिता से कोई लेना-देना नहीं है। उसका तर्क है कि कथित तौर पर बीयर-बार वालों द्वारा मारे गए राघवेंद्र दुबे पत्रकार नहीं थे। दूसरी ओर दूसरा वर्ग इस तर्क से सहमत नहीं हैं। उसका अपना तर्क है जिसके मुताबिक़ राघवेंद्र 'ख़ुशबू उजाला' नाम का हिंदी साप्ताहिक अख़बार निकालते थे, इसलिए वह पत्रकार थे। इसी बिना पर यह धड़ा हत्या को “मीडिया पर हमला” करार दे रहा है।
सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि जिस साप्ताहिक अख़बार की बात हो रही है, वह मीरारोड के पेपर स्टॉल्स पर भी नहीं दिखता था। यहां तक कि शहर में अख़बार बांटने वाले भी उस अख़बार के बारे में नहीं जानते हैं। लिहाज़ा, आम आदमी का अख़ाबर से अनभिज्ञ होना सहज है। कई लोगों को राघवेंद्र दुबे की हत्या के बाद पता चला वह पत्रकार भी थे।
तो क्या यह सचमुच मीडिया पर हमला है? मीडिया पर हमला एक व्यापक टर्म है, जो लोग इसे मीडिया पर हमला कह रहे हैं, उन्हें कुछ सवालों का जवाब देना पड़ेगा। सबसे बड़ा सवाल है कि गुरुवार की रात ह्वाइट हाऊस बीयर-बार रेड के दौरान तीन ग़ुमनाम साप्ताहिक अख़बारों के तीन पत्रकार क्या करने गए थे? क्या वीकली अख़बारों में बार रेड की अपडेट कवरेज होती है? अगर नहीं तो लोकल वीकली न्यूज़पेपर्स के जर्नलिस्ट्स वहां क्यों गए? उनका क्या इंटरेस्ट था? आमतौर पर बार रेड को कवर करने के लिए बड़े-बड़े अख़बार के रिपोर्टर क्राइम भी स्पॉट पर नहीं जाते, क्योंकि पूरी दुनिया जानती है, बार-रेड भ्रष्ट पुलिस की अपनी छवि सुधारने की कवायद होती है। बारों में रेड तब पड़ती है, जब बार मालिक लोकल पुलिस को मान माफिक हफ़्ता देने से कतराने लगता है।
आमतौर पर बीयर-बारों में रेड पुलिस की सोशल सर्विस ब्रांच करती है। वह रेड से पहले टीवी वालों को ख़बर कर देती है, लेकिन ह्वाइट हाऊस में कथित रेड लोकल पुलिस के चंद अफसरान वसूली के लिए डाल रहे थे। शुरू में इसमें एसएस ब्रांच का कोई योगदान नहीं था। चर्चा में आ जाने से रेड को फ़ॉर्मल कर दिया गया और कुछ अरेस्ट और लड़कियों के रेस्क्यू का नाटक भी किया गया।
अमूमन इस तरह के अनॉफ़िशियल रेड मुंबई और ठाणे के उपनगरों में बीयर बारों में होते रहते हैं, जिन्हें वसूली रेड कहा जाता है, जो ऑन द स्पॉट भुगतान के बाद बंद हो जाते हैं। बार रेड अख़बारों की बमुश्किल सिंगल कॉलम की ख़बर होती है। ख़बरों का टोटा होने पर कभी-कभार डबल कॉलम स्थान पा जाती है। ख़बर भी फिलिंग द ब्लैंक स्टाइल की होती हैः अमुक बार में रेड पड़ी, इतनी बार-बालाएं, इतने ग्राहक और इतने कर्मचारी अरेस्ट हुए। सभी अरेस्टेड लोगों को दूसरे दिन कोर्ट से बेल मिल जाती है। बार भी दूसरे दिन से फिर से पुलिस संरक्षण में मज़े करने वाले ग्राहकों को खींचने लगता है।
इस सदी के आरंभ में टीवी मीडिया कल्चर शुरू होने पर बार रेड की ख़बर ब्रेकिंग न्यूज़ बनने लगी। टीवी पर अकसर ब्रेकिंग न्यूज़ चलती है कि अमुक बार में रेड पड़ी। मज़ेदार बात यह है कि इससे होता-जाता कुछ नहीं। चैनल पर थोड़ी देर सनसनी ज़रूर रहती है। देखा-देखी सारे टीवी न्यूज़ वाले यह ख़बर चलाते हैं। प्रतिस्पर्धा के चलते बार रेड कवर करना टीवी वालों की मजबूरी बन गई है। टीवी चैनल्स के नाइट रिपोर्टर रात ड्यूटी पर पहुंचने पर सबसे पहले सहयोगियों से पता करते हैं कि कहीं बार में रेड तो नहीं हुई। मतलब विज़ुअल और बाइट के लिए केवल इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लोग बार रेड कवर करते हैं। इससे वसंतराव ढोबले जैसे अफ़सरों का लाइमलाइट में आने का मौक़ा मिल जाता है।
चूंकि बार में रोक के बावजूद डांस हो रहा है, ऐसे में कुछ लोग साप्ताहिक अख़बार निकाल कर डांस बार की शिकायत करते हैं। यदा-कदा छपने वाले साप्ताहिक या पक्षिक या मंथली अख़बार निकाले ही इसलिए जाते हैं ताकि धन उगाही की जा सके। कहा जाता है कि शिकायत के बदले में शिकायतकर्ता को डांस बार से हर महीने नियमित राशि नज़राने के रूप में मिलती है।
मुंबई और ठाणे इस तरह के लाभार्थी पत्रकारों की फेहरिस्त बहुत लंबी है। पुलिस सूत्र बताते हैं कि राघवेंद्र दुबे खुशबू उजाला के लेटरहेड का इस्तेमाल शिकायत के लिए करते थे। हत्या में लवबर्ड बार का मालिक भी अरेस्टेड है। लवबर्ड के ख़िलाफ़ राघवेंद्र के सौ से ज़्यादा शिकायती पत्र मीरारोड पुलिस स्टेशन की फाइल में पड़े हैं। अब मुंबई के पत्रकारों को तय करना है कि राघवेंद्र दुबे को आजतक के अक्षय सिंह की कैटेगरी में खड़ा कर दिया जाए या नहीं?
एक टिप्पणी भेजें