गुरुवार, 30 जुलाई 2015

क्या याकूब मेमन की आख़िरी इच्छा अधूरी रही?

1993 में मुंबई बम धमाकों के साजिशकर्ताओं में से एक याकूब मेमन की जीवित रहने बहुत प्रबल इच्छा थी, लेकिन आख़िरकार उसके ग़ुनाहों ने उसे जीने नहीं ही दिया और वह फांसी पर लटका दिया गया। 12 मार्च 1993 के मुंबई सीरियल ब्लास्ट के इस ग़ुनाहगार ने देश के सबसे अच्छे वकीलों की सेवाएं ली और अपने आपको फांसी के फंदे से बचाने की हर मुमकिन कोशिश की। यहां तक कि उसकी ओर से सुप्रीम कोर्ट, महाराष्ट्र के राज्यपाल और राष्ट्रपति के पास याचिका पर याचिका दायर की गई कि वह मौत की सज़ा से बच जाए, लेकिन उसकी यह इच्छा पूरी नहीं हुई और मौत ने उससे 257 हत्याओं का बदला ले लिया।
इतना ही नहीं सुप्रीम कोर्ट ने भी उसे जीवित रहने का मौक़ा देने के लिए ही रात 2.30 बजे उसके वकीलों की ओर से दायक याचिका पर सुनवाई की। याकूब के मौत के वॉरंट पर रोक लगाने के लिए उसके वकीलों की ओर से दायर याचिका खारिज़ सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को तड़के खारिज़ कर दी। तीन जजों की खंडपीठ ने कोर्ट चार में अपने आदेश में कहा कि मौत के वॉरंट पर रोक लगाना न्याय का मज़ाक़ होगा, लिहाज़ा, उसकी याचिका खारिज़ की जाती है। याचिका पर सुनवाई के लिए आधी रात में कोर्ट खोला गया। सुनवाई तड़के 3.20 बजे शुरू हुई और 90 मिनट चली। ऐसा भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में पहली बार हुआ, जब एक फांसी की सज़ा पाए क़ैदी को जीवित रहने का मौक़ा देने के लिए उसकी अपील पर देश की सबसे बड़ी अदालत ने आधी रात को सुनवाई की हो, यह इसलिए भी हुआ कि याकूब या उसके परिजन या समर्थक यह न कहें कि उसके साथ इंसाफ़ नहीं हुआ।
दरअसल, जेल सूत्रों के हवाले से बताया जा रहा है कि गुरुवार की सुबह याकूब मौत का फंदा गले में डालने से पहले अपनी 21 साल की बेटी ज़ुबेदा को देखना चाहता था, लेकिन बेटी फांसी के समय मुंबई थी, लिहाज़ा, जेल अधिकारी उसकी वह इच्छा पूरी नहीं कर सकते थे। तब याकूब से पूछा गया कि उसके बदले उसकी आख़िरी ख्‍वाहिश क्या है? तो याकूब ने कहा कि वह जुबेदा से बात करना चाहेगा। याकूब की आखिरी इच्छा का सम्मान करते हुए जेल से उसके घर फोन लगाया गया और उसने फोन पर बेटी से तीन-चार मिनट बातचीत की। फांसी की सज़ा पाए क़ैदी से उसकी आखिरी इच्छी पूछने का दस्तूर है, तो कह सकते हैं कि याकूब मेमन की आख़िरी इच्छा पूरी तरह तो नहीं बल्कि आंशिक तौर पर पूरी हो गई। वैसे याकूब का परिवार 24 जुलाई को उससे मिला था।  उसकी पत्नी रूहीन मेमन, दो बहने और बेटी ज़ुबेदा रिश्तेदार इक़बाल मेमन के साथ याकूब से नागपुर जेल में ही मिले थे। इस मुलाकात के दौरान वह फूट-फूटकर रोने लगा था।
एक अति भरोसेमंद सूत्र के मुताबिक़, याकूब मेमन ने फोन पर अपनी बेटी से कहा कि ऐसा कोई काम नहीं करना, जिससे ऐसे लाचारी भरे दिन देखने पड़े। संभवतः याकूब अपनी अप्रत्यक्ष रूप से अपनी मौजूदा लाचारी की ज़िक्र कर रहा था कि कहां वह अच्छा खाता-पिता चार्टर्ड अकाउंटेंट था, कहां भाई का साथ देकर 257 लोगों की हत्या का गुनाहग़ार बन गया और इतना लाचार हो गया कि वह जीना चाहता है, लेकिन उसका ग़ुनाह उसे जीने नहीं दे रहा है।
जेल अधिकारियों ने ऐसा महसूस किया याकूब को टाइगर मेमन का साथ देने का गहरा अफसोस है। बहरहाल, याकूब को इसके तुरंत बाद साढ़ छह बजे नागपुर सेंट्रल जेल में फांसी दे दी गई है। लोग भी मानते हैं कि मुंबई बम कांड के बाद परिवार की जलालत होते देखकर याकूब टाइगर से नाराज़ हो गया था। बुधवार की शाम वह जेल के लोगों से बराबर पूछता रहा कि सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ. संभवतः उसके मन में कहीं न कहीं उम्मीद थी कि संभव हो कोई चमत्कार हो और वह ज़िंदगी पा जाए।  लेकिन ऐसा नहीं हुआ। रात को जब उसकी आख़िरी दया याचिका राष्ट्रपति ने केंद्रीय गृहमंत्री से बातचीत के बाद ठुकराई तब उसके वकील सुप्रीम कोर्ट चले गए। यह याकूब को बताया गया था। बहरहाल, रात भर जेल अधिकारी भी सुप्रीम कोर्ट के आदेश का इंतज़ार करते रहे।
फांसी देने के समय याकूब एकदम चुप था। शायद वह अपने किए पर पछता रहा था। उसने अन्य कैदियों और जेलकर्मियों से कहा कि अगर उससे कभी कोई कोई ग़लती हो गई हो तो माफ़ कर देना। इससे पहले सुबह कुरान पढऩे के बाद याकूब का मेडिकल चेकअप किया गया। हालांकि याकूब ने यह कहते हुए कि वह एकदम फिट है, और उसने चेकअप करवाने से इनकार कर दिया। मगर जैल मैनुअल के अनुसार उसका मेडिकल किया गया और उसे फांसी देने के लिए फिट घोषित किया गया। इसके बाद तय नियमों और प्रक्रिया के तहत उसे फांसी दे दी गई।
इस मौक़े पर मुंबई धमाकों का ज़िक्र करना ग़लत नहीं होगा कि जब 12 मार्च 1993 को1.30 से 3.20 के बीच मुंबई में सिलसिलेवार 12 जगह बम धमाके हुए थे, जिसमें 257लोग मारे गए थे और  713 से ज़्यादा लोग ज़ख़्मी हुए थे। दरअसल, उस शुक्रवार को सब कुछ सामान्य ढंग से चल रहा था।  मुंबई में लोग दो चरण में हुए दंगे से उबरने लगे थे। दंगे के लिए दोषी ठहराए गए मुख्यमंत्री सुधाकरराव नाईक को कांग्रेस ने हटा दिया था और उनकी जगह रक्षामंत्री शरद पवार राज्य के मुख्यमंत्री बनकर आ चुके थे। दंगों के समय पुलिस कमिश्नर रहे श्रीकांत बापट की जगह अमरजीत सिंह सामरा आ चुके थे। मुंबई दंगों की जांच के लिए श्रीकृष्ण आयोग का गठन हो चुका था। अचानक शुक्रवार को लंच के समय दोपहर 1.30 बजे मुंबई स्टॉक एक्सचेंज में बहुत ज़ोरदार धमाका हुआ। लोग समझ ही नहीं पाए कि क्या हो गया। तब देश पर आतंकी हमले के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता था। पुलिस और फायर ब्रिगेड की टीम मौक़े पर पहुंच गई। घेरे बंदी के बाद बचाव कार्य शुरू हो गया, तभी कोई पौने घंटे बाद 2.15 बजे मस्जिद बंदर में नरसीनाथ स्ट्रीट में दूसरा धमाके की ख़बर आई। इसी बीच 15 मिनट बाद जब 2.30 बजे तीसरा शिवसेना भवन के पास के पेट्रोल पंप पर धमाका हुआ तो पहली बार मुंबई पुलिस के वायरलेस सेट पर घोषणा की गई कि यह आतंकवादी हमला है।
इसके बाद तो ऐसा लगा मुंबई ज्वालामुखी पर बैठी है और पांच-पांच दस-दस मिनट पर धमाके पर धमाके हो रहे हैं। शिवसेना भवन के धमाके के कुछ मिनट बाद 2.33 बजे नरीमन पॉइंट में एक्सप्रेस टॉवर के पास एयरइंडिया बिल्डिंग के बेसमेंट में बम फटा यह चौथा धमाका था। पांचवा धमाका 12 मिनट बाद 2.45 बजे सेंचुरी बाज़ार में हुआ जहां एक पेड़ और एक बस ही ग़ायब से हो गए। इसी समय यानी 2.45 बजे माहिम में छठा विस्फोट हुआ, यहां ग्रेनेड फेंका गया था, बाद में पता चला दाऊद के गुर्गों ने बम फेंका था। आम आदमी ही नहीं, मुंबई पुलिस और फायर ब्रिगेड के लोग भी परेशान कि कहां जाएं, किस जगह को प्राथमिकता दे।
क़रीब 3.05 बजे सातवां धमाका जवेरी बाज़ार में हुआ जबकि पांच मिनट बाद 3.10 बजे बैंडस्टैंड में सीरॉक होटल में आठवां बम फटा। शिवसेना भवन के पास 3.13 बजे प्लाजा सिनेमा में नौवां धमाका हुआ। कुछ ही पलों बाद ख़बर आई कि दसवां बम जुहू सेंटूर होटल में 3.20 बजे फटा. 3.30 बजे सहार हवाई अड्डे के पास ग्यारवां धमाका हुआ जब किसी ने ग्रेनेड फेंक और बारहवां धमाका 3.40 बजे एयरपोर्ट के पास सेंटूर होटल में हुआ। इसके बाद तो पूरा शहर ही एक अज्ञात ख़ौफ़ से घिर गया।  लोग डर रहे थे कि पता नहीं कहां-कहां बम रखा गया है? तब टीवी न्यूज़ का कल्चर नहीं था, लिहाज़ा, लोग जान ही नहीं पा रहे थे क्या हो रहा है?
बहरहाल, शाम को अमरजीस सिंह सामरा ने प्रेस कॉन्‍फ्रेंस में बताया कि यह देश की आर्थिक राजधानी मुंबई आतंकी हमला था। तीसरे दिन पता चला कि इसके पीछे मोस्ट वॉन्‍टेड क्रिमिनल दाउद इब्राहिम का हाथ है। उसके इशारे पर इन हत्याओं को इब्राहिम मुश्ताक अब्दुल रज्जाक मेमन और उसके भाइयों ने अंजाम दिया जिनमें याकूब मेमन भी था।
एक टिप्पणी भेजें