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शुक्रवार, 1 अप्रैल 2016

भारत सेमीफाइनल वेस्टइंडीज़ से क्यों हारा..?

हरिगोविंद विश्वकर्मा
टी-20 विश्वकप के सेमीफाइनल में मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में वेस्टइंडीज़ के हाथों भारत की पराजय से भारतीय क्रिकेटप्रेमी दुखी हो गए। कई लोगों ने माना कि गुरुवार को शाम किस्मत ने भारत का साथ नहीं दिया। कई लोगों ने कहा कि दो नोबॉल की वजह से भारत हार गया। जबकि सच यह है कि किस्मत ने वेस्टइंडीज़ से ज़्यादा भारत का साथ दिया, क्योंकि सिमंस को अगर दो नोबॉल पर जीवनदान मिला तो कोहली दो रनआउट एक बार कैच आउटहोने से बच गए थे।

भारत-वेस्टइंडीज़ के बीच सेमीफाइनल मैच का अगर निष्पक्ष विश्लेषण किया जाए तो यह कहने में गुरेज़ नहीं होना चाहिए कि भारत अपनी ग़लती और महेंद्र सिंह धोनी के चंद ग़लत फ़ैसले के कारण हार गया। हालांकि मैच के बाद कमेंटेटर से बातचीत के दौरान धोनी ने जब हार के लिए मैच के आधे घंटे पहले शुरू होने को वजह बताया तो कमेंटेटर भी हंसने लगे।

बहरहाल, यह तो मानना पड़ेगा कि विश्व चैंपियन बनने के लिए किसी टीम की अपने एक खिलाड़ी पर इतनी निर्भ्ररता ठीक नहीं। कोई भी टीम अगर किसी एक खिलाड़ी पर बुरी तरह आश्रित है तो वह कप जीतने की हक़दार नहीं हो सकती। अगर टी-20 विश्वकप की बात करें तो टीम इंडिया बुरी तरह विराट पर निर्भर है। यही वजह रही कि टीम इंडिया वानखेडे की रनों से भरी पिच पर 20 ओवर में केवल 192 रन बना सकी, जबकि धोनी को पता था कि अभी 13 दिन पहले इसी मैदान पर दक्षिण अफ्रीका की टीम 229 रन बनाने के बावजूद हार गई थी।

बांग्लादेश पर भारत की 1 रन से जीत के बाद धोनी की तारीफ़ के पुल बांध दिए गए थे। जबकि सच यह था कि उस दिन भारत ने मैच जीता नहीं था, बल्कि ख़ुद बांग्लादेश मैच हार गया था। बहरहाल, धोनी से पूछा जाना चाहिएथा कि रवींद्र जडेजा जैसे औसत दर्जे के खिलाड़ी को अंतिम एकादश में क्यों रखा जा रहा है। ख़ासकर जिस वानखेड़़े पिच पर गेंद घूम न रही हो, उस पर आर अश्विन के साथ जडेजा को क्यों टीम में रखा।

अगर रवींद्र जडेजा को ऑलराउंडर होने के कारण टीम में रखा गया। तो धोनी बताएं कि 2009 में अंतरराष्ट्रीय में पदार्पण करने वाले जडेजा बतौर ऑलराउंडर किस मैच में परफॉर्मेंस दिया है। कहने का मतलब जब जडेजा को विशुद्ध गेंदबाज़ के रूप में टीम में रखना है तो उनसे बेहतर गेंदबाज हरभजन हो सकते थे। वह अंतिम ओवरों में अच्छे शॉट्स के साथ रन भी बना लेते हैं...

वानखेड़े में जडेजा की सबसे ज़्यादा पिटाई हुई, तब भी उन्होंने अपने कोटे के पूरे 4 ओवर गेंदबाज़ी की और 48 रन दे डाले, जबकि धोनी ने अश्विन को केवल 2 ओवर दिया और अश्विन 2 ओवर में 20 रन दिए। धोनी अगर अश्विन का पूरा ओवर करवाते तो ज़्यादा से ज्यादा वह 20 रन और दे देते, लेकिन यह भी संभव था कि, वह एकाध विकेट गिरा देते तो बाज़ी पलट सकती थी।

मैच में 18 मार्च को दक्षिण अफ्रीका 229 रन की रक्षा नहीं कर पाया और इंग्लैंड से हार गया। यह बात धोनी नहीं जानते थे, तो उनकी रणनीति सही नहीं कही जा सकती थी। दरअसल, बल्लेबाज़ों के लिए स्वर्ग वानखेड़े मैदान पर भारत को कम से कम 220 रन के टारगेट के साथ उतरना चाहिए था। लेकिन भारत 200 के टारगेट के साथ उतरा। यही कारण था कि रहाणे विशुद्ध रूप से अपनी स्टाइल में बल्लेबाज़ी करते रहे और एकदिवसीय मैच के अनुसार बल्लेबाज़ी की, जबकि उनसे टी-20 जैसी बल्लेबाजी की उम्मीद थी।

15.3 ओवर में रहाणे का विकेट गिरने के बाद धोनी मैदान में उतरे। तक तक दो दो रन लेने के लिए विकेट के बीच ज़्यादा दौड़ने के कारण कोहली भी थक चुके थे। ऐसे में अंतिम चार ओवर में बल्लेबाज़ी की कमान धोनी को ख़ुद अपने हाथ में लेनी चाहिए थी। सवाल उठता है कि धोनी जब तूफानी बैटिंग नहीं कर सकते थे, तब अपने क्रम से पहले बैटिंग करने के लिए उतरे ही क्यों। जब वह मैदान पर आए तक 27 गेंदे खेली जानी थी. 27 बाल में केवल 66 बने जबकि भारत के पास 8 विकेट हाथ में थे। धोनी 8 बॉल खेले और बनाए 15 रन बनाए. जबकि यह समय चौके-छक्के मारने का समय था, सिंगल लेने का नहीं, क्योंकि यह बल्लेबाजों की पिच थी। मजेदार बात यह रही कि फ्रेश धोनी अंतिम 66 में से केवल 15 रन बनाए, जबकि थके मांदे कोहली अंतिम 17 गेंद में 51 रन बना दिए। लोग यह देखकर हैरान थे कि छोटे मैदान के कारण चौके-छक्के मारने की बजाय धोनी सिंगलव ले रहे थे। जबकि वेस्टइंडीज़ के सिंमस और रसेल चौके छक्के मार कर टीम को जिताया।


इस बार विश्वकप भारत में हो रहा था, सब कुछ भारत के अनुकूल था लेकिन धोनी के ग़लत फ़ैसले के चलते भारत अपने मैदानों पर फाइनल में नहीं पहुंच पाया। और तो और अगर किस्तम ने साथ न दिया होता तो भारत सेमीफाइनल में नहीं पहुंच पाता। अब ज़रूरत है, धोनी के विकल्प तलाशने की, ताकि भारतीय टीम एक मज़बूत टीम बनी रहे। धोनी ने बहुत खेल लिया, अब उन्हें आराम देने पर विचार किया जाना चाहिए,

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