रविवार, 31 अगस्त 2014

स्मरणः सचमुच बहुत कठिन होता है सोनिया से मिलना

22 मई 2014 के मेरे फेसबुक वॉल से साभार
स्मरण...
सचमुच बहुत कठिन होता है सोनिया से मिलना

कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हो चुके सांसद जगदंबिका पाल सिंह सही कह रहे हैं. सोनिया गांधी से मिलना सचमुच बहुत कठिन होता है. चंद लोगों को छोड़कर आम कांग्रेसियों से भी वह बमुश्किल ही मिल पाती हैं. 
1999 में जब शरद पवार, पीए संगमा और तारिक अनवर ने सोनिया गांधी के विदेशी मूल को लेकर काग्रेस से से बग़ावत की थी, तब कांग्रेस संकट में थी. उस समय मैंने भी सोनिया गांधी से मिलने की कोशिश की थी. दरअसल, मैं सोनिया का इंटरव्यू लेना चाहता था. सो मिलने की हिमाकत की. हालांकि तब मेरे जैसे छोटे पत्रकार के लिए वह असंभव सा था फिर भी मैंने मिलने को ठान लिया. 
लेकिन अंततः उनका औपचारिक इंटरव्यू नहीं मिल सका. दरअसल, रिपोर्टिंग के दौरान मैं हर जगह अपना सूत्र बना लेता था. 10 जनपथ में भी सूत्र बना लिया. अपने उस सूत्र के जरिए कई दिन लगातार फ़ील्डिंग करता रहा. जब सूत्र बोलता तब फोन करता. क़रीब 10 दिन की अनवरत मेहनत के बाद मौक़ा मिल गया. 27 या 28 मई 1999 की शाम थी वह. सूत्र ने कहा था कि 4 बजे 10 जनपथ के मेन गेट पर पहुंच जाना. मैं निर्धारित समयसे पहले गेट पर पहुंच गया. वहां तैनात गार्डों को बताया कि मुझे सोनिया गांधी से मिलना है. सब के सब हैरानी से मुझे देखने लगे क्योंकि जो भी सोनिया से मिलने आते थे सब वीआईपी टाइप लोग होते थे और बहुत महंगी कार में सवार होकर आते थे. उनके पास मोबाइल फोन होता था. तब मोबाइल स्टैटस सिंबल के रूप में भारत में आ चुका था लेकिन मेरे पास नहीं था. बहरहाल, महंगी कार की बजाय मैं बस से उतर कर पैदल गेट तक गया. मुझे पैदल आते गार्डों ने देख लिया था. 
बहरहाल, गोर्डों ने मुलाकातियों की सूची देखी तो उसमें मेरा भी नाम था. अपना नाम सूची में देखकर मुझे लगा कि मैडम से मुलाक़ात हो जाएगी. वरना अपने सूत्र पर भी बहुत भरोसा नहीं था. बहरहाल, शाम 4 बजे मुझे अंदर जाने की इजाज़त मिली. मेरी बहुत ही सघन तलाशी हुई. मेरी बॉलपेन को भी बारीक़ी से चेक किया गया. खैर, कैंपस में एक बहुत बड़ा लॉन है, वहीं मुझे रुककर इंतज़ार करने को कहा गया. 
मैंने देखा, दिल्ली कांग्रेस के बड़े-बड़े नेता लॉन में इंतज़ार कर रहे हैं. मैंने दाढ़ी के कारण सज्जन कुमार को पहचान लिया. बहरहाल, 20 मिनट इंतज़ार करने के बाद मैंने देखा सुरक्षा गार्डों से घिरी थीं. उनके साथ विंस्टन जार्ज और इमरान किदवई थे, हालांकि तब मैं दोनों को पहचानता नहीं था. सब लोग लाइन से खड़े हो गए. कांग्रेस के लोग भी उसी क़तार में खड़े हो गए. मुझे हैरानी हुई कि कांग्रेस के लोग भी मैडम से इस तरह मिलते हैं. बहरहाल, सोनिया मेरे बाएं से लोगों से मिलते हुए आ रही थीं. जार्ज के अलावा दो सुरक्षा गार्ड थे. इसके अलावा एक सुरक्षा गार्ड पंक्ति में खड़े लोगों के पीछे पीछे फ़लो कर रहा था. एक कैमरामैन भी था जो हर मुलाक़ाती और सोनिया की फोटे खींच रहा था. क़तार में मुझसे ठीक पहले एक महिला खड़ी थी. जब सोनिया उसके पास पहुंचीं तो वह भावुक हो गई और फूट-फूटकर रोने लगी. सोनिया ने उसे गले लगा लिया. वह सोनिया के ख़िलाफ़ बग़ावत से दुखी लग रही थी. तब सोनिया हिंदी नहीं बोल पाती थीं लिहाज़ा, अंग्रेज़ी में ही महिला को सांतवना देने लगीं. लेकिन महिला चुप होने का नाम ही नहीं ले रही थी. मैं भी बेसब्री से अपनी बारी का इंतज़ार कर रहा था. क़रीब 10 मिनट तक सोनिया महिला को ही चुप करातीं रह गईं. मुझे उसी समय लगा सोनिया अच्छी महिला हैं, भावुक किस्म की.
बहरहाल जब वह मेरे पास पहुंची तो मैंने पूछ लिया. “मैंडम, विल यू विकम प्राइम मिनिस्ट इफ गेट मेज़ारिटी इन इलेक्शन?” सोनिया कुछ सेकेंड मुझे देखती रहीं, फिर बहुत धीरे से “नो” कहा. मैं कुछ और सवाल पूछता उससे पहले ही उन्होंने इमरान किदवई को बुलाया और कहा, “आई नीड सच पीपल, जस्ट टाक टू हिम ऐंड इफ़ ही इज़ इंटरेस्टेड आस्क हिम टू वर्क फ़ॉर पार्टी.” इमरान किदवई ने कहा कि आप मैडम से अलग से मिल लीजिएगा. अभी मैडम को लोगों से मिलने दीजिए. उसी दौरान फोटोग्राफर ने सोनिया से मिलते हुए मेरी फोटो भी खींची. बहरहाल, सोनिया आगे बढ़ गईं. मज़ेदार बात यह रही कि जब में सोनिया से बात कर रहा था तो पीछे के गार्ड ने आहिस्ता से मेरी बेल्ट पीछे से पकड़ रखी थी ताकि मैं सोनिया की ओर और न बढ़ सकूं. बहरहाल, मुलाक़ात के फ़ौरन बाद फिर इमरान मेरे पास आए और बोले कि आप कल 24 अकबर रोड (कांग्रेस मुख्यालय) आइए. आपसे बात करनी है. मुझे लगा सोनिया का इंटरव्यू मिल जाएगा. सो दूसरे दिन भी वहां गया. तो बहुत इंतज़ार करवाने के बाद इमरान मुझसे मिले और मुझे जनार्दन द्विवेदी से मिलने को कहा. मुझे इंटरव्यू चाहिए था सो जनार्दन द्विवेदी के पास गया. उन दिनों वह सोनिया का भाषण लिखते थे. वह मुझसे नहीं मिले. दूसरे दिन आने को कहा. दूसरे दिन भी गया पर नहीं मिले. कई बार कोशिश करने के बाद आख़िरकार वह मुझसे मिले लेकिन बहुत अनिच्छा के साथ, तब साफ़ मुझे लगा कि सोनिया का इंटरव्यू नहीं मिल सकता क्योंकि उनके आसपास चमचों का बहुत स्ट्रांग घेरा होता है. लिहाज़ा, मैंने व्यर्थ का चक्कर लगाना छोड़ दिया. क़रीब दो साल तक मैं दिल्ली में रहा. इस दौरान दिल्ली की हर प्रमुख शख़्सियत चाहे वह साहित्यकार हो, पत्रकार हो, कलाकार हो या राजनेता हो, से मिला. कमलेश्वर से मिलने उनके बंगले पर पहुंच गया. बहुत प्रेम से मिले और शरबत पिलाया. अटलबिहारी वाजपेयी तब प्रधानमंत्री थे. मैं उनसे मिलने 7 रेसकोर्स पहुंच गया. उनसे संक्षिप्त मुलाक़ात हुई. उन्हें एक पत्र दिया. बाद में पीएमओस से उसका जबाव आया. उसी दौरान तब शरद पवार, वीवी सिंह, कांशीराम समेत क़रीब-क़रीब सभी शीर्ष नेताओं से उनके बंगलों पर मिला. वयोवृद्ध सीताराम केसरी तो मुझे अच्छी तरह पहचानने लगे. उनके निजी सहायक नन्हकी और टेलीफोन ऑपरेटर शिवजी और बंगले के सभी कर्मचारियों से घनिष्ठ रिश्ता बन गया. केसरी के यहां से मेरे कार्यालय में अकसर फोन आता था. उसी दौरान मेरे सीनियर अनिल ठाकुर को केसरी का एक इंटरव्यू चाहिए था पर केसरी किसी को इंटरव्यू नहीं देते थे. तो अनिल जी का इंटरव्यू मैंने ही किया. जिसका मुझे 400 रुपए मिला था जिस पर बस में पाकेटमारों ने हाथ साफ़ कर दिया. बहरहाल, जब केसरी बीमार होकर एम्स में भर्ती हुए तो मुझे अख़बार पढ़कर सुनाने के लिए बुलावाते थे. वह बमुश्किल उठ पाते थे. केसरी के पुराना किला रोड के बंगले पर कई कांग्रेस नेताओं से मुलाकात हुई जिनमें स्वर्गीय माधवराव सिंधिया और राजेश पायलट भी थे. दोनों से मेरी पुराना किला वाले बंगले पर कई मुलाक़ात हुई. सिंधिया केसरी को बहुत मानते थे क्योंकि नरसिंह राव के समय कांग्रेस छोड़ने के बाद केसरी उन्हें और विलासराव देशमुख को वापस कांग्रेस में लाए थे. केसरी के बंगले पर कई बहुत ही बड़े पत्रकारों को भी आते मैं देखता था. कई लोगों को देखकर मुझे हैरानी भी होती थी. बहरहाल, उन्हीं दिनों अचानक घर से फोन आने पर वापस मुंबई चला आया. मुंबई में उसी साल यूएनआई में नौकरी मिल गई और दिल्ली गया ही नहीं.
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