रविवार, 17 अगस्त 2014

क्या महात्मा गांधी को सचमुच सेक्स की बुरी लत थी?

हरिगोविंद विश्वकर्मा
राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गांधी की कथित सेक्स लाइफ़ पर एक बार फिर से बहस छिड़ गई है. लंदन के प्रतिष्ठित अख़बार द टाइम्स के मुताबिक गांधी को कभी भगवान की तरह पूजने वाली 82 वर्षीया गांधीवादी इतिहासकार कुसुम वदगामा ने कहा है कि गांधी को सेक्स की बुरी लत थी, वह आश्रम की कई महिलाओं के साथ निर्वस्त्र सोते थे, वह इतने ज़्यादा कामुक थे कि ब्रम्हचर्य के प्रयोग और संयम परखने के बहाने चाचा अमृतलाल तुलसीदास गांधी की पोती और जयसुखलाल की बेटी मनुबेन गांधी के साथ सोने लगे थे. ये आरोप बेहद सनसनीख़ेज़ हैं क्योंकि किशोरावस्था में कुसुम भी गांधी की अनुयायी रही हैं. कुसुम, दरअसल, लंदन में पार्लियामेंट स्क्वॉयर पर गांधी की प्रतिमा लगाने का विरोध कर रही हैं. बहरहाल, दुनिया भर में कुसुम के इंटरव्यू छप रहे हैं.
वैसे तो महात्मा गांधी की सेक्स लाइफ़ पर अब तक अनेक किताबें लिखी जा चुकी हैं. जो ख़ासी चर्चित भी हुई हैं. मशहूर ब्रिटिश इतिहासकार जेड ऐडम्स ने पंद्रह साल के गहन अध्ययन और शोध के बाद 2010 में गांधी नैकेड ऐंबिशन लिखकर सनसनी फैला दी थी. किताब में गांधी को असामान्य सेक्स बीहैवियर वाला अर्द्ध-दमित सेक्स-मैनियॉक कहा गया है. किताब राष्ट्रपिता के जीवन में आई लड़कियों के साथ उनके आत्मीय और मधुर रिश्तों पर ख़ास प्रकाश डालती है. मसलन, गांधी नग्न होकर लड़कियों और महिलाओं के साथ सोते थे और नग्न स्नान भी करते थे.
देश के सबसे प्रतिष्ठित लाइब्रेरियन गिरिजा कुमार ने गहन अध्ययन और गांधी से जुड़े दस्तावेज़ों के रिसर्च के बाद 2006 में ब्रम्हचर्य गांधी ऐंड हिज़ वीमेन असोसिएट्स में डेढ़ दर्जन महिलाओं का ब्यौरा दिया है जो ब्रम्हचर्य में सहयोगी थीं और गांधी के साथ निर्वस्त्र सोती-नहाती और उन्हें मसाज़ करती थीं. इनमें मनु, आभा गांधी, आभा की बहन बीना पटेल, सुशीला नायर, प्रभावती (जयप्रकाश नारायण की पत्नी), राजकुमारी अमृतकौर, बीवी अमुतुसलाम, लीलावती आसर, प्रेमाबहन कंटक, मिली ग्राहम पोलक, कंचन शाह, रेहाना तैयबजी शामिल हैं. प्रभावती ने तो आश्रम में रहने के लिए पति जेपी को ही छोड़ दिया था. इससे जेपी का गांधी से ख़ासा विवाद हो गया था.
तक़रीबन दो दशक तक महात्मा गांधी के व्यक्तिगत सहयोगी रहे निर्मल कुमार बोस ने अपनी बेहद चर्चित किताबमाई डेज़ विद गांधी में राष्ट्रपिता का अपना संयम परखने के लिए आश्रम की महिलाओं के साथ निर्वस्त्र होकर सोने और मसाज़ करवाने का ज़िक्र किया है. निर्मल बोस ने नोआखली की एक ख़ास घटना का उल्लेख करते हुए लिखा है, एक दिन सुबह-सुबह जब मैं गांधी के शयन कक्ष में पहुंचा तो देख रहा हूं, सुशीला नायर रो रही हैं और महात्मा दीवार में अपना सिर पटक रहे हैं. उसके बाद बोस गांधी के ब्रम्हचर्य के प्रयोग का खुला विरोध करने लगे. जब गांधी ने उनकी बात नहीं मानी तो बोस ने अपने आप को उनसे अलग कर लिया.
ऐडम्स का दावा है कि लंदन में क़ानून पढ़े गांधी की इमैज ऐसा नेता की थी जो सहजता से महिला अनुयायियों को वशीभूत कर लेता था. आमतौर पर लोगों के लिए ऐसा आचरण असहज हो सकता है पर गांधी के लिए सामान्य था. आश्रमों में इतना कठोर अनुशासन था कि गांधी की इमैज 20 वीं सदी के धर्मवादी नेता जैम्स वॉरेन जोन्स और डेविड कोरेश जैसी बन गई जो अपनी सम्मोहक सेक्स-अपील से अनुयायियों को वश में कर लेते थे. ब्रिटिश हिस्टोरियन के मुताबिक गांधी सेक्स के बारे लिखना या बातें करना बेहद पसंद करते थे. इतिहास के तमाम अन्य उच्चाकाक्षी पुरुषों की तरह गांधी कामुक भी थे और अपनी इच्छा दमित करने के लिए ही कठोर परिश्रम का अनोखा तरीक़ा अपनाया. ऐडम्स के मुताबिक जब बंगाल के नोआखली में दंगे हो रहे थे तक गांधी ने मनु को बुलाया और कहा अगर तुम मेरे साथ नहीं होती तो मुस्लिम चरमपंथी हमारा क़त्ल कर देते. आओ आज से हम दोनों निर्वस्त्र होकर एक दूसरे के साथ सोएं और अपने शुद्ध होने और ब्रह्मचर्य का परीक्षण करें.
किताब में महाराष्ट्र के पंचगनी में ब्रह्मचर्य के प्रयोग का भी वर्णन है, जहां गांधी के साथ सुशीला नायर नहाती और सोती थीं. ऐडम्स के मुताबिक गांधी ने ख़ुद लिखा है, “नहाते समय जब सुशीला मेरे सामने निर्वस्त्र होती है तो मेरी आंखें कसकर बंद हो जाती हैं. मुझे कुछ भी नज़र नहीं आता. मुझे बस केवल साबुन लगाने की आहट सुनाई देती है. मुझे कतई पता नहीं चलता कि कब वह पूरी तरह से नग्न हो गई है और कब वह सिर्फ़ अंतःवस्त्र पहनी होती है. दरअसल, जब पंचगनी में गांधी के महिलाओं के साथ नंगे सोने की बात फैलने लगी तो नथुराम गोड्से के नेतृत्व में वहां विरोध प्रदर्शन होने लगा. इससे गांधी को प्रयोग बंद कर वहां से बोरिया-बिस्तर समेटना पड़ा. बाद में गांधी हत्याकांड की सुनवाई के दौरान गोड्से के विरोध प्रदर्शन को गांधी की हत्या की कई कोशिशों में से एक माना गया.
ऐडम्स का दावा है कि गांधी के साथ सोने वाली सुशीला, मनु, आभा और अन्य महिलाएं गांधी के साथ शारीरिक संबंधों के बारे हमेशा गोल-मटोल और अस्पष्ट बाते करती रहीं. उनसे जब भी पूछा गया तब केवल यही कहा कि वह सब ब्रम्हचर्य के प्रयोग के सिद्धांतों का अभिन्न अंग था. गांधी की हत्या के बाद लंबे समय तक सेक्स को लेकर उनके प्रयोगों पर भी लीपापोती की जाती रही. उन्हें महिमामंडित करने और राष्ट्रपिता बनाने के लिए उन दस्तावेजों, तथ्यों और सबूतों को नष्ट कर दिया गया, जिनसे साबित किया जा सकता था कि संत गांधी, दरअसल, सेक्स-मैनियॉक थे. कांग्रेस भी स्वार्थों के लिए अब तक गांधी के सेक्स-एक्सपेरिमेंट से जुड़े सच छुपाती रही है. गांधी की हत्या के बाद मनु को मुंह बंद रखने की सख़्त हिदायत दी गई. उसे गुजरात में एक बेहद रिमोट इलाक़े में भेज दिया गया. सुशीला भी इस मसले पर हमेशा चुप्पी साधे रही. सबसे दुखद बात यह है कि गांधी के ब्रम्हचर्य के प्रयोग में शामिल क़रीब-क़रीब सभी महिलाओं का वैवाहिक जीवन नष्ट हो गया.
ब्रिटिश इतिहासकार के मुताबिक गांधी के ब्रह्मचर्य के चलते जवाहरलाल नेहरू उनको अप्राकृतिक और असामान्य आदत वाला इंसान मानते थे. सरदार पटेल और जेबी कृपलानी ने उनके व्यवहार के चलते ही उनसे दूरी बना ली थी. गिरिजा कुमार के मुताबिक पटेल गांधी के ब्रम्हचर्य को अधर्म कहने लगे थे. यहां तक कि पुत्र देवदास गांधी समेत परिवार के सदस्य और अन्य राजनीतिक साथी भी ख़फ़ा थे. बीआर अंबेडकर, विनोबा भावे, डीबी केलकर, छगनलाल जोशी, किशोरीलाल मश्रुवाला, मथुरादास त्रिकुमजी, वेद मेहता, आरपी परशुराम, जयप्रकाश नारायण भी गांधी के ब्रम्हचर्य के प्रयोग का खुला विरोध कर रहे थे.
गांधी की सेक्स लाइफ़ पर लिखने वालों के मुताबिक सेक्स के जरिए गांधी अपने को आध्यात्मिक रूप से शुद्ध और परिष्कृत करने की कोशिशों में लगे रहे. नवविवाहित जोड़ों को अलग-अलग सोकर ब्रह्मचर्य का उपदेश देते थे. रवींद्रनाथ टैगोर की भतीजी विद्वान और ख़ूबसूरत सरलादेवी चौधरी से गांधी का संबंध तो जगज़ाहिर है. हालांकि, गांधी यही कहते रहे कि सरला उनकी महज आध्यात्मिक पत्नीहैं. गांधी डेनमार्क मिशनरी की महिला इस्टर फाइरिंग को भी भावुक प्रेमपत्र लिखते थे. इस्टर जब आश्रम में आती तो वहां की बाकी महिलाओं को जलन होती क्योंकि गांधी उनसे एकांत में बातचीत करते थे. किताब में ब्रिटिश एडमिरल की बेटी मैडलीन स्लैड से गांधी के मधुर रिश्ते का जिक्र किया गया है जो हिंदुस्तान में आकर रहने लगीं और गांधी ने उन्हें मीराबेन का नाम दिया.
दरअसल, ब्रिटिश चांसलर जॉर्ज ओसबॉर्न और पूर्व विदेश सचिव विलियम हेग ने पिछले महीने गांधी की प्रतिमा को लगाने की घोषणा की थी. मगर भारतीय महिला के ही विरोध के कारण मामला विवादित और चर्चित हो गया है. अपने इंटरव्यू में कभी महात्मा गांधी के सिद्धांतों पर चलाने वाली कुसुम ने उनकी निजी ज़िंदगी पर विवादास्पद बयान देकर हंगामा खड़ा कर दिया है. कुसुम ने कहा, बड़े लोग पद और प्रतिष्ठा का हमेशा फायदा उठाते रहे हैं. गांधी भी इसी श्रेणी में आते हैं. देश-दुनिया में उनकी प्रतिष्ठा की वजह ने उनकी सारी कमजोरियों को छिपा दिया. वह सेक्स के भूखे थे जो खुद तो हमेशा सेक्स के बारे में सोचा करते थे लेकिन दूसरों को उससे दूर रहने की सलाह दिया करते थे. यह घोर आश्चर्य की बात है कि धी जैसा महापुरूष यह सब करता था. शायद ऐसा वे अपनी सेक्स इच्छा पर नियंत्रण को जांचने के लिए किया करते हों लेकिन आश्रम की मासूम नाबालिग बच्चियों को उनके इस अपराध में इस्तेमाल होना पड़ता था. उन्होंने नाबालिग लड़कियों को अपनी यौन इच्छाओं के लिए इस्तेमाल किया जो सचमुच विश्वास और माफी के काबिल बिलकुल नहीं है. कुसुम का कहना है कि अब दुनिया बदल चुकी है. महिलाओं के लिए देश की आजादी और प्रमुख नेताओं से ज्यादा जरूरी स्वंय की आजादी है. गांधी पूरे विश्व में एक जाना पहचाना नाम है इसलिए उन पर जारी हुआ यह सच भी पूरे विश्व में सुना जाएगा.
दरअसल, महात्मा गांधी हत्या के 67 साल गुज़र जाने के बाद भी हमारे मानस-पटल पर किसी संत की तरह उभरते हैं. अब तक बापू की छवि गोल फ्रेम का चश्मा पहने लंगोटधारी बुजुर्ग की रही है जो दो युवा-स्त्रियों को लाठी के रूप में सहारे के लिए इस्तेमाल करता हुआ चलता-फिरता है. आख़िरी क्षण तक गांधी ऐसे ही राजसी माहौल में रहे. मगर किसी ने उन पर उंगली नहीं उठाई. कुसुम के मुताबिक दुनिया के लिए गांधी भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के आध्यात्मिक नेता हैं. अहिंसा के प्रणेता और भारत के राष्ट्रपिता भी हैं जो दुनिया को सविनय अवज्ञा और अहिंसा की राह पर चलने की प्रेरणा देता है. कहना न भी ग़लत नहीं होगा कि दुबली काया वाले उस पुतले ने दुनिया के कोने-कोने में मानव अधिकार आंदोलनों को ऊर्जा दी, उन्हें प्रेरित किया.
समाप्त

5 टिप्‍पणियां:

Arvind Upadhayay ने कहा…

हरिगोविन्द भाई,
सार्थक विषय बहुत हैं.इस तरह के विषयों को हम अपने विदेशी मित्रों के लिए छोड़ दें तो बेहतर होगा.अगली नस्ल को गलत सन्देश देने वाले लेखन हमारी रचनात्मकता पर महज़ सवाल ही खड़े करेंगे.स्थापित प्रतीकों का हम महिमामंडन भले ही न करें लेकिन उनकी छवि पर कालिख लगाना अन्ततः देश और समाज के लिए अशुभ साबित होगा.इस तरह के लेखन को चर्चा में आने के अस्वीकार्य प्रयास से अधिक नहीं समझा जाता.

बेनामी ने कहा…

Very ni ce sir. Ase lekhan se he hum jan sak te hai sekee k do pehlu. Insaan k do bhin bhin roop. Or adhyatmikta k naam per khud ko mahan banane vale neta.

बेनामी ने कहा…

Erdh nagnn hoker desh ko azadi de ne ka shrye le n wale gandhise or khya umid ho sakti th. Bohot h bedhya hari ji. Sach or sahasi patrakaro mai aap ka naam aya hai. Mubarak ho dhtata

गिरिजा कुलश्रेष्ठ ने कहा…

मैं अरविन्द जी की बात से पूरी तरह सहमत हूँ ।

हरिगोविंद विश्वकर्मा (Harigovind Vishwakarma) ने कहा…

परम आदरणीय अरविंदजी,
जहां तक आपने चर्चा के लिए लेखन की बात कही है, तो हर लेखक इस मकसद से लिखता है कि उसे लोग पढ़ें, ज़्यादा से ज़्यादा लोग पढ़ें. यानी पढ़कर उसके लेखन पर चर्चा करें. लोग किताबें अख़बारवालों को क्यों देते हैं, इसलिए कि उनकी किताब पर लिखा जाए ताकि उसकी चर्चा हो. आप मुझे किसी लेखक का उदाहरण दीजिए, जो चर्चा के लिए न लिखता है. लिहाज़ा यह कहने में तनिक संकोच नहीं कि हर कोई चर्चा के लिए ही लिखता है. यहां तक कि महात्मा गांधी भी चर्चा पाने के लिए ही लिखते थे. तभी तो दक्षिण अफ्रीका के पहले चरण के बाद जब वह भारत आए थे और इलाहाबाद पहुंच गए थे, मोतीलाल नेहरू से मिलने तो वह पायनियर के दफ़्तर जाकर उसके संपादक से मिलने और अपने दक्षिण अफ्रीका संघर्ष के बारे में लिखना नहीं भूले. उन्होंने क्यों लिखा, ज़ाहिर है चर्चा पाने के लिए. वह किसी से मिले या न मिले हों, विदेशी पत्रकारों से ज़रूर मिलते थे, क्यों? ताकि उनका चर्चा मिले. मैं सन् 2000 से गांधी और स्वतंत्रता संग्राम पर विशेष अध्ययन कर रहा हूं. इस आप रिसर्च भी कह सकते हैं. हालांकि तमाम किताबे में अपने पैसे से ही ख़रीदता हूं. गांधी पर मैंने सकारात्मक, नकारात्मक और आलोचनात्मक तीनों तरह के साहित्य का अध्ययन किया है. अध्ययन का यह सिलसिला अभी थमा नहीं है. मैं इतना कहना चाहता हूं, कि गांधी आज जिस मुकाम पर पहुंचे है वहां वह अपने कर्मों से नहीं नथुराम गोड्स के कुकर्मों से पहुंचें हैं. और अगर गांधी आज एक स्थापित प्रतीक हैं तो अपनी महानता की वजह से नहीं बल्कि 15 अगस्त 1947 (मैं इस तिथि को स्वतंत्रता दिवस नहीं मानता) के बाद लगातार सत्ता में रही कांग्रेस के कारण. गांधी के बारे में झूठी बातें बढ़-चढ़कर कही गई. उनकी अहिंसा को महिमामंडित किया गया जिसके चलते 20 लाख निर्दोष लोगों की जान गई. ऐसी अहिंसा किस काम की जिसके कारण इतनी मौतें हो और इतनी बड़ी तादाद में लोग विस्थापित हों. लिहाज़ा, गांधी स्थापित प्रतीक कुछ मुट्ठी भर लोगों की नज़र में हैं. नथुराम गोड्से तो अंत तक कहता रहा, कि गांधी हत्या पर या गांधीवाद पर कोई उससे बहस करे लेकिन कोई गांधीवादी तैयार नहीं हुआ. विनोबा भावे ने पहले चुनौती स्वीकार की बाद में वह भी पीछे हट गए. दरअसल, हम और आप उस दौर में पैदा हुए, जब न गांधी थे, न नेहरू या फिर न ही सावरकर या गोड्से और न ही अंग्रेज़... ऐसे में हमारी जानकारी का स्रोत केवल किताबे हैं. मेरी समस्या यह है कि मैंने केवल गांधी की अपने को महिमामंडित करने वाली किताबें नहीं पढ़ी बल्कि गांधी के बारे में लिखी किताबे पढ़ी चाहे उसे भारतीय ने लिखी हो या विदेशी. जहां तक आपने विदेशी लेखक की बात कही है तो गांधी के ब्रम्हचर्य के प्रयोग पर सबसे पहले गांधी के क़रीबी लेखक वेद मेहता, गांधी के 20 साल तक सचिव रहे निर्मल कुमार बोस और गांधी पर बहुत लंबा अध्ययन करने वाले गिरिजा कुमार ने लिखी. जेड ऐडम्स जैसे विदेशी लेखकों ने तो बहुत बाद में लिखा. इसलिए मैं विनम्रता से कहना चाहता हूं, कि इस लेख को यह बताने का प्रयास मात्र माने कि गांधी के बारे में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्या चर्चा चल रही है, इसे मैं अपना पत्रकारीय दायित्व मानता हूं.