बुधवार, 30 सितंबर 2015

नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मौत विमान हादसे में नहीं हुई -फ्रांस की खुफिया रिपोर्ट

हरिगोविंद विश्वकर्मा
भारतीय राजनीति के कर्ण माने जाने वाले नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मौत के बारे में नया खुलासा करते हुए कहा है कि फ्रांस की खुफिया रिपोर्ट ने 15 जुलाई 2017 को दावा किया कि नेताजी की मौत हवाई हादसे में नहीं हुई है। पेरिस के इतिहासकार जेबीपी मूर का दावा है कि नेताजी की मौत ताइवान के प्लेन क्रैश में नहीं हुई है, बल्कि नेताजी के ठिकाने के बारे में दिसंबर 1947 तक पता नहीं था। मूर के दावे के बाद एक बार फिर से यह साफ हो जाता है कि फ्रांस नेताजी के प्लेन क्रैश में 18 अगस्त 1945 में मारे जाने के दावे को मानने को तैयार नहीं है। आपको बता दें कि मूर पेरिस के प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानमें प्रोफेसर हैं।  मूर का कहना है कि फ्रांस की खुफिया विभाग का मानना है कि बोस 18 अगस्त 1947 में प्लेन क्रैश में नहीं मारे गए थे, बल्कि वह इंडो-चीन से बच निकलने में सफल हुए थे, उनके ठिकाने के बारे में 11 दिसंबर 1947 तक किसी को पता नहीं था। इससे साफ है कि वह कहीं ना कहीं 1947 तक जिंदा थे।

देशवासियों को “तुम मुझे ख़ून दो मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा” का नारा देने वाले स्वतंत्रता आंदोलन के असली हीरो नेताजी सुभाषचंद्र बोस को अगर भारतीय राजनीति का कर्ण कहा जाए, तो अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा। जैसे महाभारत में महाबली कर्ण के साथ जीवन पर्यंत, यहां तक कि मृत्यु तक, अन्याय होता रहा, उसी तरह नेताजी के साथ पूरे जीवनकाल ही नहीं, मृत्यु के बाद भी अन्याय पर अन्याय ही हुआ. वह भी उनके अपने ही देश में। दरअसल, महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचंद्र बोस तीनों समान स्टैचर के नेता थे, लेकिन जहां अंग्रेज़ों का “ब्लूआई परसन” होने के कारण गांधी और नेहरू भारतीय राजनीति में युधिष्ठिर और अर्जुन बनने का गौरव हासिल करने में सफल रहे, वहीं ब्रिटिश हुक्मरानों की आंख की किरकिरी रहे सुभाषबाबू के खाते में केवल उपेक्षा, अपमान, पलायन और मौत ही आई।

कहा जाता है, सुभाषबाबू के आज़ाद हिंद फ़ौज में भर्ती होने की भारतीय युवकों में दीवानगी देखकर ब्रिटिश सरकार के होश भी उड़ गए थे। बहरहाल, बाग़ी तेवर और सशस्त्र संघर्ष की पैरवी करने के कारण ही जंग-ए-आज़ादी के महानायक को लंबे समय तक निर्वासन का जीवन बिताना पड़ा। दूसरी ओर गांधी-नेहरू की अगुवाई वाली उदार कांग्रेस हमेशा ही अंग्रेज़ों की कृपापात्र रही। तब गांधी-नेहरू जहां उदारवादी गुट का नेतृत्व करते थे, वहीं नेता जोशीले क्रांतिकारी दल के प्रिय नेता थे। सत्तासुख भोगने वाले नेहरू ही नहीं कांग्रेसियों ने भी बोस के साथ इंसाफ़ नहीं किया। उनसे जुड़े तमात तत्यों को इतने लंबे समय तक इस तरह छिपाया कि हर देशवासी उनकी मंशा पर शक करने लगा।

इतिहास और इतिहासकारों ने भी सुभाषचंद्र बोस के साथ कर्ण जैसा व्यवहार किया। भारतीय इतिहासकारों ने महात्मा गांधी और पं. नेहरू के कार्यों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जबकि नेताजी की नीति और कार्यों को इस तरह पेश नहीं किया गया, जितना वह डिज़र्व करते थे। कांग्रेस, ख़ासकर गांधी, अपनी अहिंसावादी नीति के चलते सुभाष को पसंद ही नहीं करते थे। उनकी इच्छा के विपरीत 1938 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष निर्वाचित होने के बाद नेताजी ने राष्ट्रीय योजना आयोग का गठन करके प्रगतिशील क़दम उठाया था। इसकी ख़ूब सराहना हुई, लेकिन यह नीति गांधी के आर्थिक विचारों के अनुकूल नहीं थी, लिहाज़ा गांधी और उनके समर्थक नेताजी का विरोध करने लगे।

इसी तरह अगले साल (सन् 1939 में) कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव में सुभाष और गांधी फिर आमने-सामने आ गए। जैसे ही सुभाषबाबू ने दोबारा अध्यक्ष का चुनाव लड़ने की घोषणा की, गांधी ने यूरोप के लंबे प्रवास से स्वदेश लौटे नेहरू को नामांकन दाखिल करने को कहा, लेकिन स्मार्ट नेहरू ने मौलाना अबुल कलाम आज़ाद का नाम आगे कर दिया। मगर पराजय के डर से मौलाना ने अपना नाम वापस ले लिया। अंत में गांधी ने आनन-फानन में आंध्रप्रदेश के नेता डॉ. पट्टाभी सितारमैया का नामांकन भरवाया। लेकिन वह सुभाषबाबू से हार गए। नेताजी को 1580 वोट मिले थे, जबकि सितारमैया को 1377 वोट। गांधी ने इसे अपनी व्यक्तिगत हार माना और सार्वजनिक तौर पर कहा, “सुभाषबाबू की जीत मेरी व्यक्तिगत हार है।” ऐसा लगा, गांधी कांग्रेस वर्किंग कमिटी से इस्तीफ़ा दे देंगे। उनके विरोध के चलते ही सुभाषबाबू ने अध्यक्ष से त्यागपत्र दे दिया। फिर डॉ. राजेंद्र प्रसाद कांग्रेस अध्यक्ष बनाए गए थे।

इतिहासकार बताते हैं कि सुभाषबाबू आज़ादी के संघर्ष के पुरोधा महात्मा गांधी का बहुत सम्मान करते थे। उनके विचार बेशक भिन्न थे लेकिन वह अच्छी तरह जानते थे कि गाधी और उनका मक़सद एक ही है, यानी देश की आज़ादी। बस दोनों के रास्ते अलग-अलग हैं। महात्मा गांधी को सबसे पहले ‘राष्ट्रपिता’ कहकर नेताजी ने ही संबोधित किया था। बाद में उन्हें औपचारिक रूप से राष्ट्रपिता मान लिया गया।

23 जनवरी 1897 को उड़ीसा (तब उड़ीसा ब्रिटिश बंगाल प्रेसीडेंसी का हिस्सा था) में कटक के बंगाली परिवार में जन्मे नेताजी सुभाषचंद्र बोस से जुड़ी 64 अति गोपनीय फाइलों को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी द्वारा सार्वजनिक करने के बाद कहा जा रहा है कि नेताजी 1945 के बाद भी जीवित थे। तो क्या 18 अगस्त 1945 को ताइवान के ताईहोकू हवाई अड्डे (अब ताइपेई डोमेस्टिक एयरपोर्ट) पर विमान हादसे में नेताजी के मरने की झूठी ख़बर फैलाई गई? ऐसे में इस तरह की आशंका की गहन जांच कराकर देश को सच बताने की ज़रूरत है ताकि नेताजी की मौत की सात दशक पुरानी अनसुलझी गुत्थी सुलझ सके।

इस खुलासे के बाद अब सवाल यह भी उठता है कि क्या देश के नेहरू के स्टेनों रहे श्यामलाल जैन की बात, जैसा कि बीजेपी नेता डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी दावा करते रहे हैं, सही है कि नेताजी की हत्या नेहरू के कहने पर रूसी तानाशाह जोसेफ स्तालिन ने करवा दी थी। डॉ स्वामी के मुताबिक़ “मेरठ निवासी श्यामलाल नेहरू के स्टेनो थे। नेताजी की मौत की ख़बर के पब्लिक होने के नेहरू ने उन्हें आसिफ अली के घर बुला कर एक पत्र टाइप करावाया था, जिसमें उन्होंने ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लिमेंट एटली को लिखा था कि उनका वॉर क्रिमिनल रूस के क़ब्ज़े में है। हालांकि, श्यामलाल ने खोसलाकमीशन के सामने यह बयान दिया था, लेकिन उनके पास अपने बयान के समर्थन में कोई सुबूत नहीं था।“

सुभाषचंद्र बोस की मौत के रहस्य पर चार क़िताबें “बैक फ्रॉम डेड इनसाइड द सुभाष बोस मिस्ट्री” (2005), “सीआईए'ज आई ऑन साउथ एशिया” (2008), “इंडिया'ज बिगेस्ट कवरअप” (2012) और “नो सेक्रेट” (2013) लिखने वाले और एनजीओं ‘मिशन नेताजी’ के संस्थापक पत्रकार-लेखक अनुज धर ने तीन साल पहले ही कह दिया था कि कांग्रेस और कांग्रेस का एक बंगाली नेता दोनों नहीं चाहते थे कि नेताजी के बारे में रहस्यों से परदा हटे। अनुज ने कड़ी मेहनत से लिखी क़िताबों में ताइवान सरकार के हवाले से दावा किया है कि 15 अगस्त से पांच सितंबर 1945 के दौरान कोई विमान हादसा नहीं हुआ था।

अनुज का दावा सीआईए की रिपोर्ट से मेल खाता है। दरअसल, नेताजी की कथित मौत के 20 दिन बाद तीन सितंबर 1945 को अमेरिकी सेना ने जापानी सेना को हराकर ताइवान पर क़ब्ज़ा कर लिया था। इसके बाद अमेरिकी की ख़ुफिया एजेंसी सीआईए ने अपनी रिपोर्ट में साफ़-साफ़ कहा था कि ताइवान में पिछले छह महीने से कोई विमान हादसा नहीं हुआ था। यहां इस बात पर भी गौर करना चाहिए कि अपनी कथित मौत से दो दिन पहले 16 अगस्त 1945 को नेताजी वियतनाम के साइगॉन शहर से भागकर मंचूरिया गए थो जो उस समय रूस के क़ब्ज़े में था।

सुभाषबाबूजी के निजी गनर रहे जगराम भी दावा करते हैं कि नेताजी की विमान दुर्घटना में मौत नहीं हुई थी, उनकी हत्या कराई गई होगी। उनका कहना था कि अगर विमान हादसे में नेताजी की मौत होती तो कर्नल हबीबुर्रहमान ज़िंदा कैसे बच जाते? क्योंकि वह दिन रात साये की तरह नेताजी के साथ रहते थे। यही बात ख़ुद कर्नल हबीबुर्रहमान ने कही है।

नेताजी की रहस्यमय मौत की जांच के लिए अब तक तीन जांच कमेटी/कमिशन की नियुक्ति की जा चुकी है. सबसे पहली शाहनवाज़ कमेटी 1956 में नेहरू ने गठित की. दूसरा जीडी खोसला कमीशन 1970 में इंदिरा गांधी ने बनाया और तीसरा एनएम मुखर्जी कमीशन का गठन 1999 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने किया। खोसला कमीशन ने कहा था कि नेताजी की मौत विमान हादसे में हुई। लेकिन अनुज धर का मानते हैं कि खोसला कमीशन के गवाह कांग्रेसी और इंटेलिजेंस ब्यूरो के ही लोग थे। लिहाज़ा उस पर भरोसा नही किया जा सकता।

बहरहाल, मुखर्जी कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में नेताजी की विमान हादसे में मौत होने की संभावनाओं से इनकार कर दिया था। रिपोर्ट 17 मई 2006 को लोकसभा में पेश की गई थी, लेकिन कांग्रेस नीत सरकार ने रिपोर्ट अस्वीकार कर दिया था। हालांकि इस साल मई में नेताजी की सुश्री प्रपौत्री राज्यश्री चौधरी ने कहा था कि अगर मुखर्जी कमीशन की रिपोर्ट बिना संपादित किए संसद में रख दी जाए तो सच सामने आ जाएगा। तथ्यों पर आधार पर सुश्री चौधरी ने दावा किया था कि नेहरू ने कुर्सी के लिए स्टालिन के जरिए अमानवीय यातनाएं देकर साइबेरिया में नेताजी को मरवाया।

नेताजी कटक शहर के मशहूर वक़ील जानकीनाथ बोस और प्रभावती की 14 संतानों (6 बेटियां और 8 बेटे) में नौवीं संतान थे। उनकी पढ़ाई कटक के रेवेंशॉव कॉलेजिएट स्कूल, प्रेज़िडेंसी कॉलेज और स्कॉटिश चर्च कॉलेज से हुई। इंडियन सिविल सर्विस की तैयारी के लिए वे केंब्रिज विश्वविद्यालय भेजे गए। जहां परीक्षा में चौथा स्थान प्राप्त किया। उनका मानना था कि अंग्रेजों के दुश्मनों से मिलकर आज़ादी हासिल की जा सकती है। इसीलिए ब्रिटिश के चंगुल से निकलकर अफगानिस्तान और रूस होते हुए जर्मनी जा पहुंचे।

सुभाषबाबू ने दुनिया भर का भ्रमण किया। हिटलर-मुसोलिनी के दौर में वह यूरोप में रहे और दोनों से मिले भी। उन्होंने 1937 में अपनी सेक्रेटरी ऑस्ट्रियन नागरिक एमिली शेंकल से शादी कर ली थी। नेताजी ने 1943 में जर्मनी छोड़कर जापान चले गए और वहां से सिंगापुर। वहीं 21 अक्टूबर को आज़ाद हिंद फ़ौज का गठन किया था। रासबिहारी बोस आज़ाद हिंद फ़ौज के नेता थे। फ़ौज का पुनर्गठन किया गया और महिलाओं के लिए रानी झांसी रेजिमेंट का गठन किया, जिसकी मुखिया कैप्टन लक्ष्मी सहगल बनी। नेताजी आजाद हिंद फ़ौज के साथ चार जुलाई 1944 को बर्मा (म्यानमार) पहुंचे। यहीं पर उन्होंने अपना नारा, "तुम मुझे ख़ून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा" दिया।

देश को आज़ादी का सपना दिखाने वाले सुभाषबाबू के साथ आज़ादी मिलने का बाद उसी देश ने सौतेला व्यवहार किया। लिहाज़ा, वक़्त का तकाजा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस मुद्दे पर निजी दिलचस्पी लेकर सात दशक से जारी रहस्य से परदा हटाएं,ताकि पूरा मुल्क जान सके कि सुभाषबाबू के साथ आख़िर हुआ क्या था?
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