बुधवार, 16 दिसंबर 2015

2012 दिल्ली गैंगरेपः इंसाफ़ के लिए कितना लंबा इंतज़ार?

हरिगोविंद विश्वकर्मा

आप लोगों को याद हैकोई तीन साल पहले की बात है। दिसंबर का दूसरा पखवाड़ाऔर 16 दिसंबर का दिन। दिल्ली में चलती बस में एक गैंगरेप हुआ था। पीड़ित लड़की पैरामेडिकल की छात्रा थी। उसके साथ छह दरिंदों ने इतना अमानवीय व्यवहार किया था कि लड़की का शरीर ही नष्ट हो गया। भारत में डॉक्टरों ने उसकी जान बचाने की हर संभव कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हुए। भारतीय डॉक्टरों के नाकाम होने पर उसे सिंगापुर के विश्वविख्यात माउंट एलिजाबेथ अस्पताल ले जाया गया, फिर भी उसकी जान नहीं बचाई जा सकी। यानी दो हफ़्ते मौत से जूझने के बाद 29 दिसंबर को वह यमराज से उसी तरह हार गई, जैसे बलात्कारियों से लड़ने के बाद हार गई थी।

क्या उस क्रूर और अमानवीय घटना का इंसाफ़ हो गयाअगर नहीं तो क्योंदिसंबर 2012 और दिसंबर 2015 के कालखंड के बीच इतना बदलाव हुआ कि लोग वारदात को ही भूल गए। अब मुमकिन है, उसकी तीसरी बरसी पर 16 दिसंबर को टीवी चैनल वाले भी उसे याद करते हुए, यही सवाल उठाएं कि आख़िर गुनाहगारों को अब तक सज़ा क्यों नहीं दी गई? फिर कुछ लोग कहेंगे, सरकार ने अपनी तरफ़ से बलात्कारियों को सज़ा देने की प्रक्रिया में हर मुमकिन मदद की। चूंकि किसी आरोपी को सज़ा कितनी और किस तरह देनी है, यह फ़ैसला अदालत करती है और अदालत के फ़ैसले पर किसी का कोई ज़ोर नहीं। न्यायपालिका स्वतंत्र है। वह दिल्ली गैंगरेप के आरोपियों को कब मौत की सज़ा दी जाए या कोई दूसरी सज़ा, यह फ़ैसला केवल अदालत ही करेगी।
पैरा-मेडिकल छात्रा के साथ हुए गैंगरेप की निंदा देश-विदेश में हुई थी। रेप के विरोध में ट्विटर और फेसबुक जैसी सोशल मीडिया पर बहुत कुछ लिखा गया। देश में कहीं उग्र तो कहीं शांतिपूर्ण प्रदर्शन हुए। दिल्ली में प्रदर्शन इतना उग्र हो गया था कि मेट्रो सेवा बंद करनी पड़ी। रायसीना हिल्स रोड पर दिल्ली पुलिस ने आंदोलनकारियों पर लाठीचार्ज किया था। बलात्कार के दो दिन बाद 18 दिसंबर को इसी विषय पर संसद के दोनों सदनों में जोरदार हंगामा हुआ। आक्रोशित संसद सदस्यों ने रेपिस्ट्स के लिए फ़ासी की सज़ा तय करने की मांग की। तत्कालीन गृहमंत्री सुशीलकुमार शिंदे ने संसद को आश्वासन दिया कि राजधानी में महिलाओं की सुरक्षा के लिए सभी ज़रूरी क़दम उठाए जाएंगे।

दिल्ली गैंगरेप पर बीबीसी के लिए फिल्मकार लेस्‍ली एडविन ने 'इंडियाज डॉटर्स' शीर्षक से डॉक्‍यूमेंट्री बनाई थी, जिसमें उन्होंने देश में महिलाओं या लड़कियों के प्रति पुरुष की मानसिकता को बताने की कोशिश की थी। इसके लिए उन्होंने तिहाड़ जेल में एक आरोपी का इंटरव्यू भी लिया था। यह वृत्तचित्र विवाद में आ गई और उस पर प्रसारण से पहले ही बैन लग गया। सरकार के आग्रह पर कंटेंट को यू-ट्यूब से भी हटा दिया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने टाइम को दिए इंटरव्यू में प्रतिबंध को अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता से जुड़ा मुद्दा मानने से इनकार करते हुए इसे क़ानून से जुड़ा मामला बताया। मोदी ने कहा, 'इस डॉक्‍यूमेंट्री में उस पीड़ित लड़की की पहचान ज़ाहिर की गई है। इसकी कानूनी प्रक्रिया जारी है। लिहाज़ा, प्रसारण से कानूनी प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है।

बहरहाल, सरकार और न्यायपालिका सबकी की सक्रियता देखकर उस समय एक बार तो पूरे देश को यही लगा और भरोसा हुआ कि अब पूरी व्यवस्था बदल जाएगी। ऐसे प्रावधान किए जाएंगे कि कोई बलात्कार करने की हिमाकत नहीं करेगा। महिलाओं पर यौन हमला करने वाला हर अपराधी जेल में होगा। केंद्र ने महिलाओं के ख़िलाफ़ बढ़ते य़ौन अपराध को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे जस्टिस जेएस वर्मा की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन कर दिया। ज़ाहिर है, कमेटी को महिलाओं पर यौन अत्याचार करने वालों को कठोर दंड देने की सिफारिश करनी थी। लोगों को यह भी उम्मीद बंधी थी कि बलात्कारियों को फ़ांसी की सज़ा देने का प्रावधान किया जाएगा। चूंकि दिल्ली गैंगरेप के आरोपियों को नए क़ानून के तहत सज़ा दी जानी थी, इसलिए जस्टिस वर्मा ने दिन रात काम करते हुए रिकॉर्ड 29 दिन में 630 पेज की रिपोर्ट पूरी करके 23 जनवरी 2013 को सरकार को सौंप दी। जस्टिम वर्मा को ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी समेत देश और विदेश से लगभग 80 हजार सुझाव मिले। मगर रिपोर्ट निराशाजनक रही।

रिपोर्ट में जस्टिस वर्मा ने रेप को रेयर ऑफ़ रेयरेस्ट नहीं माना, जबकि लालकृष्ण आडवाणी जैसे राष्ट्रीय नेता हर बलात्कारी को फ़ांसी की सज़ा देने के पक्ष में थे। मगर भारत जैसे पुरुष प्रधान देश में पले-बढ़े और न्याय-व्यवस्था का संचालन करने वाले जस्टिस वर्मा संभवतः बलत्कृत स्त्री की पीड़ा कोमहसूस करने में नाकाम रहे, अन्यथा वह बलात्कारी के लिए फ़ांसी की सज़ा की सिफ़ारिश ज़रूर करते। बहरहाल, जस्टिस वर्मा ने बलात्कार के बाद लड़की की हत्या को रेयरेस्ट ऑफ़ रेयर ज़रूर माना और हत्यारे बलात्कारी के लिए मौत की सज़ा का प्रावधान किया। इसके अलावा जस्टिस वर्मा ने यौन अपराध करने वालों को कड़ी सज़ा का प्रावधान किया जिसके चलते तरुण तेजपाल जैसे तथाकथित लोग पुलिस की गिरफ़्त में आए। 21 मार्च 2013 को लोकसभा ने बलात्कार विरोधी बिल पास कर दिया और इस क़ानून को क्रिमिनल लॉ संशोधन अधिनियम 2013 कहा गया।

इस बीच दिल्ली गैंगरेप के मुख्य आरोपी ड्राइवर रामसिंह ने न्यायपालिका से पहले ख़ुद ही अपने आपको सज़ा दे दी और 11 मार्च 2013 की सुबह तिहाड़ जेल में आत्महत्या कर ली। 16 दिसंबर की रात लड़की पर सबसे ज़्यादा हैवानियत करने वाला आरोपी मुहम्मद अफरोज नाबालिग था और भारतीय न्याय-व्यवस्था पर जेल (सुधार घर) से हंसता हुआ बाहर निकला। बाक़ी चार आरोपियों मुकेश सिंहअक्षय ठाकुर, विनय शर्मा और पवन गुप्ता पर लगे अभियोग पर सुनवाई के लिए विशेष त्वरित अदालत गठित की गई, ताकि इंसाफ़ जल्दी हो। विशेष अदालत ने 14 सितंबर 2013 को दोषियों क़रार देते हुए फ़ांसी की सज़ा सुना दी। यानी महज 173 दिन यानी नौ महीने में आरोपियों को सज़ा सुना दी गई। दिल्ली हाईकोर्ट ने भी छह महीने के अंदर 13 मार्च 2014 को दिए फ़ैसले में चारों की फ़ासी की सज़ा बरकरार रखा। अब केस क़रीब दो साल से देश की सबसे बड़ी अदालत में है। सुप्रीम कोर्ट के जज मदन बी कोकुर के पिछले 22 नवंबर को हैदराबाद में एक सेमिनार में दी गई जानकारी के मुताबिक, पहले से ही 65 हज़ार (64,919) केस लंबित हैं। वैसे पूरे देश में तीन करोड़ मुकदमे लंबित हैं।

दिल्ली गैंगरेप के दौरान अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि कि अगर उनकी पार्टी सत्ता में आई तो दिल्ली में रेप के मुकदमों की तेज़ सुनवाई के लिए अदालतों और जजों की संख्या बढ़ाई जाएगी। उन्हें सत्ता में आए क़रीब साल भर होने वाले हैं, लेकिन इस तरह की कोई आहट नहीं दिख रही है कि राजधानी में अदालत या जजों की संख्या बढ़ाई जा रही है। बयानबाज़ी खूब करने वाले केजरीवाल ने अगर सुप्रीम कोर्ट से अपील भी की होती कि कम से कम प्रतीक तौर पर दिल्ली गैंगरेप के मामले को जल्दी से सुनवाई करके बलात्कारी को दंडित किया जाए ताकि देश में संदेश जाए कि वाक़ई रेपिस्टों को दंड मिल रहा है। मज़ेदार बात यह रही कि साफ़ सुथरी राजनीति का सब्ज़बाग़ दिखाकर दिल्ली के सीएम बने केजरीवाल ने ऐसे-ऐसे लोगों को टिकट दिया कि 67 विधायकों में उनके पांच विधायक जेल जा चुके हैं, जिनमें एक मंत्री भी शामिल है।

अब नया अपराध क़ानून के बने क़रीब तीन साल होने वाले हैं, लेकिन नए क़ानून के तहत अभी तक किसी को सज़ा नहीं हुई है। यही वजह है कि तमाम कोशिश के बावजूद बलात्कार की वारदातें रोके नहीं रुक रही हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक़, पिछले साल यानी 2014 में 36735 बलात्कार के मामले दर्ज किए गए। 2013 में रेप के 33707 और 2012 में 24923 मामले केस हुए थे। पिछले साल रोज़ाना 101 रेप की वारदात दर्ज हुई। यानी 14 मिनट में एक महिला अपनी इज्ज़त गंवा बैठती है। यह 2012 के बाद बलात्कार की घटना में सात फ़ीसदी से ज़्यादा बढ़ोतरी है। दिल्ली और मुंबई महिलाओं के लिए सेफ मानी जाती है, लेकिन यहां बलात्कार की घटनाएं सबसे ज़्यादा होती है। अकेले दिल्ली में 2013 में 1626 रेप हुआ था।

मशहूर उर्दू शायर ख़्वाज़ा हैदर अली 'आतिश' का शेर बहुत शोर सुनते थे पहलू में दिल काजब चीरा तो क़तरा-ए-खूं न निकला।“ इस देश की जनता और सरकार की करनी और कथनी में अंतर बया करता है। मतलब, कभी लोग क्रांति करने के लिए उतावले हो जाते हैं और कभी घटना ही विस्मृत कर देते हैं। दरअसल, कोई घटना होती है, तो भारतीय बहुत ज़्यादा उत्तेजित हो जाते हैं। सरकार भी पीछे नहीं रहती और घोषणा पर घोषणा कर देती है, यह सोचे बिना ही कि घोषणा पर अमल होगा या नहीं। लोगों की सक्रियता देखकर यही लगता है कि अब इस तरह की वारदात भविष्य में नहीं होगी, लेकिन जल्द ही लोग घटना ही भूलने लगते हैं और पुलिस कांख में डंडा दबाए फिर से वही खैनी खाने के मूड में आ जाती है। यह अप्रोच हर घटना को लेकर रहती है। चाहे वह आतंकी हमला हो या फिर महिलाओं पर यौन हमला यानी सामूहिक बलात्कार। बहरहाल, उम्मीद की जानी चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट इस केस की सुनवाई जल्द से जल्द करने बलात्कारियों को सुनाई गई सज़ा को बरकरार रखेगा, ताकि महिलाओं पर बुरी नज़र डालने वालों पर अंकुश लग सके।
समाप्त
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