सोमवार, 25 जनवरी 2016

भारतीय लोकतंत्र पर चंद राजनीतिक परिवारों क़ब्ज़ा

हरिगोविंद विश्वकर्मा
आज गणतंत्र दिवस है। यह देश का एक राष्ट्रीय पर्व है जो हर साल 26 जनवरी को मनाया जाता है। इसी दिन सन 1950 को भारत का संविधान लागू किया गया था। दरअसल, भारत को स्वतंत्र और पूर्ण लोकतांत्रिक गणराज्य बनने के लिए 26 नवंबर 1949 को भारतीय संविधान सभा ने मौजूदा संविधान को अपनाया था। एक साल दो महीने बाद इसे लोकतांत्रिक सरकार प्रणाली के साथ विधिवत लागू किया गया था। इस तारीखः का चयन इसलिए भी हुआ, क्योंकि 1930 में इसी दिन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारत को पूर्ण स्वराज घोषित किया था।

गणतंत्र समारोह पिछले 66 साल से मनाया जा रहा है। ऐसे में यह आकलन तो होना ही चाहिए कि जिस मकसद से भारत को भारतीय गणराज्य यानी इंडियन रिपब्लिक बनाया गया था, वे मकसद पूरे हुए या नहीं? अगर नहीं तो क्योंइस दृष्टि से यह आकलन करने का सर्वोत्तम दिन है, कि आज़ादी या लोकतंत्र का लाभ किन-किन लोगों को सबसे ज़्यादा मिला? इतना ही नहीं, क्या ऐसे लोग भी हैं, जिन्हें कोई शेयर ही नहीं मिला। यह बहुत बड़ा विषय है, इसलिए आज भारतीय राजनीति में लोकतंत्र को हाईजैक करने वालों पर ही चर्चा सीमित रहेगी।

किसी परिवार में पैदा होना कोई गुनाह नहीं है। इसके लिए किसी को दोषी भी नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि कोई कहां पैदा हो, यह प्रकृति तय करती है, लेकिन किसी को उसकी योग्यता और उसके परिश्रम से बहुत ज़्यादा मिल जाना तो गंभीर दोष है और अगर किसी को किसी ख़ास परिवार में पैदा होने के कारण उसकी योग्यता और उसके परिश्रम से ज़्यादा मिला है तो यह बेशक ग़लत है, यह असामाजिक, असंवैधानिक और अनैतिक भी है। कोई नौसिखिया व्यक्ति इसीलिए मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री बन जाए कि वह किसी ख़ास आदमी का बेटा या उसके परिवार का है, इसे तो ग़लत कहा जाएगा। तब योग्यता या कॉम्पीटिशन का क्या मतलब रह गया ?

वंशवाद के नाम पर गांधी परिवार को सबसे ज़्यादा कोसा जाता रहा है, जबकि यह सच है कि दूसरे दलों में परिवारवाद - मुलायम-लालू-पासवान-सिंधिया-बादल-ठाकरे-मुंडे-पवार-संगमा-करुणानिधि - ज़्यादा में फैल गया है। बहरहाल, मुद्दा इंदिरा की हत्या के बाद राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बनाए जाने के बाद ज़्यादा मुखर हुआ और तब से गाहे-बगाहे चलता ही रहा है। देश की राजनीति में परिवारवाद को लेकर चाहे जितनी भी बात की जाए, लेकिन कोई दल इससे अछूता नहीं रहा। राजनीति में परिवारवाद ख़त्म होने की बजाय वटवृक्ष की तरह फैलता जा रहा है। यह कई दशक से कोई दूसरा नेतृत्व तैयार ही नहीं होने दे रहा है।

भारतीय राजनीति में वंशवाद यानी परिवारवाद पर ब्रिटिश लेखक पैट्रिक फ्रेंच ने बहुत लंबे शोध के बाद एक किताब लिखी है, जो 2011 में प्रकाशित हुई और ख़ासी चर्चित भी रही। मजेदार बात यह कि वंशवाद उससे भी आगे बढ़ चुक है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है. पिछले चुनाव में 80 करोड़ लोग मतादादा थे। आबादी के हिसाब से दुनिया का हर छठा व्यक्ति भारतीय था, मगर हर 10 में से तीन सांसद एक ही परिवार से आते रहे हैं।

पैट्रिक के अनुसार पिछली लोकसभा में 28.6 फीसदी सदस्य वंशानुगत थे, 6.4 फीसदी इंडस्ट्री या बिजनेस से सीधे आए थे और 9.6 फीसदी अन्य तरह के कनेक्शनों से लोकसभा में थे. केवल 46.8 फीसदी सदस्य ही वंशानुगत नहीं थे। पिछली लोकसभा में 30 साल से कम उम्र के सभी सदस्य परिवार के प्रतिनिधि थे, जबकि 40 साल तक के 65 फीसदी सदस्य वंशानुगत। अगर महिला की बात करें तो क़रीब 70 फीसदी महिला सदस्य राजनीतिक पारिवार की थीं। पैट्रिक फ्रेंच कहते हैं कि अगर संसद में 33 फीसदी रिज़र्वेशन हो गया परिवार की भागीदारी और बढ़ जाएगी।

66 साल के लोकतंत्र में सबसे पिछड़े राज्य यूपी में मुलायम यादव परिवार सबसे ज़्यादा तरक्की किया और तक़रीबन हर सदस्य किसी न किसी पद पर है। मुलायम आजमगढ से लोकसभा में हैं तो बहू डिंपल यादव कन्नौज से। बेटा अखिलेश यादव सूबे का सीएम है, तो भाई रामगोपाल यादव राज्यसभा में हैं। दूसर भाई शिवपाल यादव राज्य में पीडब्ल्यूडी मंत्री हैं, तो दो भतीजे धर्मेंद्र यादव बदायूं और अक्षय यादव फिरोजाबाद से एमपी हैं। अब बड़े भाई का पोता तेज़ प्रताप यादव भी मैनपुरी से लोकसभा में पहुंच गया है। यह राज्य की ग़रीब जनता का जनादेश है। इसी तरह केवल बेटे को उत्तराधिकारी मानने वाले चारा घोटाले में सज़ायाफ़्ता लालूप्रसाद यादव के दोनों बेटे तेजस्वी और तेजस नीतीश कुमार के बिहार मंत्रिमंडल में मंत्री हैं यह बिहार की जनता जनार्दन का फ़ैसला है।

मजेदार बात यह है कि कई परिवार में तो राजनीति करने लायक जितने भी सदस्य हैं वे सभी किसी न किसी पद पर हैं। कुछ परिवारों ने तो दो-दो दलों में अपनी पैठ बना रखी है और हवा के रूख के हिसाब से अपने भविष्य की राजनीति को तय करते हैं। लेकिन वंश का माल खाकर तरक्की हासिल करना क्या उचित है। पैट्रिक फ्रेंच डाटाबेस के मुताबिक वंशानुगत लोकसभा सदस्य गैर-वंशानुगत सदस्य के मुकाबले औसतन 4.5 गुना अमीर हैं. अगर वंशानुगत सदस्यों में उन सदस्यों की संपत्ति देखी जाए जिनके एक से ज्यादा पारिवारिक कनेक्शन हैं यानी हाइपर वंशानुगत सदस्य, तो पता चलता है कि हाइपर वंशानुगत सदस्य बाकी वंशानुगत सदस्यों के मुकाबले लगभग दोगुना संपत्ति वाले हैं।

बिहार ही नहीं, पंजाब का कैबिनेट भी वंशवाद को पुष्ट करने के लिए काफी है। पंजाब यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर आशुतोष ने एमए की छात्रा गुनरीत कौर की थीसीस का उदाहरण देते हुए बताते हैं कि बादल के पुत्र सुखबीर डिप्टी सीएम हैं, भतीजे मनप्रीत वित्तमंत्री, दामाद आदेश सिंह कैरों (पूर्व सीएम कैरों के पौत्र) मंत्री, करीबी रिश्तेदार, जनमेजा सिचाई मंत्री। सुखबीर के साले बिक्रमाजीत मजीठिया मंत्री रहे हैं। प्रकाश बादल की पत्नी सुरिंदर कौर अकाली दल महिला शाखा की संरक्षक हैं। बहू हरसिमरत कौर केंद्र में मंत्री। शासन ऐसा कर रहा है कि आतंकवादी बेख़ौफ़ राज्य में आने लगे हैं। इसी तरह कैप्टन अमरिंदर सिंह, सिमरनजीत सिंह मान की पत्नी और बेअंत सिंह के बाद सीएम हरचरण सिंह बरार की बहू आपस में बहन हैं।

प्रो आशुतोष कहते हैं, जैसे प्रचीनकाल में हिंदू और मध्यकाल में मुस्लिम शासक अपने राज्य के विस्तार के लिए दूसरी जाति और धर्म में शादियां करते थे या दूसरे रिश्ते बनाते थे उसी तरह आज के राजनेता करते रहे हैं। परिवारिक सदस्य होने के नाते राजनीति में सफल होने के लिए संसाधन आसानी से मिल जाते हैं. आर्थिक संसाधनों के साथ-साथ वंशानुगत राजनीतिक नेटवर्क का फायदा भी मिलता है। परिवार से होने के नाते क्षेत्र व समाज में पारिवारिक दबदबा, खानदानी और जातिगत समर्थन विरासत में मिलता है. इसके चलते राजनीति और सत्ता तक उनकी पहुंच आसानी से हो जाती है। इसके अलावा अनुशासन, वरिष्ठता और नियम-कायदे उन पर लागू नहीं होते हैं। लेकिन आम कार्यकर्ता पर सब कुछ लागू होता है और अगर वह सब अर्हताएं पूरी भी करें तब भी कोई खानदानी नेता सार कि-धर को गुड़गोबर कर सकता है।

कह सकते हैं कि लोकतंत्र के इस तमाशे में हर तरह के लोग हैं। विश्व के लोकतंत्रिक इतिहास में भारत ऐसा देश है, जहां परिवारवाद की जड़ें गहरी धंसी हुई है। आज़ादी के तुरंत बाद शुरू हुई वंशवाद की यह अलोकतानात्रिक परंपरा अपनी जड़े दिनोंदिन गहरी करती जा रही है। राष्ट्रीय राजनीति के साथ-साथ राज्य और स्थानीय स्तर पर इसकी जड़े इतनी जम चुकी है कि देश का लोकतंत्र परिवारतंत्र नजर आने लगा है। इस परिवारतंत्र को कितना लोकतांत्रिक कहा जा सकता है, यह सवाल दिनों दिन बढ़ता जा रहा है। प्राचीन और मध्यकाल के राजा और सुल्तानों की जगह पोलिटिकल फैमिलीज़ ने ले ली है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं। पहले जैसे राजा का बेटा राज बनता था, वैसे है आज प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री का बेटा (या बेटी) प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री बनता है। इसका साफ मतलब है कि इन दलों में नेतृत्व करने के लिए दूसरा नाम आना असंभव है।

परिवारवादी नेताओं ने राज्य में कैसा शासन किया। एक तस्वीर उसकी भी देखिए। सन् 1943 में ब्रिटिश सरकार ने हेल्थ सेवा के लिए सर जोसेफ भोरे की अध्यक्षता में समिति का गठन किया था, जिसने 1946 में रिपोर्ट दे दी थी। भोरे समिति ने कहा था, हेल्थ सर्विस उपलब्ध कराना सरकार की ज़िम्मेदारी है। पैसे के अभाव में किसी नागरिक को अच्छी स्वास्थ सेवा से वंचित नहीं किया जा सकता है। अंग्रेज़ सिफ़ारिश को मानकर इलाज मुफ़्त करने वाले थे, लेकिन उनके जाने के बाद आज़ाद भारत में उस रिपोर्ट को डस्टबिन में डाल दिया गया। मतलब अपनी तथाकथित ग़ुलाम जनता के लिए जितने चिंतित गोरे थे, उतनी अपनी सरकार नहीं रही हैं।

सबसे अहम बात यह कि अंग्रेज़ जब देश को भारतीयों के हवाले कर रहे थे, तब देश पर एक पाई भी क़र्ज़ नहीं है, आज हर भारतीय पर औसतन 45 हज़ार रुपए से ज़्यादा क़र्ज़ है। इसी तरह अंग्रेज़ों के समय भारतीय रुपया डॉलर के बराबर था, लेकिन आज एक डॉलर 64 रुपए के बराबर हो गया है। ऐसे हालात में ऐसे बहुत सारे लोग भी मिलेंगे, जो निःसंकोच कह देंगे कि इससे बेहतर को अंग्रेज़ों का शासन था। 

कहा जाता है कि अमेरिका में एक फ़ीसदी लोग शासन करते हैं। यानी महज एक फ़ीसदी लोगों ने डेमोक्रेसी को हाइजैक कर लिया है। भारत में इससे भी कम लोगों ने यह काम कर दिया है। जी हां, भारत में तो यह आधा या एक चौथाई फ़ीसदी नहीं है। लोकतंत्र के 66 साल में एक करोड़ या उससे ज़्यादा वार्षिक आमदनी वाले केवल 42,800 (बयालिस हज़ार आठ सौ) लोग हैं, जो कुल आबादी का 0.00354 फ़ीसदी है। यही लोग लोकतंत्र के लाभार्थी रहे हैं। इसमें दो राय नहीं कि भारत में लोकतंत्र 66 साल के सफ़र के दौरान इसे परिवारतंत्र में बदलने वाली कैंसर जैसी बीमारी लग गई है इस कैंसर जैसी बीमारी का इलाज केवल एक डॉक्टर कर सकता है और वह है भारतीय मतदाता।

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