बुधवार, 16 नवंबर 2016

बाल ठाकरे की कीर्ति हिंदुस्तान की सरहद के बाहर तक गई ( पुण्यतिथि पर विशेष)

हरिगोविंद विश्वकर्मा
शिवसेना के संस्थापक बालासाहेब ठाकरे भारत के उन चंद नेताओं में से रहे जिनकी न्यूज़वैल्यू अंतिम समय तक जस की जस रही। यही वजह से है कि उनकी कीर्ति हिंदुस्तान की सरहद के बाहर तक गई और क़द पाने वाले ठाकरे महाराष्ट्र के इकलौते नेता रहे। इसमें दो राय नहीं कि मराठी मानुस से  जैसा मान-सम्मान और प्यार बाल ठाकरे को मिला वह विरले ही राजनेताओं को मिल पाता है। शिवसेना का आम कार्यकर्ता ही नहीं, बल्कि मराठी समाज का एक बहुत बड़ा तबका आज भी ठाकरे को भगवान की तरह पूजता है। यही वजह है कि उनकी पुण्यतिथि पर शिवाजी पार्क में ठाकरे को श्रद्धा सुमन अर्पित करने वालों का तांता लग जाता है।

बहरहाल, देश भर में बालासाहेबके रूप में लोकप्रिय रहे ठाकरे देश के उन नेताओं में से रहे जिनका करिश्मा लोगों के सिर चढ़कर बोलता था। उनकी एक झलक पाने के लिए लोग लालायित रहते थे। उनकी सभाओं में अपार भीड़ जुटती थी। इसीलिए उनकी शुमार उन नेताओं में होती है, जिन्होंने केवल अपने ही दम पर एक राजनीतिक दल को खड़ा ही नहीं किया, बल्कि उसे सत्ता भी दिलवाई। लेकिन ख़ुद कभी कोई पद क़बूल नहीं किया। उनका यही त्याग उन्हें बाक़ी राजनेताओं से उन्हें अलग करता है।

महाराष्ट्र की सांस्कृतिक राजधानी पुणे में प्रोग्रेसिव ऐक्टिविस्ट प्रबोधनकार ठाकरे उर्फ केशव के घर 23 जनवरी 1926 को जन्मे ठाकरे बचपन से ही होनहार थे। पुणे की आबोहवा का असर उन पर जीवन भर रहा और वह पूरी तरह मराठी संस्कृति में रच-बस गए थे। उनकी वाणी में जादू ही नहीं, करिश्मा भी था जिसमें भीड़ खींचने का माद्दा होता था। उनके अंदर व्यंग्य कार्टूनिस्ट ने बचपन में ही जन्म ले लिया था। परंतु उसे सही फोरम 1950 के दशक में मिला जब कार्टूनिस्ट के रूप में उन्हें फ्रीप्रेस जर्नल में नौकरी मिल गई। उनके कार्टून इतने अपीलिंग थे कि टाइम्स ऑफ इंडिया भी संडे एडिशन में छापने लगा। इस प्रोत्साहन से प्रेरित होकर ठाकरे ने 1960 में कार्टून साप्ताहिक मार्मिक शुरू किया।

बाल ठाकरे का कारवां एक बार मंज़िल की ओर बढ़ा तो फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। मराठी समाज के हितों और अधिकारों की रक्षा के लिए उन्होंने 19 जून 1960 में शिवसेना की स्थापना की। शिवसेना का लक्ष्य शुरू में मराठीभाषियों को नौकरी दिलाना था, क्योंकि उन दिनों नौकरी में मराठी कम्युनिटी के लोग बाक़ी लोगों के मुक़ाबले पिछड़े थे। ऐसे में ठाकरे की पहल को अभूतपूर्व प्रतिसाद मिला। ख़ासकर मराठी युवाओं ने उन्हें सिर आंखों पर बिठा लिया। उन्होंने मुंबई ट्रेड यूनियनों में कम्युनिस्टों का एकाधिकार ही ख़त्म कर दिया। उसकी जगह शिवसेना की कामगार सेना ने ले ली। ये वह दौर था जब तत्कालीन मुख्यमंत्री वसंतराव नाईक खुलकर ठाकरे को प्रमोट कर रहे थे। इसीलिए ठाकरे के उदय में वसंतराव नाईक का बड़ा योगदान माना जाता है।

मराठी मानुस के लिए बहुत ज़्यादा डेडिकेटेड ठाकरे जीवन भर मराठी भाषा और संस्कृति के पैरोकर रहे। उनकी राह में जो भी आया, उससे उनका पंगा हो गया। चाहे वो साठ के दशक में गुजराती मारवाड़ी रहे हों या फिर सत्तर के दशक में दक्षिण भारतीय या फिर अस्सी-नब्बे के दशक में उत्तरप्रदेश और बिहार के लोग। यही वजह है कि अभी 2010 में जब क्रिकेटर सचिन तेंडुलकर ने मुंबई के बारे में ठाकरे की नीति के विपरीत कमेंट किया तो ठाकरे उन पर भी भड़क उठे। हालांकि तकनीकी तौर पर ठाकरे ने कभी किसी भी व्यक्ति या समुदाय का सीधे विरोध नहीं किया। वह तो बस मराठी समाज को उसका अधिकार देने की पैरवी करते रहे हैं सो उनकी विचारधारा से इत्तिफाक न रखने वालों से टकराव लाजिमी ही था।

छह दशक के पब्लिक लाइफ़ में ठाकरे हमेशा किसी न किसी विवाद में रहे। सबसे बड़ा विवाद उनकी हिंदुत्ववादी विचारधारा पर रहा। उनके अतिवादी हिंदुत्ववाद ने उन्हें कट्टर मुस्लिम विरोधी बना दिया। शिवसेना उन लोगों का विरोध करती थी, जिनकी आस्था, उनके अनुसार, भारत की बजाय पाकिस्तान में थी। वह मुंबई में अशांति के लिए बांग्लादेशियों को ज़िम्मेदार ही मानते थे। इसी लाइन पर चलते हुए ठाकरे ने 2002 में इस्लामी आतंकवाद का मुक़ाबला करने के लिए हिंदू आत्मघाती दस्ता बनाने की पैरवी। उनका बयान मीडिया की सुर्खियां में रहा। हिंदू संस्कृति के पैरोकार ठाकरे वेलेंटाइन डे को हिंदू सभ्यता के अनुकूल नहीं मानते थे। उनके भाषण के कारण निर्वाचन आयोग ने उनसे छह साल के लिए मतदान का अधिकार भी छीन लिया था।

हिटलर एवं इंदिरा गांधी के प्रशंसक और तमिल चीतों के समर्थक ठाकरे का यह करिश्मा ही था सत्तर के दशक तक छोटी पार्टी रही, शिवसेना अस्सी के दशक में सशक्त जनाधार वाली पार्टी बना गई। ठाकरे ने ऐलान किया कि विधान भवन पर भगवा ध्वज फहराकर रहेंगे। लक्ष्य हासिल करने के लिए 1987 में बीजेपी से गठबंधन किया। 1995 में शरद पवार और कांग्रेस से उब चुकी जनता ने भगवा गठबंधन पर भरोसा जताया। चुनावों में इस गठजोड़ ने कांग्रेस को धूल चटा दी और ठाकरे का सपना साकार हुआ। लेकिन जनता की उम्मीदों को पूरा करने के लिए जो टीम बनी, उसने ईमानदारी से काम नहीं किया और 1999 के चुनाव में पिछड़ गया। यानी अगली पीढ़ी के नेता ठाकरे की विरासत को संभाल नहीं पाए।

इस बात में दो राय नहीं रही कि ठाकरे का उत्तराधिकारी बनने में उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे की लड़ाई से सबसे ज़्यादा नुकसान शिवसेना को उठाना पड़ा। फ़िलाहाल उनकी विरासत उनके पुत्र उद्धव ठाकरे संभाल रहे हैं। बहरहाल, उद्धव-राज की लड़ाई के चलते शिवसेना भगवा ब्रिगेड में भाजपा के बाद नंबर दो की हैसियत वाली पार्टी बन गई। जहां बाल ठाकरे के दौर में सत्तारूढ़ भगवा गठबंधन में शिवसेना सरकार का नेतृत्व कर रही थी और उसने राज्य को मनोहर जोशी और नारायण राणे (अब कांग्रेस में) के रूप में दो चीफ़ मिनिस्टर दिए, वहीं ठाकरे के बाद बीजेपी ने शिवसेना को दूसरे नंबर पर ढकेलते हुए सरकार की कमान अपने हाथ में ले ली।

सन् 2014 के विधान सभा चुनाव में शिवसेना बीजेपी का क़रीब तीन दशक पुराना गठबंधन ही टूट गया और दोनों दल एक दूसरे के सामने आ गए। बहरहाल, चुनाव में एक बार तो 288 सीटों वाली विधानसभा में अपने ही दम पर सरकार बनाती दिखने लगी, लेकिन 22 सीट कम रह गए। बीजेपी ने 27.8 फ़ीसदी वोट हासिल किया और उसके 122 विधायक जीते। दूसरी ओर शिवसेना महज 19.3 फ़ीसदी वोट हासिल कर पाई और 63 सीटों के साथ उसकी स्थिति कमोबेश 2009 के चुनाव जैसी ही रही।

चुनाव प्रचार के दौरान शिवसेना और बीजेपी में इतनी कटुता आ गई कि एक लगा कि दोनों का फिर से गठबंधन असंभव है। उद्धव ठाकरे और उनके सिपहसालारों ने तो चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी के ख़िलाफ़ बहुत तल्ख भाषण दिया। बहरहाल, उद्धव को अपनी पार्टी में बग़ावत को रोकने के लिए बहुत मजबूरी में बीजेपी के साथ पोस्ट-इलेक्शन गठबंधन करना पड़ा। उद्धव ने बीजेपी के देवेंद्र फड़नवीस को मुख्यमंत्री के रूप में स्वीकार तो कर लिया, लेकिन हार की पीड़ा अब तक जज्ब नहीं कर पाए हैं। यही वजह है कि सरकार में रहने के बावजूद उद्धव का व्यवहार विपक्षी नेता जैसा होता है। शिवसेना के मुखपत्र सामना के जरिए वह अब भी बीजेपी और केंद्र सरकार पर हमला करते रहते हैं।

यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 500 और 1000 रुपए के नोट को बंद करने के फ़ैसले पर भी शिवसेना सरकार में रहकर भी विपक्षी दलों के साथ खड़ी नज़र आ रही है। राजनीतिक हलकों में माना जाता है कि अगर ठाकरे जीवित होते तो यह तल्खी इतनी न बढ़ती। वैसे ठाकरे की राजनीतिक विरासत संभाल रहे हैं उद्धव का पहले अपने चचेरे भाई राज ठाकरे से ही सबसे ज़्यादा ख़तरा था, क्योंकि शिवसेना कार्यकर्ता राज ठाकरे में बाल ठाकरे की छवि और स्टाइल देखते थे। यही वजह है कि जब राज ठाकरे ने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का गठन किया तो एक बार मराठी मुद्दे पर उद्धव को ओवरटेक करने लगे थे।

यही वजह है कि ठाकरे के ज़िंदा रहते ही एमएनएस राज्य में बड़ी ताक़तवर पार्टी बनकर उभरी और 2009 के विधान सभा चुनाव में उसके 13 विधायक चुने गए। 2009 के चुनाव के बाद एक बार तो ऐसा लगा कि राज ठाकरे शिवसेना को ही ख़त्म कर देंगे, क्योंकि बड़ी संख्या में शिवसेना कार्यकर्ता एमएनएस में शामिल होने लगे थे। राज ठाकरे की अपरिपक्व और बचकानी राजनीति के चलते उद्धव ठाकरे को शिवसेना की विचारधारा में राज ठाकरे से एक तरह से वॉकओवर मिल गया। 2014 के चुनाव में तो मराठीवाद का नारा देने वाले राज को मराठी जनता ने अस्वीकार कर दिया और पार्टी महज खाता ही खुल पाया वह भी दूसरे दल से आए नेता ने जीत दर्ज करके एमएनएस के सूपड़ा साफ़ होने से बचाया। अब राज ठाकरे उद्धव ठाकरे के लिए दूर-दूर तक कोई चुनौती ही नहीं रह गए।



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