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गुरुवार, 10 मार्च 2016

विजय माल्या विदेश भागे, अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत

हरिगोविंद विश्वकर्मा
हिंदी में एक कहावत हैः अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत. बैंकों से क़र्ज़ लेकर ऐय्याशी करने वाले राज्यसभा सदस्य विजय माल्या के विदेश भागने के बाद नरेंद्र मादी सरकार के हाथ-पांव मारने की हरकत पर यह कहावत सटीक बैठती है। दरअसल, जब माल्या देश में थे, तब उनका पॉसपोर्ट ज़ब्त करने की बजाय उन्हें खुली आज़ादी दी गई। अब बैंकों का 9000 करोड़ रुपए डुबोकर माल्या विदेश भाग गए, तब उनका पॉसपोर्ट रद करने और देश में लाने की बात की जा रही है।

मुद्दा यह है कि विजय माल्या को पहले कांग्रेस और अब बीजेपी रिजिम में खूब छूट मिली। मसलन, वह दो साल पहले डिफॉल्टर घोषित किए जा चुके हैं. इसके बावजूद उनकी ऐय्याशी वाली लाइफस्टाइल जस की तस रही। अभी पिछले 18 दिसंबर को अपने 60वें जन्म दिन पर माल्या ने गोवा में तीन दिन तक इतनी ऐय्याशी की कि रिज़र्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन को कहना पड़ा कि किसी डिफॉल्टर व्यक्ति को जन्मदिन पर इतनी दौलत नहीं ख़र्च करनी चाहिए।

आरबीआई गवर्नर ने इशारों-इशारों में कहा था कि देश में आम आदमी को महंगा क़र्ज़ ऐसी आलीशान बर्थडे पार्टियों के चलते ही मिल रहा है। जब रिजर्व बैंक का गवर्नर ऐसा कहे कि बैंकों का उधार न लौटा पाने वाले बड़े डिफॉल्टरों को पैसे की नुमाइश कर ऐसी ऐय्याशी के साथ जन्मदिन मनाने से गलत संदेश जा रहा है तो उसी समय उस आदमी पर शिकंजा कसना ही चाहिए था।

अभी कोई दस दिन पहले डियाजियो से 515 करोड़ रुपए की डील करने और अपनी कंपनी के चेयरमैनशिप से इस्तीफा देने के बाद भी माल्या ने कहा था कि वह लंदन में बसना चाहते हैं, ताकि वह अपने बच्चों के और करीब रह सकें। तब पूरे देश को लगा कि माल्या बैंकों का पैसा डुबोकर भागेंगे, लेकिन उन्हें रोकने वाली तमाम एजेंसियां हाथ पर हाथ धरे बैठी रहीं।

बुधवार को ख़बर आई कि माल्या आख़िरकार विदेश भाग ही गए। भारत के अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि माल्या फ़िलहाल देश मे नहीं है. वह कहां है, किसी को कुछ नहीं पता। हालांकि कहा जा रहा है कि वह लंदन में है, क्योंकि वह पहले ही कह चुके हैं कि वह लंदन में शिफ़्ट होना चाहते हैं।

कई लोगों का मानना है कि केंद्र सरकार की बड़े लोगों के प्रति उदार नीति के कारण माल्या को पहले गिरफ़्तार नहीं किया गया। लोग हैरानी जता रहे हैं कि इतने बड़े डिफॉल्टर का एहतियात के तौर पर पासपोर्ट क्यों ज़ब्त नहीं किया गया। बहरहाल, किंगफिशर एयरलाइंस को क़र्ज़ देने वाली 17 बैकों की अगुवाई कर रहे भारतीय स्टेट बैंक ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा तब खटखटाया जब बहुत देर हो चुकी थी। एसबीआई ने सरकार से अपील की थी कि माल्या को गिरफ्तार किया जाए, ताकि वह बैंकों का 9000 करोड़ रुपए डुबोकर विदेश न भाग सके। लेकिन नरेंद्र मोदी की सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी रही और माल्या चुपचाप निकल लिया।

अब माल्या को क़र्ज़ देने वाली सभी 17 बैंकों से भी यह पूछा जाना चाहिए कि माल्या समेत बैड लोन वाले क़र्ज़ को देने वाले बैंक अधिकारियों के ख़िलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हुई। गौरतलब है कि उद्योंगपतियों से सांठगांठ करके शीर्ष बैंक अफसर करोड़ों रुपए के क़र्ज़ बांटते हैं और उससे मिले नज़राने से ऐश करते हैं। क़र्ज़ मंजूर करने वाले ढेर सारे बैंक अधिकारी रिटायर होने के बाद विदेश शिफ्ट हो जाते हैं और ऐश करते हैं। ऐसे अफसरों को भी जांच के दायरे में लाने की ज़रूरत है। बैड लोन बांटने वाले बैंक अफसरों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं होती, इसलिए विजय माल्या जैसे लोग बैंकों को चूना लगाते हैं।  

हम आम जीवन में देखते हैं कि कोई आदमी महज़ 5-10 हज़ार रुपए का क़र्ज़ नहीं चुका पाए तो उसे बैंकें या तो पकड़ ले जाती हैं या फिर उसके घर बॉउंसर भेज देती हैं. लेकिन माल्या जैसे धन्नासेठों के साथ रियायत करती हैं। माल्या समेत उद्योगपतियों और बिल्डरों द्वारा लिया गया क़रीब पांच लाख करोड़ रुपए का लोन लिया बैड लोन घोषित किया जा चुका है।

इससे दो जून की रोटी जुटाने के लिए एड़ी-चोटी का पसीना बहाने वाले लोगों को लगता है कि इस देश में क़ायदे का जीवन केवल विजय माल्या जैसे मुट्ठीभर लोग जीते हैं, बाक़ी तो पेट भरने के लिए भी स्ट्रगल करते हैं। देशवासियों को यह भी लग रहा है कि बीजेपी हो, कांग्रेस हो, वामदल हों, आप हो, या सपा-राजद या ममता की पार्टी हो, सभी उद्योगपतियों के हित में काम करती हैं। बहरहाल, माल्या एपिसोड के बाद उम्मीद की जानी चाहिए कि बैंकें बड़े लोगों को क़र्ज़ बांटने की अपनी नीति में बदलाव करेंगी और प्रवर्तन निदेशालय बैंक अफसरों के आय के स्रोतों और आय की मिलान करके कार्रवाई करेगा।

जैसी कि उम्मीद थी विजय माल्या के विदेश भागने का मामला बृहस्पतिवार को संसद के दोनों सदनों में ज़ोरदार तरीक़े से उठा। राज्यसभा में कांग्रेस के ग़ुलाम नबीं आज़ाद के सवाल पर वित्तमंत्री अरुण जेटली कहा कि माल्या से एक-एक पाई वसूली जाएगी। अब कितना वसूली करेंगे, यह तो वक्त ही बताएगा। यह यह बताना ज़रूरी है कि ललित मोदी को लंदन भागे कितने साल हो गए, उसे स्वदेश लाकर मुक़दमा चलाना तो दूर बीजेपी के नेता वहां जाकर उससे मिलते रहे हैं। ऐसे में विजय माल्या के ख़िलाफ़ कार्रवाई होगी इस पर भारी संदेह है।

मंगलवार, 8 मार्च 2016

महिलाओं की हर समस्या का एक ही हल, हर जगह उन्हें 50 फ़ीसदी प्रतिनिधित्व

हरिगोविंद विश्वकर्मा
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाकर महिलाओं को ख़ुश करने की कोशिश की जा रही है। दरअसल, जो हो रहा है, वह मुद्दे से ध्यान हटाने की कवायद है। यह वैसी ही प्रैक्टिस है जैसे, कभी राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री तो कभी लोकसभा अध्यक्ष पद पर किसी महिला को बिठाकर मान लेना कि नारी सशक्तिकरण यानी वूमैन इम्पॉवरमेंट हो गया। दरअसल, जो लोग धूमधाम से महिला दिवस मनाते हैं, उनमें ज़्यादातर लोग महिलाओं का हक़ मारते हैं। चूंकि महिलाओं का हक़ मारना यानी उनके साथ पक्षपात एक सामाजिक अपराध है, लिहाज़ा, उसी सामाजिक अपराध का प्रायश्चित करने के लिए ही पुरुष प्रधान-समाज महिला दिवस मनाता है।

सवाल उठता है कि क्या सचमुच समाज के पैरोकार महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने के पक्षधर हैं, क्या सचमुच महिलाओं का उत्थान चाहते हैं। अगर हां, तो वे सभी प्रावधान किए जाएं जो सही मायने में स्त्री को बराबरी के मुकाम तक पहुंचाते हैं। इस क्रम में सबसे ज़रूरी है कि पहले असली समस्या को जानने की कोशिश करनी चाहिए क्योंकि, किसी को पता ही नहीं कि असली समस्या क्या है। ज़ाहिर है मर्ज़ के नेचर का पता नहीं चलेगा तो दवा अंदाज़ से दी जाएगी, जिससे ठीक होने की बजाय कभी-कभार मरीज़ की मौत तक हो जाती है।

अगर नेशनल क्राइम ब्यूरो के डेटा देश में नया पर गौर करें तो नया रेप क़ानून के अस्तित्व में आने के बाद रेप की घटनाएं ज्यादा तेजी से बढ़ी हैं। सन् 2009, 2010, 2011 और 2012 में रेप के मामले क्रमशः 21,397, 22172, 24206 और 24923  तो 2013 में नया कानून बनने के बाद रेप के मामले ऊछलकर सन् 2013, 2014, 2015 और 2016 में 33707, 34098, 36,735 और 38,947 हो गया। इसका अर्थ है डर्टी सोचवाले क़ानून से नहीं डरते। क़ानून कठोरतम यानी रेपिस्ट को पब्लिकली ज़िंदा जलाने का भी बना दिया जाए। तब भी वे महिलाओं पर ज़ुल्म जारी रखेंगे। यानी रेप समेत महिलाओं पर होने वाले ज़ुल्म क़ानून कठोर करके नहीं रोके जा सकते। दरअसल, समाज ही असंतुलित और पुरुष-प्रधान यानी मेल-डॉमिनेटेड है और ऐसे समाज में रेप नहीं रोका जा सकता, क्योंकि अपनी जटिलताओं के चलते यह समाज महिलाओं को अल्पसंख्यक बनाता है।

कठोर रेप लॉ के बावजूद बढ़ती रेप की वारदातें साबित करती हैं कि क़ानून-निर्माता अब भी मूल समस्या समझ पाने में नाकाम हैं। या तो उनकी सोच वहां तक पहुंच नहीं रही है कि समस्या आइडेंटीफाई कर उसे हल करें या फिर वे इतने शातिर हैं कि समस्या हल ही नहीं करना चाहते। यह भावना मे बहकर अनाप-शनाप बयान देने का वक़्त नहीं, बल्कि पता करने का वक़्त है कि रेप जैसे क्राइम रोके कैसे जाएं। रेपिस्ट को दंड देने की बात तो बाद में आती है। अगर ऐसे प्रावधान हो जाएं कि रेप जैसे अपराध हो ही न, तो दंड पर ज़्यादा दिमाग़ खपाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। सवाल उठता है कि आख़िर रेप जैसे जघन्य अपराध हो ही क्यों रहे हैं। आख़िर क्यों औरत को अकेले या एकांत में देखकर चंद पुरुष अपना विवेक, जो सही मायने में उन्हें इंसान बनाता है, खो देते हैं और हैवान का रूप धारण कर लेते हैं? एक स्त्री जो हर किसी के लिए आदरणीय होनी चाहिए, माता-बहन के समान होनी चाहिए, आख़िर क्यों अविवेकी लोगों के लिए महज ‘भोग की वस्तु” बन जाती है?

दरअसल, महिलाओं की बहुत कम संख्या देखकर पुरुष उन्हें कमज़ोर मान लेते हैं और मनमानी करने का दुस्साहस करने लगते हैं। महिलाओं पर होने वाले हर ज़ुल्म के लिए समाज का मैल-डॉमिनेटेड ताना-बाना ही ज़िम्मेदार है। ऐसे समाज में स्त्री पुरुष की बराबरी कर ही नहीं सकती, क्योंकि यह सेटअप स्त्री को सेकेंड सेक्स का दर्जा देता है। सभ्यता के विकास के बाद जब से मौजूदा समाज प्रचलन में आया, तब से स्त्री दोयम दर्जे की ही नागरिक रही। बॉलीवुड अभिनेत्रियों या शहरों की लड़कियों को जींस-टीशर्ट या स्कर्ट में देखकर कुछ क्षण के लिए ख़ुश हुआ जा सकता है कि महिलाएं पुरुषों की बराबरी कर रही हैं लेकिन सच यह है कि स्त्री कभी पुरुष की बराबरी कर ही नहीं पाई। यह सच स्त्रियों से बेहतर कौन समझ सकता है।

दरअसल, पुरुष-प्रधान मानसिकता ही स्त्री को बराबरी का दर्जा देने भी नहीं देती। लिहाजा, ज़रूरत उन प्रावधानों पर अमल करने की है जो सही मायने में स्त्री को बराबरी के मुकाम तक लाते हैं। इसके लिए शुरुआत घर से करनी होगी। क्या लोग अपने घर में स्त्री या लड़कियों को बराबरी का दर्जा देते हैं? क्या घर में बेटे-बेटी में फ़र्क़ नहीं करते? विकसित परिवारों में स्त्री के साथ खुला पक्षपात होता है, उसे एहसास दिलाया जाता है कि दोयम दर्जे की नागरिक है। ऐसे में पिछड़े और दूर-दराज़ के समाज में स्त्री की क्या पोज़िशन होती होगी, सहज समझा जा सकता है।

पुरुष-प्रधान संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 फ़ीसदी आरक्षण मिलेगा, अब इसकी संभावना नहीं के बराबर है। महिला आरक्षण तो किसी भी सरकार के एजेंडा में ही नहीं था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अपवाद नहीं हैं। ऐसे में जो नेता रेप पर आंसू बहाते हैं, वे लोगों को बेवकूफ़ बनाते हैं। इनकी स्त्रियों को बराबरी का दर्जा देने में दिलचस्पी ही नहीं। अगर लोग सचमुच महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने के हिमायती हैं तो सबसे पहले राजनीतिक दलों के अलावा केंद्र और राज्य सरकार में 50 फ़ीसदी पद महिलाओं को दें। यानी देश की हर सरकार में महिला-मंत्रियों की तादाद पुरुष-मंत्रियों के बराबर हो। विधायिका में 33 फ़ीसदी नहीं बल्कि 50 फ़ीसदी जगह महिलाओं के लिए सुनिश्चित हो। महिलाओं की आबादी फ़िफ़्टी परसेंट है तो विधायिका में आरक्षण 33 फ़ीसदी क्यों? संसद में 790 सदस्यों (लोकसभा-545 और राज्यसभा-245) में से किसी भी सूरत में 395 सदस्य महिलाएं होनी ही चाहिए।

एक बात और, महिला आरक्षण का लाभ केवल गांधी, पवार, बादल, पटनायक, या मुलायम जैसे राजनीतिक परिवारों की महिलाएं या लड़कियां ही हाईजैक न कर लें, जैसा कि होता रहा है। पॉलिटिकल फैमिलीज़ की महिलाएं अपने पति, पिता, ससुर या बेटे की पुरुष प्रधान सोच को ही रिप्रज़ेंट करती हैं। लिहाज़ा, महिला रिज़र्वेशन का लाभ आर्थिक-सामाजिक रूप से पिछड़े यानी ग़रीब,  देहाती, आदिवासी,  दलित, पिछड़े वर्ग और मुस्लिम जमात की महिलाओं को भी मिले, यह भी सुनिश्चित होना चाहिए। इसके अलावा मेन स्ट्रीम से ग़ायब उच्च जाति की महिलाओं को भी मौक़ा मिले। विधायिका ही नहीं, न्यायपालिका में आधे जज और आधी एडवोकेट महिलाएं होनी चाहिए। फ़िलहाल सुप्रीम कोर्ट में 25 जज हैं, उनमें केवल एक ही महिला हैं। यही वजह है कि दिल्ली गैंगरेप का मुक़दमा सुप्रीम कोर्ट में तीन साल से लंबित है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या 400 की जानी चाहिए, उनमें 200 जज महिलाएं हों। इसी तरह हाईकोर्ट और निचली अदालतों में जजों की संख्या सीधे 16 गुना बढ़ा देनी चाहिए और महिला-पुरुष जजों की संख्या बराबर होनी चाहिए।

विधायिका और न्यायपालिका के बाद नंबर आता है ब्यूरोक्रेसी का। इसमें भी हर साल छात्र-छात्राओं को चयन बराबर संख्या में होनी चाहिए। पुलिस तंत्र में महिला-पुरुष की संख्या बराबर की जानी चाहिए। कल्पना कीजिए, किसी पुलिस स्टेशन में जाते हैं और वहां जितने पुरुष हैं, उतनी ही महिलाएं भी तो आपका डर, ख़ासकर महिलाओं का डर ख़त्म हो जाएगा। इसी तरह आर्मफोर्स, बैंक, मीडिया संस्थानों और धार्मिक संस्थानों में आधी स्ट्रेंथ महिलाओं की होनी ही चाहिए। सरकारी व निजी संस्थानों, स्कूल-कॉलेज और यूनिवर्सिटीज़ में 50 प्रतिशत पोस्ट महिलाओं को दी जानी चाहिए। आख़िर महिला घर में क्यों बैठें? वे काम पर क्यों न जाएं? यदि 50 फ़ीसदी महिलाएं काम पर जाएंगी तो घर के बाहर उनकी विज़िबिलिटी पुरुषों के बराबर होगी। यानी हर जगह जितने पुरुष दिखेंगे उतनी ही महिलाएं भी। इससे महिलाओं का मोरॉल बुस्टअप करेगा।

जब गली, सड़क, बस, ट्रेन, प्लेन, दफ़्तर, थाने, कोर्ट और स्कूल-कॉलेज यानी हर जगह में महिलाओं की संख्या और मौजूदगी पुरुषों के बराबर होगी तो पुरुष की ज़ुर्रत नहीं कि महिला को बुरी नज़र से देखे। वस्तुतः महिलाओं की कम संख्या ही लंपट पुरुषों को प्रोत्साहित करती हैं। सो महिलाओं को अबला या कमज़ोर होने से बचाना है तो उन्हें इम्पॉवर करना एकमात्र विकल्प है। जिस दिन केंद्र और राज्य सरकार, लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा, न्यापालिका, कार्यपालिका और पुलिस तंत्र में पुरुष-वर्चस्व ख़त्म हो जाएगा और महिलाएं बराबर की संख्या में मौजूद रहेंगी, उस दिन हालात एकदम बदल जाएंगे।

नतीजा यह होगा कि जब लड़कियों को लड़कों की तरह सरकारी और प्राइवेट नौकरी मिलने लगेगी तो उनमें सेल्फ़-रिस्पेक्ट पैदा होगा। वे अपने को “पराश्रित” और “वस्तु” समझने की मानसिकता से बाहर निकलेंगी। वे पति या पिता रूपी पुरुष पर निर्भर नहीं रहेंगी, बल्कि स्वावलंबी होंगी। तब वे माता-पिता पर बोझ नहीं होंगी। तब प्रेगनेंसी के दौरान सेक्स-डिटरमिनेशन टेस्ट की परंपरा ख़त्म हो जाएगी। घर में लड़की के जन्म पर उसी तरह ख़ुशी मनाई जाएगी जैसे पुत्र के आगमन पर। लोग केवल पुत्र की कामना नहीं करेंगे, बल्कि लड़की की भी कामना करेंगे। यक़ीन मानिए, तब 1000 लड़कों के मुक़ाबले 1000 लड़कियां पैदा होंगी। समाज संतुलित और ख़ुशहाल होगा। जहां हर काम स्त्री-पुरुष दोनों कर सकेंगे।

मगर यक्ष-प्रश्न यह है कि क्या नारी को अबला और वस्तु मानने वाला पुरुष-प्रधान समाज अपनी सत्ता महिलाओं को सौंपने के लिए तैयार होगा? इस राह में पक्षपाती परंपराएं और संस्कृति सबसे बड़ी बाधा हैं जिनमें आमूल-चूल बदलाव की जानी चाहिए। यानी ‘ढोल, गंवार शूद्र पशु नारी, ये सब ताड़न के अधिकारी’ चौपाई रचने वाले तुलसीदास जैसे पुरुष मानसिकता वाले कवियों को ख़ारिज़ करना पड़ेगा। ‘रामचरित मानस‘ को संशोधित करना होगा, जहां पत्नी की अग्निपरीक्षा लेने और गर्भावस्था में उसे घर से निकाल देने वाले पति को ‘मर्यादा पुरुषोत्तम राम’ माना गया है। ‘महाभारत‘ और व्यास की सोच भी सुधारनी होगी, जो पत्नी को दांव पर लगाने वाले जुआड़ी पति युधिष्ठिर को ‘धर्मराज’ मानती है। उन सभी परंपराओं और ग्रंथो में संशोधित करना होगा, जहां पुरुष को ‘पति-परमेश्वर’ और स्त्री को ‘चरणों की दासी’ माना गया है। इतना ही नहीं उन त्यौहारों में बदलाव करना होगा, जिसमें पुरुष की सलामती के लिए केवल स्त्री व्रत रखती है। स्त्री की सलामती के लिए पुरुष व्रत नहीं रखता। स्त्री को घूंघट या बुरक़ा पहनने को बाध्य करने वाली नारकीय परंपराओं भी छोड़ना होगा। इतना ही नहीं लड़कियों को पिता की संपत्ति में बराबर की हिस्सेदारी सुनिश्चित करनी होगी और उस पर सख़्ती से अमल करना होगा। सवाल खड़ा होता है, क्या यह पुरुष-प्रधान समाज इसके लिए तैयार होगा?

वस्तुतः समाज में महिलाओं की बहुत कम विज़िबिलिटी ही सबसे बड़ी समस्या या प्रॉब्लम है। घर के बाहर महिलाएं दिखती ही नहीं, दिखती भी हैं तो नाममात्र तादाद में। सड़कों, रेलवे स्टेशनों और दफ़्तरों में उनकी प्रज़ेंस बहुत कम होती है। मुंबई और दिल्ली जैसे डेवलप्ड सिटीज़ में भी महिलाओं की विज़िबिलिटी दस-पंद्रह फ़ीसदी से ज़्यादा नहीं है। देश के बाक़ी हिस्सों में तो हालत भयावह है। चूंकि महिलाओं की आबादी 50 फ़ीसदी है तो हर जगह उनकी मौजूदगी भी 50 फ़ीसदी होनी चाहिए। अगर विज़िबिलिटी की इस समस्या को हल कर लिया गया यानी महिलाओं की प्रज़ेंस 50 फ़ीसदी कर ली गई तो महिलाओं की ही नहीं, बल्कि मानव समाज की 99 फ़ीसदी समस्याएं ख़ुद-ब-ख़ुद हल हो जाएंगी। इसके बाद महिला दिवस मनाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। महिलाएं बिना किसी क़ानून के सही-सलामत और महफ़ूज़ रहेंगी।
(समाप्त)

सोमवार, 7 मार्च 2016

महिला आरक्षण विधेयक को भूल गए पुरुष-प्रधान समाज के नेता

हरिगोविंद विश्वकर्मा
क्या आपको याद है? कभी देश के लोग नारी सशक्तीकरण के प्रतीक महिला आरक्षण विधेयक की बात किया करते थे। उस बिल में संसद और राज्य विधान मंडलों में महिलाओं को 33 फ़ीसदी रिज़र्वेशन का प्रावधान था। अब उसकी चर्चा कोई नहीं करता। महिला आरक्षण बिल कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की विशेष पहल राज्यसभा में भारी शोर-शराबे, विरोध और निलंबन के बीच आनन-फानन नौ मार्च 2010 को पारित किया था। संसदीय इतिहास में वह दिन ऐतिहासिक दिन माना गया था। दूसरे दिन सभी अख़बारों की लीड स्टोरी वही थी। लोगों ने पहली बार सुषमा स्वराज, वृंदा करात और नज़मा हेपतुल्ला को एक मंच से लोगों का अभिवादन करते देखा था। माना गया था कि 2014 के आम चुनाव के बाद लोकसभा में एक तिहाई महिलाएं नज़र आएंगी। लेकिन ऐसा हो न सका, क्योंकि वह बिल अंततः पंद्रहवीं लोकसभा में अटक गया।

2014 की गर्मियों में उस लोकसभा का कार्यकाल ख़त्म होते ही बिल ने भी दम तोड़ दिया। संविधान के अनुच्छेद 107 (5) के तहत विचाराधीन रहने वाले बिल लोकसभा भंग होते ही ख़त्म हो जाते हैं। महिला आरक्षण विधेयक के मुखर विरोधी समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल के ज़्यादा सदस्य मौजूदा  लोकसभा में नहीं हैं। ऐसे बिल को क़ानून का रूप देने का यह सबसे अनुकूल समय था, पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को महिलाओं को संसद और विधान मडलों में प्रतिनिधित्व देने के बारे में सोचने की फ़ुर्सत ही नहीं। इसीलिए उनके 22 महीने के कार्यकाल में संसद के कई अधिवेशन हुए, लेकिन महिला रिज़र्वेशन बिल पेश करना तो दूर उसकी आहट तक नहीं है। दरअसल, यह बिल मोदी के एजेंडा में ही नहीं है।
दरअसल, पंद्रहवीं लोकसभा के पहले संयुक्त अधिवेशन मे चार जून 2009 को तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने घोषणा की थी कि सरकार महिला आरक्षण विधेयक 100 दिन के अंदर पारित करवाएगी, क्योंकि महिलाओ को कई कारण अवसरों से वंचित रहना पड़ता है। उस साल लोकल बॉडीज़ में महिला रिप्रज़ेंटेशन 50 फ़ीसदी कर दिया गया था। मुमकिन है, इस साल भी महिला दिवस मनाते हुए चंद लोग अफसोस जताएं कि आज़ादी के क़रीब दशक बाद भी महिलाओं को समुचित रिप्रजेंटेशन नहीं दिया जा सका, लेकिन पर्व के बीतते ही सब लोग फिर से भूल जाएंगे कि कभी महिलाओं को संसद और विधान सभाओं में प्रतिनिधित्व देने की बात होती थी।

यह विडंबना है कि महिला आरक्षण का ज्वलंत मुद्दा पिछले दो दशक से लंबित है। देश मे आधी आबादी पिछले दो दशक से अपना प्रतिनिधित्व बढाने की मांग कर रही हैं लेकिन पुरूष प्रधान राजनीति संसद में बिल पारित नहीं होने दे रही। हालांकि क़रीब हर राजनीतिक दल अपने मैनिफेस्टो में महिलाओं को रिज़रवेशन देने का वादा करता है। इस बार यानी 16 लोकसभा में 61 महिलाएं हैं। जबकि पिछली बार 58 महिलाएं लोकसभा में पहुंची थी। वैसे पिछली लोकसभा कई मायनों में अलग थी। पहली बार संसद में इतनी ज़्यादा महिला सांसद चुनी गईं थीं और सबसे बढ़कर भारतीय लोकतंत्र में पहली बार मीरा कुमार के रूप में महिला लोकसभा स्पीकर मिली थीं।

अगर महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने के इतिहास में जाएं तो महिलाओं के राजनीतिक सशक्तीकरण के लिए उन्हें रिज़र्वेशन देने का कॉन्सेप्ट राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में आया था। राजीव ने सत्ता का विकेंद्रीकरण करते हुए पंचायतों और लोकल बॉडीज़ को अधिकार देने और उसमें महिलाओं के लिए जगह सुरक्षित करने की बात की थी। पंचायतों और लोकल बॉडीज़ में महिलाओं को आरक्षण 73वें और 74वें संविधान संशोधन के ज़रिए 1993 में शुरू किया गया। उसी समय संसद और विधान मंडलों में महिलाओं की संख्या बढ़ाने की रूपरेखा बनी थी। हालांकि राजीव सरकार के घोटाले में फंस जाने से वह प्रयास फलीभूत नहीं हुआ।

दरअसल, महिला रिज़र्वेशन बिल का संसदीय सफर सितंबर 1996 से शुरू हुआ। जब संयुक्त मोर्चा सरकार ने बिल लोकसभा में पेश किया। उस समय भी निचले सदन में ज़बरदस्त हंगामा हुआ और मंत्री के हाथ से बिल छीन लिया गया।  जब बिल पास नहीं हुआ तो उसे संयुक्त संसदीय समिति के पास भेज दिया गया। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की नेता गीता मुखर्जी की अगुवाई वाली समिति ने नवंबर 1996 में पेश अपनी रिपोर्ट में सात संशोधन सुझाए थे। (1) रिज़र्वेशन की अवधि 15 साल, (2) ऐंग्लो-इंडियन के लिए सब-रिज़र्वेशन, (3) तीन लोकसभा सीटों से कम वाले राज्यों में भी आरक्षण, (4) दिल्ली विधान सभा में भी आरक्षण, (5) ‘एक तिहाई से कम नहीं’ की जगह ‘क़रीब एक तिहाई’ व्यवस्था (6) ओबीसी महिलाओं के लिए सब-रिज़र्वेशन और (7) राज्यसभा और राज्य विधान परिषदों में भी आरक्षण।

संशोधित महिला आरक्षण बिल 1997 फिर पेश किया गया, लेकिन तीन यादवों (मुलायम, लालू और शरद) ने उसे पास ही नहीं होने दिया। शरद यादव महिला बिल के कट्टर विरोधी निकले। वह महिलाओं को महिलाओं के प्रतिनिधि के क़ाबिल ही नहीं मानते। 1997 में एक बार उन्होंने कहा था, “आपको क्या लगता है, छोटे बाल वाली महिलाएं हमारी महिलाओं के बारे में बोल पाएंगी ?” बहराल, अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने 1998 और 1999 में भी बिल पेश किया गया लेकिन विपक्ष ख़ासकर सपा और राजद के विरोध के कारण पास नहीं किया जा सका।

बहरहाल, वाम दलों और कांग्रेस के लिखित आश्वासन के बाद एनडीए सरकार ने 2002 में एक बार और 2003 में दो बार बिल पेश किया, लेकिन बहुमत होने के बावजूद बिल पास नहीं करवाया जा सका। कहते हैं अटल सरकार ने बिल पास करवाने की कोशिश ही नहीं की। इसके बाद सत्ता में आई मनमोहन सिंह सरकार ने अपने कॉमन मिनिमम प्रोग्राम में महिला आरक्षण बिल को शामिल किया, लेकिन बिल पास नहीं हो सका। आम सहमति न बन पाने को कारण बताकर महिला विधेयक को एक प्रकार से ठंडे बस्ते में डाल दिया गया और कांग्रेस ने चार साल बाद 2008 मे फिर कोशिश की। गीता मुखर्जी समिति की पहली पांच सिफारिशों को संशोधित बिल में शामिल कर लिया गया और अंतिम दो को छोड़ दिया गया।

छह मई 2008 को विधेयक पेश करते समय लोकसभा में अजीब हालात पैदा हो गए। बिल पेश कर रहे तत्कालीन मंत्री हंसराज भारद्वाज से समाजवादी पार्टी के लोग बिल छीन न लें, इसके लिए उन्हें दो कांग्रेस महिला सांसदों कुमारी शैलजा और अंबिका सोनी के बाच बैठना पड़ा। जयंती नटराजन और अलका क्षत्रिय भारद्वाज भी उनकी रक्षा कर रही थीं। इसके बावजूद भारद्वाज के बिल पेश करने की कोशिश करते समय समाजवादी पार्टी सांसद अबु आसिम आज़मी ने बिल की कॉपी छीनने की कोशिश की, तो केंद्रीय रेणुका चौधरी ने उन्हें धक्का दे दिया था।

बहरहाल, 2008 में बिल के लोकसभा में पास न होने पर इसे संसदी की स्थाई समिति के पास भेज दिया, लेकिन स्थाई समिति में बिल पर आम राय नहीं बन पाई। समाजवादी पार्टी के सदस्य वीरेंद्र भाटिया और शेलेंद्र कुमार ने कहा कि वे महिलाओं को आरक्षण देने के ख़िलाफ नहीं हैं, लेकिन विधेयक का मौजूदा स्वरूप उन्हें स्वीकार्य नहीं। उन्होंने कहा कि मौजूदा समय में महिलाओं को 20 फ़ीसदी से ज़्यादा आरक्षण नहीं दिया जाना चाहिए। इसके अलावा पिछड़े वर्ग और अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए भी कोटा होना चाहिए।

कई कार्यकर्ताओं का मानना है कि पुरुष प्रधान राजनीतिक दल, संसद और विधान सभाएं महिलाओं को आरक्षण दिए जाने के पक्ष में नहीं हैं। महिला आरक्षण बिल पर सभी राजनीतिक दलों की सोच एक जैसी ही है। दो मुख्य दलों बीजेपी और कांग्रेस हमेशा दोहरा मापदंड अपनाया। इसलिए महिलाएं समुचित प्रतिनिधित्व से वंचित हैं। महिला ऐक्टिविस्ट मधु किश्वर कहती हैं कि अगर बिना ठोस प्रवाधान के महिला आरक्षण लागू किया गया तो लाभ मौजूदा नेताओं की पत्नियों-बेटियों की “बीवी-बेटी ब्रिगेड” ले उडेंगी।

रविवार, 6 मार्च 2016

जेएनयू में आज़ादी-आज़ादी का उद्घोष बेहद ख़तरनाक संकेत

हरिगोविंद विश्वकर्मा
हम क्या चाहते हैं- आज़ादी! ज़ोर से बोलो- आज़ादी! इधर से बोलो- आज़ादी, उधर से बोलो- आज़ादी। फिर से बोलो- आज़ादी। हम चाहते हैं- आज़ादी! आज़ादी! आज़ादी!! आज़ादी!!! हमें आज़ादी से कम कुछ भी मंजूर नहीं, हम आज़ादी लेकर ही रहेंगे, इस आज़ादी लेने से हमें कोई ताक़त रोक नहीं सकती, हम आज़ादी चाहते हैं। अंत में छोटा-सा स्पष्टीकरण –हम देश “से” नहीं, बल्कि देश “में” आज़ादी चाहते हैं। यानी सांप भी मर गया और लाठी भी नहीं टूटी। इसी को कहते हैं, शब्दों की कारीगरी। मतलब अपनी बात भी कह दी और देश के टीवी देखने वाले तबके ने आज़ादी की इस परिभाषा को प्रशंसा भाव से मान भी लिया और आज़ादी पर लट्टू भी हो गया। लगे हाथ संविधान का उल्लंघन भी नहीं हुआ। निश्चित तौर पर यह जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार सिंह के लिए वैल्यू ऐडेडे मुद्दा साबित हुआ। आज़ादी का नारा देकर वह रातोरात देश का स्टार पोलिटिशियन बन गया।

आप नौ फरवरी 2016 की शाम जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय कैंपस में लगे कश्मीर की आज़ादी के नारे और तीन मार्च की रात कन्हैया कुमार सिंह की आज़ादी वाले नारे की तुलना कीजिए। बस “से” की जगह “में” ने ले लिया। बाक़ी सारा मंजर, मतलब मन्तव्य और मकसद वही था। यानी इसमें शब्दों का भले हेरफेर कर दिया गया हो, लेकिन इसका संदेश वही गया, जो संदेश अलगाववादी तत्व भारतीय संसद पर हमला करवाने वाले जैश-ए-मोहम्मद के आतंकवादी मोहम्मद अफजल गुरू को फांसी पर लटकाने की तीसरी बरसी पर देना चाहते थे और जिसके लिए सारा तामझाम किया गया था। मतलब, नौ फरवरी को लगा “भारत से आज़ादी” का नारा 25 दिन बाद “भारत में आज़ादी” में तब्दील हो गया। गहराई से मनन करने पर लगता है क़ानूनी दांव-पेंच के चलते यह किया गया, क्योंकि देशद्रोह का आरोप झेल रहे कन्हैया कुमार छह महीने की अंतरिम ज़मानत पर हैं।

बहरहाल, किसी भी देश में आज़ादी का उद्घोष और वह भी राष्ट्रीय राजधानी में, उस जगह, जहां तीन हफ़्ते पहले कश्मीर की आज़ादी और देश के टुकड़े-टुकड़े करने वाले नारे लगे हों, वहां इस तरह आज़ादी का उद्घोष किसी भी दृष्टि से शुभ संकेत नहीं है। ख़ास कर कन्हैया ने भाषण से पहले और भाषण के बाद जिस तरह आज़ादी का उद्घोष किया, वह गंभीर व चिंताजनक है। आज़ादी के उद्घोष के दूरगामी परिणामों से अनजान अरविंद केजरीवाल जैसे अपरिपक्व नेता अपने राजनीतिक लाभ के लिए इस तरह के दुस्साहस को प्रमोट करके ऐतिहासिक भूल कर रहे हैं। यह उसी तरह की भूल जैसे कभी खिलाफत आंदोलन में शामिल हो कर  महात्मा गांधी ने की थी या जवाहरलाल नेहरू ने जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देकर या फिर इस सीमावर्ती राज्य के एक तिहाई हिस्से से पाकिस्तानी क़ब्ज़ा ताक़त से ख़त्म करने की बजाय मसला संयुक्त राष्ट्र में ले जाकर की थी।

दरअसल, “आज़ादी” एक उर्दू शब्द है। इसका सहज और पहला यानी प्रचलित और सबसे ज़्यादा मान्य अर्थ “स्वतंत्रता” यानी “स्वाधीनता”, अंग्रेज़ी में “फ्रीडम” ही होता है। यानी जब कोई आज़ादी मांगता है तो इसका मतलब वह व्यक्ति, समाज, संस्थान, सिस्टम, सरकार और देश से आज़ाद यानी स्वाधीन होना चाहता है। यानी आज़ादी की मांग केवल व्यक्ति, समाज, संस्थान, सिस्टम, सरकार और देश से ही की जा सकती है। क्योंकि व्यक्ति पर व्यक्ति, समाज, संस्थान, सिस्टम, सरकार और देश का ही नियंत्रण होता है। कन्हैया ने कहा कि हम भारत में आज़ादी चाहते हैं। फिर तपाक् से कह दिया कि देश से नहीं बल्कि ग़रीबी, जातिवाद या मनुवाद आदि से आज़ादी चाहते हैं। दरअसल, यहां आज़ादी का मतलब ही ग़लत समझा गया, क्योंकि ग़रीबी, जातिवाद या मनुवाद आदि अवस्थाएं हैं, इनसे कोई आज़ादी नहीं मांग सकता। इन अवस्थाओं में बदलाव लाया जा सकता है यानी इन्हें समूल नष्ट किया जा सकता है, इनसे आज़ाद नहीं हुआ जा सकता है।

जो शब्द देश के लिए, भले ही पहले कांग्रेस लीडरशिप और अब बीजेपी लीडरशिप के नकारपन के कारण, सिरदर्द जैसा हो गया हो और जिसका सही अर्थ देश के तमाम लोग 1990 में कश्मीर में आतंकवाद के उदय से जानते हों। आज़ादी रूपी जिस शब्द को भारत और भारतीय व्यवस्था में भरोसा न करने वाले अलगाववादी तत्व लगाते आ रहे हैं। या जिस आज़ादी शब्द से देश का मेजॉरिटी पापुलेशन चिढ़ता हो, उसी शब्द का चयन या तो मूर्खता कही जाएगी या असली मन्तव्य छुपाने के लिए लोगों की आंख में धूल झोंकने वाला क़दम कहा जाएगा। कन्हैया जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष है, इसलिए वह इस तरह की मूर्खता नहीं कर सकते। हां, वह उमर खालिद जैसे अपने दोस्तों का हिडेन एजेंडा लागू करने के लिए लोगों की आंख में धूल ज़रूर झोंक सकते हैं।

देश और देशवासियों को यह कतई नहीं भूलना चाहिए कि अफ़ज़ल गुरू ने देश के लोकतंत्र पर हमला करवाया था। उसी अफज़ल की बरसी पर कार्यक्रम में देश विरोधी और कश्मीर की आज़ादी के समर्थन में नारे लगाए गए थे। लिहाज़ा, कन्हैया का समर्थन करते समय हर सच्चे भारतीय को यह ज़रूर सोचना चाहिए, कि कन्हैया का समर्थन करके कहीं कोई ऐतिहासिक ग़लती तो नहीं कर रहे हैं, जिसके बाद पछताने के अलावा कुछ भी हाथ में नहीं आएगा।

नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने और 22 महीने उनकी सरकार की नीतियों से जिन-जिन लोगों का नुकसान हो रहा है या दिल दुख रहा है, उन सबको कन्हैया का भाषण दिल छू लेने वाला या ऐतिहासिक लगा। कुछ लोगों ने तो इतना ओजस्वी भाषण जीवन में पहली बार सुना। चाहे वह दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल हों, कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार या फिर वामपंथी दल हो, सबको कन्हैया का भाषण असाधारण लगा। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव सीताराम येचुरी ने तो घोषणा भी कर दी कि कन्हैया पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव में वामदलों का प्रचार भी करेंगे।

कन्हैया कुमार का इंटरव्यू लेने वाले पत्रकारों से उम्मीद थी कि आमने-सामने मिलने पर जेएनयू नेता से ज़रूर पूछेंगे कि क्या आप आज़ाद नहीं हैं, जो आज़ादी मांग रहे हैं। आप राजधानी में देश के प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ नारे लगा रहे हैं और आज़ादी का उद्घोष कर रहे हैं, क्या यह आज़ादी नहीं है? आप देश के सबसे बेहतरीन शिक्षण संस्थान जेएनयू में देश के ख़र्च पर में रिसर्च कर रहे हैं, क्या यह आज़ादी नहीं है? कन्हैया से यह भी पूछा जाना चाहिए था कि देश में किसने उन्हें ग़ुलाम बनाकर रखा है जो उससे आज़ादी चाहते हैं। ख़ासकर जो देश अपने आपको दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहता रहा हो, उस देश के अंदर आज़ादी की बात करना कहां तक उचित है।

लोग उम्मीद कर रहे थे कि कि कन्हैया जेएनयू जैसे संस्विथान के छात्रसंघ के अध्यक्ष हैं। लिहाज़ा, वह कुछ सीरियस और इश्यू-ओरिएंटेड बात करेंगे। मोदी की नीतियों में खामियों या ईपीएफ पर प्रस्तावित टैक्स पर बात करेंगे। वह लोकपाल की बात करेंगे, कि किस तरह मोदी ने उसे लटका रखा है। मोदी के एक रिटायर्ड चीफ़ जस्टिस को राज्यपाल बनाने कर जजों को पोस्टरिटायर प्रलोभन देकर एक बहुत ग़लत परिपाटी शुरू करने का मुद्दा उठाएंगे। मौजूदा संसद में कोई विपक्ष का नेता नहीं है, इससे कई समितियों में विपक्ष का प्रतिनिधित्व नहीं हो रहा है, लोग उम्मीद कर रहे थे कि कन्हैया यह मसला भी उठाएंगे। कन्हैया महिला आरक्षण की बात करेंगे, जिसे पिछले दो दशक से पहले कांग्रेस और अब बीजेपी ने ठंडे बस्ते में डाल रखा है। वह आरक्षण की बात करेंगे, जिसका लाभ केवल पासवान-मीरा कुमार, लालू-मुलायम जैसे लोग ही उठा रहे हैं। वह लोकतंत्र को पोलिटिकल फैमिलीज़ के क़ब्ज़े से मुक्त कराने की बात करेंगे, जिसके कारण किसानों को आत्महत्या करने के लिए मज़बूर होना पड़ रहा है और देश का लोकतंत्र मूकदर्शक बना हुआ है। लिहाज़ा, कन्हैया नकली लोकतंत्र की जगह असली लोकतंत्र लाने की बात करेंगे, लेकिन कन्हैया “मोदी” “संघी” और “एबीवीपी” की टर्मिनॉलॉजी से उबर ही नहीं पाए। पूरे भाषण में वह संघी, मोदी, स्मृति, हिंदू और मनुवाद की उल्टी करते रहे। यह उलटी कई नामचीन लोगों को ऐतिहासिक लगी। कन्हैया के भाषण में आदर्शवाद हावी रहा और आदर्शवादी बातें भावुक किस्म के लोगों को बहुत अच्छी लगती हैं। लोगों ने गौर किया होगा कि कन्हैया हिदीभाषी बिहार से हैं, लेकिन ठीक से हिंदी भी नहीं बोल पा रहे थे। तो क्या जेएनयू में कमोबेश सभी छात्र ऐसे ही हैं। सभी सीरियस बात करने की बजाय क्या जुमलेबाज़ी और हुल्लड़ ही करते हैं?

कन्हैया ने यह ज़रूर कहा कि उन्हें कानून पर भरोसा है, बाबसाहेब भीमराव अंबेडकर के संविधान की एक एक धारा पर भरोसा है। उन्होंने यह भी कहा कि संविधान की प्रस्तावना में कहे गए हैं समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता, समानता के साथ खड़े हैं। लगे हाथ उन्होंने यह भी कहा कि वह उमर खालिद और दूसरे साथियों की रिहाई के लिए संघर्ष करेंगे। इसका मतलब गाहे-बगाहे या स्मार्टनेस तरीक़े से वह अपने दोस्त उमर के समर्थन में ही खड़े नज़र आए। 48 मिनट से ज़्यादा चले के भाषण में कन्हैया और उनके साथी क़रीब पहले पांच मिनट और बाद के चार मिनट किसी उन्मादी की तरह आज़ादी का उद्घोष करते रहे। इस दौरान करीब दो सौ बार आज़ादी के नारे लगे। नारे में “से” की जगह “में” का इस्तेमाल करके क़ानून और संविधान की नज़र में बच गए।

पूरा देश सोच रहा था, कि कन्हैया चश्मदीद होने के कारण देश को बताएंगे कि अफज़ल की बरसी पर आख़िर जेएनयू कैंपस में हुआ क्या था। यह तो सच है न कि वहां अफजल की बरसी मनाई गई थी और देश विरोधी और आज़ादी के समर्थन में नारे लगाए गए थे। उसमें किसकी कितनी भागीदारी है, यह देश की अदालत तय करेगी, लेकिन अपनी तरफ से कन्हैया को बताना चाहिए था कि उसमें उनका किरदार क्या था। लेकिन सबज्यूडिस के बहाने वह असली मुद्दे को टाल गए। असली मुद्दे पर बात करने की बजाय वह पूरे भाषण में मोदी, संघ, एबीवीपी और मनुवाद को कोसते रहे।

अगर इतिहास में जाएं तो पिछली सदी के आरंभ में सन् 1906 माहौल ऐसा ही था। वायसराय लॉर्ड कर्ज़न की अगुवाई में अंग्रेज़ों ने देश बंग-भंग के जरिए अलगाववाद को जो पौधा रोपा उसके उगते ही उसी माहौल में जनाब सैयद अहमद खान मुस्लिम लीग की स्थापना की। मुस्लिम लीग पाकिस्तान-पाकिस्तान कर रही थी। महज 41 साल की उम्र में उस पौधे ने देश का धर्म के आधार पर विभाजन कर दिया। तो क्या यह देश एक और विभाजन की ओर बढ़ रहा है? भले ही वह कई सदी बाद आए। लिहाज़ा, अभी से इस आज़ादी की असली मंशा पर चौकन्ना होने की ज़रूरत है, कि कही देर न हो जाए।

बुधवार, 24 फ़रवरी 2016

संसद में सेक्युलिरिज़्म पर भारी पड़ता राष्ट्रवाद

हरिगोविंद विश्वकर्मा
जिन लोगों ने उम्मीद लगा रखी थी कि देश की सबसे बड़ी जनपंचायत संसद में बजट सत्र का पहले दिन कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष बीजेपी और उसके गठबंधन दलों को बैकफुट पर ला देगी, ऐसे लोगों के लिए पहले दिन का कार्यवाही गहरी निराशा लेकर आई। पूरे दिन लोकसभा ही नहीं राज्यसभा में हमला करने की बजाय उलटे विपक्ष ही बैकफुट पर नज़र आया और बीजेपी की आक्रामकता का सामना करने में पूरी तरह असफल रहा। यह साफ़ लगा कि सही मायने में सवा सौ साल से ज़्यादा पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस में दलित और राष्ट्रवाद के मुद्दे पर अधिकार और इनपुट्स के साथ बोलने वाला नेताओं का भारी अकाल है। बाप की विरासत के बदौलत लोकसभा में पहुंचे ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसै तथाकथित यंगब्रिगेड सदन में पार्टी की संख्या भले बढ़ा दें, तर्कपूर्ण बहस करना उनके वश की बात नहीं और अगर बोलेंगे तो उससे पार्टी को नुकसान ही होगा।

ऐसे में यह कहना न तो अतिशयोक्तिपूर्ण होगा न ही अनुचित कि कांग्रेस अपने युवराज राहुल गांधी की अपरिपक्व और कन्फ़्यूज़्ड सियासत के चलते लड़ाई शुरू होने से पहले ही हार मान बैठी थी। पूरे दिन कांग्रेसी ही नहीं सेक्युलरिज़्म के बैनर तले हर नैतिक-अनैतिक काम करने वाले दल और उनके नेताओं ने भी साफ़ महसूस किया कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय कैंपस में नौ फरवरी की अप्रिय घटना के बाद छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार सिंह की कथित तौर पर देशद्रोह की आरोप में गिरफ़्तारी के समर्थन करने के लिए कांग्रेस उपाध्यक्ष का जेएनयू कैंपस जाना एक ऐतिहासिक भूल थी, जिसने उन्हें हंसी का पात्र बनाकर रख दिया है।

राहुल गांधी की इसी ऐतिहासिक भूल ने मानव संसाधन मंत्री स्मृति जुबीन ईरानी को पहले दिन चैंपियन बना दिया, जिन्होंने संसद पटल पर ज़ोरदार तरीक़े से राष्ट्रवाद की व्याख्या की। ज़बरदस्त होमवर्क करके संसद में आईं स्मृति को कांग्रेस की 2004 से 2014 के दस साल के शासन से ही नहीं, बल्कि छह दशक तक सत्ता में रहने के दौरान कांग्रेस द्वारा की गई हर ग़लती से स्मृति ईरानी और दूसरे बीजेपी नेताओं को ज़बरदस्त खाद-पानी मिलता रहा और वे लोग लच्चेदार भाषा में राष्ट्रवाद की अपने ढंग से व्याख्या तो करते ही रहे, लगे हाथ कांग्रेस की ग़लतियों को भी रेखांकित करते रहे, जिससे कांग्रेस को ही बचाव की मुद्रा में आना पड़ा।

इसकी मिसाल तब देखने को मिली जब हैदराबाद विश्वविद्यालय के दलित छात्र रोहित वेमुला की ख़ुदकुशी और जेएनयू विवाद पर स्मृति ईरानी ने दोनों सदनों में विपक्ष को करारा जवाब देते हुए कहा कि रोहित वेमुला को सस्पेंड करने का फ़ैसला जिस समिति ने किया था उसकी नियुक्ति कांग्रेस के दस साल के शासन में हुई थी। बकौल स्मृति ईरानी, “रोहित वेमुला को सस्पेंड करने का फैसला लेने वाली समिति के सदस्यों को मैंने नियुक्त नहीं किया था। हां, लेकिन केंद्र सरकार ने जब देखा कि उस समिति में कोई भी दलित प्रतिनिधि नहीं है, तो उसमें कोऑप्ट करने का फैसला ज़रूर किया गया।“

विपक्ष का दरअसल, रोहित वेमुला की ख़ुदकुशी और जेएनयू विवाद को एकसाथ क्लिप करना, बीजेपी के लिए बड़े फ़ायदे कौ सौदा साबित हुआ, क्योंकि दोनों सब्जेक्ट का आपस में बस इतना संबंध था कि दोनों घटनाएं दो सेंट्रल यूनिवर्सिटीज़ में हईं। जेएनयू विवाद का दलित शोषण से कोई लेना देना नहीं था, तो रोहित वेमुला की ख़ुदकुशी का मुद्दा राष्ट्रवाद या अभिव्यक्ति की आज़ादी जैसे मुद्दों से कोसों दूर रहा। इसीलिए जहां, बीएसपी सुप्रीमो मायावती के अगुवाई में दलितों की राजनीति करने वाले रोहित वेमुला की ख़ुदकुशी मामला प्रमुखता से उठाते रहे वहीं, सेक्युलिरज़्म की रोटी पर पल रहे लोग जेएनयू विवाद में कन्हैया कुमार सिंह और खालिद उमर की गिरफ्तारी जैसे मुद्दे उठा रहे थे। दोनों मुद्दों को एकसाथ उठाए जाने से भ्रम की स्थिति बन गई।

संसद की बहस से एक बात और साफ़ हो गई कि देश के ख़िलाफ़ या देश के टुकड़े करने या फिर कश्मीर की तथाकथित आज़ादी का राग अलापने वाले लोग पूरी तरह आउटडेटेड हो चुके हैं। उनका समर्थन इक्का दुक्का लोगों के अलावा कोई नहीं देगा। इस मुल्क के लोग किसी भी कीमत पर संसद पर हमले की साज़िश रचने के लिए देश की सबसे बड़ी अदालत द्वारा दंडित किए गए जैश-ए-मोहम्मद के दुर्दांत आतंकवादी मोहम्मद अफजल गुरू की तीसरी बरसी मनाने और देश विरोधी नारे लगाने वालों का कतई समर्थन नहीं कर सकते। ऐसे तत्वों का साथ केवल टीवी स्क्रीन को काला करने वाले कन्यप़्य़ूज़्ड लोग या राग-सेक्युलिरज़्म अलापने वाले या फिर अपनी अतिवादी बौद्धिकता के कारण डायनासोर के नक्शे क़दम पर चल रहे कम्युनिस्ट ही कर सकते हैं।

ज़ाहिर-सी बात है, जेएनयू की घटना के चलते इस समय देश में अचानक यह एक तरह से 2014 की गर्मियों जैसा माहौल बन गया है, जब देश को लगा कि राग-सेक्युलिरज़्म के नाम पर कांग्रेस देश का बंटाधार कर रही है, तो मुलायम सिंह यादव गिन-गिनकर अपने बेटे-पुत्रवधू, भाइयों-भतीजों और नाती-पोतों को या तो संसद या उत्तर प्रदेश की विधान सभा में भेज रहे हैं। देश की जनता ने साफ़ देखा कि मुलायम जैसे लोग राजनीतिक लाभ के लिए कल्याण सिंह जैसे नेताओं को लगा लेते हैं तो मायावती और नीतीश कुमार जैसे लोग बीजेपी के साथ सरकार बनाने के बावजूद ख़ुद को बेशर्मी से सेक्युलिरज़्म का पैरोकार बताते हैं।

देश ने यह भी देखा कि सेक्युलिरज़्म के नाम ये तमाम दल मुसलमानों को बेवकूफ़ ही नहीं बना रहे हैं, बल्कि उनके अंदर कथित तौर पर अल्पसंख्यक और असुरक्षित होने का भाव जगा रहे हैं। अब तो ख़ुद मुस्लिम समुदायके लोग खुलेआम कहने लगे हैं कि कम्युनिस्ट, कांग्रेस और दूसरे तथाकथि धर्मनिरपेक्ष दलों के कारण ही वे हाशिये पर जा रहे हैं। यह तो सर्वविदित है कि जेएनयू में अफ़ज़ल गुरु की तीसरी बरसी में एक प्रोग्राम हुआ और उसे खालिद उमर नाम के छात्र ने ही शेखी बघारने के लिए आयोजित किया। उससे कन्हैया कुमार सिंह या खालिद उमर ने देश विरोधी नारा लगाया या नहीं यह अदालत देखेगी।

जेएनयू के इनछात्रों का व्यवहार देशद्रोह की कैटेगरी में आता हैं या नहीं, यह भी उपलब्ध फोटोग्राफ और वीडियों के रूप में उपलब्ध सबूतों और दूसरे साक्ष्यों की सत्यता की जांच करने के बाद अदालत तय करेगी। लेकिन एफआईआर दर्जकरने के बाद इनको अदालत में पेश करना तो पुलिस का काम था, लोग उसमें भी बाधा डाल रहे थे। यह बात लोगों के गले नहीं उतरी। ख़ासकर जेएनयू के वाइस चांसलर प्रो. एम जगदीश कुमार ने देशद्रोह का संगीन आरोप और लुकआउट नोटिस वाले आरोपी को गिरफ़्तार करने से दिल्ली पुलिस को रोकना भी रास नहीं आया। पिछले दो हफ़्ते से सोशल नेटवर्किंग पर लोगों के पोस्ट और रेलवे-बस में यात्रा करते लोगों की बहस से यह साफ़ हो गया था।


जो भी हो, इस बार भी साफ़ हो गया है कि संसद के बजट सत्र में बजट पेश करने के अलावा कोई रचनात्मक कार्य नहीं होने वाला। विपक्ष की अकर्मण्यता ने बीजेपी सरकार की 20 महीने के जनविरोधी और कुशासन पर ज़रूर परदा डाल दिया है। क्रूड ऑयल का भाव 25 डॉलर प्रति बैरल से भी नीचे आने से देश के आम लोगों को जो लाभ होना था उससे वंचित करने का बीजेपी और नरेंद्र मोदी का अपराध भी जेएनयू विवाद और रेहित वेमुला की आत्महत्या की मामले के नीचे दब गया।