मंगलवार, 23 फ़रवरी 2016

जेएनयू के वाइस चांसलर को जवाबदेह मानकर क्यों न उन्हें गिरफ़्तार किया जाए?

हरिगोविंद विश्वकर्मा
क्या वाक़ई जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय भारत में ही है? अगर हां, तो भारतीय क़ानून का पालन जेएनयू कैंपस में क्यों नहीं हो रहा है? आख़िर जेएनयू के वाइस चांसलर प्रो. ममिडाला जगदीश कुमार कौन होते हैं, दिल्ली पुलिस को उस शख़्स को गिरफ़्तार करने से रोकने वाले, जिस पर देशद्रोह का संगीन आरोप है और जिसके ख़िलाफ़ पुलिस ने लुकआउट नोटिस जारी कर रखा है। क्या भारत सरकार को जेएनयू कैंपस में पुलिस के प्रवेश को सुनिश्चित करने के लिए जेएनयू से प्रत्यर्पण संधि यानी एक्स्ट्रडिशन ट्रीटी साइन करनी पड़ेगी?

क्या यह किसी मज़ाक़ से कम है कि दिल्ली पुलिस की टीम दुर्दांत आतंकवादी अफ़ज़ल गुरु की बरसी मनाने वाला उमर ख़ालिद का जेएनयू के गेट पर इंतज़ार कर रही है और खालिद अपने साथियों के साथ भारतीय क़ानून पर हंस रहा है। निश्चित तौर पर इस मुद्दे पर दुनिया में भारत की खिल्ली उड़ रही है कि एक यह देश देशद्रोह के आरोपियों को राजधानी में ही नहीं पकड़ पा रही है। यह देश की इमैज के लिए बहुत ख़तरनाक है। यह बहुत ही ग़लत परंपरा की शुरुआत भी हो रही है। पुलिस की काम में बाधा डालने के लिए जेएनयू के वाइस चांसलर को फौरन बर्खास्त करके उन्हें भी गिरफ्तार किया जाना चाहिए। यही एकमात्र विकल्प है।

बताइए, अफ़ज़ल गुरु को शहीद बताने वाले और भारत मुर्दाबाद के नारे लगाने वाले प्रोग्राम का आयोजन करने वाला उमर ख़ालिद जेएनयू कैंपस में बैठा है और वाइस चांसलर पुलिस टीम को कैंपस के अंदर जाने की इजाज़त नहीं दे रहे हैं। ऐसा लग रहा है जेएनयू भारत के अंदर कोई स्वतंत्र देश हैं, जहां देशद्रोह के आरोपी को पकड़ने के लिए पुलिस को वाइस चांसलर का मुंह देखना पड़ रहा है। यह तो कायरता की पराकाष्ठा है।

यहां यह सवाल नहीं है कि कन्हैया कुमार सिंह, खालिद उमर और उनके साथी देशद्रोह के दोषी हैं या नहीं, क्योंकि उन पर देशद्रोह के आरोपों की सत्यता की जांच करना अदालत का काम है और अदालत यह काम कार्यक्रम के फोटोग्राफ और वीडियों के रूप में उपलब्ध सबूतों और दूसरे साक्ष्यों की सत्यता की जांच करने के बाद तय करेगी। यहां सवाल यह है कि कन्हैया कुमार सिंह, खालिद उमर और उनके साथियों पर देशद्रोह का मामला पहले ही दर्ज किया जा चुका है और उसके लिए इन सबको गिरफ़्तार करके उनकी कोर्ट के सामने पेश होनी चाहिए।

इस गिरफ़्तारी में अड़ंगा डालनेवाले वाइस चांसलर प्रो. एम जगदीश कुमार जेएनयू के प्रशासनिक मुखिया हैं, इसलिए कैंपस में होने वाली हर गतिविधि के लिए वह भी सीधे तौर पर ज़िम्मेदार है। अगर वह अच्छे काम के लिए ज़िम्मेदार हैं तो, देशद्रोह जैसे बुरे और राष्ट्रविरोधी काम के लिए भी वही ज़िम्मेदार हैं। अगर लोग देश के हर घटना के लिए देश के प्रधानमंत्री को जवाबदेह मानते हैं और प्रदेश की घटनाओं के लिए संबंधित मुख्यमंत्री को जवाबदेह मानते हैं तो किसी विश्वविद्यालय की हर घटना के लिए उसके वाइसचांलर को जवाबदेह मानना चाहिए। इस आधार पर जेएनयू की हर घटना के लिए वहां के वाइस चांसलर को क्यों नहीं जवाबदेह माना जाना चाहिए।

जेएनयू कैंपस के अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर अगर राष्ट्रविरोधी तत्व सिर उठा रहे हैं, तो कहीं न कहीं वाइस चांसलर ही जिम्मेदार है। लिहाज़ा, नौ फरवरी की घटना के लिए अगर कन्हैया कुमार सिंह, उमर खालिद और उनके साथी जितने ज़िम्मेदार हैं, उतने ही ज़िम्मेदार जेएनयूके वाइसचांसलर हैं। लिहाज़ा, अगर इस मसले पर अगर कन्हैया कुमार सिंह, उमर खालिद और उनके साथियोंपर मामला दर्ज किया गया है तो वाइस चांसलर के ख़िलाफ़ भी मुक़दमा दर्ज किया जाना चाहिए।

एक देश जो संयुक्त राष्ट्रसंघ की सबसे शक्तिशाली बॉडी सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता की दावेदारी पेश कर रहा है, वह अपने राजधानी में एक विश्वविद्यालय की हरकतों से नहीं निपट पा रहा है। सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता की दावेदारी का मतलब भारत दुनिया की समस्याओं को हल करने में अपना योगदान देना चाहता है। जेएनयू की घटना देश के इस दावे को निश्चित तौर पर खोखला बनाती है।

यह तो वहीं बात हुई कि जैएनयू कैंपस के अंदर शरण लिए छात्र देश के क़ानून को ठेंगा दिखाते रहे और देश वाइस चांसलर के परमिशन का इंतज़ार करता रहे। निश्चित तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके बैबिनेट के इस मामले में कठोर फैसला करना चाहिए वरना देश के लोगों में यह भावना बढ़ जाएगी कि भारत एक सॉफ़्ट नेशन हीं नहीं कमज़ोर देश भी है। अगर केंद्र सरकार मौन रहती है तो दिल्ली हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट को देश के क़ानून का पालन करवाने के लिए आगे आना चाहिए।


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