शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

सत्तावर्ग बनाम प्रजावर्ग

हरिगोविंद विश्वकर्मा
इस देश के सवर्णों (जनरल कैटेगरी) को लगता है कि बीजेपी और कांग्रेस जैसी पाटियां ही उनके हितों की रक्षा कर रही हैं। इसी तरह पिछड़े वर्ग (मंडलवाले) के लोगों को लगता है, महज सपा-आरजेडी और उनके जैसी दूसरी पार्टियां ही उनकी पैरोकार हैं। इसी तरह दलितों (एससी-एसटी) को लगता है कि केवल बसपा और लोजपा उनकी आवाज़ और उनके स्वाभिमान की रक्षा करती हैं। यूपी बिहार के यादवों को लगता है मुलायम-लालू उनका ही उद्धार कर रहे हैं। इसी आधार पर ये लोग अपने नेताओं के लिए किसी को भी मारने या अपमानित करने के लिए तत्पर रहते हैं। इन तमाम को नहीं पता कि ये लोग बड़ी ग़लतफ़हमी में जी रहे हैं।

दरअसल, सवर्ण हो या बैकवर्ड या फिर दलित, सभी क्राइसेस ऑफ इन्फॉरमेशन यानी अज्ञानता के शिकार हैं। एक दूसरे के ख़ून के प्यासे हो चुके इन तीनों कैटेगरीज़ के लोगों पता ही नहीं कि देश में केवल दो वर्ग है। सत्ता वर्ग और प्रजा वर्ग। सारे नेता चाहे वे जिस पार्टी के हों, सत्ता वर्ग के हैं और पार्टी लाइन से ऊपर उठकर हमेशा हर नेता दूसरे नेता को डिफेंड करता है। कोई नेता क्या है? क्या वह हमारे आपकी तरह बस और ट्रेन या रिक्शे में सफ़र करता है। नहीं, उसकी आर्थिक हैसियत पर रिसर्च करिए। तब उसका समर्थन या विरोध कीजिए।

नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं। कहते हैं, चाय बेचकर पीएम बने हैं। अपने अब तक के कार्यकाल में उन्होंने चायवालों के लिए क्या किया? प्रधानमंत्री बनते ही सबसे पहले दिल्ली कटरा (वैष्णोदेवी) के बीच श्रीशक्ति एक्सप्रेस को हरी झंडी दिखाया, जो पूरी तरह एसी ट्रेन है। आगे बुलेट ट्रेन चलाएंगे। इन सब में कितने चायवाले यात्रा करेंगे? आप सोचिए, बुलेट ट्रेन चलाने पर जितना ख़र्च आ रहा है, उससे पूरे देश के लोगों का मुफ़्त इलाज हो सकता है। उनकी जान बचाई जा सकती है, ख़ासकर उनकी जो महंगे इलाज के कारण उपचार नहीं करवा पा रहे हैं और बिना पूरा जीवन जीए मर रहे हैं। आए दिन हम सोशल नेटवर्क पर ऐसे लोगों के नाम देखते रहते हैं। खैर, मोदी ने ऐसा नहीं किया, क्योंकि वह चायवालों के नहीं सत्तावर्ग के प्रतिनिधि हैं।

दुनिया जानती है, पवार, मायावती, मुलायम-लालू, पासवान, जयललिता, करुणानिधि, ठाकरे और दूसरे ढेर सारे नेताओं ने राजनीति में आने के बाद अकूत धन बनाया। जिसका उनके ज्ञात आय के स्रोत से कोई मिलान नहीं। फिर मोदी ने किसके ख़िलाफ़ कार्रवाई की। नाम बताइए। मोदी ने तो रॉबर्ट वाड्रा तक को छोड़ दिया, जिसके ख़िलाफ़ कार्रवाई करने की बात कहकर सत्ता में आए। आप सोच रहे होंगे कि कोई कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है? तो जान लीजिए ये सभी लोग सत्तावर्ग परिवार के हैं। इन्हें पोलिटिकल फैमिली भी कह सकते हैं। एक दूसरे को बचाते हैं। इस सत्ता परिवार में तमाम मीडिया घराने के मालिक भी आते हैं, जो पत्रकारों को टूल की तरह इस्तेमाल करते हैं।

इन सत्ता-परिवार में सोनिया, मुलायम, लालू, मायावती, गडकरी, पवार, करुणानिधि, जयललिता, बादल, नीतीश, ममता, राज-उद्धव ठाकरे, सोरेन, अब्दुल्ला व मुफ्ती परिवार, गहलोत, फडनवीस, चव्हाण, पटनायक, सिंधिया, जिंदल, केजरीवाल के अलावा सभी नेता, सभी 790 सांसद, 99 फ़ीसदी विधायक हैं। हमें लगता है ये एक दूसरे के विरोधी हैं, लेकिन यक़ीन मानिए ये एक दूसरे के हितैषी हैं। इनकी मदद करते हैं सभी औद्योगिक घराने। इसके अलावा अमिताभ बच्चन, शाहरुख, सलमान, आमिर-अक्षय, तेंदुलकर, धोनी और बाक़ी खरबपति लोग भी सत्तावर्ग क्लब में शामिल हैं। इसमें दो राय नहीं कि पूरा देश महज 5 फ़ीसदी संपन्न लोगों का होकर रह गया है। वहीं लोग क़ायदे की ज़िंदगी जी रहे हैं। अंग्रेज़ों के जाने के बाद शुरुआत में जिन्हें मौक़ा मिला, उन्होंने बहुत बड़ी संपत्ति हथिया ली और वही लोग धन्नासेठ कहलाते हैं। इसी तरह जिन लोगों को नौकरियां मिलीं, उन्होंने अपने परिवार और उसके बाद क़रीबी ओर उसके बाद दूर के रिश्तेदारों को कहीं न कहीं सेट कर दिया।

ख़ूब डींग हांकी जाती है कि भारत लोकतांत्रिक देश है। यहां जनता के हित के लिए जनता के द्वारा चलाई जा रही जनता की सरकार है। अच्छा बताएं, देश और देश के लोकतंत्र में जनता की कितनी भागीदारी है? किसी को पता है, देश को कौन-कौन लोग चला रहे हैं? जो लोग देश को चला रहे हैं, वे आम आदमी के कितने हितैषी हैं? यह समझना बहुत ज़रूरी है कि इस देश में लोगों पर शासन कौन लोग कर रहे हैं? बहुत लंबे और गहन रिसर्च और अध्ययन के बाद देश में संपन्न लोगों का वर्गीकरण किया गया है।

1. बेशुमार दौलत किसके पास ?

पहली कैटेगरी
एक अरब 28 करोड़ की आबादी वाले इस देश में खरबपति (हज़ार करोड़ रुपए से ज़्यादा संपत्ति वाले) केवल 55 (पचपन) लोग हैं, जिनमें बड़े उद्योगपति, टॉप-लिस्टेड बिल्डर्स और कुछ बहुत भ्रष्ट नेता हैं। यही लोग प्रमुख राजनीतिक दलों की फंडिंग करते हैं। पूरी व्यवस्था पर एक तरह से इन्हीं का कंट्रोल है। सरकार किसी की भी रहे, इनकी कोई फाइल किसी भी मंत्रालय में नहीं रुकती। जो रोकने की कोशिश भी करता है, उसे उसके पद से हटा दिया जाता है।

दूसरी कैटेगरी
दुनिया भर में सुपररिच लोगों का हिसाब-क़िताब रखने वाली अंतरराष्ट्रीय ऐसेंजी बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप यानी बीसीजी की अभी हाल ही में आई सालाना रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में सुपररिच लोगों की संख्या तीन गुना बढ़ गई। एजेंसी ने कहा कि 100 मिलियन अमेरिकी डॉलर यानी 650+ करोड़ रुपए की संपत्ति वालों की संख्या 2013 के 284 से बढ़कर 2014 में 928 हो गई। यानी देश में मात्र 929 लोगों के पास कम से कम 650 करोड़ रुपए की संपत्ति है। इनमें इनमें उद्योगपतियों, बड़े समाचार पत्रों और चैनल्स के मालिक, बिल्डर, कारोबारी, भ्रष्ट नेता आते हैं।

तीसरी कैटेगरी
अगर व्यक्तिगत संपत्ति कम करके लगभग 200 करोड़ रुपए कर दें तो, धन्नासेठों की संख्या भी 7850 हो जाती है। इनमें उद्योगपतियों, बिल्डर, कारोबारी, भ्रष्ट नेता, अभिनेता और बड़े खिलाड़ी आते हैं। यानी इस देश में 0.0006133 फ़ीसदी लोगों के पास 200 करोड़ या उससे ज़्यादा संपत्ति है।

चौथी कैटेगरी
अगर घर की संपत्ति के अलावा बाक़ी संपत्ति को न्यूनतम 25 करोड़ रुपए कर दे, तो कोटक वेल्थ मैनेजमेंट की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक़, 2015 में भारत में सुपर रिच की संख्या 1 लाख 37 हज़ार (137100) हो गई है। यह देश की आबादी का 0.0100 फ़ीसदी है। इस वर्ग के सुपर रिच की यह संख्या 2014 में एक लाख सत्रह हज़ार थी।

पांचवी कैटेगरी
अगर घर जैसी संपत्ति को छोड़कर व्यक्तिगत संपत्ति 6 करोड़ रुपए की संपत्ति को आधार बनाएं तो बीसीजी की सालाना रिपोर्ट के अनुसार, भारत में केवल 1.75 लाख परिवारों की निजी संपत्ति क़रीब 6 करोड़ रुपये या उससे अधिक हैं। यानी इस देश में केवल 0.0150 प्रतिशत लोग ही जिन्हें सही मायने में आर्थिक रूप से सुखी और चिंतामुक्त कहा जा सकता है।

इन पांचों कैटेगरीज़ के लोग मनचाही ज़िंदगी जीते हैं। महंगाई कितनी भी बढ़ जाय इनको कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। इनके पास इतनी ज़्यादा दौलत है कि इनकी सौ पीढ़ियां भी ख़र्च नहीं कर पाएंगी। इन पर किसी संकट का असर नहीं होता। ये ठाट से 24 घंटे एसी वाली जगह रहते हैं। ये केवल प्लेन से सफ़र करते हैं। जिस संकट आप रोज़ाना दो-चार होते हैं, उससे इनका कभी सामना नहीं होता। इनके सामने रोज़ी-रोटी का संकट नहीं जो आम आदमी रोज़ाना झेलता है। ये जो दान देते हैं, या धर्म-कर्म करते हैं, वह इसलिए करते हैं ताकि इन्हें इनकम टैक्स में छूट मिले। वरना ये हमारे आपकी ओर देखना भी पसंद नहीं करते हैं।

देश की संसद पर इन्हीं का क़ब्ज़ा है। कार्यपालिका और न्यायपालिका को इन्होंने बंधक बना रखा है। इकॉनॉमी पर इनका दख़ल है। शेयर बाज़ार में यही निवेश करते हैं। मुंबई में करोड़ों रुपए के महंगे फ़्लैट ख़रीदने की हैसियत इनकी ही है। हर छोटी-बड़ी इंडस्ट्रीज़ इनके कंट्रोल में है। खेल संघों में अहम पदों पर यही हैं। छोटे-बड़े सभी संस्थानों में इनका ही वर्चस्व है। मीडिया के असली ओनर यही हैं, जहां पत्रकारों को टूल की तरह इस्तेमाल करते हैं और ज़रूरत ख़त्म होने पर दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंकते हैं। समस्याओं हल करने के लिए एसी कमरे में बैठकर यही लोग डायलॉग करते हैं।

2. बेशुमार आमदनी किसकी ?

पहली कैटेगरी
अगर सालाना कमाई को 1 करोड़ रुपए बेस मान लें तो वित्त मंत्रालय के मुताबिक, केवल 42,800 (42 हज़ार आठ सौ) लोगों की सालाना आमदनी 1 करोड़ रुपए या उससे ज़्यादा है। जो आबादी का मात्र 0.00354 फ़ीसदी है। इसमें उद्योगपति, बिल्डर, कारोबारी के साथ भ्रष्ट नौकरशाह, भ्रष्ट पुलिस अफ़सर, भ्रष्ट जज और बड़े अभिनेता और खिलाड़ी शामिल हैं। मज़ेदार बात है कि देश की कुल संपत्ति का 95 हिस्सा इन्हीं 0.00354 फ़ीसदी लोगों के पास है। यही लोकसभा, राज्यसभा और राज्य की विधानसभाओं में पहुंचने की हैसियत रखते हैं। या अपने ख़ास लोगों को फंडिंग के ज़रिए संसद-विधानसभाओं में पहुंचाते हैं, जो इनके हित के मुताबिक़ फ़ैसले लेते हैं।

दूसरी कैटेगरी
इस कैटेगरी में सत्तावर्ग के प्रति स्वामिभक्ति दिखाने वाले चमचे लोग आते हैं। इनकी सालाना कमाई 20 लाख से एक करोड़ रुपए (1.67 लाख से लेकर 8.33 लाख रुपए प्रति माह) के बीच होती है। इनकी आबादी 4.06 लाख है। ये भी आबादी का महज 0.0319 फ़ीसदी हिस्सा हैं। इस कैटेगरीज़ के लोग सत्तावर्ग के आदमी कहे जाते हैं। इनकी आबादी महज़ 0.03544 फीसदी है, जो कुल आबादी का 32वां हिस्ता नहीं बल्कि एक बत्तीसवें फ़ीसदी के आसपास है।

तीसरी कैटेगरी
इस कैटेगरी में आबादी का 0.108 फ़ीसदी हिस्सा यानी 13.78 लाख लोग आते हैं। जिनकी आमदनी 10 से 20 लाख रुपए (83 हज़ार से लेकर 1.67 लाख रुपए प्रति माह) के बीच होती है। इन पर भी महंगाई का बहुत ज़्यादा असर नहीं होता है। इस वर्ग के क़रीब 95 फ़ीसदी लोग सत्ता परिवार की ओर झुके रहते हैं। यानी उनकी दलाली या चमचागिरी करते हैं। बदले में इन्हें अच्छा जीवन जीने की गारंटी मिलती है।

चौथी कैटेगरी
इस कैटेगरी की संख्या 17.88 लाख है, जो आबादी का 0.140 फ़ीसदी है। ये हर साल 5 से 10 लाख रुपए (क़रीब 42 हज़ार से लेकर 83 हज़ार रुपए प्रति माह) की कमाई करते हैं। ये मध्यम वर्ग के आदमी कहे जाते हैं। इसमें हमारे आप के बीच के अच्छा सेलरी वाले सीनियर पत्रकार भी आते हैं। इस वर्ग के 90 फ़ीसदी से ज़्यादा लोग यथास्थितिवादी होते हैं। परिवार पालने या दूसरी मज़बूरियों के चलते ज़मीर से समझौता करके सत्ता वर्ग की हां में हां मिलाते हैं और फ़ेसबुक या दूसरी सोशल नेटवर्किंग साइट पर अपनी जमात यानी आम आदमी को ख़ूब गाली देते हैं या उसकी आलोचना करते हैं। पेट पालने की मज़बूरी में ये समाज का भला करने वालों के ख़िलाफ़ माहौल बनाते हैं।

इन चारों कैटेगरीज़ को मिला दीजिए, तो कुल 0.28344 फ़ीसदी होता है. यह आबादी का आधा फ़ीसदी भी नहीं है। यानी मुट्ठी भर लोग देश को चलाते या उनका समर्थन करते हैं। अब सोचिए, इस देश में इंसान की तरह रहने वालों की संख्या कितनी कम है।

पांचवीं कैटेगरी
सालाना कमाई को और कम करें तो कितने भयावह आंकड़े आते हैं, यह देखिए...
आमदनी की पांचवी कैटेगरी के लोगों की आमदनी 1.80 लाख से 5 लाख रुपए (15 हजार से क़रीब 42 हज़ार रुपए प्रति माह) के बीच होती हैं। टैक्स देने वालों में ये सबसे नीचे हैं। इन्हें लोअर मिडिल क्लास कहे जाते हैं जिनकी जनसंख्या 2 करोड़ 88 लाख से ज़्यादा है। यह कुल आबादी का 2.271 फ़ीसदी है।

पूरे देश में टेक्सपेयर्स की कुल संख्या 2016 के बजट के अनुसार 4 फ़ीसदी यानी 5 करोड़ 16 लाख है। यानी जितने संपन्न हैं सब इसी में हैं।रिटर्न फाइल करने वाले टैक्‍सपेयर्स में से 54 फीसदी (2.78 करोड़) के ऊपर जीरो टैक्‍स दिया। यानी ये बॉर्डर पर रह गए। यानी असली टैक्स देने वाले केवल 46 फ़ीसदी यानी 2 करोड़ 37 लाख लोग हैं। इनकी आबादी 2 फ़ीसदी भी नहीं है। बहरहाल, इन 2 फ़ीसदी लोगो पर आश्रित व्यक्तियों को भी जोड़ दिया जाए तो बमुश्किल 5 फ़ीसदी होता है। यानी महज 5 फ़ीसदी लोग इंसान की तरह रहते हैं। बाक़ी लोग जीवन के लिए संघर्ष करते हैं।

3. इनके हिस्से कुछ भी नहीं आया?
आइए उनकी बात करे जिनके हिस्से कुछ भी नहीं आया।

पहली कैटेगरी
इस कैटेगरी में देश की 27 करोड़ आबादी आती है। इन्हें रोज़ाना दो डॉलर यानी 130 से 135 रुपए मजदूरी मिलती है। ये लोअर मज़दूर वर्ग के लोग हैं इनकी सालाना आमदनी 50 हज़ार से ज़्यादा नहीं होती। इनकी तादाद 23.3 यानी क़री-क़रीब एक चौथाई आबादी अपना ख़ून पसीना बहाने का बावजूद महज 130 रुपए रोज़ पाती है।

दूसरी कैटेरगी
इस कैटेगरी में मनरेगा के तहत न्यूनतम 100 दिन काम पाने वाले लोग भी आते हैं, जिन्हें दैनिक मज़दूरी 174 रुपए मिलती है। इऩकी सालाना आमदनी 16 हज़ार से 1 लाख 80 हज़ार रुपए (क़रीब 14 सौ रुपए से लेकर 15 हज़ार रुपए प्रति माह) होती है। ये बड़ी मुश्किल से पेट पाल पाते हैं और प्रलोभन दिए जाने पर अपराध की दुनिया में उतर जाते हैं। इस कैटेगरी में 49 करोड़ 69 लाख 60 हजार लोग काम करने वाले हैं। इनकी आबादी आबादी का 38.82 फ़ीसदी है। इनमें ज़्यादातर दिहाड़ी मज़दूर हैं। अस्थाई ड्राइवर और छोटा-मोटा काम करने वाले हैं।

तीसरी कैटेगरी
इस कैटेगरी के लोग कुछ भी नहीं करते। यानी बेरोज़गार हैं। इंटनैशनल लेबर ऑर्गनाइज़ेशन की ग्लोबल इंप्लॉयमेंट ट्रेंड 2014 की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 4 करोड़ 56 लाख पंजीकृत बेरोज़गार हैं। यानी आबादी के 3.8 फ़ीसदी हिस्से के पास काम ही नहीं है। ये अपने माता-पिता या संरक्षक पर निर्भर होते हैं। इनका जीवन संकटपूर्ण होता है। बड़ी मुश्किल से पेट पाल पाते हैं और प्रलोभन दिए जाने पर अपराध की दुनिया में उतर जाते हैं। अपराध, नक्सलाइट या आतंकवाद की दुनिया में आने वाले 99 फ़ीसदी इसी कैटेगरी के होते हैं।

3. क्या है नौकरियों की हक़ीक़त ?
नौकरी में जिस आरक्षण ने देश के युवकों को अगड़े-पिछड़े या हिंदू-मुस्लिम के नाम पर आपस में लड़ा रहा है, उसकी हालत देखिए। इंडियन इकॉनमी में नौकरी की औक़ात केवल 2.3 फ़ीसदी है। यानी महज़ 2.3 फ़ीसदी के लिए युवक धर्म, जाति, क्षेत्र, भाषा और नस्ल के नाम पर बंटे हैं। इस नौकरी की संख्या महज 2.96 करोड़ है। यानी देश में कुल 2 करोड़ 96 लाख 50 हज़ार लोग ही ठीकठाक नौकरी करते हैं। यानी देश के युवकों की नज़र 97.7 फ़ीसदी हिस्से पर न होकर महज 2.3 फ़ीसदी हिस्से पर है।

बहरहाल, 2.96 करोड़ सेलरीड लोगों में 2 करोड़ लोग केंद्र सरकार, सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों की नौकरी के अलावा बैंक और दूसरे सावर्जनिक उपक्रम में काम करते हैं। केंद्र सरकार के पास 47 लाख कर्मचारी और 52 लाख पेंशन पाने वाले रिटायर्ड लोग हैं। अकेले भारतीय रेलवे में 13 लाख 34 हज़ार कर्मचारी हैं। अभी जो पे कमिशन लागू हुआ, उसका फायदा इन्हीं एक करोड़ कर्मियों को मिलेगा। ये लोग मुफ़्त की तनख्वाह लेते हैं। काम कुछ नहीं करते।

इसी तरह प्राइवेट सेक्टर में 96 लाख लोग नौकरी करते हैं। जिनमें 50 सबसे बड़ी निज़ी कंपनियों में बमुश्किल 10 लाख लोगों को नौकरी मिली हुई है। बाक़ी 86 लाख लोग छोटी-छोटी कंपनियों में काम करते हैं, जहां कंपनियां जब चाहें, उन्हें नौकरी से निकाल दें।

भारतीय बैंकों में कुल 11 लाख 51 हज़ार (पब्लिक सेक्टर बैंकों में 8 लाख 30 हजार, निजी बैंकों में 2 लाख 96 हज़ार और विदेशी बैंकों में क़रीब 25 हज़ार) कर्मचारी हैं। बैंको में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने सबसे ज़्यादा 1 लाख 98 हज़ार लोगों को नौकरी दे रखी है। इसी तरह देश की सबसे बड़ी कंपनी रिलांयस इंडस्ट्रीज़ में कुल 24,930 कर्मचारी हैं। अनिल अंबानी की रिलायंस ने अपनी बेवसाइट पर कर्मचारियों की संख्या नहीं लिखी है, परंतु माना जा रहा है कि कंपनी ने अपनी सभी कंपनियों में 20 हजार स्टॉफ रखे हैं। टाटा का कारोबार 100 से ज़्यादा देशों में हैं, इसकी बेवसाइट के मुताबिक़ समूह में 6 लाख कर्मचारी हैं। टाटा ने कितने भारतीयों को नौकरी दी है, इसकी ब्यौरा छुपा लिया है। विशेषज्ञों के मुताब़िक कंपनी ने 35 हज़ार भारतीय नागरिकों को नौकरी दी है।

देश के सबसे बड़े प्रकाशन समूह टाइम्स ऑफ इंडिया ने 11000 लोगों को नौकरी दी है। सबसे बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी माइक्रोसॉफ्ट है, जिसने पूरी दुनिया में एक लाख 18 हज़ार लोगों को नौकरी दी है। भारत में इसके पांच हज़ार से भी कम कर्मचारी हैं, जबकि भारत में सबसे ज़्यादा कमाई करती है। दूसरी सबसे बड़ी कंपनी अमेरिका की आईबीएम में 73 हज़ार कर्मचारी हैं। हिंदुस्तान यूनीलीवर के यहां 18000 लोग नौकरी करते हैं। नेस्ले कंपनी के पांचों मैगी प्लांट्स में 1500 लोग काम करते हैं और कंपनी हर साल 500 करोड़ रुपए मुनाफा कमाती है। इसी तरह सबसे बड़ी मोबाइल कंपनी वोडाफोन इंडिया के पास 11500 कर्मचारी हैं और यह कंपनी भारत से हर साल 20 हज़ार करोड़ कमाकर अपने देश भेजती है।

प्रजावर्ग की आबादी का 95 फ़ीसदी है। ये अनाज की बोरी की तरह ट्रेन में ठुंसने वाले लोग होते हैं। इनके न तो पैदा होने की नोटिस ली जाती है न ही मरने की। लोकतंत्र, लोकतंत्र के स्तंभ- कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका और मीडिया, तमाम व्यवस्थाएं- शासन-तंत्र, पुलिस, बैंक, सभी योजनाएं इनके लिए बेमानी हैं। चाहे साबित हो या न हो, पर पूरा देश जान गया है कि सत्ता के शिखर पर बैठे लोग महाभ्रष्ट हैं। ख़ुलेआम लूट रहे हैं। लूटमारी के धंधे में कोई नेता किसी से कम नहीं है। ये इतने निरंकुश हैं कि इन्हें अपने किए पर ज़रा भी पछतावा नहीं है। इनकी छांव में फल-फूल रहे, इनके चमचे, इन भ्रष्टों का बेखौफ़ होकर बचाव करते हैं। भारतीय क़ानून में बचाव-पक्ष को दिए जाने वाले मौक़े का नाजायज़ तरीक़े से दुरुपयोग कर रहे हैं।

दरअसल, क़ुदरत ने जो दिया है वह समस्त देशवासियों के लिए पर्याप्त है। लेकिन सत्ता में बैठे लालची लोगों ने आम लोगों के हिस्से के रिसोर्सेज़ पर भी क़ब्ज़ा कर लिया है। रूलिंग क्लास ने आम लोगों का हक़ मारने का सामाजिक और नैतिक अपराध किया है। लिहाज़ा इनके साथ अपराधियों की तरह सलूक किया जाना चाहिए। इनके लिए दंड निर्धारित किया जाना चाहिए।
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