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शनिवार, 30 अप्रैल 2011

अजब-गजब : जब मध्य रेलवे ने एलटीटी-गुवाहाटी एक्सप्रेस को बिना चार्ट के रवाना कर दिया।

हरिगोविंद विश्वकर्मा

जी हां, आपको यकीन नहीं होगा मगर बात सही है। मध्य रेलवे ने शनिवार (30 अप्रैल 2011) की सुबह ये कारनामा किया। दरअसल, कुर्ला के लोकमान्य तिलक टर्मिनस पहुंचने वाले यात्रियों को बताया गया कि सुबह 0805 बजे रवाना होने वाली एलटीटी-गुवाहाटी एक्सप्रेस दो से ढाई घंटे लेट है। और दस बजे के बाद ही रवाना होगी। फिर घोषणा की गई कि ट्रेन प्लेटफ़ॉर्म पर लगने वाली है। और ट्रेन 0808 बजे प्लेटफ़ॉर्म नंबर चार पर लग भी गई। कुछ लोग रिस्क लेकर चढ़ भी गए। लेकिन अधिकांश लोग चार्ट का इंतजार करने लगे। लेकिन 0835 तक चार्ट नहीं लगा। इसके बाद एक कर्मचारी चार्ट लेकर आया और एस-1 से चार्ट लगाना शुरू किया। वह एस-11 तक पहुंचा था कि ट्रेन रेंगने लगी। उसके बाद के कोचेज़ में चार्ट ही नहीं लगा। लोगों में अफरा-तफरी मच गई, दौड़कर ट्रेन में चढने लगे। किसी समझदार ने चेन पुलिंग करके ट्रोन रोक दी। लेकिन एक मिनट रुककर ट्रेन फिर रवाना हो गई। हालांकि क़रीब सभी यात्री ट्रेन में घुस गए। लेकिन उनमें ज्यादातर यात्री अपनी सीट पर नहीं पहुंच सके। सबसे ज्यादा परेशानी महिलाओं और बच्चों को हुई। बहरहाल, मध्य रेल के जनसंपर्क अधिकारी एके जैन को सूचना दी गई। उन्होंने एलटीटी के ऑन ड्यूटी स्टेशन मास्टर श्री गोयल से बात की तो उन्होंने स्वीकार किया कि गलती हो गई और खेद भी व्यक्त किया। उन्होंने कल्यण के रेल अधिकारियों से आग्रह किया कि वहां ट्रेन को थोड़ा देर रोक कर लोगों को अपने अपने सीट पर जाने में मदद करें। जिस ट्रेन में दो दो हज़ार से ज़्यादा यात्री यात्रा कर रहे हो उसके साथ इतनी लापरवाही के बदले क्या केवल सॉरी कहना काफी है... दरअसल, रेल में भ्रष्टाचार इस कदर घर कर गया है कि हर आदमी पैसे बनाने की ही जुगत में रहता है। जो भी पब्लिक को डिल करता है वह चाहता है किसी न किसी तरह पैसे बनाए। न तो किसी का ध्यान रेल गाड़ियों के आवागमन या उनमें बुनियादी सुविधाओं पर न ही यात्रियों की खोज-खबर परेशानी पर। इन दिनों गर्मियों की छुट्टी आ गई है हर कोई गांव जाना चाहता है लेकिन इन दिनों गांव जाना एक दिवास्वप्न जैसा हो गया है।

सोमवार, 25 अप्रैल 2011

बुरका महिला के लिए पुरुष की खोजी मोबाइल जेल

बुरक़ा पुरुष की महिला के लिए खोजी मोबाइल जेल
डॉ. शाज़िया नवाज़
हिंदी अनुवाद
हरिगोविंद विश्वकर्मा

हम सभी जानते हैं कि बुरक़े का धर्म या मज़हब से कोई लेना देना नहीं। धर्म केवल ये कहता है कि औरते ऐसे कपड़े पहने ताकि उच्चश्रृंखल न दिखें। फिर बुरक़ा या घूंघट आया कहा से? दुनिया भर में महिलाएं अपने चेहरे को ढंकती क्यों हैं? बुरक़ा पुरुष द्वारा खोजी गई वह चलती-फिरती जेल है जिसके अंदर वह उस स्त्री को रखता है जिससे वह प्रेम करता है। अगर इसमें मोहब्बत होती तो मैं इसे शायद मंज़ूर कर लेती। उस सूरतेहाल में यह जेल स्त्री को किसी दूसरे मायने में ज्यादा स्वीकार्य होती। तब किस स्वभाव का पुरुष उस इंसान को जेल में रखेगा जिसे वह मोहब्बत करता है। ऐसे में बुरक़ा उस तरह की जेल अधिक है जिसमें पुरुष ‘अपनी स्त्री’ को रखता है। औरत के ब्रेनवाश की प्रक्रिया बचपन में ही शुरू हो जाता है। बहुत कम उम्र में ही उसे बताया जाता है कि तुम्हें ख़ुद को पुरुषों से छिपाना है। तुम्हारा चेहरा छुपाकर रखना ‘धर्म’ है। औरत को पुरुषों से भयभीत रहना भी सिखाया जाता है। बहुत कम उम्र से औरत को बताया जाता है कि पुरुष ख़तरनाक़ होते हैं उन पर ऐतबार नहीं किया जा सकता। स्त्री से कहा जाता है, तुम केवल अपने पिता और भाई पर ऐतबार कर सकती हो। क्योंकि पुरुष आपको सहजता से फुसला सकता है। पाकिस्तान में तो औरतों को बताया जाता है ‘पुरुष भेड़िया यानी कामुक और क्रूर होता है जबकि औरत भेड़ या सीधी-सादी होती है।‘ इस नसीहत के चलते ही ज्यादतर पुरुष भेड़िये की तरह व्यवहार करने लगते हैं जबकि औरत भेड़ बन जाती है।

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हमारे पुरुष कहते हैं कि औरत को परदा करना चाहिए जबकि हम औरतों के पास पुरुष के लिए किसी तरह का विचार या नज़रिया नहीं होता। ये विचार औरत को नुकसान पहुंचाने और उनके साथ ज़ोर-ज़बरदस्ती करने का होता है। इसलिए वे (पुरुष) हमें (औरत) जेल में रखना चाहते हैं ताकि हमें लेकर उनका दिमाग़ साफ़ रहे। यह तो तोड़ा-मरोड़ा हुआ तर्क है। लेकिन क्या यक़ीनन उनका ये विचार यहां रुक जाता है? हक़ीक़त की दुनिया में उन्हें इससे कुछ फ़र्क़ नहीं पड़ता है कि आप बुरक़े में हैं, वे आपको तंग करेंगे ही। मेरा अनुभव बताता है कि चेहरे पर परदा सड़कों-गलियों में होने वाली छेड़छाड़ या छींटाकशी से मेरी कभी हिफ़ाज़त नहीं कर पाता। पाकिस्तान से छोटे शहरों में घर से निकलने पर हमेशा या मेरे फिता या मेरे भाई साथ होते हैं। अन्यथा गलियों से अकेले गुज़रते समय हमारे जिस्म पर चाहे जितने कपड़े हों, पुरुष चिल्लाएंगे, छींटाकशी करेंगे, पीछा करेंगे और हमारे जिस्म को छूने की कोशिश करेंगे।

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इसी के चलते औरत अपने घर से अकेली नहीं निकल सकती। और उसके साथ हमेशा घर का कोई पुरुष रहता है। पाकिस्तान और दूसरे मुस्लिम मुल्कों में पुरष अपने घर की औरतों की दूसरों से हिफ़ाज़त करते हैं। हां, लाहौर जैसे पाकिस्तान के बड़े शहरों में माहौल अलग होता है, आप यकीन करें या न करें. यहां औरतों को यौन-शोषण जैसी समस्या से औरत अपेक्षाकृत कम दो चार होती है। यहां हमारे आसपास के पुरुष सिर न ढंकने और परदा न करने वाली औरतों के सानिध्य आदी होते हैं। पुरुष अधिक शिक्षित होते हैं, इतना ही नहीं ख़ुद उनकी बहन और मां ज़्यादा आज़ाद होती हैं। आइए, अब बात करते हैं अमेरिका की, जी हां, यहां तो गलियों में पुरुष का व्यवहार अनुभव करना विस्मयकारी अनुभव रहा है। मैं जो चाहूं पहन कर आसपास जा सकती हूं। किसी की क्या मजाल की बुरी नज़र भी डाले। इससे मेरी समझ में आया कि बुरक़ा ख़तरनाक़ पुरुषों को हमसे दूर नहीं रखती, बल्कि यह समाज का धारण है। ख़ासकर क़ानून पर अमल का नतीजा जो किसी देश में स्त्री को महफ़ूज़ रखती है। हवाई के खूबसूरत बीच पर मस्ती भरी ठंड हवाओं के सुखद स्पर्श का मेरा पहला अनुभव हैरतअंगेज रहा। वरना पुरुष ने बुरक़ा कहे जाने वाले शामियाने में रखकर स्त्री से खुशनुमा मौसम को इंजॉय करने का उसका बुनियादी हक़ ही लूट लिया है। बुरक़े के भीतर अंधेरा होता है, गर्मी होती है, स्त्री को पुरुष ने वहां केवल इसलिए ढकेल दिया है कि स्त्री के बारे में उसके पास कोई विचार नहीं है तो वो बुरके के अंदर घुटती रहे रहे। डॉक्टर्स विचार को खुदा की बनाई स्वस्थ परंपरा मानते हैं। किसी सभ्य मुल्क में अगर सामने वाले की रज़ामंदी के बग़ैर आपने अपने विचार उस पर थोपने की कोशिश की तो आप 10-20 साल के लिए जेल भेज दिए जाएंगे।

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दबाए हुए समाज के पुरुष के लिए ये समझना बड़ा मुश्किल है कि खुले समाज के पुरुष वास्तव में अपने विचार पर अंकुश लगाना सीख गए हैं और उसके लिए वे औरतों पर दोषारोपण नहीं करते। जब फ्रांस में बुरक़े पर रोक की बात आती हैं, जहां यह तर्क दिया जाता है कि औरत जो चाहे उसे पहनने की आज़ादी होनी चाहिए और ये आज़ादी काम नहीं करती... हर समाज में ड्रेसकोड और आज़ादी की एक सीमा है। आपकी आज़ादी वहीं ख़त्म हो जाती है जहां से हमारा रास्ता शुरू होता है। नंगेपन के पैरोकार अकसर मांग करते हैं कि सड़क पर बिना कपड़े के घूमना उनका अधिकार और आज़ादी है जो पूरी होनी चाहिए। ज़ाहिर है उन्हें उन्हें इसकी इजाज़त नहीं दी जा सकती ताकि दूसरे समाज में अव्यवस्था न फैले। इसी तरह एक इंसान की उपर से नीचे तक परदे में रहना भी सुरक्षा के लिए ख़तरा हो सकता है। आपको पता ही नहीं परदे में कौन है। ये अब ख़तरनाक दुनिया हो गई है। आप अपने बच्चे को पार्क में खेलने की इजाज़त नही दे सकता जहां सिर से पांव तक बुरके में ढंके लोग बैठे हैं। क्या मुसलमानों को फ्रांस से बुरक़े पर रोक लगाने की मांग करने का अधिकार है ऐसे में जब पश्चिम की औरते कम कपड़े में मुस्लिम देशों नहीं घूम सकती। आप उम्मीद कर रहे हैं कि वे आपकी संस्कृति का सम्मान करें और जब वे आपके देश में आए तब भी और जब आप उनके यहां जाए तब भी।

(नोट.. सुश्री शाज़िया नवाज़ पाकिस्तान की प्रमुख लेखिका और बुद्धिजीवी हैं, फ़्रांस में बुरक़े पर रोक लगाने के फ़ैसले पर पाकिस्तान में बहस चल रही है, उस बहस में शिरकत करते हुए बुरक़े पर उनका यह अंग्रेज़ी आर्टिकल पाकिस्तान की प्रमुख बेवसाइट “लेट अस बिल्ड पाकिस्तान” में प्रकाशित हुआ है। उसी लेख का यह हिंदी अनुवाद है।)

रविवार, 10 अप्रैल 2011

A Letter to Pakistani Friends By Hari Govind Vishwakarma

I fully agree with you, I would like to suggest you, please once go to Jammu & Kashmir and live for at least one year. Believe me; your thinking, perception and mind-set about valley will totally be changed. If we talk about the freedom, it means we should be ruled by our own people. Am I right? So, I will tell you the reality of this so-called freedom.


India and Pakistan got freedom in 1947 and since then two counties have been ruled by their own people, India by politicians and Pakistani by politicians and army rulers (Generals are also our own people). But, if you will compare our rule with British, you will say British rulers were much much better. We will talk about India as this country enjoyed fully democratic system of governance.

It means, if you are ruling by your own people then there should not any discrimination, partiality, injustice with any citizen or violation of human rights of people but I am sorry to say this is not happening in India (I can’t say about your country but firmed that same thing happening in other part of this sub-continent). Why this is happening? Any moment you thought?

I am telling you; actually the entire population in India and Pakistan have divided into ruling class and ruled class. The population of ruling class is less than 10 percent but they possessed more than 90 assets and resources of the nation while the population of ruled class is more than 90 percent but they have only less than 10 percent assets and resources of the country. So the ruled class fights one another for snatching their share in remaining 10 percent assets and resources.

The ruling class is enjoying everything, including VIPs-status while ruled class is facing so hardship even for bread and butter. In Mumbai, Mukesh Ambani, (ruling class person) has constructed 35 story-apartment (which monthly electric bill is Rs 35 laks) as his residence while lakhs of people (ruled class) are living in slum without any facility. It means ruling class was never bother about the ruled class. So ruling class must boost on freedom, self-sules etc.

Now come to Jammu and Kashmir. This state is also ruling by their-own people since 1948 when Raja Hari Singh and Lord Mountbatten signed the letter after accession to India. The state was ruled by RC Kak, Mehr Chand Mahajan, Sheikh Abdullah, Bakshi Ghulam Mohammad, Khwaja Shamsuddin, Ghulam Mohammed Sadiq, Syed Mir Qasim, Farooq Abdullah, Ghulam Mohammad Shah, Mufti Mohammad Sayeed, Ghulam Nabi Azad and Omar Abdullah , all these people were Kashmiri.

Despite so huge amount of help from centre state is not self-dependent. This state is the second most corrupt state in the country. I visited everywhere but more than 30 percent areas are still deprived by road connectivity. There are only two hospitals one each at Jammu and Srinagar. So most of injured or patients lose their lives during on the way. Student from Punchh, Rajouri, Doda, Ramban, Kishtwar, Baramula, Kupwada and Bodinpura come to Jammu or Srinagar for higher education.

Means all facilities, entertainment, health service, education, sports and administration are centralized to Jammu and Srinagar. Ruled class is deprived and ruling class is enjoying the life. In remote areas youth don’t have job or employment, people don’t have source of income. They need food, cloth, house, education, employment first later power or freedom.

One more point, this is big conspiracy of ruling class that ruled class people, army soldiers and militants (according to you freedom fighter), are killing each other while people from ruling class, politicians, are busy in dialogues in air-conditioned rooms in New Delhi.

Just tell me who is enjoying more freedom, people in India or in Pakistan? I think the democratic government is more liberal so Indian are enjoying more freedom than Pakistan as your country has been ruling by Generals most of time. The geography and topography of Jammu and Kashmir do not allow the freedom. It will be with India or Pakistan otherwise it will be captured by China as China captured Tibet in 1949.

I think our object must be better governance and equal opportunities for everyone. This is much better than freedom. I think you will be agreed with me.

रविवार, 20 फ़रवरी 2011

कसाब शायद दस साल तक ज़िंदा रहे...

हरिगोविंद विश्वकर्मा
मुंबई पर आतंकवादी हमले में शामिल रहे एकमात्र ज़िंदा हमलावर मोहम्मद आमिर अजमल क़साब को फ़ांसी देने की पुष्टि बॉम्बे हाईकोर्ट ने अभी कुछ देर पहले (22 फरवरी) कर दी, लेकिन देश की जटिल न्यायिक और प्रशासनिक व्यवस्था के चलते क़साब अगर आने वाले दस साल तक ज़िदा रहे तो किसी को हैरान नहीं होना चाहिए।

फिलहाल, न्यायिक प्रक्रिया दूसरा दौर अभी-अभी खत्म हुआ है। क़साब ने विशेष अदालत के मौत की सज़ा के फ़ैसले को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। जहां 292 दिन बाद निचली अदालत के फ़ैसले पर महाराष्ट्र की सबसे बड़ी अदालत ने भी अपनी मुहर लगा दी। हालांकि अब भी क़साब को फांसी पर लटकाना संभव नहीं।

क़साब को फ़ौरन फ़ांसी देने की मांग करने से पहले यह नहीं भूलना चाहिए कि हम एक सभ्य समाज में रहते हैं। हमारे देश में लोकतंत्र है जिसके तीन स्तंभों में से एक न्यायपालिका भी है। देश में अपराधियों को दंडित करने के लिए क़ायदे-क़ानून बनाए हैं। आरोपी को सज़ा उसी के अनुसार दी जाती है। क़साब को भी दंडित करने की प्रक्रिया चल रही है। मसलन, 26 नवंबर 2008 को क़साब की गिरफ़्तारी के बाद हमले से जुड़े हर पहलू की जांच हुई। जल्दी सज़ा देने के लिए ही विशेष अदालत का गठन किया गया। जहां छह मई 2010 को क़साब को मृत्युदंड का फ़रमान सुनाया जा चुका है और उस सज़ा को 22 फरवरी 2011 को बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी अप्रूव्ड कर दिया है। विदेशी नागरिक को सज़ा सुनाने से पहले भारत में उसे बचाव का पूरा मौक़ा दिया जा रहा है क्योंकि देश में गहरी जड़ों वाला लोकतंत्र ही नहीं है बल्कि निष्पक्ष और पारदर्शी न्यायपालिका भी है।

जो लोग क़साब को फ़ांसी पर लटकता (हालांकि इन पंक्तियों का लेखक भी न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद क़साब को सज़ा देने का समर्थन करता है) देखना चाहते हैं, उन्हें अभी बहुत लंबा इंतज़ार करना होगा। अभी क़साब इंसाफ़ के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटा सकता है। वहां भी केस पर लंबी बहस चलेगी। और अगर देश की सबसे बड़ी अदालत में भी क़साब को कोई राहत न मिली तो भी पाकिस्तानी आतंकी सर्वोच्च न्यायालय में ही पुनर्विचार याचिका दायर कर सकता है। और अदालत से पूरी तरह निराश होने का बाद आख़िर में क़साब राष्ट्रपति के यहां जीवनदान की अपील कर सकता है।

राष्ट्रपति के पास भी 2001 में संसद पर हमला करने की साज़िश रचने वाले मोहम्मद अफजल उर्फ अफ़ज़ल गुरू समेत करीब 30 मर्सी पिटिशन पहले से ही विचाराधीन हैं। इनमें से २४ राष्ट्रपति सचिवालय और तीन गृह मंत्रालय में विचाराधीन हैं जबकि दो पर राज्य सरकारों की राय की प्रतीक्षा है। राष्ट्रपति के यहां विचाराधीन अपील में अफ़ज़ल की याचिका का 27वां नंबर है। यहां यह नहीं भूलना चाहिए कि अफ़ज़ल की तमाम अपील को खारिज़ कर सुप्रीम कोर्ट 2004 में ही उसे फ़ांसी की सज़ा सुना चुका है। इस लश्कर आतंकी को 20 अक्टूबर 2006 को फ़ांसी दी भी जाने वाली थी। लेकिन राष्ट्रपति के दरबार में दया की गुहार लगाने के बाद उसकी फ़ांसी टल गई।

राष्ट्रपति के यहां विचाराधीन दया याचिकाओं के निबटारे की ताजा गति पर गौर करें तो अगले 10 साल तक अफजल की बारी शायद ही आए। मौके दर मौके राजनीतिक दल अफजल को फांसी पर लटकाने की मांग सरकार से करते रहे हैं।

कानून मंत्री वीरप्पा मोइली तल्ख़ लहज़े में कहते हैं कि जहां विधि का शासन है वहां किसी को पकड़कर ज़बरन फ़ांसी पर नहीं लटकाया जा सकता है। वे यह भी मानते हैं कि दया याचिकाओं के शीघ्र निबटारे के लिए क़ानूनगत प्रक्रिया में सुधार की सख़्त ज़रूरत है। लेकिन ऐसे सुधार की पहल कब होगी, इसका ठीक-ठीक जवाब उनके पास भी नहीं है। क़ानून की यही विवशता रही तो अफ़ज़ल को लंबे समय तक फ़ांसी पर लटकाना मुमकिन नहीं लग रहा है। क्योंकि दया याचिकाओं के निबटारे की गति बेहद चिंताजनक है। गृह मंत्रालय की ही मानें तो पिछले एक वर्ष में एक भी दया याचिका का निबटारा नहीं किया जा सका है।

कहने का मतलब अफ़ज़ल को सज़ा सुनाने के छह साल बाद भी दंडित नहीं किया जा सका है तो क़साब को क़ानूनी प्रक्रिया मुक़म्मिल किए बिना कैसे फ़ांसी पर चढ़ाया जा सकता है। क़साब के लिए देश की ज्यूडिशियरी सिस्टम बदली तो नहीं जा सकती। लिहाज़ा क़साब को फ़ांसी देने की मांग करने वालों को लंबे इतज़ार के लिए तैयार रहना होगा।

वैसे, 1996 में शंकर दयाल शर्मा ने राजस्थान के राम चंद्र रावजी की दया याचिका पर छह दिन में ही फैसला सुनाया था। अपील राष्ट्रपति के पास 13 मार्च, 1996 को भेजी गई और 19 मार्च को खारिज हो गई। पिछले तीन दशकों में राष्ट्रपतियों ने केवल 77 क़ैदियों की दया याचिकाओं पर निर्णय दिया।

राष्ट्रपति के पास सबसे पुरानी दया अपील यूपी के श्याम, शिवराम, प्रकाश, रवींद्र और हरीश की है। फ़ांसी पर तामील करने का सबसे ताजा मामला छह साल पुराना है। 14 अगस्त 2004 को कोलकाता में धनंजय चटर्जी को फांसी दी गई। महाराष्ट्र में आखिरी बार 26 अगस्त, 1995 को सुधाकर जोशी को फांसी दी गई थी। उससे पहले जनरल अरुण कुमार वैद्य के हत्यारे सुक्खा और जिंदा 9 अक्टूबर, 1992 को फांसी पर लटकाए गए। फिलहाल राज्य में क़साब समेत 58 को मौत की सज़ा मिली है। सबकी अपील हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन हैं। एक दया याचिका राष्ट्रपति के पास है। देश में मृत्युदंड पाए क़ैदियों की संख्या 1177 है।

वैसे भी अगर पाकिस्तानी आतंकी अजमल क़साब को फ़ांसी दी जाती है तो सबसे पहले जल्लाद का जुगाड़ करना होगा। महाराष्ट्र में 1997 में आरएस जाधव के रिटायर होने के बाद से देश में कोई जल्लाद नहीं है। जेल मैनुअल के हिसाब से जल्लाद हर फ़ांसी पर अमल के एवज में 75 रुपये लेता हैं। पहले लोग पीढ़ी दर पीढ़ी यह पेशा अपनाते थे, पर नई पीढ़ी इसमें नहीं आ रही। ब्रिटेन समेत 95 देशों में मृत्युदंड पर रोक है।

एक बात और क़साब के पक्ष में जाती है। दरअसल, आतंकवाद ज़हर भारत अस्सी के दशक से ही पी रहा है। पहले पंजाब में आतंकवाद और उसके बाद जम्मू-कश्मीर में दहशतगर्दी। यानी ख़ून-ख़राबे का सिलसिला शुरू होने के बाद से ही भारत पूरी दुनिया से कहता आ रहा है कि देश में मानवनिर्मित विनाश के लिए पड़ोसी मुल्क़ पाकिस्तान ज़िम्मेदार है। लेकिन इस्लामाबाद नई दिल्ली के आरोप को सिरे से खारिज़ कर प्रत्यक्ष सबूत मांगता रहा है। यहां तक कि आतंकी के रूप में भारतीय सरज़मीन पर मारे गए अपने नागरिकों के शव भी लेने से पाकिस्तान कतराता रहा है। इसलिए क़साब भारत के लिए अहम है क्योंकि मुंबई आतंकी हमले के दौरान तुकाराम ओंबले द्वारा पकड़ा गया यह आतंकी वह ज़िंदा सबूत है जिसे पाकिस्तानी हुक़्मरान झुठला नहीं सके। इसीलिए क़साब देश का सबसे महंगा क़ैदी है और मुंबई के आर्थर रोड जेल में उसकी सुरक्षा पर हर रोज़ क़रीब 85 लाख रुपए ख़र्च हो रहे हैं। वस्तुतः पाकिस्तानी नागरिक के रूप में क़साब की पहचान के बाद ही भारत पड़ोसी मुल्क़ पर दबाव बनाने में क़ामयाब रहा। इतना ही नहीं, भारत में किसी भी आतंकी हमले में अपना हाथ होने की बात पहली बार पाकिस्तान ने क़बूल किया। चाहे वह ख़ानापूर्ति ही कर रहा है लेकिन दुनिया भर को बता तो रहा है कि हमले की साज़िश के सूत्राधार जकीउर रहमान लखवी समेत लश्कर-ए-तैयबा के कई लोगों के ख़िलाफ़ पाकिस्तानी अदालत में आरोप पत्र दायर किया जा चुका है। अगर भारत ने कूटनीतिक प्रयास ऐसे ही जारी रखा तो इस्लामाबाद देर-सबेर लश्कर चीफ़ हाफ़िज़ मोहम्मद सईद के ख़िलाफ़ कार्रवाई के लिए मज़बूर हो जाएगा। इसलिए भारत क़साब के रूप में मिले इस बेशकीमती सबूत की जान लेकर उसे नष्ट नहीं करना चाहेगा, यही बात क़साब की जीवन-अवधि बढा देगी। (समाप्त)

रविवार, 30 जनवरी 2011

अयोध्या में न तो बाबरी मस्जिद थी न ही राम मंदिर

हरिगोविंद विश्वकर्मा
अयोध्या में जिस विवादित स्थल को लेकर छह दशक से ज़्यादा समय से देश में सांप्रदायिक दंगे-फ़साद हो रहे हैं, जिनमें लाखों लोग मज़हब के नाम पर अपनी आहुति दे चुके हैं और जिसके चलते आज भी करोड़ों धर्मांध हिंदू और मुसलमान एक दूसरे के ख़ून के प्यासे हैं, वहां न तो कभी बाबरी मस्जिद नाम की कोई मस्जिद थी न कोई राम मंदिर, जिसे तोड़कर मस्जिद बनवाई गई हो। यह ख़ुलासा आज से दस साल पहले ही हो चुका है और यह किसी ऐरे-ग़ैरे ने नहीं, देश के शीर्षस्थ कालजयी साहित्यकार और साहित्य अकादमी पुरस्कार पाने वाले उपन्यासकार कमलेश्वर ने दस साल के गहन शोध, अध्ययन और तफ़तीश के बाद लिखे उपन्यास ‘कितने पाकिस्तान’ में किया है। सन् 2000 में प्रकाशित इस उपन्यास को नामवर सिंह, विष्णु प्रभाकर, अमृता प्रीतम, राजेंद्र यादव, कृष्णा सोबती, हिमांशु जोशी और अभिमन्यु अनत जैसे मूर्धन्य साहित्यकारों ने विश्व-उपन्यास की संज्ञा देते हुए इसकी दिल खोलकर प्रशंसा की है। कई प्रतिष्ठित हिंदी-अंग्रेज़ी अख़बारों में उपन्यास की समीक्षा भी प्रकाशित हो चुकी है। मज़ेदार बात यह है कि भारत सरकार ने भी इस किताब को मान्यता दी है। अटलबिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार ने उपन्यास में पाकिस्तान बनने के बारे में दिए गए तथ्यों की दिल खोलकर तारीफ़ की थी और इसे साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाज़ा था। ग़ौरतलब है कि साहित्य अकादमी केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय के अधीन आता है और तब उसके मुखिया हिंदुत्व और राम मंदिर आंदोलन के बहुत बड़े पैरोकार डॉ. मुरली मनोहर जोशी थे। अगर कमलेश्वर के निष्कर्ष से सरकार को किसी भी तरह की आपत्ति होती तो कम से कम उन्हें सरकारी पुरस्कार नहीं दिया जाता। ये माना जाता है कि कोई सरकार किसी किताब को पुरस्कृत कर रही है तो वह सरकार उसमें लिखी हर बात से सहमत है।

बहरहाल, कमलेश्वर ने समय और किरदार की सीमाओं को तोड़कर बड़ी खूबसूरती से ‘कितने पाकिस्तान’ की रचना की है जिसमें ‘अदीब’ यानी लेखक ‘समय की अदालत’ लगाता है जिसमें महात्मा गांधी, मोहम्मद अली जिन्ना, अली बंधु, लार्ड माउंटबेटन, बाबर, हुमायूं, कबीर जैसे सैकड़ों विश्व-इतिहास के अहम किरदारों ने ख़ुद अपने अपने बयान दिए हैं। इसके अलावा कई दर्जन विश्व-प्रसिद्ध इतिहासकारों ने भी इस अनोखी अदालत में हर विवादास्पद घटनाओं पर गवाही दी है। किताब में इन्हीं बयानों और अंग्रेज़ों के कार्यकाल में तैयार गजेटियर, पुरातत्व विभाग के दस्तावेज़ों और इतिहास के नामचीन हस्तियों की आत्मकथाओं में उपलब्ध जानकारी को आधार बनाया गया है। जिनकी प्रमाणिकता पर संदेह करने का सवाल ही नहीं उठता।

‘कितने पाकिस्तान’ में कमलेश्वर ने कई अध्याय अयोध्या मुद्दे को समर्पित किया है। उपन्यास के मुताबिक अयोध्या में मस्जिद बाबर के आक्रमण और उसके भारत आने से पहले ही मौजूद थी। बाबर आगरा की सल्तनत पर 20 अप्रैल 1526 को क़ाबिज़ हुआ जब उसकी सेना ने इब्राहिम लोदी को हराकर उसका सिर क़लम कर दिया। एक हफ़्ते बाद 27 अप्रैल 1526 को आगरा में बाबर के नाम का ख़ुतबा पढ़ा गया।

मज़ेदार बात यह है कि ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी माना है कि अयोध्या में राम मंदिर को बाबर और उसके सूबेदार मीरबाक़ी ने 1528 में मिसमार करके वहां बाबरी मस्जिद का निर्माण करवाया। मीरबाक़ी का पूरा नाम मीरबाक़ी ताशकंदी था और वह अयोध्या से चार मील दूर सनेहुआ से सटे ताशकंद गांव का निवासी था। इसी तथ्य को आधार बनाकर हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने सितंबर में बहुप्रतीक्षित ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाया है। जिस पर अभी तक प्रतिक्रियाएं आ रही हैं।

दरअसल, अयोध्या की मस्जिद (बाबरी मस्जिद नहीं) में एक शिलालेख भी लगा था जिसका जिक्र अंग्रेज़ अफ़सर ए फ़्यूहरर ने कई जगह किया है। फ़्यूहरर ने 1889 में आख़िरी बार उस शिलालेख को पढ़ा जिसे बाद में, किताब के अनुसार, अंग्रेज़ों ने नष्ट करवा दिया। शिलालेख के मुताबिक अयोध्या में मस्जिद का निर्माण इब्राहिम लोदी के आदेश पर 1523 में शुरू हुआ और 1524 में मस्जिद बनकर तैयार हुई। इतना ही नहीं, शिलालेख के मुताबिक, मस्जिद किसी मंदिर को तोड़कर नहीं बल्क़ि ख़ाली जगह पर बनवाई गई थी। इसका यह भी मतलब होता है कि अगर विवादित स्थल पर राम या किसी दूसरे देवता का मंदिर था, जिसके अवशेष खुदाई करने वालों को मिले हैं, तो वह 15वीं सदी से पहले नेस्तनाबूद कर दिया गया था या ख़ुद नष्ट हो गया था। उसे कम से कम बाबर या मीरबाक़ी ने नहीं तोड़वाया जैसा कि इतिहासकारों का एक बड़ा तबक़ा और अनेक हिंदूवादी नेता कई दशक से मानते और दावा करते आ रहे हैं।

‘कितने पाकिस्तान’ के मुताबिक मस्जिद में इब्राहिम लोदी के शिलालेख को नष्ट करने में अंग्रेज़ अफ़सर एचआर नेविल ने अहम भूमिका निभाई। वह सारी ख़ुराफ़ात और साज़िश का सूत्राधार था। उसने ही आधिकारिक तौर पर फ़ैज़ाबाद का गजेटियर तैयार किया। नेविल की साज़िश में दूसरा फ़िरंगी अफ़सर कनिंघम भी शामिल था जिसे अंग्रेज़ी हुक़ूमत ने हिंदुस्तान की तवारिख़ और पुरानी इमारतों की हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी दी थी। कनिंघम ने बाद में लखनऊ का गजेटियर भी तैयार किया। किताब के मुताबिक दोनों अफ़सरों ने धोखा और साज़िश के तहत गजेटियर में दर्ज किया कि 1528 में अप्रैल से सितंबर के बीच एक हफ़्ते के लिए बाबर अयोध्या आया और राम मंदिर को तोड़कर वहां बाबरी मस्जिद नींव रखी थी। यह भी लिखा कि अयोध्या पर हमला करके बाबर की सेना ने एक लाख चौहत्तर हज़ार हिंदुओं को हलाक़ किया जबकि फ़ैज़ाबाद के गजेटियर में आज भी लिखा है कि 1869 में, उस लड़ाई के क़रीब साढ़े तीन सौ साल बाद, अयोध्या-फ़ैज़ाबाद की कुल आबादी महज़ दस हज़ार थी जो 1881 में बढ़कर साढ़े ग्यारह हज़ार हो गई। सवाल उठता है कि जिस शहर की आबादी इतनी कम थी वहां बाबर या उसकी सेना ने इतने लोगों को हलाक़ कैसे किया या फिर इतने मरने वाले कहां से आ गए? यहीं, बाबरी मस्जिद के बारे में देश में बनी मौजूदा धारणा पर गंभीर सवाल उठता है।

बहरहाल, हैरान करने वाली बात यह है कि दोनों अफ़सरों नेविल और कनिंघम ने सोची-समझी नीति के तहत बाबर की डायरी बाबरनामा, जिसमें वह रोज़ाना अपनी गतिविधियां दर्ज करता था, के 3 अप्रैल 1528 से 17 सितंबर 1528 के बीच 20 से ज़्यादा पन्ने ग़ायब कर दिए और बाबरनामा में लिखे ‘अवध’ यानी ‘औध’ को ‘अयोध्या’ कर दिया। उल्लेखनीय बात है कि मस्जिद के शिलालेख का फ़्यूहरर द्वारा किए गए अनुवाद को ग़ायब करना अंग्रेज़ अफ़सर भूल गए। वह अनुवाद आज भी आर्कियोल़जिकल इंडिया की फ़ाइल में महफ़ूज़ है और ब्रितानी साज़िश से परदा हटाता है। इसके अलावा बाबर की गतिविधियों की जानकारी बाबरनामा की तरह हुमायूंनामा में भी है। लिहाज़ा, बाबरनामा के ग़ायब पन्ने से नष्ट सूचना हुमायूंनामा से ली जा सकती है। हुमायूंनामा के मुताबिक 1528 में बाबर अफ़गान हमलावरों का पीछा करता हुआ घाघरा (सरयू) नदी तक अवश्य गया था लेकिन उसी समय उसे अपनी बीवी बेग़म मेहम और अन्य रानियों और बेटी बेग़म ग़ुलबदन समेत पूरे परिवार के काबुल से अलीगढ़ आने की इत्तिला मिली। बाबर लंबे समय से युद्ध में उलझने की वजह से परिवार से मिल नहीं पाया था इसलिए वह तुरंत अलीगढ़ रवाना हो गया। पत्नी-बेटी और परिवार के बाक़ी सदस्यों को लेकर वह अपनी राजधानी आगरा आया और 10 जुलाई तक उनके साथ आगरा में ही रहा। उसके बाद बाबर परिवार के साथ धौलपुर चला गया। वहां से सिकरी पहुंचा, जहां सितंबर के दूसरे हफ़्ते तक रहा।

ग़ौर करने वाली बात यह भी है कि, पुस्तक के मुताबिक, गोस्वामी तुलसीदास से पहले जम्बूद्वीप (तब भारत या हिंदुस्तान था ही नहीं था सो इस भूखंड को जम्बूद्वीप कहा जाता था) के हिंदू धर्म के अनुयायी नटखट कृष्ण और फक्कड़ शंकर की पूजा करते थे। तब राम का उतना क्रेज नहीं था। राम का महिमामंडन तो तुलसीदास ने किया और रामचरित मानस रचकर राम को हिंदुओं के घर-घर प्रतिष्ठित कर दिया। तुलसीदास १४९८ में पैदा हुआ और बाबर के कार्यकाल तक वह किशोर था और पत्नी का दीवाना तुलसादास अपनी मायावी दुनिया में मशगूल था। तुलसी ने रामचरित मानस की रचना बुढापे में की जो हुमायूं और अकबर का दौर था। रामचरित मानस के प्रचलन में आने के बाद ही राम हिंदुओं के देवता नंबर वन बने।
कुल मिलाकर ‘कितने पाकिस्तान’ में कमलेश्वर ने ऐतिहासिक तथ्यों का सहारा लेकर कहा है कि 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेज़ चौकन्ने हो गए और ब्रिटिश इंडिया की नई पॉलिसी बनाई जिसके मुताबिक अगर इस उपमहाद्वीप पर लंबे समय तक शासन करना है तो इस भूखंड को धर्म के आधार पर विभाजित करना होगा। ताकि हिंदू और मुसलमान एक दूसरे से ही लड़ते रहें और उनका ध्यान आज़ादी जैसे मुद्दों पर न जाए। और, इसी नीति के तहत इब्राहिम लोदी की बनवाई मस्जिद ‘बाबरी मस्जिद’ बना दी गई और उसे ‘राम मंदिर’ से जोड़कर एक ऐसा विवाद खड़ा कर दिया जो सदियों तक हल नहीं हो। अंग्रेज़ निश्चित रूप से सफल रहे क्योंकि उस वक़्त पैदा की गई नफ़रत ही अंततः देश के विभाजन की मुख्य वजह बनी।

(समाप्त)

(Note: This article was written by Hari Govind Vishwakarma in 2003 (then he was bureau chief of UNI at Varanasi) when Kamleshwar got Sahitya Academy award but could't publish due to some reason)

बुधवार, 5 जनवरी 2011

राष्ट्रीय एकता के वाहक बनते टीवी सीरियल

हरिगोविंद विश्वकर्मा.
मनोरंजन टेलीविज़न चैनलों पर आने वाले धारावाहिकों की एक्स्ट्रामैरिटल अफ़ेयर और चाइल्ड-लेबर जैसे मसले पर चाहे जितनी आलोचना की जाए या विरोध हो लेकिन इतना तो सच है कि ये सीरियल्स फिलहाल राष्ट्रीय एकता के वाहक बनते जा रहे हैं। सोमवार से शुक्रवार शाम सात बजे से रात ग्यारह बजे तक प्रमुख टीवी चैनलों पर प्रसारित होने वाले इन धारावाहिकों को नियमित देखने से देश के दूसरे हिस्से लोगों की जीवन-शैली और भाषा की जानकारी मिल रही है। ऐसे में कहें कि इन धारावाहिकों से देश की क्षेत्रीय जीवनशैली, भाषा, सभ्यता और संस्कार का गुपचुप तरीक़े से विस्तार हो रहा है तो कतई अतिशयोक्ति न होगा। वस्तुतः ये धारावाहिक हिंदी में हैं लेकिन इनकी कहानी और जीवनशैली अलग-अलग संस्कृति-भाषा का प्रतिनिधित्व करती है। संवादों में क्षेत्रीय भाषाओं और वेशभूषा के इस्तेमाल से इसे स्थानीय टच मिल रहा है।

मसलन, ज़ीटीवी पर नौ बजे आने वाले “पवित्र रिश्ता” में मराठीभाषी परिवारों की कहानी है। जिसमें बीच-बीच में पात्र मराठी बोलते हैं जिन्हें ग़ैर-मराठी दर्शक भी आसानी से समझ लेते हैं। ऐसे में कहा जा सकता है कि यह धारावाहिक मराठी भाषा और मराठी संस्कृति को देश के अन्य हिस्से में पहुंचा रहा है। दूसरे प्रांतों के लोग जानने लगे हैं कि महाराष्ट्र या मुंबई में मराठी परिवार किस तरह रहता है और किस तरह की समस्याओं से दो-चार होता है। “अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो” में उत्तरप्रदेश के ठाकुर परिवार की कहानी है। जिसमें पूर्वांचल की वेशभूषा और भोजपुरी मिश्रित अवधी भाषा से देश के बाक़ी हिस्से के लोग रूबरू हो रहे हैं। सहारा वन पर आने वाले सीरियल “बिट्टो” में भी उत्तरप्रदेश की ही कहानी है और निचली जाति पर ऊंची जाति के अत्याचार की थीम पर आधारित है। “छोटी बहू” में ब्रजभाषा और मथुरा के आसपास रहने वाले लोगों की जीवन शैली देखने-सुनने को मिल रहा है। खासकर राजपुरोहित परंपरा को दिखाया जा रहा है। ठीक इसी तरह की कहानी स्टार प्लस के “प्रतिज्ञा” की है, जहां पूर्वांचल की वेशभूषा और भाषा दिखती है। “12/24 करोल बाग” और स्टार वन के “गीत हुई परायी” जैसे धारावाहिकों के पंजाबी डॉयलॉग दूसरी भाषा के लोग भी समझने लगे हैं। “मैं घर-घर खेली“ में उज्जैन के दो परिवार की कहानी है जहां मालवा जीवनशैली और भाषा दिखती है। “ससुराल गेंदा फूल” देश की राजधानी दिल्ली खासकर पुरानी दिल्ली की संस्कृति का दीदार होता है और वहां बोली जाने वाली भाषा सुनने को मिलती है। स्टार प्लस के “ये रिश्ता क्या कहता है” में उदयपुर में रहने वाले परंपरागत मारवाड़ी परिवार की कहानी है। इसके विपरीत कलर्स के चर्चित और विवादास्पद धारावाहिक “बालिका वधू” में राजस्थान के देहात में रहने वाले परिवारों दिनचर्या और रहन-सहन की कहानी है। इस सीरियलों में दर्शकों को मारवाड़ी भाषा के डॉयलॉग सुनने को मिलते हैं जिसे लोग अब आसानी से समझने लगे हैं। इसी चैनल पर ही अभी हाल ही शुरू “तेरे लिए” में बंगाली जीवन शैली और संस्कृति की झलक मिलती है, खासकर आदमियों द्वारा खींचा जाने वाले इक्के को देख सकते हैं। “चांद छुपा बादल” में शिमला में रहने वाले परिवारों की कहानी और जीवन शैली बयां करती है। इसमें भी संवादों में ज़्यादातर स्थानीय पहाड़ी भाषा सुनने को मिलती है। स्टार प्लास की लाडली, सोनी टीवी के चर्चित सीरियल “रंग बदलती ओढ़नी” और सब टीवी के “तारक मेहता का उल्टा चश्मा” में गुजराती परिवारों की कथाएं हैं तो “मिस्टर ऐंड मिसेज़ शर्मा इलाहाबाद वाले” में इलाहाबाद की कहानी है। इमैजिन के सीरियल “काशी” बिहार में निचले तबके की कहानी है जहां बचपन में ही लड़कियां व्याह दी जाती हैं। इस धारावाहिक में भोजपुरीयुक्त संवाद भी सुनने को मिलते हैं। सीरियल को संवाद के जरिए स्थानीय टच देने की सफल कोशिश की गई है। स्टारप्लस पर आने वाला “मर्यादा” हरियाणा और पश्चिम उत्तर प्रदेश का रहन-सहन पर बेस्ड है। कलर्स के “न आना इस देश में लाड़ो” में उस समाज की कहानी है, जहां विवाह में गोत्र अहम माना जाता है। “मान रहे तेरा पिता” छत्तीसगढ़ में कोयले की खान की पृष्ठभूमि पर आधारित पिता-पुत्री के रिश्ते की भावनात्मक कहानी है। इसमें भी संवाद में भी स्थानीय भाषा होती है।

भाषा और रहन-सहन के अलावा कई धारावाहिक हिंदुस्तानी समाज की परंपराओं के अलावा सामाजिक बुराइयों-कुरीतियों पर आधारित हैं। सोनी टीवी पर गोद भराई ऐसा ही धारावाहिक है जिसमें “गोद भराई” का धार्मिक संस्कार है। यह देश के हर हिस्से में मनाया जाता है खासकर घर की गर्भवती महिला के सात महीने पूरे करने पर होता है। बंगाली में इसे शाद कहते हैं। केरल में यह सीमंधा और तमिलनाडु में वेलाकप्पू नाम से मनाया जाता है। जीटीवी पर इन दिनों रानी लक्ष्मीबाई सीरियल आ रहा है जो लक्ष्मीबाई के जीवन पर आधारित है। इसी तरह पिछले दो दशक के दौरान “भारत एक खोज”, “रामायण” और “महाभारत”समेत कई ऐतिहासिक और पौराणिक धारावाहिकों का प्रसारण हुआ जिससे ऐतिहासिक और पौराणिक किरदारों के बारे में लोगों के जनरल नॉलेज में काफी इजाफा हुआ।

देश में छोटे परदे पर सीरियलों की उम्र 26 साल है जो बहुत कम है। यह सिलसिला दूरदर्शन ने सात जुलाई 1984 को शुरू किया। जब मनोहर श्याम जोशी की “हमलोग“ के रूप में मध्यम वर्ग की कहानी आई और बेहद लोकप्रिय हुई। आम भारतीय उसमें अपनी कहानी देखने लगा। तीन साल से ज़्यादा समय चक चले हमलोग के हर किरदार लोकप्रिय हुए। बहरहाल, अभी लंबा रास्ता तय करना है और उम्मीद की जानी चाहिए कि सीरियल राष्ट्रीय एकता के वाहक बने रहेंगे।

बेशक, यह देश की एकता और अखंडता मज़बूत करने के दृष्टिकोण से सकारात्मक प्रयास है। भविष्य में बाक़ी रिमोट हिस्सों के लोगों की जीवन-शैली को भी सीरियल के माध्यम से पेश किया जाए तो बूद्धू बक्से की प्रतिष्ठा में चार चांद लग जाएगा। गौरतलब है कि सिनेमा ने हिंदी को देश के कोने कोने में पहुंचाया है। अधिकृततौर पर हिंदी भले ही न राष्ट्रीय भाषा का दरजा पा सकी हो लेकिन अगर व्यवहारिक रूप से देखें तो हिंदी देश की संपर्क भाषा बन गई है। देश के किसी भी हिस्से में चले जाइए हर जगह हिंदी बोलने समझने वाले मिल जाएंगे। दक्षिण में नेताओं के हिंदी विरोध को हिंदी सिनेमा ने इतिहास की चीज़ बना दी। आजकल हिंदी कर्नाटक और आंध्रप्रदेश ही नहीं तमिलनाडु और केरल के दूर-दराज़ के हिस्सों में भी धड़ल्ले से बोली जाने लगी है।

दरअसल, जानकारी की स्रोत किताबें होती हैं या फिर देशाटन। अपने देश में दोनों बेहद महंगी हैं। एक आम आदमी जीवन भर दो जून की रोटी जुटाने में व्यस्त रहता है। वह न तो किताब खरीद पाता है न ही उसे घूमने की फ़ुर्सत मिलती है फिर इन सबके लिए उसके पास उतना पैसा भी नहीं होता। ऐसे में ये सीरियल्स ही आम आदमी की जानकारी के स्रोत बन रहे हैं। समस्या यह है कि सैटेलाइट चैनलों की पहुंच केवल शहरों में है। देहातों में कहीं-कहीं लोगों ने सेटबाक्स लगा रखे हैं लेकिन बिजली की कमी के चलते निजी टीवी मनोरंजन से वंचित है रहते हैं। यानी देश की साठ फ़ीसदी आबादी आज भी टीवी देखने से वंचित रहती है। लेकिन जिस तरह दूरसंचार तकनीकी क्रांति कर रही है। भविष्य में संभव है यह मुश्किल काम आसान हो जाए। अगर ऐसा हुआ तो इस देश की भाषाई अखंडता के लिए शुभ संकेत होगा।

(Note... I written this article around 3 months before)
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मंगलवार, 24 अगस्त 2010

कहानी - बदचलन

हरिगोविंद विश्वकर्मा

उसे लेकर मैं बुरी तरह उलझा था। ऐसा क्यों हुआ... उसने ऐसा क्यों किया... पूरे मामले को नए सिरे से समझने की कोशिश कर रहा था। मैं अभी तक सकते में था। कह लीजिए, मेरे अंदर घमासान-सा मचा था। हालांकि, पछतावा भी हो रहा था और ग़ुस्सा भी आ रहा था, मुझे अपने ऊपर। उसका रिऐक्शन मेरे लिए एकदम अप्रत्याशित था। हां, आख़िर उसका वीहैवियर उसके स्वभाव के एकदम विपरीत क्यों रहा। कहीं उसके बारे में मेरा पूरा का पूरा आकलन ग़लत तो नहीं था, उसकी प्रतिक्रिया तो कुछ ऐसी ही थी। ओ माई गॉड...! तब तो बहुत बड़ा अनर्थ हो गया। कैसे हुई मुझसे यह चूक...?

दरअसल, पिछले कई साल से वह इसी मोहल्ले में रह रही थी। पहले उसकी मां भी साथ रहती थी। दो साल पहले मां का स्वर्गवास हो गया और वह अकेली रह गई। तब से वह अकेली ही रह रही थी। कभी-कभार घर में एक वृद्ध महिला आ जाती थी, दो चार दिन के लिए। वह उसकी मौसी है। मौसी के वापस जाने के बाद वह फिर से अकेली हो जाती है। पास-पड़ोस के लोगों से वह ज़्यादा घुली-मिली नहीं थी।

नौकरी मिलने से पहले मैं घर पर ही रहता था। सो, उसे रोज़ सुबह घर से जाते और शाम को वापस लौटते देखता था। कभी-कभार रात भी हो जाती थी। परंतु जब से मैं ड्यूटी पर जाने लगा, उसकी दिनचर्या से अनजान हो गया। हालांकि लोग कहते थे कि वह देर रात रिक्शे से उतरती देखी जाती है। और, महीने में चार-पांच बार तो रात भर बाहर ही रहती है और एकदम सुबह घर लौटती है।

यह भी पता नहीं कि वह क्या काम करती है या कहां काम करती है। हालांकि लोग कहते हैं कि वह यहीं पास में किसी ऑफ़िस में काम करती है, जहां हफ़्ते में दो दिन शनिवार और रविवार अवकाश रहता है। कुछ लोग कहते हैं कि वह टीचर है। लेकिन सच क्या है भगवान ही जाने...

यह भी कहा जाता था कि उसकी शादी को कोई पांचेक साल गुज़र चुके हैं। उसकी शादी में मेरे घर वाले भी शामिल हुए थे। शादी के दौरान ही लेनदेन को लेकर विवाद हो गया और पर्याप्त दहेज की व्यवस्था न होने से उसकी विदाई नहीं हुई, वह ससुराल ही न जा सकी। कई लोग कानाफूसी करते हैं कि वह छूट गई है। जब तक उसकी मां जीवित थी, साथ रही। अब वह बिलकुल अकेली है। मां के निधन के कुछ महीने बाद एक दिन अचानक वह बहुत बीमार हो गई। उसे पास के अस्पताल में भर्ती कराया गया था। वह काफी सीरियस थी।

उन दिनों मैं पढ़ाई पूरी करके मुंबई में नया-नया आया था। घर वालों के कहने पर मुझे भी उसे देखने के लिए अस्पताल जाना पड़ा। पड़ोसी होने के नाते यह मेरा फ़र्ज़ भी था। उस दिन, जब मैं अस्पताल पहुंचा तो अचानक उसकी तबीयत और बिगड़ गई। उसकी मौसी रो रही थी, मैंने उन्हें ढांढ़स बंधाया। उसके लीवर में शायद कुछ सूजन आ गई थी। शरीर ज्वर से तप रहा था। वह बेहाश थी। उसका ऑपरेशन होने वाला था। ख़ून की तत्काल सख़्त ज़रूरत थी, लेकिन आसपास के ब्लडबैंकों में उसके ग्रुप का ख़ून ही न था। उसके कई रिश्तेदार आए थे। ख़ून देने की पहल कई लोगों ने की, पर किसी का ग्रुप भी उससे ना मिला जिससे कोई उसे ख़ून न दे सका। ब्लड डोनेशन की औपचारिक पहल मैंने भी की, हालांकि डर रहा था क्योंकि घर में किसी से पूछा नहीं था और मामला ख़ून एक अनजान लड़की को देने का था। मेरा संकट उस समय और बढ़ गया जब मेरा ग्रुप उसके ग्रुप का ही निकला और न चाहते हुए भी मुझे ख़ून देना पड़ा।

लेकिन उतने से ही काम नहीं होने वाला था, ख़ून की और ज़रूरत थी। इलाज कर रहे डॉ. बत्रा परेशान थे। ख़ून के अभाव में ऑपरेशन नहीं हो पा रहा था। और, उसकी हालत लगातार बिगड़ती जा रही थी।

आख़िरकार डॉ. बत्रा ख़ुद बेड पर लेट गए और अपने असिस्टेंट से ख़ून निकालने को कहा। मेरी ज़िंदगी में पहली घटना थी, जब किसी डॉक्टर ने अपने मरीज को अपना ही ख़ून देने का फ़ैसला किया हो। मेरी ही नहीं, वहां मौजूद हर किसी की नज़र में डॉ. बत्रा का सम्मान अचानक बहुत बढ़ गया। वह महामानव का दर्जा पा गए। श्रद्धेय हो गए। उन्होंने जता दिया कि अन्य डॉक्टरों के लिए डॉक्टरी भले पैसा बनाने का ख़ालिस पेशा हो लेकिन उनके लिए पूजा है, सच्ची समाजसेवा है।

उस दिन ख़ून देने के बाद मैं कई घंटे अस्पताल में ही रहा। मन ही मन मना रहा था कि ख़ून देने की ख़बर घर वालों को न लगे। पूरे समय तनाव में था कि क्या जवाब दूंगा? एक अनजान लड़की को ख़ून देने के अपने फ़ैसले को कैसे जस्टीफ़ाई करूंगा? निश्चित तौर पर लोग नाराज़ होंगे। हालांकि मेरे ख़ून देने की ख़बर मुझसे पहले ही मेरे घर पहुंच गई, मेरे भैया ख़ुद अस्पताल आ गए मुझे लेने के लिए। वह किसी ज़रूरतमंद को ख़ून देने के मेरे फ़ैसले से बहुत ख़ुश थे। मुझे बड़ी तसल्ली हुई। मैं हलका महसूस करने लगा।

बहरहाल, ऑपरेशन के बाद उसकी तबीयत सुधरने लगी। चार-पांच दिन में ठीक भी हो गई और अस्पताल से डिसचार्ज कर दी गई। उसकी मौसी साथ ही रही। दो महीने में वह एकदम भली-चंगी हो गई और मौसी वापस चली गई। बीमारी के बाद उसका रूप और भी निखर आया। तक़रीबन तीस साल की उम्र में कह लीजिए कि उसका यौवन ग़ज़ब का गदराया हुआ था। सुंदर तो थी ही, देखने वाला पहली नज़र में ही मंत्रमुग्ध हो जाए। हां, उसकी मुस्कुराहट भी बड़ी क़ातिल थी। स्वभाव से भी बहुत चंचल। हर किसी से बिंदास बातचीत करती और बिना किसी प्रसंग के हंस भी देती थी। छोटी-मोटी बातों का कभी बुरा नहीं मानती थी।

एक बार जब मैं घर में अकेला था तभी वह आ गई और मेरे बहुत क़रीब आकर धीरे से ‘थैक्स’ बोली। शायद ख़ून देने के लिए मेरा शुक्रिया अदा किया।

इस बीच एक कंपनी में मुझे नौकरी मिल गई। कंपनी बहुत दूर थी। मेरी दिनचर्या घर और कंपनी के बीच सिमट कर रह गई। आठ घंटे की नौकरी के लिए मुझे पांच-छह घंटे यात्रा में ख़र्च करने पड़ते थे। कुल 13 से 14 घंटे। मैं सुबह घर से निकलता और रात को ही लौट पाता। बस और लोकल गाड़ी की भीड़ में यात्रा करता हुआ मैं बुरी तरह थक जाता। इसीलिए बिस्तर पर पड़ते ही गहरी नींद की आगोश में चला जाता। और अगली सुबह सात बजे जगा दिया जाता। इस दौरान मेरे मोहल्ले में क्या कुछ होता रहा, मुझे पता ही न चला।

बहरहाल, शाम को आवारा लड़के धीरे-धीरे हमारे पड़ोस में जमा होने लगे। वह घर में होती तो लड़के दरवाज़े के सामने ही खड़े रहते। बाहर निकलती तो छींटाकशी करते, फब्तियां कसते। सड़कछाप मजनुंओं की तादाद दिनोंदिन बढ़ने लगी। हां, जिस दिन वह घर पर न होती तो वहां पूरी शांति रहती।

अलबत्ता, मुझे तो तब पता चला था, जब पानी सिर से काफी ऊपर निकल गया। वह मोहल्ले की नंबर एक बदमाश लड़की मानी जाने लगी। यह चर्चा आम हो गई कि दरवाज़े के सामने खड़े होने वाले आवारा लड़कों के साथ उसका चक्कर है।

एक बार मेरे अवकाश वाले दिन पड़ोस के भाजीवाले मास्टर घर आ गए। बात-बात में उन्होंने कहा –वह बहुत बदमाश लड़की है। एक बार मैंने ख़ुद आधी रात को नल के पास एक लड़के का साथ आपत्तिजनक अवस्था में पकड़ा था। अरे भाई, पक्की हरामी औरत है वह। रात में लड़कों के साथ स्कूल के अहाते में भी चली जाती है शरीर की प्यास बुझाने के लिए।

उनकी बात सुनकर मैं सकते में आ गया। क्योंकि वह मोहल्ले में बेहद सम्मानित व्यक्ति थे। उनकी देखी घटना झूठ तो हो ही नहीं सकती। लिहाजा, उसके बारे में मेरे ख़यालात बदलने लगे। मुझे लगा, ज़रूर उसमें खोट है। तभी तो पता नहीं कहां-कहां के आवारा लड़के उसके दरवाज़े पर हा-हा, हू हू करते रहते हैं। अगर वह सही होती तो विरोध तो करती।

ऐसी ही बातें बाद में मोहल्ले के कई और लोगों ने मुझे बताई। अब मेरे मन में यह बात घर कर गई कि वह सचमुच महाचालू और चरित्रहीन है, उसका नैतिक पतन हो चुका है। हालांकि, मैंने कभी उसे किसी लड़के से बात करते भी नहीं देखा था। हां, उसके घर के सामने आवारा किस्म के लड़कों का हुजूम ज़रूर मेरी नज़र में था।

धीरे-धीरे कानाफूसी होने लगी कि वह धंधा भी करती है। पैसे के लिए तन बेचती है। बड़े-बड़े हॉटेलों में क्लाइंट्स के पास जाती है। रात भर वहीं रहती है। लड़के भी अपनी शारीरिक भूख मिटाने के लिए बिंदास उसके घर में घुस जाते हैं। और ना मालूम क्या क्या...

काफी अरसे बाद एक दिन वह मेरे घर आई। मेरा साप्ताहिक अवकाश था। मुझे देखकर मुस्करा दी और ‘हैलो’ बोली। औपचारिक अभिवादन के बाद मैं चुप हो गया। वह सामने कुर्सी पर बैठ गई और अंग्रेज़ी अख़बार पढ़ने लगी। उसके बाद तो हर अवकाश पर मैं उसे अपने घर में अख़बार पढ़ते हुए देखने लगा। वह ऐसे समय आती जब मैं घर पर ही होता। मुझसे बात भी करती थी। इसके बाद तो हमारी खूब बात होने लगी। कुछ दिन बाद वह कई-कई घंटे बैठने लगी। कई मसलों पर बात भी करती। बातचीत में काफी मैच्यौर्ड लगती थी। पहुंचते ही पूछती, ‘खाना हो गया’। मैं भी झट से ‘हां’ कह देता था। हमारे बीच व्यक्तिगत बात बिलकुल न होती थी। इसलिए हम एक दूसरे से अनजान ही रहे।

कोई साल भर पहले, एक दिन उसके घर के सामने जुटने वाले लड़कों में आपस में ही मारपीट हो गई। चाकूबाज़ी में एक लड़का घायल हो गया। चर्चा थी कि लड़ने वाले दोनों लड़के उसके प्रेमी हैं और मारपीट की जड़ भी वही थी। उसी के लिए दोनों में ख़ूनी तक़रार हुई।

चाकूबाज़ी की घटना के बाद पुलिस आ गई और पूछताछ के लिए उसे थाने ले गई। रात को मैं घर आया तो पता चला कि कई घंटे से वह थाने में ही है। उसकी मौसी और घर वालों के आग्रह पर मैं एक स्थानीय नेता के साथ थाने गया और देर रात उसे वापस लिवा आया। घर आते समय वह फूट-फूट कर रो रही थी। लेकिन मुझे लगा कि नाटक कर रही है। चरित्रवान होने का ढोंग। मुझ पर इंप्रेशन बना रही है।

दो दिन बाद भाजीवाले मास्टर ने बताया कि दोनों युवकों के साथ उसे रात में कई बार स्कूल के अहाते में आपत्तिजनक अवस्था में पकड़ चुके हैं। उन्होंने कहा –कार्तिक की कुतिया हो गई है साली। एक से मन नहीं भरता।

उस वारदात के बाद वह थाने में भी बदनाम औरत के रूप में दर्ज हो गई। उसके घर पुलिस वाले भी आने लगे। छोटी-मोटी बात पर उसे थाने बुलाया जाने लगा। कुल मिलाकर वह मोहल्ले की सीमा लांघकर आसपास के इलाके में कुख्यात हो गई। इस प्रकरण के बाद उसकी नौकरी भी छूट गई। वह घर पर ही रहने लगी। हां महीने में कई बार उसे काम से लौटते देखता था। शायद उसे कैज़ुअल या पार्टटाइम जॉब मिल गया था। महीने में चार-पांच बार मैंने उसे सुबह-सुबह घर लौटते देखा। मगर कभी नहीं पूछा कि वह क्या काम करती है?

अब वह साप्ताहिक अवकाश के दिन मेरे पास और ज़्यादा वक़्त गुज़ारने लगी। कह लीजिए कि सुबह से शाम मेरे घर में बैठी रहती। और तो और कई बार वह तिपाई पर ही सो जाती। मैं संकोचवश कुछ बोल नहीं पाता था। इस दौरान या तो मुझसे बात करती या अख़बार, पत्रिका या कोई पुस्तक पढ़ती रहती। वह कई चर्चित किताबों और उपन्यासों एवं उनके किरदारों के बारे में बात करती थी। कभी-कभार तो नामचीन विदेशी लेखकों की बात करके मुझे भी चौंका देती। विश्व-साहित्य में इतना अपडेटेड होने की उसकी क़ाबिलियत का मैं कायल हो गया। उसके चरित्र और रुचि में भारी विरोधाभास पर अकसर हैरान होता।

एक दिन दूसरे पड़ोसी रामू मास्टर मेरे घर आ गए। वह भी उसके बारे में भाजीवाले मास्टर की ही तरह विचार रखते थे।

बात-बात में उन्होंने कहा –पटा लिया आपने भी तितली... मैं चौंककर उनकी ओर देखा।

–आजकल, उन्होंने कहा, वह आपके घर खूब आती है। बहती गंगा में आप भी हाथ धो रहे हैं... अच्छा है! माल अच्छा है! मोहल्ले और आसपास के छोकरे ही नहीं पुलिस वाले तर रहे हैं, आप भी तर जाइए! इतना अच्छा मौक़ा मिलने पर चूकना मूर्खता है!

रामू मास्टर की बात मुझे बहुत बुरी लगी और मैंने उन्हें डांटकर चुप करा दिया। पर उनकी बात से मेरी नींद हराम हो गई। पहली बार मैंने अपने को बेचैन पाया। मेरा ध्यान बार-बार उसकी ओर जा रहा था। देर रात तक मैं न मालूम क्या-क्या सोचता रहा।

मैंने महसूस किया कि रामू मास्टर की बात से मेरे अंदर आग लग गई है। जिसमें मेरा विवेक धू-धू करके जल रहा है। मन में विकृत विचार जन्म लेने लगे। उसी समय मुझे लग गया था कि कुछ न कुछ अनर्थ होने वाला है क्योंकि धीरे-धीरे मेरा अपने मन पर से नियंत्रण ढीला हो रहा था। मेरे अंदर दो व्यक्ति पैदा हो गए। एक उसकी ओर आकर्षित होता, दूसरा मना करता। मेरे अंदर अंतरद्वंद्व का सिलसिला शुरू हो गया।

उसे लेकर हमेशा ही उलझा रहता। एक दिन अचानक मन में ख़याल कौंधा, क्या वह मुझसे पटेगी? अगले पल सिर झटक दिया कि मैं क्या वाहियात सोच रहा हूं? अंतरद्वंद्व चलता रहा। मेरे अंदर का एक व्यक्ति कहता, मैं भी कोशिश करूं, अगले क्षण अंदर का दूसरा व्यक्ति कहता, नहीं कभी नहीं। यह ग़लत है।

मेरे चरित्र और कामदेव के बीच लंबे समय तक संघर्ष चलता रहा। फिर मैंने महसूस किया कि कामदेव चरित्र पर भारी पड़ रहे हैं। कुछ बातें न चाहते हुए भी मैं कर रहा था। मसलन, जब भी वह घर आती मैं अपने दरवाज़े पर खड़ा रहता। आते-जाते उसका कोई ना कोई अंग मुझसे ज़रूर छू या टकरा जाता। इससे मुझे सुख मिलता। मैंने महसूस किया कि मैं उसके उरोजों और कूल्हों को भी छूने की भरसक कोशिश करता हूं। मुझे अपने ऊपर दया आने लगी, कि मैं स्पर्श-मनोरोगी होता जा रहा हूं। छू जाने पर उसका विशेष ढंग से हंसना और पलक झपकाना, मेरी धड़कन बढ़ा देता। इन सब हरकतों से मुझे लगता, वह लिफ़्ट दे रही है। वह जब भी मेरे घर आती तो मुझे बहुत अच्छा लगता।

मुझे लगा वह मेरे मनोभाव अच्छी तरह समझती है। इसके बावजूद मुझमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि कुछ कहता। मैं हरदम यही सोचता, काश वह ही पहल करती! लेकिन वह आगे बढ़ने का नाम ही नहीं ले रही थी। मेरी व्याकुलता दिनोंदिन बढ़ती जा रही थी।

मेरी इस हालत के लिए रामू मास्टर ज़िम्मेदार थे। आज सुबह वह मेरे पास बैठे थे। इधर-उधर की बातें हो रही थीं। मुझे पता था जल्द ही वह उसका ही जिक्र करेंगे।

–आख़िरकार तितली आप पर ही मरने लगी। उन्होंने मुस्कराकर धीरे से कहा।

ना मालूम क्यूं इस बार मुझे उनकी बात बुरी नहीं लगी। मैंने मुस्कराकर प्रशंसा-पत्र ग्रहण कर लिया। हालांकि मुझे मेरी ही मुस्कराहट अच्छी नहीं लगी। फिर भी एक कुटिल मुस्कान मेरे चेहरे से चिपक गई। मुझे ख़ुद से घृणा हुई।

–हमें भी दिलवाओ यार! बातचीत में रामू मास्टर और आगे बढ़ गए।

–क्या...? मैं उनका मतलब समझ गया।

–जिसका मज़ा आप लूट रहे हैं। वह बेशर्मी पर उतर आए।

–मास्टर आप ग़लत समझ रहे हैं। अबकी बार मुझे सफ़ाई देनी पड़ी।

–अब हमीं से झूठ मत बोलो यार।

उसी समय वह घर में आ गई। और सोफे पर बैठकर अख़बार देखने लगी। रामू मास्टर के चेहरे पर अर्थ भरी मुस्कान थी। थोड़ी देर बाद वह चले गए। मैं भी एक किताब निकाल कर पन्ने पलटने लगा।

कमरे में नीरवता पसरी थी। मैं सोच रहा था, हमारे बीच अब तो कुछ होना ही चाहिए।

–यह आदमी आपके यहां बहुत ज़्यादा आता है क्या...? अचानक वह बिना किसी भूमिका के बोली।

–कौन...? रामू मास्टर...?

–हां...!

–हां, आ जाते हैं कभी-कभार। नेक इंसान हैं। मैंने अपनी तरफ़ से सफ़ाई दी –मैं नहीं जाता इन लोगों के पास। ये ही आ जाते हैं।

वह बग़ौर मुझे ही देख रही थी। देखे जा रही थी। शायद मेरी रामू मास्टर से मेलजोल के बारे में सोच रही थी।

–आपको पता है... उसका स्वर तेज़ था।

–क्या...?

–यही कि हमारे बारे में ये लोग क्या चर्चा करते हैं।

–तुम्हीं बताओ न...! क्या चर्चा करते हैं...? मैं जानने को उत्सुक हो गया।

–फिलहाल तो यह चर्चा है कि... वह रुक गई। थोड़ा विराम लेकर बोली... कि मैं आपसे भी फंस गई हूं। वह उसी तरह बग़ौर देख भी रही थी। मुझे पढ़ने की कोशिश कर रही थी शायद... बाद में हलके से मुस्करा दी थी।

उसकी बात सुनकर रोमांच से मेरे रोंगटे खड़े हो गए। शरीर में सनसनी हुई। दिल की धड़कनें असामान्य। पक्का यक़ीन हो गया कि वह मुझे खुला लिफ़्ट दे रही है। अचानक, पता नहीं कैसे, मेरा हाथ उसकी ओर बढ़ गया और उसके हाथ को नरमी के साथ पकड़ लिया। उसने भी विरोध नहीं किया उस समय। मुझे यही लगा, शायद मेरी सांसे गरम हो रही हैं।

–क्या सचमुच ऐसी अफवाह है...? मैंने उसका हाथ धीरे से दबा दिया। हालांकि अंदर ही अंदर डर रहा था और कांप भी रहा था।

वह हंस दी। पर इस बार उसकी हंसी फीकी-सी थी। पहली बार मुझे उसकी हंसी में व्यंग्य की गंध आई।

–तुम हंसी क्यों...? अबकी बार मैंने उसका हाथ सहलाते हुए पूछा।

–यही कि आपको लेकर भी मैं गच्चा खा गई। उसकी आवाज़ बहुत कठोर थी, बेहद निर्मम।

–मतलब...? मुझे उसकी हरकत से धक्का-सा लगा।

जवाब देने की जगह उसने अपना हाथ तेज़ी से खींच लिया।

–मतलब कि आप भी ठहरे एक साधारण पुरुष, जिसे औरत चाहिए! है ना! आपके अंदर भी वासना की आग में जलता मर्द देख रही हूं जो मुझे पाने की जुगत में है। सोचा था, मोहल्ले में तमाम हवसियों के बीच कोई ऐसा भी है जिसे अपना मान सकती हूं, दोस्त कह सकती हूं। उसके पास सुरक्षित महसूस कर सकती हूं। लेकिन साफ़ दिख रहा है कि आपकी भी नज़र मेरे जिस्म, मेरी जवानी, मेरे उरोजों पर है। आज यक़ीन हो गया कि दुनिया के सारे मर्द एक जैसे होते हैं। औरत के भूखे, विवेकहीन, असामाजिक। सामाजिक प्राणी की जगह केवल प्राणी। पशु। जिसकी केवल दो ही ज़रूरतें होती हैं, संभोग और भोजन। इसीलिए इनकी निग़ाह स्त्री के तन पर होती है। स्त्री की लाचारी का बेज़ा फायदा उठाना चाहते हैं। मौक़े की तलाश में रहते हैं। दोस्ती और हमदर्दी को ढोंग रचते हैं। जबकि होते हैं सब के सब बलात्कारी। भाजीवाले मास्टर ने भी मुझे पाने की कोशिश की। छी...! सफल न हुआ तो मैं चरित्रहीन हो गई। बदनाम कर दिया साले ने। उस कृतघ्न के कारण ही आज मेरी यह हालत है। हे भगवान मैं क्या करूं? वह फूट-फूटकर रोने लगी। मुझे तो काटो तो ख़ून नहीं। जैसे किसी ने आसमान से खींचकर ज़मीन पर ला पटक दिया हो।

वह तेज़ी से कमरे से बाहर निकल गई।

मैं एकदम जड़वत्। कोई जवाब ही नहीं सूझा। किंकर्तव्यविमूढ़। चेतनाशून्य।

हादसा कहूं या और कुछ और... उसे गुज़रे कई घंटे बीत चुके हैं मगर मैं उसी तरह स्तंभित हूं...

–ऐसा क्यों किया उसने। मैं तब से लगातार सोच ही रहा था –क्या मैं उसे बहुत बुरा आदमी लगा। या मैंने उसका हाथ अपने हाथ में लेकर ग़लती की। उसका रिऐक्शन इस तरह नहीं होना चाहिए था।

मैं लगातार सोचे जा रहा था। कभी अपने ऊपर ग़ुस्सा आता तो कभी उस पर।

–जब मुझसे इतना ही परहेज़ था, मैं इतना ही बुरा था तो क्यों आती थी मेरे पास... क्यों बैठती थी दिन-दिन भर... मैं फिर से बड़बड़ाने लगा –जो भी हो, वह मेरे बारे में ग़लत धारणा बना कर गई है।

शाम हो गई। हादसे को पूरे सात घंटे।

–ग़लती तो मेरी ही थी। मेरे अंतःकरण से आवाज़ आई। हां, किस हक़ से मैंने उसका हाथ पकड़ा। आख़िर मेरी भी मंशा तो ग़लत ही थी। मुझे उसके घर जाकर माफ़ी मांगनी चाहिए।

मैं सोचता रहा। उसके घर जाऊं या नहीं। फिर महसूस किया कि मेरे पांव ख़ुद उसके घर की ओर बढ़ रहे हैं। मैं बुदबुदाया –मुझे उसके सामने ग़लती मान लेनी चाहिए और सॉरी बोलना चाहिए।

मैंने उसके दरवाज़े पर दस्तक दी।

क़रीब पांच मिनट तक खड़ा रहा। मुझे लगा कि दरवाज़ा नहीं खोलेगी। लौट रहा था कि दरवाज़ा खुल गया।

उसका चेहरा बुझा था। मुझे देख रही थी। मैं उसके बग़ल से घर में दाख़िल हो गया। उसने दरवाज़ा बंद किया और मेरे पास आ गई।

अचानक फिर लरज पड़ी, –प्लीज़... मुझे पाने की कोशिश न करो...! दहेजलोभी पति ने तलाक़ दे दिया। अब मेरे पास कोई और ठौर नहीं। सो मुझे अपनी ही नज़र में मत गिराओ। दुनिया की नज़र में पहले ही गिर चुकी हूं। अब अपनी ही नज़र में नहीं गिरना चाहती। जब लोग मेरे बारे में ऊलजलूल बकते हैं तो मेरी आत्मा, मेरा चरित्र मुझे दिलासा देते हैं कि लोग झूठ बोल रहे हैं। यही मेरा आत्मबल है जो मुझे तमाम अपमान और जिल्लत झेलने की ताक़त देता है। इसीलिए दुनिया की परवाह नहीं करती। किसी को सफ़ाई नहीं देती। मुझे लोगों से चरित्र प्रमाण-पत्र नहीं चाहिए। जिनका चरित्र ख़ुद संदिग्ध है, वे क्या दूसरों को चरित्र प्रमाण-पत्र देंगे। चूंकि लोग ग़लत हैं सो मैंने कभी किसी की परवाह नहीं की। आपके घर में मुझे ज़्यादा सुरक्षा का अहसास होता रहा है। तभी तो पढ़ते-पढ़ते बिंदास सो भी जाती थी। आपसे एक अटूट रिश्ता सा बन गया था। हमारी रुचि भी मेल खाती थी। आपका स्वभाव मुझे आकर्षित करता था। भावनात्मक संबल मिलता था आपसे। ओह... कितना पाक था हमारा रिश्ता। स्त्री-पुरुष संबंधों से बहुत ऊपर। मुझे लगा था इस बस्ती में एक इंसान भी है जिसकी आत्मा निष्पाप है, अकलुष है। पर मैं यहां भी छली गई। आपसे दोस्ती का भ्रम पाल बैठी। पता नहीं इस शरीर में ऐसा क्या है कि हर पुरुष ललचाई नज़र से देखता है। हर जगह वासना की भूखी निग़ाहे घूरती हैं। सोचती हूं, इस चेहरे, इस यौवन को नष्ट कर दूं लेकिन मुझसे यह भी नहीं हो पाता। लड़की हालात से कितनी लाचार होती है, आप नहीं समझ सकते। मेरी पीड़ा, मेरी व्यथा भी आपके गले नहीं उतरेगी क्योंकि आप एक पुरुष हैं। आप क्या कोई भी पुरुष किसी नारी का दर्द नहीं समझ सकता। आज लग रहा है, दुनिया में अकेली हूं। विलकुल तन्हा। पता नहीं अब हवसियों से लड़ पाऊंगी भी या नहीं। कितनी बदनसीब हूं मैं। हे प्रभु। मेरी रक्षा करना। अब मैं कहां जाऊं। कहां मिलेगा सहारा और संरक्षण।

मुझसे रहा नहीं गया और उसकी ओर बढ़ गया।

सॉरी.. मुझसे ब्लंडर हो गया। तुम्हें समझ ही न पाया। प्लीज़ माफ़ कर दो। मैं तो तुम्हारा दोस्त बनने के भी क़ाबिल नहीं। माफ़ कर दो ना प्लीज... प्लीज़...

कहना चाहा कि आओ जीवन का आगे का सफ़र साथ मिलकर तय करें, अगर तुम्हें मंजूर हो तो तुम्हें सहारा और संरक्षण देने में मुझे गर्व महसूस होगा लेकिन ये वाक्य ज़बान से निकले ही नहीं।

वह चुप हो गई थी। मैं उसे सामान्य होने का मौक़ा देना चाहता था। सो वापस हो लिया। इस बार मैंने ख़ुद को हलका महसूस किया।

॰॰॰॰॰

बुधवार, 14 जुलाई 2010

ग़ज़ल - आ गए क्यों उम्मीदें लेकर

आ गए क्यों उम्मीदें लेकर
करूं तुम्हें विदा क्या देकर...

लाख मना की पर ना माने
क्यों रह गए तुम मेरे होकर...

अपना लेते किसी को तुम भी
आखि‍र क्यों रहे खाते ठोंकर...

जी ना सके इस जीवन को
क्या पाए खुद को जलाकर...

अब तो मेरी तमाम उम्र में
रहोगे चुभते कांटे बनकर...

हरिगोविंद विश्वकर्मा

मंगलवार, 13 जुलाई 2010

कविता : चित्रकार की बेटी

तुम बहुत अच्छे इंसान हो
धीर-गंभीर और संवेदनशील
दूसरों की भावनाओं का सम्मान करने वाले
बहुत कुछ मेरे पापा की तरह
तुम्हारे पास है बहुत आकर्षक नौकरी
कोई भी युवती सौभाग्य समझेगी अपना
तुम्हारी जीवन-संगिनी बनने में
मैं भी अपवाद नही हूं
तभी तो
अच्छा लगता है मुझे सान्निध्य तुम्हारा
इसे प्यार कह सकते हो तुम
हां तुममें जो पुरूष है
उससे प्यार करने लगी हूं मैं
स्वीकार नहीं कर पा रही हूं
फिर भी परिणय प्रस्ताव तुम्हारा
तुम एक चित्रकार हो
और मैं चित्रकार की बेटी
तुम्हारे अंदर देखती हूं मैं
अपने चित्रकार पापा को
एक ऐसा इंसान
जो पूरी ज़िंदगी रहा
दीन-हीन और पराजित
अपराधबोध से ग्रस्त
अपनी बेटी-पत्नी से डरता हुआ
पैसे-पैसे के लिए संघर्ष करता हुआ
हारता हुआ ज़िंदगी के हर मोर्चे पर
तमाम उम्र जो ओढ़े रहा
स्वाभिमान की एक झीनी चादर
उसके स्वाभिमान ने
उसके सिद्धांत ने
बनाए रखा उसे तमाम उम्र कंगाल
और छीन लिया मुझसे
मेरा अमूल्य बचपन
मेरी मां का यौवन
मेरी मां सहेजती रही
उस चित्रकार को
पत्नी की तरह ही नहीं
एक मां की तरह भी
एक संरक्षक की तरह भी
उसे खींचती रही
मौत के मुंह से
सावित्री की तरह
फिर भी वह चला गया
ख़ून थूकता हुआ
मां को विधवा और मुझे अनाथ करके
बेशक वह था एक महान चित्रकार
एक बेहद प्यार करने वाला पति
एक ख़ूब लाड़-दुलार करने वाला पिता
लेकिन वह चित्रकार था
एक असामाजिक प्राणी भी
समाज से पूरी तरह कटा हुआ
आदर्शों और कल्पनाओं की दुनिया में
जीने वाला चित्रकार
कभी न समझौते न करने वाला ज़िद्दी कलाकार
लेकिन जब वह बिस्तर पर पड़ा
भरभरा कर गिर पड़ीं सभी मान्यताएं
बिखर गए तमाम मूल्य
अंतत दया का पात्र बनकर
गया वह इस दुनिया से
उसके भयावह अंत ने
ख़ून से सनी मौत ने
हिलाकर रख दिया बहुत अंदर से मुझे
नफ़रत सी हो गई मुझे
दुनिया के सभी चित्रकारों से
मेरे अंदर आज भी
जल रही एक आग
जब मैं देखती हूं अपनी मां को
ताकती हूं उसकी आंखों में
तब और तेज़ी से उठती हैं
आग की लपटें
पूरी ताक़त लगाती हूं मैं
ख़ुद को क़ाबू में रखने के लिए
ख़ुद को सहज बनाने में
इसीलिए
तुमसे प्यार करने के बावजूद
तुम्हारे साथ
परिणय-सूत्र में नहीं बंध सकती मैं
जो जीवन जिया है मेरी मां ने
एक महान चित्रकार की पत्नी ने
मैं नहीं करना चाहती उसकी पुनरावृत्ति
तुम्हारी जीवनसंगिनी बनकर
नहीं दे पाऊंगी तुम्हें
एक पत्नी सा प्यार
इसलिए मुझे माफ़ करना
हे अद्वितीय चित्रकार

हरिगोविंद विश्वकर्मा

सोमवार, 12 जुलाई 2010

ग़ज़ल - जिंदगी भर

जोड़-घटाने में उलझे रहे जिंदगी भर
सौदा घाटे का करते रहे जिंदगी भर

एक गुनाह की बड़ी कीमत चुकाई
खुद से ही डरते रहे जिंदगी भर

दुनिया के सामने आखिर आ ही गया
जिस राज को छिपाते रहे जिंदगी भर

कामयाबियों के नाम पर शिफर ही रहे
न मालूम क्या करते रहे जिंदगी भर

दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंका
जिस शख्स से चिपके रहे जिंदगी भर

कलियुग का मतलब जान नहीं पाए
सतयुग का भ्रम पाले रहे जिंदगी भर

झूठ बोलने का साहस कभी न हुआ
सच से भी कतराते रहे जिंदगी भर

खुद रोने लगते थे कहीं देखकर आंसू
बस आंसू ही बहाते रहे जिंदगी भर

दिल को हमेशा दिमाग से ऊपर रखा
भावनाओं में बहते रहे जिंदगी भर

आखिर देखने भी नहीं आया वह शख्स
जिसका इंतजार करते रहे जिंदगी भर

हरिगोविंद विश्वकर्मा