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रविवार, 10 नवंबर 2019

शिवसेना का ट्रांसफॉर्मेशन – पहले कट्टर मराठीवाद, फिर कट्टर हिंदुत्व और अब सेक्युलर शिवसेना

शिवसेना का ट्रांसफॉर्मेशन – पहले कट्टर मराठीवाद, फिर कट्टर हिंदुत्व और अब सेक्युलर शिवसेना

हरिगोविंद विश्वकर्मा
महाराष्ट्र की राजनीति के अगर मौजूदा हालात पर नज़र डालें तो साफ़ है कि अगर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस ने शिवसेना का समर्थन किया तो शिवसेना का राज्य में अपना मुक्यमंत्री बनाने का सपना तीसरी बार और शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे की मौत के बाद पहली बार साकार कर सकती है। जो भाजपा के साथ गठबंधन में रहते संभव नहीं था। हालांकि इसके लिए इस भगवा पार्टी को भगवा राजनीति की ही तिलांजलि देनी होगी, जो उसकी अब तक पहचान रही है।

भारत में क़रीब सात दशक के लोकतांत्रिक इतिहास में कई दलों ने अपनी विचारधारा में समय के साथ बदलाव किए। इसकी जीती जागती मिसाल शिवसेना है। अपने जन्म के समय से मराठी मानुस का नारा देकर पहले दक्षिण भारतीयों फिर उत्तर भारतीयों के खिलाफ जहर उगलने वाली शिवसेना बाद में कट्टर हिदुत्ववाद का रास्ता अख़्तियार कर लिया और अब भगवा की पैरोकार यह राजनीतिक पार्टी राज्य में मुख्यमंत्री की कुर्सी पाने के लिए धर्मनिरपेक्षता की विचारधारा वाले दो दलों एनसीपी और कांग्रेस का समर्थन लेने जा रही है।

दरअसल, शिवसेना का जन्म 19 जून 1966 को कार्टूनिस्ट बाल ठाकरे ने कांग्रेस नेता महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री वसंतराव नाईक की शह पर किया था। बाद में कांग्रेस ने शिवसेना का इस्तेमाल मुंबई ट्रेड यूनियान्स खासकर मिलों में कम्युनिस्टों के वर्चस्व को ख़त्म करने लगी। इससे बाल ठाकरे की ताक़त बढञने लगी। इसी बीच ठाकरे की कांग्रेस से मतभेद हो गया और शिवसेना कांग्रेस के लिए भस्मासुर साबित हुई। बहराहल, पिछली सदी के साठ-सत्तर के दशक में शिवसेना ने मराठी मानुस का नारा दिया और दक्षिण भारतीयों के खिलाफ हमले की आक्रामक मुहिम शुरू की। इसके बाद शिवसेना के निशाने पर उत्तर भारतीय खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग आ गए। शिवसेना के लोग उनको परप्रांतीय कहकर उन पर हमला करने लगे। उत्तर भारतीयों पर शिवसेना के हमले की बात उत्तर भारतीय अभी तक नहीं भूले हैं।

बहराहल, अयोध्या में भगवान श्री राम के मंदिर के लिए राम जन्मभूमि आंदोलन शुरू होने के बाद सहसा शिवसेना में बदलाव आया। उसके लिए कट्टर मराठीवाद से भी ऊपर कट्टर हिंदुत्वाद हो गया। शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे ने घोषित तौर पर कट्टर हिदुत्व का रास्ता अपना लिया। इसके बाद कई मामलों में शिवसेना हिंदुत्व के मुद्दे पर भाजपा से भी ज़्यादा आक्रामक रही। सीनियर ठाकरे और उनका मुखपत्र सामना देश के मुसलमानों के खिलाफ जहर उगलते रहे। इसीलिए महाराष्ट्र ही नहीं देश के हिंदू उनके नाम के आगे ‘हिदुं हृदय सम्राट’ का अलंकरण लगाया जाने लगा। बाल ठाकरे तो यहां तक दावा करते रहे कि अयोध्या में राम मंदिर-बाबरी मस्जिद के विवादित ढांचे को कारसेवा में गए शिवसेना कार्यकर्ताओं ने ही ढहाया था। इसके बाद से ही देश में शिवसेना हिंदुत्व की प्रतिनिधि दल रहा है। लोग शिवसेना को भाजपा से ज्यादा कट्टर हिदुत्ववाली पार्टी मानते थे।

बाल ठाकरे के बाद शिवसेना की कमान संभालने वाले उनके बेटे उद्धव ठाकरे भी कट्टर हिंदुत्व के रास्ते पर ही चलते रहे। वह भाजपा पर राम मंदिर निर्माण की राह में आई बाधाओं के जानबूझकर दूर न करने का भी आरोप लगाते रहे। इतना ही नहीं उद्धव ने अपने बेटे आदित्य ठाकरे के साथ अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण पर जोर देने के लिए पिछले वर्ष अयोध्या का दौरा किया। उनके उस दौरे को खूब हाइप भी मिला, क्योंकि ठाकरे परिवार का कोई सदस्य पहली बार महाराष्ट्र के बाहर निकला था।

यह संयोग ही है कि जब अयोध्या विवाद का सैद्धांतिक तौर पर सुप्रीम कोर्ट ने हल कर दिया और रामलला के विवादित स्थल को हिंदुओं को राम मंदिर बनाने के लिए सौंप दिया, ठीक उसी समय शिवसेना उस मुकाम पर पहुंच गई जब उसे कट्टर हिंदुत्व या अपना महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री दोनों में से एक का चयन करना है। एनसीपी कांग्रेस के साथ सरकार बनाने पर निश्चित तौर पर शिवसेना को कट्टर हिंदुत्व का मार्ग छोड़ना पड़ेगा। शिवसेना अब अपने उस नारे को भी छोड़ना पड़ेगा, जिसमें वह अब तक अयोध्या के बाद काशी और मथुरा की बात करती रही है।

इस तरह भाजपा और शिवसेना के बीच 1980 के दशक के अंत से चला आ रहा गठबंधन रविवार की शाम भाजपा के राज्य में सरकार न बनाने के फ़ैसले के साथ टूट गया। इसीलिए भाजपा ने राज्यपाल भगत सिंह कोशियारी को बताया कि शिवसेना के कथित बेईमानी और गठबंधन का धर्म निभाने से इनकार करने के कारण वह राज्य में सरकार नहीं बनाने का फैसला किया है। इसके बाद राज्यपाल ने दूसरी सबसे बड़ी पार्टी शिवसेना से पूछा कि क्या वह राज्य में सरकार के गठन के लिए इच्छुक है और इसके लिए उसके पास विधायक बल है?

शिवसेना प्रवक्ता और उद्धव ठाकरे के लेफ़्टिनेंट संजय राऊत ने कहा कि पार्टी अध्यक्ष उद्धव ठाकरे के हवाले से कहा कि शिवसेना सरकार बनाएंगी। वैसे भी भाजपा के सरकार बनाने से इनकार करने के बाद शिवसेना के लिए
शिवसेना के पास केवल 56 विधायक हैं। यानी सरकार बनाने के लिए ज़रूरी 88 विधायकों के समर्थन के लिए शिवसेना सेक्यूलर दलों एनसीपी -कांग्रेस पर निर्भर रहेगी। यानी शिवसेना को अपना मुख्यमंत्री बनाने के लिए अपने दो परंपरागत प्रतिद्वंद्वियों एनसीपी और काग्रेस का समर्थन लेना पड़ेगा। ये दोनों दल शिवसेना को तभी समर्थन देंगे जब शिवसेना कट्टर हिदुत्ववाद के अपने एजेंडे को ठंडे बस्ते में डाल देगी। 

इन परिस्थियों में यहां अब सवाल उठेगा कि बाल ठाकरे की शिवसेना उद्धव ठाकरे और आदित्य ठाकरे के अनुवाई में सत्ता के लिए अपने कट्टर हिंदुत्ववाद का रास्ता वाक़ई छोड़ देगी और सेक्यूलर शब्द को हमेशा ‘छद्म’ कहने वाली शिवसेना सेक्यूलर रास्ता अख़्तियार करेगी? शिवसेना सत्ता के लिए अगर कट्टर हिंदुत्ववाद का मार्ग छोड़कर ‘सेक्यूलर शिवसेना’ में ट्रांसफॉर्म होती है तो यह महाराष्ट्र ही नहीं देश की राजनीति में बहुत बड़ा परिवर्तन होगा।

वैसे भाजपा और शिवसेना का गठबंधन अवसरवादिता की मिसाल रहा है। इसलिए भारत की राजनीति का यह सबसे कम भरोसेमंद गठबंधन रहा। जब यह गठबंधन शुरू हुआ तो शिवसेना बड़े भाई की भूमिका में थी। जब तब बाल ठाकरे जिंदा थे, तब तक शिवसेना गठबंधन में बड़े भाई के ही किरदार में रही, लेकिन उनके निधन के बाद शिवसेना सिमटने लगी और 2014 के बाद भाजपा बड़े भाई की भूमिका में आ गई। इसे उद्धव ठाकरे कभी दिल से स्वीकार नहीं कर पाए।

अगर 2014 के महाराष्ट्र चुनाव प्रचार के दौरान उद्धव ठाकरे के भाषण को फिर से सुनें, तो यह साफ लगता है कि उनके मन में भाजपा और भाजपा शीर्ष नेताओं के खिलाफ बहुत अधिक विष भरा हुआ है, जिसे वह जब भी मौका मिलेगा तो उगल देंगे। इसीलिए इस बार विधान सभा चुनाव में जब भाजपा पिछली बार की बहुमत से 23 की तुलना में 40 सीट पिछड़ गई, तो उद्धव को 2014 के चुनाव और उसके बाद छोटे भाई का दर्जा स्वीकार करने के अपमान का बदला लेने का स्वर्णिम मौका मिल गया।

शिवसेना दरअसल, 2014 के बाद से ही इस मौक़े को तलाश रही थी, चूंकि भाजपा बहुत मजबूत स्थिति में पहुंच गई थी, लिहाज़ा, वह वेट एंड वॉच के मोड में रही। मौके की तलाश में ही 2014 में छोटे भाई ‘भाजपा’ को 127 सीट से अधिक देने को तैयार न होने वाली शिवसेना 2019 में खून का घूंट पीकर 144 की बजाय 124 सीट पर चुनाव लड़ने के लिए तैयार हो गई।

उद्धव ठाकरे और उनके लेफ़्टिनेंट संजय राऊत जानते थे कि कांग्रेस-एनसीपी साथ चुनाव लड़ रहे हैं, लिहाजा, भाजपा के साथ गठबंधन करके लड़ने पर ही वह विधान सभा में सम्मानजनक सीट हासिल कर सकती है। अन्यथा वह बहुत ज्यादा घाटे में जा सकती है। उसके सामने 2014 का उदाहरण था, जब चुनाव में पूरी ताक़त लगाने के बावजूद वह 63 सीट से आगे नहीं बढ़ पाई, जबकि भाजपा उसके लगभाग दोगुना यानी 122 सीट जीतने में सफल रही। इसीलिए फिफ्टी-फिफ्टी फॉर्मूले की बात करने वाले उद्धव और उनके लेफ़्टिनेंट संजय राऊत भाजपा से केवल 124 सीट मिलने पर चुप रहे। पूरे चुनाव प्रचार के दौरान, जब नरेंद्र मोदी और अमित शाह जैसे नेता बोल रहे थे कि इस बार चुनाव देवेंद्र फडवीस के नेतृत्व मे लड़ा जा रहा है और वहीं अगले पांच साल मुख्यमत्री रहेंगे, तब भी पिता-पुत्र ने खामोश रहने में अपना हित समझा।

24 अक्टूबर का दिन उद्धव ठाकरे और उनके लेफ़्टिनेंट संजय राऊत के लिए बदला लेने का दिन था। चुनाव परिणाम में भाजपा की 18 सीट कम होने से दोनों नेता अचानक से फिफ्टी-फिफ्टी फॉर्मूले का राग आलापने लगे और ढाई-ढाई साल का मुख्यमंत्री और सरकार में बराबर मंत्रालय की मांग करने लगे। वह जानते थे कि भाजपा पिछली बार की तरह मजबूत पोजिशन में नहीं है, वह शिवसेना के समर्थन के बिना सरकार नहीं बना सकती। अचानक से शिवसेना की बारगेनिंग पावर बहुत बढ़ गई थी।

महाराष्ट्र में भगवा गठबंधन में ‘बड़ा भाई’ बनने की हसरत पाले उद्धव ठाकरे की नज़र मुख्यमंत्री की कुर्सी पर थी। वह बार-बार हवाला दे रहे हैं कि उन्होंने अपने पिता और शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे को वचन दिया है कि महाराष्ट्र में एक न एक दिन शिवसैनिक को मुख्यमंत्री बनाकर ही रहेंगे। हां इसके लिए उन्हें अपने कट्टर हिंदूत्वाद के एजेंडे को छोड़ना पड़ेगा जो शिवसेना की एक तरह से पहचान रही है। 

क्या शिवसेना कांग्रेस- एनसीपी के साथ जाने के लिए कट्टर हिंदुत्ववाद का रास्ता छोड़ देगी?

हरिगोविंद विश्वकर्मा
महाराष्ट्र में भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना के बीच 1980 के दशक के अंत से शुरू हुए रोमांस का शिवसेना की हठधर्मिता के चलते क़रीब-क़रीब अंत हो गया है। इसीलिए भाजपा ने राज्यपाल भगत सिंह कोशियारी को रविवार की शाम बता दिया कि महागठबंधन के प्रमुख सहयोगी शिवसेना के गठबंधन का धर्म निभाने से इनकार करने के कारण वह राज्य में सरकार बनाने की स्थिति में फिलहाल नहीं है। इस साथ ही भाजपा नेताओं ने शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस के संभावित गठबंधन को शुभकामनाएं दी।

भाजपा के सरकार बनाने से असमर्थता जताने के तुरंत बाद शिवसेना प्रवक्ता और उद्धव ठाकरे के लेफ़्टिनेंट संजय राऊत ने कहा कि अगर उद्धव ठाकरे बोले हैं कि महाराष्ट्र का अगला मुख्यमंत्री शिवसेना का होगा तो मुख्यमंत्री शिवसेना का होगा ही। यानी भाजपा के सरकार बनाने से इनकार करने के बाद शिवसेना के लिए अपना मुख्यमंत्री बनाने की स्वर्णिम मौका है। लेकिन उसके पास केवल 56 विधायक हैं। यानी सरकार बनाने के लिए ज़रूरी 88 विधायक एनसीपी-कांग्रेस गठबंधन के होंगे। 

इसका मतलब शिवसेना को अपना मुख्यमंत्री बनाने के लिए अपने दो परंपरागत प्रतिद्वंद्वियों एनसीपी और काग्रेस का समर्थन लेना पड़ेगा। ऐसे में यहां अब सवाल यह उठता है कि हिंदू हृदय सम्राट बाल ठाकरे की शिवसेना उद्धव ठाकरे और आदित्य ठाकरे के अनुवाई में सत्ता के लिए कट्टर हिंदुत्ववाद का रास्ता छोड़ देगी और सेक्यूलर शब्द को ‘छद्म’ कहने वाली शिवसेना सेक्यूलर रास्ता अख़्तियार करेगी? अगर शिवसेना सत्ता के लिए कट्टर हिंदुत्ववाद का रास्ता छोड़कर ‘सेक्यूलर शिवसेना’ में ट्रांसफॉर्म होगी तो यह महाराष्ट्र की राजनीति में बहुत बड़ा परिवर्तन होगा।

राम जन्मभूमि आंदोलन शुरू होने के बाद शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे ने कट्टर हिदुत्व का रास्ता अपना लिया था। बाल ठाकरे तो यहां तक दावा करते रहे कि अयोध्या में राम मंदिर-बाबरी मस्जिद के विवादित ढांचे को शिवसेना कार्यकर्ताओं ने ही ढहाया। इसके बाद से ही शिवसेना देश में हिंदुत्व की प्रतिनिधि दल रहा है। कई मामलों में शिवसेना हिंदुत्व के मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी से भी ज़्यादा आक्रमाक रही है। सीनियर ठाकरे और उनका मुखपत्र सामना देश के मुसलमानों के खिलाफ जहर उगलते रहे। इसीलिए महाराष्ट्र ही नहीं देश के हिंदू उनके नाम के आगे ‘हिदुं हृदय सम्राट’ का अलंकरण लगाया जाने लगा।

ठाकरे के बाद शिवसेना की कमान संभालने वाले उद्धव भी कट्टर हिंदुत्व के रास्ते पर चलते रहे। वह भाजपा पर राम मंदिर निर्माण की राह में आई बाधाओं के जानबूझकर दूर न करने का भी आरोप लगाते रहे। इतना ही नहीं उद्धव अपने बेटे के साथ अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण पर जोर देने के लिए पिछले वर्ष अयोध्या का दौरा किया। उनके उस दौरे को खूब हाइप भी मिला, क्योंकि ठाकरे परिवार का कोई सदस्य पहली बार महाराष्ट्र के बाहर निकला था।

यह संयोग ही है कि जब अयोध्या विवाद का सैद्धांतिक तौर पर सुप्रीम कोर्ट ने हल कर दिया और रामलला के विवादित स्थल को हिंदुओं को राम मंदिर बनाने के लिए सौंप दिया, ठीक उसी समय शिवसेना उस मुकाम पर पहुंच गई जब उसे कट्टर हिंदुत्व या अपना महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री दोनों में से एक का चयन करना है। एनसीपी कांग्रेस के साथ सरकार बनाने पर निश्चित तौर पर शिवसेना को कट्टर हिंदुत्व का मार्ग छोड़ना पड़ेगा। शिवसेना अब अपने उस नारे को भी छोड़ना पड़ेगा, जिसमें वह अयोध्या के बाद काशी और मथुरा की बात करती रही है।

अगर 2014 के महाराष्ट्र चुनाव प्रचार के दौरान उद्धव ठाकरे के भाषण को फिर से सुने तो यह साफ हो जाएगा कि उनके मन में भाजपा और भाजपा नेताओं के खिलाफ बहुत अधिक विष भरा है, जिसे वह जब भी मौका मिलेगा तो उगल देंगे। इसीलिए जब इस बार विधान सभा चुनाव में भाजपा पिछली बार की 23 की तुलना में 40 सीट पिछड़ गई तो उद्धव को 2014 के चुनाव और उसके बाद छोटे भाई का दर्जा स्वीकार करने के अपमान का बदला लेने का मौका मिल गया।

शिवसेना दरअसल, 2014 के बाद से ही मौका तलाश रही थी, चूंकि भाजपा बहुत मजबूत स्थिति में पहुंच गई थी, लिहाज़ा, वह वेट एंड वॉच के मोड में रही। मौके की तलाश में ही 2014 में छोटे भाई ‘भाजपा’ को 127 सीट से अधिक देने को तैयार न होने वाली शिवसेना 2019 में 144 की बजाय 124 सीट पर चुनाव लड़ने के लिए तैयार हो गई।

शिवसेना जानती थी कि भाजपा के साथ गठबंधन बनाकर लड़ने पर ही वह विधान सभा में सम्मानजनक सीट हासिल कर सकती है। उसके सामने 2014 का उदाहरण था, जब चुनाव में पूरी ताक़त लगाने के बावजूद शिवसेना 63 सीट से आगे नहीं बढ़ पाई, जबकि भाजपा उसके लगभाग दोगुना यानी 122 सीट जीतने में सफल रही, इसीलिए फिफ्टी-फिफ्टी फॉर्मूले की बात करने वाले उद्धव और उनके लेफ़्टिनेंट संजय राऊत 124 सीट मिलने पर चुप रहे।

दरअसल, शिवसेना नेता जानते थे कि कांग्रेस एनसीपी का गठबंधन हो गया है, लिहाजा, उसके लिए भाजपा के साथ लड़ना लाभदायक होगा। अन्यथा वह बहुत ज्यादा घाटे में जा सकती है। पूरे चुनाव प्रचार के दौरान, जब नरेंद्र मोदी और अमित शाह जैसे नेता बोल रहे थे कि इस बार चुनाव देवेंद्र फडवीस के नेतृत्व मे लड़ा जा रहा है और वहीं अगले पांच साल मुख्यमत्री रहेंगे, तब भी पिता-पुत्र ने खामोश रहने में अपना हित समझा।

24 अक्टूबर का दिन उद्धव ठाकरे और उनके लेफ़्टिनेंट संजय राऊत के लिए बदला लेने का दिन था। चुनाव परिणाम में भाजपा की 18 सीट कम होने से दोनों नेता अचानक से फिफ्टी-फिफ्टी फॉर्मूले का राग आलापने लगे और ढाई-ढाई साल का मुख्यमंत्री और सरकार में बराबर मंत्रालय की मांग करने लगे। वह जानते थे कि भाजपा पिछली बार की तरह मजबूत पोजिशन में नहीं है, वह शिवसेना के समर्थन के बिना सरकार नहीं बना सकती। अचानक से शिवसेना की बारगेनिंग पावर बहुत बढ़ गई।


महाराष्ट्र में भगवा गठबंधन में ‘बड़ा भाई’ बनने की हसरत पाले उद्धव ठाकरे की नज़र मुख्यमंत्री की कुर्सी पर थी। इसीलिए मुंबई की वरली सीट से आदित्य ठाकरे चुनाव मैदान में उतारे और विधायक चुने गए। प्रमुख उद्धव ठाकरे बार-बार हवाला दे रहे हैं कि उन्होंने अपने पिता और शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे को वचन दिया है कि महाराष्ट्र में एक न एक दिन शिवसैनिक को मुख्यमंत्री बनाकर ही रहेंगे।

दरअसल, 1988-89 में जब प्रमोद महाजन और बाल ठाकरे ने भाजपा और शिवसेना के बीच गठबंधन का फैसला किया तब भाजपा को राज्य में कोई ख़ास जनाधार नहीं था। उस समय शिवसेना बड़े भाई और भाजपा छोटे भाई के किरदार में थी। 1995 में जब भगवा गठबंधन की सरकार बनी तब शिवसेना के मनोहर जोशी मुख्यमंत्री और भाजपा के गोपीनाथ मुंडे उपमुख्यमंत्री बने थे। यह सिलसिला 2014 के लोकसभा चुनाव तक जारी रहा, लेकिन 2014 के विधान सभा चुनाव के नतीजों के बाद भाजपा बड़े भाई के किरदार में आ गई। इस अदला-बदली को उद्धव मन से कभी स्वीकार नहीं कर सके। अब भाजपा से बदला लेने का मौका मिल तो अवसर क्यों चूकते। यानी पहले मराठी मानुस, फिर कट्टर हिंदुत्व की राह पर चलने वाली शिवसेना अब एनसीपी और कांग्रेस के साथ धर्मनिरपेक्ष हो जाएगी।

रविवार, 29 सितंबर 2019

अततः ठाकरे परिवार की तीसरी पीढ़ी उतरी चुनावी राजनीति में


हरिगोविंद विश्वकर्मा
महाराष्ट्र में होने वाले विधान सभा चुनाव में एक बात पहली बार हो रही है। वह बात है आदित्य ठाकरे के विधान सभा चुनाव लड़ने की। शिवसेवना ने आधिकारिक रूप से घोषणा कर दी है कि ठाकरे परिवार की तीसरी पीढ़ी के प्रतिनिधि आदित्य ठाकरे चुनावी राजनीति में शिरकत करेंगे और ऐसा करने वाले ठाकरे परिवार के वह पहले सदस्य होंगे। महाराष्ट्र के तक़रीबन छह दशक के इतिहास में ठाकरे परिवार का कोई सदस्य पहली बार जनता से वोट मांगेगा।

इस बार विधान सभा चुनाव में शिवसेना और भारतीय जनता पार्टी एक साथ होंगे। इसकी अभी तक औपचारिक घोषणा मंगलवार को होने की संभावना है, अगर मौजूदा फ़ॉर्मूले को दोनों पक्ष मान लेते हैं, तो भाजपा और शिवसेना क्रमशः 144 और 124 सीट पर चुनाव लड़ सकती हैं। हालांकि शिवसेना में एक तबका बराबर सीट मांग रहा था और मुख्यमंत्री पद भी ढाई-ढाई साल करने पर ज़ोर दे रहा था। इन दो बिंदुओं पर गठबंधन टूटने की भी संभावना बन गई थी, लेकिन अब सब दोनों पक्ष साथ में चुनाव मैदान में उतरने पर सहमत हो गए हैं। अगर भगवा गठबंधन की सत्ता में वापसी हुई तो भाजपा की ओर से देवेंद्र फड़णवीस मुख्यमंत्री और जूनियर ठाकरे उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ले सकते हैं।

हालांकि पिछली बार जब भाजपा और शिवसेना के बीच पोस्ट-इलेक्शन अलायंस बना, तब मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस ने शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे को उपमुख्यमंत्री पद देने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन इस पर विचार नहीं किया गया। लिहाजा, शिवसेना की ओर से कोई नेता उपमुख्यमंत्री नहीं बन सका। लेकिन लगता है, अब शिवसेना चाहती है कि भविष्य में राजनीति में सफलता हासिल करने के लिए आदित्य का सरकार में शामिल होना ज़रूरी है। इसी रणनीति के तहत उनको नई सरकार में उप मुख्यमंत्री बनाने की बात हो रही है।

आदित्य ठाकरे के लिए शिवसेना ने दक्षिण मुंबई की वरली विधान सभा सीट चुना है। यहां से फ़िलहाल शिवसेना के सुनील शिंदे विधायक हैं। लिहाजा, यह सीट सुरक्षित है, क्योंकि 2014 के विधान सभा चुनाव में सुनील शिंदे को 60,625 वोट मिले थे, जबकि राष्ट्रवादी कांग्रेस उम्मीदवार और माफिया डॉन अरुण गवली के भतीजे सचिन अहीर, जो सरकार में राज्यमंत्री भी थे, को 37,613 वोट मिले थे। इस तरह शिंदे 23 हजार से ज़्यादा वोट से जीते थे। अब सचिन अहीर ख़ुद शिवसेना में शामिल हो चुके हैं।

अगर ठाकरे परिवार के चुनावी राजनीति की बात करें, तो 31 मई, 2014 को महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के अध्यक्ष राज ठाकरे ने मुंबई के सोमैया ग्राउंड में विधान सभा चुनाव लड़ने का ऐलान करते हुए कहा था कि अगर बहुमत मिला तो सत्ता संभालेंगे। यानी राज ने खुद को सीएम पद का प्रत्याशी उम्मीदवार कर दिया था। इससे एमएनएस कार्यकर्ताओं में जोश का संचार हो गया था, एक बार लगा कि मुमकिन है एमएनएस शिवसेना की जगह ले ले। लेकिन बाद में राज ने अपने क़दम पीछे खींच लिए और एमएनएस का एक तरह से अस्तित्व ही ख़त्म हो गया। राजनीति विश्लेषकों का मानना है कि राज ठाकरे में जो भी अपरिपक्वता है, वह चुनाव न लड़ने के कारण है।

दरअसल, किसी भी नेता या पब्लिक लाइफ़ में उतरने वाले व्यक्ति को उस हर पंचायत का अनुभव होना चाहिए, जहां डिबेट होता है। यानी उसे हर ऐसी जगह बोलना या भाषण देना चाहिए, जहां विरोध करने वाले लोग भी बैठे हों। ऐसे में नेता के भाषण का बारीक़ विश्लेषण होता है और उसे तार्किक जबाव मिलता है। तब नेता भी ख़ुद महसूस करता है कि उसने क्या ग़लत बोला या कहां उसका वक्तव्य सही नहीं था। अपने तर्क कटने से वह सावधान होता है और सीखता है। अगली बार और तैयारी एवं अध्ययन के साथ ही अपनी बात रखता है। इस प्रक्रिया से गुज़रने से नेता धीरे-धीरे परिपक्व यानी सीज़न्ड हो जाता है। इसलिए, हर नेता को विधानसभा या लोकसभा चुनाव ज़रूर लड़ना चाहिए। अगर उसे हारने का डर सता रहा हो तो वह विधान परिषद या राज्यसभा में जा सकता है। लेकिन उसे वाद-विवाद वाले फ़ोरम का मंच ज़रूर शेयर करना चाहिए।

वस्तुतः औपचारिक रूप से शिवसेना की स्थापना 19 जून 1966 को हुई, लेकिन ठाकरे परिवार के किसी सदस्य ने अब तक चुनाव नहीं लड़ा। मतलब, पूरा ठाकरे परिवार अब तक डिबेटिंग फोरम के एक्सपोज़र से वंचित रहा है। ठाकरेज (सभी ठाकरे) के भाषणों में इससे वह मैच्यौरिटी नहीं दिखती, जो सीज़न्ड पॉलिटिशियन्स में होती है। यह कहने में ज़रा भी संकोच नहीं कि बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर के बाद बाल ठाकरे महाराष्ट्र की धरती पर पैदा होने वाले सबसे लोकप्रिय और सर्वमान्य नेता रहे। उनकी बड़ी हसरत थी कि प्रधानमंत्री बनें, लेकिन इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए उन्होंने कभी लोकसभा या विधान सभा चुनाव नहीं लड़ा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हिटलर और इंदिरा गांधी के समर्थक बाल ठाकरे अगर चुनाव लड़े होते तो महाराष्ट्र ही नहीं पूरे देश का राजनीतिक परिदृश्य अलग हो सकता था। मुमकिन था शिवसेना तब राष्ट्रीय पार्टी के रूप में उभर सकती थी। ठाकरे के आलोचक भी कहते हैं कि अगर ठाकरे राष्ट्रीय राजनीति में उतरे होते तो मुमकिन था महाराष्ट्र से भी कोई देश का प्रधानमत्री बनने का गौरव पा जाता।

बहरहाल, विधान सभा या लोकसभा की बहसों के अनुभव से वंचित ठाकरे अकसर विवादित, असंवैधानिक और लोगों को नाराज़ करने वाले बयान दे देते थे, जो उनके लिए ही आफ़त बन जाता था। एक विवादित भाषण के चलते, एक बार उनकी नागरिकता छह साल के लिए छीन ली गई थी। छह साल तक वह वोट ही नहीं दे पाए थे। इसी तरह एक बार उन्होंने सभा में तत्कालीन टाडा जज को भला-बुरा कह दिया था, जिसके लिए उन्हें बाद में ख़ेद जताना पड़ा। उनके ख़िलाफ़ अकसर मानहानि के मुक़दमे दायर किए जाते थे। अगर वह चुनाव लड़े होते तो शायद यह सब न होता। कमोबेश यही अवगुण बाद में राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे में भी दिखा।

राज ठाकरे का मराठी मानुस का पूरा दर्शन ही असंवैधानिक था। उनके ख़िलाफ़ अब तक सख़्त कार्रवाई नहीं हुई, इसका मतलब यह नहीं कि उन्होंने जो कुछ बोला वह संविधान के दायरे में था। महाराष्ट्र या मुंबई में केवल मराठी लोगों को प्रवेश देने के लिए संविधान में संशोधन करना होगा। संविधान में साफ़-साफ़ लिखना होगा कि दूसरे प्रांत के लोग रोज़ी-रोटी के लिए दूसरे राज्य में नहीं जा सकते हैं। तब ही कोई नेता कह सकता है कि दूसरे प्रांत के लोग उसके राज्य में क़दम न रखें। जब तक संविधान में परिवर्तन नहीं होता किसी को किसी भारतीय नागरिक को देश के किसी कोने में जाने या रोज़ी-रोटी कमाने से रोकने का कोई हक़ नहीं है।

दरअसल, ठाकरेज़ की समस्या यह भी रही कि कम उम्र या वाद-विवाद का सामना किए बिना पार्टी के मुखिया बना दिए जाते रहे हैं। शिवसेना का जन्म होने पर मुखिया बने बाल ठाकरे 40 साल के भी नहीं थे। उन्होंने कोई चुनाव भी नहीं लड़ा था। ऐसी पृष्ठिभमि का नेता जब किसी दल का सर्वेसर्वा बनता है तो वह चमचों से घिर जाता है। चमचे किसी भी राजनेता के व्यक्तित्व के विकास में सबसे बड़ी बाधा होते हैं। दरअसल, चमचे नेता के सही को सही तो कहते ही है, नेता के ग़लत को भी डर के मारे सही कहने लगते हैं। इससे नेता अपनी कही हुई ग़लत बात को भी सही मानने लगता है। यहीं से उसका वैचारिक पतन शुरू हो जाता है। बाल ठाकरे के साथ यही हुआ। चमचों ने उन्हें वैचारिक रूप से अपरिपक्व बना दिया। अगर वह चुनाव लड़े होते। लोकसभा का अनुभव लिए होते तो निश्चित तौर पर सदन की बहस उन्हें परिपक्व करती और तब वह शर्तिया देश के प्रधानमंत्री भी बन सकते थे। ठाकरे में वह क़ाबिलियत तो थी ही जो राष्ट्रीय नेता में होनी चाहिए।

बहरहाल, इसी कारण राजनीतिक हलक़ों में कहा जा रहा है कि ठाकरे परिवार सही मायने में राजनीति में अब उतर रहा है। आदित्य ने भविष्य की राजनीति को ध्यान में रखकर सही फ़ैसला किया है। इस साल गर्मियों में अपनी विजय संकल्प मेलावा यात्रा में वह ‘नया महाराष्ट्र’ बनाने का आह्वान कर भी रहे थे। शिवसेना तो आदित्य का नाम मुख्यमंत्री पद के लिए आगे कर रही थी। उद्धव ठाकरे की तीव्र अभिलाषा है कि उनका बेटा राज्य में शासन की बाग़डोर संभाले। मगर अभी थोड़ी जल्दी है। जल्दी ही शिवसेना को एहसास हो गया कि अनुच्छेद 370 को हटाने के बाद पैदा हुए हालात में भाजपा बीस पड़ रही है। लिहाज़ा, शिवसेना के लिए भाजपा के साथ रहना फायदेमंद है। इस तरह कह सकते हैं कि अगर भगवा गठबंधन सत्ता में वापस लौटता है तो आदित्य नई सरकार में उपमुख्यमंत्री बनाए जा सकते हैं। हालांकि भाजपा में एक तबक़ा उपमुख्यमंत्री पद देने का भी विरोध कर रहा है।

बुधवार, 25 सितंबर 2019

क्या गिरफ़्तारी का डर सता रहा है शरद पवार को ?


हरिगोविंद विश्वकर्मा
क्या आपने कभी किसी घोटाले में नाम आने पर जांच एजेंसी के बुलाने से पहले ही किसी को एजेंसी के पास जाने की ख़बर सुनी है? शर्तिया आपने ज़ेहन में ऐसी कोई मिसाल नहीं होगी, जब बिना तलब किए ही कोई किसी जांच ऐजेंसी के पास गया हो। लेकिन देश के रक्षा एवं कृषि मंत्री और तीन बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रह चुके शरदचंद्र गोविंदराव पवार इसी तरह की मिसाल पेश कर रहे हैं। वह आगामी 27 सितंबर को प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी के कार्यालय जाएंगे। दरअसल, ईडी ने पवार के ख़िलाफ़ राज्य की एक सहकारी बैंक में हुए कथित घोटाले में मनी लॉन्डरिंग के तहत एफ़आईआर दर्ज़ किया है।

देश के बेहद सीज़न्ड पॉलिटिशियन माने जाने वाले शरद पवार आईएनएक्स घोटाले में पिछले महीने कांग्रेस के धाकड़ नेता और पूर्व वित्त एवं रक्षा मंत्री पी चिंदबरम की नाटकीय गिरफ़्तारी से बेहद सतर्क हैं। जब केंद्रीय जांच ब्यूरो ने पहले चिदंबरम के घर नोटिस चस्पा किया और बाद में सीबीआई अफ़सर उनके घर में दीवार फांद कर घुस गए थ्। संभवतः पवार को भी लग रहा है कि बैंक घोटाले में प्रवर्तन निदेशालय ने भले ही अभी एफ़आईआर ही दर्ज किया है। कल को जांच एजेंसी उनके घर नोटिस चस्पा कर सकती है या पूछताछ के लिए बुला सकती है और अगर वह उस समय चुनाव प्रचार के सिलसिले में मुंबई से बाहर रहे, तो संभव है प्रवर्तन निदेशालय उन्हें भगोड़ा घोषित कर दे।

पिछले महीने कम से कम सीबीआई ने चिदंबरम को गिरफ़्तार करने से पहले ऐसी ही हरकत की थी। इसीलिए मराठा क्षत्रप अपनी तरफ से कोई कोर कसर छोड़ना नहीं चाहते हैं। लिहाज़ा उन्होंने आनन-फ़ानन में बुधवार को संवाददाता सम्मेलन बुलाया और एहतियात के तौर पर घोषणा कर दी है, “27 सितंबर को मैं खुद प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारियों के पास जाऊंगा और जांच में एजेंसी को पूरा सहयोग दूंगा, क्योंकि ईडी ने एमएससी बैंक मामले में मेरा नाम दर्ज़ किया गया है। चूंकि मैं चुनाव प्रचार में मुंबई के बाहर रहूंगा। इसीलिए एजेंसी अपनी तरफ़ से यह न मान ले कि मैं जांच में सहयोग नहीं कर रहा हूं।”

ऐसे समय जब महाराष्ट्र में विधान सभा चुनाव की घोषणा हो चुकी है। इसके चलते प्रमुख दलों के शीर्ष नेता विधान सभा में उम्मीदवारों के नाम को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। ठीक ऐसे बहुत व्यस्त समय में शरद पवार महाराष्ट्र राज्य सहकारी बैंक घोटाले में अपना नाम आने से सकते में आ गए हैं। वैसे प्रवर्तन निदेशालय की ओर से बैंक घोटाले में पवार, भतीजे अजित पवार और प्रदेश एनसीपी प्रमुख जयंत पाटिल समेत 70 लोगों के ख़िलाफ़ मनी लॉन्ड्रिंग का केस दर्ज करने से महाराष्ट्र की राजनीति में तूफ़ान आ गया है।

सबसे अहम बात प्रवर्तन निदेशालय ने बैंक घोटाले में अभी पवार के ख़िलाफ़ केवल एफ़आईआर ही दर्ज़ किया है। जांच एजेंसी ने पवार को किसी तरह के स्पष्टीकरण या पूछताछ के लिए अभी तक बुलाया नहीं है। प्रशंसकों और कार्यकर्ताओं ने ‘साहेब’ के रूप में लोकप्रिय पवार के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज करने के विरोध में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता बुधवार को प्रवर्तन निदेशालय के मुंबई दफ़्तर के सामने प्रदर्शन किया। पवार के गृह नगर बारामती में लोगों ने विरोध स्वरूप बंद रखा। एनसीपी के नेता इसे चुनावी हथकंडा बता रहे हैं।

यशवंतराव चव्हाण के बाद सबसे प्रभावशाली मराठा नेता पवार मंगलवार को दिन भर महाराष्ट्र में विधान सभा के चुनावी हलचल में व्यस्त थे। कांग्रेस के साथ 125-125 सीट पर चुनाव लड़ने का समझौता होने के बाद वह उम्मीदवारों के नाम को अंतिम रूप देने में मशगूल हैं, लेकिन शाम को ईडी की ओर से घोटाले में एफ़आईआर दर्ज करने की ख़बर फ़्लैश होने के बाद उनकी प्राथमिकताएं अचानक बदल गईं। अब वह बेहद चौकन्ने होकर निर्णय ले रहे हैं। हर क़दम फूंक-फूंक कर रख रहे हैं।

बहरहाल, पवार ने कहा, “करीब 60 साल के मेरे राजनीतिक जीवन में यह दूसरी बार है, जब मेरे ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज़ हुई है। इससे पहले 1980 में मुझे एक आंदोलन के दौरान गिरफ़्तार किया गया था।” प्रेस कॉन्फ्रेंस में पवार इमोशनल कार्ड भी खेल गए। छत्रपति शिवाजी महाराज से अपनी तुलना करते हुए पवार ने कहा, “महाराष्ट्र के इतिहास ने हमें दिल्ली सल्तनत के आगे कभी न झुकना सिखाया है। मैं छत्रपति शिवाजी महाराज के आदर्शों पर चलता रहा हूं। शिवाजी महाराज ने हमें बचपन से ही सिखाया है कि दिल्ली की ताक़त के आगे कभी नहीं झुकना है। प्रवर्तन निदेशालय ने मेरे ख़िलाफ़ मामला दर्ज़ किया है, तो मैं स्वागत करता हूं। हालांकि मैं राज्य भर में इसके ख़िलाफ़ ज़बरदस्त प्रतिक्रिया देख रहा हूं। मुझे संविधान और न्याय पर विश्वास है।”

हालांकि प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई कोर्ट के आदेश पर हो रही है। बैंक घोटाले का मामला फ़िलहाल सुप्रीम कोर्ट में है। 22 अगस्त को बॉम्बे हाईकोर्ट की जस्टिस एससी धर्माधिकारी और जस्टिस एसके शिंदे की बेंच ने मुंबई पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा को घोटाले में अजित पवार समेत 70 लोगों के ख़िलाफ़ पांच दिन के अंदर केस दर्ज करने का आदेश दिया था। पवार और जयंत पाटिल समेत बैंक के दूसरे निदेशकों के ख़िलाफ़ बैंकिंग एवं आरबीआई अधिनियमों के कथित उल्लंघन का आरोप है। घोटाले में बैंक की 34 शाखाओं के कई अधिकारी भी शामिल हैं। हाईकोर्ट ने माना था कि घोटाला सभी आरोपियों के संज्ञान में था। अब उसी घोटाले में प्रवर्तन निदेशालय ने मनी लॉन्ड्रिंग का केस दर्ज किया है।

आरोप है कि पवार समेत बैंक के निदेशकों ने कथित तौर पर चीनी मिल को कम दरों पर कर्ज दिया था। चीनी मिलों तथा कताई मिलों को ऋण देने और उनकी वसूली में अनियमितता के कारण बैंक को 2007 से 2011 के बीच करीब 1000 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। यह भी आरोप है कि डिफॉल्टर्स की संपत्तियों को सस्ते दाम पर बेच दिया था। अजित पवार उस समय एमएससीबी के निदेशक थे। महाराष्ट्र को-ऑपरेटिव सोसायटी अधिनियम के तहत इस मामले की नाबार्ड ने जांच की और अपनी रिपोर्ट में पवार, हसन मुश्रीफ, कांग्रेस नेता मधुकर चव्हाण और अन्य लोगों को बैंक घोटाले का दोषी करार दिया था।

2012 में पूर्व आईपीएस अधिकारी वाईपी सिंह ने बहुचर्चित लवासा मामले में बड़ा खुलासा करते हुए एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार और अजीत पवार पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया था। वाईपी सिंह का आरोप था कि अजीत पवार ने बहुत ही सस्‍ती दर पर लवासा को 348 एकड़ जमीन दी। यह भी आरोप था कि नीलामी प्रक्रिया की भारी अनदेखी की गई। लवासा में पवार की बेटी सुप्रिया सुले की भी हिस्‍सेदारी थी। लवासा कॉरपोरेशन बनने के बाद सुप्रिया ने अपना 20.81 प्रतिशत शेयर बाद में बेच दिया था। वाईपी ने कहा था कि पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को खुल्‍लम-खुल्‍ला उल्‍लंघन किया गया।

शरद पवार के मुख्यमंत्रित्वकाल में जब डेमोलिशन मैन मनपा उपायुक्त गोविंद राघो खैरनार दाऊद की इमारत तोड़ रहे थे। कहा जाता है कि तब नाराज होकर पवार ने खैरनार का तबादला गोवंडी कसाईखाने में कर दिया। इसके बाद राज्य में माहौल कांग्रेस के खिलाफ हो गया और पार्टी 1995 का विधान सभा चुनाव हार गई।

1940 में पुणे जिले में बारामती से 10 किलोमीटर दूर कातेवाड़ी में किसान गोविंद राव पवार के घर में जन्में पवार का बचपन बहुत सामान्य था। अपना राजनीति सफर 1962 में 22 साल की उम्र में शुरू करने वाले पवार के बारे में कुछ साल पहले उनके एक करीबी मित्र ने एक लेख लिखा था। जिसमें बताया था कि युवावस्था में शरद पवार टैंपो से मुंबई आया जाया करते थे। टैंपों में वह पीछे बैठते थे, कभी-कभार ड्राइवर की बग़ल में सीट उपलब्ध होने पर आगे बैठने का अवसर पा जाते थे।

मात्र 24 साल की उम्र में वह महाराष्ट्र युवक कांग्रेस अध्यक्ष बन गए। महज 27 साल की उम्र में वह 1967 में विधानसभा चुनाव जीते और 32 साल की उम्र में खेलमंत्री बनाए गए। 1978 महज 38 साल की उम्र में पवार महाराष्ट्र जैसे राज्य के मुख्यमंत्री बन गए। 1991 में देश का रक्षा मंत्री बनने से पहले शरद पवार एक बार और सीएम की कुर्सी पर आसीन हुए। 1992-93 के मुंबई दंगों के बाद कांग्रेस हाई कमान ने कांग्रेस की इमैज ठीक करने के लिए पवार को सीएम बनाकर मुंबई भेजा। इस तरह पवार तीसरी बार राज्य के सीएम बने।

कॉमर्स से स्नातक पवार छह बार लोकसभा के लिए भी चुने जा चुके हैं। 1995 में उन्हें लोकसभा में विपक्ष का नेता बनाया गया। कथित तौर पर चाटुकारिता नापसंद करने वाले पवार को कांग्रेस की चमचा-संस्कृति कभी पसंद न आई। जिससे कांग्रेस के साथ उनके रिश्ते बनते-बिगड़ते रहे हैं। 1999 में उन्होंने विदेशी मूल के मुद्दे पर कांग्रेस छोड़ दी और एनसीपी की स्थापना की।



रविवार, 22 सितंबर 2019

चीन में उइगरों की दुर्दशा पर मुस्लिम समुदाय मौन क्यों?

हरिगोविंद विश्वकर्मा
दुनिया में किसी कोने में मुसलमानों पर ज़ुल्म होता है तो आम मुसलमान इस्लाम के भाईचारे का हवाला देते हुए पीड़ितों के समर्थन में उठ खड़ा हो जाता है। लेकिन चीन के शिंजियांग प्रांत में उइगर मुसलमानों पर हो रहे ज़ुल्म के ख़िलाफ़ कोई आवाज़ नहीं उठाता है। 2012 में जब रोहिंग्या मुसलमानों को कथित तौर पर म्यानमार से निकाला जाने लगा तो उनके समर्थन में मुंबई के आज़ाद मैदान में मुसलमानों ने भारी उपद्रव किया था। हिंसा की होली खेली और पुलिस बल पर पथराव किया गया था। बहरहाल, मुंबई पुलिस के अत्यधिक संयम के चलते उस समय भारी मारकाट होने से बच गया। इसी तरह भारत में फलिस्तीन के मुसलमानों का इतना अंध समर्थन किया जाता है कि आम मुसलमान इज़राइल को अपना दुश्मन नंबर एक मानता है। मुसलमानों की नाराज़गी के डर से ही इज़राइल जैसे विकसित और समान विचारधारा वाले देश के साथ रिश्ते को बेहतर बनाने में कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकारों ने कभी दिलचस्पी ही नहीं ली।


चीन के पश्चिमी प्रांत शिंजियांग में उइगरों पर ज़ुल्म होने की अक्सर ख़बरें आ रहती हैं। वहां मस्जिदों पर बुलडोजर चलवाया जाता है। उइगरों की धार्मिक स्वतंत्रता पर भी अंकुश लगा है। मेलबोर्न आस्ट्रेलिया के ला-त्रोबे यूनिवर्सिटी के जातीय समुदाय और नीति के विशेषज्ञ रिसर्चर जेम्स लीबोल्ड कहते हैं, “चीन की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी धर्म को ख़तरा मानती है। लंबे समय से चीन सरकार चीनी समाज को सेक्यूलर बनाना चाहती है। इसीलिए उइगरों पर अत्याचार किया जाता है।” इस साल गर्मियों में रमज़ान महीने में ही शिंजियांग के होतन शहर की सबसे प्रमुख हेयितका मस्जिद को ढहा दिया गया। इस बार जब रमज़ान में दुनिया के कोने-कोने में मुसलमान ख़ुशी से ईद मना रहे थे, तब दर्जनों मस्जिद गिराए जाने से शिंजियांग के मुस्लिम बस्तियों में सन्नाटा पसरा था, क्योंकि ऊंची गुंबददार मस्जिद की निशानी मिटने से बस्ती वीरान थी। वहां सुरक्षाकर्मियों की भारी मौजूदगी थी। 2014 में शिंजियांग सरकार ने रमज़ान में मुस्लिम कर्मचारियों के रोज़ा रखने और मुस्लिम नागरिकों के दाढ़ी बढ़ाने पर पाबंदी लगा दी थी। अंतरराष्ट्रीय मीडिया के मुताबिक 2014 में ही सख़्त आदेशों के बाद यहां की कई मस्जिदों और मदरसों के भवन ढहा दिए गए। 2017 के बाद से अकेले शिंजियांग में 36 मस्जिदें गिराई जा चुकी हैं। हालांकि शिंजियांग सरकार ने कहा कि वह धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करती है और नागरिक कानून की सीमा के दायरे में रहते हुए रमज़ान मना सकते हैं।


भारत में भी रोहिंग्या के लिए हथियार उठाने की बात करने वाले तमाम मुसलमान उइगरों के मुद्दे पर चुप हैं। किसी कोने से उइगरों पर ज़ुल्म के ख़िलाफ़ कोई आवाज़ नहीं उठा रहा है। कश्मीर मुद्दे पर दुनिया के मुसलमानों से सहयोग की अपील करने वाले इमरान ख़ान भी शिंजियांग के एक करोड़ से ज़्यादा मुसलमानों की दुर्दशा पर एकदम खामोश हैं। इमरान ने एक टीवी इंटरव्यू में कहा कि उइगरों की समस्या के बारे में उन्हें ज़्यादा जानकारी नहीं है। उइगर मुद्दे पर चीन को घेरने की जगह भारत ने इंटरपोल रेड कॉर्नर नोटिस का हवाला देकर अप्रैल 2016 में वर्ल्ड उइगर कांग्रेस की एग्ज़ीक्यूटिव कमेटी के चेयरमैन डोल्कन ईसा का ई-वीज़ा ही रद्द कर दिया था। जर्मनी निवासी ईसा धर्मशाला में तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा से मिलना चाहते थे। हैरानी वाली बात है कि उसी समय चीन जैश-ए-मोहम्मद सरगना मौलाना अज़हर मसूद को आतंकी घोषित कराने के प्रस्ताव का संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में बार-बार विरोध कर रहा था। इतना ही नहीं, हाल ही में चीन ने कश्मीर मुद्दा भी सुरक्षा परिषद में उठाया, पर प्रस्ताव गिर गया।


दरअसल, शिंजियांग के उइगर मुसलमान पिछले कई दशक से 'ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट' चला रहे हैं। वे चीन से अलग होना चाहते है। 1990 में सोवियत संघ का विघटन होने पर भी शिंजियांग की आज़ादी के लिए उइगर मुसलमानों ने संघर्ष किया था। उइगर आंदोलन को मध्य-एशिया में कई मुस्लिम देशों का समर्थन भी मिला था, लेकिन चीनी सरकार के कड़े रुख के आगे किसी की न चली और आंदोलन को सैन्य बल से दबा दिया गया। 'पूर्व तुर्किस्तान गणतंत्र' नामक राष्ट्र की पिछली सदी में दो बार स्थापना हो चुकी है। पहली बार 1933-34 में काश्गर शहर में केंद्रित था और दूसरी बार 1944-49 में सोवियत संघ की सहायता से पूर्वी तुर्किस्तान गणतंत्र बना था। 1949 से इस क्षेत्र पर चीन का नियंत्रण है। चीन 'पूर्वी तुर्किस्तान' नाम का ही विरोध करता है। वह इसे शिंजियांग प्रांत कहता है। इसकी सीमा मंगोलिया और रूस सहित आठ देशों के साथ मिलती है। इसकी अर्थव्यवस्था सदियों से खेती और व्यापार पर केंद्रित रही है। ऐतिहासिक सिल्क रूट की वजह से यहां संपन्नता और ख़ुशहाली रही है।


शिंजियांग में पहले उइगर मुसलमानों का बहुमत था। लेकिन एक रणनीति के तहत चीन ने वफ़ादार रहे बहुसंख्यक नस्लीय समूह हान समुदाय के लोगों को यहां बसाना शुरू किया। पिछले कई साल से इस क्षेत्र में हान चीनियों की संख्या में बहुत अधिक इज़ाफ़ा हुआ है। वामपंथी चीनी सरकार 'ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट' को दबाने के लिए हान चीनियों को यहां भेज रही है। उइगरों का आरोप है कि चीन सरकार भेदभावपूर्ण नीतियां अपना रही है। वहां रहने वाले हान चीनियों को मजबूत करने के लिए सरकार हर संभव मदद दे रही है। सरकारी नौकरियों में उन्हें ऊंचे पदों पर बिठाया जा रहा है। उइगुरों को दोयम दर्जे की नौकरियां दी जा रही हैं। दरअसल, सामरिक दृष्टि से शिंजियांग बेहद महत्वपूर्ण है और चीन ऐसे में ऊंचे पदों पर बाग़ी उईगरों को बिठाकर कोई जोखिम नहीं लेना चाहता। इसीलिए हान लोगों को नौकरियों में ऊंचे पदों पर बैठाया जा रहा है।


उइगर दरअसल अल्पसंख्यक तुर्क जातीय समूह हैं जो सभ्यता के विकास के बाद मध्य-पूर्व एशिया से आकर पूर्वी तुर्की में बस गया। आज भी ये लोग सांस्कृतिक रूप से मध्य-पूर्व एशिया से जुड़े हैं। इस्लाम के वहां पहुंचने पर ये लोग इस्लाम के अनुयायी बन गए। मध्य एशिया के इस ऐतिहासिक इलाक़े को कभी पूर्वी तुर्किस्तान कहा जाता था, जिसमें ऐतिहासिक तारिम द्रोणी और उइग़ुर लोगों की पारंपरिक मातृभूमि सम्मिलित हैं। इसका मध्य एशिया के उज़बेकिस्तान, किर्गिज़स्तान और काज़ाख़िस्तान जैसे तुर्क देशों से गहरा धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक संबंध रहा। उइगर आधिकारिक तौर पर मान्यता प्राप्त चीन के 55 जातीय अल्पसंख्यकों में से एक माना जाता है। पिछले साल अगस्त में संयुक्त राष्ट्र की एक कमेटी को बताया गया था कि शिंजियांग में क़रीब दस लाख मुसलमान हिरासत में रखे गए हैं। हालांकि चीन सरकार ने पहले इन ख़बरों का खंडन किया था, लेकिन इस दौरान शिंजियांग में लोगों पर निगरानी के कई सबूत सामने आए थे। तब पिछले साल चीनी प्रशासन ने माना कि तुर्कभाषी व्यावसायिक शिक्षा केंद्र चला रहे हैं, जिसका मकसद है कि लोग चीनी कानूनों से वाकिफ होकर धार्मिक चरमपंथ का रास्ता त्याग दें।


वामपंथी चीनी सरकार के पक्षपाती रुख के चलते इस क्षेत्र में हान चीनियों और उइगरों के बीच अक्सर संघर्ष की ख़बरें आती हैं। हिंसा का सिलसिला 2008 से शुरू हुआ। इसके बाद से इस प्रांत में लगातार हिंसक झड़पें होती रही हैं। 2008 में शिंजियांग की राजधानी उरुमची में हिंसा में 200 लोग मारे गए जिनमें अधिकांश हान चीनी थे। अगले साल 2009 में उरुमची में दंगे हुए जिनमें 156 उइगुर मुस्लिम मारे गए। इस दंगे की तुर्की ने कड़ी निंदा करते हुए इसे ‘बड़ा नरसंहार’ कहा था। 2012 में छह लोगों को हाटन से उरुमची जा रहे विमान को हाइजैक करने की कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हुए। चीन ने इसमें उइगर मुसलमानों का हाथ बताया था। 2013 में प्रदर्शन कर रहे उइगरों पर पुलिस ने फायरिंग कर दी, जिसमें 27 प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई थी। अधिकृत चीनी मीडिया ने तब कहा था कि प्रदर्शनकारियों के पास घातक हथियार थे जिससे पुलिस को गोलियां चलानी पड़ीं। अक्टूबर 2016 में बीजिंग में एक कार बम धमाके में पांच लोग मारे गए जिसका आरोप उइगरों पर लगा। उइगरों पर हिंसा की घटनाएं अक्सर होती हैं, लेकिन ऐसी घटनाओं को चीनी सरकार दबा देती है। यहां मीडिया पर पाबंदी होने के कारण ख़बरें नहीं आ पाती हैं।


मिस्र में दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित सुन्नी मुस्लिम शैक्षिक संस्थान अल अजहर में इस्लामिक धर्मशास्त्र का अध्ययन कर रहे उइगर छात्र अब्दुल मलिक अब्दुल अजीज ने इसी साल अगस्त में आरोप लगाया था कि एक दिन अचानक मिस्र पुलिस ने उस बिना किसी वजह के गिरफ्तार कर लिया और उसकी आंख पर पट्टी बांध दी। जब पुलिस ने उसकी आंखों से पट्टी हटाई गई तो वह यह देखकर सकते में पड़ गया कि वह एक पुलिस स्टेशन में है और चीनी अधिकारी उससे पूछताछ कर रहे हैं। उसे दिनदहाड़े उसके दोस्तों के साथ उठाया गया और काहिरा के एक पुलिस स्टेशन में ले जाया गया जहां चीनी अधिकारियों ने उससे पूछा कि वह मिस्र में क्या कर रहा है। तीनों अधिकारियों ने उससे चीनी भाषा में बात की और उसे चीनी नाम से संबोधित किया ना कि उइगर नाम से। अब्दुल ने कहा कि चीन में उइगर मुसलमानों पर अत्याचारों की बात किसी से छिपी नहीं है और अब दूसरे देशों में रह रहे उइगरों पर नकेल कसा जा रहा है। दरअसल, पाकिस्तान की तरह मिस्र में भी चीन बड़े पैमाने पर निवेश कर रहा है, इसीलिए वहां भी उइगरों पर नकेल कसी जा रही है।

चीन का कहना है कि उसे उइगर अलगाववादी इस्लामी गुटों से ख़तरा है, क्योंकि कुछ उइगर लोगों ने इस्लामिक स्टेट समूह के साथ हथियार उठा लिए हैं। चीन इसके लिए उइगर संगठन 'ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट' को दोषी मानता है। उसके अनुसार विदशों में बैठे उइगर नेता शिंजियांग में हिंसा करवाते हैं। चीन ने सीधे तौर पर हिंसा के लिए वरिष्ठ उइगर नेता इलहम टोहती और डोल्कन ईसा को जिम्मेदार ठहराया है। ईसा चीन की 'मोस्ट वांटेड' की सूची में है। इन मामलों को लेकर चीन में कई उइगर नेता जेल में हैं। उइगर समुदाय के अर्थशास्त्री इलिहम टोहती 2014 से चीन में जेल में बंद हैं। वहीं, उइगर संगठन चीन के आरोपों को गलत और मनगढ़ंत बताते हैं। उधर अमेरिका भी 'ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट' को उइगरों का अलगाववादी समूह मानता है, लेकिन वाशिंगटन का यह भी कहना है कि इस संगठन की आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देने की न तो क्षमता है और न ही हैसियत।


शनिवार, 21 सितंबर 2019

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव - भगवा गठबंधन के लिए इस बार वॉकओवर जैसी स्थिति


हरिगोविंद विश्वकर्मा
महाराष्ट्र में विधान सभा चुनाव की बहुप्रतीक्षित घोषणा निर्वाचन आयोग ने कर दी। राज्य में पहली बार चुनाव ऐसे माहौल में हो रहा है, जब विपक्ष एकदम बिखरा हुआ है। कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में हालांकि 125-125 सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला हो चुका है, लेकिन दोनों दलों के नेता इस तरह दूसरे दल में जा रहे हैं कि कांग्रेस और एनसीपी का नेतृत्व ख़ुद नहीं जानता कि कौन नेता कल पाला बदल लेगा। अब तक कांग्रेस और एनसीपी के 16 विधायक भारतीय जनता पार्टी या शिवसेना का दामन थाम चुके हैं।

विधानसभा में विपक्ष के नेता राधाकृष्ण विखे-पाटिल भाजपा में शामिल हुए। फड़णवीस ने उन्हें आवास मंत्री बना दिया। कई और बड़े नेता भाजपा में शामिल होने के लिए कतारबद्ध हैं। कतार लंबी होने के कारण इनमें से कई लोगों को शिवसेना में शामिल होने की सलाह दी जा रही है। एनसीपी मुंबई अध्यक्ष एवं पूर्व मंत्री सचिन अहिर और कांग्रेस के अब्दुल सत्तार शिवसेना का दामन थाम चुके हैं। दोनों भाजपा में शामिल होना चाहते थे। पूर्व उपमुख्यमंत्री अजित पवार के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले के बाद एफआईआर दर्ज होने से भी पार्टी बैकफुट पर है। शरद पवार ने हाल ही में पाकिस्तान की तारीफ करके एनसीपी कार्यकर्ताओं को भी असहज कर दिया है।

नरेंद्र मोदी के दौबारा प्रधानमंत्री बनने के बाद जिस तरह ट्रिपल तलाक का कानून पास किया गया और जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35 ए को हटाया गया और जम्मू-कश्मीर में कोई खून-खराबा नहीं हुआ उससे भाजपा के समर्थन में स्पष्ट जनादेश दिख रहा है। अनुच्छेद 370 ने आर्थिक मंदी, कंपनियों में छंटनी और बेरोजगारी जैसे बुनियादी मुद्दों को दबा दिया है। कांग्रेस ने अनुच्छेद 370 और 35ए को हटाए का विरोध करके अपने पांव पर कुल्हाड़ी दे मारी है। आम कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं को इस मुद्दे पर जनता का सामना करने में असुविधा हो रही है। अगर राज ठाकरे की बात करें तो इस बार विधान सभा चुनाव में उन्हें कोई भी सीरियसली नहीं ले रहा है।

भाजपा प्रचारकों को राज्य में भेजा जा रहा है ताकि अनुच्छेद 370 और 35 ए को हटाए का अधिकतम चुनावी लाभ लिया जा सके। इसी क्रम में सोमवार यानी 23 सितंबर को गोरेगांव के प्रदर्शनी मैदान पर गृहमंत्री अमित शाह की सभा हो रही है। राजनीति के जानकार साफ साफ कह रहे हैं कि इस चुनाव में सत्तारूढ़ गठबंधन को विपक्ष से इस बार वॉकओवर मिलता दिख रहा है। यह इस बिना पर कहा जा रहा है क्योंकि लोकसभा चुनाव में भाजपा शिवसेना गठबंधन को 230 विधान सभा सीटों पर बढ़त मिली थी।

हालांकि भारतीय जनता पार्टी और उसकी सहयोगी शिवसेना में सीट बंटवारे का पेंच अभी तक फंसा हुआ है। परंतु दोनों दलों का शीर्ष नेतृत्व कह रहा है कि सीट को लेकर समझौता हो जाएगा और भगवा गठबंधन के दोनों दल एक साथ चुनाव लड़ेंगे। समझा जा रहा है कि भारतीय जनता पार्टी इस बार कमांडिंग पोज़िशन में है। लिहाज़ा, शिवसेना लोकसभा चुनाव की तरह बारगेनिंग करने की स्थिति में नहीं है। रोचक बात यह है कि भाजपा के अंदर एक तबका ऐसा भी है, जो चाहता है भाजपा अकेले चुनाव लड़े, लेकिन भाजपा अकेले चुनाव नहीं लड़ेगी।

पिछली बार चुनाव में सीट बंटवारे को लेकर गंभीर मतभेद के चलते गठबंधन नहीं हो सका था और दोनों दल अकेले चुनाव मैदान में उतरे थे। भाजपा 122 सीट जीतने में कामयाब रही, जबकि शिवसेना केवल 63 सीट ही जीत सकी थी। अब तीन दूसरे दलों के विधायक शिवसेना में आ चुके हैं। इस तरह इस पार्टी के पास 66 विधायक हैं। जबकि भाजपा शिवसेना के बहुत आगे है, 13 विधायक भाजपा में आ गए हैं। मौजूदा परिस्थितियों में अगर सूत्रों की मानें तो भाजपा शिवसेना को अधिकतम 110 सीटें ही दे सकती है। हालांकि शिवसेना आधे-आधे की बात कर रही हैं, जबकि उसके नेता 115 सीट तक मान सकते हैं।

केंद्रीय नेतृत्व ने बहुत पहले देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में चुनाव लड़ने का मन बना लिया था। राज्य की छह दशक की राजनीति में पहली बार मुख्यमंत्री का चेहरा सामने रखकर चुनाव लड़ा जा रहा है। भाजपा के अंदर मुख्यमंत्री पद को लेकर कोई कन्फ्यूजन न रहे इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह पब्लिक मंच से औपचारिक घोषणा कर चुके हैं कि राज्य का चुनाव फडणवीस के नेतृत्व में लड़ा जाएगा। देवेंद्र फड़णवीस के रूप में महाराष्ट्र को 1975 के बाद अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा करने वाला पहला मुख्यमंत्री मिला। इससे पहले लोग दो या तीन साल के लिए ही मुख्यमंत्री बन पाते थे।

देवेंद्र फड़णवीस अपनी दूसरी पारी के लिए कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे हैं। तीन चरण वाली उनकी ‘महाजनादेश यात्रा’ उम्मीद से अधिक सफल रही। महाजनादेश यात्रा के दौरान हर जगह फड़णवीस को देखने सुनने बड़ी संख्या में लोग जुटे। फड़वणीस की यात्रा के समांतर युवा शिवसेना नेता आदित्य ठाकरे विजय संकल्प मेलावा पर निकले थे। वह ‘नया महाराष्ट्र’ बनाने का आह्वान कर रहे थे। यात्रा के मामले में विपक्ष भी पीछे नहीं था। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी खान देश और पश्चिम महाराष्ट्र में शिव स्वराज्य यात्रा निकाल चुकी है। कांग्रेस इस मामले में पिछड़ गई।

पहले कहा जा रहा था कि भगवा गठबंधन में मुख्यमंत्री पद को लेकर खींचतान चल रही है और शिवसेना आदित्य ठाकरे का नाम आगे कर रही है, लेकिन यह मात्र अटकल साबित हुई, शिवसेना जानती है कि भाजपा के साथ रहना उसके लिए फायदेमंद है। अगर भगवा गठबंधन सत्ता में वापस लौटता है तो आदित्य नई सरकार में उपमुख्यमंत्री बनाए जा सकते हैं। वैसे मुख्यमंत्री जनादेश यात्रा में ही कह चुके हैं कि आदित्य ठाकरे अगर चाहेंगे तो उनको उपमुख्यमंत्री पद दिया जा सकता है। फडणवीस ने यह भी कहा था कि भाजपा कार्यकर्ता चाहते हैं कि भाजपा अकेले चुनाव लड़े और पार्टी उस स्थिति में है भी, लेकिन भाजपा गठबंधन का धर्म निभाएगी और लोकसभा चुनाव से पहले हुआ गठबंधन जारी रहेगा। कुल मिलाकर राज्य में कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन इतना कमज़ोर हो चुका है कि भाजपा और शिवसेना के लोग कह रहे हैं, "अच्छे दिन आने वाले हैं।"


अब स्वामी चिन्मयानंद के आश्रमों की गहन जांच की ज़रूरत


हरिगोविंद विश्वकर्मा
“मैं अपने किए पर बहुत ही शर्मिंदा हूं। मुझसे इससे आगे और कुछ मत पूछिए प्लीज़!” सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर बनाई गई एसआईटी के सामने पूछताछ के दौरान ज्ञानवान-प्रज्ञावान और वैदिक धर्म के प्रकांड पंडित भगवाधारी महापुरुष स्वामी चिन्मयानंद ने यही कहा था। स्वामी के इस भावुक स्वीकारोक्ति के बाद एसआईटी ने उनसे कुछ और पूछना उचित नहीं समझा। एसआईटी का यह क़दम समझ से परे है। वस्तुतः एसआईटी का कहना है कि इस मामले में उपलब्ध सबूत ख़ुद कहते हैं कि प्राइमा फेसाई स्वामी दोषी हैं। पीड़ित छात्रा ने जो भी आरोप लगाए हैं, वे सब सही हैं। इसके बाद तथाकथित संत चिन्मयानंद को गिरफ़्तार कर लिया गया। इस तरह आसाराम बापू और गुरमीत सिंह राम-रहीम के बाद स्वामी चिन्मयानंद तीसरे साधु हैं, जो आश्रम में रहकर अपनी ऐय्याशी कर रहे थे और धर्म के पवित्र चादर को चर्र-चर्र फाड़ रहे थे।

बहरहाल, 20 सितंबर, 2019 को चिन्मयानंद गिरफ़्तार कर लिए गए। उनके ख़िलाफ़ भारतीय दंड संहिता की धारा 376 सी, 354 डी, 342, और 506 के तहत केस दर्ज़ किया गया है। यानी जांच एजेंसी ने उन पर सीधे रेप का केस दर्ज़ नहीं किया है। कई लोग जांच एजेंसी के फ़ैसले को चिन्मयानंद को दी गई रियायत के रूप में देख रहे हैं। जो भी हो, शाहजहांपुर की स्थानीय अदालत ने स्वामी को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। वैसे स्वामी को बचाने की हर संभव कोशिश की गई। पीड़िता का धारा 164 के तहत बयान दर्ज़ होने के बाद, उसी दिन देर शाम स्वामी के बीमार होने की बात फैलाई गई। अगले दिन उन्हें बरेली मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भर्ती कराया गया। बाद में किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी लखनऊ रेफ़र कर दिया गया। लखनऊ में इलाज के दौरान पोलपट्टी खुल जाने के डर से उन्होंने वहां जाना रद कर दिया और कहा कि वह आयुर्वेदिक इलाज करवाना चाहते हैं। उन्हें मुमुक्षु आश्रम वापस ले जाया गया। वही से उनकी गिरफ्तारी हुई। इस तरह एक और साधु जेल चला गया।

चिन्मयानंद पर पहली बार बलात्कार का आरोप नही लगा है। आठ साल में यह दूसरा मौका है, जब उन पर बलात्कार का बेहद गंभीर आरोप लगा। 2001 में चिन्मयानंद जौनपुर के सांसद थे। एक दिन दक्षिणी दिल्ली की एक युवती अपने माता-पिता के साथ उनसे मिलने आई। कहते हैं, चिन्मयानंद उसी समय उस पर लट्टू हो गए और उन्होंने युवती को आधात्यामिक ज्ञान लेने की सलाह दी। उसके माता-पिता को भी बताया कि आध्यातमिक ज्ञान लेने के बाद यह लड़की दुनिया में नाम रौशन करेगी।  वह युवती स्वामी से बहुत इंप्रेस्ड हुई और दीक्षा लेना स्वीकार कर लिया। अगले साल 2002 में वह दीक्षा लेने वाली थी लेकिन मामला अटक गया। 2010 में दोबारा वह साध्वी नहीं बन सकी। बहरहाल, उसे साध्वी कहा जाने लगा। उस युवती ने नवंबर 2011 को चिन्मयानंद के ख़िलाफ़ शहर कोतवाली में बलात्कार का मामला दर्ज़ कराया।

साध्वी पीड़िता को एक विद्यालय में प्राचार्य की नौकरी मिल गई है। कुछ समय पहले उसने इंटरव्‍यू में अपनी दास्तां बताते हुए साध्वी ने कहा, “मैं स्वामी चिन्मयानंद के पास संन्यास ग्रहण करने गई थी। लेकिन मुझे साध्वी नहीं बनाया। तो मैं वापस आ गई, लेकिन 2004 में स्वामी के गुंडों ने बंदूक के बल पर मुझे किडनैप कर लिया। दिल्ली से मुझे शाहजहांपुर ले जाया गया। वहां एक दिन स्वामी ने नशे में धुत होकर स्वामी के मेरे साथ रेप किया। रेप का वीडियो भी बनाया गया था। उसने ज़ुबान बंद रखने को कहा। मैं चुप हो गई और आश्रम में रहने लगी। वह सात साल तक मेरा यौन-शोषण करता रहा। इस दौरान मैं कई बार गर्भवती हुई। दो बार तो मेरा गर्भपात करवाया गया। उसके गुंडे हमेशा मेरे पीछे लगे रहते थे। इस तथाकथित भगवाधारी ने मेरे साथ-साथ दर्ज़नों दूसरी लड़कियों का जीवन बर्बाद कर दिया। बूढ़ा होने के बावजूद लड़कियों के बिना यह नहीं रह सकता। बहुत बड़ा मक्कार और जालिम है।”

पीड़ित साध्वी ने बताया था, “2010 में हरिद्वार आश्रम में रुद्र यज्ञ हो रहा था। स्वामी ने दिखावे के लिए स्वामी ने मुझे रुद्र यज्ञ में बैठने के लिए कहा, जबकि दूसरे आचार्य ने हमें वहां बैठने नहीं दिया। उसने कारण यह बताई कि सरस्वती परंपरा में महिलाएं संन्यास नहीं ले सकतीं। वहां मौजूद स्वामी चिन्मयानंद मंद-मंद मुस्करा रहे थे। मै समझ गई कि सारा खेल उसी का रचा हुआ है। जब मालूम हो गया कि संन्यास नहीं मिलने वाला, तो इस तरह का जीवन जीने का कौई अर्थ नहीं था। लिहाज़ा, मैंने वैदिक रीति से विवाह किया।”

साध्वी ने यह भी दावा किया कि चिन्मयानंद ने तरुणाई में अपने गांव से संन्यास लेने के लिए नहीं, बल्कि गांव की ही एक लड़की से रेप करके भागा था। हैरान करने वाली बात है कि वह लड़की स्वामी की चचेरी बहन लगती थी। स्‍वामी ने आज तक किसी को साध्वी नहीं बनाया। वह केवल इस्तेमाल करता है। उसके सभी आश्रमों में ढेर सारी लड़कियां हैं। लड़कियों को गर्भवती करके उनकी शादी किसी ग़रीब ब्राह्मण या किसी नौकर से करवा देता है। स्‍वामी का आश्रम देश का पहला संस्‍थान है, जहां महिलाएं रहती हैं, लेकिन महिला वार्डेन नहीं रखी जाती। जब वह मेरे प्रमाणपत्रों को जला रहा था, तो मैंने उसके पैर पकड़े थे, लेकिन उस राक्षस ने नहीं माना और मेरे सारे प्रमाणपत्र जला दिए।”

य़ह संयोग है कि चिन्मयानंद के लॉ कॉलेज की छात्रा ने आरोप लगाया है कि यह दुराचारी ढेर सारी लड़कियों की ज़िंदगी ख़राब कर चुका है। शिष्या के दुष्कर्म का आरोप लगाने के बावजूद चिन्मयानंद का बाल बांका नहीं हुआ। योगी सरकार ने मार्च 2018 में सीआरपीसी की धारा 321 के तहत शाहजहांपुर की अदालत से मुकदमा वापस लेने का फैसला किया। इसका पीड़ित साध्वी ने विरोध किया। एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में उसने कहा “बेटियों के सम्मान में, भाजपा मैदान में नारा देने वाली भाजपा अब मेरा मुक़दमा ख़त्म कर रही है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है। मैं भी किसी बेटी हूं, मुझे भी इंसाफ चाहिए। केस वापस लेना लोकतंत्र की हत्या करने जैसा है। किसी अपराधी का इस हद तक पक्ष लिया जा रहा है कि सरकार उसे ट्रायल तक फेस नहीं करने देना चाहती। सरकार को न्यायालय के फ़ैसले की प्रतीक्षा करनी चाहिए थी। मैंने अदालत में इस आशय का प्रार्थनापत्र दिया है कि आरोपी के ख़िलाफ़ वारंट जारी करके उसे जल्द से जल्द जेल भेजा जाए।”


चिन्मयानंद शाहजहांपुर के मूल निवासी नहीं बल्कि वह गोंडा जिले के गोगिया पचदेवरा गांव के निवासी हैं। उनके बचपन का नाम कृष्णपाल सिंह है। उनका परिवार काग्रेस विचारधारा का था। उनके चचेरे भाई उमेश्वर प्रताप सिंह कांग्रेस से विधायक भी रहे। तीन मार्च 1947 को पैदा हुए कृष्णपाल के घर का माहौल धार्मिक था। साधु-संतों का आना-जाना रहता था। लिहाज़ा, उनकी भी प्रवृत्ति धार्मिक हो गई। इंटर करने के बाद उन्होंने घर का त्याग कर दिया और पंजाब चला गया। कुछ समय तक वहां रहने के बाद बृंदावन पहुंच गए। इस दौरान उन्होंने इंस्टीट्यूट ऑफ ओरिजनल फिलास्फी से ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल कर ली। उन्होंने लखनऊ से भी पढ़ाई की। 1882 में बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से दर्शनशास्त्र में पीएचडी किया।

बृंदावन  से चिन्मयानंद 1971 में परमार्थ आश्रम ऋषिकेश पहुंचा और साधु-संतों के बीच रहने लगे। उनकी वैराग्य प्रवृत्ति को देकर उन्हें दीक्षा दी गई और उनका नाम चिन्मयानंद रखा गया। इस तरह कृष्णपाल से स्वामी चिन्मयानंद बन गए। स्वामी बनने के बाद वह परिवार की विचारधार के विपरीत जाकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ गए। हालांकि संघ के लोग चिन्मयानंद की संदिग्ध गतिविधियों से देखकर सतर्क हो गए और संघ में उसे कोई ज़िम्मेदारी नहीं दी गई। अपनी तरफ़ से चिन्मयानंद संघ की विचारधारा के समर्थक बन गए। उनहोंने संघ की एकात्मता यात्रा में भागीदारी की। वह जयप्रकाश नारायण के आदोलन से जुड़े रहे। फिर रामजन्मभूमि आदोलन से जुड़ गए। 1984 में सरयू तट पर राम जन्मभूमि का संकल्प लिया और दो साल बाद उसे रामजन्मभूमि आदोलन संघर्ष समिति का राष्ट्रीय संयोजक बना दिया गया। 1989 में स्वामी निश्चलानंद के अधिष्ठाता पद छोड़ने के बाद चिन्मयानंद अधिष्ठाता बनकर शाहजहां के मुमुक्षु आश्रम आ गया।

चिन्मयानंद इस दौरान अपना राजनीतिक क़द बढ़ाता रहा। वह तीन बार सांसद बनने में भी सफल रहा। 1991 में भाजपा के टिकट पर वह बदायूं से चुनाव मैदान में उतरा और जात गया। 1996 में शाहजहापुर भाजपा का टिकट लिया और हार गया। 1998 में मछलीशहर से जीत कर लोकसभा पहुंचा। मछलीशहर में उसने कोई काम नहीं किया, लिहाज़ा, 1999 में मछलीशहर की बजाय जौनपुर से चुनाव लड़ा और लोकसभा में पहुंचा। वर्ष 2003 में उसे अटलबिहारी वाजपेयी सरकार में गृह राज्यमंत्री बनाया गया।

स्वामी के करीबी कहते है कि संन्यासी ने उपनिषद सार, गीता बोध, भक्ति वैभव समेत करीब आठ धार्मिक किताबें लिखी हैं। स्वामी चिन्मयानंद पत्रकार भी हैं। वह दो धार्मिक पत्रिकाओं ‘धर्मार्थ' और ‘विवेक रश्मी' का संपादन करते हैं। संत के रूप में शाहजहांपुर और हरिद्वार में आश्रम भी चलाते हैं। ऋषिकेश के परमार्थ निकेतन से जुड़े हैं। वह मुमुक्षु आश्रम के अधिष्ठाता हैं और राम मंदिर आंदोलन से भी सक्रिय हैं। स्वामी चिन्मयानंद शाहजहांपुर में स्वामी शुकदेवानंद लॉ कॉलेज भी चलाते हैं। कॉलेज के लोग दबी ज़ुबान कहते हैं कि चिन्मयानंद ऐय्याशी करते हैं। यह बहुत गंभीर बात है। सरकार को चिन्मयानंद के सभी आश्रमों की गहन और बिना किसी पक्षपात के तह़क़ीक़ात करनी चाहिए और यह पता करना चाहिए कि आरोप लगाने वाली दोनों महिलाओं के आरोप में कितनी सचाई है। इंसाफ़ होना ही नहीं चाहिए, बल्कि जनता तक यह संदेश भी जाना चाहिए कि इंसाफ़ हो रहा है।