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बुधवार, 20 जुलाई 2016

क्यों अमेरिकी युवाओं को पसंद आ रहे हैं डोनाल्‍ड ट्रंप? क्या अमेरिकी जनता भारत की तरह सोचने लगी ?

हरिगोविंद विश्वकर्मा
दुनिया भर के मुसलमानों और दूसरे समुदाय के लोगों के ख़िलाफ़ खुलेआम ज़हर उगलने और अमेरिका में उन्हें अस्थाई रूप से न घुसने देने का आह्वान करने वाले अमेरिका के खरबपति उद्योपति डोनाल्ड जॉन ट्रंप जब से रिपब्लिकन पार्टी की ओर से देश के 45वें राष्ट्रपति के लिए उम्मीदवार बनाए गए हैं, हर जगह एक ही चर्चा है, क्या वाक़ई ट्रंप की तरह कथिततौर पर ख़तरनाक सोच वाला व्यक्ति दुनिया का सबसे ताकतवर आदमी बनकर ह्वाइट हाऊस पर क़ाबिज़ हो जाएगा?

कई लोग तो डोनाल्ड ट्रंप को उम्मीदवार बनाए जाने से ही हैरान हैं। ऐसे लोग ट्रंप को जिद्दी, सिरफिरा और अनाप-शनाप बोलनेवाला करार देते हुए कहते हैं कि पैसे का भरपूर उपयोग करके ट्रंप ने अमेरिका की जनता को पूरी तरह भ्रमित कर दिया। इतना ही नहीं, ट्रंप का विरोध करने वाले यह भी मानते हैं कि अमेरिकियों ने इस बार कथिततौर पर एक अलोकतांत्रिक और असभ्य से व्यक्ति को राष्ट्रपति पद के लायक मान लिया है। बहरहाल, ट्रंप का मुक़ाबला डैमोक्रेटिक पार्टी की तरफ से राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार और पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की पत्नी हिलेरी क्लिंटन से हो रहा।

धरती के सबसे शक्तिशाली पद के लिए हो रहे चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप को जिस तरह से अमेरिकी जनता, ख़ासकर युवाओं का समर्थन मिल रहा है, वह 2014 में नरेंद्र मोदी के चुनाव प्रचार की याद दिला रहा है, जब दो ढाई साल पहले सेक्यूलर पॉलिटिक्स करने वाली ताकतों की हर संभव कोशिश के बावजूद गठबंधन के दौर में भारत के मतदाताओं ने भारतीय जनता पार्टी को 282 सीटों का स्पष्ट बहुमत का तोहफा दे दिया था, जिसके बाद कथिततौर पर सांप्रदायिक, तानाशह और मौत के सौदागर नरेंद्र मोदी देख के प्रधानमंत्री बने थे।

दरअसल, किसी भी विचारधारा को आम लोगों पर जब कुछ ज़्यादा ही थोपा जाने लगता है, तब एक समय के बाद लोगों को संदेह होने लगता है और उन्हें लगने लगता है, यह तो कुछ ज़्यादा ही हो रहा है। यही 2002 के बाद तीन बार विधानसभा चुनाव में गुजरात में हुआ। जब सेक्यूलर पॉलिटिक्स करने वाले
नरेंद्र मोदी को तानाशाह, हत्यारा, मौत का सौदागर वगैरह कहने लगे थे। सबसे बड़ी बात पहले तो जनता को लगा कि मोदी ने ज़रूर ग़लत किया, लेकिन यह जुमला इतना ज़्यादा उछाला गया कि लोगों को लगा कि इसमें वेस्टेड इंटरेस्ट है। बस क्या था मोदी का विरोध करने वाले ही हाशिए पर चले गए। मज़ेदार बात यह रही कि जब मोदी का विरोध कम होने की बजाय राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ने लगा, तब देश की जनता ने मोदी को प्रधानमंत्री बना दिया।

कहना न होगा, अब भारत के हालात अमेरिका में दोहराए जा रहे हैं। सेक्यूलर जमात के लोग आतंकवाद का उस स्तर पर विरोध नहीं करते और झट से कह देते हैं कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। लेकिन सारे आतंकवादी एक ही धर्म के प्रॉडक्ट क्यों हैं, इस सवाल पर चुप्पी साध जाते हैं। चूंकि आतंकवाद भले अमेरिका ने पैदा किया हो, लेकिन हाल के सालों में अमेरिकी जनता आतंकवाद की बड़ी विक्टिम रही है। इसीलिए उसे ट्रंप का मुस्लिम विरोध अच्छा लग रहा है। इसीलिए अमेरिकी जनता भी आजकल वैसा ही सोच रही है, जैसा पिछले आम चुनाव में भारत की जनता सोच रही थी।

गौर करने वाली बात है कि डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन कुछ दिन पहले तक अपनी जीत के प्रति पूरी तरह आश्वस्त थीं। लेकिन अब वह बिलकुल नहीं हैं। यानी इस डेमोक्रेट प्रत्याशी को अब पक्के तौर पर नहीं लग रहा है कि वह ट्रंप को हरा पाएंगी। दरअसल, हिलेरी को लगता है कि वह नहीं जीतेंगी क्योंकि ट्रंप कथित तौर पर अपने सिरफिरेपन के कारण अमेरिकियों पर छा गए हैं। हिलेरी की चिंता के पीछे उनके देश का मौजूदा रवैया एक वजह है। चुनाव में ट्रंप अपने बड़बोलेपन के कारण आम अमेरिकियों पर छा से गए हैं। अमेरिका में मुस्लिमों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने, देश में सतर्कता बढ़ाए जाने एवं ‘कट्टरपंथ इस्लामी आतंकवादी’ को कुचलने का ट्रंप की जुमला आम अमेरिकियों को ज़्यादा बेहतर लग रहा है।

अगर ट्रंप को मिल रहे समर्थन की बात करें तो अमेरिका को चीन से भी बड़ी चिंता है। इसके अलावा यूरोप में शरणार्थियों का बोझ कब अमेरिकियों के सिर पर न आ जाए, यह डर भी है। ऐसे में अमेरिकी जनता ऐसा नेता खोज रही थी जो कूटनीति में नहीं, धमकियों से बात करे। जो हर बात पर ‘सिर फोड़ देंगे’, ‘धक्के देकर बाहर निकाल देंगे’, ‘उठाकर पटक देंगे’, ‘मारकर भगा देंगे’ वाली भाषा बोले जो बहुतों को अच्छी भी लगती है। ट्रंप इस सांचे में एकदम फिट बैठ रहे हैं। कई लोगों को लगता है कि अगर ट्रंप राष्ट्रपति बन गए तो अमेरिका शांति का दूत नहीं, धौंस देने वाल देश बन जाएगा।

दरअसल, अमेरिका के ओरलैंडो में आतंकी वारदात के बाद ट्रंप ज़्यादा मुखर हो गए हैं। ओरलैंडो शूटआउट पर उन्होंने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। ट्रंप ने साफ़-साफ कहा था, ‘‘ओरलैंडो के गे क्लब पर फायरिंग करने वाले अफगान मूल के बंदूकधारी उमर मतीन ने हत्याओं को अंजाम देते समय ‘अल्ला हो अकबर’ कहा था। इसमें 50 से अधिक लोगों की मौत हो गई। ट्रंप ने एक चुनावी रैली में कहा, “इन हत्यारों को यहां अमेरिका में नहीं होना चाहिए। हमारे समक्ष कट्टरपंथी इस्लामी आतंकवाद की समस्या है।“

वैसे पिछले दौ दशक से दुनिया भर में हो रही आतंकवादी वारदात से अमेरिकी जनता भी तंग आ चुकी है। 2001 में दुनिया से सबसे क्रूरतम आतंकी हमले की गवाह रही अमेरिकी जनता आतंकवाद ख़ासकर इस्लामिक स्टेट ऑफ़ इराक ऐंड सीरिया (आईएसआईएस) से सुरक्षा को लेकर बहुत आश्वस्त नहीं है। इस आतंकी संगठन में जिस तरह एजुकेटेड मुस्लिम यूथ शामिल हो रहे हैं, इससे अमेरिकी जनता को लगता है कि ख़तरा सिर पर सवार है। अमेरिका के लोग आशंकित रहते हैं कि न जाने कहां और कब आईएस का हमला हो जाए। इसीलिए अमेरिकी मतदाताओं की पसंद नरम हिलेरी की बजाय गरम ट्रंप हैं।

अमेरिका को सबसे गहरी चोट देने वाले आतंकवादी ओसामा बिन लादेन को मार गिराने वाले राष्ट्रपति बराक ओबामा ने हालांकि अपने कार्यकाल में अच्छी नीतियां बनाईं पर इतनी अच्छी नहीं कि अमेरिका पुरानी ऊंचाइयों को छू सके। अमेरिकी जनता अपने वर्तमान और भविष्य को लेकर चिंता में डूबी है। ट्रंप चुनावी रैलियों में कह रहे हैं कि वह अमेरिका की खोई चमक फिर से लौटाएंगे। दो टूक शब्दों में कहते है, ‘‘हम सीरिया से लोगों को आने नहीं दे सकते और इसे तत्काल रोका जाएगा। हमारे देश में हज़ारों लोग आ रहे हैं। हमें नहीं मालूम कि कौन हैं। कोई कागजात नहीं हैं।"

अमेरिका में गैरक़ानूनी रूप से रहने वालों के लिए भी डोनाल्ड ट्रंप की सीधी योजना है - निर्वासन। वह कहते हैं, दो साल में यह काम पूरा हो जाएगा। बहरहाल, सीमा मामलों के अधिकारी कहते हैं- कुछ समय पहले ही साल भर में क़रीब चार लाख लोगों को निर्वासित किया गया था। बहरहाल, ट्रंप की नीति पर बहस शुरू हो गई है कि अमेरिका में अवैध रूप से रह रहे 1.1 करोड़ लोगों को वह कैसे निकालेंगे और मैक्सिको की 1609 किलोमीटर लंबी सीमा पर दीवार कैसे बनाएंगे? डोनाल्ड ट्रंप को लोगों का और पार्टी के उन मतदाताओं का अच्छा समर्थन मिल रहा है।

डोनाल्ड ट्रंप मुस्लिमों का अमेरिका में प्रवेश प्रतिबंधित करने और अवैध प्रवासियों को देश से बाहर निकालने का अपने रूख को बार बार दोहरा रहे हैं।  रिपब्लिकन पार्टी की ओर से उम्मीदवार बनने के बाद ट्रंप ने एक रैली में अपने विवादास्पद भाषण को वापस लेने से इंकार कर दिया। सीएनएन के साथ साक्षात्कार में, ट्रंप ने इतना ज़रूर कहा, “मुस्लिमों का अमेरिका में प्रवेश अस्थायी तौर पर रोकने वाले बयान वापस नहीं लिया। दृढ़ रूख अख्तियार करते हुए ट्रंप ने कहा कि वह इससे उन्हें खुदको नुकसान भी पहुंचे, तो भी वह इसकी परवाह नहीं करते। इसी के साथ, उन्होंने कहा कि वह आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ने में मुस्लिम देशों के साथ मिलकर काम करेंगे। ट्रंप ने यह तर्क भी दिया कि इसकी जिम्मेदारी पहले उन देशों पर है।

न्यूयॉर्क टाइम्स और सीबीएस न्यूज के पोल बताते हैं कि ट्रंप को मतदाता पसंद कर रहे हैं और उन्हें राष्ट्रपति के तौर पर उन्हें ही देखना चाहते हैं। 76 वर्षीय रिटायर टीचर डेलोर्स स्टॉकेट कहते हैं, मैं ट्रंप का सहयोग करूंगा, क्योंकि अगर आप विकल्प के तौर पर बाहरी व्यक्ति को लाते हैं, तो वह कम अनुकूल रहेगा। वैकल्पिक व्यक्ति में यह जरूरी नहीं कि उसके विचार भी हमारी तरह हों या फिर वह हमारी बातों से सहमत हो। डोनाल्ड ट्रंप के बारे में सीएनएन ने कुछ दिन पूर्व विश्व के विभिन्न देशों के कई लोगों से बात की, जिसमें जहां मुस्लिम दशों के लोग चाहते हैं कि ट्रंप राष्ट्रपति न बने जबकि इस्लामिक आतंकवाद से पीड़ित लोगों ने एक स्वर से ट्रंप को हिलेरी क्लिंटन से बेहतर उम्मीदवार करार दिया है। लोग मान रहे हैं कि ट्रंप आतंकवाद के मुकाबले ताकतवर साबित होंगे। हालांकि लंदन की फैशन की दुनिया में जुड़े सीमन मार्टिन कहते हैं कि यदि ट्रंप राष्ट्रपति चुने गए तो उनका मानवजाति से विश्वास समाप्त हो जाएगा।


अलविदा ड्रिबलिंग के बादशाह मोहम्मद शाहिद...

अलविदा ड्रिबलिंग के बादशाह मोहम्मद शाहिद...

हरिगोविंद विश्वकर्मा
दुनिया भर में अपनी ‘ड्रिबलिंग’ का लोहा मनवाने वाले दिग्गज खिलाड़ी मोहम्मद शाहिद जैसा खिलाड़ी भारतीय हॉकी में शायद ही देखने को मिले। शाहिद को लेफ़्ट इन पोजिशन पर खेलने वाला भारत का सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी माना जाता है। हॉकी की दुनिया में उन्हें ड्रिब्लिंग का बादशाह भी कहा जाता था। ज़फर इक़बाल के साथ भारत की अग्रिम पंक्ति में उनकी जोड़ी से हर प्रतिद्वंद्वी टीम थर्राती थी। हॉकी में उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें 1981 में पद्मश्री से सम्मानित किया था। उसी साल उन्हें अर्जुन पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था।

इस पूर्व भारतीय हॉकी कप्तान का लंबी बीमारी के बाद आज (20 जुलाई 2016) गुड़गांव के मेदांता अस्पताल में निधन हो गया। मैं जब बनारस में यूएनआई का ब्यूरो चीफ़ था तब मेरे सहकर्मी फोटोग्राफर विजय यादव मुझे शाहिद से मिलवाने उनके घर ले गए थे। इसके बाद शाहिद अकसर दशाश्वमेध घाट पर आते और मेरी उनसे मुलाक़ात होती थी।

वाराणसी में 14 अप्रैल 1960 को जन्मे शाहिद किशोरावस्था से ज़बरदस्त क्रिकेट खेलते थे। इसीलिए उन्हें 1979 में फ्रांस में महज़ 19 साल की उम्र में जूनियर हॉकी विश्वकप में बतौर फॉरवर्ड खिलाड़ी देश का प्रतिनिधित्व करने का मौक़ा मिला। उनकी प्रतिभा को देखकर फौरन उन्हें सीनियर टीम में ले लिया गया और भास्करन के नेतृत्व में उन्हों मास्को ओलिंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया। उस बार भारत आख़िरी बार ओलंपिक खेल में गोल्ड मेडल जीता था। भारत ने मॉस्को ओलंपिक के बाद ओलंपिक में पदक नहीं जीता। 1982 और 1986 एशियाड खेलों में सिल्वर और ब्रॉन्ज मेडल दिलाने में इस खिलाड़ी की अहम भूमिका रही थी।

शाहिद ने अपने 11 साल के इंटरनेशनल हॉकी करियर के दौरान कुल 167 मैच खेले और 66 गोल किये। उनका करियर वर्ष 1980 से लेकर 1990 तक चला। अपने जादुई खेल से विपक्षी रक्षापंक्ति को परेशान करने वाले बनारस के इस खिलाड़ी ने चैंपियंस ट्राफी में पाकिस्‍तान के खिलाफ वर्ष 1980 में करियर का आगाज किया और आखिरी मैच 1990 के बीजिंग एशियाड में प्रबल प्रतिद्वंद्वी पाकिस्‍तान के खिलाफ ही खेला।

हालांकि 1980 के बाद 1984 के लॉस एंजेलिस और 1988 के सियोल ओलंपिक में भी मोहम्मद शाहिद ने भारत का प्रतिनिधित्व किया। शाहिद अपनी कप्‍तानी में टीम को प्रतिष्ठित अजलान शाह कप में भी स्‍वर्ण पदक दिला चुके हैं। 1985 में मलेशिया के इपोह शहर में अजलान शाह कप में शाहिद टीम के कप्‍तान थे और भारत ने इसमें गोल्‍ड जीता था। वर्ष 1986 में भारत-पाकिस्तान की टेस्‍ट सीरीज में भी भारत ने जीत हासिल की और शाहिद इस दौरान भारतीय टीम के कप्‍तान थे।


पेट में दर्द की शिकायत पर उन्हें 29 जून को वाराणसी के सर सुंदरलाल अस्पताल में दाखिल कराया गया था। वहां हालत न सुधरने पर उन्हें एयरलिफ्ट करके गुड़गांव के मेदांता मेडिसिटी अस्पताल में दाखिल कराया गया। उनका लीवर ट्रांसप्लांट किया जाना था लेकिन किडनी के काम न करने के कारण ट्रांसप्लांट भी संभव नहीं हो पा रहा था। पिछले कुछ दिनों से उनके डायलिसिस की प्रक्रिया चल रही थी। आईसीयू में भर्ती शाहिद ने बुधवार को आखिरी सांस ली। अस्पताल में उनके साथ उनकी पत्नी परवीन शाहिद, बेटी हिना, बेटा मोहम्मद सैफ और परिवार के अन्य लोग उपस्थित रहे।


मास्को ओलंपिक में उनके साथ खेल चुके एमके कौशिक ने कहा कि अंतिम समय तक उन्होंने जिंदादिली नहीं छोड़ी। कौशिक ने मास्को ओलंपिक की यादों को ताजा करते हुए कहा कि वह 1980 में काफी युवा था और हम उससे सीनियर थे। वह सभी का सम्मान करता और खूब हंसी मजाक करता लेकिन इसका पूरा ध्यान रखता कि कोई आहत ना हो। उसके ड्रिबलिंग कौशल ने भारत को स्वर्ण पदक जिताने में मदद की और पूरी दुनिया ने उसके फन का लोहा माना। पेनल्टी कार्नर बनाने से लेकर गोल करने तक में उसका कोई सानी नहीं था।

विश्व कप 1975 में भारत की खिताबी जीत के नायक और मेजर ध्यानचंद के बेटे अशोक कुमार ने उन्हें अपने दौर में दुनिया के तीन सर्वश्रेष्ठ ड्रिबलरों में शुमार किया। अशोक कुमार ने कहा कि लखनऊ होस्टल के दिनों में ही शाहिद को देखकर उन्हें अनुमान हो गया था कि यह भारत के महानतम खिलाड़ियों में से एक होगा। उन्होंने कहा कि उस दौर में यानी ध्यानचंद के बाद के दौर में इनामुर रहमान और पाकिस्तान के शहनाज शेख के अलावा किसी को ड्रिबल के लिये जाना गया तो वह शाहिद थे।

उन्होंने ये भी कहा कि मैं शाहिद को लखनउ होस्टल के दिनों से जानता था जब हम इंडियन एयरलाइंस के सालाना शिविर के लिये केडी सिंह बाबू स्टेडियम जाते थे। मैं युवा लड़कों के साथ अभ्यास करना पसंद करता था जिनमें से शाहिद एक था। उसका खेल इतनी कम उम्र में भी सीनियर खिलाड़ियों की तरह था और मैं तभी समझ गया था कि एक दिन यह भारत के महानतम खिलाड़ियों में से एक होगा।



गुरुवार, 14 जुलाई 2016

आबादी 136 करोड़ के पार गई - भारत को “हम दो हमारा कोई नहीं” स्कीम की जरूरत

हरिगोविंद विश्वकर्मा


12 अप्रैल 2019 की सुबह जनसंख्या इंडेक्स से पता चला कि भारत की जनसंख्या एक अरब छत्तीस करोड़ (136 करोड़) हो गई। इतनी बड़ी आबादी को रोटी-कपड़ा-मकान के अलावा स्वास्थ्य-शिक्षा और रोज़गार दिलाना किसी भी सरकार के लिए असंभव है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपना कार्यकाल पूरा कर रहे हैं, लेकिन जनसंख्या का मसाइल उनके एजेंडा में ही नहीं था। पिछले पांच साल के दौरान सरकार ने अनगिनत योजनाओं की घोषणा की लेकिन उनमें एक भी ऐसी योजना नहीं है, जो सुरसा के मुंह की तरह दिन दूना रात चौगुना बढ़ रही आबादी पर अंकुश लगाए। लोग हैं कि चंद्रगुप्त मौर्य की तरह अपने “साम्राज्य की रक्षा” के लिए तीन-तीन चार-चार उत्तराधिकारी पैदा किए जा रहे हैं। जिससे देश की आबादी हर घंटे क़रीब दो हज़ार बढ़ जाती है। इससे हर जगह अव्यवस्था का आलम है, चाहे वह ट्रेन हो, बस हो या फिर मकान। हर जगह भारी भीड़। कह सकते हैं कि जनसंख्या वृद्धि न केवल सारी योजनाओं पर पानी फेर रही है। हिंदुस्तानियों को का जीवन जानवर जैसा बना दिया है।


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जो लोग कभी विदेश, ख़ासकर यूरोप या अमेरिकी देशों की यात्रा पर करते हैं और वहां लोगों का जीवन देखकर हैरान होते हैं। कहीं कोई भीड़ नहीं – बसों में पर्याप्त जगह, ट्रेन में हर समय टिकट और सीट उपलब्ध, पार्क या टूरिस्ट स्पॉट पर आराम से बैठने, मस्ती करने की जगह और माहौल। यह देखकर मन में सवाल उठता है कि, भारत में ये सुविधाएं क्यों नहीं। अगले पल जवाब मिल जाता है, सुविधाएं तो भरपूर हैं, लेकिन यहां ज़्यादा बच्चे पैदा करने वालों ने नरक मचा कर रखा है। आज़ादी के बाद इतने बच्चे पैदा किए गए कि देश का नागरिक क्रॉउड में तब्दील हो गया। भीड़ के चलते बस में चढ़ना मुश्किल, इतनी ट्रेनें बढ़ाई जा रही हैं, फिर भी कनफर्म्ड टिकट नहीं मिलता। कहीं नौकरी की एकाध जगह का ऐड छपा नहीं, कि हज़ारों बेरोज़गार युवक लाइन लगा लेते हैं। मतलब हर जगह भीड़ ही भीड़, पशुओं की तरह मारामारी है। जनसंख्या बढ़ोतरी के कारण इस देश में नागरिक इंसान न होकर पशु जैसा हो गया है।
इसमें दो राय नहीं कि देश में जनसंख्या विस्फोट सभी समस्याओं की जननी बन गई है। ग़रीबी, कुपोषण, भुखमरी, बेरोज़गारी, निरक्षरता, बढ़ते अपराध, आतंकवाद, पुअर हेल्थकेयर, धार्मिक उन्माद, कट्टरता और शिक्षण संस्थानों में दाख़िला जैसी समस्याएं आबादी विस्फोट की नाभि से ही निकलकर समाज को बीमार और परेशान कर रही हैं। केवल जनसंख्या ही अकेले दम पर सभी योजनाओं, नीतियों और प्रोग्राम्स की हवा निकाल रही है। यह सुरसा बनकर मानव कल्याण के हर फ़ैसले को अप्रभावी बना रही है। लिहाज़ा, जनसंख्या वृद्धि को देश की सबसे बड़ी समस्या मानते हुए, सबसे पहले इससे निपटने का विकल्प या समाधान तलाशा जाना चाहिए।
इस क्रम में थोक के भाव बच्चे पैदा करने वालों, चाहे वे किसी धर्म या मजहब के हों, पर अंकुश लगाना बहुत ज़रूरी है। जब तक बच्चे पैदा करने वालों के मन में भय पैदा नहीं किया जाएगा, आबादी पर अंकुश मुमकिन नहीं। बच्चे पैदा करने से रोकने के लिए दस-बीस साल के लिए चीन जैसा कठोर क़ानून बनाना होगा। ऐसे कड़े क़ानून, जो जनसंख्या पर अंकुश लगाया जा सके। सबसे पहले हम दो हमारे दो की नीति पर सख़्ती से अमल करना होगा। तीसरी संतान पैदा करने वालों को सामाजिक अपराध का दोषी मानने और उन्हें जेल भेजने का प्रावधान करना होगा। जो सरकारी कर्मचारी तीसरी संतान पैदा करें, उन्हें फ़ौरन नौकरी से बर्खास्त करने का भी प्रावधान करने की ज़रूरत है। जब तक ऐसे क़दम नहीं उठाए गए, तो यह सिलसिला नहीं थमेगा।

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देश में ऐसी नीति की दरकार है, जिससे केवल दो बच्चे पैदा करने वाले प्रोत्साहित किए जा सकें। जिनके पास केवल एक बच्चा है, उन्हें और ज़्यादा प्रोत्साहन देने की ज़रूरत है। जिनके पास केवल एक बेटी है, उन्हें पक्के तौर पर सरकारी नौकरी देने का प्रावधान होना चाहिए। खेती तो दूर की बात इंसान के रहने के लिए ही जगह कम न पड़ने लगे, इस बात को ध्यान में रखकर “हम दो हमारे दो” के साथ साथ “हम दो हमारा एक” और “हम दो हमारा कोई नहीं” जैसी योजनाएं शुरू करने की ज़रूरत है। हम दो हमारा कोई नहीं का मतलब निःसंतान रहना नहीं, बल्कि जिन्होंने कोई बच्चा पैदा नहीं किया, उनको वृद्धावस्था में सामाजिक सुरक्षा देने जैसे क़दम उठाए जाने चाहिए। हम दो हमारा कोई नहीं योजना प्रयोग के तौर पर पहले पांच साल फिर दस और बाद में बीस साल के लिए आजमाई जा सकती है।
भारतीय समाज में सदियों से लोग मानते आए हैं कि बच्चे बुढ़ापे में उनका पालन-पोषण करते हैं। ऐसा लोग देश में सोशल सिक्योरिटी न होने के कारण सोचते हैं। कह सकते हैं कि भारत पुत्र-प्रधान परंपराओं का देश है। पुत्र पैदा होने पर यहां लोग जश्न मनाते हैं। लोग मान कर चलते हैं कि बेटियां शादी के बाद दूसरे के घर चली जाती हैं, इसलिए बुढ़ापे में देखभाल के लिए पुत्र ज़रूरी है। पुत्र को लोग बुढ़ापे की लाठी भी मानते हैं। इसलिए हर दंपत्ति चाहता है, उसे एक बेटा ज़रूर हो। इसीलिए दो बेटियां होने पर कई लोग बेटे के लिए तीसरा बच्चा पैदा करते हैं। यह आम धारणा है।
बच्चों के बुढ़ापे में सहारा बनने की परिकल्पना कोरे भ्रम के अलावा और कुछ नहीं है। आजकल माता-पिता बच्चों के एजेंडे में होते ही नहीं। जो मां-बाप बच्चों को पालने, उन्हें बेहतर शिक्षा देने के चक्कर में क़ायदे से जीवन जी नहीं पाते, उन्हें उनकी ही औलाद बुढ़ापे में घर में अपमानित करती है, नारकीय जीवन की सौगात देती है। बुजुर्गो को बोझ मानकर उनका तिरस्कार करने की ख़बरे आए दिन अख़बारों की सुर्खियों में रहती हैं। ऐसे भी उदाहरण भी देखने को मिलते हैं, कि बेटे ने बूढ़े माता-पिता को घर से बाहर निकाल दिया। उम्र के अंतिम दौर में लोग वृद्धाश्रम में अकेले रहने को मजबूर किए जा रहे हैं।
डब्ल्यूएचओ और हेल्पेज के मुताबिक, 2026 में भारत में बूढ़ों की आबादी 17.32 करोड़ होने का अनुमान है। पॉप्युलेशन को उम्र के हिसाब से नज़र रखने वाली संस्था कंट्री मीटर्स की वेबसाइट के मुताबिक भारत में 65 साल या उससे ऊपर की आबादी 5.5 फ़ीसदी यानी सात करोड़ से ज़्यादा हैं। अनुमानतः 50 लाख लोग ऐसे हैं, जिनके पास बुढ़ापे में कोई सहारा नहीं है। ऐसे लोगों को 65 साल की उम्र होने पर सरकार की ओर से 20 हज़ार रुपए महीने पेंशन देने की योजना शुरू की जानी चाहिए। फ़ालतू योजनाओं में वैसे भी लाखों करोड़ रुपए बर्बाद होते हैं। अगर वृद्धावस्था में सामाजिक सुरक्षा की आकर्षक योजना शुरू हुई तो निश्चित रूप से लोगों में बेटे की चाहत कम होगी और आबादी पर अंकुश लगेगा।
भारत में इंसान इतने ज़्यादा हो गए हैं कि ज़मीन कम पड़ने लगी है। आबादी पर हर पल नज़र रखने वाली बेवसाइट सेंसस इंडिया के मुताबिक़ देश में हर घंटे तीन हज़ार (3080) बच्चे पैदा हो रहे हैं, जबकि हर घंटे एक हजार (1099) लोगों की मौत होती है। यानी देश की आबादी हर घंटे क़रीब दो हज़ार बढ़ जाती है। जनसंख्या विस्फोट को देखकर ही डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट ‘वर्ल्ड पॉप्युलेशन प्रोस्पेक्ट्स’ में कहा गया है कि इसी तरह बच्चे पैदा होते रहे तो भारत की आबादी सन् 2028 तक चीन से ज़्यादा हो जाएगी। इसका मतलब लोगों को रहने के लिए जगह नहीं बचेगी।
धर्म के आधार पर आबादी देखें तो मुसलमान अब भी दो से ज़्यादा बच्चे पैदा कर रहे हैं। 2011 की जनसंख्या में मुसलमानों की आबादी 14.2 फीसदी बताई गई। जबकि 2001 की जनगणना में भारत में मुस्लिम आबादी 13.4 फ़ीसदी थी। इसका मतलब दस साल में 0.8 फीसदी यानी लगभग एक फीसदी मुसलमान बढ़ रहे हैं। दूसरी तरफ 2011 की जनगणना के अनुसार देश की आबादी में हिंदुओं की संख्या 79.8 फीसदी थी। 2001 में हिंदुओं की संख्या 80.45 फीसदी थी, मतलब हिंदुओं का जनसंख्या कम हो रही है, यानी जनसंख्या वृद्धि में हिंदुओं का कोई योगदान नहीं है। हिंदुओं की आबादी पिछले दस साल में 0.66 फीसदी कम हुई। अगर धर्म के आधार पर देखें तो हर हिंदू स्त्री औसतन 2 बच्चे और हर मुस्लिम स्त्री औसतन 3 बच्चे पैदा कर रही है। जैन महिला केवल औसतन 1.2 बच्चे पैदा करती है। यह भी गौर करने वाली बात है कि यह आंकड़ा महिलाओं का है। निचले तबके के मुसलमानों में बड़ी संख्या लोग एक से ज़्यादा शादियां करते हैं। इस हिसाब से देखे तो हर औसत मुसलमान तीन से चार बच्चों का बाप होता। इसलिए मुस्लिम आबादी बढ़ रही है। इसी तरह हर हिंदू पुरुष अब दो से भी कम बच्चों का बाप होता है। इसलिए हिंदू आबादी घट रही है।


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भारत के पास विश्व की समस्त भूमि का केवल 2.4 फ़ीसदी हिस्सा है, जबकि विश्व की आबादी का 16.8 फ़ीसदी हिस्सा यहां रहता है। इस लिहाज़ से भारत दुनिया का सबसे ज़्यादा घनत्व वाला देश है। फ़िलहाल देश की आबादी 1.36 अरब पहुंच चुकी है। 68.86 करोड़ (51.54 फ़ीसदी) पुरुष और 64.49 करोड़ (48.46 फ़ीसदी) महिलाएं हैं। हर 1000 पुरुष के लिए 943 महिलाएं हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट के अनुसार चीन की अपेक्षा भारत की जनसंख्या दोगुनी तेजी से बढ़ रही है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत की जनसंख्या साल 2010 से 2019 के बीच सालाना 1.2 फीसदी की दर से बढ़ रही है।
19वीं सदी के उत्तरार्ध में इस भूभाग (तब भारत नहीं, ब्रिटिश इंडिया था) की आबादी ही क़रीब 17 करोड़ थी, लेकिन अब उससे ज़्यादा लोग हर दस साल में बढ़ जाते हैं। 20वीं सदी के आरंभ में ब्रिटिश इंडिया की आबादी 23.84 करोड़ से दस साल में 25.21 करोड़ हो गई। अगले दो दशकों में जनसंख्या 27.89 और 31.86 करोड़ हुई। आबादी में विस्फोट आज़ादी के बाद आया। सन् 1951 की जनगणना में पता चला, देश की आबादी 36 करोड़ को पार कर चुकी है। आबादी 1961 में उछलकर 43.9 करोड़ हो गई। सत्तर के दशक में लगा कि देश में बच्चे पैदा करने का कॉम्पटिशन शुरू हो गया है, क्योंकि दस साल में 11 करोड़ लोग बढ़ गए। आबादी 54 करोड़ हो गई। इसी तरह 1981 में 68.3 करोड़ और 1991 में 84.6 करोड़ हो गई। अगले दशक में 16 करोड़ लोग बढ़े। न्यू मिलेनियम में तो बच्चे पैदा करने के सारे रिकॉर्ड टूट गए। एक दशक में 21 करोड़ बच्चे पैदा हुए और 2011 में आबादी 1.21 अरब हो गई।
मज़ेदार बात यह है कि आज़ादी के बाद से ही केंद्र और सभी राज्य सरकारें कोशिश कर रही हैं कि इस पर अंकुश लगाया जाए लेकिन हर कोशिश टांय-टांय फिस्स हो रही है। देश में दो बार जनसंख्या नीति बन चुकी है, जिसमें जनसंख्या विस्फोट पर अंकुश लगाने और छोटे परिवार प्रमोट करने की बात थी, पर सब धरी की धरी रह गई। सन् 2000 से जनसंख्या आयोग भी अस्तित्व में आ चुका है। फिर भी आबादी थमने का नाम नहीं ले रही है। नसबंदी भारत में चीन से पहले से शुरू हुई, लेकिन ख़ास नतीजा नहीं निकला। अब प्रयोग के तौर पर गर्भवती महिला का पंजीकरण अनिवार्य होना चाहिए। यह काम देहात में ग्राम पंचायत और शहर में म्युनिसिपैलिटी को करनी चाहिए। सरकार का नेटवर्क गांव गांव और घर घर है, इसलिए यह काम कठिन नहीं है। हर गर्भवती महिला पर नज़र रखना ग्राम पंचायत अधिकारी और म्युनिसिपैलिटी के अधिकारी की ड्यूटी का हिस्सा कर दिया जाए।
सत्तर के दशक में चीन में ऐसी ही परिस्थियां थीं। लिहाज़ा, आबादी कंट्रोल करने के लिए चीन को 1979 में वन चाइल्ड पॉलिसी लागू करनी पड़ी। इसके तहत हर कपल को एक ही बच्चा पैदा करने की इजाज़त है। दूसरा बच्चा पैदा करने पर पैरेट्स के ख़िलाफ़ तो कार्रवाई होती ही है, बच्चे को 'गैरकानूनी बच्चा’ कहा जाता है। उसे निःशुल्क शिक्षा या सेहत संबंधी सुविधाएं नहीं दी जाती हैं। यही नहीं, बच्चा अपने ही देश में यात्रा नहीं कर सकता और किसी लाइब्रेरी का इस्तेमाल नहीं कर सकता। यह नीति के लागू होने से पहले चीन में लोग औसतन चार बच्चे पैदा करते थे। वन चाइल्ड पॉलिसी से आबादी पर तो अंकुश लगा ही, चीन में लोगों की ज़िंदगी पूरी तरह से बदल गई। जो भी हो, भारत को अगर समस्याओं का देश होने से बचाना है तो कठोर क़दम उठाने ही होंगे।

रविवार, 3 जुलाई 2016

अमरनाथ यात्रा - खतरों-बाधाओं के बावजूद बड़ी रोमांचक होती है बर्फीली पहाड़ों की यात्रा

हरिगोविंद विश्वकर्मा
हिमालय की गोद में स्थित पवित्र शिवलिंग तक पहुंचने की श्री अमरनाथ यात्रा शुरू है। जिसने कभी अमरनाथ की रोमांचक यात्रा नहीं की, वह धरती के स्वर्ग के एक ख़ास आनंद से वंचित रह गया है। इतना ही नहीं, अमरनाथ यात्रा पर न जाने वाला बड़ा नैसर्गिक खुशी भी मिस कर देता है। दरअसल, तमाम कठिनाइयों, बाधाओं और ख़तरों के बावजूद मॉनसून के दौरान दो महीने चलने वाली यह पवित्र यात्रा एक सुखद एहसास होती है। यही वजह है कि दिनोंदिन इसे लेकर उत्साह बढ़ता ही जा रहा है। पिछले दिनों हुए आतंकवादी हमले में 8 श्रद्धालुओं की मौत के बावजूद शिवभक्तों का उत्साह कम नहीं हुआ है।

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दरअसल, स्थानीय सरकार की लगातार उपेक्षा के बावजूद श्रद्धालुओं का उत्साह कम नहीं हुआ। अब तो अमरनाथ यात्रा धार्मिक यात्रा से बढ़कर राष्‍ट्रीयता का प्रतीक बन गई है। जम्‍मू बेस कैंप से जब श्रद्धालुओं का जत्‍था निलता है तो 'जय भालेनाथ' ‘बम-बम भोले’ और ‘हर-हर महादेव’ के साथ साथ 'वंदे मातरम्' 'जयहिंद' और ‘भारत माता की जय’ के भी सुर निकलते हैं। यही वजह है कि इस यात्रा पर आतंकवादियों की धमकियों और हमलों का भी कोई असर नहीं पड़ा। जम्मू से लेकर श्रीनगर, पहलगाम-बालटाल ही नहीं, पूरी यात्रा के दौरान जगह-जगह गैरसरकारी संस्थाओं की ओर से लंगर की व्यवस्था की जाती है। लोग खाते-पीते धूनी रमाए भोलेनाथ के दर्शन के लिए आगे बढ़ते रहते हैं।

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हिमालय की गोद में स्थित अमरनाथ हिंदुओं का सबसे ज़्यादा आस्था वाला पवित्र तीर्थस्थल है। पवित्र गुफा श्रीनगर के उत्तर-पूर्व में 135 किलोमीटर दूर समुद्र तल से 13 हज़ार फ़ीट ऊंचाई पर है। पवित्र गुफा की लंबाई (भीतरी गहराई) 19 मीटर, चौड़ाई 16 मीटर और ऊंचाई 11 मीटर है। अमरनाथ की ख़ासियत पवित्र गुफा में बर्फ़ से नैसर्गिक शिवलिंग का बनना है। प्राकृतिक हिम से बनने के कारण ही इसे स्वयंभू ‘हिमानी शिवलिंग’ या ‘बर्फ़ानी बाबा’ भी कहा जाता है।

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आषाढ़ पूर्णिमा से रक्षाबंधन तक चलने वाले पवित्र हिमलिंग दर्शन के लिए लाखों श्रद्धालु अमरनाथ यात्रा पर जाते हैं। गुफा में ऊपर से बर्फ के पानी की बूंदें टपकती रहती हैं। यहीं पर ऐसी जगह है, जहां टपकने वाली हिम बूंदों से क़रीब दस फ़िट ऊंचा शिवलिंग बनता है। चंद्रमा के घटने-बढ़ने के साथ-साथ बर्फ़ के लिंग का आकार भी घटता-बढ़ता रहता है। सावन की पूर्णिमा को यह पूर्ण आकार में हो जाता है और अमावस्या तक धीरे-धीरे छोटा हो जाता है। हैरान करने वाली बात है कि शिवलिंग ठोस बर्फ़ का होता है, जबकि आसपास आमतौर पर कच्ची और भुरभुरी बर्फ़ ही होती है।

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भगवान शिव के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक अमरनाथ को तीर्थों का तीर्थ कहा जाता है। मान्यता है कि इस गुफा में शंकर ने पार्वती को अमरकथा सुनाई थी, जिसे सुन सद्योजात शुक-शिशु शुकदेव ऋषि के रूप में अमर हो गए। गुफा में आज भी कबूतरों का एक जोड़ा दिखाई देता है, जिन्हें अमर पक्षी माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि जिन श्रद्धालुओं को कबूतरों जोड़ा दिखाई देता है, उन्हें शिव-पार्वती दर्शन देते हैं और मोक्ष प्रदान करते हैं। यह भी माना जाता है कि भगवान शिव ने 'अनीश्‍वर कथा' पार्वती को गुफा में ही सुनाई थी। इसीलिए यह बहुत पवित्र मानी जाती है। शिव ने पार्वती को ऐसी कथा भी सुनाई थी, जिसमें यात्रा और मार्ग में पड़ने वाले स्थलों का वर्णन था। यह कथा अमरकथा नाम से विख्यात हुई।

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कई विद्वानों का मत है कि शंकर जब पार्वती को अमर कथा सुनाने ले जा रहे थे, तो उन्होंने छोटे-छोटे अनंत नागों को अनंतनाग में छोड़ा, माथे के चंदन को चंदनबाड़ी में उतारा, अन्य पिस्सुओं को पिस्सू टॉप पर और गले के शेषनाग को शेषनाग नामक स्थल पर छोड़ा था। अमरनाथ गुफा का सबसे पहले पता सोलहवीं शताब्दी के पूर्वाध में एक मुसलमान गड़ेरिए बूटा मलिक को चला था। आज भी चौथाई चढ़ावा बूटा मलिक के वंशजों को मिलता है। यह एक ऐसा तीर्थस्थल है जहां फूल-माला बेचने वाले मुसलमान होते हैं। अमरनाथ गुफा एक नहीं है, बल्कि अमरावती नदी पर आगे बढ़ते समय और कई छोटी-बड़ी गुफाएं दिखती हैं। सभी बर्फ से ढकी हैं। मूल अमरनाथ से दूर गणेश, भैरव और पार्वती के वैसे ही अलग अलग हिमखंड हैं।

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अमरनाथ जाने के दो मार्ग हैं। पहला पहलगाम होकर और दूसरा सोनमर्ग बालटाल से। जम्मू या श्रीनगर से पहलगाम या बालटाल बस या छोटे वहन से पहुंचना पड़ता है। उसके बाद आगे पैदल ही जाना पड़ता है। कमज़ोर और वृद्धों के लिए खच्चर और घोड़े की व्यवस्था रहती है। पहलगाम से जानेवाला रास्ता सरल और सुविधाजनक है। बलटाल से पवित्र गुफा की दूरी हालांकि केवल 14 किलोमीटर है, परंतु यह सीधी चढ़ाई वाला बहुत दुर्गम रास्ता है, इसलिए सुरक्षा की नज़रिए से ठीक नहीं है। इसीलिए इसे सेफ नहीं माना जाता। लिहाज़ा, ज़्यादातर यात्रियों को पहलगाम से जाने के लिए कहा जाता है। हालांकि रोमांच और ख़तरे से खेलने के शौकीन इस मार्ग से जाना पसंद करते हैं। इस रास्तें से जाने वाले लोग अपने रिस्क पर यात्रा करते हैं। किसी अनहोनी की ज़िम्मेदारी सरकार नहीं लेती है।

दरअसल, श्रीनगर से पहलगाम 96 किलोमीटर दूर है। यह वैसे भी देश का मशहूर पर्यटन स्थल है। यहां का नैसर्गिक सौंदर्य देखते ही बनता है। लिद्दर और आरू नदियां इसकी ख़ूबसूरती में चार चांद लगाती हैं। पहलगाम का यात्री बेस केंप छह किलोमीटर दूर नुनवन में बनता है। पहली रात भक्त यहीं बिताते हैं। दूसरे दिन यहां से 10 किलोमीटर दूर चंदनबाड़ी पहुंचते हैं। चंदनबाड़ी से आगे इसी नदी पर बर्फ़ का पुल है। यहीं से पिस्सू घाटी की चढ़ाई शुरू होती है। कहा जाता है कि पिस्सू घाटी में देवताओं और राक्षसों के बीच घमासान लड़ाई हुई जिसमें राक्षसों की हार हुई। यात्रा में पिस्सू घाटी जोख़िम भरा स्थल है। यह समुद्रतल से 11,120 फ़ीट ऊंचाई पर है।

पिस्सू घाटी के बाद अगला पड़ाव 14 किलोमीटर दूर शेषनाग में पड़ता है। लिद्दर नदी के किनारे-किनारे पहले चरण की यात्रा बहुत कठिन होती है। यह मार्ग खड़ी चढ़ाई वाला और ख़तरनाक है। यात्री शेषनाग पहुंचने पर भयानक ठंड का सामना करता हैं। यहां पर्वतमालाओं के बीच नीले पानी की खूबसूरत झील है। इसमें झांकने पर भ्रम होता है कि आसमान झील में उतर आया है। झील करीब डेढ़ किलोमीटर व्यास में फैली है। कहा जाता है कि शेषनाग झील में शेषनाग का वास है। 24 घंटे में शेषनाग एक बार झील के बाहर निकलते हैं, लेकिन दर्शन खुशनसीबों को ही नसीब होता है। तीर्थयात्री यहां रात्रि विश्राम करते हैं और यहीं से तीसरे दिन की यात्रा शुरू करते हैं।

शेषनाग से पंचतरणी 12 किलोमीटर दूर है। बीच में बैववैल टॉप और महागुणास दर्रे पार करने पड़ते हैं, जिनकी समुद्रतल से ऊंचाई क्रमश: 13,500 फ़ीट व 14,500 फ़ीट है। महागुणास चोटी से पंचतरणी का सारा रास्ता उतराई का है। यहां पांच छोटी-छोटी नदियों बहने के कारण ही इसका नाम पंचतरणी पड़ा। यह जगह चारों तरफ से पहाड़ों की ऊंची-ऊंची चोटियों से ढका है। ऊंचाई की वजह से ठंड भी बहुत ज़्यादा होती है। ऑक्सीजन की कमी की वजह से तीर्थयात्रियों को यहां सुरक्षा के इंतज़ाम करने पड़ते हैं।

पवित्र अमरनाथ की गुफा यहां से केवल आठ किलोमीटर दूर रह जाती है। रास्ते में बर्फ ही बर्फ जमी रहती है। इसी दिन गुफा के नज़दीक पहुंचकर लोग रात बिता सकते हैं और दूसरे दिन सुबह पूजा-अर्चना कर पंचतरणी लौटा जा सकता है। कुछ यात्री शाम तक शेषनाग वापस पहुंच जाते हैं। रास्ता काफी कठिन है, लेकिन पवित्र गुफा में पहुंचते ही सफ़र की सारी थकान पल भर में छू-मंतर हो जाती है और अद्भुत आत्मिक आनंद की अनुभूति होती है।

दरअसल, जब चंदनवाड़ी या बालटाल से श्रद्धालु निकलते हैं, तो रास्ते भर उन्हें प्रतिकूल मौसम का सामना करना पड़ता है। पूरा बेल्‍ट यानी चंदनवाड़ी, पिस्‍सू टॉप, ज़ोली बाल, नागा कोटि, शेषनाग, वारबाल, महागुणास टॉप, पबिबाल, पंचतरिणी, संगम टॉप, अमरनाथ, बराड़ी, डोमेल, बालटाल, सोनमर्ग और आसपास का इलाक़ा साल के अधिकांश समय बर्फ़ से ढंका रहता है। इससे इंसानी गतिविधियां महज कुछ महीने रहती हैं। बाक़ी समय यहां का मौसम इंसान के रहने लायक नहीं होता। गर्मी शुरू होने पर यहां बर्फ पिघलती है और अप्रैल से यात्रा की तैयारी शुरू की जाती है।

पवित्र गुफा की ओर जाने वाले श्रद्धालुओं के लिए चंदनवाड़ी से अमरनाथ और बालटाल के बीच ठहरने या विश्राम करने का कोई अच्छा ठिकाना नहीं है। 30 किलोमीटर से अधिक लंबे रास्‍ते में अकसर तेज़ हवा के साथ कभी हल़की तो कभी भारी बारिश होती रहती है और श्रद्धालुओं के पास भीगने के अलावा और कोई विकल्‍प नहीं होता। बचने के लिए कहीं कोई शेड नहीं है, सो बड़ी संख्‍या में लोग बीमार भी हो जाते हैं। यही वजह है कि कमज़ोर कद-काठी के यात्री शेषनाग की हड्डी ठिठुराने वाली ठंड सहन नहीं कर पाते और उनकी मौत तक हो जाती है। इसीलिए मेडिकली अनफिट लोगों को अमरनाथ यात्रा पर नहीं जाने की सलाह दी जाती है।

दरअसल, आतंकवाद और धमकियों के बावजूद शेष भारत से लोगों, का जम्‍मू कश्‍मीर आना-जाना कम होने की बजाय बढ़ता ही गया। वजह रहे वैष्‍णोदेवी, अमरनाथ, शिवखोड़ी, खीर भवानी और बुड्ढा अमरनाथ जैसे धार्मिक स्‍थल। पहले वैष्‍णोदेवी की चढ़ाई लो‍कप्रिय हुई, फिर अमरनाथ यात्रा। देश भर से अमरनाथ गुफा जाने वालो की संख्या लगातार बढ़ ही रही है। श्रद्धालुओं को हतोत्साहित करने के लिए कभी लिंग के पिघलने तो कभी कृत्रि‍म लिंग लगाने का विवाद खड़ा किया गया, परंतु श्रद्धा कम नहीं हुई।

लोगों की बढ़ती भीड़ को देखकर सन् 2000 में श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड की भी स्‍थापना की गई। श्रद्धालुओं की इन कठिनाइयों को दूर करने के लिए केंद्र के आग्रह पर ग़ुलाम नबी आज़ाद सरकार ने 26 मई 2008 को श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड को बालटाल के पास डोमेल में वन विभाग की 800 कनाल यानी 40 हेक्‍टेयर ज़मीन आवंटित की थी, ताकि यात्रियों की सुविधा के लिए अस्थाई शिविर यानी टेंपररी शेड बनाए जा सकें। प्रस्‍तावित शेल्‍टर में नहाने, खाने और रात में ठहरने की सु‍विधा होती। बदले में 2.5 करोड़ रुपए का मुआवजा भी तय किया गया था। दरअसल, पहले मामला जम्‍मू–कश्‍मीर हाईकोर्ट में गया, जहां अदालत ने साफ़ कहा कि यात्रियों की सुविधा के लिए प्रीफैब्रिकेटिड हट बनाए जाएं और अन्य सुविधाएं दी जाएं।

मौजूदा मुख्यमंत्री मेहबूबा मुफ़्ती, उनकी पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी और घाटी के अलगाववादी नेताओं ने ज़मीन हस्तांतरण का भारी विरोध किया था। इनकी शह पर श्रीनगर में हिंसा हुई, जहां पुलिस की गोली से कई उपद्रवी मारे गए। तब राज्य में कांग्रेस-पीडीपी गठजोड़ की सरकार थी। मेहबूबा ने धमकी दी कि ज़मीन आवंटन रद नहीं हुआ तो समर्थन वापस ले लेंगी। लिहाज़ा, पहली जुलाई 2008 को ज़मीन का आवंटन रद कर दिया गया और श्राइन बोर्ड के मुख्‍य कार्यकारी व राज्‍यपाल के प्रधान सविच अरुणकुमार को भी बर्खास्‍त कर दिया गया। इस तरह अमरनाथ की कठिन यात्रा पर जाने वाले श्रद्धालुओं के लिए उनके अपने देश में शिविर बनाने का सपना साकार नहीं हो सका।

वैसे अथाई शेड की ज़रूरत बालटाल ही नहीं, डोमेल, संगम टॉप, अमरनाथ, पंचतरिणी, पिस्‍सू टॉप, चंदनवाड़ी और नुनवन में भी है, क्‍योंकि कपड़े के जो टेंट बनाते हैं, उसमें श्रद्धालु भीग जाते हैं। राज्य में ऐसा पहली बार नहीं हुआ था कि किसी संस्थान को वन विभाग की भूमि दी गई हो। राजौरी में बाबा बडशाह गुलाम यूनिवर्सिटी के लिए पांच हजार कनाल भूमि दी गई। इसी तरह कई मजहबी तंजीम को वन विभाग की ज़मीन दी जा चुकी है। इतना ही नहीं वन भूमि की ज़मीन के लिए आंसू बहाने वाले कई कश्मीरी नेताओं ने अपना घर बन विभाग की ज़मीन पर क़ब्‍ज़ा करके बनवाया है।

दरअसल, यह कश्‍मीरियों के आतिथ्‍य का असर रहा है कि सदियों से लोग ख़ूबसूरत पहाड़ों और झीलों का आनंद लेने धरती के इस स्‍वर्ग पर आते रहे हैं। बेहतरीन मेहमाननवाज़ी के लिए मशहूर कश्‍मीरी आवाम जागरूक और संवेदनशील मानी जाती रही है। उसी अवाम की तहज़ीब और डेमोग्राफी केवल 40 हेक्‍टर ज़मीन श्राइन बोर्ड को देने से से ख़तरे में पड़ गई थी। होना तो यह चाहिए था कि मुस्लिम बाहुल्‍य राज्‍य होने के नाते कश्‍मीरी लीडरशिप को एकमत से बोर्ड को ज़मीन देने के फ़ैसले को मानना चाहिए था, क्‍योंकि यह पूरी दुनिया के करोड़ों हिंदुओं के आस्‍था का सवाल था।

मगर छोटे दिल के मीरवाइज़ फ़ारुक उमर और सैयद अली शाह गिलानी अस्‍थाई शेल्‍टर से बुरी डर गए। सेल्‍फ़रूल का राग आलापने वाले पीडीपी की मेहबूबा को भी डर आतंकित कर गया। ग्रेटर आटोनॉमी पर ज़ोर देने वाले नैशनल कांग्रेस के फ़ारूक अब्‍दुल्‍ला और उमर अब्‍दुल्‍ला को भी कश्‍मीर की डेमोग्राफी और संस्‍कृति के नष्‍ट होने का डर सताने लगा था। इन लोगों ने मान लिया कि अगर अस्‍थाई शेल्‍टर बने तो कश्‍मीरी कल्‍चर के पतन की शुरुआत हो सकती है।

यह कटु भी सच है कि यह राज्‍य केंद्र की मदद के बिना एक दिन भी सरवाइव नहीं कर सकता। राज्‍य के सालाना बजट में राज्‍य सरकार का योगदान महज 14 फ़ीसदी हो ता है। राज्‍य के कर्मचारियों के क़रीब क़रीब पूरा वेतन केंद्र वहन करता है, जो पूरे देश के टैक्सपेयर्स का पैसा होता है। दरअसल, यहां राज करने वालों ने अपने रिश्‍तेदारों या पार्टीके लोगों को खैरात में सरकारी नौकरी बांटी। नतीजा यह हुआ कि कर्मचारियों की संख्‍या क़रीब पौने तीन लाख है जिनमें आधे के पास काम ही नहीं। राज्‍य में साढ़े चार लाख से ज़्यादा पंजीकृत बेरोज़गार हैं जिनमें एक लाख से अधिकत स्‍नातक, लॉ स्‍नातक या स्‍नातकोत्‍तर हैं। औसतन एक कश्‍मीरी, दूसरे राज्‍य के नागरिक के मुक़ाबले केंद्र से आठ गुना पैसा पाता है। इसी तरह औसतन पांच सदस्‍यों वाला हर कश्‍मीर परिवार को भारत के खज़ाने से क़रीब 41 हज़ार रुपए हर साल मिलता है। कश्मीरियों की पर कैपिटा केंद्रीय सहायता भारतीयों की परकैपिटा केंद्रीय सहायता के क़रीब आठ गुना है।

जिस देश की जनता इस राज्य के लिए इतना कुछ करती है, उस देश के श्रद्धालुओं के लिए अस्थाई सेल्टर नहीं बनाने दिया गया। यह सुनकर हैरानी और दुख होता है। जबकि होना यह चाहिए कि हर जगह श्रद्धालुओं के लिए व्यवस्था होना ही चाहिए। भारत में हर धर्म के लोग रहते हैं, हिंदू हो, मुसलमान हो, सिख हों या ईसाई हों, केंद्र या राज्‍य सरकारें सभी महत्‍वपूर्ण धर्मथलों पर बुनियादी सुविधा उपलब्‍ध कराने के लिए कश्‍मीर से कन्‍याकुमारी और गुजरात से बंगाल तक कहीं भी ज़मीन आवंटित करने का अधिकार होना चाहिए ताकि जो लोग कहीं जाते हैं, उन्हें बेहतर सुविधाएं दी जा सकें।
https://youtu.be/ia7G_zvAx04

सोमवार, 27 जून 2016

चीन भारत का शुभचिंतक कभी हो ही नहीं सकता

हरिगोविंद विश्वकर्मा
आप लोगों को शायद याद होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता संभालने का बाद चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भारत का दौरा किया था। मोदी के जन्मदिन पर 17 सितंबर 2014 को जिनपिंग श्रीलंका से नई दिल्ली की बजाय सीधे अहमदाबाद पहुंचे थे। उसी दिन शाम को साबरमती रिवरफ्रंट पर मोदी ने शी को स्पेशल डिनर पार्टी दी थी। वस्तुतः मोदी ने यह सब बड़े साफ़ मन से किया था, इस सोच के साथ कि भारत और चीन के बीच लंबे समय से जमी अविश्वास की बर्फ़ पिघले और दोनों देश आपसी सहयोग से विकास की नई ऊचाइयां तय करें, जिसका लाभ दोनों देश की जनता को मिले। लेकिन मोदी चीन के मन में बैठे चोर को देखने में कामयाब नहीं हुए। अब भारत को परमाणु सप्लायर्स ग्रुप यानी एनएसजी की सदस्यता लेने से वंचित करवाने में चीन के मन में बैठा वही चोर सामने आ गया।

इसका मतलब यह भी होता है - जनाब हम तो सदा चोर यानी धोखेबाज़ ही थे, आपने हमें वफ़ादार समझ लिया तो यह आपकी नादानी। हम चीन के नेता हैं, जो दिमाग़ से काम लेते हैं, भारत के नेता नहीं, जो दिल की सुनते हैं। दरअसल, सिओल में भारत का खुला विरोध करके चीन ने साबित कर दिया कि नई दिल्ली चाहे जितनी कोशिश या मान-मनुहार कर ले, जितनी खातिरदारी करनी हो कर ले, या चीन की कंपनियों को निवेश के लिए चाहे जितना प्रोत्साहन देना हो दे दे, मगर चीन अपने ‘भारत विरोधी’ परंपरागत नीति पर कायम ही रहेगा। बीजिंग नईदिल्ली को दोस्त मान ही नहीं सकता।

अगर प्रधानमंत्री मोदी को सिओल एपिसोड के बाद भी लगता है, जैसा कि मोदी अब तक सोचते रहे हैं, कि चीन और चीनी नेतृत्व अपने स्वभाव को बदलेगा और भारत का अच्छा दोस्त बनेगा तो यह मोदी की वैसी ऐतिहासिक भूल होगी, जैसी भयंकर भूल पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने 1950-60 के दशक में ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ का नारा देकर की थी। वैसे भारतीय प्रधानमंत्री को अब जुमलों की दुनिया से बाहर आकर एक ‘सीरियस प्राइम मिनिस्टर’ का रुख अख़्तियार करना चाहिए। हमेशा से ‘इनविज़िबल एनेमी’ रहे चीन पर “इमोशनल डिपेंडेंसी” मोदी ही नहीं, उनकी पूरी टीम और भारतीय विदेश मंत्रालय के लिए भी ठीक नहीं है।

इतिहास गवाह है, चीन कभी किसी का दोस्त नहीं रहा। उसका पाकिस्तान प्रेम भी उसकी विस्तारवादी नीति का एक हिस्सा है। भारत को चीन हमेशा से अपने विरोधियों की सूची में रखता आया है। इसका प्रमाण चीन ने अभी इसी साल अप्रैल में दिया था। बीजिंग ने भारत को आंख दिखाते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ में आतंकी संगठन जैश-ए मोहम्मद के सरगना मौलाना मसूद अजहर को आतंकवादी घोषित करने के भारत के प्रस्ताव को वीटो कर दिया। मोदी के कार्यकाल में विदेश नीति की यह सबसे बड़ी असफलता मानी गई थी। इतना ही नहीं जब भारत ने जर्मनी में रह रहे उइगुर नेता डोलकुन ईसा को अमेरिकी ‘इनीशिएटिव्‍स फॉर चाइना’ की ओर से एक कॉन्‍फ्रेंस में शामिल होने के लिए वीज़ा दिया तो चीन आंखें लाल-पीली करने लगा। चीन के दबाव में भारत ने डोलकुन ईसा को जारी वीज़ा रद्द कर दिया। चीन ने कहा कि वह ईसा को आतंकवादी मानता है, लेकिन उसने भारत की मौलाना मसूद के इसी फॉर्मूले के तहत आतंकी कहने की दलील नहीं मानी।

बहरहाल, एनएसजी की सदस्यता न मिल पाने से सोशल मीडिया में लोग बेहद मुखर हैं। इस पर कड़ी प्रतिक्रिया हो रही है। ज़्यादातर लोग चीन में बने सामानों के बहिष्कार का आह्वान कर रहे हैं तो ढेर सारे लोग ख़ुद शपथ ले रहे हैं कि आज से चीन में बना कोई सामान इस्तेमाल नहीं करेंगे। लब्बोलुआब यह माना जा रहा है कि अगर हर भारतीय चीन में बने सामान का इस्तेमाल करना छोड़ दे तो चीनी अर्थव्यवस्था चरमरा जाएगी। सोशल मीडिया पर लोगों के इस दावे में कितनी सच्चाई है, यह शोध का विषय है, लेकिन इतना तो है, कि अगर हर भारतवासी तय कर ले कि चीन में बना कोई माल नहीं ख़रीदेगा तब इससे चीन के निर्यात पर व्यापक जडरूर असर पड़ सकता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या ऐसा वाक़ई मुमकिन है या यह तत्कालिक रिएक्शन है जो बाद में फुस्स हो जाएगी।

जहां लोग चीन को लेकर ग़ुस्से में हैं, वहीं हैरान करने वाली बात यह है कि चीन तब भारत का विरोध कर रहा है, जब भारत इस ख़तरनाक पड़ोसी की कंपनियों के निवेश के लिए अपने दरवाज़े खोल रखे हैं। कई चीनी कंपनियां भारत में अरबो-खरबों का मुनाफा कमा रही हैं। नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में चीन को भारत में कितनी अहमियत दी जा रही है, इसका उदारण प्रत्यक्ष विदेशी निवेश है। चीन पिछले दो साल में 956 अमेरिकी मिलियन डॉलर यानी क़रीब 65 अरब रुपए का निवेश करके भारत में निवेश के मामले में दसवें नंबर पर पहुंच गया है। वैसे चीन भारत में निवेश के मामले में 18 नंबर पर है, लेकिन पिछले दो साल में चीन ने हांगकांग, इटली, केमेन आईलैंड और दक्षिण कोरिया जैसे देशों को पीछे छोड़ दिया। चीन अब ई-कॉमर्स, टेलीकम्युनिकेशन्स, और मैनुफैक्चिरंग सेक्टर में निवेश कर रहा है।

इसमें दो राय नहीं कि भारत अमेरिका के साथ साथ चीन के लिए भी बहुत बड़ा बाज़ार है। चीन में बने माल से पूरा बाज़ार भार पड़ा है, क्योंकि चीन कंपनियों के माल भारत में धड़ल्ले से बिक रहे हैं। अभी चीन की यात्रा पर गए वित्तमंत्री अरुण जेटली ने सरकारी चैनल सीसीटीवी को दिए साक्षात्कार में चीन की कंपनियों को भारत में निवेश के लिए आमंत्रित करते हुए कहा कि भारत में निवेश के असीमित अवसर हैं। उसके आर्थिक विकास की दर टिकाऊ है। जेटली ने भारत के बढ़ते बुनियादी क्षेत्र में भी निवेश के लिए चीनी कंपनियों को आमंत्रित किया।

अलबत्ता, पिछले छह सात दशक में चीन के व्यवहार और रवैये की बात करें तो चीन ने हमेशा अपने आपको भारत के दुश्मन के ही किरदार में रखता रहा है। आज़ादी के बाद नेहरू भारत-चीनी भाई-भाई का नारा लगा रहे थे। क़ानून मंत्री डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संसद में अपने भाषण के दौरान नेहरू को बार बार आगाह किया। उन्होंने उसी समय कह दिया था, चीन पर भरोसा नहीं किया जा सकता। अंबेडकर ने चीन के भविष्य के रवैए पर भी कई प्रश्न उठाए थे और पाकिस्तान के साथ साथ चीन को ख़तरनाक पड़ेसी क़रार दिया था। अंबेडकर चीन को अलग तरीक़े से डील करने पर जोर देते थे। वह नेहरू के चीन प्रेम की तीखी आलोचना करते थे।

इतना ही नहीं, इससे पहले की अटलबिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में रक्षामंत्री रहे जार्ज फर्नांडिस खुलकर कहते थे कि भारत को पाकिस्तान के मुक़ाबले चीन से ज़्यादा ख़तरा है। फर्नांडिस कहते थे कि चीन पर बिलकुल भरोसा नहीं किया जा सकता, क्योंकि 1949 में तिब्बत को अपने क़ब्ज़े में लेने और 13 साल बाद भारत के बड़े भूभाग पर क़ब्ज़ा करने वाला यह देश भारत की तरक़्क़ी कभी देख ही नहीं सकता। फर्नांडिस झूठ नहीं बोल रहे थे। उनका बयान चीन की हरकतों को देखकर था। वैसे भी मोदी के कार्यकाल में भी चीन और भारत के रिश्ते बहुत अच्छे नहीं रहे हैं, सीमा विवाद को लेकर पिछले डेढ़ सालों में तल्खी और बढ़ी है। भारत और अमरीका की बढ़ती दोस्ती भी चीन को रास नहीं आ रहा है।

दरअसल, चीन सिओल-बैठक भारत के सामने सबड़ा बड़ा दुश्मन बनकर खड़ा हुआ। यह भारतीय लीडरशिप को जेहन में रखना चाहिए, क्योंकि सिओल-बैठक भारत के लिए कड़ा अनुभव लेकर आई। इससे दुनिया में भारत की भद्द पिट गई। वह भी उस समय जब दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश होने के नाते भारत अपने को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता का दावेदार मानता है। खैर अंतरराष्ट्रीय मंच पर इस तरह की जीत-हार होती रहती है। इसमें दो राय नहीं कि भारत की कूटिनीतिक तैयारी पर्याप्प नहीं थी। लिहाज़ा, इस मसले पर भविष्य में बेहतर होमवर्क की ज़रूरत है।

बहरहाल, डैमेज कंट्रोल में अमेरिका ने संकेत दिया है कि इस साल किसी भी कीमत पर भारत को एनएसजी का सदस्य बनाने की हर संभव कोशिश की जाएगी। इसके लिए साल के अंत तक एनएसजी के सदस्य दशों की एक विशेष बैठक हो सकती है। अब भारत को इस मौक़े पर पूरी तैयारी करनी होगी और हां, चीन को आंख मूंदकर निवेश करने की छूट देने की मौजूदा नीति की समीक्षा भी ज़रूरी है, ताकि यह नौबत न आए कि हमारे यहां अरबों खरबों का मुनापा कमाकर चीन हमें ही आंख दिखाए। भारत को एक बात कभी नहीं भूलना कि चीन भारत की शुभचिंतक कभी हो ही नहीं सकता। इसलिए उसके साथ हमेशा डिप्लोमेटिक रिलेशन ही रखने की सोचना चाहिए।






बुधवार, 22 जून 2016

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की श्रीनगर में संदिग्ध मौत की जांच आखिर क्यों नहीं करवाई नेहरू ने?

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की पुण्यतिथि पर विशेष
हरिगोविंद विश्वकर्मा
अपने समय के असाधारण राजनेता, चिंतक, शिक्षाविद् और भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की आज से ठीक 63 साल पहले कश्मीर में कथिततौर पर न्यायिक हिरासत के दौरान मौत हो गई थी। हैरानी की बात है कि उनकी मां लेडी जोगमाया देवी मुखर्जी की मांग के बावजूद न तो केंद्र सरकार और न ही जम्मू कश्मीर सरकार ने मौत की जांच करवाई। जोगमाया देवी ही नहीं पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. विधानचंद राय और तब के बड़े कांग्रेस नेता पुरुषोत्तमदास टंडन ने भी डॉ. मुखर्जी की मौत की जांच सुप्रीम कोर्ट के जज से कराने की ज़ोरदार मांग की थी, लेकिन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू टस से मस नहीं हुए।

दिनांक चार जुलाई, 1953 को जोगमाया ने नेहरू को अंग्रेज़ी में मार्मिक पत्र लिखा था। उन्होंने लिखा, “उसकी (डॉ. मुखर्जी) मौत रहस्य में डूबी हुई है। क्या यह हैरतअंगेज़ और अविश्वसनीय नहीं है कि बिना किसी ट्रायल के उसे गैरक़ानूनी ढंग से 43 दिन हिरासत में रखा गया और मुझे, उसकी मां को, जानकारी तक नहीं नहीं दी गई और वहां की सरकार ने मुझे सूचना उसके निधन के दो घंटे बाद दी। मैं अपने पुत्र की मृत्यु के लिए राज्य सरकार को ही ज़िम्मेदार मानती हूं और आरोप लगाती हूं कि उसने ही मेरे पुत्र की जान ली है। मैं तुम्हारी सरकार पर भी यह आरोप लगाती हूं कि घटना को छुपाने के लिए सांठगांठ करने की कोशिश की। इसलिए मैं, स्वतंत्र भारत के उस निडर सपूत की मां, उसकी दुखद और रहस्यमय मौत की अविलंब निष्पक्ष जांच की मांग करती हूं। मैं जानती हूं कि अब कुछ भी हो, उसका जीवन वापस नहीं लाया जा सकता, लेकिन मैं चाहती हूं भारत के लोगों पूरी घटना के असली कारणों से अवगत हों जिससे मेरे बेटे व्यक्ति की मौत हो गई।“

पांच जुलाई 1953 को जोगमाया को भेजे जवाब में नेहरू ने लिखा, “मैं डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की हिरासत और मौत के बारे में ईमानदारी से जुटाई गई जानकारी के आधार पर आपको जवाब देना चाहता हूं। मैंने ढेर सारे लोगों से पूछताछ की जो उस समय घटनास्थल पर ही मौजूद थे। अब मैं केवल इतना ही कह सकता हूं कि मैं सच्चे और स्पष्ट निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि डॉ. मुखर्जी की मौत पर इस तरह का कोई रहस्य नहीं है, जिस पर विचार किया जाए।”

दरअसल, नेहरू का डॉ. भीमराव अंबेडकर और सरदार पटेल की तरह डॉ. मुखर्जी से बहुत गंभीर मतभेद था। यहां तक कि 13 फरवरी 1953 को लोकसभा में दोनों की बीच बहुत तल्ख बहस हुई थी। जिसमें नेहरू ने अपना आपा तक खो दिया था। उसके बाद 14 अप्रैल को लोकसभा में अपने भाषण में जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 को समाप्त करने की पैरवी करते हुए डॉ. मुखर्जी ने कहा कि नेहरू की नीतियों को देश के लिए विनाशकारी साबित होंगी।

वस्तुतः, 26 अक्टूबर 1947 को जम्मू कश्मीर के भारत में विलय के समझौते का बाद जम्मू कश्मीर भारत का हिस्सा तो हो गया, लेकिन धारा 370 के तहत उस समय जम्मू कश्मीर का अलग झंडा और अलग संविधान था। वहां देश के सुप्रीम कोर्ट तक का फ़ैसला लागू नहीं होता था। इतना ही नहीं, वहां का मुख्यमंत्री वजीरे-आज़म अर्थात् प्रधानमंत्री कहलाता था और जम्मू कश्मीर में भारतीयों को प्रवेश करने के लिए पासपोर्ट की तरह परमिट लेनी पड़ती थी। यानी भारत के अंदर जम्मू कश्मीर को स्वतंत्र देश का दर्जा दे दिया गया।

डॉ. मुखर्जी जम्मू-कश्मीर को भारत का पूर्ण और अभिन्न अंग बनाने के प्रबल पैरोकार थे।  इस मुद्दे पर पूरा देश उनके साथ था। अगस्त 1952 में जम्मू की विशाल रैली में उन्होंने अपना संकल्प व्यक्त किया था और कहा था, “या तो मैं आपको भारतीय संविधान प्राप्त कराऊंगा या फिर इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपना जीवन बलिदान कर दूंगा।“

नेहरू सरकार को डॉ. मुखर्जी ने चुनौती दी और अपने दृढ़ निश्चय पर अटल रहे। अपने संकल्प को पूरा करने के लिए वह मई 1953 में बिना परमिट लिए जम्मू-कश्मीर की यात्रा पर निकल पड़े। वह पंजाब के उत्तरी छोर पर बसे माधोपुर तक पहुंच गए। माधोपुर में रावी को पार करते ही जम्मू कश्मीर राज्य शुरू होता है। राज्य में प्रवेश करने पर डॉ. मुखर्जी को 11 मई 1953 को वज़ीरे आज़म शेख़ अब्दुल्ला के आदेश पर हिरासत में ले लिया था।

सबसे ज़्यादा हैरान करने वाली बात यह थी कि डॉ. मुखर्जी को माधोपुर से राज्य में प्रवेश करने पर लखनपुर में हिरासत में लिया गया था लेकिन उन्हें जम्मू की किसी जेल में रखने की बजाय क़रीब 500 किलोमीटर दूर श्रीनगर ले जाया गया। बताया जाता है कि वह रास्तें में ही बीमार पड़ गए और बीमारी की हालत में ही जीप में डालकर उन्हें श्रीनगर ले जाया गया। इतनी लंबी यात्रा उनकी सेहत के लिए घातक थी। परंतु जम्मू कश्मीर के पुलिस अधिकारी उन्हें श्रीनगर ले जाने के लिए अड़े रहे।

वस्तुतः पंजाब सरकार डॉ. मुखर्जी को माधोपुर में ही हिरासत में ले सकती थी, लेकिन उन्हें गुरुदासपुर के डिप्टी एसपी ने सूचित किया कि सरकार ने उन्हें जम्मू कश्मीर जाने की इजाज़त दे दी है। इसी बिना पर उन्हें पंजाब-जम्मू कश्मीर सीमा पार करने दिया गया। माधोपुर की बजाय लखनपुर में हिरासत में लेने का राज्य और केंद्र को यह लाभ हुआ कि एक लोकसभा सदस्य की गिरफ़्तारी पर भी सुप्रीम कोर्ट भी दख़ल नहीं दे सकता था, क्योंकि जम्मू कश्मीर राज्य तब देश की सबसे बड़ी अदालत की ज्यूरीडिक्शन से बाहर था।

डॉ. मुखर्जी को श्रीगनर में जिस जेल में रखा गया था, वह उस समय उजाड़ स्थान पर था और वहां से अस्पताल 15 किलोमीटर दूर था। श्रीनगर जेल में टेलीफोन की भी सुविधा नहीं थी। मृत्यु से पहले डॉ. मुखर्जी को अस्पताल में जिस गाड़ी में ले जाया गया उसमें जानबूझ कर उनके किसी और साथी को बैठने नहीं दिया गया। सबसे बड़ी बात यह कि डॉ. मुखर्जी की व्यक्तिगत डायरी को रहस्यमय ढंग से ग़ायब कर दिया गया। परिस्थितिजन्य साक्ष्यों से यह भी स्पष्ट होता है कि मुखर्जी को हिरासत में लेने के लिए भी किसी न किसी स्तर पर बड़ी साज़िश हुई थी।

सबसे बढ़कर, मुखर्जी के इलाज के तमाम दस्तावेज़ संदेहास्पद हालात में छिपा लिए गए। इन्हीं साक्ष्यों के आधार पर भारतीय जनसंघ समेत देश के कई गणमान्य लोगों ने मुखर्जी की मौत की जांच की मांग की। शेख अब्दुल्ला सरकार पर मुखर्जी की मौत में शामिल होने का शक बहुत गहरा था। इसीलिए जब आठ अगस्त 1953 को शेख अब्दुल्ला को गिरफ़्तार किया गया तो कई लोगों ने यही माना कि उनकी गिरफ़्तारी मुखर्जी की मौत के सिलसिले में हुई, जबकि, दस्तावेज़ों के मुताबिक़, शेख अब्दुल्ला को कथित तौर पर कश्मीर को भारत से अलग करने की साज़िश रचने के आरोप में डिसमिस कर जेल में डाला गया था। बहरहाल, अब्दुल्ला की गिरफ़्तारी के बाद भी मुखर्जी की मौत की जांच के लिए न तो जम्मू कश्मीर सरकार न ही केंद्र सरकार तैयार हुई।

छह जुलाई जुलाई 1901 को कलकत्ता के मशहूर शिक्षाविद् आशुतोष मुखर्जी एवं जोगमाया देवी की संतान के रूप में जन्मे डॉ. मुखर्जी ने 1917 में मैट्रिक किया और 1921 में स्नातक और 1923 में लॉ की डिग्री लेने के बाद वह विदेश चले गये। 1926 में इंग्लैंड से बैरिस्टर बनकर स्वदेश लौटे। पिता का अनुसरण करते हुए उन्होंने भी अल्पायु में ही स्टडी शुरू कर दी थी। महज़ 33 साल की अल्पायु में वह कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति बनाए गए। एक विचारक और प्रखर शिक्षाविद् के रूप में उनकी उपलब्धि तथा ख्याति निरंतर आगे बढ़ती गयी। वह 'इंडियन इंस्टीटयूट ऑफ़ साइंस', बंगलौर की परिषद एवं कोर्ट के सदस्य और इंटर-यूनिवर्सिटी ऑफ़ बोर्ड के चेयरमैन भी रहे।

डॉ. मुखर्जी ने देशप्रेम का अलख जगाने के उद्देश्य से ही राजनीति में प्रवेश किया था। वह सच्चे अर्थों में मानवता के उपासक और सिद्धांतवादी थे। वह वीर सावरकर से ख़ासे प्रभावित थे और उनके राष्ट्रवाद के प्रति आकर्षित हुए और हिंदू महासभा में शामिल हुए। तब मुस्लिम लीग की राजनीति से बंगाल का माहौल हिंसक हो गया था। वहां सांप्रदायिक विभाजन की नौबत आ गई थी। कम्युनल लोगों की ब्रिटिश सरकार मदद कर रही थी। इस विषम परिस्थिति में उन्होंने यह सुनिश्चित करने का बीड़ा उठाया कि बंगाल के हिंदुओं की उपेक्षा न हो। अपनी विशिष्ट रणनीति से उन्होंने बंगाल के विभाजन के मुस्लिम लीग के प्रयासों को पूरी तरह से नाकाम कर दिया।

डॉ. मुखर्जी इस धारणा के प्रबल समर्थक थे कि सांस्कृतिक दृष्टि से सभी भारतीय एक हैं। हममें कोई अंतर नहीं। हम सब एक ही रक्त के हैं। एक ही भाषा, एक ही संस्कृति और एक ही हमारी विरासत है। इसलिए धर्म के आधार पर विभाजन नहीं होना चाहिए। परंतु उनके इन विचारों को अन्य राजनैतिक दल के तत्कालीन नेताओं ने दूसरे रूप से प्रचारित-प्रसारित किया। बावजूद इसके लोगों के दिलों में उनके प्रति अथाह प्यार और समर्थन बढ़ता गया। अगस्त, 1946 में मुस्लिम लीग ने अपने ऐक्शन प्लान के तहत जंग की राह पकड़ ली और कलकत्ता में भयंकर बर्बरतापूर्वक अमानवीय मारकाट हुई।

ब्रिटेन की विभाजन की योजना और साज़िश कांग्रेस नेताओं ने अखंड भारत संबंधी अपने वादों को ताक पर रखकर स्वीकार कर लिया। तब मुखर्जी ने बंगाल और पंजाब के विभाजन की मांग उठाकर प्रस्तावित पाकिस्तान का विभाजन कराया और आधा बंगाल और आधा पंजाब खंडित भारत के लिए बचा लिया। महात्मा गांधी और सरदार पटेल के अनुरोध पर वह केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल हुए। उन्हें उद्योग जैसे महत्वपूर्ण विभाग की ज़िम्मेदारी सौंपी गई। संविधान सभा और प्रांतीय संसद के सदस्य और केंद्रीय मंत्री के नाते उन्होंने शीघ्र ही अपना विशिष्ट स्थान बना लिया। किंतु उनके राष्ट्रवादी चिंतन के चलते नेहरू समेत दूसरे नेताओं से मतभेद बराबर बने रहे। नेहरू और पाकिस्तानी पीएम लियाकत अली के बीच कथित तौर पर हिंदू विरोधी समझौते और पाकिस्तान के हिंदुओं के क़त्लेआम न रोक पाने के विरोध में छह  अप्रैल 1950 को उन्होंने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था।

डॉ. मुखर्जी जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन संघचालक गुरु गोलवलकर से सलाह करने के बाद 21 अक्तूबर 1951 को दिल्ली में भारतीय जनसंघ की नींव रखी और इसके पहले अध्यक्ष बने। सन् 1952 के चुनावों में भारतीय जनसंघ ने संसद की तीन सीटों पर विजय प्राप्त की, जिनमें से एक सीट पर डॉ. मुखर्जी जीते। उन्होंने संसद में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन बनाया जिसमें 32 सदस्य लोकसभा तथा 10 सदस्य राज्य सभा शामिल हुए।

बहरहाल, इस देश में किसी भी संदिग्ध मौत की केंद्रीय एजेंसी, एसआईटी या आयोग गठित करके जांच की लंबी परंपरा रही है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस की कथित तौर पर हवाई दुर्घटना में मारे जाने की जांच के लिए तीन तीन आयोग बनाए गए, लेकिन डॉ. मुखर्जी के साथ घोर पक्षपात किया गया। प्रो. बलराज मोधक ने अक्टूबर 2008 में अपने एक लेख फाउंडिल ऑफ जनसंघ में कहा है कि डॉ. मुखर्जी की संदिग्ध मौत नेहरू और शेख़ के आशीर्वाद से हुई।

इस घटना को फ़िलहाल 63 साल हो गए। इस दौरान जम्मू-कश्मीर में कई सरकारें आईं और कई गईं। कई बार राज्य में राज्यपाल शासन भी रहा। इसी तरह दिल्ली में अनेक सरकारें बदली। जनसंघ के आधुनिक संस्करण भारतीय जनता पार्टी की भी सरकार रही, लेकिन किसी ने भी डॉ. मुखर्जी की संदिग्ध मौत से पर्दा उठाने का साहस नहीं किया। डॉ. मुखर्जी की मां जोगमाया देवी का नेहरु को लिखा गया पत्र दुर्भाग्य से अभी भी अपने उत्तर की तलाश कर रहा है।

सबसे विचित्र बात यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने दो साल के कार्यकाल में इस बारे में कोई पहल नहीं की। मोदी की सरकार की जम्मू-कश्मीर नीति कमोबेश कांग्रेस सरकार जैसी ही है। कांग्रेस की तरह बीजेपी भी वहां की क्षेत्रीय पार्टी पीपुल्स डेमोक्रिटक पार्टी के साथ सत्ता सुख भोग रही है। और तो और बीजेपी ने पीडीपी को लिखित रूप में आश्वासन दिया है कि केंद्र सरकार अनुच्छे 370 को जस का तस बनाए रखेगी यानी उससे कोई छोड़छाड़ नहीं किया जाएगा, जिसके लिए डॉ. मुखर्जी ने अपना बलिदान दिया। 

मंगलवार, 21 जून 2016

रघुराम राजन भारतीय रिज़र्व बैंक के सर्वश्रेष्ठ गवर्नर के रूप में याद किए जाएंगे

हरिगोविंद विश्वकर्मा
भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर डॉ. रघुराम गोविंदा राजन को भले ही नरेंद्र मोदी सरकार राजनीतिक वजह से दूसरा कार्यकाल नहीं दे रही है, लेकिन इस अर्थशास्त्री को सर्वश्रेष्ठ गवर्नर के रूप में हमेशा याद किया जाएगा। सन् 2013 में जब रुपया अनियंत्रित होकर रोज़ औंधे मुंह गिर रहा था और महज़ 120 दिन में 15.17 गिरकर 68.82 तक आ गया था, उसी समय डॉ. राजन रुपए के लिए संकटमोचक बनकर आए थे और उन्होंने रुपए को केवल संभाला ही नहीं, बल्कि उसकी स्थिति बेहतर करने में भी कामयाब रहे।

सन् 2013 की गर्मियों में रुपए का ज़बरदस्त अवमूल्यन शुरू हुआ था। चूंकि कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार का आख़िरी साल शुरू हो गया था, इसलिए सरकार के काम खड़े हो गए। भ्रष्टाचार के ढेर सारे आरोपों से पहले ही सरकार पस्त थी। उस पर भारतीय मुद्रा भी परेशानी खड़ी करने लगी। रुपया तत्कालीन गवर्नर डॉ. डी सुब्बाराव से संभल ही नहीं रहा था। वह बिलकुल असहाय दिख रहे थे। केंद्र सरकार और वित्त मंत्रालय में खलबली मची गई थी।

सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि उस समय प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह, वित्तमंत्री के रूप में  पी चिदंबरम, प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाह परिषद के अध्यक्ष के रूप में सी रंगराजन, योजना आयोग के उपाध्यक्ष के रूप में मोंटेकसिंह अहलूवालिया और ख़ुद गवर्नर के रूप में सुब्बाराव जैसे पांच अर्थशास्त्र के महारथी देश को चला रहे थे, फिर भी रुपया रोज़ाना औंधे मुंह गिर रहा था।

चार माह में डॉलर का मूल्य 53.58 से 68.82 रुपए पहुंच गया यानी रुपया 15.17 रुपए सस्ता हो गया। भारतीय मुद्रा जितनी आज़ादी के 40 साल बाद यानी सन् 1987 तक नहीं गिरी थी उतनी चार महीने में गिर गई। उस समय एक बार लगा, कहीं वर्ष ख़त्म होते-होते कहीं एक डॉलर की कीमत 100 रुपए न हो जाए। किसी के कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि रुपए को संभालने के लिए करें तो क्या करें।

ठीक उसी समय रघुराम राजन ने भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर का पदभार संभाला। चंद दिन में देश ने देखा कि रुपए का अवमूल्यन अचानक रुक गया। फिर रुपया डॉलर के मुक़ाबले मज़बूत होने लगा। यह किसी करिश्मे से कम नहीं था। इसके लिए राजन को क्रेडिट भले न दिया जाए, लेकिन यह उनके ही नेतृत्व में हो रहा था। राजन ने जादुई ढंग से रुपए का अवमूल्यन रोका ही नहीं, बल्कि उसे नीचे लाने में भी कामयाब रहे। फ़िलहाल, जब उनकी विदाई तय हो गई है, रुपया 67.19 पर है। यानी जब उन्होंने कार्यभार संभाला था, तब से 1.63 सुधरा हुआ है।

रिज़र्व बैंक के इतिहास में 23 गवर्नर हुए, जिनमें आज़ादी के बाद 21 गवर्नरों ने काम किया। इनमें पांच गवर्नर कार्यकारी रहे यानी कुछ महीने ही काम किया। 16 पूर्णकालिक गवर्नरों में मात्र दो ऐसे रहे, जिनके कार्यकाल में ओवरऑल रुपए का अवमूल्यन नहीं, बल्कि अधिमूल्यन हुआ यानी रुपया मज़बूत हुआ। रुपए को बेहतर स्थिति में करके जाने वाले राजन दूसरे गवर्नर हैं। इससे पहले 21वें गवर्नर वाईवी रेड्डी रुपए की स्थिति बेहतर करके गए थे। सबसे अहम बात है, रेड्डी को पांच साल का मौक़ा मिला जबकि राजन तीन साल में विदा हो रहे हैं।

चार सिंतबर 2013 को आरबीआई भवन पहुंचकर काम शुरू करने वाले राजन ने आते ही कमाल करना शुरू कर दिया। पहले भारतीय रुपए का अवमूल्यन रोका फिर साल ख़त्म होते-होते रुपए की फीकी पड़ी चमक को वापस लाने में कामयाब रहे। उनके चार महीने की मेहनत की बदौलत रुपया 31 दिसंबर 2013 को डॉलर के मुक़ाबले 68.82 से मज़बूत होकर 61.82 पर आ गया था। देश के अर्थशास्त्रियों ने राजन के क़दम की सराहना की और उम्मीद बंधने लगी कि उनके नेतृत्व में देश की सेंट्रल बैंक देश की ख़राब अर्थ-व्यवस्था को पटरी पर लाएगी।

अगर रुपए के अवमूल्यन के इतिहास पर नज़र डाले तो 2008 से 2013 तक आरबीआई को लीड करने वाले सुब्बाराव का कार्यकाल सबसे निराशाजनक रहा। उनके पांच साल से कार्यकाल में रुपया 43.41 से 68.75 चला गया था यानी डॉलर 25.34 रुपए महंगा हुआ। सी रंगराजन (1992 से 97) का कार्यकाल भी बेहद ख़राब रहा और उनके दौर में डॉलर का मूल्य 22.72 से बढ़कर 36.36 रुपए हो गया। यानी रुपए में 13.64 का अवमूल्यन हुआ। इसी तरह डॉ बिमल जालान (1997-2003) के छह साल के पीरियड में रुपए में 10.24 का अवमूल्यन हुआ।

गवर्नरों के बाद राजनीतिक दलों की बात करें, तो आज़ादी के बाद कांग्रेस के शासन में रुपए का सबसे ज़्यादा अवमूल्यन हुआ। कांग्रेस 1947 से 1977, 1980 से 1989, 1991 से 1996 और 2004 से 2014 तक सत्ता में रही और इस दौरान भारतीय मुद्रा के भाव में 57.29 रुपए का पतन हुआ। चौंकाने वाला सच यह है कि रुपए में 57.29 में 45 से ज़्यादा की गिरावट के लिए अकेले एक्स पीएम मनमोहन सिंह ज़िम्मेदार रहे।

दरअसल, सन् 1982 में मनमोहन क़रीब ढाई साल आरबीआई गवर्नर रहे, तब भारतीय मुद्रा 1.96 रुपए सस्ती हुई थी। नवंबर 1990 से वह आठ महीने प्रधानमंत्री (चंद्रशेखर सिंह) के आर्थिक सलाहकार रहे। तब रुपए में 2.97 का लॉस दर्ज हुआ था। जून 1991 से से 1996 तक मनमोहन वित्तमंत्री रहे, तब रुपया 14.51 गिरा। इसी तरह मई 2004 से वह 10 साल प्रधानमंत्री रहे। इस दौरान रुपया 24.93 सस्ता हुआ। इस तरह मनमोहन भारतीय मुद्रा के लिए अशुभ साबित हुए।

जिस अमेरिकी डॉलर का भाव आज 67.19 रुपए है, उसकी कीमत अंग्रेज़ों ने 15 अगस्त 1947 को जब नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस को सत्ता सौंपी, तब महज एक रुपया थी। यानी फ़िरंगी भारतीयों से बेहतर प्रशासक ही नहीं अर्थशास्त्री भी थे। अंग्रेज़ों ने ही एक अप्रैल 1935 को रिज़र्व बैंक को शुरू किया और सर ओसबोर्न स्मिथ पहले गवर्नर बने। सर सीडी देशमुख गवर्नर बनने वाले पहले भारतीय थे। सबसे अहम अंग्रेज़ों ने सन् 1773 से 1947 के बीच क़रीब पौने दो सौ साल शासन किया, लेकिन अर्थव्यवस्था गिरने नहीं दी। उनके शासन में देश पर एक पैसा भी विदेशी क़र्ज़ नहीं था।

नेहरू को कितना भी विज़नरी कहा जाए परंतु उनकी अगुवाई में अर्थ-व्यवस्था उत्तरोत्तर पतन ही हुआ। नेहरू ने 1951 में विदेशी कर्ज लेना शुरू किया। यह सिलसिला कभी थमा ही नहीं। क़र्ज़ का असर रुपए की सेहत पर पड़ा। नेहरू के पहले कार्यकाल में 1952 में डॉलर का दाम एक रुपए से बढ़कर 4.75 रुपए हो गया। उसके बाद रुपए का अवमूल्यन कभी तेज़ तो कभी सुस्त होता ही रहा।

नेहरू के बाद लालबहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी ने देश की कमान संभाली, पर रुपए का पतन जारी रहा। इमरजेंसी के बाद कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई, तो डॉलर का मूल्य क़रीब 9 रुपए हो चुका था। 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनी और मोरराजी देसाई व चरण सिंह की कलह के चलते भले जनता सरकार कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई लेकिन जब चरण ने इंदिरा को सत्ता सौंपी तो रुपए की सेहत थोड़ी सुधरी हुई थी। डॉलर का भाव 7.99 रुपए आ चुका था।

कांग्रेस यानी इंदिरा के सत्ता में आते ही रुपया फिर गिरने लगा। राजीव गांधी भी रुपए की सेहत सुधार नहीं पाए. बोफोर्स तोप घोटाले के चलते जब 1989 में सत्ता से बाहर हुए तो रुपया 16.93 तक पहुंच गया था। यानी 10 साल के कांग्रेस शासन में रुपए में 8.94 की गिरावट दर्ज हुई। दूसरी बार बनीं ग़ैरकांग्रेसी सरकारें भी रुपए के लिए शुभ नहीं हुईं और अवमूल्यन जारी रहा। मई 1991 में जब पीवी नरसिंह राव ने चंद्रशेखर सिंह से सत्ता ली, तब डॉलर के मुक़ाबले रुपया 20.52 पर था।

1991 में राव ने मनमोहन को वित्तमंत्री बनाकर उदारीकरण की प्रक्रिया शुरू की। उदारीकरण रुपए के लिए दिवास्वप्न साबित हुआ और अगले ही महीने ही रुपए का अभूतपूर्व अवमूल्यन हुआ और वह 25.61 तक आ गया। जब देश की जनता ने मई 1996 में कांग्रेस को सत्ता से बेदख़ल किया तो डॉलर की कीमत 35 रुपए हो चुकी थी।

कांग्रेस शासन में इकॉनमी इतनी ख़स्ताहाल हो गई थी कि एचडी देवेगौड़ा और इंद्रकुमार गुजराल रुपए को संभाल नहीं पाए। जनता दल के 22 महीने की अवधि में रुपया 4.5 कमज़ोर हुआ। गुजराल ने मार्च 1998 में अटलबिहारी बाजपेयी को सत्ता सौंपी, तब रुपया 39.57 पर था। सत्ता संभालने के दो महीने बाद ही यानी 11 और 13 मई को अटल ने परमाणु परीक्षण कर दिया, जिससे अमेरिका समेत पश्चिमी देशों ने आर्थिक प्रतिबंध लगा दिया, लेकि भारत और भारतीय रुपए ने इस प्रतिबंध को बहादुरी से झेला। परमाणु विस्फोट वाले महीने में रुपए की कीमत 40.47 थी।

बहरहाल, संकट ख़त्म होने के बाद रुपए में फिर गिरावट शुरू हो गई, जिसकी रफ़्तार थामने में सरकार असफल रही। एनडीए के रिजिम में जून 2002 में रुपया लुढ़ककर 48.98 तक आया। हालांकि बाद में रिज़र्व बैंक ने इसे संभाला और रुपए की कीमत में इज़ाफ़ा भी हुआ। अटल सरकार का पतन मई 2004 में हुआ और एक महीने पहले तक रुपया संभलकर 43.89 तक आ गया था।

सन् 2004 के चुनाव में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। सोनिया गांधी ने मनमोहन को प्रधानमंत्री बना दिया। मनमोहन कारोबारियों, खासकर शेयर बाज़ार में जुआ खेलने वाले तेजड़ियों और बिल्डरों के लिए सोने के अंडे देने वाली मुर्गी बन गए। उनके पहले कार्यकाल में जो भी रियल इस्टेट में कूदा, कुबेर बन गया। लेकिन वह रुपए का अवमूल्यन नहीं रोक पाए और उनके कार्यकाल में ही डॉलर का 50 रुपए को पार कर गया। 2009 का चुनाव आया पर बीजेपी कांग्रेस की नाकामियों को भुनाने में नाकाम रही और मनमोहन की दूसरी बार बतौर प्रधानमंत्री ताजपोशी हुई, लेकिन इस बार रुपए ने अवमूल्यन के सारे रिकॉर्ड तोड़ डाले। संभवतः देश के लोग भारतीय रुपए और अर्थ-व्यवस्था का हित चाहते थे इसीलिए मनमोहन से कहना पड़ा, प्लीज़ बस करिए, बहुत हो गया, अपनी तशरीफ़ वापस ले जाइए।

मनमोहन के नरेंद्र मोदी आए, उनके कार्यकाल में क्रूड ऑयल का भाव 116 डॉलर प्रति बैरल से गिरकर 25 डॉलर प्रति बैरल तक आ गया। इससे भारतीय रुपए पर अवमूल्यन का संकट नहीं आया। और उनके दो साल के कार्यकाल में भारतीय मुद्रा डॉलर के मुक़ाबले साठ के नीचे थी। यानी जिस दिन मोदी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली, उस दिन राजन के नेतृत्व में रुपया 58.63 पर था। मोदी सरकार की पहली सालगिरह पर 63.98 पर रहा और दूसरी सालगिरह पर 66.96 रहा। हालांकि दो साल में डॉलर आठ रुपए महंगा होना ज़्यादा है, पर यह 2013 के 68.82 के मुक़ाबले ज़्यादा नहीं लगता। यानी, राजन के नेतृत्व में रिज़र्व बैंक संतोषजनक काम कर रहा है। इसके बावजूद राजन को तीन साल में जाना पड़ रहा है।

बहरहाल, बीजेपी नेता डॉ सुब्रमण्यम स्वामी पता नहीं क्यों राजन से नाराज़ हो गए और उनके ख़िलाफ़ मोर्चा खोल लिया। उन्हें इस तरह अमेरिका भेजने की बात कर रहे थे, जैसे राजन भारतीय न होकर अमेरिकी नागरिक हों। जो भी हो बीजेपी एक बेहतरीन अर्थशास्त्री की सेवाओं से ख़ुद को वंचित कर रही है। जबकि मौजूदा दौर में सरकार को ज़रूरत थी।

मोदी सरकार के लोग दावा कर रहे हैं कि सरकार शानदार काम कर रही है, लेकिन मंदी का दौर छंटने का नाम नहीं ले रहा है। यह कमोबेश 2004 जैसा दौर है, जब अटल सरकार ‘फीलगुल’ के ज़रिए दावा कर रही थी कि सरकार अच्छा काम कर रही है, लेकिन जनता चुनाव में कनविंस्ड नहीं हुई। 2004 में कांग्रेस को सत्ता दी तो देश की एकॉनमी में बूम आ गया। इसलीए अगर अटल सरकार जैसी हालत 2019 मोदी सरकार की भी हो तो हैरान की बात नहीं होगी, क्योंकि बेहतर शासन करने के बावजूद बीजेपी विशेषज्ञों की मदद लेने में कांग्रेस जैसी परिपक्व नहीं है। शायद इसीलिए 2004 में मंदी थी और 2016 में भी मंदी है।