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शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

राजनीति बिजनेस से भी ज्यादा रिटर्न देने वाला सेक्टर

हरिगोविंद विश्वकर्मा
इस देश के सवर्णों (जनरल कैटेगरी) को लगता है कि बीजेपी और कांग्रेस जैसी पाटियां ही उनके हितों की रक्षा कर रही हैं। इसी तरह पिछड़े वर्ग (मंडलवाले) के लोगों को लगता है, महज सपा-आरजेडी और उनके जैसी दूसरी पार्टियां ही उनकी पैरोकार हैं। इसी तरह दलितों (एससी-एसटी) को लगता है कि केवल बसपा और लोजपा उनकी आवाज़ और उनके स्वाभिमान की रक्षा करती हैं। यूपी बिहार के यादवों को लगता है मुलायम-लालू उनका ही उद्धार कर रहे हैं। इसी आधार पर ये लोग अपने नेताओं के लिए किसी को भी मारने या अपमानित करने के लिए तत्पर रहते हैं। इन तमाम को नहीं पता कि ये लोग बड़ी ग़लतफ़हमी में जी रहे हैं।
दरअसल, सवर्ण हो या बैकवर्ड या फिर दलित, सभी क्राइसेस ऑफ इन्फॉरमेशन यानी अज्ञानता के शिकार हैं। एक दूसरे के ख़ून के प्यासे हो चुके इन तीनों कैटेगरीज़ के लोगों पता ही नहीं कि देश में केवल दो वर्ग है। सत्ता वर्ग और प्रजा वर्ग। सारे नेता चाहे वे जिस पार्टी के हों, सत्ता वर्ग के हैं और पार्टी लाइन से ऊपर उठकर हमेशा हर नेता दूसरे नेता को डिफेंड करता है। कोई नेता क्या है? क्या वह हमारे आपकी तरह बस और ट्रेन या रिक्शे में सफ़र करता है। नहीं, उसकी आर्थिक हैसियत पर रिसर्च करिए। तब उसका समर्थन या विरोध कीजिए।
नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं। कहते हैं, चाय बेचकर पीएम बने हैं। अपने अब तक के कार्यकाल में उन्होंने चायवालों के लिए क्या किया? प्रधानमंत्री बनते ही सबसे पहले दिल्ली कटरा (वैष्णोदेवी) के बीच श्रीशक्ति एक्सप्रेस को हरी झंडी दिखाया, जो पूरी तरह एसी ट्रेन है। आगे बुलेट ट्रेन चलाएंगे। इन सब में कितने चायवाले यात्रा करेंगे? आप सोचिए, बुलेट ट्रेन चलाने पर जितना ख़र्च आ रहा है, उससे पूरे देश के लोगों का मुफ़्त इलाज हो सकता है। उनकी जान बचाई जा सकती है, ख़ासकर उनकी जो महंगे इलाज के कारण उपचार नहीं करवा पा रहे हैं और बिना पूरा जीवन जीए मर रहे हैं। आए दिन हम सोशल नेटवर्क पर ऐसे लोगों के नाम देखते रहते हैं। खैर, मोदी ने ऐसा नहीं किया, क्योंकि वह चायवालों के नहीं सत्तावर्ग के प्रतिनिधि हैं।
दुनिया जानती है, पवार, मायावती, मुलायम-लालू, पासवान, जयललिता, करुणानिधि, ठाकरे और दूसरे ढेर सारे नेताओं ने राजनीति में आने के बाद अकूत धन बनाया। जिसका उनके ज्ञात आय के स्रोत से कोई मिलान नहीं। फिर मोदी ने किसके ख़िलाफ़ कार्रवाई की। नाम बताइए। मोदी ने तो रॉबर्ट वाड्रा तक को छोड़ दिया, जिसके ख़िलाफ़ कार्रवाई करने की बात कहकर सत्ता में आए। आप सोच रहे होंगे कि कोई कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है? तो जान लीजिए ये सभी लोग सत्तावर्ग परिवार के हैं। इन्हें पोलिटिकल फैमिली भी कह सकते हैं। एक दूसरे को बचाते हैं। इस सत्ता परिवार में तमाम मीडिया घराने के मालिक भी आते हैं, जो पत्रकारों को टूल की तरह इस्तेमाल करते हैं।
इन सत्ता-परिवार में सोनिया, मुलायम, लालू, मायावती, गडकरी, पवार, करुणानिधि, जयललिता, बादल, नीतीश, ममता, राज-उद्धव ठाकरे, सोरेन, अब्दुल्ला व मुफ्ती परिवार, गहलोत, फडनवीस, चव्हाण, पटनायक, सिंधिया, जिंदल, केजरीवाल के अलावा सभी नेता, सभी 790 सांसद, 99 फ़ीसदी विधायक हैं। हमें लगता है ये एक दूसरे के विरोधी हैं, लेकिन यक़ीन मानिए ये एक दूसरे के हितैषी हैं। इनकी मदद करते हैं सभी औद्योगिक घराने। इसके अलावा अमिताभ बच्चन, शाहरुख, सलमान, आमिर-अक्षय, तेंदुलकर, धोनी और बाक़ी खरबपति लोग भी सत्तावर्ग क्लब में शामिल हैं। इसमें दो राय नहीं कि पूरा देश महज 5 फ़ीसदी संपन्न लोगों का होकर रह गया है। वहीं लोग क़ायदे की ज़िंदगी जी रहे हैं। अंग्रेज़ों के जाने के बाद शुरुआत में जिन्हें मौक़ा मिला, उन्होंने बहुत बड़ी संपत्ति हथिया ली और वही लोग धन्नासेठ कहलाते हैं। इसी तरह जिन लोगों को नौकरियां मिलीं, उन्होंने अपने परिवार और उसके बाद क़रीबी ओर उसके बाद दूर के रिश्तेदारों को कहीं न कहीं सेट कर दिया।
ख़ूब डींग हांकी जाती है कि भारत लोकतांत्रिक देश है। यहां जनता के हित के लिए जनता के द्वारा चलाई जा रही जनता की सरकार है। अच्छा बताएं, देश और देश के लोकतंत्र में जनता की कितनी भागीदारी है? किसी को पता है, देश को कौन-कौन लोग चला रहे हैं? जो लोग देश को चला रहे हैं, वे आम आदमी के कितने हितैषी हैं? यह समझना बहुत ज़रूरी है कि इस देश में लोगों पर शासन कौन लोग कर रहे हैं? बहुत लंबे और गहन रिसर्च और अध्ययन के बाद देश में संपन्न लोगों का वर्गीकरण किया गया है।
1. बेशुमार दौलत किसके पास ?

पहली कैटेगरी
एक अरब 28 करोड़ की आबादी वाले इस देश में खरबपति (हज़ार करोड़ रुपए से ज़्यादा संपत्ति वाले) केवल 55 (पचपन) लोग हैं, जिनमें बड़े उद्योगपति, टॉप-लिस्टेड बिल्डर्स और कुछ बहुत भ्रष्ट नेता हैं। यही लोग प्रमुख राजनीतिक दलों की फंडिंग करते हैं। पूरी व्यवस्था पर एक तरह से इन्हीं का कंट्रोल है। सरकार किसी की भी रहे, इनकी कोई फाइल किसी भी मंत्रालय में नहीं रुकती। जो रोकने की कोशिश भी करता है, उसे उसके पद से हटा दिया जाता है।

दूसरी कैटेगरी
दुनिया भर में सुपररिच लोगों का हिसाब-क़िताब रखने वाली अंतरराष्ट्रीय ऐसेंजी बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप यानी बीसीजी की अभी हाल ही में आई सालाना रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में सुपररिच लोगों की संख्या तीन गुना बढ़ गई। एजेंसी ने कहा कि 100 मिलियन अमेरिकी डॉलर यानी 650+ करोड़ रुपए की संपत्ति वालों की संख्या 2013 के 284 से बढ़कर 2014 में 928 हो गई। यानी देश में मात्र 929 लोगों के पास कम से कम 650 करोड़ रुपए की संपत्ति है। इनमें इनमें उद्योगपतियों, बड़े समाचार पत्रों और चैनल्स के मालिक, बिल्डर, कारोबारी, भ्रष्ट नेता आते हैं।

तीसरी कैटेगरी
अगर व्यक्तिगत संपत्ति कम करके लगभग 200 करोड़ रुपए कर दें तो, धन्नासेठों की संख्या भी 7850 हो जाती है। इनमें उद्योगपतियों, बिल्डर, कारोबारी, भ्रष्ट नेता, अभिनेता और बड़े खिलाड़ी आते हैं। यानी इस देश में 0.0006133 फ़ीसदी लोगों के पास 200 करोड़ या उससे ज़्यादा संपत्ति है।

चौथी कैटेगरी
अगर घर की संपत्ति के अलावा बाक़ी संपत्ति को न्यूनतम 25 करोड़ रुपए कर दे, तो कोटक वेल्थ मैनेजमेंट की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक़, 2015 में भारत में सुपर रिच की संख्या 1 लाख 37 हज़ार (137100) हो गई है। यह देश की आबादी का 0.0100 फ़ीसदी है। इस वर्ग के सुपर रिच की यह संख्या 2014 में एक लाख सत्रह हज़ार थी।

पांचवी कैटेगरी
अगर घर जैसी संपत्ति को छोड़कर व्यक्तिगत संपत्ति 6 करोड़ रुपए की संपत्ति को आधार बनाएं तो बीसीजी की सालाना रिपोर्ट के अनुसार, भारत में केवल 1.75 लाख परिवारों की निजी संपत्ति क़रीब 6 करोड़ रुपये या उससे अधिक हैं। यानी इस देश में केवल 0.0150 प्रतिशत लोग ही जिन्हें सही मायने में आर्थिक रूप से सुखी और चिंतामुक्त कहा जा सकता है।

इन पांचों कैटेगरीज़ के लोग मनचाही ज़िंदगी जीते हैं। महंगाई कितनी भी बढ़ जाय इनको कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। इनके पास इतनी ज़्यादा दौलत है कि इनकी सौ पीढ़ियां भी ख़र्च नहीं कर पाएंगी। इन पर किसी संकट का असर नहीं होता। ये ठाट से 24 घंटे एसी वाली जगह रहते हैं। ये केवल प्लेन से सफ़र करते हैं। जिस संकट आप रोज़ाना दो-चार होते हैं, उससे इनका कभी सामना नहीं होता। इनके सामने रोज़ी-रोटी का संकट नहीं जो आम आदमी रोज़ाना झेलता है। ये जो दान देते हैं, या धर्म-कर्म करते हैं, वह इसलिए करते हैं ताकि इन्हें इनकम टैक्स में छूट मिले। वरना ये हमारे आपकी ओर देखना भी पसंद नहीं करते हैं।

देश की संसद पर इन्हीं का क़ब्ज़ा है। कार्यपालिका और न्यायपालिका को इन्होंने बंधक बना रखा है। इकॉनॉमी पर इनका दख़ल है। शेयर बाज़ार में यही निवेश करते हैं। मुंबई में करोड़ों रुपए के महंगे फ़्लैट ख़रीदने की हैसियत इनकी ही है। हर छोटी-बड़ी इंडस्ट्रीज़ इनके कंट्रोल में है। खेल संघों में अहम पदों पर यही हैं। छोटे-बड़े सभी संस्थानों में इनका ही वर्चस्व है। मीडिया के असली ओनर यही हैं, जहां पत्रकारों को टूल की तरह इस्तेमाल करते हैं और ज़रूरत ख़त्म होने पर दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंकते हैं। समस्याओं हल करने के लिए एसी कमरे में बैठकर यही लोग डायलॉग करते हैं।
2. बेशुमार आमदनी किसकी ?

पहली कैटेगरी
अगर सालाना कमाई को 1 करोड़ रुपए बेस मान लें तो वित्त मंत्रालय के मुताबिक, केवल 42,800 (42 हज़ार आठ सौ) लोगों की सालाना आमदनी 1 करोड़ रुपए या उससे ज़्यादा है। जो आबादी का मात्र 0.00354 फ़ीसदी है। इसमें उद्योगपति, बिल्डर, कारोबारी के साथ भ्रष्ट नौकरशाह, भ्रष्ट पुलिस अफ़सर, भ्रष्ट जज और बड़े अभिनेता और खिलाड़ी शामिल हैं। मज़ेदार बात है कि देश की कुल संपत्ति का 95 हिस्सा इन्हीं 0.00354 फ़ीसदी लोगों के पास है। यही लोकसभा, राज्यसभा और राज्य की विधानसभाओं में पहुंचने की हैसियत रखते हैं। या अपने ख़ास लोगों को फंडिंग के ज़रिए संसद-विधानसभाओं में पहुंचाते हैं, जो इनके हित के मुताबिक़ फ़ैसले लेते हैं।

दूसरी कैटेगरी
इस कैटेगरी में सत्तावर्ग के प्रति स्वामिभक्ति दिखाने वाले चमचे लोग आते हैं। इनकी सालाना कमाई 20 लाख से एक करोड़ रुपए (1.67 लाख से लेकर 8.33 लाख रुपए प्रति माह) के बीच होती है। इनकी आबादी 4.06 लाख है। ये भी आबादी का महज 0.0319 फ़ीसदी हिस्सा हैं। इस कैटेगरीज़ के लोग सत्तावर्ग के आदमी कहे जाते हैं। इनकी आबादी महज़ 0.03544 फीसदी है, जो कुल आबादी का 32वां हिस्ता नहीं बल्कि एक बत्तीसवें फ़ीसदी के आसपास है।

तीसरी कैटेगरी
इस कैटेगरी में आबादी का 0.108 फ़ीसदी हिस्सा यानी 13.78 लाख लोग आते हैं। जिनकी आमदनी 10 से 20 लाख रुपए (83 हज़ार से लेकर 1.67 लाख रुपए प्रति माह) के बीच होती है। इन पर भी महंगाई का बहुत ज़्यादा असर नहीं होता है। इस वर्ग के क़रीब 95 फ़ीसदी लोग सत्ता परिवार की ओर झुके रहते हैं। यानी उनकी दलाली या चमचागिरी करते हैं। बदले में इन्हें अच्छा जीवन जीने की गारंटी मिलती है।

चौथी कैटेगरी
इस कैटेगरी की संख्या 17.88 लाख है, जो आबादी का 0.140 फ़ीसदी है। ये हर साल 5 से 10 लाख रुपए (क़रीब 42 हज़ार से लेकर 83 हज़ार रुपए प्रति माह) की कमाई करते हैं। ये मध्यम वर्ग के आदमी कहे जाते हैं। इसमें हमारे आप के बीच के अच्छा सेलरी वाले सीनियर पत्रकार भी आते हैं। इस वर्ग के 90 फ़ीसदी से ज़्यादा लोग यथास्थितिवादी होते हैं। परिवार पालने या दूसरी मज़बूरियों के चलते ज़मीर से समझौता करके सत्ता वर्ग की हां में हां मिलाते हैं और फ़ेसबुक या दूसरी सोशल नेटवर्किंग साइट पर अपनी जमात यानी आम आदमी को ख़ूब गाली देते हैं या उसकी आलोचना करते हैं। पेट पालने की मज़बूरी में ये समाज का भला करने वालों के ख़िलाफ़ माहौल बनाते हैं।

इन चारों कैटेगरीज़ को मिला दीजिए, तो कुल 0.28344 फ़ीसदी होता है. यह आबादी का आधा फ़ीसदी भी नहीं है। यानी मुट्ठी भर लोग देश को चलाते या उनका समर्थन करते हैं। अब सोचिए, इस देश में इंसान की तरह रहने वालों की संख्या कितनी कम है।

पांचवीं कैटेगरी
सालाना कमाई को और कम करें तो कितने भयावह आंकड़े आते हैं, यह देखिए...
आमदनी की पांचवी कैटेगरी के लोगों की आमदनी 1.80 लाख से 5 लाख रुपए (15 हजार से क़रीब 42 हज़ार रुपए प्रति माह) के बीच होती हैं। टैक्स देने वालों में ये सबसे नीचे हैं। इन्हें लोअर मिडिल क्लास कहे जाते हैं जिनकी जनसंख्या 2 करोड़ 88 लाख से ज़्यादा है। यह कुल आबादी का 2.271 फ़ीसदी है।

पूरे देश में टेक्सपेयर्स की कुल संख्या 2016 के बजट के अनुसार 4 फ़ीसदी यानी 5 करोड़ 16 लाख है। यानी जितने संपन्न हैं सब इसी में हैं।रिटर्न फाइल करने वाले टैक्‍सपेयर्स में से 54 फीसदी (2.78 करोड़) के ऊपर जीरो टैक्‍स दिया। यानी ये बॉर्डर पर रह गए। यानी असली टैक्स देने वाले केवल 46 फ़ीसदी यानी 2 करोड़ 37 लाख लोग हैं। इनकी आबादी 2 फ़ीसदी भी नहीं है। बहरहाल, इन 2 फ़ीसदी लोगो पर आश्रित व्यक्तियों को भी जोड़ दिया जाए तो बमुश्किल 5 फ़ीसदी होता है। यानी महज 5 फ़ीसदी लोग इंसान की तरह रहते हैं। बाक़ी लोग जीवन के लिए संघर्ष करते हैं।
3. इनके हिस्से कुछ भी नहीं आया?
आइए उनकी बात करे जिनके हिस्से कुछ भी नहीं आया।

पहली कैटेगरी
इस कैटेगरी में देश की 27 करोड़ आबादी आती है। इन्हें रोज़ाना दो डॉलर यानी 130 से 135 रुपए मजदूरी मिलती है। ये लोअर मज़दूर वर्ग के लोग हैं इनकी सालाना आमदनी 50 हज़ार से ज़्यादा नहीं होती। इनकी तादाद 23.3 यानी क़री-क़रीब एक चौथाई आबादी अपना ख़ून पसीना बहाने का बावजूद महज 130 रुपए रोज़ पाती है।

दूसरी कैटेरगी
इस कैटेगरी में मनरेगा के तहत न्यूनतम 100 दिन काम पाने वाले लोग भी आते हैं, जिन्हें दैनिक मज़दूरी 174 रुपए मिलती है। इऩकी सालाना आमदनी 16 हज़ार से 1 लाख 80 हज़ार रुपए (क़रीब 14 सौ रुपए से लेकर 15 हज़ार रुपए प्रति माह) होती है। ये बड़ी मुश्किल से पेट पाल पाते हैं और प्रलोभन दिए जाने पर अपराध की दुनिया में उतर जाते हैं। इस कैटेगरी में 49 करोड़ 69 लाख 60 हजार लोग काम करने वाले हैं। इनकी आबादी आबादी का 38.82 फ़ीसदी है। इनमें ज़्यादातर दिहाड़ी मज़दूर हैं। अस्थाई ड्राइवर और छोटा-मोटा काम करने वाले हैं।

तीसरी कैटेगरी
इस कैटेगरी के लोग कुछ भी नहीं करते। यानी बेरोज़गार हैं। इंटनैशनल लेबर ऑर्गनाइज़ेशन की ग्लोबल इंप्लॉयमेंट ट्रेंड 2014 की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 4 करोड़ 56 लाख पंजीकृत बेरोज़गार हैं। यानी आबादी के 3.8 फ़ीसदी हिस्से के पास काम ही नहीं है। ये अपने माता-पिता या संरक्षक पर निर्भर होते हैं। इनका जीवन संकटपूर्ण होता है। बड़ी मुश्किल से पेट पाल पाते हैं और प्रलोभन दिए जाने पर अपराध की दुनिया में उतर जाते हैं। अपराध, नक्सलाइट या आतंकवाद की दुनिया में आने वाले 99 फ़ीसदी इसी कैटेगरी के होते हैं।
4. क्या है नौकरियों की हक़ीक़त ?
नौकरी में जिस आरक्षण ने देश के युवकों को अगड़े-पिछड़े या हिंदू-मुस्लिम के नाम पर आपस में लड़ा रहा है, उसकी हालत देखिए। इंडियन इकॉनमी में नौकरी की औक़ात केवल 2.3 फ़ीसदी है। यानी महज़ 2.3 फ़ीसदी के लिए युवक धर्म, जाति, क्षेत्र, भाषा और नस्ल के नाम पर बंटे हैं। इस नौकरी की संख्या महज 2.96 करोड़ है। यानी देश में कुल 2 करोड़ 96 लाख 50 हज़ार लोग ही ठीकठाक नौकरी करते हैं। यानी देश के युवकों की नज़र 97.7 फ़ीसदी हिस्से पर न होकर महज 2.3 फ़ीसदी हिस्से पर है।

बहरहाल, 2.96 करोड़ सेलरीड लोगों में 2 करोड़ लोग केंद्र सरकार, सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों की नौकरी के अलावा बैंक और दूसरे सावर्जनिक उपक्रम में काम करते हैं। केंद्र सरकार के पास 47 लाख कर्मचारी और 52 लाख पेंशन पाने वाले रिटायर्ड लोग हैं। अकेले भारतीय रेलवे में 13 लाख 34 हज़ार कर्मचारी हैं। अभी जो पे कमिशन लागू हुआ, उसका फायदा इन्हीं एक करोड़ कर्मियों को मिलेगा। ये लोग मुफ़्त की तनख्वाह लेते हैं। काम कुछ नहीं करते।

इसी तरह प्राइवेट सेक्टर में 96 लाख लोग नौकरी करते हैं। जिनमें 50 सबसे बड़ी निज़ी कंपनियों में बमुश्किल 10 लाख लोगों को नौकरी मिली हुई है। बाक़ी 86 लाख लोग छोटी-छोटी कंपनियों में काम करते हैं, जहां कंपनियां जब चाहें, उन्हें नौकरी से निकाल दें।

भारतीय बैंकों में कुल 11 लाख 51 हज़ार (पब्लिक सेक्टर बैंकों में 8 लाख 30 हजार, निजी बैंकों में 2 लाख 96 हज़ार और विदेशी बैंकों में क़रीब 25 हज़ार) कर्मचारी हैं। बैंको में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने सबसे ज़्यादा 1 लाख 98 हज़ार लोगों को नौकरी दे रखी है। इसी तरह देश की सबसे बड़ी कंपनी रिलांयस इंडस्ट्रीज़ में कुल 24,930 कर्मचारी हैं। अनिल अंबानी की रिलायंस ने अपनी बेवसाइट पर कर्मचारियों की संख्या नहीं लिखी है, परंतु माना जा रहा है कि कंपनी ने अपनी सभी कंपनियों में 20 हजार स्टॉफ रखे हैं। टाटा का कारोबार 100 से ज़्यादा देशों में हैं, इसकी बेवसाइट के मुताबिक़ समूह में 6 लाख कर्मचारी हैं। टाटा ने कितने भारतीयों को नौकरी दी है, इसकी ब्यौरा छुपा लिया है। विशेषज्ञों के मुताब़िक कंपनी ने 35 हज़ार भारतीय नागरिकों को नौकरी दी है।
देश के सबसे बड़े प्रकाशन समूह टाइम्स ऑफ इंडिया ने 11000 लोगों को नौकरी दी है। सबसे बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी माइक्रोसॉफ्ट है, जिसने पूरी दुनिया में एक लाख 18 हज़ार लोगों को नौकरी दी है। भारत में इसके पांच हज़ार से भी कम कर्मचारी हैं, जबकि भारत में सबसे ज़्यादा कमाई करती है। दूसरी सबसे बड़ी कंपनी अमेरिका की आईबीएम में 73 हज़ार कर्मचारी हैं। हिंदुस्तान यूनीलीवर के यहां 18000 लोग नौकरी करते हैं। नेस्ले कंपनी के पांचों मैगी प्लांट्स में 1500 लोग काम करते हैं और कंपनी हर साल 500 करोड़ रुपए मुनाफा कमाती है। इसी तरह सबसे बड़ी मोबाइल कंपनी वोडाफोन इंडिया के पास 11500 कर्मचारी हैं और यह कंपनी भारत से हर साल 20 हज़ार करोड़ कमाकर अपने देश भेजती है।
प्रजावर्ग की आबादी का 95 फ़ीसदी है। ये अनाज की बोरी की तरह ट्रेन में ठुंसने वाले लोग होते हैं। इनके न तो पैदा होने की नोटिस ली जाती है न ही मरने की। लोकतंत्र, लोकतंत्र के स्तंभ- कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका और मीडिया, तमाम व्यवस्थाएं- शासन-तंत्र, पुलिस, बैंक, सभी योजनाएं इनके लिए बेमानी हैं। चाहे साबित हो या न हो, पर पूरा देश जान गया है कि सत्ता के शिखर पर बैठे लोग महाभ्रष्ट हैं। ख़ुलेआम लूट रहे हैं। लूटमारी के धंधे में कोई नेता किसी से कम नहीं है। ये इतने निरंकुश हैं कि इन्हें अपने किए पर ज़रा भी पछतावा नहीं है। इनकी छांव में फल-फूल रहे, इनके चमचे, इन भ्रष्टों का बेखौफ़ होकर बचाव करते हैं। भारतीय क़ानून में बचाव-पक्ष को दिए जाने वाले मौक़े का नाजायज़ तरीक़े से दुरुपयोग कर रहे हैं।
दरअसल, क़ुदरत ने जो दिया है वह समस्त देशवासियों के लिए पर्याप्त है। लेकिन सत्ता में बैठे लालची लोगों ने आम लोगों के हिस्से के रिसोर्सेज़ पर भी क़ब्ज़ा कर लिया है। रूलिंग क्लास ने आम लोगों का हक़ मारने का सामाजिक और नैतिक अपराध किया है। लिहाज़ा इनके साथ अपराधियों की तरह सलूक किया जाना चाहिए। इनके लिए दंड निर्धारित किया जाना चाहिए।

बुधवार, 20 जुलाई 2016

क्यों अमेरिकी युवाओं को पसंद आ रहे हैं डोनाल्‍ड ट्रंप? क्या अमेरिकी जनता भारत की तरह सोचने लगी ?

हरिगोविंद विश्वकर्मा
दुनिया भर के मुसलमानों और दूसरे समुदाय के लोगों के ख़िलाफ़ खुलेआम ज़हर उगलने और अमेरिका में उन्हें अस्थाई रूप से न घुसने देने का आह्वान करने वाले अमेरिका के खरबपति उद्योपति डोनाल्ड जॉन ट्रंप जब से रिपब्लिकन पार्टी की ओर से देश के 45वें राष्ट्रपति के लिए उम्मीदवार बनाए गए हैं, हर जगह एक ही चर्चा है, क्या वाक़ई ट्रंप की तरह कथिततौर पर ख़तरनाक सोच वाला व्यक्ति दुनिया का सबसे ताकतवर आदमी बनकर ह्वाइट हाऊस पर क़ाबिज़ हो जाएगा?

कई लोग तो डोनाल्ड ट्रंप को उम्मीदवार बनाए जाने से ही हैरान हैं। ऐसे लोग ट्रंप को जिद्दी, सिरफिरा और अनाप-शनाप बोलनेवाला करार देते हुए कहते हैं कि पैसे का भरपूर उपयोग करके ट्रंप ने अमेरिका की जनता को पूरी तरह भ्रमित कर दिया। इतना ही नहीं, ट्रंप का विरोध करने वाले यह भी मानते हैं कि अमेरिकियों ने इस बार कथिततौर पर एक अलोकतांत्रिक और असभ्य से व्यक्ति को राष्ट्रपति पद के लायक मान लिया है। बहरहाल, ट्रंप का मुक़ाबला डैमोक्रेटिक पार्टी की तरफ से राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार और पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की पत्नी हिलेरी क्लिंटन से हो रहा।

धरती के सबसे शक्तिशाली पद के लिए हो रहे चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप को जिस तरह से अमेरिकी जनता, ख़ासकर युवाओं का समर्थन मिल रहा है, वह 2014 में नरेंद्र मोदी के चुनाव प्रचार की याद दिला रहा है, जब दो ढाई साल पहले सेक्यूलर पॉलिटिक्स करने वाली ताकतों की हर संभव कोशिश के बावजूद गठबंधन के दौर में भारत के मतदाताओं ने भारतीय जनता पार्टी को 282 सीटों का स्पष्ट बहुमत का तोहफा दे दिया था, जिसके बाद कथिततौर पर सांप्रदायिक, तानाशह और मौत के सौदागर नरेंद्र मोदी देख के प्रधानमंत्री बने थे।

दरअसल, किसी भी विचारधारा को आम लोगों पर जब कुछ ज़्यादा ही थोपा जाने लगता है, तब एक समय के बाद लोगों को संदेह होने लगता है और उन्हें लगने लगता है, यह तो कुछ ज़्यादा ही हो रहा है। यही 2002 के बाद तीन बार विधानसभा चुनाव में गुजरात में हुआ। जब सेक्यूलर पॉलिटिक्स करने वाले
नरेंद्र मोदी को तानाशाह, हत्यारा, मौत का सौदागर वगैरह कहने लगे थे। सबसे बड़ी बात पहले तो जनता को लगा कि मोदी ने ज़रूर ग़लत किया, लेकिन यह जुमला इतना ज़्यादा उछाला गया कि लोगों को लगा कि इसमें वेस्टेड इंटरेस्ट है। बस क्या था मोदी का विरोध करने वाले ही हाशिए पर चले गए। मज़ेदार बात यह रही कि जब मोदी का विरोध कम होने की बजाय राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ने लगा, तब देश की जनता ने मोदी को प्रधानमंत्री बना दिया।

कहना न होगा, अब भारत के हालात अमेरिका में दोहराए जा रहे हैं। सेक्यूलर जमात के लोग आतंकवाद का उस स्तर पर विरोध नहीं करते और झट से कह देते हैं कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। लेकिन सारे आतंकवादी एक ही धर्म के प्रॉडक्ट क्यों हैं, इस सवाल पर चुप्पी साध जाते हैं। चूंकि आतंकवाद भले अमेरिका ने पैदा किया हो, लेकिन हाल के सालों में अमेरिकी जनता आतंकवाद की बड़ी विक्टिम रही है। इसीलिए उसे ट्रंप का मुस्लिम विरोध अच्छा लग रहा है। इसीलिए अमेरिकी जनता भी आजकल वैसा ही सोच रही है, जैसा पिछले आम चुनाव में भारत की जनता सोच रही थी।

गौर करने वाली बात है कि डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन कुछ दिन पहले तक अपनी जीत के प्रति पूरी तरह आश्वस्त थीं। लेकिन अब वह बिलकुल नहीं हैं। यानी इस डेमोक्रेट प्रत्याशी को अब पक्के तौर पर नहीं लग रहा है कि वह ट्रंप को हरा पाएंगी। दरअसल, हिलेरी को लगता है कि वह नहीं जीतेंगी क्योंकि ट्रंप कथित तौर पर अपने सिरफिरेपन के कारण अमेरिकियों पर छा गए हैं। हिलेरी की चिंता के पीछे उनके देश का मौजूदा रवैया एक वजह है। चुनाव में ट्रंप अपने बड़बोलेपन के कारण आम अमेरिकियों पर छा से गए हैं। अमेरिका में मुस्लिमों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने, देश में सतर्कता बढ़ाए जाने एवं ‘कट्टरपंथ इस्लामी आतंकवादी’ को कुचलने का ट्रंप की जुमला आम अमेरिकियों को ज़्यादा बेहतर लग रहा है।

अगर ट्रंप को मिल रहे समर्थन की बात करें तो अमेरिका को चीन से भी बड़ी चिंता है। इसके अलावा यूरोप में शरणार्थियों का बोझ कब अमेरिकियों के सिर पर न आ जाए, यह डर भी है। ऐसे में अमेरिकी जनता ऐसा नेता खोज रही थी जो कूटनीति में नहीं, धमकियों से बात करे। जो हर बात पर ‘सिर फोड़ देंगे’, ‘धक्के देकर बाहर निकाल देंगे’, ‘उठाकर पटक देंगे’, ‘मारकर भगा देंगे’ वाली भाषा बोले जो बहुतों को अच्छी भी लगती है। ट्रंप इस सांचे में एकदम फिट बैठ रहे हैं। कई लोगों को लगता है कि अगर ट्रंप राष्ट्रपति बन गए तो अमेरिका शांति का दूत नहीं, धौंस देने वाल देश बन जाएगा।

दरअसल, अमेरिका के ओरलैंडो में आतंकी वारदात के बाद ट्रंप ज़्यादा मुखर हो गए हैं। ओरलैंडो शूटआउट पर उन्होंने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। ट्रंप ने साफ़-साफ कहा था, ‘‘ओरलैंडो के गे क्लब पर फायरिंग करने वाले अफगान मूल के बंदूकधारी उमर मतीन ने हत्याओं को अंजाम देते समय ‘अल्ला हो अकबर’ कहा था। इसमें 50 से अधिक लोगों की मौत हो गई। ट्रंप ने एक चुनावी रैली में कहा, “इन हत्यारों को यहां अमेरिका में नहीं होना चाहिए। हमारे समक्ष कट्टरपंथी इस्लामी आतंकवाद की समस्या है।“

वैसे पिछले दौ दशक से दुनिया भर में हो रही आतंकवादी वारदात से अमेरिकी जनता भी तंग आ चुकी है। 2001 में दुनिया से सबसे क्रूरतम आतंकी हमले की गवाह रही अमेरिकी जनता आतंकवाद ख़ासकर इस्लामिक स्टेट ऑफ़ इराक ऐंड सीरिया (आईएसआईएस) से सुरक्षा को लेकर बहुत आश्वस्त नहीं है। इस आतंकी संगठन में जिस तरह एजुकेटेड मुस्लिम यूथ शामिल हो रहे हैं, इससे अमेरिकी जनता को लगता है कि ख़तरा सिर पर सवार है। अमेरिका के लोग आशंकित रहते हैं कि न जाने कहां और कब आईएस का हमला हो जाए। इसीलिए अमेरिकी मतदाताओं की पसंद नरम हिलेरी की बजाय गरम ट्रंप हैं।

अमेरिका को सबसे गहरी चोट देने वाले आतंकवादी ओसामा बिन लादेन को मार गिराने वाले राष्ट्रपति बराक ओबामा ने हालांकि अपने कार्यकाल में अच्छी नीतियां बनाईं पर इतनी अच्छी नहीं कि अमेरिका पुरानी ऊंचाइयों को छू सके। अमेरिकी जनता अपने वर्तमान और भविष्य को लेकर चिंता में डूबी है। ट्रंप चुनावी रैलियों में कह रहे हैं कि वह अमेरिका की खोई चमक फिर से लौटाएंगे। दो टूक शब्दों में कहते है, ‘‘हम सीरिया से लोगों को आने नहीं दे सकते और इसे तत्काल रोका जाएगा। हमारे देश में हज़ारों लोग आ रहे हैं। हमें नहीं मालूम कि कौन हैं। कोई कागजात नहीं हैं।"

अमेरिका में गैरक़ानूनी रूप से रहने वालों के लिए भी डोनाल्ड ट्रंप की सीधी योजना है - निर्वासन। वह कहते हैं, दो साल में यह काम पूरा हो जाएगा। बहरहाल, सीमा मामलों के अधिकारी कहते हैं- कुछ समय पहले ही साल भर में क़रीब चार लाख लोगों को निर्वासित किया गया था। बहरहाल, ट्रंप की नीति पर बहस शुरू हो गई है कि अमेरिका में अवैध रूप से रह रहे 1.1 करोड़ लोगों को वह कैसे निकालेंगे और मैक्सिको की 1609 किलोमीटर लंबी सीमा पर दीवार कैसे बनाएंगे? डोनाल्ड ट्रंप को लोगों का और पार्टी के उन मतदाताओं का अच्छा समर्थन मिल रहा है।

डोनाल्ड ट्रंप मुस्लिमों का अमेरिका में प्रवेश प्रतिबंधित करने और अवैध प्रवासियों को देश से बाहर निकालने का अपने रूख को बार बार दोहरा रहे हैं।  रिपब्लिकन पार्टी की ओर से उम्मीदवार बनने के बाद ट्रंप ने एक रैली में अपने विवादास्पद भाषण को वापस लेने से इंकार कर दिया। सीएनएन के साथ साक्षात्कार में, ट्रंप ने इतना ज़रूर कहा, “मुस्लिमों का अमेरिका में प्रवेश अस्थायी तौर पर रोकने वाले बयान वापस नहीं लिया। दृढ़ रूख अख्तियार करते हुए ट्रंप ने कहा कि वह इससे उन्हें खुदको नुकसान भी पहुंचे, तो भी वह इसकी परवाह नहीं करते। इसी के साथ, उन्होंने कहा कि वह आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ने में मुस्लिम देशों के साथ मिलकर काम करेंगे। ट्रंप ने यह तर्क भी दिया कि इसकी जिम्मेदारी पहले उन देशों पर है।

न्यूयॉर्क टाइम्स और सीबीएस न्यूज के पोल बताते हैं कि ट्रंप को मतदाता पसंद कर रहे हैं और उन्हें राष्ट्रपति के तौर पर उन्हें ही देखना चाहते हैं। 76 वर्षीय रिटायर टीचर डेलोर्स स्टॉकेट कहते हैं, मैं ट्रंप का सहयोग करूंगा, क्योंकि अगर आप विकल्प के तौर पर बाहरी व्यक्ति को लाते हैं, तो वह कम अनुकूल रहेगा। वैकल्पिक व्यक्ति में यह जरूरी नहीं कि उसके विचार भी हमारी तरह हों या फिर वह हमारी बातों से सहमत हो। डोनाल्ड ट्रंप के बारे में सीएनएन ने कुछ दिन पूर्व विश्व के विभिन्न देशों के कई लोगों से बात की, जिसमें जहां मुस्लिम दशों के लोग चाहते हैं कि ट्रंप राष्ट्रपति न बने जबकि इस्लामिक आतंकवाद से पीड़ित लोगों ने एक स्वर से ट्रंप को हिलेरी क्लिंटन से बेहतर उम्मीदवार करार दिया है। लोग मान रहे हैं कि ट्रंप आतंकवाद के मुकाबले ताकतवर साबित होंगे। हालांकि लंदन की फैशन की दुनिया में जुड़े सीमन मार्टिन कहते हैं कि यदि ट्रंप राष्ट्रपति चुने गए तो उनका मानवजाति से विश्वास समाप्त हो जाएगा।


अलविदा ड्रिबलिंग के बादशाह मोहम्मद शाहिद...

अलविदा ड्रिबलिंग के बादशाह मोहम्मद शाहिद...

हरिगोविंद विश्वकर्मा
दुनिया भर में अपनी ‘ड्रिबलिंग’ का लोहा मनवाने वाले दिग्गज खिलाड़ी मोहम्मद शाहिद जैसा खिलाड़ी भारतीय हॉकी में शायद ही देखने को मिले। शाहिद को लेफ़्ट इन पोजिशन पर खेलने वाला भारत का सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी माना जाता है। हॉकी की दुनिया में उन्हें ड्रिब्लिंग का बादशाह भी कहा जाता था। ज़फर इक़बाल के साथ भारत की अग्रिम पंक्ति में उनकी जोड़ी से हर प्रतिद्वंद्वी टीम थर्राती थी। हॉकी में उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें 1981 में पद्मश्री से सम्मानित किया था। उसी साल उन्हें अर्जुन पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था।

इस पूर्व भारतीय हॉकी कप्तान का लंबी बीमारी के बाद आज (20 जुलाई 2016) गुड़गांव के मेदांता अस्पताल में निधन हो गया। मैं जब बनारस में यूएनआई का ब्यूरो चीफ़ था तब मेरे सहकर्मी फोटोग्राफर विजय यादव मुझे शाहिद से मिलवाने उनके घर ले गए थे। इसके बाद शाहिद अकसर दशाश्वमेध घाट पर आते और मेरी उनसे मुलाक़ात होती थी।

वाराणसी में 14 अप्रैल 1960 को जन्मे शाहिद किशोरावस्था से ज़बरदस्त क्रिकेट खेलते थे। इसीलिए उन्हें 1979 में फ्रांस में महज़ 19 साल की उम्र में जूनियर हॉकी विश्वकप में बतौर फॉरवर्ड खिलाड़ी देश का प्रतिनिधित्व करने का मौक़ा मिला। उनकी प्रतिभा को देखकर फौरन उन्हें सीनियर टीम में ले लिया गया और भास्करन के नेतृत्व में उन्हों मास्को ओलिंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया। उस बार भारत आख़िरी बार ओलंपिक खेल में गोल्ड मेडल जीता था। भारत ने मॉस्को ओलंपिक के बाद ओलंपिक में पदक नहीं जीता। 1982 और 1986 एशियाड खेलों में सिल्वर और ब्रॉन्ज मेडल दिलाने में इस खिलाड़ी की अहम भूमिका रही थी।

शाहिद ने अपने 11 साल के इंटरनेशनल हॉकी करियर के दौरान कुल 167 मैच खेले और 66 गोल किये। उनका करियर वर्ष 1980 से लेकर 1990 तक चला। अपने जादुई खेल से विपक्षी रक्षापंक्ति को परेशान करने वाले बनारस के इस खिलाड़ी ने चैंपियंस ट्राफी में पाकिस्‍तान के खिलाफ वर्ष 1980 में करियर का आगाज किया और आखिरी मैच 1990 के बीजिंग एशियाड में प्रबल प्रतिद्वंद्वी पाकिस्‍तान के खिलाफ ही खेला।

हालांकि 1980 के बाद 1984 के लॉस एंजेलिस और 1988 के सियोल ओलंपिक में भी मोहम्मद शाहिद ने भारत का प्रतिनिधित्व किया। शाहिद अपनी कप्‍तानी में टीम को प्रतिष्ठित अजलान शाह कप में भी स्‍वर्ण पदक दिला चुके हैं। 1985 में मलेशिया के इपोह शहर में अजलान शाह कप में शाहिद टीम के कप्‍तान थे और भारत ने इसमें गोल्‍ड जीता था। वर्ष 1986 में भारत-पाकिस्तान की टेस्‍ट सीरीज में भी भारत ने जीत हासिल की और शाहिद इस दौरान भारतीय टीम के कप्‍तान थे।


पेट में दर्द की शिकायत पर उन्हें 29 जून को वाराणसी के सर सुंदरलाल अस्पताल में दाखिल कराया गया था। वहां हालत न सुधरने पर उन्हें एयरलिफ्ट करके गुड़गांव के मेदांता मेडिसिटी अस्पताल में दाखिल कराया गया। उनका लीवर ट्रांसप्लांट किया जाना था लेकिन किडनी के काम न करने के कारण ट्रांसप्लांट भी संभव नहीं हो पा रहा था। पिछले कुछ दिनों से उनके डायलिसिस की प्रक्रिया चल रही थी। आईसीयू में भर्ती शाहिद ने बुधवार को आखिरी सांस ली। अस्पताल में उनके साथ उनकी पत्नी परवीन शाहिद, बेटी हिना, बेटा मोहम्मद सैफ और परिवार के अन्य लोग उपस्थित रहे।


मास्को ओलंपिक में उनके साथ खेल चुके एमके कौशिक ने कहा कि अंतिम समय तक उन्होंने जिंदादिली नहीं छोड़ी। कौशिक ने मास्को ओलंपिक की यादों को ताजा करते हुए कहा कि वह 1980 में काफी युवा था और हम उससे सीनियर थे। वह सभी का सम्मान करता और खूब हंसी मजाक करता लेकिन इसका पूरा ध्यान रखता कि कोई आहत ना हो। उसके ड्रिबलिंग कौशल ने भारत को स्वर्ण पदक जिताने में मदद की और पूरी दुनिया ने उसके फन का लोहा माना। पेनल्टी कार्नर बनाने से लेकर गोल करने तक में उसका कोई सानी नहीं था।

विश्व कप 1975 में भारत की खिताबी जीत के नायक और मेजर ध्यानचंद के बेटे अशोक कुमार ने उन्हें अपने दौर में दुनिया के तीन सर्वश्रेष्ठ ड्रिबलरों में शुमार किया। अशोक कुमार ने कहा कि लखनऊ होस्टल के दिनों में ही शाहिद को देखकर उन्हें अनुमान हो गया था कि यह भारत के महानतम खिलाड़ियों में से एक होगा। उन्होंने कहा कि उस दौर में यानी ध्यानचंद के बाद के दौर में इनामुर रहमान और पाकिस्तान के शहनाज शेख के अलावा किसी को ड्रिबल के लिये जाना गया तो वह शाहिद थे।

उन्होंने ये भी कहा कि मैं शाहिद को लखनउ होस्टल के दिनों से जानता था जब हम इंडियन एयरलाइंस के सालाना शिविर के लिये केडी सिंह बाबू स्टेडियम जाते थे। मैं युवा लड़कों के साथ अभ्यास करना पसंद करता था जिनमें से शाहिद एक था। उसका खेल इतनी कम उम्र में भी सीनियर खिलाड़ियों की तरह था और मैं तभी समझ गया था कि एक दिन यह भारत के महानतम खिलाड़ियों में से एक होगा।



गुरुवार, 14 जुलाई 2016

आबादी 136 करोड़ के पार गई - भारत को “हम दो हमारा कोई नहीं” स्कीम की जरूरत

हरिगोविंद विश्वकर्मा


12 अप्रैल 2019 की सुबह जनसंख्या इंडेक्स से पता चला कि भारत की जनसंख्या एक अरब छत्तीस करोड़ (136 करोड़) हो गई। इतनी बड़ी आबादी को रोटी-कपड़ा-मकान के अलावा स्वास्थ्य-शिक्षा और रोज़गार दिलाना किसी भी सरकार के लिए असंभव है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपना कार्यकाल पूरा कर रहे हैं, लेकिन जनसंख्या का मसाइल उनके एजेंडा में ही नहीं था। पिछले पांच साल के दौरान सरकार ने अनगिनत योजनाओं की घोषणा की लेकिन उनमें एक भी ऐसी योजना नहीं है, जो सुरसा के मुंह की तरह दिन दूना रात चौगुना बढ़ रही आबादी पर अंकुश लगाए। लोग हैं कि चंद्रगुप्त मौर्य की तरह अपने “साम्राज्य की रक्षा” के लिए तीन-तीन चार-चार उत्तराधिकारी पैदा किए जा रहे हैं। जिससे देश की आबादी हर घंटे क़रीब दो हज़ार बढ़ जाती है। इससे हर जगह अव्यवस्था का आलम है, चाहे वह ट्रेन हो, बस हो या फिर मकान। हर जगह भारी भीड़। कह सकते हैं कि जनसंख्या वृद्धि न केवल सारी योजनाओं पर पानी फेर रही है। हिंदुस्तानियों को का जीवन जानवर जैसा बना दिया है।


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जो लोग कभी विदेश, ख़ासकर यूरोप या अमेरिकी देशों की यात्रा पर करते हैं और वहां लोगों का जीवन देखकर हैरान होते हैं। कहीं कोई भीड़ नहीं – बसों में पर्याप्त जगह, ट्रेन में हर समय टिकट और सीट उपलब्ध, पार्क या टूरिस्ट स्पॉट पर आराम से बैठने, मस्ती करने की जगह और माहौल। यह देखकर मन में सवाल उठता है कि, भारत में ये सुविधाएं क्यों नहीं। अगले पल जवाब मिल जाता है, सुविधाएं तो भरपूर हैं, लेकिन यहां ज़्यादा बच्चे पैदा करने वालों ने नरक मचा कर रखा है। आज़ादी के बाद इतने बच्चे पैदा किए गए कि देश का नागरिक क्रॉउड में तब्दील हो गया। भीड़ के चलते बस में चढ़ना मुश्किल, इतनी ट्रेनें बढ़ाई जा रही हैं, फिर भी कनफर्म्ड टिकट नहीं मिलता। कहीं नौकरी की एकाध जगह का ऐड छपा नहीं, कि हज़ारों बेरोज़गार युवक लाइन लगा लेते हैं। मतलब हर जगह भीड़ ही भीड़, पशुओं की तरह मारामारी है। जनसंख्या बढ़ोतरी के कारण इस देश में नागरिक इंसान न होकर पशु जैसा हो गया है।
इसमें दो राय नहीं कि देश में जनसंख्या विस्फोट सभी समस्याओं की जननी बन गई है। ग़रीबी, कुपोषण, भुखमरी, बेरोज़गारी, निरक्षरता, बढ़ते अपराध, आतंकवाद, पुअर हेल्थकेयर, धार्मिक उन्माद, कट्टरता और शिक्षण संस्थानों में दाख़िला जैसी समस्याएं आबादी विस्फोट की नाभि से ही निकलकर समाज को बीमार और परेशान कर रही हैं। केवल जनसंख्या ही अकेले दम पर सभी योजनाओं, नीतियों और प्रोग्राम्स की हवा निकाल रही है। यह सुरसा बनकर मानव कल्याण के हर फ़ैसले को अप्रभावी बना रही है। लिहाज़ा, जनसंख्या वृद्धि को देश की सबसे बड़ी समस्या मानते हुए, सबसे पहले इससे निपटने का विकल्प या समाधान तलाशा जाना चाहिए।
इस क्रम में थोक के भाव बच्चे पैदा करने वालों, चाहे वे किसी धर्म या मजहब के हों, पर अंकुश लगाना बहुत ज़रूरी है। जब तक बच्चे पैदा करने वालों के मन में भय पैदा नहीं किया जाएगा, आबादी पर अंकुश मुमकिन नहीं। बच्चे पैदा करने से रोकने के लिए दस-बीस साल के लिए चीन जैसा कठोर क़ानून बनाना होगा। ऐसे कड़े क़ानून, जो जनसंख्या पर अंकुश लगाया जा सके। सबसे पहले हम दो हमारे दो की नीति पर सख़्ती से अमल करना होगा। तीसरी संतान पैदा करने वालों को सामाजिक अपराध का दोषी मानने और उन्हें जेल भेजने का प्रावधान करना होगा। जो सरकारी कर्मचारी तीसरी संतान पैदा करें, उन्हें फ़ौरन नौकरी से बर्खास्त करने का भी प्रावधान करने की ज़रूरत है। जब तक ऐसे क़दम नहीं उठाए गए, तो यह सिलसिला नहीं थमेगा।

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देश में ऐसी नीति की दरकार है, जिससे केवल दो बच्चे पैदा करने वाले प्रोत्साहित किए जा सकें। जिनके पास केवल एक बच्चा है, उन्हें और ज़्यादा प्रोत्साहन देने की ज़रूरत है। जिनके पास केवल एक बेटी है, उन्हें पक्के तौर पर सरकारी नौकरी देने का प्रावधान होना चाहिए। खेती तो दूर की बात इंसान के रहने के लिए ही जगह कम न पड़ने लगे, इस बात को ध्यान में रखकर “हम दो हमारे दो” के साथ साथ “हम दो हमारा एक” और “हम दो हमारा कोई नहीं” जैसी योजनाएं शुरू करने की ज़रूरत है। हम दो हमारा कोई नहीं का मतलब निःसंतान रहना नहीं, बल्कि जिन्होंने कोई बच्चा पैदा नहीं किया, उनको वृद्धावस्था में सामाजिक सुरक्षा देने जैसे क़दम उठाए जाने चाहिए। हम दो हमारा कोई नहीं योजना प्रयोग के तौर पर पहले पांच साल फिर दस और बाद में बीस साल के लिए आजमाई जा सकती है।
भारतीय समाज में सदियों से लोग मानते आए हैं कि बच्चे बुढ़ापे में उनका पालन-पोषण करते हैं। ऐसा लोग देश में सोशल सिक्योरिटी न होने के कारण सोचते हैं। कह सकते हैं कि भारत पुत्र-प्रधान परंपराओं का देश है। पुत्र पैदा होने पर यहां लोग जश्न मनाते हैं। लोग मान कर चलते हैं कि बेटियां शादी के बाद दूसरे के घर चली जाती हैं, इसलिए बुढ़ापे में देखभाल के लिए पुत्र ज़रूरी है। पुत्र को लोग बुढ़ापे की लाठी भी मानते हैं। इसलिए हर दंपत्ति चाहता है, उसे एक बेटा ज़रूर हो। इसीलिए दो बेटियां होने पर कई लोग बेटे के लिए तीसरा बच्चा पैदा करते हैं। यह आम धारणा है।
बच्चों के बुढ़ापे में सहारा बनने की परिकल्पना कोरे भ्रम के अलावा और कुछ नहीं है। आजकल माता-पिता बच्चों के एजेंडे में होते ही नहीं। जो मां-बाप बच्चों को पालने, उन्हें बेहतर शिक्षा देने के चक्कर में क़ायदे से जीवन जी नहीं पाते, उन्हें उनकी ही औलाद बुढ़ापे में घर में अपमानित करती है, नारकीय जीवन की सौगात देती है। बुजुर्गो को बोझ मानकर उनका तिरस्कार करने की ख़बरे आए दिन अख़बारों की सुर्खियों में रहती हैं। ऐसे भी उदाहरण भी देखने को मिलते हैं, कि बेटे ने बूढ़े माता-पिता को घर से बाहर निकाल दिया। उम्र के अंतिम दौर में लोग वृद्धाश्रम में अकेले रहने को मजबूर किए जा रहे हैं।
डब्ल्यूएचओ और हेल्पेज के मुताबिक, 2026 में भारत में बूढ़ों की आबादी 17.32 करोड़ होने का अनुमान है। पॉप्युलेशन को उम्र के हिसाब से नज़र रखने वाली संस्था कंट्री मीटर्स की वेबसाइट के मुताबिक भारत में 65 साल या उससे ऊपर की आबादी 5.5 फ़ीसदी यानी सात करोड़ से ज़्यादा हैं। अनुमानतः 50 लाख लोग ऐसे हैं, जिनके पास बुढ़ापे में कोई सहारा नहीं है। ऐसे लोगों को 65 साल की उम्र होने पर सरकार की ओर से 20 हज़ार रुपए महीने पेंशन देने की योजना शुरू की जानी चाहिए। फ़ालतू योजनाओं में वैसे भी लाखों करोड़ रुपए बर्बाद होते हैं। अगर वृद्धावस्था में सामाजिक सुरक्षा की आकर्षक योजना शुरू हुई तो निश्चित रूप से लोगों में बेटे की चाहत कम होगी और आबादी पर अंकुश लगेगा।
भारत में इंसान इतने ज़्यादा हो गए हैं कि ज़मीन कम पड़ने लगी है। आबादी पर हर पल नज़र रखने वाली बेवसाइट सेंसस इंडिया के मुताबिक़ देश में हर घंटे तीन हज़ार (3080) बच्चे पैदा हो रहे हैं, जबकि हर घंटे एक हजार (1099) लोगों की मौत होती है। यानी देश की आबादी हर घंटे क़रीब दो हज़ार बढ़ जाती है। जनसंख्या विस्फोट को देखकर ही डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट ‘वर्ल्ड पॉप्युलेशन प्रोस्पेक्ट्स’ में कहा गया है कि इसी तरह बच्चे पैदा होते रहे तो भारत की आबादी सन् 2028 तक चीन से ज़्यादा हो जाएगी। इसका मतलब लोगों को रहने के लिए जगह नहीं बचेगी।
धर्म के आधार पर आबादी देखें तो मुसलमान अब भी दो से ज़्यादा बच्चे पैदा कर रहे हैं। 2011 की जनसंख्या में मुसलमानों की आबादी 14.2 फीसदी बताई गई। जबकि 2001 की जनगणना में भारत में मुस्लिम आबादी 13.4 फ़ीसदी थी। इसका मतलब दस साल में 0.8 फीसदी यानी लगभग एक फीसदी मुसलमान बढ़ रहे हैं। दूसरी तरफ 2011 की जनगणना के अनुसार देश की आबादी में हिंदुओं की संख्या 79.8 फीसदी थी। 2001 में हिंदुओं की संख्या 80.45 फीसदी थी, मतलब हिंदुओं का जनसंख्या कम हो रही है, यानी जनसंख्या वृद्धि में हिंदुओं का कोई योगदान नहीं है। हिंदुओं की आबादी पिछले दस साल में 0.66 फीसदी कम हुई। अगर धर्म के आधार पर देखें तो हर हिंदू स्त्री औसतन 2 बच्चे और हर मुस्लिम स्त्री औसतन 3 बच्चे पैदा कर रही है। जैन महिला केवल औसतन 1.2 बच्चे पैदा करती है। यह भी गौर करने वाली बात है कि यह आंकड़ा महिलाओं का है। निचले तबके के मुसलमानों में बड़ी संख्या लोग एक से ज़्यादा शादियां करते हैं। इस हिसाब से देखे तो हर औसत मुसलमान तीन से चार बच्चों का बाप होता। इसलिए मुस्लिम आबादी बढ़ रही है। इसी तरह हर हिंदू पुरुष अब दो से भी कम बच्चों का बाप होता है। इसलिए हिंदू आबादी घट रही है।


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भारत के पास विश्व की समस्त भूमि का केवल 2.4 फ़ीसदी हिस्सा है, जबकि विश्व की आबादी का 16.8 फ़ीसदी हिस्सा यहां रहता है। इस लिहाज़ से भारत दुनिया का सबसे ज़्यादा घनत्व वाला देश है। फ़िलहाल देश की आबादी 1.36 अरब पहुंच चुकी है। 68.86 करोड़ (51.54 फ़ीसदी) पुरुष और 64.49 करोड़ (48.46 फ़ीसदी) महिलाएं हैं। हर 1000 पुरुष के लिए 943 महिलाएं हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट के अनुसार चीन की अपेक्षा भारत की जनसंख्या दोगुनी तेजी से बढ़ रही है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत की जनसंख्या साल 2010 से 2019 के बीच सालाना 1.2 फीसदी की दर से बढ़ रही है।
19वीं सदी के उत्तरार्ध में इस भूभाग (तब भारत नहीं, ब्रिटिश इंडिया था) की आबादी ही क़रीब 17 करोड़ थी, लेकिन अब उससे ज़्यादा लोग हर दस साल में बढ़ जाते हैं। 20वीं सदी के आरंभ में ब्रिटिश इंडिया की आबादी 23.84 करोड़ से दस साल में 25.21 करोड़ हो गई। अगले दो दशकों में जनसंख्या 27.89 और 31.86 करोड़ हुई। आबादी में विस्फोट आज़ादी के बाद आया। सन् 1951 की जनगणना में पता चला, देश की आबादी 36 करोड़ को पार कर चुकी है। आबादी 1961 में उछलकर 43.9 करोड़ हो गई। सत्तर के दशक में लगा कि देश में बच्चे पैदा करने का कॉम्पटिशन शुरू हो गया है, क्योंकि दस साल में 11 करोड़ लोग बढ़ गए। आबादी 54 करोड़ हो गई। इसी तरह 1981 में 68.3 करोड़ और 1991 में 84.6 करोड़ हो गई। अगले दशक में 16 करोड़ लोग बढ़े। न्यू मिलेनियम में तो बच्चे पैदा करने के सारे रिकॉर्ड टूट गए। एक दशक में 21 करोड़ बच्चे पैदा हुए और 2011 में आबादी 1.21 अरब हो गई।
मज़ेदार बात यह है कि आज़ादी के बाद से ही केंद्र और सभी राज्य सरकारें कोशिश कर रही हैं कि इस पर अंकुश लगाया जाए लेकिन हर कोशिश टांय-टांय फिस्स हो रही है। देश में दो बार जनसंख्या नीति बन चुकी है, जिसमें जनसंख्या विस्फोट पर अंकुश लगाने और छोटे परिवार प्रमोट करने की बात थी, पर सब धरी की धरी रह गई। सन् 2000 से जनसंख्या आयोग भी अस्तित्व में आ चुका है। फिर भी आबादी थमने का नाम नहीं ले रही है। नसबंदी भारत में चीन से पहले से शुरू हुई, लेकिन ख़ास नतीजा नहीं निकला। अब प्रयोग के तौर पर गर्भवती महिला का पंजीकरण अनिवार्य होना चाहिए। यह काम देहात में ग्राम पंचायत और शहर में म्युनिसिपैलिटी को करनी चाहिए। सरकार का नेटवर्क गांव गांव और घर घर है, इसलिए यह काम कठिन नहीं है। हर गर्भवती महिला पर नज़र रखना ग्राम पंचायत अधिकारी और म्युनिसिपैलिटी के अधिकारी की ड्यूटी का हिस्सा कर दिया जाए।
सत्तर के दशक में चीन में ऐसी ही परिस्थियां थीं। लिहाज़ा, आबादी कंट्रोल करने के लिए चीन को 1979 में वन चाइल्ड पॉलिसी लागू करनी पड़ी। इसके तहत हर कपल को एक ही बच्चा पैदा करने की इजाज़त है। दूसरा बच्चा पैदा करने पर पैरेट्स के ख़िलाफ़ तो कार्रवाई होती ही है, बच्चे को 'गैरकानूनी बच्चा’ कहा जाता है। उसे निःशुल्क शिक्षा या सेहत संबंधी सुविधाएं नहीं दी जाती हैं। यही नहीं, बच्चा अपने ही देश में यात्रा नहीं कर सकता और किसी लाइब्रेरी का इस्तेमाल नहीं कर सकता। यह नीति के लागू होने से पहले चीन में लोग औसतन चार बच्चे पैदा करते थे। वन चाइल्ड पॉलिसी से आबादी पर तो अंकुश लगा ही, चीन में लोगों की ज़िंदगी पूरी तरह से बदल गई। जो भी हो, भारत को अगर समस्याओं का देश होने से बचाना है तो कठोर क़दम उठाने ही होंगे।

रविवार, 3 जुलाई 2016

अमरनाथ यात्रा - खतरों-बाधाओं के बावजूद बड़ी रोमांचक होती है बर्फीली पहाड़ों की यात्रा

हरिगोविंद विश्वकर्मा
हिमालय की गोद में स्थित पवित्र शिवलिंग तक पहुंचने की श्री अमरनाथ यात्रा शुरू है। जिसने कभी अमरनाथ की रोमांचक यात्रा नहीं की, वह धरती के स्वर्ग के एक ख़ास आनंद से वंचित रह गया है। इतना ही नहीं, अमरनाथ यात्रा पर न जाने वाला बड़ा नैसर्गिक खुशी भी मिस कर देता है। दरअसल, तमाम कठिनाइयों, बाधाओं और ख़तरों के बावजूद मॉनसून के दौरान दो महीने चलने वाली यह पवित्र यात्रा एक सुखद एहसास होती है। यही वजह है कि दिनोंदिन इसे लेकर उत्साह बढ़ता ही जा रहा है। पिछले दिनों हुए आतंकवादी हमले में 8 श्रद्धालुओं की मौत के बावजूद शिवभक्तों का उत्साह कम नहीं हुआ है।

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दरअसल, स्थानीय सरकार की लगातार उपेक्षा के बावजूद श्रद्धालुओं का उत्साह कम नहीं हुआ। अब तो अमरनाथ यात्रा धार्मिक यात्रा से बढ़कर राष्‍ट्रीयता का प्रतीक बन गई है। जम्‍मू बेस कैंप से जब श्रद्धालुओं का जत्‍था निलता है तो 'जय भालेनाथ' ‘बम-बम भोले’ और ‘हर-हर महादेव’ के साथ साथ 'वंदे मातरम्' 'जयहिंद' और ‘भारत माता की जय’ के भी सुर निकलते हैं। यही वजह है कि इस यात्रा पर आतंकवादियों की धमकियों और हमलों का भी कोई असर नहीं पड़ा। जम्मू से लेकर श्रीनगर, पहलगाम-बालटाल ही नहीं, पूरी यात्रा के दौरान जगह-जगह गैरसरकारी संस्थाओं की ओर से लंगर की व्यवस्था की जाती है। लोग खाते-पीते धूनी रमाए भोलेनाथ के दर्शन के लिए आगे बढ़ते रहते हैं।

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हिमालय की गोद में स्थित अमरनाथ हिंदुओं का सबसे ज़्यादा आस्था वाला पवित्र तीर्थस्थल है। पवित्र गुफा श्रीनगर के उत्तर-पूर्व में 135 किलोमीटर दूर समुद्र तल से 13 हज़ार फ़ीट ऊंचाई पर है। पवित्र गुफा की लंबाई (भीतरी गहराई) 19 मीटर, चौड़ाई 16 मीटर और ऊंचाई 11 मीटर है। अमरनाथ की ख़ासियत पवित्र गुफा में बर्फ़ से नैसर्गिक शिवलिंग का बनना है। प्राकृतिक हिम से बनने के कारण ही इसे स्वयंभू ‘हिमानी शिवलिंग’ या ‘बर्फ़ानी बाबा’ भी कहा जाता है।

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आषाढ़ पूर्णिमा से रक्षाबंधन तक चलने वाले पवित्र हिमलिंग दर्शन के लिए लाखों श्रद्धालु अमरनाथ यात्रा पर जाते हैं। गुफा में ऊपर से बर्फ के पानी की बूंदें टपकती रहती हैं। यहीं पर ऐसी जगह है, जहां टपकने वाली हिम बूंदों से क़रीब दस फ़िट ऊंचा शिवलिंग बनता है। चंद्रमा के घटने-बढ़ने के साथ-साथ बर्फ़ के लिंग का आकार भी घटता-बढ़ता रहता है। सावन की पूर्णिमा को यह पूर्ण आकार में हो जाता है और अमावस्या तक धीरे-धीरे छोटा हो जाता है। हैरान करने वाली बात है कि शिवलिंग ठोस बर्फ़ का होता है, जबकि आसपास आमतौर पर कच्ची और भुरभुरी बर्फ़ ही होती है।

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भगवान शिव के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक अमरनाथ को तीर्थों का तीर्थ कहा जाता है। मान्यता है कि इस गुफा में शंकर ने पार्वती को अमरकथा सुनाई थी, जिसे सुन सद्योजात शुक-शिशु शुकदेव ऋषि के रूप में अमर हो गए। गुफा में आज भी कबूतरों का एक जोड़ा दिखाई देता है, जिन्हें अमर पक्षी माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि जिन श्रद्धालुओं को कबूतरों जोड़ा दिखाई देता है, उन्हें शिव-पार्वती दर्शन देते हैं और मोक्ष प्रदान करते हैं। यह भी माना जाता है कि भगवान शिव ने 'अनीश्‍वर कथा' पार्वती को गुफा में ही सुनाई थी। इसीलिए यह बहुत पवित्र मानी जाती है। शिव ने पार्वती को ऐसी कथा भी सुनाई थी, जिसमें यात्रा और मार्ग में पड़ने वाले स्थलों का वर्णन था। यह कथा अमरकथा नाम से विख्यात हुई।

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कई विद्वानों का मत है कि शंकर जब पार्वती को अमर कथा सुनाने ले जा रहे थे, तो उन्होंने छोटे-छोटे अनंत नागों को अनंतनाग में छोड़ा, माथे के चंदन को चंदनबाड़ी में उतारा, अन्य पिस्सुओं को पिस्सू टॉप पर और गले के शेषनाग को शेषनाग नामक स्थल पर छोड़ा था। अमरनाथ गुफा का सबसे पहले पता सोलहवीं शताब्दी के पूर्वाध में एक मुसलमान गड़ेरिए बूटा मलिक को चला था। आज भी चौथाई चढ़ावा बूटा मलिक के वंशजों को मिलता है। यह एक ऐसा तीर्थस्थल है जहां फूल-माला बेचने वाले मुसलमान होते हैं। अमरनाथ गुफा एक नहीं है, बल्कि अमरावती नदी पर आगे बढ़ते समय और कई छोटी-बड़ी गुफाएं दिखती हैं। सभी बर्फ से ढकी हैं। मूल अमरनाथ से दूर गणेश, भैरव और पार्वती के वैसे ही अलग अलग हिमखंड हैं।

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अमरनाथ जाने के दो मार्ग हैं। पहला पहलगाम होकर और दूसरा सोनमर्ग बालटाल से। जम्मू या श्रीनगर से पहलगाम या बालटाल बस या छोटे वहन से पहुंचना पड़ता है। उसके बाद आगे पैदल ही जाना पड़ता है। कमज़ोर और वृद्धों के लिए खच्चर और घोड़े की व्यवस्था रहती है। पहलगाम से जानेवाला रास्ता सरल और सुविधाजनक है। बलटाल से पवित्र गुफा की दूरी हालांकि केवल 14 किलोमीटर है, परंतु यह सीधी चढ़ाई वाला बहुत दुर्गम रास्ता है, इसलिए सुरक्षा की नज़रिए से ठीक नहीं है। इसीलिए इसे सेफ नहीं माना जाता। लिहाज़ा, ज़्यादातर यात्रियों को पहलगाम से जाने के लिए कहा जाता है। हालांकि रोमांच और ख़तरे से खेलने के शौकीन इस मार्ग से जाना पसंद करते हैं। इस रास्तें से जाने वाले लोग अपने रिस्क पर यात्रा करते हैं। किसी अनहोनी की ज़िम्मेदारी सरकार नहीं लेती है।

दरअसल, श्रीनगर से पहलगाम 96 किलोमीटर दूर है। यह वैसे भी देश का मशहूर पर्यटन स्थल है। यहां का नैसर्गिक सौंदर्य देखते ही बनता है। लिद्दर और आरू नदियां इसकी ख़ूबसूरती में चार चांद लगाती हैं। पहलगाम का यात्री बेस केंप छह किलोमीटर दूर नुनवन में बनता है। पहली रात भक्त यहीं बिताते हैं। दूसरे दिन यहां से 10 किलोमीटर दूर चंदनबाड़ी पहुंचते हैं। चंदनबाड़ी से आगे इसी नदी पर बर्फ़ का पुल है। यहीं से पिस्सू घाटी की चढ़ाई शुरू होती है। कहा जाता है कि पिस्सू घाटी में देवताओं और राक्षसों के बीच घमासान लड़ाई हुई जिसमें राक्षसों की हार हुई। यात्रा में पिस्सू घाटी जोख़िम भरा स्थल है। यह समुद्रतल से 11,120 फ़ीट ऊंचाई पर है।

पिस्सू घाटी के बाद अगला पड़ाव 14 किलोमीटर दूर शेषनाग में पड़ता है। लिद्दर नदी के किनारे-किनारे पहले चरण की यात्रा बहुत कठिन होती है। यह मार्ग खड़ी चढ़ाई वाला और ख़तरनाक है। यात्री शेषनाग पहुंचने पर भयानक ठंड का सामना करता हैं। यहां पर्वतमालाओं के बीच नीले पानी की खूबसूरत झील है। इसमें झांकने पर भ्रम होता है कि आसमान झील में उतर आया है। झील करीब डेढ़ किलोमीटर व्यास में फैली है। कहा जाता है कि शेषनाग झील में शेषनाग का वास है। 24 घंटे में शेषनाग एक बार झील के बाहर निकलते हैं, लेकिन दर्शन खुशनसीबों को ही नसीब होता है। तीर्थयात्री यहां रात्रि विश्राम करते हैं और यहीं से तीसरे दिन की यात्रा शुरू करते हैं।

शेषनाग से पंचतरणी 12 किलोमीटर दूर है। बीच में बैववैल टॉप और महागुणास दर्रे पार करने पड़ते हैं, जिनकी समुद्रतल से ऊंचाई क्रमश: 13,500 फ़ीट व 14,500 फ़ीट है। महागुणास चोटी से पंचतरणी का सारा रास्ता उतराई का है। यहां पांच छोटी-छोटी नदियों बहने के कारण ही इसका नाम पंचतरणी पड़ा। यह जगह चारों तरफ से पहाड़ों की ऊंची-ऊंची चोटियों से ढका है। ऊंचाई की वजह से ठंड भी बहुत ज़्यादा होती है। ऑक्सीजन की कमी की वजह से तीर्थयात्रियों को यहां सुरक्षा के इंतज़ाम करने पड़ते हैं।

पवित्र अमरनाथ की गुफा यहां से केवल आठ किलोमीटर दूर रह जाती है। रास्ते में बर्फ ही बर्फ जमी रहती है। इसी दिन गुफा के नज़दीक पहुंचकर लोग रात बिता सकते हैं और दूसरे दिन सुबह पूजा-अर्चना कर पंचतरणी लौटा जा सकता है। कुछ यात्री शाम तक शेषनाग वापस पहुंच जाते हैं। रास्ता काफी कठिन है, लेकिन पवित्र गुफा में पहुंचते ही सफ़र की सारी थकान पल भर में छू-मंतर हो जाती है और अद्भुत आत्मिक आनंद की अनुभूति होती है।

दरअसल, जब चंदनवाड़ी या बालटाल से श्रद्धालु निकलते हैं, तो रास्ते भर उन्हें प्रतिकूल मौसम का सामना करना पड़ता है। पूरा बेल्‍ट यानी चंदनवाड़ी, पिस्‍सू टॉप, ज़ोली बाल, नागा कोटि, शेषनाग, वारबाल, महागुणास टॉप, पबिबाल, पंचतरिणी, संगम टॉप, अमरनाथ, बराड़ी, डोमेल, बालटाल, सोनमर्ग और आसपास का इलाक़ा साल के अधिकांश समय बर्फ़ से ढंका रहता है। इससे इंसानी गतिविधियां महज कुछ महीने रहती हैं। बाक़ी समय यहां का मौसम इंसान के रहने लायक नहीं होता। गर्मी शुरू होने पर यहां बर्फ पिघलती है और अप्रैल से यात्रा की तैयारी शुरू की जाती है।

पवित्र गुफा की ओर जाने वाले श्रद्धालुओं के लिए चंदनवाड़ी से अमरनाथ और बालटाल के बीच ठहरने या विश्राम करने का कोई अच्छा ठिकाना नहीं है। 30 किलोमीटर से अधिक लंबे रास्‍ते में अकसर तेज़ हवा के साथ कभी हल़की तो कभी भारी बारिश होती रहती है और श्रद्धालुओं के पास भीगने के अलावा और कोई विकल्‍प नहीं होता। बचने के लिए कहीं कोई शेड नहीं है, सो बड़ी संख्‍या में लोग बीमार भी हो जाते हैं। यही वजह है कि कमज़ोर कद-काठी के यात्री शेषनाग की हड्डी ठिठुराने वाली ठंड सहन नहीं कर पाते और उनकी मौत तक हो जाती है। इसीलिए मेडिकली अनफिट लोगों को अमरनाथ यात्रा पर नहीं जाने की सलाह दी जाती है।

दरअसल, आतंकवाद और धमकियों के बावजूद शेष भारत से लोगों, का जम्‍मू कश्‍मीर आना-जाना कम होने की बजाय बढ़ता ही गया। वजह रहे वैष्‍णोदेवी, अमरनाथ, शिवखोड़ी, खीर भवानी और बुड्ढा अमरनाथ जैसे धार्मिक स्‍थल। पहले वैष्‍णोदेवी की चढ़ाई लो‍कप्रिय हुई, फिर अमरनाथ यात्रा। देश भर से अमरनाथ गुफा जाने वालो की संख्या लगातार बढ़ ही रही है। श्रद्धालुओं को हतोत्साहित करने के लिए कभी लिंग के पिघलने तो कभी कृत्रि‍म लिंग लगाने का विवाद खड़ा किया गया, परंतु श्रद्धा कम नहीं हुई।

लोगों की बढ़ती भीड़ को देखकर सन् 2000 में श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड की भी स्‍थापना की गई। श्रद्धालुओं की इन कठिनाइयों को दूर करने के लिए केंद्र के आग्रह पर ग़ुलाम नबी आज़ाद सरकार ने 26 मई 2008 को श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड को बालटाल के पास डोमेल में वन विभाग की 800 कनाल यानी 40 हेक्‍टेयर ज़मीन आवंटित की थी, ताकि यात्रियों की सुविधा के लिए अस्थाई शिविर यानी टेंपररी शेड बनाए जा सकें। प्रस्‍तावित शेल्‍टर में नहाने, खाने और रात में ठहरने की सु‍विधा होती। बदले में 2.5 करोड़ रुपए का मुआवजा भी तय किया गया था। दरअसल, पहले मामला जम्‍मू–कश्‍मीर हाईकोर्ट में गया, जहां अदालत ने साफ़ कहा कि यात्रियों की सुविधा के लिए प्रीफैब्रिकेटिड हट बनाए जाएं और अन्य सुविधाएं दी जाएं।

मौजूदा मुख्यमंत्री मेहबूबा मुफ़्ती, उनकी पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी और घाटी के अलगाववादी नेताओं ने ज़मीन हस्तांतरण का भारी विरोध किया था। इनकी शह पर श्रीनगर में हिंसा हुई, जहां पुलिस की गोली से कई उपद्रवी मारे गए। तब राज्य में कांग्रेस-पीडीपी गठजोड़ की सरकार थी। मेहबूबा ने धमकी दी कि ज़मीन आवंटन रद नहीं हुआ तो समर्थन वापस ले लेंगी। लिहाज़ा, पहली जुलाई 2008 को ज़मीन का आवंटन रद कर दिया गया और श्राइन बोर्ड के मुख्‍य कार्यकारी व राज्‍यपाल के प्रधान सविच अरुणकुमार को भी बर्खास्‍त कर दिया गया। इस तरह अमरनाथ की कठिन यात्रा पर जाने वाले श्रद्धालुओं के लिए उनके अपने देश में शिविर बनाने का सपना साकार नहीं हो सका।

वैसे अथाई शेड की ज़रूरत बालटाल ही नहीं, डोमेल, संगम टॉप, अमरनाथ, पंचतरिणी, पिस्‍सू टॉप, चंदनवाड़ी और नुनवन में भी है, क्‍योंकि कपड़े के जो टेंट बनाते हैं, उसमें श्रद्धालु भीग जाते हैं। राज्य में ऐसा पहली बार नहीं हुआ था कि किसी संस्थान को वन विभाग की भूमि दी गई हो। राजौरी में बाबा बडशाह गुलाम यूनिवर्सिटी के लिए पांच हजार कनाल भूमि दी गई। इसी तरह कई मजहबी तंजीम को वन विभाग की ज़मीन दी जा चुकी है। इतना ही नहीं वन भूमि की ज़मीन के लिए आंसू बहाने वाले कई कश्मीरी नेताओं ने अपना घर बन विभाग की ज़मीन पर क़ब्‍ज़ा करके बनवाया है।

दरअसल, यह कश्‍मीरियों के आतिथ्‍य का असर रहा है कि सदियों से लोग ख़ूबसूरत पहाड़ों और झीलों का आनंद लेने धरती के इस स्‍वर्ग पर आते रहे हैं। बेहतरीन मेहमाननवाज़ी के लिए मशहूर कश्‍मीरी आवाम जागरूक और संवेदनशील मानी जाती रही है। उसी अवाम की तहज़ीब और डेमोग्राफी केवल 40 हेक्‍टर ज़मीन श्राइन बोर्ड को देने से से ख़तरे में पड़ गई थी। होना तो यह चाहिए था कि मुस्लिम बाहुल्‍य राज्‍य होने के नाते कश्‍मीरी लीडरशिप को एकमत से बोर्ड को ज़मीन देने के फ़ैसले को मानना चाहिए था, क्‍योंकि यह पूरी दुनिया के करोड़ों हिंदुओं के आस्‍था का सवाल था।

मगर छोटे दिल के मीरवाइज़ फ़ारुक उमर और सैयद अली शाह गिलानी अस्‍थाई शेल्‍टर से बुरी डर गए। सेल्‍फ़रूल का राग आलापने वाले पीडीपी की मेहबूबा को भी डर आतंकित कर गया। ग्रेटर आटोनॉमी पर ज़ोर देने वाले नैशनल कांग्रेस के फ़ारूक अब्‍दुल्‍ला और उमर अब्‍दुल्‍ला को भी कश्‍मीर की डेमोग्राफी और संस्‍कृति के नष्‍ट होने का डर सताने लगा था। इन लोगों ने मान लिया कि अगर अस्‍थाई शेल्‍टर बने तो कश्‍मीरी कल्‍चर के पतन की शुरुआत हो सकती है।

यह कटु भी सच है कि यह राज्‍य केंद्र की मदद के बिना एक दिन भी सरवाइव नहीं कर सकता। राज्‍य के सालाना बजट में राज्‍य सरकार का योगदान महज 14 फ़ीसदी हो ता है। राज्‍य के कर्मचारियों के क़रीब क़रीब पूरा वेतन केंद्र वहन करता है, जो पूरे देश के टैक्सपेयर्स का पैसा होता है। दरअसल, यहां राज करने वालों ने अपने रिश्‍तेदारों या पार्टीके लोगों को खैरात में सरकारी नौकरी बांटी। नतीजा यह हुआ कि कर्मचारियों की संख्‍या क़रीब पौने तीन लाख है जिनमें आधे के पास काम ही नहीं। राज्‍य में साढ़े चार लाख से ज़्यादा पंजीकृत बेरोज़गार हैं जिनमें एक लाख से अधिकत स्‍नातक, लॉ स्‍नातक या स्‍नातकोत्‍तर हैं। औसतन एक कश्‍मीरी, दूसरे राज्‍य के नागरिक के मुक़ाबले केंद्र से आठ गुना पैसा पाता है। इसी तरह औसतन पांच सदस्‍यों वाला हर कश्‍मीर परिवार को भारत के खज़ाने से क़रीब 41 हज़ार रुपए हर साल मिलता है। कश्मीरियों की पर कैपिटा केंद्रीय सहायता भारतीयों की परकैपिटा केंद्रीय सहायता के क़रीब आठ गुना है।

जिस देश की जनता इस राज्य के लिए इतना कुछ करती है, उस देश के श्रद्धालुओं के लिए अस्थाई सेल्टर नहीं बनाने दिया गया। यह सुनकर हैरानी और दुख होता है। जबकि होना यह चाहिए कि हर जगह श्रद्धालुओं के लिए व्यवस्था होना ही चाहिए। भारत में हर धर्म के लोग रहते हैं, हिंदू हो, मुसलमान हो, सिख हों या ईसाई हों, केंद्र या राज्‍य सरकारें सभी महत्‍वपूर्ण धर्मथलों पर बुनियादी सुविधा उपलब्‍ध कराने के लिए कश्‍मीर से कन्‍याकुमारी और गुजरात से बंगाल तक कहीं भी ज़मीन आवंटित करने का अधिकार होना चाहिए ताकि जो लोग कहीं जाते हैं, उन्हें बेहतर सुविधाएं दी जा सकें।
https://youtu.be/ia7G_zvAx04